आलोचना पाठ – छंद 26 व 27 : अर्थ एवं व्याख्या
पुनि द्रव्य कमावन काजै, बहु आरम्भ हिंसा साजै।
किये तिसनावश अघ भारी, करुणा नहिं रंच विचारी॥
धनार्जन और आरम्भ में हिंसा
शब्दार्थ
- द्रव्य — धन-संपत्ति।
- कमावन काजै — कमाने के उद्देश्य से।
- आरम्भ — सांसारिक कार्यों में प्रवृत्ति, विशेषतः ऐसे कार्य जिनमें हिंसा जुड़ी हो।
- हिंसा साजै — हिंसात्मक कार्यों को अपनाया/व्यवस्थित किया।
- तिसनावश — तृष्णा के वश होकर।
- अघ भारी — भारी पाप।
- रंच — थोड़ा भी।
- करुणा — दया।
‘पुनि द्रव्य कमावन काजे’, पुनः द्रव्य यानी पैसा, पैसा कमाने के लिए ‘बहु आरंभ हिंसा साजे’, मैंने बहुत आरंभ और हिंसा की है, उसका सामान इकट्ठा किया है। ‘कीये तिसनावश अघ भारी’, मैंने तृष्णावश यानी कि बहुत ज्यादा लोभ के वश होकर के मैंने बहुत पाप कमाया है। ‘करुणा नहीं रंच विचारी’, मैंने किंचित मात्र भी करुणा का विचार नहीं किया, करुणा का विचार अपने मन के भीतर नहीं लाया।
यह पद आलोचना का एक बहुत महत्वपूर्ण मोड़ है। पहले पदों में मैंने दैनिक कार्यों से होने वाली अनजानी हिंसा की चर्चा की थी। अब धन कमाने की इच्छा में हमने जानते हुए भी अनेक हिंसात्मक आरम्भ किए। अधिक धन और परिग्रह कमाने की तृष्णा में व्यक्ति बड़े-बड़े व्यापार, कारखाने और नए-नए आरंभ करता है। इस प्रक्रिया में अनजाने में बहुत हिंसा होती है। दया और करुणा का विचार किए बिना केवल लाभ के पीछे भागने से भारी पाप कर्मों का बंध होता है।
यहाँ मूल कारण बताया गया है—
“तिसनावश” — तृष्णा के वश होकर।
धन स्वयं समस्या नहीं है; समस्या तब उत्पन्न होती है जब धन की तृष्णा विवेक और करुणा पर हावी हो जाती है।
तृष्णा के कारण व्यक्ति सोच सकता है—
- अधिक लाभ कैसे मिले?
- खर्च कम कैसे हो?
- उत्पादन अधिक कैसे हो?
- किसी भी साधन से धन कैसे कमाया जाए?
और इसी क्रम में यदि जीवों की हिंसा, शोषण या अन्याय की उपेक्षा होने लगे तो वह पाप का कारण बनता है।
यहाँ अर्थ और धर्म के बीच संतुलन की आवश्यकता बताते हैं। धन कमाना जीवन की आवश्यकता हो सकता है, लेकिन
धनार्जन + तृष्णा + हिंसा = अशुभ कर्मबंध
इसके विपरीत—
धनार्जन + विवेक + अहिंसा + न्याय = संयमित गृहस्थ जीवन।
छंद 27
इत्यादिक पाप अनन्ता, हम कीने श्री भगवंता
संतति चिरकाल उपाई, वाणी तै कहिय न जाई ॥27॥
शब्दार्थ
- इत्यादिक — इस प्रकार के और भी।
- पाप अनन्ता — अनंत प्रकार के पाप।
- श्री भगवंता — हे भगवान जिनराज!
- संतति — निरंतर, लगातार।
- चिरकाल — बहुत लंबे समय से।
- उपाई — किए/उत्पन्न किए।
- वाणी तै कहिय न जाई — वाणी से उनका पूरा वर्णन नहीं किया जा सकता।
‘इत्यादिक‘, इस तरह से, इस प्रकार से ‘पाप अनंता’, मैंने अनंत पाप किए हैं। ‘हम कीने श्री भगवंता’, हे भगवन्! हमने किए हैं, हमने बहुत सारे पाप किए हैं।हे श्री भगवान! मैंने बताए गए पापों के अतिरिक्त अनंत प्रकार के और भी पाप किए हैं। ‘संतति चिरकाल उपाई’, लंबे समय से निरंतर अनेक दोष करता आया हूँ लगातार और बहुत काल तक लगातार किए हैं। ‘वाणी ते कही न जाई‘, वाणी से मैं उनको कहने में भी समर्थ नहीं हूँ। मेरे द्वारा किए गए उन सभी पापों का पूरा वर्णन वाणी द्वारा करना संभव नहीं है।
अब अपनी आलोचना को किसी एक पाप या दोष तक सीमित नहीं रखते। वे स्वीकार करते हैं कि जो कुछ उन्होंने अभी तक बताया है, वह समस्त दोषों की पूरी सूची नहीं है।
“इत्यादिक पाप अनन्ता” का भाव है कि मनुष्य के जीवन में—
- जाने-अनजाने,
- मन से,
- वचन से,
- शरीर से,
- स्वयं करके,
- दूसरों से करवाकर,
- अनुमोदना करके,
अनेक प्रकार के दोष हो सकते हैं।
इसलिए कहते हैं कि मेरे पाप इतने अधिक हैं कि वाणी उनकी पूरी गणना नहीं कर सकती। हे भगवान! मैंने अनन्त काल से अनेक प्रकार के पाप किए हैं, जिन्हें वाणी से व्यक्त करना भी संभव नहीं है। यहाँ आलोचना का भाव निष्कपट आत्मस्वीकृति है। अपने दोषों को छिपाने, छोटा करके दिखाने या उनका औचित्य सिद्ध करने का प्रयास नहीं करते।
सच्ची आलोचना में यह स्वीकार करना आवश्यक है कि “मैं केवल उन्हीं दोषों का दोषी नहीं हूँ जो मुझे याद हैं; मेरे अज्ञान और प्रमाद से हुए ज्ञात-अज्ञात दोष भी मेरी आत्मशुद्धि के विषय हैं।”
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