छहढाला – तीसरी ढाल छंद 11 – सम्यक्त्व के 25 दोष 8 गुण
वसु मद टारि निवारि त्रिशठता, षट् अनायतन त्यागो । शंकादिक वसु दोष बिना संवेगादिक चित पागो ॥
अष्ट अंग अरु दोष पचीसों, तिन संक्षेपहुँ कहिये। बिन जानेतैं दोष-गुनन को, कैसे तजिये गहिये ॥11 ॥
अन्वयार्थ (वसु) आठ (मद) मदों को (टारि) छोड़कर (त्रिशठता) तीन मूढ़ताओं को (निवारि) हटाकर (षट्) छः (अनायतन) अनायतनों को (त्यागो) त्यागना चाहिए। और (शंकादिक) शंका आदि (वसु) आठ (दोष) दोषों को (बिना) छोड़कर (संवेगादिक) संवेग, अनुकम्पा, आस्तिक्य और प्रशम में (चित) मन को (पागो) लगाना चाहिए। अब (अष्टअंग) आठों अंग (अरु) और (पचीसों) पच्चीसों (दोष) दोष (संक्षेपहुँ) संक्षेप में (कहिये) कहे जाते हैं। क्योंकि (बिन जानेतैं) जाने बिना (दोष) दोषों को (कैसे) कैसे (तजिये) छोड़ा जा सकता है और (गुणन को) गुणों को (कैसे) कैसे (गहिये) ग्रहण किया जा सकता है।
अर्थ – अब सम्यक् दर्शन को धारण करना है, तो देव, गुरु और धर्म के बारे में तो आ गया समझ में कि देव कौन है, गुरु कौन है और धर्म कैसा है.
इनको अपन ने श्रद्धा में बैठा लिया और सम्यक् दर्शन धारण करने के लिए आठ अंगों को भी स्वीकार करना पड़ता है.
और 25 दोषों को भी दूर हटाना पड़ता है. कौन से 25 दोष हैं? तो वसु मद. वसु का अर्थ होता है आठ. वसुविध द्रव्य संजोए के, आठ प्रकार के द्रव्य. वसु का अर्थ धन भी होता है. वसु ददाति इति वसुधा, जो धन को धारण करे उसको वसुधा कहते हैं, पृथ्वी, क्योंकि पृथ्वी के अंदर बहुत खजाने पड़े हुए हैं.
तो वसु मद, आठ प्रकार के मद, मद यानी अहंकार. इनको टारी, टालो. और त्रिशठता निवारी, तीन प्रकार की शठता यानी मूढ़ता, देवमूढ़ता, गुरुमूढ़ता, लोकमूढ़ता, इनका निवारण करो. और षट् अनायतन त्यागु, छह जो अनायतन हैं, यानी मिथ्यात्व के स्थान हैं छह, उनको छोड़ो.
और शंकादिक वसु दोष, आठ प्रकार के जो शंकादि दोष हैं, इनके बिनासं, यानी इनसे रहित सम्यक् दर्शन को धारण करना है. और संवेगादिक चित पागो, प्रशम, संवेग, आस्तिक्य, अनुकंपा, इनको चित्त में प्राप्त करो, अपने मन में प्राप्त कर लो.
तो आठ अंग और दोष जो 25 हैं, उनका संक्षेप में हम कथन कर रहे हैं, शॉर्ट में कहता हूं. क्योंकि बिन जाने ते दोष गुणन को, दोषों को और गुणों को इन दोनों को अगर नहीं जानते, तो फिर दोषों को कैसे तजिए और गुणन को कैसे गहीए? दोषों को छोड़ोगे कैसे जब तक पहचानोगे नहीं?
अब कोई यह समझता हो कि क्रोध तो अच्छी चीज़ है, बहुत ज़रूरी है, अथवा कोई यह समझता हो कि छल-कपट आज के ज़माने में बहुत आवश्यक है, अनिवार्य है, कलयुग में तो इसके बिना काम चल ही नहीं सकता, चाहे जेनी हो या जेतरे हो. अगर ऐसी धारणा हो किसी की, तो उसने छल-कपट को दोष न मानकर क्या माना? गुण माना.
तो गुण माना, तो गुण मानने पर ग्रहण किया जाता है, इसलिए छल-कपट को उसने अपना लिया अपने जीवन में, अब वो छोड़ नहीं सकता, क्योंकि जिसने दोष को गुण मान लिया, वो उसका त्याग कैसे करेगा?
और गुण को अगर दोष मान ले ईमानदारी को, ईमानदारी गुण है कि दोष? ईमानदारी से बोल ना.
तो ईमानदारी गुण है, लेकिन उसको अगर कोई दोष मान ले कि आज जो ईमानदार हैं, उनका ज़माना नहीं है, पिटोगे बोले. इसलिए ईमानदारी को छोड़ो अब, कोई काम की नहीं है ईमानदारी. तो ईमानदारी को अगर अकार्यकारी मानकर, व्यर्थ मानकर छोड़ दे कोई, दोष समझ ले, तो फिर क्या होगा? स्थिति विपरीत होगी. इसलिए यहाँ पंडित दौलतराम जी कह रहे हैं कि दोषों को और गुणों को जाने बिना दोषों का त्याग और गुणों का ग्रहण संभव नहीं है.
और संवेग आदि जो गुण हैं, उनमें अपना मन लगाओ. इस तरह आठ अंग और 25 दोष हो गए. तिन माने उनको संक्षेप से कहते हैं, क्योंकि बिना जाने हुए, जब तक दोष और गुणों को हम जानेंगे नहीं, तो कैसे तो छोड़ेंगे और कैसे ग्रहण करेंगे?
इसलिए 25 दोष, आठ अंग और संवेग आदि जो गुण हैं, उनका वर्णन किया जाता है, ताकि जो सम्यक्त्व प्राप्त किया जाए, उसमें एक भी दोष न लगे, और आठ अंगों से युक्त होकर वह सम्यग्दर्शन विशुद्ध बना रहे.
संवेगादिक चित पागो—संवेग आदि जो पांच गुण हैं, उनकी चर्चा हम जरूर कर लेते हैं. सम्यग्दृष्टि के लिए चार गुण आवश्यक हैं:
- पहला गुण—प्रशम: प्रशम माने कषायों की मंदता. क्रोध, मान, माया, लोभ मंद होना चाहिए.
- दूसरा—संवेग: संसार से भयभीत पना. संसार बिल्कुल अच्छा नहीं लगता, इससे डर लगता है. सम्यग्दृष्टि ऐसा होता है.
- तीसरा—अनुकंपा: जीव मात्र पर दया, मेरे द्वारा किसी जीव की हिंसा न हो.
- चौथा—आस्तिक्य: सच्चे देव, शास्त्र, गुरु अपने आत्मतत्त्व का पूर्ण विश्वास.
सम्यग्दृष्टि में ये चार गुण पाए जाते हैं: प्रशम (कषायों की मंदता), संवेग (संसार से भयभीत पना), अनुकंपा (जीव मात्र पर दया), आस्तिक्य (सच्चे देव, शास्त्र, गुरु, पुनर्जन्म, अपना आत्मा आदि का ज्ञान, इस पर श्रद्धा का होना). ये चार गुण सम्यग्दृष्टि के होते हैं.
अब देखिए, सम्यक्त्व के आठ अंगों को बतला रहे हैं:
छंद 12 & 13 – सम्यग्दर्शन के आठ अंग का स्वरूप
जिनवचमें शंका न, धार वृष, भव-सुख-वांछा भानै । मुनि-तन मलिन न देख घिनावै, तत्त्व कुतत्त्व पिछानै ॥
निज-गुण अरु पर औगुण ढाँकै, वा निज-धर्म-बढ़ावै । कामादिक कर वृषतैं चिगते, निज-परको सु दिढ़ावै ॥ 12 ॥
धर्मी सों गौवच्छ प्रीतिसम, कर जिनधर्म दिपावै। इन गुणतैं विपरीत दोष वसु, तिनकों सतत खिपावै ॥
अन्वयार्थ (जिनवचमें) सर्वज्ञदेव के द्वारा कथित तत्त्वों में (शंका) संदेह (न धार) नहीं करना निःशंकित अंग है। (वृष) धर्म को (धार) धारण कर (भवसुखवांछा) संसार के सुखों की चाह (भानै) नहीं करना निःकांक्षित अंग है। (मुनितन) मुनिराज आदि के शरीर को (मलिन) मैला (देख) देखकर (न घिनावै) घृणा नहीं करना निर्विचिकित्सा अंग है। (तत्त्व कुतत्त्व) साँचे झूठे तत्त्वों की (पिछानै) पहचान करना अमूढ़दृष्टि अंग है। (निजगुण) अपने गुणों को (अरु) और (पर औगुण) दूसरे के दोषों को (ढाँके) छिपाना (वा) और (निजधर्म) अपने आत्मधर्म को (बढ़ावै) बढ़ाना या निर्मल बनाना उपगूहन अंग है। (कामादिक कर) कामविकार आदि कारणों से (वृषतैं) धर्म से (चिगते) डिगते हुये (निज पर को) अपने को और दूसरों को (सु दिढ़ावै) फिर से उसी में दृढ़ कर देना स्थितिकरण अंग है। (धर्मी सों) अपने सहधर्मी जनों से (गौवच्छ प्रीतिसम) बछड़े पर गाय के प्रेम के समान (कर) स्नेह करना वात्सल्य अंग है। तथा (जिनधर्म) जैनधर्म को (दिपावै) प्रकाशित करना प्रभावना अंग है। (इन गुणतैं) इन आठ गुणों-अंगों से (विपरीत) उलटे (वसु) आठ (दोष) दोष हैं (तिनकों) उन्हें (सतत) हमेशा (खिपावै) दर करना चाहिए।
अपने शरीर में आठ अंग होते हैं—दो हाथ, दो पैर, मस्तक, वक्षस्थल, पीठ और नितम्ब, जिस अंग के ऊपर अपन बैठते समय अपने शरीर को अवस्थित करते हैं। तो इन आठ अंगों में सम्यक् दर्शन का जो पहला अंग है—निःशंकित। निःशंकित यानी संदेह नहीं होता। अब उसके लिए अपने शरीर में प्रतीक भूत अंग जो है, वो दाहिना पैर है। अपन दाहिना पैर वहीं रखते हैं जहाँ हड्डी टूटने का खतरा ना हो।माने जब तक शंका होती है, अगर अपने को जैसे पानी में से निकलना है, बारिश गिरी हुई है और अगर फिसलने का खतरा हो, तो फिर आप पैर नहीं रखेंगे और मान लो उसमें बीच में पत्थर भी रखे हों, पानी के अंदर, तो भी आप पहले रुकेंगे। क्या करेंगे रुक करके?
दो-चार लोगों को निकलते हुए देख लोगे और उसके बाद फिर अपने वजन को भी देखोगे शरीर के, कि वो जो निकल गए, उनका वजन तो कम था मेरे से और मेरा वजन ज्यादा है, मैं निकल पाऊँगा कि नहीं? फिर थोड़ी देर इंतजार करके जब किसी भारी व्यक्ति को भी निकलते हुए देख लोगे, तो फिर विश्वास हो जाएगा कि भई, इसमें अब कोई शंका की बात नहीं है।
जिन वच में—जिनेन्द्र भगवान के वचनों में शंका न, शंका नहीं करना. अगर जिनेन्द्र भगवान के वचनों में जो आचार्यों ने शास्त्रों में लिखा है, यह यही है, ऐसा ही है, अन्य नहीं है, अन्य प्रकार नहीं है, ऐसे शंका रहित रहता है, तो उसका पहला अंग होता है निःशंकित अंग. सम्यग्दृष्टि का पहला अंग है निःशंकित अंग—जिनेन्द्र भगवान के वचनों में शंका न करना. तो निशंकित अंग को धारण करने वाला सम्यक् दृष्टि जीव जिनवचि में, यानी जिनवाणी में शंका नहीं करता. पता नहीं यह सही लिखा है कि गलत लिखा है, यह भाव उसके अंदर नहीं आता. जो शास्त्र वचन हैं, वो मेरे लिए प्रामाणिक हैं, मुझे स्वीकार हैं, मैं इन्हें सत्य मानता हूँ. इतना विश्वास होता है उसको.
दूसरा—निकांक्षित, शब्दार्थ देखना—संसारिक इच्छाओं से रहित होना. क्या लिखा? धार वृष, अब यहाँ पर वृष शब्द जो लिखा है, वृष का अर्थ होता है धर्म. तो वृष अर्थात धर्म संबंधी या धर्म को लेकर भवसुख वांछा, संसार संबंधी सुखों की वांछा को भानें, नष्ट कर देता है.
“मैंने धर्म किया है, मैं पूजा इसलिए करता हूं, मैं दान इसलिए देता हूं, ताकि धन-संपत्ति बढ़े, मेरे बेटा हो जाए, मेरा यह हो जाए,” इस तरह संसारिक सुखों की वांछा करेगा, तो दोष होगा; और नहीं करेगा, तो निकांक्षित नाम का गुण होगा. धर्म के माध्यम से सांसारिक सुख मिले, ऐसी इच्छा नहीं करेगा. सांसारिक सुख की इच्छा तो करेगा.सीता को प्राप्त करने की जो इच्छा थी राम के अंदर, राम तो शुद्ध सम्यक् दृष्टि थे और जिसके कारण उन्होंने रावण के साथ युद्ध भी किया, वो इच्छा सांसारिक इच्छा थी या मोक्ष की इच्छा थी? सीता प्राप्त करने की इच्छा काहे की इच्छा थी? सांसारिक इच्छा थी
संसारिक सुख तो जितनी भूमिका है, वहाँ तक तो चाहता है, लेकिन धर्म के बदले यानी देव शास्त्र गुरु के प्रति जो हमारी श्रद्धा है, इस श्रद्धा को मैं आगे तभी बढ़ने दूँगा, मैं छः महीने तक श्रद्धा करके देखता हूँ, अगर मेरा काम हो जाए तो ठीक है, नहीं तो फिर मैं छोड़ दूंगा। ऐसी श्रद्धा को मिथ्यात्व कहते हैं। ये सम्यक् दर्शन नहीं है क्योंकि इसमें क्या है? शर्त है।
काम हो तो फिर मैं आगे श्रद्धा रखूँ, ना हो तो छोड़ दूँ। तो श्रद्धा में कामना नहीं होती, इसी का नाम निःकांक्षित अंग है।
उस श्रद्धा करने वाले में, जैसे जिनेन्द्र भगवान पर श्रद्धा है, तो उस श्रद्धा के बदले वो नहीं चाहता कुछ मिल जाए। लेकिन कुछ मिल जाए, बिल्कुल नहीं चाहता हो, ऐसा भी नहीं है। कुछ मिल जाए, ऐसा तो चाहता होगा लेकिन श्रद्धा के बदले कुछ मिल जाए, ये नहीं चाहता।
और इसके लिए एक दृष्टांत भी ऐसा दिया था हमने कभी, कि कोई सम्यक् दृष्टि के पास कोई कुछ धन है और रास्ते पर चलते-चलते गिर जाए नीचे और गिर जाने पर जब वो देखता है अपनी जेब आदि टटोल करके कि अरे, पैसे कहीं गिर गए लगता है। मुड़ करके देखता है कि वो पीछे से कोई ऐसे उसको उठा रहा है, तो वो रोकता है, रुक जाओ, रुक जाओ! मेरे हैं। तो फिर वो लड़ने को तैयार हो जाता है, तो फिर ये भी लड़ने को तैयार हो जाता है। सैकड़ों के नोट के पीछे सम्यक् दृष्टि हाथापाई कर सकता है, लेकिन करोड़ों की संपत्ति मिलने पर भी अपनी श्रद्धा को नहीं छोड़ सकता। इसका नाम है निःकांक्षित अंग। अब स्पष्ट हो गया?
उसको आप करोड़ रुपए दे दो, तो भी तुम मानना छोड़ दो ना देव शास्त्र गुरु को, कहाँ तुम हमारे यहाँ आ जाओ। नहीं।यहाँ पर सौदेबाजी नहीं होगी। सिद्धांत में कभी समझौता नहीं होता। समझौता लौकिक विवादों में हो सकता है, संवादों में हो सकता है, लेकिन सिद्धांत के साथ कभी समझौता सम्यक् दृष्टि जीव नहीं करता। तो ये निःकांक्षित अंग है। बायां पैर क्योंकि दाहिना जहाँ जाता है, बायां पैर बिनाकांक्षा के वहीं चला जाता है। चुपचाप उसका पीछा करता है।
तीसरा अंग—निर्विचिकित्सा. विचिकित्सा माने घृणा, घृणा रहित होना. अर्थात मुनियों के तन माने शरीर, शरीर कैसा मलीन? दिगंबर मुनि स्नान नहीं करते, शरीर पर मैल जमा होता है, लेकिन मुनियों के मलीन शरीर को देखकर न घिनावे, घृणा नहीं करना.
मुनि महाराज हैं, स्नान करेंगे तो जीव हिंसा होगी, इसलिए ये स्नान नहीं करते, इन्हें अपने शरीर से ममत्व नहीं है, शरीर संस्कार से ये रहित होते हैं, इसलिए इनसे घृणा नहीं करना, ये तो रत्नत्रय के पुंज हैं, ऐसे सोचना. क्या कहा? तीसरा अंग क्या है? मुनियों के मलीन शरीर को देखकर न घिनावे, घृणा न करना, नाम निर्विचिकित्सा.
पूर्व जन्म में जिन्होंने साधुओं की सेवा की है, उनको इस जन्म में बहुत बलवान और निरोग शरीर प्राप्त होता है। और सुंदर शरीर होता है वो।
बाहुबली पूर्व जन्म में ऐसा कौन सा पुण्य कमाया था कि आदिनाथ भगवान उनके पिता श्री, जो प्रथम तीर्थंकर थे, वो तो पाँच सौ धनुष के हुए और ये पच्छीस धनुष के? तो फिर उसका समाधान दिया कि इन्होंने पिछले जन्म में साधुओं की इतनी सेवा की थी, इतनी सेवा की थी कि जितनी इनके पिता श्री ने भी नहीं की थी। तो साधुओं की सेवा से इनको वो शरीर प्राप्त हुआ और वो बल प्राप्त हुआ है कि जिस बल के आगे चक्रवर्ती का बल भी फीका पड़ गया। चक्रवर्ती को कोई जीत नहीं सकता। चक्रवर्ती में इतनी शक्ति होती है कि अगर महल के खंभे को ऐसे खींच दे तो पूरा महल ढीला पड़ जाए। धराशायी हो जाए पूरा महल इतनी शक्ति और फिर ये तो एक साधारण नमूना दिया हमने आपको समझने के लिए। वैसे देखा जाए तो चक्रवर्ती का बल बहुत अधिक होता है। लेकिन चक्रवर्ती को पराजित करने वाले बाहुबली को वो बल कहाँ से प्राप्त हुआ था? तो पूर्व जन्म में उन्होंने मुनियों की सेवा की थी।
भक्ति ही सुंदर रूपम। भक्ति से अपना रूप सुंदर होता है आगामी भव में। अभी कितना भी कुरूप हो कोई, लेकिन अगर वो भक्ति में अपना मन लगा दे, तो उसको आगामी भव में अवश्य सुंदर रूप की प्राप्ति होगी, लेकिन सुंदर रूप की प्राप्ति के लिए भक्ति नहीं करना।
इसी प्रकार सारे चौबीसी कामदेव प्रद्युम्न ने श्री कृष्ण को चकमा डाल दिया था। प्रद्युम्न चरित्र अगर आपने पढ़ा हो तो बलदेव को, वासुदेव को सबको मतलब आश्चर्यचकित कर दिया था, जब वो पहली बार द्वारिका आए थे तब। और बाद में अंत में अपना रूप प्रकट किया था रुक्मणी माँ के पास पहुँचे थे पहले। रुक्मणी ने उनको अच्छे से आहार कराया था और उसके बाद फिर जो निमित्त बताए थे कि जब तुम्हारा पुत्र, खोया हुआ पुत्र वापस मिलेगा तब बगीचा पूरा हरा-भरा हो जाएगा और सारे निमित्त सारे शकुन उन्होंने देखे रुक्मणी ने कि ये शकुन तो ऐसे लग रहे हैं कि जैसे मेरा पुत्र आ गया हो मेरे पास लेकिन कहाँ है मेरा पुत्र? क्योंकि प्रद्युम्न रूप बदल करके आए थे जनाब! वो कौतुक प्रिय थे ना, खेल-खेल में उनको आनंद आता था।
फिर अंत में उन्होंने अपना रूप प्रकट किया कि माता मैं ही तुम्हारा पुत्र हूँ। फिर अपने पुत्र को सोलह वर्ष का देख करके, माँ हर्षित भी होती और फिर थोड़ी खिन्न भी होती कि अब वो बचपन का रूप मुझे कैसे मिल सकता है देखने? और वो माँ भाग्यशाली है जिसने तुझे बचपन से पाला है, मैं अभागन हूँ। तब प्रद्युम्न ने बोला कि ये कौन सी बड़ी बात है, बोले? ये तो जर्रा सी बात है मेरे लिए। तो उसने विद्या से फिर अपना रूप छोटे बालक का बना दिया अपने बचपन का और फिर माँ के साथ फिर धीरे-धीरे बड़ा होते-होते धीरे-धीरे मतलब वर्षों में नहीं, वहीं उनके सामने छोटे से बड़ा रूप धारण करके फिर अपने 16वें साल के रूप में आ गया। तो इस प्रकार बड़ा मजेदार है प्रद्युम्न चरित्र पढ़ो तो फिर उसमें पूरे कौतुक ही कौतुक भरे हुए हैं।
चौथा—अमूढ़दृष्टि. मूढ़ माने मूर्ख, दृष्टि माने नजर. अमूढ़ माने मूढ़ नहीं होना, माने ज्ञानी होना. अर्थात मूढ़ दृष्टि नहीं होना. अर्थात तत्त्व कुतत्त्व पिछाने, सच क्या है, गलत क्या है, इसकी पहचान करता है. तत्त्व माने वस्तु का वास्तविक स्वरूप क्या है, और कुतत्त्व माने यह वस्तु का स्वरूप नहीं है, ऐसी पहचान करता है. अगर करता है, तो अमूढ़ दृष्टि होता है. यह चौथा अंग.
पांचवां—निज गुण—अपने गुणों को और दूसरे के अवगुणों को ढांकने वाला होता है. अपने गुणों की सेखी नहीं करता, और दूसरे के जो अवगुण या बुराइयां या दोष हैं, उनको बताता नहीं, उनको ढकने वाला होता है; और साथ में अपने निज माने अपनी आत्मा के धर्म को बढ़ाने वाला होता है. अंग का नाम—उपगूहन. उपगूहन माने अपनी प्रशंसा नहीं करना, क्या लिखा? अपने गुणों को बखान नहीं करना, और दूसरे की निंदा, दूसरे के अवगुणों को नहीं कहना, और अपने निजी धर्म को बढ़ाना, यह हुआ उपगूहन अंग.
अब छठा—स्थितिकरण. कामादिक कर (मतलब काम, क्रोध आदि के कारण), कर माने कारण द्वारा, वृषते (माने धर्म से), चिगते (माने डगते हुए), निज माने स्वयं को और पर माने अन्य को दिढ़ावे (मजबूत करने वाला होता है). कभी काम, क्रोध, मद, लोभ आदि के कारण अगर धर्म से स्खलन हो रहा हो, मन कमजोर पड़ गया हो, तो अपने को और अन्य को भी मजबूत बनाता है. कहा जा रहे हो? यह तो गलत हो जाएगा, ऐसा कभी नहीं करना. लोग ऐसा कहते हैं, कहने दो, ऐसा करने से ऐसा हो जाएगा, कुछ नहीं होगा, अपने धर्म पर डटे रहना. स्वयं भी मजबूत होता है और अन्य को भी मजबूत बनाता है. देखें: काम, क्रोध आदि के कारण वृष माने धर्म से चिगते माने डगते हुए, डिगते हुए, स्वयं को और अन्य को दिढ़ावे (मजबूत बनाता है), इसका नाम स्थितिकरण—स्थितिकरण मजबूत करना.
जैसे पुष्पडाल मुनि थे। वह अपनी पत्नी के मोह से इतना मोहित थे कि बार साल तक दीक्षा निभाने पर भी उनके मन में वही-वही बात घूमती थी। और एक दिन तो वो बिल्कुल संयम छोड़ करके, दीक्षा छोड़ करके पत्नी के पास जाने को तैयार हो गए। तब फिर उनको संभालने का जो काम होता है, उसका नाम है स्थितिकरण। वारिषेण मुनि ने उनका स्थितिकरण किया।
वारिषेण मुनि उनको अपनी माँ के पास ले गए, रानी चेलना के और फिर महल में ले जाकर के माँ से कहा कि माता, मेरे अंतःपुर को स-शृंगार प्रस्तुत किया जाए, उपस्थित किया जाए। यानी मेरी जितनी भी पत्नियाँ थीं, उनको शृंगार सहित यहाँ पर बुलाया जाए। तो बत्तीस विवाह किए थे वारिषेण के, तो वो सारे वहाँ पर उपस्थित हो गए शृंगार सहित। और फिर वारिषेण मुनि से चेलना रानी पूछती है कि हे मुनिवर, और कोई आदेश?
तब मुनिराज कहते हैं कि मेरे मित्र की पत्नी को यथावत प्रस्तुत किया जाए। यथावत मतलब जैसी है अभी इस समय वो, ज्यों की त्यों उसको यहाँ पर सामने लाओ, बुलाओ। तो फिर उनकी पत्नी को बुलाया गया यथावत, तो बाल बिखरे हुए थे और शरीर की तो ऐसी दशा थी कि जिसको कोई भी देखना ना चाहे। हड्डी-पसली थी और कोई कहते हैं कि एक आँख से कानी भी थी वो। तो ऐसी दुर्दशा थी उसकी, उसको बुलवाया।
और फिर देखो कैसे उन्होंने उन मुनि महाराज को संभाला जो दीक्षा छोड़कर के पत्नी के पास जाना चाहते थे, उनको कैसे उन्होंने संभाला?उन्होंने बोला कि हे पुष्पडाल मित्र, इसको मन से न छोड़ सकने के कारण तुमने बारह वर्ष कष्ट भोगे हैं और इनको हृदय से त्यागने के कारण मैंने वैराग्य का आनंद लूटा है। इनको किनको? वो बत्तीस की तरफ इशारा करके बोलते हैं।
तब फिर पुष्पडाल मुनि ऐसे देखते हैं उस तरफ, इस तरफ भी देखते हैं और फिर तुलना करता है कि देखो, जिसमें राग होने योग्य है, उसमें इनको वैराग्य है और जिसको देखकर वैराग्य होने योग्य है, उसमें मुझे राग है। मेरे जैसा दुर्बुद्धि कौन होगा? एकदम वारिषेण मुनि के चरण पकड़ लेता है और कहते हैं कि हे मुनिवर!
आप सच्चे वैरागी हैं, आप सच्चे साधु हैं और आपने वास्तव में मेरे साथ जो मित्रता थी, उसको निभाया है। आज आपने मुझे सद्बुद्धि प्रदान करके मेरा जीवन संवार दिया। अब मुझे पुनर्दिक्षा दिलवाइए और अब मैं सचमुच वैरागी हो गया हूँ। अब राग का कोई कारण मेरे जीवन में बचा नहीं है।
मैंने देख लिया बारह वर्ष बाद अपनी पत्नी की दशा, मैं जिसके प्रति इतना अनुरागी था, वो अनुराग व्यर्थ था और जिसके प्रति अनुराग था, वो अनुराग के योग्य वस्तु नहीं थी। तब वारिषेण मुनि कहते हैं कि जिनको तुम शृंगार सहित देख रहे हो, वो भी अनुराग की वस्तु नहीं है, बोले। क्योंकि उनकी त्वचा के नीचे भी हड्डी, मांस, चर्बी और दुनिया की अपवित्र वस्तुओं के सिवाय है क्या? ये तो सिर्फ ऊपर का रूप है जिसके कारण आँखें धोखा खा जाती है।
और यदि अपने अंदर विवेक हो, तो फिर ये स्पष्ट समझ में आता है कि सुंदर से सुंदर रूप अंदर से असुंदर ही होता है। कहीं कोई राग का स्थान विवेकी मनुष्य के लिए नहीं रह जाता। इसलिए बुद्धिमान जन उस शरीर के प्रति राग नहीं करते जिसके प्रति मूर्ख लोग अपना जीवन बर्बाद कर डालते हैं। और निर्विवेक होकर दुर्बुद्धि होकर के वो क्या-क्या नहीं करते, सब अनर्थ करने को तैयार हो जाते हैं। उस रूप के पाश में बद्ध होकर के और रागी होकर के। तो ऐसे उपायों से जो धर्म से डगमगा रहा है, उसको धर्म में स्थिर करना।
और कभी-कभी ऐसा भी होता है कि कोई श्रद्धा से डगमगाता है। श्रद्धा से कब डगमगाता है? बहुत समय तक भगवान का अभिषेक कर रहा है, पूजा कर रहा है, सारा धार्मिक अनुष्ठान कर रहा है, दान भी दे रहा है, लेकिन कोई संकट जीवन में पीछा नहीं छोड़ रहा है अपना। और संकट पीछा नहीं छोड़ रहा तो फिर क्या लगता है अंदर ही अंदर?
क्या रखा है धर्म में? कित्तो तो धर्म कर लो, कछु नहीं हो रहो। ऐसा मतलब मन में विचार करता है कि इतना सब धर्म करने के बाद भी क्या लाभ है? कुछ नहीं होता, बोले। तो ऐसे धर्म से उसकी श्रद्धा विचलित होती है और णमोकार मंत्र बोलते रहते हैं, णमोकार मंत्र सबसे महामंत्र है, ऐसा है, वैसा है, क्या हो रहा है? मुझे तो कोई लाभ नहीं होता णमोकार मंत्र, जिसको होता है, तो होता होगा, मेरे को कोई लाभ नहीं होता।
सब कहने की बातें हैं। इस प्रकार जब अश्रद्धा होती है, तब उसको स्थिर करने के लिए कई दृष्टांत दिए जाते हैं।
कई ऐसे उदाहरण दिखलाए जाते हैं आँखों से कि तू देख ले। णमोकार मंत्र से अगर कुछ नहीं होता है ना, तू तेरी श्रद्धा डगमगा गई है इसलिए तू कह रहा है कि णमोकार से कुछ नहीं होता, तो देख, प्रयोग देख।
तो उसको कुछ ऐसे प्रयोग दिखलाए जाते हैं। कि णमोकार मंत्र का क्या प्रभाव है?
अब वो जिसके पास प्रभाव हो, वही दिखला सकता है। सब थोड़ी दिखा सकते हैं। नहीं तो फिर वो उसका अप्रभावी दिखा दे तो फिर सामने वाला भी बोलेगा कि हाँ, सही कह रहे हो तुम, तो णमोकार मंत्र में कछु नहीं है। मैं तो आज तक धोखे में था, वो भी डगमगा जाएगा बेचारा। नहीं, पक्का होना चाहिए। स्थितिकरण करने के लिए किसी गिरे हुए को उठाने के लिए अपने अंदर ताकत होना जरूरी है। कमजोर आदमी नहीं उठा सकता।
तो उसको णमोकार मंत्र के कुछ ऐसे प्रैक्टिकल्स भी दिखा सकते हैं जैसे कल्याण सागर मुनिराज ने एक प्रयोग करवाया था। कहता है कि तीन गमले रखवाए थे और एक गमले में पानी भर करके उस पौधे को विकसित कराया। दूसरे गमले में फिर जो दूसरा प्रसिद्ध मंत्र है ना, लोक में एक बहुत प्रसिद्ध मंत्र, गायत्री मंत्र जिसका नाम। ॐ भूर्भुवः स्वः ऐसे पढ़ते हैं उसको, अभी पढ़ना मत। तो उस मंत्र को पढ़वा करके फिर पानी डलवाया। और तीसरे में णमोकार महामंत्र पढ़कर के पानी डलवाया। तो फिर वहाँ जितने वैज्ञानिक थे, उन्होंने भी स्वीकार किया कि णमोकार मंत्र की शक्ति सर्वाधिक है। यद्यपि उस पानी को अगर अपन केमिकली जाँच करोगे, तो फिर उसमें कोई ऐसा रासायनिक परिवर्तन नहीं हुआ है।
लेकिन वो मंत्र के प्रभाव से उसमें कुछ ऐसी एनर्जी भर गई है कि जिसको यंत्रों से नहीं नाप सकते। पर प्रैक्टिकली उसका असर देखो, तो उस पौधे का जो विकास हुआ है, वो खाद-पानी वाले पौधे में से भी अधिक हुआ है। तो इससे मालूम पड़ जाता है कि णमोकार मंत्र में कुछ अद्भुत क्षमता विद्यमान है। ऐसे और भी बहुत सारे नमूने हो सकते हैं। णमोकार मंत्र से बहुत सारे ऐसे चमत्कार होते हैं। और फिर दूसरी चीज़ क्या?
कि धर्म के प्रति श्रद्धा उसकी डगमगा रही है, तो फिर उसको उदाहरण दिए जाते हैं। जैसे एक बहुत सुंदर बात कही थी, सुधा सागर महाराज जी ने। वो ये बात थी कि अगर कोई ये सोचता हो कि धर्म अंगीकार करने से मेरे दुःख मिट जाएंगे। तो फिर उससे हमारा कहना है कि इस भ्रम में मत रहना। क्योंकि पुराणों में देखो कि सीता धर्मात्मा थी, दुखी हुई। राम धर्मात्मा थे, दुखी हुए हैं। पांडव धर्मात्मा थे, दुखी हुए। और जो अधर्मी लोग थे वो बड़े सुखी रहे। तो धर्म से तत्काल सुख मिल जाता हो, ऐसा अगर सोचोगे तो फिर बहुत धोखा खाओगे, बोले। क्योंकि धर्म अन्याय नहीं करता। अब ये बहुत अद्भुत बात कही थी उन्होंने। धर्म अन्याय नहीं करता। अन्याय नहीं करता, क्या मतलब इसका? तो उसका दृष्टांत खुलासा ये था कि अगर किसी ने मर्डर किया हो और वो पैसे ऐसे देकर के छूट जाए, तो उसको अपन अन्याय कहते हैं कि न्याय?
अन्याय कहते हैं ना। तो इसी प्रकार जिसने पूर्व जन्म में बहुत पाप कमाए हैं और आज उसको दंड मिल रहा है उन पापों का, तो क्या धर्म उसको उन दुखों से मुक्त कर दे? अगर पापी को धर्म दुखों से मुक्त कर दे, तो फिर धर्म न्यायाधीश हुआ या अन्यायी? अब देखो, अब घबराना, वो सब लोग खुलकर नहीं बोल पा रहे हैं। भविष्य में ये गारंटी है कि धर्म से आपको सुख मिलेगा। लेकिन आज जो आपने पाप किया था, उसका फल तो आपको भोगना ही पड़ेगा। आप ये मत सोचना कि हम कितने भी पाप कर लें और आज धर्म करने
अब अगले छंद की इन दो पंक्तियों में दो अंगों की चर्चा और है. देखें: धर्मी सों साधर्मी से, गौ बच्छ (गाय और बछड़े के समान), जैसे गाय और बछड़े में प्रीति होती है. होती है, उसके समान प्रीति करके। अर्थात क्या करें? साधर्मियों से गाय और बछड़े के समान प्रीति करें।
साधर्मी देखते ही दिल प्रफुल्लित हो जाना चाहिए। क्या उदाहरण दिया है? गाय और बछड़े की प्रीति। गाय और बछड़े की प्रीति बड़ी निस्वार्थ प्रीति होती है। बछड़ा कभी गाय की सेवा के काम में नहीं आता, लेकिन फिर भी गाय उससे कितना प्रेम करती है! तो अपना साधर्मी के साथ प्रेम कैसा होना चाहिए? बिल्कुल गाय-बछड़े के समान निस्वार्थ। इसे कहते हैं वात्सल्य अंग।
अर्थात साधर्मियों के साथ गाय और बछड़े के समान प्रीति करें। अर्थात देश और विदेश में जैन धर्म को फैलावे। इसका नाम होता है प्रभावना अंग।
इन गुण ते, ये आठ जो गुण हुए इनसे, विपरीत माने उल्टे आठ दोष हैं। आठ गुण हो गए, अब इनसे उल्टे हो गए आठ दोष। तिनको, उन आठ दोषों को, सतत माने निरंतर खिपावे, दूर करे, नष्ट करे, हटाये। पहला अंग था निशंकित।
अब मैं आपको बता रहा हूँ शंकादिक आठ दोष। निशंकित आदि आठ अंग, इनसे उल्टे शंकादिक आठ दोष। वो कौन से बनते हैं? वो समझें, इससे ही समझ में आएगा। देखिए, पहला अंग था निशंकित। जिनेन्द्र भगवान के वचनों में शंका ना करे, निशंकित अंग। इससे उल्टा हुआ शंका नाम का दोष, अर्थात भगवान के वचनों में शंका करना। मालूम नहीं नंदीश्वर दीप है कि नहीं, असंख्यात दीप समुद्र हैं कि नहीं, किसने देखे हैं? मेरे तो समझ में नहीं आता, शंका नाम का दोष।
दूसरा, निकांक्षित अंग, धर्म धारण करके सांसारिक सुखों की वांछा ना करे। यह हुआ निकांक्षित अंग। इससे उल्टा होता है कांक्षा नाम का दोष, अर्थात धर्म करे, पर सांसारिक सुखों की वांछा रखे, यह हुआ कांक्षा नाम का दोष।
तीसरा, मुनियों के मलिन शरीर को देखकर घृणा नहीं करना, निर्विचिकित्सा अंग। और मुनियों के मलिन शरीर को देखकर अगर घृणा करे, इनके मुँह से बदबू आती है, देखो नग्न रहते हैं, हमको तो इन्हें देख के बड़ी एकदम घृणा सी होती है, ऐसे कैसे रहना? नहाते नहीं हैं, देखो गर्मी में पसीने की बदबू आती है, अगर ऐसा करे, तो फिर कौन सा दोष होनेगा? विचिकित्सा दोष हो गया।
चौथा, वास्तविक क्या है, सही स्वरूप क्या है, और गलत स्वरूप क्या है, उसकी पहचान करना, अमूढ़दृष्टि अंग, और सच्चे और झूठे की पहचान ना करना, चाहे जिसको मान लेना, यह मूढ़दृष्टि दोष है।
चार हुए, आगे चलें। अपने गुणों को और दूसरे के अवगुणों को ढकना और अपने धर्म को बढ़ाना, उपबृहन नाम का अंग। अब इससे उल्टा दोष का नाम, अनुपबृहन, अर्थात अपने गुणों को प्रकाशित करे, और अपने गुणों को प्रकाशित करे और दूसरे के अवगुणों को भी प्रकाशित करे। अपनी तो सेखी करना और दूसरे की बुराइयों को बताना, और आत्मधर्म को बजाय बढ़ाने के घटाना, इसका मतलब हुआ अनुपबृहन।
काम-क्रोध आदि के द्वारा धर्म से कभी डिगमगा रहे हुए, अपने को और अन्य को मजबूत करना, स्थितिकरण। और अगर कोई धर्म से डिग रहा हो, गिरे तो गिरने दो, धर्म से छूट रहा है तो छूटने दो, अगर ऐसे विचार करता है, तो अस्थितिकरण। अस्थितिकरण क्या हुआ? यह हो गया दोष। स्थितिकरण अंग, अस्थितिकरण दोष। सातवाँ दोष, गुण था वात्सल्य अंग, धर्मात्माओं से गाय और बछड़े के समान प्रीति करना।
और अवात्सल्य नाम का दोष, मुझे तो जैनी अच्छे ही नहीं लगते, जितने जैनी होते हैं सब ऐसे ही होते हैं, ऐसे अर्थात साधर्मियों के साथ गाय-बछड़े के निसाप्त समान निस्वार्थ प्रीति ना करना, यह हो गया दोष।
जिनधर्म दीपावे, जैन धर्म को प्रकाशित करना, उसका प्रचार-प्रसार करना प्रभावना अंग, बजाय इसके उल्टा दोष अप्रभावना दोष। जैन धर्म में आना, जैन धर्म में जन्म लिया है, जैन धर्म के प्रचार-प्रसार की कोशिश नहीं करना, अपना खाना-पीना भोजन खराब रखना, भ्रष्ट खान-पीन रखना, ताकि लोग कहें देखो जैनी कैसे होते हैं, यह होता है अप्रभावना अंग। इस प्रकार आठ गुणों से विपरीत जो आठ दोष हैं, उनको निरंतर दूर करे।
क्या सम्यग्दर्शन में आठ अंग होना जरूरी है? हाँ, बिल्कुल, शरीर के आठ अंग हैं। अगर एक अंग ना हो, तो क्या शरीर शरीर कहलाएगा? नहीं कहलाएगा। उसी तरह अगर सम्यग्दर्शन में एक भी अंग कम है, तब वो सम्यग्दर्शन विशुद्ध सम्यग्दर्शन नहीं कहलाएगा और संसार बंधन को नष्ट करने में समर्थ नहीं होगा। रत्नकरण श्रावकचार में लिखा है आचार्य ने, नाङ्गहीनमलं छेत्तुं दर्शनं जन्मसंततिम् ।न हि मन्त्रोऽक्षरन्यूनो निहन्ति विषवेदनाम् ॥२१ अंगरहित जो सम्यग्दर्शन है, वो जन्म परंपरा को छेदने में समर्थ नहीं है, इसीलिए सम्यग्दर्शन के आठों अंग होने चाहिए।
इस प्रकार आज हमने क्या समझा? जैसे शरीर के आठ अंग होते हैं, उसी तरह सम्यग्दर्शन के भी आठ अंग होते हैं। ये आठों अंग हैं, तो सम्यग्दर्शन विशुद्ध है, अन्यथा सम्यग्दर्शन अधूरा रहता है, कार्यकारी नहीं होता। इसलिए आप सबको, हम सबको सम्यक्त्व के आठ अंग अच्छी प्रकार समझकर, सच्चे देव-शास्त्र-गुरु की श्रद्धा, सात तत्त्वों नौ पदार्थों का सही श्रद्धान करते हुए, आठ अंगों को धारण करते हुए और इन दोषों को हटाते हुए सम्यक्त्व प्राप्ति का पूर्ण प्रयत्न करना चाहिए।
जिनवाणी पुत्र क्षुल्लक श्री ध्यानसागर जी महाराजजी और पंडित श्री रतन लाल जी बैनाडा के प्रवचन पर आधारित स्वाध्याय
छहढाला पहली ढाल छंद 1 व 2 | छंद 3 व 4 | छंद 5 व 6 | छंद 7 व 8 | छंद 9 व 10 | छंद 11 व 12 | छंद 13 व 14 | छंद 15 व 16 |
दूसरी ढाल छंद 1 व 2 | छंद 3 व 4 | छंद 5 व 6 | छंद 7 व 8 | छंद 9 व 10 | छंद 11 से 13 | छंद 14 व 15 |
तीसरी ढाल छंद 1 व 2 | छंद 3 व 4 | छंद 5 व 6 | छंद 7 व 8 | छंद 9 व 10