चौथी ढाल छंद 2 – सम्यग्ज्ञान के भेद देश प्रत्यक्ष के भेद व लक्षण
तास भेद दो हैं परोक्ष परतछि तिन माहीं। मति श्रुत दोय परोक्ष अक्ष मनतै उपजाहीं ॥
अवधिज्ञान मनपर्जय, दो हैं देशप्रतच्छा । द्रव्यक्षेत्रपरिमाण लिये, जानै जिय स्वच्छा ॥2॥
अन्वयार्थ (तास) उस सम्यग्ज्ञान के (परोक्ष) परोक्ष और (परतछि) प्रत्यक्ष (दो) ये दो (भेद हैं) भेद हैं (तिन माहीं) उनमें (मतिश्रुत) मतिज्ञान और श्रुतज्ञान (दोय) ये दोनों (परोक्ष) परोक्षज्ञान हैं। क्योंकि ये (अक्ष मनतें) इन्द्रिय और मन से (उपजाहीं) उत्पन्न होते हैं। (अवधिज्ञान) अवधिज्ञान और (मनपर्जय) मनःपर्ययज्ञान (दो) ये दोनों ज्ञान (देश प्रतच्छा) देश प्रत्यक्ष (हैं) हैं। क्योंकि (जिय) जीव इनसे (द्रव्यक्षेत्र परिमाण) द्रव्य और क्षेत्र की मर्यादा (लिये) लिये हुये (स्वच्छा) स्पष्ट (जानै) जानता है।
अर्थ- यह छहढाला है। बड़े-बड़े विद्वानों ने इस छहढाला को छोटा समयसार कहा है। यह तो ह्रदयंम करना है और इसका हर छंद मुंह से जबानी याद होना चाहिए। सोते समय, कभी भी इसको बराबर पाठ करो, हमेशा मन में चिंतन रहना चाहिए इसका। महान छोटा सा ग्रंथ है, लेकिन है बड़ा महान। आइए अर्थ समझते हैं।
अब सम्यक् ज्ञान के भेद बता रहे हैं। तास भेद दो हैं—सबसे पहले तो भेद करोगे तो फिर दो ही भेद होंगे। किसके दो भेद होंगे? सम्यक् ज्ञान के। और वो दो भेद कौन-से हैं? तो परोक्ष और प्रत्यक्ष। (‘परतछ’ लिखा है न, वो ढूँढारी भाषा है पुरानी। वैसे शब्द जो हैं मूल में, परोक्ष और प्रत्यक्ष हैं।)
और तिन माहीं मति श्रुत दोय परोक्ष—अब उनमें (परोक्ष और प्रत्यक्ष जो दो भेद किए न) उन दो भेदों में मति और श्रुत ये दो जो हैं, परोक्ष हैं। परोक्ष क्यों हैं? तो अछ मन ते उपजाहीं—क्योंकि इंद्रिय और मन के सहारे से उत्पन्न होते हैं, उपजते हैं।
और प्रत्यक्ष किसको कहते हैं? जो आत्मा से उत्पन्न होता है। और यह जो है, किसी दूसरे के आलंबन से उत्पन्न होते हैं, इसलिए किसी के सहारे से उत्पन्न होने के कारण इनको परोक्ष कहा है; और जो बिना किसी के सहारे उत्पन्न हो जाए, वह प्रत्यक्ष है।
तो मति और श्रुत ज्ञान परोक्ष हैं। ‘आद्ये परोक्षम्’—तत्त्वार्थसूत्र में आता है।
और अवधि, मनःपर्यय और केवल ज्ञान—ये प्रत्यक्ष ज्ञान हैं। अब प्रत्यक्ष के दो भेद कर रहे हैं—देश प्रत्यक्ष और सकल प्रत्यक्ष।
तो देश प्रत्यक्ष दो हैं—अवधिज्ञान और मनःपर्यय ज्ञान। ये दो हैं देश प्रतच्छा (यह ‘प्रतच्छा’ कौन-सी भाषा है? वही ढूँढारी भाषा)।
क्योंकि यह द्रव्य क्षेत्र परिमाण लिए—परिमाण यानी सीमा, एक माप। और केवल ज्ञान जो होता है, वह प्रत्यक्ष तो है, लेकिन सीमा नहीं है उसमें, असीम है। इसलिए यह जो दो ज्ञान हैं, सीमित होने के कारण देश प्रत्यक्ष। देश का अर्थ क्या होता है? अपूर्ण। (यहाँ ‘देश’ शब्द—देशव्रत, देशसंयम, यानी जो सकल संयम नहीं है उसको देशसंयम कहा। इसी प्रकार सकल प्रत्यक्ष जो नहीं है, वह देश प्रत्यक्ष। देश का अर्थ होता है अपूर्ण।) अवधि ज्ञान और मन पर्यय ज्ञान ये दो देश प्रत्यक्ष ज्ञान हैं। क्यों? क्योंकि ये पूरा नहीं जानते, अधूरा जानते हैं। जानते आत्मा से हैं। क्योंकि ये द्रव्य और क्षेत्र की मर्यादा लिए हुए, स्पष्ट अपनी आत्मा से जानते हैं। अवधि ज्ञान आत्मा से तो जानते हैं और स्पष्ट भी जानते हैं, लेकिन इनका ज्ञान अनंत नहीं है। उसमें द्रव्य और क्षेत्र की मर्यादा है।
तो द्रव्य और क्षेत्र का परिमाण लिए जिय (जिय माने जीव) इन दो ज्ञानों के द्वारा सुच्छा जाने—स्वच्छ रूप से जान लेता है, स्पष्ट जानता है। स्पष्ट जानता है इसलिए प्रत्यक्ष, लेकिन अपूर्ण जानता है इसलिए देश प्रत्यक्ष।
एक बार फिर देखें। उस सम्यग्ज्ञान के दो भेद हैं—परोक्ष ज्ञान और प्रत्यक्ष ज्ञान। उनमें मतिज्ञान और श्रुतज्ञान ये दो तो परोक्ष ज्ञान हैं क्योंकि इंद्रिय और मन से उत्पन्न होते हैं। अवधि ज्ञान और मन पर्यय ज्ञान ये दो ज्ञान देश प्रत्यक्ष हैं, क्योंकि ये द्रव्य और क्षेत्र की मर्यादा लिए हुए आत्मा से स्पष्ट जानते हैं। इस तरह चार ज्ञान की चर्चा इस छंद में हुई।
प्रश्न : सम्यग्ज्ञान कितने प्रकार का होता है?
उत्तर : सम्यग्ज्ञान के दो भेद बताए—एक परोक्ष ज्ञान और प्रत्यक्ष ज्ञान। वैसे तो सम्यग्ज्ञान के पाँच भेद हैं—मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनपर्ययज्ञान और केवलज्ञान।
इनमें जो अभी सामने आपने पढ़ा, मतिज्ञान और श्रुतज्ञान ये तो परोक्ष ज्ञान हैं। परोक्ष ज्ञान का मतलब, जो इंद्रिय और मन की सहायता से होते हों। थोड़ा समझ लेते हैं। आपने जाना, यह पंखा है। यह आँख से जाना, जाना। यह क्या हुआ? मतिज्ञान हुआ। इंद्रिय की सहायता, इंद्रिय और मन की सहायता से जो ज्ञान हो। श्रुतज्ञान, जो मतिज्ञान से जाने को विशेष जाने। जैसे, यह पंखा किस कंपनी का है? कितने रुपए का होगा? कितना पुराना है? यह आवाज क्यों कर रहा है? इसमें गड़बड़ी क्यों हुई है? यह सब जानता है, यह काम श्रुतज्ञान का। दो ज्ञान।
अब तीन ज्ञान और बचे—अवधि, मनपर्यय और केवलज्ञान। आगे स्वयं बताया इन्होंने, जो द्रव्य-क्षेत्र और भाव की मर्यादा लिए हुए, चार चीजों की बात है—द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव की मर्यादा लिए हुए जानता है, जो सिर्फ रूपी पदार्थों को जानता है, वो अवधि ज्ञान है। अवधि ज्ञान की परिभाषा—जो बिना इंद्रिय-मन की सहायता के आत्मा के द्वारा द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव की मर्यादा सहित रूपी पदार्थों को जाने, उसका नाम अवधि ज्ञान है। और मन पर्यय ज्ञान—जो दूसरे के मन में चिंतित, यह क्या सोच रहा है, उसको जाने और फिर उस चिंतित पदार्थ को भी जाने, उसे कहते हैं मन पर्यय ज्ञान। और जो समस्त द्रव्यों और उनकी समस्त गुण और पर्यायों को एक साथ जानता है, उसे कहते हैं केवलज्ञान।
तो ज्ञान के दो भेद—परोक्ष, इंद्रिय-मन से होने वाला, प्रत्यक्ष, आत्मा से होने वाले। दो ज्ञान परोक्ष हैं और तीन ज्ञान प्रत्यक्ष हैं। अवधि-मनपर्यय देश प्रत्यक्ष हैं, केवलज्ञान सकल प्रत्यक्ष है।
प्रश्न: क्या इन पाँच ज्ञानों को किसी और तरीके से भी समझ सकते हैं क्या?
उत्तर: हाँ, थोड़ा समझा जा सकता है। जैसे मतिज्ञान और श्रुतज्ञान, जो अधूरा भी जाने और अस्पष्ट भी जाने। अवधि और मन पर्यय ज्ञान, जो स्पष्ट तो जाने पर अधूरा जाने। केवलज्ञान, जो स्पष्ट भी जाने और पूरा भी जाने।
प्रश्न: अवधि ज्ञान और मनःपर्याय ज्ञान के संबंध में हम द्रव्य और क्षेत्र से क्या समझें?
उत्तर: आपका प्रश्न बिल्कुल ठीक है। अर्थात कोई अवधि ज्ञान स्थूल पदार्थ को जानता है, कोई उससे सूक्ष्म को जानता है, कोई उससे भी सूक्ष्म को जानता है, कोई उससे भी सूक्ष्म को जानता है। यह हुआ पदार्थ द्रव्य की बात।
अब आइए क्षेत्र की बात। कोई अवधि ज्ञान एक कोस की बात, कोई दो कोस, कोई चार कोस, कोई 10 कोस, कोई एक योजन, कोई और बड़ा, इतनी दूर तक जानता है। यह हुई क्षेत्र की बात।
एक होता है काल या भव की बात। कोई एक भव की बात जानता है, कोई दो भव की, कोई संख्यात भव की, कोई असंख्यात भव की बात जानता है। और भिन्न-भिन्न परिणामों को जानने के हिसाब से इन अवधि-मनपर्यय ज्ञान में द्रव्य, क्षेत्र, भाव, द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव की अपेक्षा अंतर पाया जाता है।
जितना बड़ा या जितना महान अवधि ज्ञान होगा, उसका द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव उतना ज्यादा होगा। इसी तरह हमें मनपर्यय ज्ञान में भी समझना चाहिए।
सम्यग्ज्ञान के पाँच भेदों में से चार की चर्चा हो गई—मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनपर्ययज्ञान। जो इन्द्रिय मन की सहायता से हुआ वो मतिज्ञान, जो मतिज्ञान को विशेष जानने वाला श्रुतज्ञान, द्रव्य क्षेत्र काल भाव की मर्यादा से बिना इन्द्रिय मन के आत्मा से जानने वाला, लेकिन द्रव्य क्षेत्र काल भाव की मर्यादा सहित जाने सो अवधिज्ञान, और दूसरे के मन में चिंतित पदार्थ को जो जानता है वह मनपर्यय ज्ञान है।
पंचम काल में देशावधि ज्ञान हो सकता है, कदाचित् मुनियों को। और विभंग ज्ञान कभी किसी को हो जाए तो हो जाए। नहीं, ये तो रूपी को ही जानने वाले हैं। अरूपी को केवल ज्ञान जानता है, और श्रुत ज्ञान परोक्ष रूप से जानता है। बाकी कोई ज्ञान अरूपी को ग्रहण नहीं करते।
अब बात रह गई केवलज्ञान की, तो अगली चार पंक्तियों में अब केवलज्ञान के बारे में समझते हैं।
छंद 3 – सकल प्रत्यक्ष और ज्ञान का महत्त्व
सकल द्रव्यके गुन अनन्त परजाय अनन्ता । जानै एकै काल प्रगट के वलि भगवन्ता ॥
ज्ञान समान न आन जगतमें सुखको कारन । इहि परमामृत जन्म जरा-मृत-रोग निवारन ॥3 ॥
अन्वयार्थ-जिसके द्वारा (केवलि भगवन्ता) केवली भगवान् (सकल द्रव्य के) छहों द्रव्यों के (अनन्ता) सीमा से रहित (गुन) गुणों को और (अनंता) अनन्त (परजाय) पर्यायों को (एकै काल) एक साथ (प्रगट) स्पष्ट (जानै) जानते हैं। वह (सकल) सकलप्रत्यक्ष या केवलज्ञान कहलाता है। (जगतमें) इस संसार में (ज्ञान समान) सम्यग्ज्ञान के समान (आन) दूसरा कोई पदार्थ (सुख को) सुख का (कारन) कारण (न) नहीं है। (इहि) यह सम्यग्ज्ञान ही (जन्म जरा मृत रोग-निवारन) जन्म, जरा और मृत्यु रूपी रोगों को दूर करने के लिये (परमामृत) उत्कृष्ट अमृत के समान है।
अर्थ- सकल द्रव्य के गुण अनंत हैं। सकल द्रव्य, द्रव्य कितने? छह—जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल। जितने भी जीव हैं, जितने भी पुद्गल हैं—धर्म, अधर्म तो एक-एक हैं ही, आकाश भी एक है और काल द्रव्य असंख्यात हैं। पर्याय अनंता—और पर्यायें भी अनंत हैं। पर्यायें तो तीनों काल से संबंध रखने वाली हैं—भूतकाल की पर्यायें, वर्तमान की, और अनागत (भविष्यत्) की पर्यायें अनंत हैं।
तो केवली भगवंता—केवली भगवान जो होते हैं, वे एकै काल—एक समय में प्रगट जाने—उन सबको प्रकट रूप से जान लेते हैं, स्पष्ट जानते हैं। समस्त द्रव्यों के जो अनंत गुण हैं और जो उनकी अनंत पर्यायें हैं, उन्हें जानते हैं एक ही काल—एक ही काल में, मतलब एक साथ। आगे-पीछे नहीं, एक साथ जानते हैं। प्रगट माने स्पष्ट रूप से जानते हैं, कौन? केवली भगवान।
क्या अद्भुत ज्ञान है केवल ज्ञान! “केवल णाण सहावो सोहं इति चिंतये णाणी”—नियमसार ग्रंथ में एक पंक्ति आती है, आचार्य कुंदकुंद स्वामी ने बताई है। सामायिक के समय ज्ञानी जीव ऐसा चिंतन करते हैं कि ‘केवल ज्ञान स्वभावो’—मैं केवल ज्ञान स्वभाव वाला हूँ। यह तो ज्ञानावरण के क्षयोपशम से यह विभाव ज्ञान मेरे में परिणत हो रहा है। वास्तव में ज्ञानावरण का अभाव हो जाए, क्षय हो जाए, तो फिर केवल ज्ञान मेरा वैभव है।
तो उस केवल ज्ञान से एक ही समय में वह सब कुछ जान लेते हैं—तीनों लोक, तीनों काल के सब द्रव्य, सब द्रव्यों के सब गुण, और सब गुणों की सब पर्यायें। केवल ज्ञान का वर्णन विस्तार से ‘प्रवचनसार’ के पहले अध्याय में आता है। उस वर्णन को अगर सुन लें…
केवली भगवान अगर समझ में आ जाए कि क्या स्वरूप है उनका, तो फिर एकदम श्रद्धा निर्मल हो जाती है—कि अपन जिनको भगवान मान रहे हैं, वे इतने अपार ज्ञान के भंडार हैं, केवल ज्ञानी हैं।
तो एक ही समय में वह सब जान लेते हैं, ऐसे केवली भगवान होते हैं। और ज्ञान समान—अब यह सकल प्रत्यक्ष की बात हो गई।
पांच भेद हो गए न ज्ञान के? पहले तो दो भेद किए थे—परोक्ष और प्रत्यक्ष। फिर परोक्ष में दो—मति और श्रुत ज्ञान थे। प्रत्यक्ष में दो भेद किए—देश प्रत्यक्ष और सकल प्रत्यक्ष। देश प्रत्यक्ष में अवधिज्ञान और मनःपर्यय ज्ञान लिया। और सकल प्रत्यक्ष में केवल ज्ञान लिया। यह ज्ञान के सारे भेद हो गए।
और फिर इसके आगे दौलतराम जी बहुत सुंदर बात कह रहे हैं कि जगत में ज्ञान समान—इस संसार में, इस जगत में, इस लोक में, इस विश्व में ज्ञान के समान सुख को कारण—सुख का कारण आन न—अन्य नहीं है। ‘आन’ का अर्थ क्या है? अन्य।
अब ‘आन’ शब्द एक और जगह आता है आपको याद हो यदि… आन शब्द—इसमें आप जब विनती/भक्ति पढ़ते हैं न भगवान के सामने—“तुम ना पिछानो आन मानो”। ‘आन मानो’ का मतलब—अन्य को माना मैंने। आन शब्द का अर्थ अन्य।
तो ज्ञान के समान जगत में और कोई सुख का कारण नहीं है। ज्ञान समान न आन… आन माने अन्य। ज्ञान के समान अन्य नहीं है। क्या? जगत में, संसार में, सुख को कारण, सुख का कारण। सुख का मुख्य कारण क्या है? सम्यग्ज्ञान।
इह परमामृत—वास्तव में देवलोक जो अमृत पीते हैं, वह तो साधारण अमृत है; लेकिन यह जो जिनवाणी का ज्ञान है, वह परम अमृत है, श्रेष्ठ अमृत है, उत्कृष्ट अमृत है। क्यों? क्योंकि साधारण अमृत पीने से तो क्षुधा का निवारण होता है, लेकिन इस अमृत को पीने से जन्म जरा मृत रोग निवारण—जन्म, जरा और मृत्यु रूपी रोगों का निवारण हो जाता है।
इसलिए हमें सम्यग्ज्ञान की आराधना करनी चाहिए।
प्रश्न: द्रव्य-गुण-पर्याय को एक बार फिर समझा दीजिए।
उत्तर: द्रव्य कितने हैं? छह हैं—जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश, काल। जीव कितने हैं? अनंतानंत हैं। पुद्गल जीव से भी अनंत गुणे हैं। धर्म द्रव्य एक है, अधर्म द्रव्य एक है, आकाश द्रव्य एक है, काल द्रव्य असंख्यात हैं।
यह हुए द्रव्य। द्रव्य किसे कहते हैं? जिसमें निरंतर नई पर्याय की उत्पत्ति और पुरानी पर्याय का नाश होते हुए भी जो हमेशा स्वयं कभी नष्ट नहीं होता, बना ही रहता है। तत्त्वार्थ सूत्र में आपने पढ़ा था ना—“उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य-युक्तं सत्, सत् द्रव्य-लक्षणम्”।
जितने पदार्थ हैं, वे सब द्रव्य हैं। और प्रत्येक द्रव्य में गुण भी होते हैं, और द्रव्य की और गुण की पर्यायें भी होती हैं। जैसे जीव द्रव्य का गुण है—जानना, देखना। जैसे पुद्गल का गुण है—रूप, रस, गंध, स्पर्श वाला होना। यह इनके गुण हैं। और इन गुणों की पर्यायें कितनी होती हैं? अनंतानंत पर्यायें होती हैं। ज्ञान गुण की अनंत पर्यायें होती हैं। हमारे ज्ञान गुण जो हैं, उसकी अनंतानंत पर्यायें हो गईं और अनंतानंत पर्यायें आगे होती ही रहेंगी।
तो केवलज्ञान किसे कहते हैं? जो समस्त द्रव्यों को जाने, जिसके… जिससे कोई भी द्रव्य बचा हुआ ना रह जाए, उनके गुणों को जाने, और उनके गुणों की अनंतानंत पर्यायों को भी जाने—उसका नाम केवलज्ञान है। यह केवलज्ञान किनको होता है? यह अरहंत परमेष्ठी भगवान को होता है। और इसके द्वारा वे तीनों लोकों के समस्त द्रव्य और उनकी गुण-पर्यायों को जानते हैं।
प्रश्न: केवली भगवान सभी द्रव्य और उनकी गुण-पर्यायों को एक साथ जानते हैं, तो हम अलग-अलग क्यों जानते हैं?
उत्तर: आपका ज्ञान अधूरा है या पूरा? आपका ज्ञान अधूरा। आपकी जानने की जो शक्ति है ना, वो अधूरी है या पूरी? अधूरी। आपका ज्ञान भी अधूरा, आपकी शक्ति भी अधूरी, इसलिए आप थोड़ा जानेंगे और फिर क्रम-क्रम से जानेंगे।
लेकिन केवली भगवान का ज्ञान भी पूरा और शक्ति भी पूरी। इसीलिए उनको क्रम से जानने की जरूरत नहीं। वो समस्त द्रव्यों की अनंत गुण-पर्यायों को बिना क्रम के एक साथ जानते हैं। उनके ज्ञान में अगला-पिछला नहीं होता—कि पहले इसको जाने, पहले छहढाला की पहली ढाल जाने, फिर दूसरी ढाल, फिर तीसरी ढाल जाने; ऐसा नहीं होता। वो तो एक साथ सबको जानते हैं। क्यों? क्योंकि ज्ञान पूरा और शक्ति पूरी।
प्रश्न: यहाँ सम्यग्ज्ञान को सुख का कारण कहा है। क्या पंचेंद्रिय के विषय व धन-संपत्ति सुख का कारण नहीं हैं?
उत्तर: सुख दो प्रकार का होता है—एक इंद्रिय सुख, एक अतिंद्रिय सुख।
इंद्रिय सुख नाशवान है। आज है, कल है या नहीं। इंद्रिय सुखों को जोड़ने में पाप लगता है, भोगने में पाप लगता है। लेकिन जो अतिंद्रिय सुख है, जो आत्मा से प्राप्त होता है, आत्मा के लीन होने से प्राप्त होता है, वह सुख वास्तव में है।
धन… धन के कमाने में बड़ी मेहनत, रक्षा में बड़ी मेहनत, भोगने में बड़ा पाप, फिर भी तृष्णा की वजह से कोई धनी कभी सुखी नहीं होता। अगर पंचेंद्रियों के विषयों में और धन में सुख होता, तो मुझे बताओ, भरत चक्रवर्ती ने उनको छोड़ के दीक्षा क्यों ली होती? ऐसा नहीं, उन्होंने देखा यहाँ सुख नहीं; सुख तो अपनी आत्मा में रमण करने में ही है। और वह कब होता है? जब आप अपनी आत्मा को भली-प्रकार जानें, सम्यग्ज्ञान के द्वारा, तब होता है।
इसीलिए यहाँ पंडित दौलतराम जी ने कहा—यह सम्यग्ज्ञान जो है, यह कैसा अमृत है? कैसा अमृत है? जन्म, जरा, मरण और रोगों को दूर करने वाला है। अर्थात संसार के बंधन से छुड़ा के इस जीव को मोक्ष प्राप्त कराने वाला है।
समयसार में एक बहुत अच्छा श्लोक आया है:
“भेदविज्ञानतः सिद्धाः सिद्धा ये किल केचन। तस्यैवाभावतो बद्धा बद्धा ये किल केचन।।”
अभी तक जितने जीव भी मुक्ति को प्राप्त हुए हैं, वह सब भेदविज्ञान (सम्यग्ज्ञान) की महिमा है। और अभी तक हम और आप सब जो संसार में भटक रहे हैं, यह सम्यग्ज्ञान (भेदविज्ञान) के अभाव की महिमा है। आज तक हमें सम्यग्ज्ञान नहीं हुआ, भेदविज्ञान नहीं हुआ। हम सब पदार्थों को अपना माने बैठे हैं। हमें निज का परिचय नहीं हुआ। हमें यही नहीं मालूम मैं कौन हूँ और क्या हूँ। हमने तो शरीर को ही अपना मान रखा है। अभी तक तो हम मिथ्यादृष्टि बने हुए हैं।
इसीलिए यह सम्यग्ज्ञान जो है, यह संसार-बंधन से छुड़ा के और मोक्ष प्राप्त कराने वाला है। हम सबको क्या करना चाहिए? सम्यग्ज्ञान की आराधना करनी चाहिए। सम्यग्दर्शन प्राप्त करना चाहिए और सम्यग्दृष्टि बनके चरित्र को प्राप्त कर मोक्ष मार्ग में बढ़ना चाहिए।
छहढाला पहली ढाल छंद 1 व 2 | छंद 3 व 4 | छंद 5 व 6 | छंद 7 व 8 | छंद 9 व 10 | छंद 11 व 12 | छंद 13 व 14 | छंद 15 व 16 |
दूसरी ढाल छंद 1 व 2 | छंद 3 व 4 | छंद 5 व 6 | छंद 7 व 8 | छंद 9 व 10 | छंद 11 से 13 | छंद 14 व 15 |
तीसरी ढाल छंद 1 व 2 | छंद 3 व 4 | छंद 5 व 6 | छंद 7 व 8 | छंद 9 व 10 | छंद 11 व 12 | छंद 13 व 14 | छंद 15 व 16 | छंद 17
चौथी ढाल दोहा और छंद 1




