तत्वार्थ सुत्र अध्याय ३-२३ से ३१
#1

तत्वार्थसूत्र जी
(आचार्यश्री  उमास्वामी विरचित)
अध्याय ३
मध्य लोक -(आगे)
'मोक्षमार्गस्य नेतराम ,भेतारं कर्मभूभृतां !
ज्ञातारं विश्वतत्त्वानां,वन्दे तद्गुणलब्द्धये' !!

भरत आदि क्षेत्रों में बहने वाली महानदियों की सहायक नदियां
चतुर्दशनदीसहस्रपरिवृतागङ्गासिन्ध्वादयोनद्यः ॥२३॥
संधि विच्छेद-चतुर्दश+नदी+सहस्र+परिवृता+गङ्गा+सिंधु:+आद्य:+नद्यः
शब्दार्थ-चतुर्दश-चौदह,नदी-नदिया,सहस्र-हज़ार परिवृता-घिरे हुए है  गङ्गा+सिंधु:,आद्य:-आदि, नद्यः सहायक नदियों से !
अर्थ-गंगा सिंधु आदि महानदिया चौदह-चौदह  हज़ार सहायक नदियों से घिरी  हुई है !भावार्थ-गंगा-सिंधुनदी से १४०००,१४०००,,रोहित-रोहितास्या से २८०००-२८०००,हरी हरिकांता से ५६०००-५६०००,सीता-सीतोदा से ११२०००-११२०००,नारी-नारीकांता से-५६०००-५६०००,सुवर्णकूला -रूप्यकूला से २८०००-२८००० तथा रक्त और रक्तोदा से १४०००-१४००० नदिया घेरी हुई है !
नोट- नदियों की संख्या विदेह क्षेत्र पर्यन्त दुगना दुगना तथा उसके बाद दक्षिण क्षेत्र के सामान ही है जैसे की सूत्र  २५ में भी क्षेत्रों और २६ में खा गया है !
क्षेत्रों का विस्तार -
भरतःषड्विंशतिपञ्चयोजनशतविस्तारःषट्चैकोनविंशतिभागायोजनस्य ॥२४॥
संधिविच्छेद -भरतः+षड्विंशति पञ्च+योजन+शत+विस्तारः+षट् +च+एकोन+विंशति+भागा+योजनस्य
शब्दार्थ-भरतः-भरत,षड्विंशति=छःऔरबीस/छब्बीस,पञ्च-पांच,योजन-योजन,शत-सौ,विस्तारः-विस्तार, षट्-छः च-और एकोन-एक कम,विंशति-बीस,भागा-भाग योजनस्य-योजन का
अर्थ-भरत क्षेत्र का विस्तार पांच सौ छब्बीस योजन और योजन के बीस भाग में से १ भाग कम अर्थात उन्नीस भाग के छः  भाग है !
भावार्थ= भरत क्षेत्र का दक्षिण से उत्तर तक का विस्तार पांच सौ छब्बीस अधिक  ६ /१९  योजन है !
अन्य पर्वतो और क्षेत्रों का विस्तार-
तदद्विगुणाद्विगुणा विस्तारा वर्षधर वर्षा विदेहान्ता:-!!२५ !!
संधि विच्छेद -तद+द्विगुणा+द्विगुणा+विस्तारा+वर्षधर+वर्ष +विदेह+अन्ता:-!!
शब्दार्थ-तद-उनका,द्विगुणा-दुगना,द्विगुणा-दुगना,विस्तारा+विस्तार,वर्षधर-पर्वतोंका,वर्षा-क्षेत्रोंका,विदेह- विदेह ,अन्ता:-तक -!!
अर्थ -विदेह क्षेत्र तक उन पर्वतों और क्षेत्रों का क्रमश:दुगना दुगना विस्तार है !
भावार्थ
हिमवन्  पर्वत का विस्तार दक्षिण से उत्तर में भरत क्षेत्र से दुगना अर्थात १०५२ और १२/१९ योजन है
हेमवत्  क्षेत्र का विस्तार हिमवान पर्वत के विस्तार से दुगना अर्थात २१०५,५/१९ योजन है,
महाहिमवान पर्वत का विस्तार हेमवत्  क्षेत्र से दुगना अर्थात ४२१०,१०/१९ योजन है,
हरि  क्षेत्र का विस्तार महहिमवान  पर्वत से दुगना अर्थात ८४२१,१/१९ योजन है,
निषध पर्वत का विस्तार हरि  क्षेत्र से दुगना अर्थात १६८४२ ,२/१९ योजन तथा
विदेह क्षेत्र का विस्तार निषध पर्वत के विस्तार से दुगना अर्थात ३३६८४,४/१९ योजन है !
विदेह क्षेत्र से आगे पर्वतों और क्षेत्रों का विस्तार-
उत्तरदक्षिणतुल्य:  !!२६ !!
संधिविच्छेद -उत्तर+दक्षिण+तुल्य:
शब्दार्थ -उत्तर दिशा में दक्षिण दिशा के समान ही (पर्वतों और क्षेत्रो का) विस्तार है!
भावार्थ-
ऐरावत क्षेत्र का विस्तार दक्षिण के भरत क्षेत्र के समान ५२६,६ /१९ योजन है,
पुण्डरीक पर्वत का  हेमवन पर्वत के सामान १०५२,१२/१९ योजन है !
हैरण्यवत्  क्षेत्र का विस्तार हेमवत क्षेत्र के समान २१०५ ,५ /१९ योजन है ,
रुक्मिन पर्वत का विस्तार महहिमवान पर्वत के समान ४२१०,१०/१९ योजन है,
रम्यक क्षेत्र का विस्तार हरी क्षेत्र के समान ८४२१,१ /१९ योजन है
नील पर्वत का विस्तार निषेध पर्वत के समान १६८४२,२/१९ योजन है!
भरत ऐरावत क्षेत्रों में  काल परिवर्तन -
भरत क्षेत्र में षट काल परिवर्तन व्यवस्था
१-अवसर्पिणी के छ काल क्रमश; प्रथम सुषमा सुषमा काल ४ कोड़ा कोडी सागर का उत्कृष्ट भोगभूमि का है -
जन्म लेने पर बच्चे सोते सोते ३  दिन तक अंगूठा चूसते है ,३ दिन  में घुटने के बल  चलते है,फिर ३ दिन  में मधुर तुतलाती भाषा बोलते है,फिर ३  दिनों  में पैरो पर चलने लगते है,फिर ३ दिनों  में कला और रूप आदि गुणों से युक्त हो जाते है,फिर ३  दिनोमें  में युवावस्था को प्राप्त करते है,फिर ३ दिनों में  सम्यग्दर्शन  धारण करने  की योग्यता प्राप् कर लेते है !ये बेर के फल  के समान  चौथे दिन  आहार लेते है!इनकी आयु ३ पल्य लम्बाई ३ कोस अर्थात ६००० धनुष  होती है!इस काल में जीवों का वर्ण उगते हुए सूर्य  समान होता है 
२- अवसर्पिणी का द्वित्य काल ३ कोड़ा कोडी सागर का माध्यम भोग भूमि का होता है !जन्म लेने पर बच्चे सोते सोते ५  दिन तक अंगूठा चूसते है ,५ दिन में घुटने के बल  चलते है,फिर ५ दिन  में मधुर तुतलाती भाषा बोलते है,फिर ५ दिनों  में पैरो पर चलने लगते है,फिर ५ दिनों  में कला और रूप आदि गुणों से युक्त हो जाते है,फिर ५ दिनोमें  में युवावस्था को प्राप्त करते है,फिर  ५ दिनों में  सम्यग्दर्शन  धारण करने  की योग्यता प्राप् कर लेते है !ये बेहड़ा फल  के समान  तीसरे  दिन  आहार लेते है !इनकी आयु २ पल्य लम्बाई २  कोस अर्थात ४००० धनुष होती है!इस काल में जीवों का वर्ण चद्रमा की कांति  के समान उज्ज्वल होता है 
३-अवसर्पिणी का तीसरा काल दुषमा सुषमा २ कोड़ा कोडी सागर का  जघन्य भोग भूमि होती है !जन्म लेने पर बच्चे सोते सोते ७ दिन तक अंगूठा चूसते है ,दुसरे सप्ताह में घुटने के बल  चलते है,तीसरे सप्ताह में मधुर तुतलाती भाषा बोलते है,चौथे सप्ताह में पैरो पर चलने लगते है,पांचवे सप्ताह में कला और रूप आदि गुणों से युक्त हो जाते है,छठे सप्ताह में युवावस्था को प्राप्त करते है,सातवे सप्ताह में सम्यग्दर्शन के धारण की योग्यता प्राप् कर लेते है !ये आवले के समान  दूसरे  दिन  आहार लेते है !इनकी आयु १ पल्य लम्बाई १ कोस अर्थात २००० धनुष होती है!इस  हरित और श्याम वर्ण के जीव उत्पन्न होते है 
भोगभूमि में जीवों के  सइस काल में जीवों के सम्यक्त्व के कारण-यहाँ जीवों को जातिस्मरण ,देवों  के उपदेशों ,सुखों/दुखो के अवलोकन से, जिनबिम्ब दर्श से और स्वभावत: भव्य जीवों को सम्यक्त्व होता है !
भोगभूमि की अन्य विशेषताए -
भोगभूमि का जीवों को  सुख भरत क्षेत्र के चक्रवर्ती से भी अधिक होता है ! जीवों का बल ९००० हाथियों के बराबर होता है !भोगभूमि में विकलत्रय जीव उत्पन्न नहीं होते ,विषैले सर्प ,बिच्छू  आदि जंतु नहीं उत्पन्न होते !वहां ऋतुओं का परिवर्तन नहीं होता ,मनुष्यों की यहाँ  वृद्धावस्था नहीं होती ,उन्हें कोई रोग नहीं होता ,कोई चिंता नहीं होती ,उन्हें निंद्रा नहीं आती!
भोगभूमि में युगल बच्चे ही युवा होने पर पति पत्नी की तरह रहते है,कोई विवाह व्यवस्था नहीं है !यहाँ जीवों को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ती के लिए पुरुषार्थ नहीं करना पड़ता ,सभी की पूर्ती दस प्रकार के कल्प वृक्षों के नीचे खड़े होकर याचना करने से हो जाती है !
- अवसर्पिणी का चौथा  दुषमा सुषमा काल कर्मभूमि का १ कोड़ा कोडी सागर में से ४२००० वर्ष कम का होता है !इसमें सभी जीवों को अपनी जीविका के लिए पुरुषार्थ करना पड़ता है क्योकि कल्प वृक्षों की फलदान शक्ति समाप्त हो जाती हा !इसमें जीवों की उत्कृष्ट आयु १ कोटि पूर्व ऊंचाई ५०० धनुष होती है!इसी काल मे धर्म प्रवर्तन होता है ,६३ श्लाखा पुरुष; १६९ महान पुरुष २४ तीर्थंकरों के  माता,पिता, कामदेव ,१४ ,कुलकर,११रुद्र,१२ चक्रवर्ती,९-९ बलभद्र,नारायण और प्रतिनारायण ,नारद  होते है !
५- अवसर्पिणी का पंचम  दुःखमा काल २१००० वर्ष का   है जिसमे जीव का हीन  सहनन ,भ्रष्ट आचरण ,पांचों वर्ण के काँति रहित, उत्कृष्ट  आयु १२० वर्ष और ऊचाई ७  हाथ होती है !इस काल में अधिकांश जीव  दुःखी ही रहते  है जीव  ,यह भी कर्म भूमि का काल है !सभी जीव मिथ्यात्व  में जन्म लेते है !पंचम काल के अंत से ३ वर्ष ८ माह १५ दिन पूर्व जैन धर्म और राजा लोप हो जायेंगे,अग्नि समाप्त हो जायेगी !तब तक इस कल में  महावीर के निर्वाण से प्रयेक १००० वर्ष के अंतराल पर अवधि ज्ञानी मुनि और चतुर्विध संघ होगा तथा  एक कल्कि राजा उत्पन्न होता रहेगा जोकि मुनि के आहार में से कर के रूप मे पहिला ग्रास वसूलने के कारण नरक में जाएगा और मुनि की अंतराय होने के कारण वे समाधी लेकर स्वर्ग जाएंगे इसी शृंखला में अंतिम के समय वीरांगज अवधि ज्ञानी मुनि,सर्वश्री नामक आर्यिका ,तथा अग्निल और पंगु श्री नामक युगल श्रावक -श्राविका होंगे !अंत में ये आहार और परिग्रहों का त्याग कर समाधी मरण ग्रहण करते है !प्रत्येक ५०० ५०० वर्षों के अंतराल पर उपक्लकी भी होते रहेंगे !इस काल में मिथ्या ब्राह्मणों का सत्कार होगा !
६- अवसर्पिणी का छठा दुःखमा दुःखमा काल २१००० वर्ष का  है यहाँ !जीवों को धर्म ,दया ,क्षमा आदि गुणों रहित होने के कारण दुःख ही दुःख है,वे नग्न ही जीवन व्यतीत करते है ! सभी जीव इस काल में मिथ्यात्व मे धुए के समान काले वर्ण युक्त।गूंगे,बहरे,अंधे,कुरूप,पशु के समान  स्वभाव के उत्पन्न होकर मिथ्यात्व में ही मरते है !अधिकांशत जीव नरक गति को ही प्राप्त करते है !इस काल मे हिंसा इतनी बढ़ जाती है की मनुष्य मनुष्य का भक्षण करने लगता है !इस काल के अंत से ४९ दिन पूर्व महा प्रलय भरत और ऐरावत क्षेत्र के आर्य खंड मे होती  है जिसमे १ योजन तक की चित्रा पृथिवी जल कर भस्म  हो जाती है !इन ४९ दिनों में ७-७ दिन के लिए क्रमश:शीट,क्षार,विष,वज्र,धुल और धूम की वर्षाये होती है जिसने इन क्षेत्रों के आर्य खंड में सभ्यता का सर्वनाश हो जाता है !यह प्रलय उत्सर्पिणी काल के प्रथम काल के ४९ दिनों तक रहती है , जिसके बाद देवों  द्वारा विज्यार्ध पर्वत और गंगा सिंधु नदी के बीच  की गुफाओं में छुपाये गए ७२ युगल और असंख्यात युगल भरत के आर्यखण्ड में  लौटकर जीवन प्रारम्भ भादो पंचमी शुक्ल पक्ष में करते है ,पंचमी से हम उसी याद में १० दिन का दस लक्षण शाश्वत पर्व मनाते है !यहाँ जीवों की उत्कृष्ट आयु २०-१५  वर्ष और ऊंचाई १  हाथ तक  होती है !उत्सर्पिणी काल का आरम्भ श्रवण कृष्णा प्रतिपदा को होता है !जिसके प्रारम्भ में प्रत्येक ७-७ दिन तक क्रमश जल,दूध,घृत ,अमृत ,सुगंधित पवन आदि की शुभ वर्षाये होती है जिससे सभी जगह शांति मय  वातावरण हो जाता है !यह दिन भाद्र शुक्ल पंचमी का होता है !!
उत्सर्पिणी के छ: काल अवसर्पिणी के ठीक विपरीत है !अर्थात पहिला  काल दुःखमा  दुःखमा-२१००० वर्ष ,कर्म भूमि  ,दूसरा दुःखमा -२१००० ,वर्ष कर्म भूमि  है !उत्सर्पिणी का छठा दुःखमा दुःखमा काल और दुःखमा काल के २०००० वर्ष व्यतीत होने के बाद अर्थात उखमा काल के १००० वर्ष शेष रहने पर प्रथम कुलकर  जन्म लेते है !जो मुष्यों को खाना बनाने की,कुलाचार आदि की  शिक्षा देते है !तीसरा काल  कर्म भूमि का १कोड़ा  कोडी सागर में ४२००० वर्ष कम , चौथा काल जघन्य भोग भूमि २ कोड़ा ,कर्मभूमि कोडी सागर का है, पंचमकाल सुखमाँ ३कोड़ा कोडी सागर का माध्यम भोग भूमि है  छठा काल सुखमा सुखमा ४ कोड़ा कोडी सागर का उत्तम भोगभूमि है ! इन  कालों में जीवों की आयु ,सुख सम्पदा ,ऊंचाई क्रमश बढ़ती है इसलिए इस काल का नाम उत्सर्पिणी काल सार्थक है !
  असंख्यात अवसर्पिणी काल के व्यतीत होने पर एक हुँडावसर्पिणी काल आता है जिसमे अनहोनी घटनाएं जैसे तीर्थंकर ऋषभदेव जी के पुत्रियों का जन्म होना,५-तीर्थंकरों वासुपूज्य,मल्लिनाथ,नेमिनाथ जी,पार्श्वनाथ जी और महावीर जी  का बालयति होना,६३ श्लाखा पुरुषों की जगह ५८ ही होना ,तीर्थंकरो ऋषभदेव जी का अवसर्पिणी काल के तीसरे काल में उत्पन्न होकर मोक्ष प्राप्त करना,भरत चक्रवर्ती के मान का गलन होना ,तीर्थंकरों पर उपसर्ग होना ,तीर्थंकरों का अयोध्या के अतिरिक्त अन्य स्थानों पर जन्म लेना,तीर्थंकरों  सम्मेद शिखर जी के अतिरिक्त अन्य स्थानों से मोक्ष प्राप्त करना इत्यादि !वर्तमान में यहाँ हुन्डावसर्पिनी काल ही चल रहा है !
 भरत और ऐरावत के म्लेच्छ खंडो तथा विज्यार्ध पर्वत की श्रेणियों में अवसर्पिणी के चतुर्थ काल के आदि से अंत तक परिवर्तन होता है,जब आर्य खंड में अवसर्पिणी का प्रथम ,द्वित्य और तृतीय  काल वर्तता है उस समय म्लेच्छ खंड और विज्यार्ध की श्रेणियों में  मनुष्यों की उत्कृष्ट  आयु १ कोटी पूर्व और ऊंचाई ५०० धनुष होती है!

()  भरत और (ऐरावत क्षेत्रो कें मात्र आर्य खण्डों  मे जीवो की अवगाहना,आयुवीर्यसुख-दू: ,भोगोपभोगो आदि  में उत्सर्पिणी के छह  कालों में क्रमशः वृद्धि होते है तथा अवसर्पिणी में कमी होती हैम्लेच खंडो  विज्यार्द्ध की श्रेणियों  में  कालों का परिवर्तन  नहीं होता  है वहा  सदा  थे काल के सामान परिवर्तन होता हैजब आर्य खंड में .. काल वर्तता तब इनमें जीवों की अवगाहना ५०० धनुष और आयु  पूर्व कोटि होती है,जब  था काल वर्तता है तब वहां जीवों की अवगाहना ५०० धनुष से घटते घटते  हाथ तक आर्य खंड की भांती होती है ,जब --काल वर्तता है तब आर्य खंड की भांती  हाथ से घटकर  हाथ तक नहीं रह जाती हैउत्सर्पिणी काल में इससे विपरीत अवगाहना,आयु  बढती हुई होती है ! अवसर्पिणी के ,और उत्सर्पिणी के , काल,कुल  ८४००० वर्षों मेंम्लेचखंड,विज्यर्द्ध की श्रेणियों में,सात हाथ की ही काया रहती है!जब आर्य खंड में उत्सर्पिणी के ३सरे  काल में अवगाहना बदनी शुरू होती है तब वहां भी काया सात हाथ से - ५०० धनुष तक बढती हैअर्थात म्लेचखंड,विज्यर्द्ध की श्रेणियों में १८ कोड़ा कोडी सागर तकअव्सिर्पिनी के ,,,- उत्सर्पिणी के,,,,कालों मेंमनुष्यों  की आयु  कोटि पूर्व और अवगाहना ५०० धनुष रहती हैअतः अवसर्पिणी के ४थे काल में  आयु  शरीर की अवगाहना घटती है व् उत्सर्पिणी के तीसरे काल में बढती है उसी प्रकार म्लेचखंड,विज्यर्द्ध की श्रेणियों में घटती  बढती है!जब आर्य खंड में पांचवा छठा काल तथा उत्सर्पिणी का प्रथम और दूसरा काल कुल ८४००० वर्ष का चल रहा होता है तब ७ हाथ की काया रहती है !
इसलिए चक्रवर्ती की ९६००० रानियों में से ३२००० विज्यार्ध पर्वत की श्रेणियों से ,३२००० म्लेच्छ खंड से और ३२००० आर्य खंड से हो जाती है !उत्सर्पिणी के तीसरे -चौथे ,पांचवे और छट्टे काल में अवगाहना ५०० धनुष हो जाती है ! चक्रवर्ती छह  खंडो का विजेता होता है तथा नारयण और प्रतिनारायण तीन खंडो के इसलिए अर्द्ध चक्रवर्ती कहलाते है 
 उत्सर्पिणी काल के समय तृतीयकाल के अंत से लेकर आदि तक परिवर्तन होता है !इनमे आर्यखण्ड की तरह ष ट काल परिवर्तन नहीं होता है !भरत ऐरावत के म्लेच्छ खण्डों  और विजयार्ध पर्वत की श्रेणियों  में  प्रलय नही होती  होती !
विजयार्ध पर्वत,
२५ योजन ऊँचा और मूल में दूना,भरत क्षेत्रों को बीचों बीच उत्तर और दक्षिण  दो भागों में विभाजित करता है !इसका प्रत्येक भाग, गंगा और सिंधु नदियों के द्वारा ३-खंड उत्तर और -३ खंड दक्षिण में  विभाजित  हो जाते है ,इस प्रकार भरत क्षेत्र के छह खंड हो जाते है ! विज्यार्ध के उत्तर में तीनो खनंद म्लेच्छ खंड है और दक्षिण में बीच का कदंड आर्य खंड और उसके दोनों ओर के २ खंड म्लेच्छ खंड है !हमारी सम्पूर्ण पृथ्वी आर्य खंड है !चक्रवर्ती छह  खंडो को जीतने के बाद म्लेच्छ खंड के वृषभांचल पर अपना नाम अंकित करने जाते है !
अन्य भूमियों में काल व्यवस्था-
ताभ्या-मपराभोम्योऽवस्थित:-!!२८!!
संधि विच्छेद -ताभ्याम् +अपरा:+भूमय :+अवस्थित:
शब्दार्थ-ताभ्याम् -उन (भरत और ऐरावत क्षेत्रों),अपरा:-आगे की  ,भूमय:-भूमियाँ ,अवस्थित:-अवस्थित है !
अर्थ-उन भरत और ऐरावत क्षेत्रों के अतिरिक्त सभी भूमियों अवस्थित है ,उनमे षट काल रूप काल  का परिवर्तन नहीं होता है!
 भावार्थ -हेमवत् वर्ष  औए ऐरावत वर्ष  में तीसरा काल ,जघन्य भोगभूमि रूप  दूसरा काल रहता  है,हरीवर्ष  और रम्यक  वर्ष में मध्यम भोगभूमि रूप रहता है ,उत्तर और देव कुरु में प्रथम काल ,उत्तम भोग भूमि रूप रहता है !चारों पूर्व दक्षिण,पश्चिम और उत्तर विदेह क्षेत्र में  चतुर्थ काल ,कर्म भूमी  रूप वर्तता है !
हेमवत आदि क्षेत्रों में आयु-
एकद्वित्रिपल्योपमस्थितियोहैमवतक-हरिवर्षकदैवकुरवका:!!२९!!
संधि-विच्छेद -एक+द्वि+त्रि+ पल्योपम +स्थितिय:+हैमवतक +हरिवर्षक+ दैवकुरवका:
शब्दार्थ -एक-एक,द्वि-दो,त्रि-तीन,पल्योपम-पल्य ,स्थितिय:-आयु ,हैमवतक -हेमवतवर्ष ,हरिवर्षक-हरीवर्ष और दैवकुरवका:-देवकुरु में है !!
अर्थ -हेमवत ,हरी और देवकुरु(विदेह क्षेत्र  में विशेष क्षेत्र )में तिर्यन्चों और मनुष्यों की उत्कृष्ट आयु क्रमश: १,२,३ पल्य की होती है !
विशेषार्थ-
१-हेमवत क्षेत्र में सदैव अवसर्पिणी का अथवा उत्सर्पिणी का चौथा काल ,जघन्य भोगभूमि का प्रवर्तता  है तथा प्राणियों  की स्थिति (आयु) १ पल्य  और  मनुष्यों की  अवगाह्न्ना २००० धनुष ,वर्ण नीला  होती है,एक दिन के अंतराल पर भोजन लेते है !
२-हरिवर्ष में सैदव अवसर्पिणी का दूसरा अथवा उत्सर्पिणी का पंचम काल प्रवर्त्ता है ,प्राणियों की उत्कृष्य स्थिति  २ पल्य होती है मनुष्यों की अवगाह्न्ना ४००० धनुष ,वर्ण शुक्ल होता है !दो दिन के अंतराल पर आहार लेते है !
३- देवकुरु के प्राणियों की स्थिति ३ पल्य प्रमाण होती है। मनुष्यों की अवगाहना ६००० धनुष ,वर्ण पीत  होता है ,भोजन ३ /४  दिन के  अंतराल पर करते है !
हैरण्यवत्  आदि क्षेत्रों में आयु-
तथोत्तरा:-३०
अर्थ-उत्तर के क्षेत्रों में मनुष्यों और तिर्यन्चों की आयु हेमवत आदि क्षेत्रों के सामान है !
भावार्थ -उत्तरकुरु में देवकुरु के सामान  उत्तम भोगभूमि ,प्रथम काल प्रवृत्त है ,प्राणियों  पल्य आयु व मनुष्यों की अवगाहना ६००० धनुष,रम्यक और हरिवर्ष में मध्यम भोग  भूमि का दूसरा काल प्रवृत्ता  है ,प्राणियों के आयु २ पल्य और अवगाहना ४००० धनुष है ,हैरण्यवत्  में हेमवत्  के समान जघन्य भोगभूमि का तीसरा काल प्रवर्त्ता है ,जीवों की उत्कृष्ट आयु १ पल्य और मनुष्यों की अवगाहना २००० धनुष होती है !
विशेष -
१-इस प्रकार जम्बूद्वीप में ६ भोगभूमि,घातकी खंड में १२ पुष्कार्ध द्वीप में १२ भोग भूमियाँ है,ढाई द्वीप -मनुष्य लोक में ३० भोग भूमियाँ है जिसमे सब तरह की भोगोपभोग की सामग्री कल्प वृक्षोस से प्राप्त होती है !
विदेह क्षेत्रमे आयु-
विदेहेषुसंख्येयकाल:-३१
संधि विच्छेद-विदेहेषु +संख्येय+काल:-
शब्दार्थ-विदेहेषु-विदेह क्षेत्र में,प्राणियों की  संख्येय-संख्यात , काल:-वर्षों की आयु है 
अर्थ -विदेह क्षेत्र में प्राणियों;मनुष्यों और तिर्यन्चों  की आयु संख्यात वर्ष है !
विशेष-
विदेह क्षेत्र में अवसर्पिणी का चौथा और उत्सर्पिणी का तीसरा काल सदैव व्यवस्थित रहता है !इसमें मनुष्यों  की उत्कृष्ट आयु १ कोटि पूर्व प्रमाण तथा अवगाहना ५०० धनुष  होती है !यहाँ कर्म भूमि होती है और सदा जीव मोक्ष को प्राप्त करते रहते है !यहाँ नित्य तीर्थंकर ,केवली,चक्रवर्ती,नारायण ,मुनि आदि उत्पन्न होकर मोक्ष प्राप्त करते रहते है 
जम्बू द्वीप में,विदेह क्षेत्र निषेध पर्वत के उत्तर और नील पर्वत के दक्षिण मे पूर्व से उत्तर तक फैला,सबसे बड़ा क्षेत्र  है जिसके मध्य में उत्तर और देवकुरु दो उत्तम भोग भूमिया है !
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तत्वार्थ सूत्र (Tattvartha sutra) अध्याय 3

Manish Jain Luhadia 
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