छहढाला – दूसरी ढाल छंद 7 – निर्जरा और मोक्ष तत्त्व का विपरीत श्रद्धान एवं अगृहीत मिथ्याज्ञान
रोके न चाह निज शक्ति खोय, शिवरूप निराकुलता न जोय।
याही प्रतीतिजुत कछुक ज्ञान, सो दुखदायक अज्ञान जान ॥7 ॥
अन्वयार्थ -“मिथ्यादृष्टि प्राणी मिथ्यात्व के प्रभाव से” (निज शक्ति) अपनी आत्मा की शक्ति को (खोय) खोकर “पाँचों इन्द्रियों के विषयों की” (चाह) इच्छा को (न) नहीं (रोके) रोकता है तथा (निराकुलता) आकुलता के अभाव को (शिवरूप) मोक्ष का स्वरूप (न जोय) नहीं मानता है। (याही) इसी (प्रतीतिजुत) श्रद्धासहित (कछुक ज्ञान) जो कुछ थोड़ा सा ज्ञान होता है (सो) वह (दुखदायक) कष्टदायक (अज्ञान) अगृहीत मिथ्याज्ञान (जान) जानना चाहिए।
अर्थ – कई पुस्तकों में “रोके न चाह” पाठ भी दिया हुआ है, लेकिन पंडित जगमोहनलाल जी “रोकी न चाह” पाठ को उचित मानते हैं। यदि “रोके न चाह” पाठ का अर्थ निकालें, तो ऐसा अर्थ निकलेगा कि वह अपनी चाह (इच्छा) को तो रोकता नहीं है, और अपनी शक्ति को खो देता है। चाह को न रोकने से ही अपनी शक्ति नष्ट होती है, क्योंकि यदि आप इच्छाओं की पूर्ति करने जाएँगे, तो जो ऊर्जा और अपनी शक्ति है, वह उसी में खर्च हो जाएगी।और फिर निराकुल जो मोक्ष का स्वरूप है, उसके दर्शन नहीं मिलने वाले। ध्यान के समय योगी को जो आनंद प्राप्त होता है, बस वही आनंद मोक्ष की प्रेरणा बन जाता है।
“ये मत खाओ”—”नहीं, नहीं, हम नहीं रह सकते।” “ऐसा मत करो”—”नहीं, ऐसा हमसे नहीं हो सकता।” “उपवास कर लो”—”नहीं, हम नहीं कर सकते।” शक्ति है, पर अपनी इच्छाओं को नहीं रोकता। इच्छाओं का रोकना अर्थात तप। आचार्यों ने क्या कहा? “इच्छा निरोध तप”। तप किसे कहते हैं? इच्छा का रोकना तप है।
मैं आज आहार, भोजन नहीं लूँगा—अनशन नाम का तप है। मैं भूख से कम खाऊंगा—उनोदर नाम का तप है। मैं आज दो घंटे खड़े होकर सामायिक करूँगा—कायक्लेश नाम का तप है। इसमें अपनी इच्छाओं को रोकना पड़ता है। शरीर तो इन चीज़ों को अच्छा थोड़ी मानता है, लेकिन आत्मा कहता है—”नहीं, तब काम बनता है।” आप उपवास करो, तो भूख लगती है कि नहीं? पेट तो भोजन मांगता है, पर आत्मा कहता है—”नहीं, उपवास करना है।” उपवास करना तप है, तप से निर्जरा होती है, मैं करूँगा, तब काम बनता है। अगर इच्छाओं को नहीं रोकेंगे, तो तप कैसे होगा? और तप नहीं होगा, तो निर्जरा कैसे होगी?
तत्त्वार्थ सूत्र में सूत्र दिया है—”तपसा निर्जरा च”। तप से निर्जरा भी होती है। निर्जरा का मुख्य कारण क्या है? तप। अगर मुनि महाराज तप नहीं करें, तो कभी कर्मों की निर्जरा नहीं और कभी केवलज्ञान और मोक्ष नहीं होगा। इसलिए निर्जरा तत्त्व का जिसको सही श्रद्धान है, वो तो इच्छाओं को रोकेगा और तप करेगा। और जिसका तप करने में विश्वास नहीं, उसको निर्जरा तत्त्व का सही श्रद्धान ही नहीं। क्या कहा? अपनी “चाह” माने इच्छाओं को नहीं रोकता है।
मिथ्यादृष्टि जीव अपनी शक्ति को खोकर… आत्मा में शक्ति कितनी है? क्या पूछूँ? हम क्या नहीं कर सकते हैं? जो चाहें सो बन सकते हैं। मुनि नहीं बन सकते? क्यों नहीं बन सकते? क्या महिलाएँ आर्यिका नहीं बन सकतीं? सब बन सकती हैं, लेकिन इच्छाओं को नहीं रोक पातीं। सर्दी बहुत लगेगी, केश कैसे होगा? बस, ये सोच के रह जाते हैं। और ऐसा अगर रह जाएँगे, तो तप कैसे होगा? तप नहीं होगी, तो निर्जरा कैसे होगी? जिन्हें निर्जरा तत्त्व का श्रद्धान होता है, वो तो यह कहते हैं—”मैं तपचरण करूँ और कर्मों को अपनी आत्मा से हटाऊँ।” वो तो अपनी तपस्या को बढ़ाते जाते हैं।
तो क्या कह रहे हैं? अपनी शक्ति को खोकर जो इच्छाओं को नहीं रोकता है, उसके निर्जरा तत्त्व का विपरीत श्रद्धान है। अगर निर्जरा तत्त्व का सही श्रद्धान है, तो निर्जरा करने में विश्वास बनाओ। तुम तो इच्छाओं को रोक नहीं रहे, इसका मतलब तुम्हें निर्जरा अच्छी नहीं लगती, तुम्हारा श्रद्धान विपरीत है।
अब देखें मोक्ष तत्त्व का—शिवरूप मोक्ष का स्वरूप निराकुलता नहीं है, न जोय (नहीं होता)। मोक्ष किसे कहते हैं? आकुलता से रहित हो जाना मोक्ष है। आकुलता क्या है? कर्मों के कारण जो सुख-दुख होते हैं, वो आकुलता है। और कर्म का उदय समाप्त हुआ, आत्मा से कर्म अलग हुए, तो आकुलता भी सारी समाप्त हो गई। अब मुक्ति में जो सिद्ध भगवान विराजमान हैं, अनंत सुख का आनंद ले रहे हैं।
दुख है आकुलता, सुख है निराकुलता। दुख का कारण है कर्मोदय, सुख का कारण है कर्मों का हटना। और परम सुख का कारण है कर्मों का नष्ट हो जाना। कर्म नष्ट हो गए, मुक्ति प्राप्त हो गई।
लेकिन मिथ्यादृष्टि क्या कहता है? “मोक्ष में क्या रखा है? संसार में तरह-तरह के राजपद मिलें, स्वर्ग मिलें, तो उसमें आनंद है। निराकुलता—ऐसा मोक्ष का स्वरूप हमें अच्छा नहीं लगता।” नहीं लगता! मोक्ष तत्त्व का विपरीत श्रद्धान हुआ। क्या लिखा देखो—मोक्ष का स्वरूप निराकुलता, ये ठीक नहीं है। ऐसा कोई मोक्ष है ही नहीं जहाँ आकुलता ना हो।
इस तरह निर्जरा और मोक्ष तत्त्व का विपरीत श्रद्धान हुआ। यहाँ तक जो गृहीत-अगृहीत मिथ्यादर्शन था, उसकी चर्चा पूरी हो गई।
“याही प्रतीतिजुत”—इसी प्रतीति का अर्थ होता है विश्वास, श्रद्धा, आस्था। तो अपनी चाह को न रोककर, शक्ति को गंवाकर, मोक्ष के स्वरूप निराकुलता को नहीं देखता। वह यह सोचता है कि इच्छाओं की पूर्ति में ही सुख है, और निराकुल जो मोक्ष है, उसके स्वरूप को नहीं समझता।
और “याही प्रतीतिजुत”—ऐसी ही श्रद्धा के साथ जो कुछ भी ज्ञान उसके पास है (चाहे वह बड़ी-बड़ी पुस्तकों का ज्ञान हो अथवा व्यावहारिक ज्ञान हो), वह सारा ज्ञान—सो दुखदायक अज्ञान जान—यह जान लो कि उसके पास जितना भी ज्ञान होगा, वह सब दुखदायक अज्ञान रूप ही होगा। अज्ञान का अर्थ हो गया मिथ्या ज्ञान। न जानना भी एक प्रकार का अज्ञान होता है, और दूसरा अज्ञान क्या है? जान तो रहा है, लेकिन अभिप्राय खोटा है।
या ही प्रतीति… इस प्रकार की सात तत्त्वों के विपरीत श्रद्धान, विपरीत विश्वास से सहित जो कुछ भी ज्ञान है (मतलब ऐसे मिथ्यादृष्टि जीव के मतिज्ञान, श्रुतिज्ञान और अवधिज्ञान को हम कहेंगे अज्ञान है, कुज्ञान है, हम ऐसा बोलेंगे)—तो ऐसे गलत विश्वास के साथ, मतलब तत्त्वों के विपरीत सिद्धांत से सहित जो कुछ भी ज्ञान है, वह दुख देने वाला है, उसे अज्ञान जानना चाहिए।
यहाँ तक चर्चा खत्म हो गई हमारी अब अग्रहीत मिथ्यादर्शन की। ऐसी जो धारणाएँ हैं, यह पूर्व के संस्कार से जीव में आती हैं, तो अग्रहीत मिथ्यादर्शन हुआ। ऐसे मिथ्यादर्शन प्रतीति, माने ऐसे गलत विश्वास से सहित उस जीव का जो कुछ भी ज्ञान है, वह दुख का देने वाला अज्ञान जानना चाहिए। अर्थात अग्रहीत मिथ्याज्ञान की परिभाषा हुई।
अग्रहीत मिथ्याज्ञान: अग्रहीत मिथ्यादर्शन से सहित जीव का जो भी ज्ञान है, वो अग्रहीत मिथ्याज्ञान कहलाता है। इस प्रकार इसमें एक अग्रहीत मिथ्यादर्शन पूरा हो गया, अग्रहीत मिथ्याज्ञान की चर्चा भी हो गई।
पंडित जी, ज्ञान तो ज्ञान है, अज्ञान रूप कैसे हो गया? ज्ञान मिथ्या ज्ञान कब कहलाएगा? जब मिथ्यात्व से सहित हो जाएगा। ज्ञान सम्यक् ज्ञान कब कहलाएगा? जब सम्यक् से सहित होगा। जानना तो वही है, लेकिन अभिप्राय दूषित है, ज्ञान भी दूषित है। अभिप्राय सही है, तो ज्ञान भी सही है। अभिप्राय के अनुसार ज्ञान का सच्चा-झूठापना होता है। ज्ञान तो वही है, ज्ञान थोड़ी बदलता है!
मिथ्यादृष्टि और सम्यक्दृष्टि अपने बच्चे को खिला रहे हैं। दोनों से पूछा जाए—”आप क्या कर रहे हैं?” “मैं अपने बच्चे को खिला रहा हूँ।” दोनों अपने बच्चे को खिला रहे हैं, लेकिन मिथ्यादृष्टि का ज्ञान झूठा ज्ञान है। क्यों? मिथ्यात्व सहित अभिप्राय—”मेरा बच्चा।” सम्यक्दृष्टि का ज्ञान सच्चा है। क्यों? मुझसे उत्पन्न हुआ है, इसलिए मेरा कहा जाता है, मेरा है थोड़ी! ये उसका ज्ञान सच्चा है।
इसलिए अगर मिथ्यात्व है, तो ज्ञान मिथ्या, चारित्र भी मिथ्या। सम्यक् है, तो ज्ञान सम्यक् और चारित्र भी सम्यक्, ऐसे बनाना चाहिए।
हम निर्जरा तत्त्व का सही सिद्धांत क्या मानें? निर्जरा उपकारी है, निर्जरा उपादेय है। निर्जरा कैसे होती है? तप के कारण होती है। तप कैसे होता है? इच्छाओं को रोकने से होता है। मैं क्या करूँ? अपनी आत्मशक्ति को जागृत करूँ और निर्जरा मेरे आत्मा के साथ लगे कर्मों की ज़्यादा से ज़्यादा कैसे होगी, मैं उनमें लगूँ।
हम बात तो बहुत करें, शास्त्र खूब पढ़ें और शास्त्र की लंबी-लंबी चर्चाएँ करें, उससे कल्याण नहीं होगा। तत्त्व का श्रद्धान तो जब माना जाएगा, जब जीव अपनी शक्ति के अनुसार कार्य करेगा।
एक छोटा सा उदाहरण – आचार्यश्री के पास सहारनपुर से एक पंडित जी पधारे। दोपहर डेढ़ बजे आचार्यश्री जब सामायिक से उठ रहे थे, मैं उनके दरवाजे के बाहर था, वो सज्जन भी दरवाजे के बाहर थे। हम दोनों आचार्यश्री की सामायिक पूरी होते ही अंदर गए। उन सज्जन ने आचार्यश्री से बड़ी हिम्मत से प्रश्न किया—”आचार्यश्री, आपने समयसार कितनी बार पढ़ा है?”
आचार्यश्री बोले—”क्या मतलब?” उन्होंने फिर बोला (उन्हें थोड़ा अपना घमंड था समयसार पढ़ने का), उन्होंने फिर बोला—”आचार्यश्री, मैंने समयसार 100 बार पढ़ा होगा कम से कम, आपने कितनी बार पढ़ा है?” आचार्यश्री मुस्कुराए और बोले—”भैया, तुमने 100 बार पढ़ा, बहुत अच्छा किया, लेकिन हम एक बात नहीं समझ पाए। हमने तो समयसार सिर्फ हमारे गुरु ने एक बार हमें पढ़ाया था, हमने एक बार पढ़ा, हमारे तो कपड़े उतर गए! तुमने 100 बार पढ़ा और तुम्हारे कपड़े नहीं उतरे, कैसे पढ़ा, हमें नहीं खबर।”
इसका मतलब निर्जरा तत्त्व का अभी सही श्रद्धान नहीं हुआ। अगर निर्जरा तत्त्व का श्रद्धान समयसार पढ़ने से सही हो गया था, तो व्रतों को धारण क्यों नहीं किया? जब तुम यह जानते हो कि निर्जरा आत्मा को कल्याण करने वाली है, तो निर्जरा होगी कैसे? तपों से होगी, आओ तपों को धारण करो ना! अरे, प्रतिमा लो ना! प्रतिमा से क्यों डर लगना? उपवास क्यों नहीं करते? शरीर से प्रेम है, इसलिए नहीं करते, ये बोलो ना सीधी बात!
इसलिए जो स्पष्ट लिखा है—अपनी शक्ति को खो जाता है। अगर आपको तप नहीं करना, आप अपनी शक्ति को खो रहे हैं, निर्जरा तत्त्व का आपको विपरीत श्रद्धान है, सही श्रद्धान ही नहीं है। और सही श्रद्धान है—मैं अधिक से अधिक निर्जरा का कारण कैसे बनूँ? निर्जरा अधिक करनी है, तो क्या करो? चारित्र को जीवन में धारण करो।
क्षायिक सम्यक्दृष्टि जीव हो और पूजा-पाठ खूब करे, तो भी समय निर्जरा नहीं, यदा-कदा निर्जरा होगी। और एक प्रतिमाधारी श्रावक है, महिला है, उसने एक प्रतिमा ले ली है, प्रति समय निर्जरा होगी। 24 घंटे एक प्रतिमाधारी सो रही है महिला, तो भी उसकी निर्जरा होगी। क्यों? चारित्र है—देशचारित्र। इस कारण तो निर्जरा का कारण है आगे बढ़ना, इच्छाओं को रोकना, व्रतों को धारण करना। अगर वैसा नहीं है ना, तो…
प्रश्न: दृष्टि सामने रस्सी पड़ी है और रस्सी को सर्प कहता है, वो देख रहा है कि हाँ, सर्प है… रस्सी है। मिथ्यादृष्टि रस्सी को रस्सी कहता है और सम्यक्दृष्टि रस्सी को सर्प कहता है, किसका ज्ञान सच्चा माना जाए?
समाधान: आपका प्रश्न ठीक नहीं। सम्यक्दृष्टि सामने रस्सी पड़ी होगी, तो सर्प क्यों कहेगा उसको? उसको सर्प दिख रहा है, नहीं… तो यह बोलिए ना, उसको रस्सी नहीं दिख रही, सर्प… प्रश्न यह बनाइए—सम्यक्दृष्टि अगर सर्प को रस्सी देखे और रस्सी कहे, और मिथ्यादृष्टि रस्सी को रस्सी कहे, तो मिथ्या ज्ञान, सम्यक् ज्ञान… किसका प्रश्न यह है ना आपका?
ठीक, देखो—सर्प है या रस्सी, यह अप्रयोजनभूत तत्त्व है, इसलिए इसको सही जानो या गलत जानो, इससे सम्यक् ज्ञान-मिथ्या ज्ञान का कोई संबंध नहीं। सम्यक्ज्ञानी उस सर्प को उस रस्सी को सर्प जानता है, तो भी सम्यक्ज्ञानी है। क्यों? प्रयोजनभूत तत्त्वों से सम्यक् ज्ञान का संबंध होता है, अप्रयोजनभूत से नहीं। इसलिए इस प्रश्न में चाहे कैसा ही जाने, सम्यक्दृष्टि का ज्ञान सम्यक् ज्ञान, मिथ्यादृष्टि का ज्ञान मिथ्या।
मिथ्यादर्शन और मिथ्याज्ञान की चर्चा हुई। अब अग्रहीत मिथ्याचारित्र क्या है? उसका स्वरूप देखते हैं।
छंद 8 – अगृहीत मिथ्याचारित्र का लक्षण
इन जुत विषयनि में जो प्रवृत्त, ताको जानो मिथ्याचरित्र।
यों मिथ्यात्वादि निसर्ग जेह, अब जे गृहीत सुनिये सु तेह ॥8 ॥
अन्वयार्थ (जो) जो (विषयनि में) पाँचों इन्द्रियों के विषयों में (इन जुत) अगृहीत-मिथ्यादर्शन और अगृहीत-मिथ्याज्ञान सहित (प्रवृत्त) प्रवृत्ति करता है (ताको) उसको (मिथ्याचारित्र) अगृहीत मिथ्या चारित्र (जानो) समझना चाहिए (यों) ऐसे (निसर्ग) अगृहीत (मिथ्यात्वादि) मिथ्यादर्शन-मिथ्याज्ञान और मिथ्याचारित्र “कहे गये हैं” (अब) अब (जेह) जो (गृहीत) गृहीत मिथ्या दर्शन-ज्ञान-चारित्र हैं (तेह) उनको (सुनिये) सुनो।
अर्थ- हमने अभी तक क्या पढ़ा? सात तत्त्वों का विपरीत श्रद्धान—यानी अग्रहीत मिथ्यादर्शन। और वैसे मिथ्यादर्शन से सहित उस मिथ्यादृष्टि जीव का जो ज्ञान है, वह अग्रहीत मिथ्याज्ञान है। अब आगे हम बढ़ते हैं—अग्रहीत मिथ्याचारित्र की ओर।
एक बार मैं फिर से बता दूँ कि अग्रहीत क्या है? जो पूर्वजन्म के संस्कारों से हमें मिला है। ‘अग्रहीत’ यानी जिसे इस भव में नया ग्रहण नहीं किया, बल्कि वह पूर्वजन्म के संस्कारों से मिला है। और ‘गृहीत’ माने जो इस भव में नया-नया ग्रहण किया गया है। पूर्वभव की श्रद्धा दूषित थी, वह अग्रहीत थी; और इस भव में यदि खोटे देव-शास्त्र-गुरु का सेवन किया, तो वह गृहीत है। इस तरह यह भेद है।
अब देखते हैं अग्रहीत मिथ्याचारित्र— “इन जुत विषयनी में जो प्रवृत्त…”
“इन जुत” यानी इनसे युक्त; किनसे? मिथ्या दर्शन और मिथ्या ज्ञान से युक्त। विषयों में यानी पंचेंद्रियों के विषयों में जो प्रवृत्ति है, जो आचरण होता है, आचरण को क्या कहते हैं? चारित्र। तो मिथ्या दर्शन और मिथ्या ज्ञान से सहित—मिथ्या दर्शन, मिथ्या ज्ञान से युक्त—जो प्रवृत्ति होती है, जो आचरण होता है, किसमें आचरण होता है? विषयों में, पाँच इंद्रियों में ही, पाँच इंद्रियों के सुख में ही उसकी प्रवृत्ति होती है, ताको जानो मिथ्या चारित्र—उसको मिथ्या चारित्र जानो। यानी मिथ्या चारित्र क्या वस्तु हुई? मिथ्या दर्शन और मिथ्या ज्ञान के साथ जो प्रवृत्ति हो रही है विषय-कषायों में, उसी का नाम मिथ्या चारित्र है।
“यों”—इस प्रकार, “जेह”—मिथ्यात्वादि निसर्ग—जो मिथ्यात्वादि निसर्ग (यानी बिना किसी के उपदेश के चले आ रहे हैं) उनका स्वरूप पूर्ण होता है। अब—अब इसके आगे, “जे गृहीत”—जो गृहीत है ना, मिथ्या दर्शन, मिथ्या ज्ञान, मिथ्या चारित्र—ये दो प्रकार के हैं—अगृहीत और दूसरे गृहीत।
अगृहीत किसको कहते हैं? कि जो कहीं से ग्रहण नहीं किया, अपने आप उसके अंदर मिथ्यात्व के उदय से वह चीज़ चली आ रही है। और गृहीत किसको कहते हैं? कि किसी के उपदेश से या किसी की संगति से, किसी के संसर्ग से वह चीज़ ग्रहण करने में आ गई, वह गृहीत कहलाते हैं।
तो अब जे गृहीत—अब जो गृहीत मिथ्या दर्शन, मिथ्या ज्ञान, मिथ्या चारित्र हैं, “सुनिए सुते”—उनको अब अच्छी तरह से सुन लो।
इनसे सहित—किनसे सहित? मिथ्यादर्शन और मिथ्याज्ञान से सहित। विषयों में—पंचेंद्रियों के विषयों में जो प्रवृत्ति है, जो आचरण है, अर्थात् मिथ्यादर्शन और मिथ्याज्ञान से सहित जो कुछ भी आचरण है, ताको माने उसको मिथ्याचारित्र जानो।
इसलिए कहा कि इन मिथ्यादर्शन और मिथ्याज्ञान से सहित पंचेंद्रियों के विषयों में जो भी प्रवृत्ति है, जो भी आचरण है, उसको मिथ्याचारित्र जानना चाहिए। अर्थात् यदि मिथ्यादर्शन और मिथ्याज्ञान है, तो उसका आचरण किसी भी रूप में हो, उसे हम मिथ्याचारित्र ही कहेंगे।
“यो मिथ्यात्वादी निसर्ग जे…”
यो यानी इस प्रकार मिथ्यात्वादि—मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान और मिथ्याचारित्र। निसर्ग यानी जो अग्रहीत थे, उनको कहा गया। इस प्रकार निसर्ग अर्थात् अग्रहीत मिथ्यादर्शन, ज्ञान और चारित्र का वर्णन हुआ। अब जो गृहीत मिथ्यादर्शन, ज्ञान, चारित्र हैं, उनको सुनिए।
पूर्वजन्म के संस्कार से जो मिला, उसकी चर्चा हो गई। अब इस जन्म में किन कारणों से मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान और मिथ्याचारित्र स्वीकार किए जा रहे हैं और बढ़ाए जा रहे हैं, अब उनकी चर्चा पंडित दौलतराम जी करेंगे।
इस प्रकार इन अग्रहीत मिथ्यादर्शन और मिथ्याज्ञान से सहित पंचेंद्रियों के विषयों में जो प्रवृत्ति है, जो आचरण है, उसको मिथ्याचारित्र जानना चाहिए। अर्थात् यदि मिथ्यादर्शन और मिथ्याज्ञान है, तो उसका आचरण किसी भी रूप में हो, उसे हम मिथ्याचारित्र ही कहेंगे।
इस प्रकार मिथ्यात्वादि निसर्ग (निसर्ग माने अग्रहीत, स्वभाव से होने वाले) जो मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान और मिथ्याचारित्र हैं, उनकी चर्चा हो गई। अब जो गृहीत मिथ्यादर्शन, ज्ञान, चारित्र हैं, उनको सुनो! अर्थात् छहढालाकार कह रहे हैं कि अब आगे मैं गृहीत मिथ्यादर्शन, ज्ञान और चारित्र का वर्णन अकरूँगा। आइए, अब आगे उसको भी अपन समझेंगे।
शंका: गृहीत और अग्रहीत में क्या अंतर है?
समाधान: गृहीत वह है जो इस भव में नया ग्रहण किया गया, और अग्रहीत वह है जो पूर्वजन्म के संस्कारों से आया है। यद्यपि दोनों मिथ्यात्व ही हैं—दोनों मिथ्यादर्शन हैं, दोनों मिथ्याज्ञान हैं, और दोनों मिथ्याचारित्र हैं।
परंतु जो एकेंद्रिय, बेइन्द्रिय, त्रीइन्द्रिय, चतुरेंद्रिय और असैनी पंचेंद्रिय जीव हैं, वे नया ग्रहण कर ही नहीं सकते, क्योंकि उनके मन ही नहीं होता। इसलिए उनके गृहीत मिथ्यादर्शन-ज्ञान नहीं होता, उनके केवल अग्रहीत ही होता है।
अब जो सैनी पंचेंद्रिय जीव हैं, उनके पूर्व का अग्रहीत तो है ही, और यदि वे नया गृहीत भी कर लें, तो उनके दोनों हो जाते हैं। इस तरह गृहीत और अग्रहीत में अंतर है।
इस प्रकार हमने अभी तक जो समझा, वह अग्रहीत मिथ्यादर्शन, ज्ञान और चारित्र की बात थी, जो पूरी हो गई। अब क्या शुरू होगा? अब शुरू होगा—गृहीत मिथ्यादर्शन, ज्ञान और चारित्र। पूर्वभव से हम जो लाए, उसके लिए हम असहाय हैं, उसमें हम कुछ नहीं कर सकते; लेकिन कम से कम अब आगे हम कोई नया मिथ्यादर्शन, ज्ञान और चारित्र ग्रहण न करें, उनसे तो बचें!
छहढाला पहली ढाल छंद 1 व 2 | छंद 3 व 4 | छंद 5 व 6 | छंद 7 व 8 | छंद 9 व 10 | छंद 11 व 12 | छंद 13 व 14 | छंद 15 व 16 |
दूसरी ढाल छंद 1 व 2 | छंद 3 व 4 | छंद 5 व 6 |