मेरी भावना – छंद 5: व्याख्या और अर्थ
मैत्रीभाव जगत में मेरा सब जीवों से नित्य रहे, दीन-दुखी जीवों पर मेरे उरसे करुणा स्रोत बहे ।
दुर्जन-क्रूर-कुमार्ग रतों पर क्षोभ नहीं मुझको आवे, साम्यभाव रखूं मैं उन पर ऐसी परिणति हो जावे ॥5॥
आत्मा को सुंदर बनाने वाली चार श्रेष्ठ भावनाएँ
यदि हम अपने आत्म-परिणामों को पवित्र और जीवन को सुंदर बनाना चाहते हैं, तो भगवान श्रीमद् उमास्वामी देव ने तत्त्वार्थसूत्र में तथा आचार्य अमितगति देव ने सामायिक पाठ की भावना द्वात्रिंशिका में चार महान भावनाओं का उपदेश दिया है। इन्हीं दिव्य भावनाओं को पंडित जी ने अत्यंत सरल शब्दों में “मेरी भावना” में प्रस्तुत किया है।
मैत्रीभाव – समस्त जीवों के प्रति मित्रता
कवि सबसे पहले भगवान से प्रार्थना करते हैं—
“मैत्रीभाव जगत में मेरा सब जीवों से नित्य रहे।”
सामान्यतः हम “मित्र” शब्द का अर्थ अपने परिचितों, रिश्तेदारों या साथ रहने वाले लोगों से लगाते हैं। परंतु यहां मैत्री का अर्थ इससे कहीं अधिक व्यापक है।
यहां मैत्री का अर्थ है—संसार के प्रत्येक जीव के प्रति ऐसा शुभभाव रखना कि हमारे मन, वचन और काय से किसी भी जीव को दुःख न पहुँचे। यह मित्रता किसी परिचय, जाति, धर्म, देश, भाषा या संबंध पर आधारित नहीं है। यह केवल एक सत्य पर आधारित है—सभी जीव आत्मा हैं और प्रत्येक आत्मा परमात्मा बनने की क्षमता रखती है।
अर्थात् हे प्रभु! तीनों लोकों में जितने भी जीव हैं, उन सभी के प्रति मेरा मित्रता का भाव सदा बना रहे। यह मित्रता किसी स्वार्थ, लाभ या संबंध पर आधारित नहीं है। इसका आधार है जीवत्व।
- जिस प्रकार मुझमें आत्मा है, उसी प्रकार प्रत्येक जीव में आत्मा है।
- जिस प्रकार मुझमें जानने और देखने की शक्ति है, उसी प्रकार प्रत्येक जीव में भी वही शक्ति विद्यमान है।
- जिस प्रकार मैं भगवान बनने की क्षमता रखता हूँ, उसी प्रकार संसार की प्रत्येक आत्मा भी परमात्मा बनने की सामर्थ्य रखती है।
इसीलिए वास्तव में हमारे बीच कोई मूलभूत भेद नहीं है। शरीर, नाम, रूप, जाति और परिस्थितियाँ अलग हो सकती हैं, लेकिन आत्मा का स्वभाव एक ही है।
संपूर्ण सृष्टि – हमारा मित्र परिवार
जैन दर्शन के अनुसार इस संसार में अनंतानंत जीव हैं।
एकेन्द्रिय निगोद से लेकर पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पति कायिक जीवों तक, दो इन्द्रिय, तीन इन्द्रिय, चार इन्द्रिय, पंचेन्द्रिय, संज्ञी और असंज्ञी—हर जीव अपने अस्तित्व में समान रूप से महत्त्वपूर्ण है। इसलिए साधक केवल मनुष्यों से ही नहीं, बल्कि प्रत्येक जीव के प्रति मित्रता का भाव विकसित करता है।
यही संसार की सबसे विशाल और सबसे सशक्त मित्रता है—ऐसी मित्रता जिसमें कोई भी जीव छूटता नहीं।
मैत्रीभाव का वास्तविक प्रभाव
जब हमारे भीतर सभी जीवों के प्रति मित्रता का भाव विकसित होता है, तब हमारे परिणाम स्वतः बदलने लगते हैं।
- किसी जीव को कष्ट पहुँचाने का भाव नहीं आता।
- हिंसा, द्वेष और प्रतिशोध की प्रवृत्ति समाप्त होने लगती है।
- प्रत्येक जीव के कल्याण की भावना जागृत होती है।
- दूसरों की उन्नति देखकर प्रसन्नता होती है।
- प्रत्येक प्राणी के जीवन, सुरक्षा और विकास के विषय में शुभ चिंतन उत्पन्न होता है।
मित्र कभी अपने मित्र का अहित नहीं चाहता। जब समस्त संसार हमारा मित्र बन जाता है, तब हमारे मन में किसी के प्रति बुरे परिणाम उत्पन्न ही नहीं होते।
मैत्री – आध्यात्मिक साधना का प्रथम चरण
मैत्रीभाव केवल सामाजिक सद्भाव का संदेश नहीं देता, बल्कि यह आत्मा की शुद्धि का प्रथम चरण है। जब हम सभी जीवों को अपने समान समझने लगते हैं, तब राग-द्वेष स्वतः क्षीण होने लगते हैं। अहिंसा सहज बन जाती है और करुणा, क्षमा तथा समता जैसे दिव्य गुण हमारे जीवन में विकसित होने लगते हैं।
इसीलिए साधक प्रतिदिन भगवान से यही प्रार्थना करता है—
हे प्रभु! तीनों लोक के समस्त जीवों के प्रति मेरा मैत्रीभाव सदैव बना रहे। मैं प्रत्येक आत्मा में अपने समान ही शुद्ध आत्मस्वरूप का दर्शन कर सकूँ और किसी भी जीव के प्रति मेरे मन में कभी भी अहित का भाव उत्पन्न न हो।
यही मैत्रीभाव आत्मा को विशाल बनाता है, संसार को परिवार बना देता है और साधक को मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर करता है।
दीन-दुखी जीवों के प्रति करुणा का झरना बहे
मैत्रीभाव के बाद कविवर दूसरी महान भावना की प्रार्थना करते हैं—
“दीन दुखी जीवों पर मेरे उर से करुणा स्रोत बहे।”
यहाँ उर का अर्थ है हृदय, और करुणा स्रोत का अर्थ है करुणा का निरंतर बहने वाला झरना।
हे प्रभु! मेरे हृदय में ऐसी करुणा जागृत हो कि वह केवल एक क्षणिक भावना न रहे, बल्कि निरंतर प्रवाहित होने वाला करुणा का स्रोत बन जाए।
करुणा किनके प्रति?
यह करुणा उन सभी जीवों के प्रति हो—
- जो दीन और असहाय हैं।
- जो दुःख और कष्टों से घिरे हुए हैं।
- जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं।
- जो दिव्यांग या विकलांग हैं।
- जो रोग, बीमारी या विपत्तियों से संघर्ष कर रहे हैं।
- जिनका जीवन अनेक समस्याओं से घिरा हुआ है।
- जो दूसरों पर आश्रित होकर जीवन व्यतीत कर रहे हैं।
- जो भीख माँगकर अपना जीवन-निर्वाह करने को विवश हैं।
- जो किसी भी प्रकार के मानसिक, शारीरिक या सामाजिक संकट से पीड़ित हैं।
ऐसे प्रत्येक जीव के प्रति मेरे हृदय में करुणा का झरना अविरल बहता रहे।
सच्ची करुणा क्या है?
करुणा केवल किसी को देखकर दया महसूस करने का नाम नहीं है। सच्ची करुणा वह है जो हमें उस जीव के दुःख को कम करने के लिए प्रेरित करे। जब हृदय में करुणा जागती है, तब हमारे भीतर उसकी रक्षा करने, उसका सहारा बनने और उसके जीवन को बेहतर बनाने की भावना उत्पन्न होती है। हम उसे केवल एक व्यक्ति, एक शरीर या एक परिस्थिति के रूप में नहीं देखते, बल्कि एक जीव के रूप में देखते हैं—ऐसी आत्मा के रूप में, जिसमें अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत सुख और अनंत वीर्य प्राप्त करने की क्षमता विद्यमान है।
दुःख ईश्वर की देन नहीं, कर्मों का परिणाम है
जैन दर्शन हमें सिखाता है कि संसार में कोई भी जीव बिना कारण दुःख नहीं भोगता। आज कोई जीव गरीबी, बीमारी, असहायता या विपत्तियों में जीवन जी रहा है, तो यह किसी ईश्वर द्वारा दिया गया दंड नहीं है। यह उसके अपने पूर्वकृत कर्मों का उदय है। किन्तु यही सम्पूर्ण सत्य नहीं है। यदि वही जीव वर्तमान में शुभ विचारों, शुभ आचरण, संयम और पुण्य के मार्ग पर चलता है, तो वह अपने पापकर्मों का क्षय कर सकता है और अपने जीवन की दिशा बदल सकता है। इसीलिए हमें किसी पीड़ित व्यक्ति को तुच्छ समझने के स्थान पर उसके भीतर छिपी अनंत संभावनाओं को देखना चाहिए।
करुणा निष्क्रिय नहीं, सक्रिय बनाती है
सच्ची करुणा केवल सहानुभूति तक सीमित नहीं रहती, बल्कि सेवा का रूप धारण कर लेती है।
जब करुणा बढ़ती है, तब हमारे मन में यह विचार आता है—
- मैं इस जीव की सहायता कैसे करूँ?
- उसके दुःख को कैसे कम करूँ?
- उसके जीवन में आशा और उत्साह कैसे जगाऊँ?
- उसके कल्याण का साधन कैसे बनूँ?
यही करुणा धर्म को व्यवहार में उतारती है।
धर्म की वास्तविक परीक्षा
पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने करुणा का अत्यंत मार्मिक स्वरूप बताते हुए कहा है—
“अपनी पीड़ा में आँखों से आँसू आना आर्त ध्यान है, लेकिन दूसरों की पीड़ा देखकर आँखों में आँसू आ जाना धर्म ध्यान है।”
वास्तव में, दूसरे का दुःख हमारी करुणा की परीक्षा लेता है। जब किसी पीड़ित की पुकार सुनकर हमारा हृदय द्रवित होता है, जब किसी असहाय की वेदना देखकर हमारी संवेदनाएँ जागृत होती हैं, तभी पता चलता है कि हमारे भीतर धर्म कितना जीवित है। दूसरों की पीड़ा हमें यह अवसर देती है कि हम अपने भीतर छिपी करुणा, संवेदना और मानवता को पहचान सकें।
करुणा ही धर्म का हृदय है
मैत्री हमें सबके प्रति शुभभाव रखना सिखाती है, जबकि करुणा हमें दुःखी और पीड़ित जीवों के दुःख को दूर करने के लिए प्रेरित करती है। जब हृदय में करुणा का झरना बहने लगता है, तब सेवा सहज बन जाती है, अहिंसा स्वाभाविक हो जाती है और धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित न रहकर हमारे व्यवहार का हिस्सा बन जाता है। यही भावना साधक को आत्मकल्याण के साथ-साथ परकल्याण की दिशा में भी अग्रसर करती है।
“दुर्जन क्रूर कुमार्ग रतों पर क्षोभ नहीं मुझको आवे। साम्यभाव रखूँ मैं उन पर, ऐसी परिणति हो जावे॥”
करुणा भावना के पश्चात् कविवर तीसरी महान भावना की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करते हैं—
यहाँ दुर्जन से आशय उन लोगों से है जो बुरे आचरण में लिप्त हैं। कुमार्ग रत अर्थात् वे जो अधर्म, हिंसा, छल, कपट, अंधविश्वास और पापकर्मों के मार्ग पर चल रहे हैं। ऐसे लोग स्वयं तो भ्रमित हैं ही, अनेक निर्दोष जीवों को भी गलत रास्ते पर ले जाते हैं। कहीं हिंसा के नाम पर बलि दी जाती है, कहीं तंत्र-मंत्र के नाम पर लोगों को भयभीत और ठगा जाता है, तो कहीं लोभ और स्वार्थ के कारण धर्म का स्वरूप विकृत कर दिया जाता है।
ऐसे दृश्य देखकर साधक भगवान से प्रार्थना करता है—
हे प्रभु! मुझे ऐसे मार्गों के प्रति न आकर्षण हो, न उनमें जाने की इच्छा हो और न ही उनके प्रति कोई मोह उत्पन्न हो।
दुर्जनों के प्रति हमारा भाव कैसा हो?
स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठता है कि जो व्यक्ति गलत मार्ग पर चल रहा है, उसके प्रति हमारा व्यवहार कैसा होना चाहिए?
कविवर इसका अत्यंत संतुलित उत्तर देते हैं—
“साम्यभाव रखूँ मैं उन पर।”
अर्थात् उनके प्रति न राग हो, न द्वेष।
न उनसे मोह हो और न उनका भय।
न उनके प्रति आकर्षण हो और न प्रतिशोध।
यही है माध्यस्थ भाव—अर्थात् समता और उपेक्षा का भाव।
माध्यस्थता क्यों आवश्यक है?
कुछ लोग ऐसे होते हैं जो उचित समझाने पर भी सत्य को स्वीकार नहीं करते। उलटे क्रोधित हो जाते हैं, विरोध करने लगते हैं और अपने मिथ्या मार्ग पर और अधिक दृढ़ हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में उनसे विवाद करना, उनके प्रति घृणा रखना या उन्हें परास्त करने का अहंकार पालना—दोनों ही हमारे लिए हानिकारक हैं।
- यदि हम उनके प्रति अत्यधिक मोह रखें, तो संभव है हम स्वयं उनके प्रभाव में आ जाएँ।
- यदि हम उनके प्रति द्वेष रखें, तो हमारे भीतर क्रोध, घृणा और प्रतिशोध की कषायाएँ प्रबल होने लगेंगी।
दोनों ही स्थितियों में हानि हमारी आत्मा की होती है। इसीलिए जैन दर्शन हमें सिखाता है कि जहाँ सुधार की संभावना न हो, वहाँ अपनी आत्मा की शांति की रक्षा करते हुए माध्यस्थ भाव रखना ही श्रेष्ठ है।
उपेक्षा का अर्थ उदासीनता नहीं है
माध्यस्थता का अर्थ यह नहीं कि हम अधर्म का समर्थन करें। इसका अर्थ है—हम अपनी आत्मा को राग-द्वेष से बचाएँ। हम न तो उनके पापकर्मों में सहभागी बनें और न ही उनके प्रति घृणा और प्रतिशोध की अग्नि अपने भीतर जलाएँ। साधक का लक्ष्य दूसरों को हराना नहीं, बल्कि स्वयं को बचाना है।
अपनी आत्मा की रक्षा ही सबसे बड़ा धर्म है
जो व्यक्ति कुमार्ग पर चलता है, उसके संपर्क में आने से अनेक बार हमारे भीतर भी कषायाएँ भड़क उठती हैं। क्रोध का उत्तर क्रोध से देने पर शत्रुता बढ़ती है और शत्रुता का परिणाम अंततः दुःख ही होता है। इसलिए बुद्धिमानी इसी में है कि हम ऐसे वातावरण से यथासंभव दूरी बनाए रखें।
अर्थात्—
- न उनके मार्ग को अपनाएँ।
- न उनके पापकर्मों से प्रभावित हों।
- न उनके प्रति द्वेष पालें।
- न अपने मन की शांति को नष्ट करें।
यही आत्मरक्षा का आध्यात्मिक मार्ग है।
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