आज दिनांक 3 जनवरी 2019 को वाग्देवी सुता गणिनी आर्यिका रत्न 105
श्री सुभूषण मति माताजी ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा- यह नगरी अत्यंत पुण्य धरा है , जहां तपस्वी आचार्य चारित्र चक्रवर्ती श्री शांति सागर जी से परम्परा के वर्तमान सप्तम पट्टाचार्य श्रीअनेकांत सागर जी सभी आचार्य भगवन्तोके चरण रज से पवित्र एवं चातुर्मास की साक्षी तथा अनेकानेक अन्य संतों का सानिध्य जिस सप्तरंगी कांठल नगरी प्रतापगढ को प्राप्त वह किसी देव भूमि से कम नहीं है।

श्री सुभूषणमति माताजी Subhushanmati Mataji


धर्म सभा को संबोधित करते हुए माताजी ने सोने की कला को समझा आर्यिका रत्न
श्री सुभूषणमती माताजी ने कहा प्रतिदिन सभी सोते हैं और जागते हैं पर कुछ ऐसे विशेष व्यक्ति होते हैं जो स्वयं जागते हैं और जीवन में दूसरों को जगाते हैं, सिर्फ तन से नहीं मन से भी जगाते हैं। पूज्य माताजी ने समझाया दिन में कोई ऐसा काम मत करो जिससे रात में नींद ना आवे और रात में कोई ऐसा काम मत करो जिससे सुबह उठकर मुंह दिखाने काबिल भी ना रहें।
सोते समय दिन भर की क्रियाओं का चिंतन करें ।
सोते समय कपड़े ढीले पहनते हो तो अपने मन को भी ढिला करो क्योंकि अहंकारी व्यक्ति जीवन में अपने अपराध कभी नहीं देख पाता है । किसी बात को सुनकर बडा पेट रखो बात को पचाना सीखोगे तो सुंदरकांड होगा वरना लंकाकांड हो जाएगा और तुम्हारी सोने की नगरी जलकर खाक हो जावेगी।

जैसे पुराना ,गंदा कपड़ा उतार देते हैं, उसी प्रकार कषाया को भी उतार फैंको। दुबारा मत अपनाओ। मन रूपी कपड़े को चिंतन रूपी मशीन में बस दो मिनट झकोर कर सम्यक ज्ञान से सुखा लो, चारित्र की चमक आ जावेगी।
अच्छा व्यापारी अपना हिसाब रोज का रोज मिलाता है इसी तरीके से आप भी अपने पाप और पुण्य के हिसाब को प्रतिदिन मिलाकर समझ लिया करो
माताजी ने कहा
रात में देखे सपने नहीं पूरे होते हैं सपने वे पूरे होते हैं जो जागते हुए दिन में देखें और उसे पाने के लिए हमें रात में निंद नहीं आवे।
सभी भक्त किसी सुखद सपने में खो रहे थे और समय ने अपना डंका बजा दिया

जीवन में ऐसे ही आज 2 जनवरी को प्रातः आगमिक , वात्सल्य मूर्ति गणिनी आर्यिका
श्री सुभूषण मती माता जी ने थर्मल नगरी प्र ता प गड को परिभाषित किया
प्र _ प्रकष्ट रूप से, ता_ ताप प_ पाप जंहा गड जावे अर्थात नष्ट हो जावे, एसी पुण्यशाली नगरी यह है। माताजी ने सांकेतिक भाषा में कहा जिनके मन काले होते हैं उनका वर्ष भी काली रात में प्रारंभ होता है।
जिनका मन साफ होता है उनका नया दिन भी प्रातः काल की सुंदर रश्मि ओं के साथ होता है। जिन्हें महावीर नव वर्ष की तुलना में कैलेंडर पलटने का नववर्ष सुंदर लगता है वह समझ लेंवे कैलेंडर के पन्ने पलटने से जीवन में नवीनता नहीं आएगी जीवन में नवीनता लाने के लिए हमारे
मन के पन्ने को पलटना पड़ेगा
जिंदगी में अहंकार और मम् कार को धूल में डालना पड़ेगा कैलेंडर बदलने के स्थान पर अपने मन के चिंतन की धारा को बदलो , अन्तरंग की आत्मा से दर्शन करें , उसे धवल बनावो अर्थात सम्यकत्व की ओर मोड़ो तब जीवन की कालीमा हटेगी और व्हाइट मनी सा उजाला सवेरा सम्यक दर्शन का प्रस्फुटित होवेगा।
सार गर्भित वाणी में माताजी ने कहा
तमन्नाओं को इच्छाओं को मेटना स्वयं को बदलना है स्वयं को
प्रयास करना है स्वयं को और आनंद पाना है स्वयं को
अतः स्वयं के आनंद के लिए प्रयास प्रारंभ कर देना
संवेदनशील सभा को पुज्य माताजी ने सचेत किया
जिवन मिला है कर्म काटने केलिए इसे समय काटने में व्यर्थ मत गंवा देना।
सारगर्भित वाणी से मंत्रमुग्ध होकर सभी भक्त गण सभा में इस तरह बैठे थे , कि घर की याद भूल गए , परंतु समय की सुईया आगे चल रही थी सबने जय घोष के साथ में निज धाम को प्रस्थान किया कल और रसपान की आस लिए।

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