नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 11
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 70- shlok 12 to 21
श्लोक ( Shlok ) 12 – 15
तदा मनोहारोद्यानगतं विमलवाहनम् । तीर्थकर्तारमाकर्ण्य वनपालमुखान्नृपः ॥ १२ ॥स्वान्तःपुरपरीवारपरीतो भक्तिचोदितः । गत्वा प्रदक्षिणीकृत्य मुहुर्मुकुलिताञ्जलिः ॥ १३ ॥प्रप्रणम्य समभ्यर्च्य गन्धपुष्पाक्षतादिभिः । पीतधर्मामृतस्तस्मादकस्माद् भोगनिस्पृहः ॥ १४ ॥तुजेऽपराजिताख्याय दत्वा सप्ताङ्गसम्पदम् । तपोऽयं समुपादत्त’ पञ्चभिर्भूभुजां शतैः ॥ १५ ॥
तदनन्तर किसी एक दिन राजाने वनपालके मुखसे सुना कि मनोहर नामके उद्यानमें विमलवाहन नामक तीर्थकर पधारे हुए हैं। सुनते ही वह भक्तिसे प्रेरित हो अपनी रानियों तथा परिवारके लोगोंके साथ वहाँ गया। वहाँ जाकर उसने बारबार प्रदक्षिणाएँ दीं, हाथ जोड़े, प्रणाम किया, गन्ध, पुष्प अक्षत आदिके द्वारा अच्छी तरह पूजा की तथा धर्मरूपी अमृतका पान किवा । यह सब करते ही अकस्मात् उसकी भोगोंकी इच्छा शान्त हो गई जिससे उसने अपराजित नामक पुत्रके लिए सप्त प्रकारकी विभूति प्रदान कर पाँच सौ राजाओंके साथ ज्येष्ठ तप धारण कर लिया ॥१२-१५।।
“Thereafter, one day, the King heard from the keeper of the forest that the Tirthankara named Vimalavahana had arrived at the Manohara garden. Upon hearing this, impelled by deep devotion, he went there along with his queens and family members. Having arrived, he circumambulated the Tirthankara repeatedly, folded his hands, bowed down, worshipped Him beautifully with fragrance, flowers, and unbroken rice grains (Akshata), and drank the nectar of righteousness (Dharma).
Upon doing all this, his desire for worldly pleasures suddenly vanished. Consequently, he bestowed the sevenfold royal opulence upon his son, Aparajita, and embraced the supreme, rigorous asceticism (Tapa) along with five hundred other kings.” || 12–15 ||
श्लोक ( Shlok ) 16
कुमारोऽपि गृहीताणुव्रतादिः शुद्धदर्शनः । प्राविशलक्षितो लक्ष्म्या साक्षादिव पुरं हरिः ॥ १६ ॥
कुमार अपराजितने भी शुद्ध सम्यग्दृष्टि होकर अणुव्रत आदि श्रावकके व्रत ग्रहण किये और फिर जिस तरह इन्द्र अमरावतीमें प्रवेश करता है उसी तरह लक्ष्मीप्ते युक्त हो अपनी राजधानीमें प्रवेश किया ।। १६ ।।
“Prince Aparajita, too, becoming a soul of pure right-belief (Shuddha Samyagdrishti), embraced the Anuvratas (the minor vows) and other spiritual disciplines of a lay disciple (Shravaka). Then, radiant with royal splendor and prosperity, he entered his capital city just as Indra enters his celestial city, Amaravati.” || 16 ||
श्लोक ( Shlok ) 17
*तन्त्रावापगतां चिन्तां निधाय निजमन्त्रिषु । सक्तः शास्त्रोक्तमार्गेण तदासौ धर्मकामयोः ॥ १७ ॥
उसने स्वराष्ट्र तथा परराष्ट्र सम्बन्धी चिन्ता तो अपने मन्त्रियोंपर छोड़ दी और स्वयं शास्त्रोक्त मार्गसे धर्म तथा काममें लीन हो गया ॥ १७ ।।
“He left the governance and political concerns of his own kingdom, as well as foreign affairs, entirely to his ministers; he himself remained deeply absorbed in the pursuits of righteousness (Dharma) and worldly pleasures (Kama) in strict accordance with the paths prescribed by the sacred scriptures.” || 17 ||
श्लोक ( Shlok ) 18 – 19
कदाचिन्निजपित्रामा जिनं विमलवाहनम् । मुक्त्या वशीकृतं श्रुत्वा गन्धमादनपर्वते ॥ १८ ॥अनिरीक्ष्य न भोक्ष्येऽहं जिनं विमलवाहनम् । इति प्रतिज्ञयाष्टोपवास्यासीदपराजितः ॥ १९ ॥
किसी एक समय उसने सुना कि हमारे पिताके साथ श्री विमलवाहन भगवान् गन्धमादन पर्वतपर मोक्षको प्राप्त हो चुके हैं। यह सुनते ही उसने प्रतिज्ञा की कि ‘मैं श्री विमलवाहन भगवान्के दर्शन किये बिना भोजन नहीं करूँगा । इस प्रतिज्ञासे उसे आठ दिनका उपवास हो गया ।॥१८-१९॥
“At one time, he heard the news that along with his father, Lord Sri Vimalavahana had attained liberation (Moksha) on Mount Gandhamadana. The moment he heard this, he took a vow: ‘I shall not consume any food until I have caught sight of Lord Sri Vimalavahana.’ On account of this strict vow, he ended up fasting for eight consecutive days.” || 18–19 ||
श्लोक ( Shlok ) 20 – 21
तदा शक्राज्ञया यक्षपतिर्विमलवाहनम् । तस्य संदर्शयामास साक्षात्कृत्वा महाशुभम् ॥ २० ॥ जैनगेहे समभ्यर्च्य तं सोऽपि कृतवन्दनः । भुङ्क्त स्म स्नेहशोकार्त्तचेतसां का विचारणा ॥२१॥
तदनन्तर इन्द्रकी आज्ञासे यक्षपतिने उस राजाको महान् शुभ रूप श्री विमलवाहन भगवान्का साक्षात्कार कराकर दर्शन कराया। राजा अपराजितने जिन मन्दिर में उन विमलवाहन भगवान्की पूजा वन्दना करनेके बाद भोजन किया सो ठीक ही है क्योंकि जिनका चित्त स्नेह तथा शोकसे पीड़ित हो रहा है उन्हें तत्वका विचार कैसे हो सकता है ? ॥ २०-२१ ॥
“Thereafter, by the command of Indra, the lord of the Yakshas (celestial guardians) manifested an exquisitely auspicious vision of Lord Sri Vimalavahana and granted the King his sight. King Aparajita then performed the worship and adoration of Lord Vimalavahana in the Jinendra temple, and only after that did he consume his food.
And this is quite fitting; for how can those whose minds are heavily afflicted by attachment and grief engage in deep philosophical reflection on absolute truth?” || 20–21 ||
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