आलोचना पाठ – छंद 30 व 31 : अर्थ एवं व्याख्या
इक गाँवपति जो होवे, सो भी दुखिया दुःख खोवै
तुम तीन भुवन के स्वामी, दुःख मेटहु अंतरजामी ॥३०॥
शब्दार्थ
- गाँवपति — गाँव का प्रधान/स्वामी।
- दुखिया — दुःखी व्यक्ति।
- दुःख खोवै — दुःख दूर करता है।
- तीन भुवन — तीन लोक।
- स्वामी — प्रभु/स्वामी।
- अंतरजामी — अंतर के भावों को जानने वाले।
जो एक गाँव का पति होता है, यानी जो एक गाँव का स्वामी या प्रधान होता है, ‘सो भी दुखिया दुख खोवे’, वह भी अपने अधिकार और सामर्थ्य से वहाँ रहने वाले दुःखी लोगों के कुछ दुःख दूर कर सकता है दुःखी लोगों को सुखी करने का प्रयास करता है। तो आप तो तीन भुवन के स्वामी हैं, आप तो तीन लोक के स्वामी हैं। आप तो महान और सर्वज्ञ हैं ‘दुख मेटो अंतरयामी’, तो हे अंतर्यामी! आप जो है मेरे दुःखों को मेटो, मेरे दुःखों को दूर करने की कृपा करें।
एक सुंदर तुलना प्रस्तुत करते हैं। एक साधारण गाँव का प्रधान भी अपनी सीमित शक्ति के अनुसार किसी व्यक्ति की सहायता कर सकता है। फिर जिनराज, जिनका ज्ञान और आध्यात्मिक वैभव अनंत है, उनके समक्ष अपने दुःखों से मुक्ति की प्रार्थना करते हैं।
हे केवलज्ञानी प्रभु! आप तो भूत, भविष्य और वर्तमान के ज्ञाता हैं। जैसे एक गाँव का मुखिया (सरपंच) अपने ग्रामीणों के दुख दूर करता है, वैसे ही आप तो तीनों लोकों के स्वामी हैं। यद्यपि आप वीतरागी हैं और स्वयं कुछ नहीं करते, फिर भी आपके नाम और भक्ति का आश्रय लेने से पुण्य का बंध होता है, जिससे सांसारिक दुख मिट जाते हैं।
यहाँ “अंतरजामी” का भाव है—जो जीव के अंतरंग भावों और कर्मों को जानता है।
हालाँकि जैन दर्शन के अनुसार तीर्थंकर किसी जीव के कर्म को मनमाने ढंग से मिटा नहीं देते। इसलिए “दुःख मेटहु” का गहरा भाव है—हे प्रभु! मुझे ऐसा सम्यक् मार्ग, ज्ञान और वैराग्य प्राप्त हो जिससे मैं अपने कर्मों और कषायों का क्षय कर दुःख से मुक्त होने की दिशा में बढ़ सकूँ।
सांसारिक सत्ता सीमित सुख दे सकती है, पर आत्मिक दुःख का वास्तविक समाधान सम्यक् दर्शन, ज्ञान और चरित्र में है।
द्रोपदी को चीर बढायो, सीता प्रति कमल रचायो
अंजन से किये अकामी, दुःख मेटो अंतरजामी ॥३१॥
शब्दार्थ
- द्रोपदी — महाभारत की द्रौपदी।
- चीर बढ़ायो —वस्त्र की वृद्धि की।
- सीता प्रति — सीता के संबंध में।
- कमल रचायो — अग्निकुंड में कमल की रचना
- अंजन — अंजन चोर से संबंधित प्रसंग।
- अकामी — इच्छा रहित कर दिया
- अंतरजामी — अंतर के भावों को जानने वाले।
अब यहाँ पर क्या बता रहे हैं कविवर? कि उदाहरण दे रहे हैं कि जैसे आपने द्रौपदी का चीर बढ़ाकर उसके दुःख को दूर करा, आपने सीताजी जब अग्निकुंड में प्रवेश करा था उन्होंने, तो आपने अग्निकुंड में कमल की रचना कर दी थी। ‘अंजन से किये अकामी’, जो अंजन जैसे चोर को आपने निरंजन बना दिया, यानी कि इच्छा रहित कर दिया, तो आप मेरे भी दुःखों को मेटो। हे अंतर्यामी! हे जिनेंद्र भगवान! हे केवलज्ञानी! आप मेरे भी दुःखों को दूर करिए।
इस पद में धार्मिक कथाओं और लोकप्रचलित प्रसंगों का स्मरण करते हुए जिनराज की करुणा और उपकार-भाव को सामने रखते हैं।यहाँ इन कथाओं का मुख्य उद्देश्य ऐतिहासिक विवरण प्रस्तुत करना नहीं, बल्कि भक्त के विश्वास और विनय-भाव को व्यक्त करना है।
जैन सिद्धांत में तीर्थंकर वीतराग होते हैं—वे किसी के प्रति राग-द्वेष से प्रेरित होकर कर्मों का हस्तक्षेप नहीं करते। अतः इन पंक्तियों का भाव भक्तिपरक है: जिनराज के वीतराग चरित्र और उपदेश से प्रेरणा लेकर जीव अपने दुःख के मूल—राग, द्वेष, मोह और कषाय—को दूर करने का प्रयास करे।
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