चौथी ढाल छंद 12 – प्रमादचर्या, हिंसादान और दुःश्रुति अनर्थदण्डों का स्वरूप और उनके त्याग का उपदेश
कर प्रमाद जल भूमि, वृक्ष पावक न विराधै। असि धनु हल हिंसोपकरण, नहिं दे यश लाघै ॥
राग-द्वेष-करतार, कथा कबहूँ न सुनीजै। औरहु अनरथदण्ड-हेतु, अघ तिन्हें न कीजै ॥12॥
अन्वयार्थ (प्रमाद कर) शिथिलाचार से बेमतलब (जल) जलकायिक (भूमि) पृथ्वीकायिक (वृक्ष) वनस्पतिकायिक (पावक) अग्निकायिक और वायुकायिक जीवों का (न विराधै) घात नहीं करना प्रमादचर्या अनर्थदण्ड व्रत कहलाता है। (असि) तलवार (धनु) धनुष (हल) हल आदि (हिंसोपकरण) हिंसा के कारण पदार्थों को (दे) देकर (यश) नामवरी (नहिं लाषै) नहीं कमाना हिंसादान अनर्थदण्डव्रत कहलाता है। (रागद्वेष करतार) राग और द्वेष को करने वाली (कथा) कथाएँ (कबहूँ) कभी भी (न सुनीजै) नहीं सुनना दुःश्रुति अनर्थदण्डव्रत कहलाता है। (औरहु) और भी (अघ हेतु) पाप के कारण (अनरथदण्ड) अनर्थदण्ड हैं (तिन्हैं) उन्हें भी (न कीजै) नहीं करना चाहिए।
अर्थ – कर प्रमाद, प्रमाद करके, जल है, भूमि है, वृक्ष है, अग्नि है, और अपन इसमें, पांच में से एक वायु छूटी है, तो उसको भी और इसमें उपलक्षण से ग्रहण कर सकते हैं। भले कोई शब्द कभी-कभी नहीं लिखा रहता, लेकिन भावार्थ में उसको सम्मिलित कर लिया जाता है।
जैसे यह कहा कि भई, जूते उतारकर के आइए घर में, तो इसका अर्थ यह नहीं कि चप्पल पहनकर आइए। तो क्या समझ में आया? शब्द अपन ने एक कहा है कि जूते उतारकर आना, तो इससे समझने वाला समझदार व्यक्ति क्या समझ लेता है? कि चप्पल भी उतारकर के आना चाहिए।
इसी प्रकार यहां पर चार सावनों का नाम लिखा है, तो अब समझदार व्यक्ति को यह भी समझ लेना चाहिए कि वायु की भी व्यर्थ में विराधना नहीं करना है प्रमादवश।
अब जल की विराधना कैसे होती है प्रमादवश? ऐसे पाइप लेकर ऐसे सींचते जा रहे हैं, बगीचे को सींच लिया आप, फिर भी पानी आ रहा है नल में, तो फिर अब दीवारों पर वो मारते हैं फव्वारे। और कुछ लोग तो अपना नाम भी बनाते हैं उसमें, पानी से। और फिर कुछ लोग और बाहर भी डालते हैं और अगर पड़ोसी ना देख रहा हो तो उसके अंदर भी उसके, उसकी सीमा के अंदर भी ऐसे थोड़ी सी पाइप की एक पिचकारी भेज देते हैं। तो ये पानी की विराधना है। अथवा नल चालू किया और फिर अब आगे आने वाला बंद करें, मेरा क्या है? मेरा तो काम।
औरहु अनर्थ, हां तो क्या ये तो और मैं, ये नहीं, इसके अतिरिक्त और भी हैं। पुरुषार्थ सिद्ध उपाय में इसके अतिरिक्त भी बताएं, देखिए। तो इनकी विराधना व्यर्थ में नहीं करेगा।
पानी है, भूमि है, अब भूमि की विराधना कैसे होती है? जमीन खोद रहे हैं, कोई ऐसा औजार मिल गया आपको, या आप जैसे आकृत पुण्य को धन्यकुमार की पर्याय में वो हल मिल गया था, तो उसने सोचा कि ये कैसा खिलौना है? तो हल चलाना प्रारंभ किया तो अंदर से घड़ा निकला। इस प्रकार अगर किसी को कोई ऐसी चीज मिल जाए और फिर वो जमीन में कुछ करने लग जाए, तो ये भूमि की विराधना हो जाएगी।
और वृक्ष, वृक्ष का अर्थ यहां पर बड़े-बड़े पेड़ों से ही मात्र नहीं है, यहां पर तात्पर्य इसका वनस्पति से है। अब छोटी घास है या फिर कोई भी पेड़-पौधे हैं, या फिर आप यात्रा के लिए निकले हैं, तो फिर कभी जो गाड़ी रहती है, उसके साथ कोई टहनी टकराती है। तो एकदम उसके पत्ते को ऐसे हाथ में पकड़ लेते हैं कुछ लोग और फिर ऐसे पकड़कर अंदर नहीं ले जाते, खिड़की के भीतर नहीं लाते बस के।
वो वहीं छोड़ देते हैं और फिर ऐसे देखते हैं, तो पत्ते ऐसे लहराते हुए हवा में नीचे गिरते हैं, उसका आनंद लेते हैं, बताइए! मनोरंजन के ऐसे साधन क्रूर, कि बिना मतलब के किसी पेड़-पौधे, आपके बाल अगर कोई नोच कर ऐसे उड़ा दे, तो कैसा लगेगा?
तो उन पेड़-पौधों में भी जान होती है, उनको व्यर्थ में पीड़ा क्यों पहुंचाते हो? ठीक है, भोजन के लिए आप शाकाहार का इस्तेमाल करते हैं, वनस्पतियों का उपयोग करते हैं, वो तो आपके लिए अनिवार्य है। उसके बिना आप नहीं रह पाते, लेकिन ये पत्ते तोड़ रहे हैं, इसके बिना तो आपका काम चल सकता है। तो व्यर्थ में, ये विराधना नहीं करनी चाहिए।
पावक, पावक का अर्थ क्या है? ये पावक शब्द पहले कहां आया है? निकर्मी, भूमि, जल, पावक। अब ये हो गया प्रमादचर्या नाम का अनर्थदंड।
पहला अपध्यान था, दूसरा पापोपदेश था, तीसरा प्रमादचर्या। ठीक है ना? प्रमादचर्या।
और ये चौथा जो है, वो हिंसादान है।
हिंसादान का अर्थ होता है कि ऐसी वस्तुओं का आदान-प्रदान करना जिसमें हिंसा होती है, हिंसा के उपकरण। असि यानी तलवार, धनु यानी धनुष है, हल है, ऐसे जो हिंसा के उपकरण अग्नि वगैरह हैं, इनको देकर के नहीं यश लाधे, यश नहीं लूटना चाहता वो। कि भई देखो इनके यहां जो मांगो मिल जाता है, तलवार दे दी आज मेरे को, अब अच्छा मजा आएगा आज तो। अब क्या मजा आएगा तलवार दे दी तो? तलवार से कैसा मजा आता है? तो ऐसी कोई भी चीज देख करके वो यश नहीं लूटता, दानवीर नहीं कहलाता। तो हिंसादान।
और फिर अंतिम जो है, वो है दुष्श्रुति। दुष्श्रुति का दूसरा नाम अशुभ श्रुति भी है। अशुभ श्रुति किसको कहते हैं? कि राग द्वेष करतार कथा, राग द्वेष को करने वाली जो कथाएं होती हैं, उनको कबहूं न सुनीजै, कभी सुनता नहीं है और ना पढ़ता है। राग द्वेष को उत्पन्न करने वाली कथा कौन सी है? नहीं, ये तो विकथा हो गई, लेकिन यहां पर दुष्श्रुति का तात्पर्य है कि ऐसे शास्त्र या ऐसे साहित्य को वो नहीं पढ़ता या सुनता कि जिसमें धर्म तो लेश मात्र भी न हो, लेकिन जिसको सुनने पर अपने अंदर राग-द्वेष की ही वृद्धि होती हो। जैसे उदाहरण के लिए आज की कुछ ऐसी फिल्में रहती है, कि जिसमें शिक्षा तो नाम मात्र है और मनोरंजन के नाम पर पब्लिक को लूटा जा रहा है। मनोरंजन कुछ भी नहीं है, सिर्फ किसी चीज को किसी दूसरे रूप में प्रस्तुत करके लोगों के लिए एक आकर्षण पैदा कर दिया गया है।
और अभी हम एक बुक पढ़ रहे थे जिग जिगलर की, कि इस बिगड़ी हुई दुनिया में संतान को अच्छे संस्कार कैसे देना? ये चिंता सिर्फ भारतवासियों को नहीं है और भारतवासियों को तो कम है बोलना चाहिए। अच्छे संस्कार देने की चिंता भारतवासियों को कम है। मुंह से बोलेंगे सब, जब इकट्ठे होंगे तो फिर अपनी थोड़ी सी प्रेस्टीज या फिर अपना प्रभाव जमाने के लिए बोलेंगे कि बच्चों पर अच्छे संस्कार पढ़ने चाहिए और खुद बच्चों को क्या-क्या करवाते हैं वो नहीं देखते।
टेलीविजन देखने की छूट किसने दी बच्चों को? और दुनिया के चैनल्स क्यों दिखा रहे हो आप उनको? वो जरूरी है क्या इतने सारे चैनल्स दिखाना? जिससे उसका जीवन खराब होने वाला है और आपको भी वो वृद्धाश्रम में भेजने वाले हैं, ऐसे संस्कार कौन डाल रहा है?
तो जिग जिगलर बोलते हैं, कि जिसमें चित्रों के माध्यम से, दृश्यों के माध्यम से बच्चे के मन में भी बुरे विचार उत्पन्न होने लग जाते हैं। अश्लील दृश्य, वही उसको दूसरी भाषा में अश्लील दृश्य कह लो आप।
उन्होंने ये लिखा कि एक बार कहीं किसी फॉरेन कंट्री में कोई ऐसी घटना हो गई, तो फिर दोनों बालक थे और फिर एक बालिका थी, तो उससे जब क्वेश्चनिंग की, क्रॉस क्वेश्चनिंग की, तो फिर उन्होंने बताया कि हमने ऐसी चीज वहां देखी थी, तो देखने के बाद हमको लगा कि हम लोग भी प्रयोग करके देखें, तो फिर हमने ऐसा काम किया। फिर उनको पता चला कि ये तो अपराध है।
औरहु अनर्थदंड, और भी ऐसे जो अनर्थदंड, अब ये समझ में आया कि ऐसा साहित्य अपने को नहीं पढ़ना चाहिए, ऐसी फिल्में, ऐसे चित्र नहीं देखना चाहिए, जिससे अपने मन में पाप उत्पन्न होता हो। क्योंकि मन मन है। मन को अगर सत्संगति के अच्छे संस्कार दिए जाएं, तो फिर मन बहुत उज्जवल होता है और मन को अगर बुरे संस्कार दिए जाएं, तो क्षणमात्र में मन क्या से क्या कर डाले। अभी आप में से कितने लोगों के मन में कैसी-कैसी भावना आती है, इतना सब सुनने के बाद, कितने परिणाम ऐसे लगते हैं कि ये चीज हमें जो मिल रही है, इसका कभी अभाव ना हो।
कुछ लोग तो सोचते हैं कि हमेशा मिलते ही रहे। और कुछ जो ज्यादा जानते नहीं महाराज जी के बारे में, वो तो ये भी बोलते हैं कि महाराज जी, आप हमेशा यहीं रहो। पर वो एक अपनी-अपनी सीमा है, साधु के जीवन की एक अलग मर्यादा होती है, पर यह भावना होना भी एक अच्छी बात है कि आप ऐसे संस्कार पसंद कर रहे हैं। लेकिन बाहर एक अलग दुनिया है और यहां अंदर एक अलग दुनिया है। अब इसमें अगर संतुलन, उसका अगर भारी हो गया, तो फिर ये संस्कार कमजोर पड़ेंगे।
इसलिए अपने अंदर, अपने परिवार में, अपने जीवन में किसका जोर आप चाहते हो, उसके अनुरूप आपको प्रवृत्ति करनी होगी। ये घटना कितनी भयंकर घटना है? जब जज ने कह दिया कि उसी ड्रेस में आ जाओ, अब इससे कितना स्पष्ट समझ में आ जाता है, इससे आगे तो और कुछ बोलने का रहता नहीं, बिल्कुल क्लियर हो जाता है। औरहु अनर्थदंड हेतु, और भी जो अनर्थदंड के हेतु हैं, ऐसे जो पाप होते हैं, उनको त्याग देते हैं। कौन?
चौथी ढाल में सम्यक् ज्ञान का वर्णन करके, फिर अब सम्यक चारित्र के वर्णन के अंतर्गत देश चरित्र और सकल चारित्र, ऐसे दो भेद बतलाए, और दो भेद बतलाकर के देश चरित्र का विवरण अब चल रहा है। तो देश चरित्र में सर्वप्रथम पांच अणुव्रत होते हैं। कौन से पांच अणुव्रत होते हैं? अहिंसाणुव्रत, सत्याणुव्रत, अचौर्य अणुव्रत, ब्रह्मचर्याणुव्रत और कौन सा? अपरिग्रह अणुव्रत नहीं होता, अपरिग्रह महाव्रत ही होता है, या परिग्रह परिमाण नाम का अणुव्रत है, पांचवां। इसके बाद तीन गुणव्रतों की चर्चा हुई है, दिग्व्रत, देशव्रत और अनर्थदंड व्रत।
व्रती लोग खेती तो कर नहीं सकते, क्योंकि उनमें तो पेड़ों का काटना होता ही है फिर?
आपने पंक्ति ढंग से नहीं पढ़ी। क्या लिखा है पंडित जी ने? कर प्रमाद, प्रमाद करता हुआ। अगर खेती कर रहा है, तो फ़सल पैदा करने के लिए करेगा, कोई आपत्ति नहीं। लेकिन प्रमाद करके व्यर्थ में पेड़ों को तोड़ना, पत्तों को खींचना, फूलों को तोड़ना, व्यर्थ में न करे। कर प्रमाद, व्यर्थ में क्यों करे? प्रयोजन नहीं करेगा। खेती करने की मना नहीं है। व्रती जो श्रावक है, खेती कर सकता है। उसका लक्ष्य क्या है? उसका लक्ष्य है खेती करना। पेड़ों को काटना उसका लक्ष्य नहीं है। और जब खेती करेगा, तो फसल काटनी पड़ेगी, वो तो काटेगा, उसमें कोई बात नहीं। लेकिन वो इस बात का ध्यान रखेगा कि अगर खेती में कल को कोई जीव लगे नहीं, क्योंकि जीव लगेंगे तो उनको मारने की दवा वो नहीं छिड़क पाएगा, नहीं तो उसको महान हिंसा का बंध हो जाएगा। इसलिए वो ऐसी कोशिश करेगा ताकि इसमें कीड़े ना लगें, लेकिन खेती कर सकता है।
और ऐसे कौन से अनर्थ दंड हैं जो व्रती को नहीं करनी चाहिए?
अब देखो, ध्यान से। मान लो, मैं और मेरी पत्नी, हम दो जने हैं। और हम जिस मकान में रहते हैं, उस मकान में मान लो आठ कमरे हैं। आठ कमरे का मकान क्यों रखना? पति-पत्नी को एक कमरा या दो कमरे का मकान रखना। क्यों? अन्यथा आठों कमरों की सफाई, धुलाई, उनकी सारी व्यवस्था में रोज हिंसा लगेगी ना? तो यह फालतू का अनर्थ दंड हुआ कि नहीं हुआ? हम सब बैठे हैं, फालतू गपशप कर रहे हैं। फलाने नेता उसके बारे में, उसके बारे में, वो ऐसा होना चाहिए, उसने गड़बड़ कर दी, उन्होंने नकल कर दी, फालतू की बातें क्यों करें? हमने क्या किया? भोजन तो किया शाम को और बर्तन उठा के रख दिए, सुबह तक नहीं मांजा, फालतू की हिंसा हुई कि नहीं हुई? हम ऐसे कार्य क्यों करें? हमने ऐसे बहुत से लोगों को देखा है, जिन्हें सामान इकट्ठे करने का बहुत शौक है, लेना ना देना। एक हमारे सज्जन हैं, वो क्या करते हैं? जितनी भी शादियां होती हैं ना, उनके कार्ड इकट्ठे करते रहते हैं। एक दिन हम उनके यहां गए, तो हमने एक अलमारी पूरी उन कार्डों से भरी हुई देखी। हमने पूछा, इनका ये अलमारी में ये कार्ड कैसे रखे हैं? बोले, पिछले 25-30 साल में जितनी शादियां हुई हैं, सबके कार्ड मैंने रखे हुए हैं, क्या लाभ? अब आप रखोगे, उनमें दीमक कीड़े लगेंगे कि नहीं लगेंगे? बिल्कुल लगेंगे। हम क्यों करें इकट्ठा? जो चीज़ बेकार हो गई है, उन्हें हटा दो ना फौरन, क्यों रखते हो तुम? अगर रखेंगे, तो हिंसा का कारण होगा। आपने गाड़ियां, एक बॉम्बे के सज्जन हैं, उनके यहां 94 फोर व्हीलर गाड़ियां हैं। घर में पति-पत्नी दो जने हैं, इतनी गाड़ियां क्यों रखना? क्यों? अगर रखोगे तो इनकी धुलाई-सफाई रोज करनी पड़ेगी। ये सब फालतू के अनर्थ दंड हैं। ऐसे बहुत से हिंसक वाले कार्य हैं, अब मकान की आप सफाई नहीं कर रहे हैं, तो उसमें गंदगी भरेगी, कीड़े पड़ेंगे, ऐसा क्यों? पुरानी अखबार की रद्दी है, छह-छह महीने दो-दो साल, चार-चार साल तक की रखी है, क्यों रखी है इतनी? फौरन जो चीज़ बेकार है, उसे हटाते जाओ ना। अगर हटाते जाएंगे, तो कीड़े नहीं लगेंगे, फालतू हिंसा नहीं लगेगी, पाप का बंध नहीं होगा। इसलिए सीधी सी बात, जो कार्य, जिनसे मेरा कोई मतलब नहीं और जिनसे पाप बंद होता है, ऐसे जितने भी कार्य हैं, मैं उनसे बचूं। यहां पंडित जी ने पांच, आचार्यों ने भी पांच अनर्थ दंड बताए हैं। उनका वर्णन कर दिया। शेष जो आपको व्यर्थ के लगें, उन्हें हटा दें।
चौथी ढाल छंद 13 – सामायिक, प्रोषधोपवास, भोगोपभोग-परिमाण व्रत और अतिथि संविभाग शिक्षाव्रत का स्वरूप
धर उर समता-भाव, सदा सामायिक करिये। परव-चतुष्टयमाहिं, पाप तज प्रोषध धरिये ॥
भोग और उपभोग, नियम करि ममत निवारै । मुनि को भोजन देय, फेर निज करहि अहारै ॥13॥
अन्वयार्थ (उर) मन में (समताभाव) निर्विकल्पता को या शल्य के अभाव को (धर) धारण करके (सदा) प्रतिदिन (सामायिक) सामायिक (करिये) करना सामायिक शिक्षाव्रत कहलाता है। (परव चतुष्टयमाहिं) चारों पर्वों के दिनों में (पाप) पाप के कामों को (तज) छोड़कर (प्रोषध) प्रोषधोपवास (धरिये) करना प्रोषधोपवास शिक्षाव्रत कहलाता है। (भोग) भोगरूप वस्तुओं का और (उपभोग) उपभोग रूप वस्तुओं का (नियम करि) परिमाण कर शेष सबसे (ममत) मोह (निवारै) हटाना भोगोपभोग परिमाणव्रत कहलाता है। (मुनि को) दिगम्बर मुनि आदि पात्रों को (भोजन) आहार (देय) देकर (फेर) पीछे (निज) स्वयं (अहारै) भोजन (करहि) करना अतिथि संविभागव्रत कहलाता है।
अर्थ- अब इसके बाद चार शिक्षा व्रत है, सामायिक व्रत, प्रोषध व्रत, भोगोपभोग परिमाण व्रत और अतिथि सत्कार व्रत, इसको अतिथि संविभाग भी कहते हैं, वैयाव्रत भी कहते हैं।
अब देखिए, कौन से चार हैं ये? तो धर उर समता भाव सदा सामायिक करिए, उर यानी अपने हृदय में समता भाव धारण करके, सदा, हमेशा, प्रतिदिन सामायिक करिए। ये शिक्षा व्रत हो गया।
क्योंकि साधु के लिए सामायिक का कोई काल नहीं है। साधु सुबह, दोपहर, शाम सामायिक करे, ऐसा कोई उल्लेख मुनियों के ग्रंथों में नहीं है।
साधु के लिए यह बतलाया है कि 24 घंटे समता भाव रखो। सुबह-दुपहर-शाम सामायिक करो, ऐसा कहीं साधु के लिए नहीं लिखा, कि सुबह, दोपहर, शाम वाली जो सामायिक है, वो श्रावक के लिए अभ्यास रूप में है।
कि साधु 24 घंटे कैसे रखते होंगे समता? श्रावक को क्या करना है? उसकी शिक्षा लेना है, तो शिक्षा व्रत के अंतर्गत सामायिक करता है, तो सामायिक कब करता है? तो प्रतिदिन करता है।
फिर प्रतिदिन कब-कब करता है? तो उसमें फिर सामायिक व्रत के स्वरूप में बतलाया है कि दो संध्याओं में करता है।
आचार्य अमृतचंद्र स्वामी ने पुरुषार्थ सिद्धू उपाय में लिखा है कि सुबह और शाम को करता है, सूर्योदय के समय और सूर्यास्त के समय, दो बार।
और जब सामायिक प्रतिमा धारण करता है, तब तीन बार करता है, त्रिसंध्यमव्यबंदी। ये इतना फर्क है सामायिक व्रत में दो बार, सामायिक प्रतिमा में तीन बार और दर्शन प्रतिमा में जहां पर कुछ भी नहीं है, दर्शन प्रतिमा में क्या है? पांच अणुव्रत है, वो भी अतिचार सहित है। सप्त व्यसनों का त्याग है पूरी तरह से, अष्ट मूल गुणों का पालन कर रहा है, लेकिन सामायिक वगैरह का कोई नियम नहीं है, तो भी कम से कम दिन में एक बार सामायिक करना चाहिए, वो उसके हित में होगी। सामायिक कभी भी अहितकारी नहीं होती।
कम से कम दर्शन प्रतिमा में भी सामायिक कर लेना चाहिए।
ठीक है, सामायिक उसमें कोई व्रत भी नहीं है और फिर प्रतिमा भी नहीं है, तो भी सामायिक का अभ्यास करना चाहिए, क्योंकि सामायिक ही जैन साधना का प्राण है।
आज तक जितने भी जीव जैन साधना के द्वारा निर्वाण को प्राप्त हुए हैं, वो बिना सामायिक के नहीं हुए।
और सामायिक के बिना निर्विकल्प समाधि की दशा बनती नहीं है, जैसे उस दिन आपको बहुत सारे शब्द लिखवाए थे, याद है आपको? वो कौन सा प्रकरण था जब लिखना पड़े थे शब्द इतने सारे? नहीं, किस शब्द को लेकर के हमने उसके पर्यायवाची भेद बतलाए थे? नहीं नहीं। यहाँ पर क्या था? नहीं कोई ऐसा शब्द आया था, हां ये त्रिगुप्ति वाली बात आई थी, याद है आपको? कोटि जन्म तप तपे ज्ञान बिन कर्म झरे जे, ज्ञानी के छीनमाही त्रिगुप्तिते सहज टरे ते।
अब ये जो ज्ञानी हैं, ये त्रिगुप्ति में स्थित ज्ञानी हैं।
त्रिगुप्ति शब्द बहुत वजनदार है। इसी को अभी एक शब्द और लिख लो आप, निर्विकार स्वसंवेदन ज्ञानी, उसी को कहा जाता है। और उस त्रिगुप्ति अवस्था में जो मुनि अवस्थित रहते हैं, उस अवस्था का नाम उपेक्षा संयम भी होता है।
उसी को शुद्धोपयोग भी कहते हैं। उसी को शुद्धात्मानुभूति भी कहते हैं। उसी को निर्विकल्प समाधि भी कहते हैं, उसी को परम सामायिक भी कहते हैं। और ऐसे कितने सारे शब्द लिखवाए थे? उसी को स्वास्थ्य भी कहते हैं।
साम्यं स्वास्थ्यं समाधिस्च योगाश्चेतरो निरोधना, उसी को योग भी कहते हैं। और कोई शब्द था? उसी को कारण समयसार भी कहते हैं, कार्य समयसार क्या होगा फिर? केवल ज्ञान आदि। केवल ज्ञान आदि उसका कार्य है अभेद रत्नत्रय, इसी को अभेद रत्नत्रय भी कहते हैं।
इसी को वीतराग चारित्र भी कहते हैं, ये सब पर्यायवाची शब्द।
सामायिक जो है, वो हृदय में समता भाव धारण करके गृहस्थ को सदा करना चाहिए, प्रतिदिन करना चाहिए। सामायिकं प्रतिदिवसम यथावदप्यनलसेन चेतव्यम्। रत्नकरण श्रावकाचार में लिखा है कि सामायिक प्रतिदिन करने योग्य होती है।
थोड़ी देर तो कम से कम आप लोग कोई भी उठकर सुबह, जैसे आप उठते ही साथ किसी काम में लग जाते हैं क्या? अगर ऐसी स्थिति हो किसी के घर में, तो फिर वो थोड़ी देर पहले उठ जाए। इतनी व्यस्तता हो, तो थोड़ी देर पहले उठ जाए। एक बार हमारे पास भाग्योदय तीर्थ में जो ब्रह्मचारिणी, प्राकृतिक चिकित्सा में संलग्न रहती हैं, उन्होंने आकर के पूछा था कि महाराज श्री! कोई दो शब्द उपदेश के, तो हमने पहले तो यह कहा कि जहां गुरु विराजमान हैं, वहां शिष्य कैसे उपदेश दे? आप उपदेश लेना हो तो गुरु के पास जाकर के लो। बोले कि नहीं फिर भी थोड़ा सा, गुरु के पास तो हम लेते ही रहते हैं, लेकिन आपसे हम कुछ लेना चाहते हैं।
तब हमने कहा कि 24 घंटे होते हैं एक दिन में। 24 घंटे में केवल 24 सेकंड के लिए आपकी वो दशा बननी चाहिए कि जिस समय आपके अंदर ऐसी संवेदना हो कि मेरा कुछ भी नहीं है। अगर 24 घंटे में 24 सेकंड तक आप इस बात को हमेशा संभाल कर रखोगे कि मेरा कुछ भी नहीं है, तो फिर आप मोह माया से एक ना एक दिन बाहर निकल जाएंगे।
क्योंकि मोह माया में जो 24 घंटे उलझा रहता है, वो छोड़ नहीं पाता। 24 घंटे में 24 सेकंड चाहिए। केवल इतना सोचना है आपको, केवल इतना, कि मेरा कुछ भी नहीं है। बहुत बड़ी कठिन बात है क्या? बड़ी आफत वाली बात है क्या? इतना आप नहीं सोच सकते क्या?
और यह सत्य है कि असत्य है, इसको और सोच लेना। और बाकी जो 23 घंटे, 59 मिनट और कितने सेकंड्स? 36 सेकंड जो कुछ हो रहा है, वो सत्य है या असत्य? बताओ।
तो कम से कम इतनी सत्य की संगति अगर रख लें, तो एक ना एक दिन वो शक्ति अपने अंदर जागृत होती है। क्या होता है कि अपने सबके अंदर वो अपार शक्ति भरी पड़ी है। किसी में कम नहीं है शक्ति।
अभी उदय सुद्धर वृत्तांत जो पद्मपुराण में आता है, शादी करने के लिए जा रहे हो और फिर दीक्षा ले ली। विवाह करते-करते वो शक्ति कहां से आ गई दीक्षा लेने की? और किसी की शक्ति सोई रहती है, तो उस शक्ति को कैसे जगाओगे? शक्ति को जगाने के लिए, देखो एक इतर रामायण में एक कथा आती है, कि जब और जैन रामायण में भी वो कथा बड़ी प्रसिद्ध है, रामायण की कथा जिसमें हनुमान को राम भेजते हैं, सीता की खोज में।
और सीता की खोज में जब भेजते हैं, तो जैन रामायण के अनुसार एक पद आता है, जब राम ने हनुमंत को गद लंक पठाया, सीता की खबर लाने को सह सैन्य सिधाया, मग बीच दो मुनिराज की लग आग में काया। जानकार हो आप लोग। माने ऐसी बारिश गिराई उन्होंने अपनी विद्या बल से, कि वो पूरा दावा नल शांत हो गया और फिर मुनिराज का उपसर्ग दूर हो गया।
तो ऐसी घटना जैन रामायण में, और जब इतर रामायण में दृष्टांत का सार अपने को ग्रहण करना है। क्या होता है कि अपने प्रथम प्रधानमंत्री ने कहा था कि जैन ये भारत, भारत में जो संप्रदाय हैं, जैन संप्रदाय, बौद्ध संप्रदाय, हिंदू संप्रदाय, इनके पुराण ग्रंथों को देखोगे,
तो आपका दिमाग चकित हो जाएगा कि क्या कभी ऐसा हो सकता है, प्रैक्टिकली जो कुछ हुआ है उसमें पुराणों में, जो कथाएं सुनाई जा रही हैं, क्या सही में ऐसी हो सकती है? तो उन्होंने ये कहा था कि इसकी सच्चाई पर ध्यान मत दो।
इसके सार को पकड़ो। कैसा सार इसमें छुपा हुआ है, उसको पकड़ो। तो उसमें कथा ऐसी आती है इतर रामायणों में, कि हनुमान जब छोटे थे, तो बहुत उत्पात मचाते थे। तो उत्पात मचाते थे, तो फिर एक बार किसी ने शाप दे दिया, कि जा तू इतना बलवान है और इतने बचपन में कितना खुरापाती है, तो तू अपनी शक्तियों को भूल जा, बोले ऐसे करके शाप दे दिया। शाप दे दिया तो शाप देने पर वो शक्तियां भूल गए अपनी, और शक्तियां भूलने पर फिर उनकी मां अंजना ने शाप देने वालों से प्रार्थना की, कि ऐसा शाप मत दो मेरे पुत्र को।
तब फिर उनका क्रोध थोड़ा शांत हुआ। शाप देने के बाद किसी का भी क्रोध थोड़ा शांत हो ही जाता है, तो क्रोध थोड़ा सा शांत हुआ, तो शांत होने पर बोले कि अच्छा ठीक है, ये राम की आराधना करेगा और जिस दिन इसको राम मिल जाएंगे, तो ये जब इसको कोई स्मरण कराएगा, कि तेरी शक्ति कैसी है, तो इसकी शक्तियां जागृत हो जाएगी। तब तक ये भूला रहेगा।
अब स्थिति ऐसी आई कि जब राम ने अंगूठी देकर के भेजा इनको, तो फिर ये ढूंढते-ढूंढते पहुंचे समुद्र के तट पर। और समुद्र के तट पर ऐसे गुमसुम बैठे हुए थे हनुमान। तो फिर बाकी सब जो वानर लोग थे, वो अपने-अपने हिसाब से बोल रहे थे कि मैं 25 योजन लांघ सकता हूं, पूरे समुद्र के पार नहीं जा सकता, तो वहां लंका तक मैं नहीं जा पाऊंगा। कोई बोलता है कि मैं 50 लांग जाऊंगा, लेकिन फिर तो लंका तो 100 योजन दूर है।
ऐसी सब चर्चाएं चल रही थीं। अंत में सबका ध्यान हनुमान की तरफ गया। तो हनुमान की तरफ जाकर के लोग बोलते हैं कि आप क्यों गुमसुम बैठे हुए हो? फिर किसी कथा में ऐसा भी आता है, कि वहां नारद जी उपस्थित होते हैं। और नारद जी उपस्थित होकर के, हनुमान से कहते हैं कि तुम अपनी शक्ति भूल गए हो क्या? तुम्हारे लिए तो ये कार्य बाएं हाथ का खेल है। नारद जी ऐसे में तो बहुत एक्सपर्ट रहते हैं, मतलब किसी को उकसाने में या फिर यहां की वहां खबर पहुंचाने में, बहुत उनके जैसा कोई उस्ताद मिलने, मिलना मुश्किल है।
तो फिर उन्होंने हनुमान को याद दिलाया, कि देखो तुम जब छोटे थे, तब वो सूर्य वाली घटना याद करो। जैन रामायण में भी ऐसी घटना आती है, सूर्य वाली एक घटना आती है, कि विद्याधरों की प्रतियोगिता होती है विजयार्ध पर्वत पर, कि कौन ज्यादा विद्यावान है? तो उस समय हनुमान ने अपनी विद्या का ऐसा प्रदर्शन किया, कि सारे विद्याधर लोहा मान गए। एक पैर तो उन्होंने विजयार्ध पर्वत के शिखर पर रखा, और अपना शरीर उस विद्या बल से इतना विशाल बनाया, कि दूसरे पैर से सूर्य के विमान को उन्होंने ठोकर मार दी।
उत्तर पुराण की रामायण में ये कथा आती है। और फिर अगले ही क्षण त्रसरेणु के समान छोटा, सूक्ष्म शरीर बना करके ऐसे उड़ते हुए, उन विद्याधरों के बीच में आ गए। तो इतना विशाल रूप बना करके, एकदम सूक्ष्म रूप बनाने के कारण, उनका नाम वहां पर हनुमान, ये रखा गया विद्याधरों के द्वारा। कई नाम है उनके, अमित तेज भी उनका एक नाम है। हनुमान भी उनका एक नाम है। श्री शैल भी उनका एक नाम है। वज्रांग बली भी उनका एक नाम, कई नाम है उनके, हनुमान के। तो उस समय जब नारद ने याद दिलाया, तब हनुमान ऐसे आंख बंद करके सुनते रहते हैं। और सुनते-सुनते उनकी श्वासों की गति परिवर्तित होती है।
उनकी धड़कनों में भी फर्क पड़ जाता है, और जब वर्णन पूरा होता है, तब हनुमान को अपनी शक्तियों का पुनः स्मरण हो जाता है, और विशाल काय बना करके वो जय श्री राम बोल कर, आपने सब देखा हुआ है टेलीविजन में। जब मन में दिया था, फिर एक कथा में नारद जी का भी उल्लेख मिलता है। तो पूरी सागर की चौड़ाई को उन एक छलांग में पार करके लंका पहुंच जाते हैं। और बीच में जितनी भी परीक्षाएं होती है, जितने विघ्न होते हैं, उन सबको क्रॉस कर जाते हैं, निकल जाते हैं। तो क्या हुआ? कि हनुमान को उनकी शक्ति याद दिलाने वाला कोई वहां पर निमित्त चाहिए था।
इसी प्रकार अपन भी यहां पर अपनी आत्मा की अनंत शक्तियों को लेकर इसी वक्त बैठे हुए हैं, लेकिन वो शक्तियां सोई हुई है। और याद दिलाने के लिए ये जिनवाणी माता आपको पुकार करके कह रही है, कि हे जीव! क्यों अपने आपको इतना निर्बल समझ रहा है? क्यों कायर बन रहा है? क्यों दीनहीन बन रहा है? क्यों अपने उस स्वाभिमान को भुला बैठा है? क्यों अपने आपको इतना कमजोर समझ रहा है? तेरी शक्ति जागृत हो जाए, तो एक क्षण में तू कहीं से कहीं गुणस्थानों की छलांग मारकर, अच्छी गिनती होती है जिनकी, उनमें गिना जाने लगे। लेकिन तू अपने आपको छोटा समझ रहा है।
एक घटना और भी आती है इसी विषय में। सामायिक का वर्णन अभी थोड़ा सा विस्तृत करेंगे अपन, आज उसको पूर्ण नहीं करते।
वैसे तो चार शिक्षा व्रतों में, चार पर्वों में, अष्टमी चतुर्दशी कृष्ण पक्ष की, और अष्टमी चतुर्दशी शुक्ल पक्ष की, इसमें प्रोषध, पापों का त्याग करके प्रोषध धारण करता है। ये दूसरा शिक्षा व्रत हो गया, पापों का त्याग करके प्रोषध धारण करने का अर्थ ये है, कि यदि उपवास करना हो अष्टमी चतुर्दशी को, तो उस दिन व्यापार, धंधे आदि को छोड़ना पड़ेगा। और दुनियादारी की जो टेलीविजन वगैरह देखते हैं, या और भी दूसरे काम काज करते हैं, तो उनको छोड़कर के प्रोषध धारण करने पर प्रोषध व्रत का, शिक्षा व्रत का लाभ होता है।
अन्यथा अगर आप यहां से भोजन छोड़ रहे हो, भोजन छोड़ने के बाद भी आप बाकी विषय कषायों को नहीं छोड़ रहे हो, तो फिर भोजन क्यों छोड़ा आपने? कि भोजन संबंधी राग से जो कर्म बंध होता है, उससे हम बच जाएं। यही उद्देश्य रहा या और कोई उद्देश्य था? ताकत देखनी थी क्या अपनी, कि खाना छोड़ करके हम कितने आगे बढ़ सकते हैं? नहीं।
वो अपनी शक्ति देखने के लिए नहीं कर रहे थे, बल्कि ये देखना था, कि इन पापों को छोड़ने से मेरे जीवन में कितनी पवित्रता आती है? तो उपवास करके अगर आप टेलीविजन के सामने दिनभर बैठे रहो, टाइम तो पास हो जाएगा, क्योंकि भूख-प्यास की जो तकलीफ है, वो मनोरंजन के माध्यम से निपट जाएगी। और इतने चैनल्स है कि आप 24 घंटे आराम से निकाल सकते हैं, अगर रात में ना भी सोए तो। लेकिन उसको उपवास नहीं कहते। उसको लंघन कहते हैं। लंघन यानी जानते हैं? ऑपरेशन के दिन भोजन नहीं करना पड़ता। उसको लंघन कहते हैं।
वैसी वैद्य भी कभी-कभी बोलूता है, कि अभी तुम ना, जो औषध का क्रम है, वो हम तब प्रारंभ करेंगे जब तुम कुछ लंघन कर लो। क्योंकि तुम्हारे शरीर में इतने जहर जमा हो गए हैं, कि अभी उसका शुद्धिकरण बिना लंघन के संभव नहीं है। तो लंघन करते हैं, तो फिर बहुत पुराना जो विकार होता है, वो अंदर से गल जाता है, क्योंकि इतनी गर्मी पैदा होती है उपवास और लंघन में, कि उस गर्मी के कारण वो विकार गल जाता है जो जमा हुआ था, और फिर वो छूटनेलग जाता है।
ये बात अलग है कि प्यास लगती है, भूख लगती है, इसकी ये अपने स्थान पर है, लेकिन जो विष है, वो विष तो छूटता है। तो लंघन कर्म निर्जरा के लिए नहीं किया जाता। लंघन किस लिए किया जाता है?
सिर्फ स्वास्थ्य लाभ के लिए या शुद्धिकरण के लिए। तो अगर आपने प्रोषध किया है, और उस समय विषय कषायों का त्याग नहीं करते, तो फिर उससे शरीर को तो लाभ हो सकता है, लेकिन आत्मा को लाभ नहीं होगा, क्योंकि कर्म निर्जरा का उद्देश्य अपूर्ण है।
इसी प्रकार भोग और उपभोग का जो परिमाण होता है, वो तीसरा शिक्षा व्रत है।
परिग्रह परिमाण तो जीवन भर का हो गया, लेकिन अब समय की सीमा बांध करके कुछ भोगों का और उपभोगों का परिमाण कर लिया जाता है, वो भी तीसरा शिक्षा व्रत है, और चौथा शिक्षा व्रत है कि साधुओं को भोजन करा करके फिर स्वयं भोजन करना।
अतिथि संविभाग। अब उसमें साधु जो होते हैं वो उत्कृष्ट पात्र होते हैं, मध्यम पात्र जो होते हैं वो व्रतिजन होते हैं, और जघन्य पात्र अविरती सम्यक् दृष्टि होते हैं। तो इतना इसके बारे में और थोड़ा सा विस्तार आगे करेंगे। सामायिक की चर्चा चल रही थी, शक्ति जगाने की बात चल रही थी। कई बार अपन कुछ अपनी कमजोरी के कारण या फिर कुछ अपनी विचारधारा के कारण डिप्रेस हो जाते हैं। डिप्रेस जानते हैं हम डिप्रेशन? अवसाद। अवसाद में चले जाते हैं।
एकदम ऐसा लगता है, कि मैं तो कुछ नहीं कर पाता हूं, और मैं करना चाहूं तो भी मेरे से क्या हो सकता है? एकदम निराशावादी विचार एकदम आ जाते हैं, और भी उसके बहुत सारे सिम्टम्स और साइंस प्रकट होने लग जाते हैं। एकदम उदास-उदास सा रहने, उसका चेहरा देखो तो ऐसा लगता है, कि जैसे इसने पर्युषण के जो व्रत होते हैं, वो कहीं अभी बीच में कर डाले हैं। ऐसी बुरी हालत हो जाती है उसके चेहरे की, माने चेहरे में वो जो खिला हुआ एक प्रफुल्लता का भाव होना चाहिए, वो उड़ जाता है डिप्रेशन में।
तो उस समय एक दृष्टांत हम आपको दे रहे हैं वो याद रखने का, कि अपनी शक्ति जगाने के लिए जैसे एक बार क्या हुआ था? ये एक किस्सा है, माने यथार्थ घटना तो इसको नहीं कह सकते, लेकिन एक प्रेरणा देने वाली एक कहानी जैसी है, कि एक बार एक कुम्हार के यहां, कहीं से शेर का बच्चा पहुंच गया, और शेर को शेर के बच्चे को उन्होंने गधों के साथ में पाल लिया। और फिर वो अच्छा बलवान था, तो बलवान था तो फिर उसको, उसके मिट्टी वगैरह सब जो है, उसी के ऊपर लाद करके लाने लगे, तो फिर वो गधे भी उससे डरते नहीं थे, और वो कुम्हार से डरता था। वो शेर बड़ा हो गया। और उसके बाद एक बार ऐसा हुआ, कि जब ये लोग सब इधर-उधर घूम रहे थे, जंगल के पास, तो गधे घास चर रहे थे, और शेर अपने हिसाब से कुछ कर रहा होगा।
तो उसी समय पहाड़ी के ऊपर से जो वास्तव में जंगल का राजा शेर था, उसने ऐसे दूर से गधों की गंध हवा इधर से उधर बह रही थी, तो गंध ली, और उसके बीच में उसको शेर की भी गंध आई। और शेर की गंध जब शेर को आती है, तो फिर वो दहाड़ता है। तो उसने ऐसे दोनों पंजे ऐसे व्यवस्थित किए, अपने पीछे के पैरों को भी व्यवस्थित किया, पूंछ को ऐसे ऊपर की तरफ फटकारा, और फिर मुंह उठा करके पूरे गर्दन के बाल ऐसे झटकते हुए उसने जोर से दहाड़ लगाई।
अब शेर की उस दहाड़ को इस शेर ने पहली बार सुना, और इसने पहली बार जैसे ही सुना, तो इसके जो सोए हुए जींस थे, उनमें एक लहर सी आ गई। और फिर पता नहीं, इसने कभी दहाड़ा नहीं होगा, वो गधों की ये आवाज सुनता रहा था बचपन से, तो उसने हो सकता है उतने समय तक वैसी आवाज निकालने की कोशिश की हो, नकल की हो गधों की। लेकिन जैसे ही उसने वो आवाज सुनी, तो फिर उसने उसने भी ऐसे ही अपने आप ये झटकारी मेन बोलते हैं, इसके जो बाल होते हैं उसके, झटकार करके फिर उसने भी ऐसे आगे पंजे किए, और फिर जोरदार दहाड़ लगा करके उसको जवाब दी।
जब उसको जवाब दिया, तो यहां से गधों ने जैसी आवाज सुनी, एक भी गधा वहां खड़ा नहीं था। तो जब शेर ने देखा कि ये लोग सब इस आवाज को सुनकर के भाग गए। यह क्यों डरते हैं? तो फिर शेर उन गधों को आवाज लगाता है।
कि देखो, मैं तुम्हारा साथी हूं। तुम लोग डर के क्यों भाग रहे हो? अब एक भी गधा पीछे मुड़ करके देखने को तैयार नहीं है। और वो शेर पहाड़ से नीचे उतरता है। और वो, इस शेर को देखता है कि ये गधों को पुकार रहा है कि मैं तुम्हारा साथी हूं, मैं तुम्हारा साथी हूं।
तब वो यहां से फिर से, ऐसे करके कुछ आवाज करता है। तो ये मुड़ करके देखता है। तो सामने आमने-सामने दो शेर आमने-सामने खड़े हो जाते हैं। तभी इस शेर को बड़ी प्रसन्नता होती है, उसके रूप को देखकर। बोले कि तुम कौन हो? तुम्हें, तुमसे मिलकर मुझे बहुत हार्दिक आह्लाद हो रहा है। तब फिर वो शेर कहता है, कि तुम मेरे साथी हूँ। ये क्या कह रहा था उन गधों से? कि मैं तुम्हारा साथी हूं।
बोले कि तुम मेरे साथी हो, उनके साथी नहीं हो। वो तो धोखे से तुम कुम्हार के यहां चले गए। तो गधों के बीच तुम्हारा लालन-पालन हो गया, इसलिए तुम, यानी शेर होकर के भी गधे बने हुए हो। वास्तव में देखो, तुम अपना रूप देखो। तुम बिल्कुल मेरे समान हो। देखो जरा, आंख झुका करके देखो। तो उसने ऐसी आंख झुकाई। तो वो पूरे बाल देखे उसने। फिर वो अपना पंजा दिखाता है। और बोले कि देख, अपने पंजे देख। तो शेर अपना पंजा देखता है। फिर बोले कि उनके याद है तेरे को? कैसे थे? उनका मुंह याद है? उनके कान याद हैं? और अब देख तेरी आवाज कैसी है? फिर जब शेर शेर को अपनी शेरियत, यानी अपने शेरपने की पहचान कराता है। तब फिर वो शेर सही में शेर बन जाता है और फिर वापस गधों के बीच नहीं जाता और फिर वहां चला जाता है।
इसी प्रकार जिनवाणी माता, रागी आत्माओं से कहती है, मिथ्या दृष्टि जीवों से कहती है कि हे मिथ्या दृष्टियों! तुम अपनी आत्मा के स्वरूप को भूलकर शरीर को ही अपना रूप मान बैठे हो। और तुम शरीर को अपना रूप मान करके, अपनी अलग-अलग प्रकार की छवियां बना करके, भ्रमित हो रहे हो।
मोह महामद पियो अनादि, भूल आपकू भ्रमत्वादी। अनादि काल से तुम भटक रहे हो अपने आपको भूल करके।
व्यर्थ में भ्रमण कर रहे हो। एक बार पहचानो तो सही, कि अपनी आत्मा में कितनी शक्तियां हैं? और अपनी आत्मा का स्वरूप क्या है? आत्मा का स्वरूप तो चारों गतियों में जीव के पास रहता है, लेकिन आत्मा का जो रूप होना चाहिए, वो रूप तो केवल सिद्ध अवस्था में इसको प्राप्त होता है। इसलिए अभी स्वरूप को पहचान लो।
फिर जब अपने स्वरूप को पहचानता है, तो स्वरूप को पहचानने पर उसको लगता है कि अरे, मैं अपने आपको क्या समझ रहा था?और मैं क्या हूं वास्तव में?और फिर जो अपने आपको कमजोर समझता रहता है, ये भी पर्याय दृष्टि है।पर्याय दृष्टि का मतलब?अभी जो कर्म के उदय से जो अवस्था बन रही है जीव को, बस उसी को अपना पूरा रूप समझ करके जीव भ्रमित हो रहा है।नहीं।कर्मोदय से होने वाली औदयिक पर्याय,इस जीव का त्रैकालिक स्वरूप नहीं है।
इसका शाश्वत स्वरूप तो चेतना है।तो उस चैतन्य स्वरूप को देखो, निराकुल स्वरूप को देखो, उस अपार शक्ति के भंडार को देखो,तो पता चलेगा कि मेरे अंदर कोई ऐसी चीज नहीं है जिसका मुझे अफसोस करना चाहिए। मेरे अंदर कुछ भी ऐसा नहीं है,जिसके कारण मैं अपने आपको कमजोर समझूं। इन्फीरियोरिटी कॉम्प्लेक्स और सुपीरियोरिटी कॉम्प्लेक्स, अपने आपको छोटा समझना या अपने आपको बड़ा समझना, दोनों ही अज्ञानता है। क्योंकि कोई आत्मा छोटी नहीं होती, कोई आत्मा बड़ी नहीं होती स्वरूप की दृष्टि से।
लेकिन पर्याय दृष्टि से देखो तो, छोटे-बड़े का फर्क होता है। इसलिए अगर अपन आत्मा को पहचानते हैं, तो फिर पर्याय दृष्टि से जिन्होंने बड़ी पर्याय प्राप्त की है आत्मा की, उनकी पूजा करें। क्योंकि अपनी पर्याय जो है वो भी हीन है, छोटी है। इस पर्याय से अपन बहुत सारे काम नहीं कर पा रहे हैं। इसलिए जिन्होंने काम किया है, उनकी उस पर्याय की अपन अर्चन करें,
अरहंत भगवान की सेवा करें, उनकी उपासना करें। तो जिसकी अपन उपासना करते हैं, उसके गुण अपने को प्राप्त होते हैं। जैसे संगीतकार की संगति करने से, संगीत की जानकारी प्राप्त होती है। जुआरी की संगति करने से, जुआ के गुर सीखने मिल जाते हैं। सत्संगति करने से सद्गुणों की प्राप्ति होती है, और कुसंगति करने से दुर्गणों की वृद्धि होती है। इसी प्रकार जिनेन्द्र भगवान की अर्चना करने से, अपने को जिनेन्द्र भगवान के कुछ गुण प्राप्त होते हैं, और उसकी प्रेरणा भी अंदर में जागृत होती है, कि जिनेन्द्र भगवान में और मुझ में कितना फर्क है? स्वरूप की दृष्टि से तो सभी आत्माओं का एक स्वरूप है, लेकिन अभी जो पर्याय है, पर्याय दृष्टि से अपन विचार करें, तो दोनों में बड़ा अंतर है।
और बड़ा अंतर क्यों है? क्योंकि मैंने अपनी आत्मा को या तो नहीं पहचाना है, और या तो पहचानते हुए भी, अपने विकारों पर मैंने विजय प्राप्त नहीं की है। और उन्होंने क्या किया है? उन्होंने आत्मा को भी पहचाना है, और अपने विकारों को भी जीता है। इसलिए वो वो हैं, और मैं मैं हूं। इतना फर्क है। वो समुद्र के उस पार खड़े हुए हैं, और मैं समुद्र के इस पार से उनकी तरफ देख रहा हूं। तो अब आगे क्या करना है?
बस उस समुद्र के फासले को कम करते जाना है। कैसे कम क रेंगे? भक्ति रूपी नौका है, उस पर सवार होकर, भक्ति की नौका, विवेक की नौका, और वैराग्य की नौका। ये भक्ति, विवेक और वैराग्य, इन तीनों के सहारे जीव संसार सागर को पार करता है।
छहढाला पहली ढाल छंद 1 व 2 | छंद 3 व 4 | छंद 5 व 6 | छंद 7 व 8 | छंद 9 व 10 | छंद 11 व 12 | छंद 13 व 14 | छंद 15 व 16 |
दूसरी ढाल छंद 1 व 2 | छंद 3 व 4 | छंद 5 व 6 | छंद 7 व 8 | छंद 9 व 10 | छंद 11 से 13 | छंद 14 व 15 |
तीसरी ढाल छंद 1 व 2 | छंद 3 व 4 | छंद 5 व 6 | छंद 7 व 8 | छंद 9 व 10 | छंद 11 व 12 | छंद 13 व 14 | छंद 15 व 16 | छंद 17
चौथी ढाल दोहा और छंद 1 | छंद 2 व 3 | छंद 4 व 5 | छंद 6 व 7 | छंद 8 व 9