छहढाला – दूसरी ढाल छंद 14 – गृहीत मिथ्याचारित्र का लक्षण
जो ख्याति-लाभ पूजादि चाह, धरि करन विविध-विध देहदाह ।
आतम अनात्म के ज्ञान-हीन, जे जे करनी तन करन-छीन ॥14॥
अन्वयार्थ (जो) जो (ख्याति) प्रसिद्धि (लाभ) फायदा और (पूजादि) मान्यता एवं आदर आदि की (चाह धरि) इच्छा से (देहदाह) शरीर पीड़ित करने वाले (आतम अनात्म के) आत्मा और पर वस्तुओं के (ज्ञान) ज्ञान से (हीन) रहित (तन) शरीर को (छीन) कमजोर (करन) करने वाले (विविधविध) अनेक प्रकार के (करनी) कार्य हैं “वे सब” [मिथ्याचारित्र] मिथ्याचारित्र कहलाते हैं।
अर्थ- गृहीत मिथ्या चारित्र की चर्चा
जो ख्याति लाभ पूजादि चाह धरी, जो ख्याति लाभ और पूजादि की चाह यानी ऊपर से तो क्रियाएं करते हैं पर अंतरंग में जिनकी इच्छा यह होती है कि “मेरी ख्याति फैलेगी, अगर मैं 10 दिन या 20 दिन का उपवास करूंगा तो लोगों में मेरा यश फैलेगा, मेरा आर्थिक लाभ हो जाएगा, मेरा सम्मान बढ़ जाएगा” माने मुझे ख्याति मिले, मुझे अच्छे-अच्छे भोजन आदि सामग्रियों का लाभ हो, मेरी पूजादि हो, लोग मेरी आराधना करें, मेरे चरणों को पूजे। ताकि लोग आश्चर्यचकित हों और अखबारों में नाम छपे इत्यादि चाह को धारण कर, विविध विधि देह दाह करण, अनेक प्रकार के शरीर के क्लेश को (देह दाह माने शरीर को तकलीफ हो) ऐसे कार्यों को करण, करना होता है। और ये सारी क्रियाएं करते हुए, आत्म अनात्म के ज्ञानहीन, आत्मा और अनात्मा का ज्ञान जिनको नहीं होता, उस ज्ञान से हीन-रहित होते हैं, वे सारे जे-जे करनी, जितनी क्रियाएं हैं, तन करण क्षीण, शरीर को क्षीण करने वाली होती है। यानी शरीर को तो सुखा रहे हैं, नौकर्म की तो निर्जरा कर रहे हैं, लेकिन कर्मों की निर्जरा नहीं कर रहे हैं।
वे सब मिथ्या चारित्र, वो सब मिथ्या चारित्र है। वो किसी प्रकार पारिव्राजक संबंधित तप हो, पंचाग्नि तप हो, परमहंस का तप हो, या और भी जितने भी उसमें भेद-प्रभेद हैं, वे सब शरीर को सुखाने वाली जितनी तपस्याएं हैं, वो मिथ्या चारित्र है। तो उसको त्याग, हे भव्य जीव! उसको त्याग दे और अब आतम के हित पंथ लाग, आत्मा का जो वास्तविक हित पंथ है, उस पर लग जा और जग जाल भ्रमण को देहू त्याग, और संसार का जो जाल है, उसमें भटकता चला जा रहा है तू, कभी इस फंदे में फंस जाता, कभी उस फंदे में चला जाता। चारों गतियों में, चौरासी लाख योनियों में जो तेरा भ्रमण चल रहा है, उसको त्याग देहू! त्याग दे!
- यदि तपस्या या उपवास आत्म-कल्याण के लिए न होकर केवल दिखावे और यश के लिए किए जाएं, तो वे सब मिथ्या चारित्र की कोटि में आते हैं।
- सम्यक् चारित्र: पंच पापों का त्याग करना, अनुव्रत-महाव्रत स्वीकार करना, पंच समिति और तीन गुप्तियों को धारण करना, मुनि अवस्था या श्रावक के संयमासंयम (प्रतिमाएँ) का पालन करना और आत्मा के कल्याण में सहकारी आचरण करना ही सम्यक् चारित्र है। (चौथे गुणस्थान में स्वरूपाचरण चारित्र मानने की नई परंपरा आगम सम्मत नहीं है, क्योंकि चौथे गुणस्थान में चारित्र का अभाव या केवल विशुद्धि होती है)।
- जिन मुनिराजों के 28 मूलगुण सुरक्षित नहीं हैं, उनका आचरण भी मिथ्या चारित्र ही माना जाता है।
छंद 15 – मिथ्याचारित्र और संसार के त्याग का उपदेश
ते सब मिथ्याचारित्र त्याग, अब आतम के हित पंथ लाग।
जगजाल भ्रमण को देहु त्याग, अब ‘दौलत’ निज आतम सुपाग ।।15 ॥
अन्वयार्थ (ते) उन (सब) सब (मिथ्याचारित्र) मिथ्या चारित्रों को (त्याग) छोड़कर (अब) अब (आतम के) आत्मा के (हित) भलाई के (पंथ) रास्ते में (लाग) लगकर (जगजाल) संसार के जाल में (भ्रमण) भटकने का (त्याग देहु) त्याग कर देना चाहिए (दौलत) हे दौलतराम ! (अब) अब (निज आतम) अपनी आत्मा में (सुपाग) अच्छी तरह लीन होओ।
अर्थ – दूसरी ढाल का उपसंहार और मुख्य शिक्षा
अब दौलत—दौलत राम अपने आप को कह रहे हैं कि हे दौलत! अब निज आतम सुपाग, अपनी आतम को सुपाग (माने अच्छी तरह से प्राप्त कर) अपनी आत्मा को अच्छी तरह से प्राप्त कर लें। क्योंकि अभी तक तुझे उसकी प्राप्ति नहीं हुई है, तू संसार में भ्रमण कर रहा है। अगृहीत मिथ्या दर्शन ज्ञान चारित्र के कारण और गृहीत मिथ्या दर्शन ज्ञान चारित्र के कारण, इसलिए अब इन सबको छोड़कर सही रास्ते पर लग जा।
तो पहली ढाल में यह बतलाया है कि संसार में जीव भटकता है मोह के कारण। फिर दूसरी ढाल में यह बतलाया है कि भ्रमण का हेतु क्या है और उसका स्वरूप क्या है? तो गृहीत मिथ्या दर्शन, मिथ्या ज्ञान, मिथ्या चारित्र बाद में बतलाया, और उसके पहले अगृहीत मिथ्या दर्शन, मिथ्या ज्ञान और मिथ्या चारित्र, उनका स्वरूप बतला दिया।
- मिथ्यात्व का त्याग: संसार के जाल और भ्रमण को बढ़ाने वाले मिथ्यात्व को छोड़कर अपनी आत्मा के हित और कल्याण के मार्ग में लगो। अपने आत्म-स्वरूप को पहचानकर भेद-विज्ञani बनो।
- लौकिक व्यवहार और धर्म: अन्य मत के लोगों से सामाजिक, व्यावसायिक या पड़ोसी के नाते अच्छे संबंध (मित्रता) रखें, किंतु धर्म के मामले में कभी कोई कॉम्प्रोमाइज न करें। आचार्य समभद्र ने भी कहा है कि किसी भी भय, आशा, स्नेह या लोभ के कारण खोटे देव, खोटे शास्त्र और खोटे गुरु को कभी प्रणाम या विनय नहीं करना चाहिए।
- गृहीत से बचाव: अनादि काल के संस्कारों (अगृहीत) की बात बाद में है, कम से कम इस जन्म में ग्रहण किए जाने वाले गृहीत मिथ्यात्व (खोटे देव, शास्त्र, गुरु और कुधर्म) से अवश्य बचें।
सच्चे देव-शास्त्र-गुरु और जिनेन्द्र वाणी का श्रद्धान करके अपने जीवन को सम्यक् मार्ग पर लगाना ही इस दूसरी ढाल का सार है।
दो ढालों का स्वाध्याय अपन ने पिछले कुछ दिनों में किया है। पहली ढाल में संसार भ्रमण और संसार भ्रमण संबंधी जो क्लेश, कष्ट, दुःख संसारी जीव भोगता है, उसका चित्रण है। निगोद से लेकर फिर स्थावर, त्रस, विकलेन्द्रिय, असैनी पंचेन्द्रिय, पंचेन्द्रिय, और फिर नरक आदि सबका वर्णन, पूरी चार गतियों का वर्णन पहली ढाल में किया गया है। और देवगति में भी सम्यक् दर्शन के बिना वैमानिक देव दुःख को ही भविष्य में प्राप्त करता है। वर्तमान में उसके पास इन्द्रिय सुख होता है, लेकिन इन्द्रिय सुख में तृप्ति नहीं होती।
छहढाला पहली ढाल छंद 1 व 2 | छंद 3 व 4 | छंद 5 व 6 | छंद 7 व 8 | छंद 9 व 10 | छंद 11 व 12 | छंद 13 व 14 | छंद 15 व 16 |
दूसरी ढाल छंद 1 व 2 | छंद 3 व 4 | छंद 5 व 6 | छंद 7 व 8