चौथी ढाल छंद 6 – सम्यग्ज्ञान की महिमा, उसका कारण और विवेक प्राप्ति
धन समाज गज बाज, राज तो काज न आवै। ज्ञान आपको रूप भये, फिर अचल रहावै ॥
तास ज्ञान को कारन स्व-पर-विवेक बखानौ। कोटि उपाय बनाय भव्य ताको उर आनौ ॥6॥
अन्वयार्थ (धन) रुपया पैसा (समाज) कुटुम्बी (गज) हाथी (बाज) घोड़े और (राज) राज्य (तो) तो (काज) अपने काम में (न आवै) नहीं आते। किन्तु (ज्ञान) सम्यग्ज्ञान (आप को रूप) आत्मा का स्वरूप है, वह (भये) होने पर (फिर) फिर (अचल) अटल (रहावै) हो जाता है (तास) उस (ज्ञान को) सम्यग्ज्ञान का (कारन) कारण (स्वपर विवेक) आत्मा और पर वस्तुओं का भेदविज्ञान (बखानौ) कहा गया है। इसलिए (भव्य) हे भव्यजीवों ! (कोटि) करोड़ों (उपाय) उपायों को (बनाय) करके (ताको) उस भेदविज्ञान को [ सम्यग्ज्ञान को] (उर) हृदय में (आनौ) धारण करो।
अर्थ- अच्छे कवि थे पंडित दौलत राम जी. देखिये कैसे इन्होंने ज का अनुप्रास बनाया- समाज गज वाज राज काज. अच्छा अनुप्रास बनाया. तो धन, समाज, गज यानी हाथी, वाज यानी घोड़ा, बाज पक्षीनी, वाज यानी घोड़ा. और राज, राज्य. तो काज ना आवे इस ना काम आने वाली वस्तुएं नहीं है. क्योंकि ये सब क्षणभंगुर है, प्राप्त हो करके फिर वियोग को प्राप्त हो सकती हैं, नष्ट हो जाती हैं.
हमें इस जन्म में अच्छा कुल जिनवाणी का सुनना मिला, फिर भी हमने उसका लाभ नहीं उठाया। हमने जीवन भर क्या किया? पैसा कमाया और परिवार का पालन, पोषण, ब्याह, शादी में हम लगे रहे। पंडित जी कह रहे हैं, धन, रुपया-पैसा, समाज माने परिवार, कुटुंब, गज माने हाथी, बाज माने घोड़े और राज माने राजपाठ, मंत्री पद, ये तो काम नहीं आते हैं। ये कुछ काम में आने वाला नहीं।
आदमी का मरण हुआ, हाथी, घोड़े, रुपया, पैसा, परिवार यहीं छूट गया, जो कर्म थे उन्हें साथ लेकर चला गया। तो कह रहे हैं, धन माने रुपया-पैसा, समाज माने परिवार, गज माने हाथी, बाज माने घोड़े और राज माने राजपाठ, मंत्री बनना और ऊंचे पदों पर आना, यह कुछ भी काम नहीं आता है।
तो ज्ञान आपको रूप है, लेकिन सिर्फ एक चीज़ ऐसी है वो है ज्ञान. वो अगर अपना रूप हो जाए, अपन अगर सच्चा ज्ञान प्राप्त कर लें, तो फिर अचल रहा वे, वो अचल हो जाता है. फिर ये ज्ञान एक ऐसी संपत्ति है जो नष्ट नहीं होती. लेकिन ज्ञान आपको रूप भए, एक बार अपने आत्मस्वरूप का अच्छी प्रकार परिचय हो जाए, ज्ञान आपको रूप भए, यदि ज्ञान आपका रूप भए, आप रूप हो जाए, आत्मस्वरूप का परिचय हो जाए तो फिर अचल रहावे, फिर वह हमेशा रहा आता है। जिसने एक बार यह अच्छी तरह निर्णय कर लिया, मैं तो आत्मा मात्र ही हूं, बस वो फिर उससे चलायमान क्यों होगा? होगा ही नहीं।
और तास ज्ञान को कारण, उस ज्ञान का कारण क्या है? स्व-पर विवेक बखाना. स्व और पर, स्व यानी अपन, पर यानी अपने से जो भिन्न है, इन दोनों का विवेक, विवेक का अर्थ होता है भेदन, भेद. इन दोनों का जो विवेक भेद विज्ञान है, उसको बखाना गया है. यानी विवेक को सम्यक ज्ञान का कारण कहा गया है, विवेक किस में? शरीर मेरा नहीं, मेरी तो मात्र आत्मा है। संसार में जो कुछ मुझे दिखाई दे रहा है, मेरा कुछ नहीं है। जो इनको देखने वाला है, मैं तो वह हूं। तुम्हें क्या करूं? जिसमें मेरा कल्याण हो, मैं उन कामों में लगूं, इन दिखने वालों के चक्कर में मैं अपना जीवन क्यों नष्ट करूं?
यह समझ तू है क्या और यह जो इतना तेरा परिसर परिकर है, तू इस रूप नहीं। ये तेरे कोई नहीं, आचार्यों ने क्या लिखा? शाम होने पर वृक्ष के ऊपर सब तरफ से पक्षी आकर बैठ जाते हैं।सुबह हुआ, सब अपने-अपने काम से चले जाते हैं। अगर वो पेड़ यह सोचने लगे रात को, ये सारे पक्षी मेरे हैं, तो उसकी कितनी भूल मानी जाएगी? उसी तरह जितने ये नौकर-चाकर, स्त्री, परिवार, माता-पिता मुझे मिले हैं, ये सब तो पेड़ पर आए हुए पक्षी की तरह हैं। अपना-अपना समय पूरा होता जाएगा, सब उड़ते जाएंगे, सब चले जाएंगे, मैं भी चला जाऊंगा।
देखौ विवेक लौकिक क्षेत्र में भी देखो, लाभ-हानि का विवेक होता है. फिर अच्छे-बुरे का विवेक होता है. हेय उपादेय छोड़ने योग्य और ग्रहण करने योग्य इसका भी विवेक होता है. यहाँ पर कह रहे हैं स्व और पर का विवेक. आत्मा और अनात्मा, इन दोनों का विवेक सम्यक ज्ञान का कारण है, जिसने आत्मा को और अनात्मा को पहचाना है, वो विवेकी जीव है और उसके पास सम्यक ज्ञान है, वो सम्यक दृष्टि है. इसलिए कोटि उपाय बनाए, करोड़ों उपाय बना लो अभी जीवन जब तक है आपके पास, जब तक मनुष्य पर्याय है, तब तो करोड़ों उपाय कर लो, और हे भव्य! ताको उर आनो, उस सम्यक ज्ञान को अपने ह्रदय में बुला लो.
आप जो हम लोगों को पढ़ा रहे हैं, यह सम्यक ज्ञान की महिमा है या सम्यक दर्शन की?”
सम्यक ज्ञान किसे कहते हैं? जो ज्ञान सम्यक दर्शन सहित प्राप्त किया जाए, उसी का नाम तो सम्यक ज्ञान है। हम इसमें आपको ज्ञान की महिमा बता रहे हैं, इसका मतलब सम्यक्त सहित ज्ञान की महिमा है इसमें। अगर ज्ञान हो और सम्यक दर्शन नहीं हो, तो तो बताएं ना, करोड़ों जन्म तप-तपने से भी कल्याण नहीं होगा। इसलिए महिमा सम्यक ज्ञान की है और सम्यक ज्ञान सम्यक दर्शन सहित ही होता है।
क्या सम्यक ज्ञान से ही मोक्ष हो जाएगा या हमें चारित्र भी धारण करना पड़ेगा?”
तुम्हें कोई बीमारी हो गई, मान लो रीढ़ की हड्डी में दर्द होता है। आप गए किसी डॉक्टर के पास, बड़े मरीज बैठे थे। आपने उनसे पूछा, “यह डॉक्टर क्या रीढ़ की हड्डी में स्पेशलिस्ट है? सब लोगों ने कहा हां है।” तुम लोगों को क्या फायदा हुआ इन डॉक्टर से? “हम इनके इलाज में हैं, बहुत फायदा है।”
तो आपको अपनी बीमारी का इलाज भी मालूम पड़ गया, इलाज करने वाले पर आपका विश्वास भी जम गया। इतने लोग कह रहे हैं ना, तो इसका मतलब ठीक तो है। अब मैं आपसे पूछता हूं, क्या इतने से आपकी बीमारी ठीक हो जाएगी क्या? कभी नहीं होगी। करना क्या पड़ेगा? डॉक्टर को दिखाना पड़ेगा। डॉक्टर जो योगा बताएगा, जो दवाई बताएगा, जो खाना-पीना बताएगा, उस खाने-पीने को खाना, दवाई को लेना, योगा को करना, यह सब शुरू करेंगे, तब तो होगी ठीक, नहीं तो कैसे दर्द ठीक होगा? नहीं होगा।
उसी तरह शास्त्र हमें मार्ग बताते हैं। कि हे संसार के प्राणी! तुम गलत मार्ग पर हो, तुम सच्चे मार्ग पर आओ और देखो सही मार्ग यह है। ऐसा आचरण करो, ऐसा खाओ, ऐसी पूजा, यह भक्ति, यह स्वाध्याय, इसमें अपना समय लगाओ।
अगर हमें वास्तव में मुक्ति प्राप्त करनी है, संसार से छूटना है, तो हम उन शास्त्र के अनुसार जो बताएंगे, वैसा हम करेंगे। नतीजा क्या होगा? धीरे-धीरे संसार छूट जाएगा। और जान के रह गए और हमें मालूम पड़ गया, डॉक्टर है, पर्चा भी लिखा लिया और दवाई नहीं लाए, नहीं खाई, योगा नहीं किया और मान लो हमने वैसा खाना-पीना ठीक नहीं किया, तो बीमारी कभी ठीक नहीं होगी।
इसलिए यह महिमा किसकी है? यह महिमा सम्यक ज्ञान सम्यक सहित है, उसकी है और जो सम्यक ज्ञानी होगा, उसका आचरण तो आगम के अनुसार होगा ही होगा। अगर स्वाध्याय करने के बाद कोई चारित्र को धारण नहीं करता है, तो समझना इसका स्वाध्याय सही नहीं है। यह पंडित तो बना है, लेकिन अपने नाम, अपनी यश, अपनी आमदनी के लिए बना है, आत्म कल्याण के लिए नहीं बना।
आत्म कल्याण के लिए कोई बना है, फिर तो शास्त्र पढ़ेगा, उसका आचरण भी उसी अनुसार होगा।
छंद 7 – सम्यग्ज्ञान का महत्त्व और विषय चाह रोकने का उपाय
जे पूरव शिव गये, जाहिं अरु आगे जै हैं। सो सब महिमा ज्ञानतनी, मुनिनाथ कहै हैं ॥
विषय-चाह-दव-दाह, जगत-जन अरनि दझावै । तासु उपाय न आन ज्ञान-घनघान बुझावै ॥7॥
अन्वयार्थ (पूरव) पहले (जे) जो जीव (शिव) मोक्ष को (गये) जा
चुके हैं (अब) अभी (जाहिं) जा रहे हैं (अरु) और (आगे) भविष्य में (जै हैं) जावेंगे (मुनिनाथ) जिनेन्द्र देव या गणधरदेव ने (सो) यह (सब) सब (ज्ञानतनी) सम्यग्ज्ञान का (महिमा) प्रभाव (कहै हैं) बतलाया है। (विषय-चाह) पाँचों इन्द्रियों के विषयों की चाह रूपी (दवदाह) भयंकर अग्नि (जगतजन) संसारी जीव रूपी (अरनि) जीर्ण शीर्ण पहाड़ी को (दझावै) जला रही है (तास) उसकी शान्ति का (उपाय) उपाय (आन) दूसरा (न) नहीं है केवल (ज्ञान घन घान) ज्ञानरूपी मेघों का समूह (बुझावै) शान्त करता है।
अर्थ – बहुत सुंदर काव्य लिखे हैं. जे पूरब शिव गए, जो भी पहले मोक्ष गए हैं, जाही यानी इस समय जो जा रहे हैं विदेह आदि क्षेत्रों से, और अब आगे जें हैं, और अब भविष्यत काल में आगे मोक्ष जाने वाले हैं, उनमें अपन भी हैं, अगर चले जाएं, रास्ता न छोड़ें तो. सो सब महिमा ज्ञान तनी, वो सब ज्ञान की ही महिमा है. अगर सम्यक ज्ञानी नहीं बनते, आत्मा में लीन नहीं होते, तो मोक्ष कभी नहीं होता।तो वह सब महिमा सम्यक ज्ञानी की है। ऐसा मुनियों के नाथ, माने गणधर देव या तीर्थंकर भगवान ने ऐसा कहा है। भगवान ऐसा कहते हैं कि आज तक जो मोक्ष गए हैं, जा रहे हैं, जाएंगे, वह सब महिमा सम्यक ज्ञान की है।
कौन कह रहा है ऐसा? मुनिनाथ कहें हैं, तीर्थंकर भगवान कहें हैं. और विषय चाह रूपी दवदाह, विषय चाह माने विषयों की इच्छा, ये क्या है? दवदाह यानी दावा नल है, जंगल की आग, ये जगत जन अरनी दझावे, संसारी प्राणी रूप वन को, अरनी का अर्थ वन है, वन को दझावे जला रही है. विष्याभिलाषा रूपी दावा नल, संसारी प्राणी रूपी वन को जला रहा है. मतलब हम जितने भी संसारी हैं, हम किसमें सुबह से शाम तक लगे रहते हैं, मरे जा रहे हैं, कह रहे हैं विषय चाह, पंचेंद्रियों के विषयों की इच्छा में हम सब मरे जा रहे हैं, सारा जीवन झोंक देते हैं।हमने तो देखा, जिनकी उम्र सारे बाल सफेद हो गए, हाथ-पैर ढीले पड़ गए, ऐसे जो हमारे बुजुर्ग हैं, वह भी पंचेंद्रियों के विषयों में उलझे रहते हैं।कह रहे हैं विषयों की इच्छा रूपी, दवदाह माने जंगल की अग्नि माने दावा नल, संसार के प्राणियों को, जंगल में जला रही है, इस संसार रूपी जंगल में पंचेंद्रियों के विषयों की चाह रूपी अग्नि हम सबको जलाए डाल रही है।
अब कौन बुझाएगा उस अग्नि को? तासु उपाय न आन, उसका कोई अन्य उपाय नहीं है, एक ही उपाय है, कौन सा उपाय है? ज्ञान घन घान बुझावे, ज्ञान रूप बादलों का समूह ही उस विषय चाह रूपी दावा नल को बुझा सकता है, और कोई नहीं बुझाने वाला. इसलिए ज्ञान रूपी मेघों के समूह को अपने अंदर स्थान देना चाहिए, तभी तो विषय चाह रूपी अग्नि शांत होगी. जंगल में आग लगी हो, तो फायर ब्रिगेड से काम नहीं बनता। हम फायर ब्रिगेड से कह दें, जा के जंगल की आग बुझा दो, नहीं बुझा पाएगा।उसके लिए तो ऊपर आकाश से घनघोर बारिश होगी, तब जंगल की आग बुझेगी।उसी तरह जो विषयों की इच्छा रूपी अग्नि हमें जला रही है, उससे अगर हमें बचना है, तो जो सम्यक ज्ञान रूपी बादल हैं, वह बादलों की घोर वर्षा से हम पंचेंद्रियों के विषयों की इच्छा से दूर होकर सुख प्राप्त कर सकते हैं।
पंचेंद्रिय विषयों की इच्छा को यहां, जंगल की अग्नि का उदाहरण देते हुए क्यों समझाया?
इसलिए जंगल की आग कैसी है? अब जहां सारे पेड़ ही पेड़ हैं, और अगर मान लो एक पेड़ में आग लग जाए, तो वह तो सारे पेड़ों में लगी चली जाएगी, वह तो बुझने का सवाल ही नहीं उठता। और हमारे-आपके जो पंचेंद्रियों के विषयों की अग्नि है, अनंत बार संसार में जन्म-मरण कर लिया, लेकिन बिल्कुल बुझी नहीं।
जो पंचेंद्रिय के विषयों की आग है, वह सम्यक ज्ञान के द्वारा कैसे बुझेगी?
अर्थात आपका जो पंचेंद्रियों में उलझना है, पंचेंद्रियों के विषयों में फंसना है, उससे कौन बचाएगा? शास्त्री तो बचाएंगे।जिरवाणी कह रही है, अगर तू पंचेंद्रियों के विषयों में उलझता है, तो मिथ्या दृष्टि है। अगर तू पंचेंद्रियों के विषयों में उलझता है, तो महान आस्त्रव बंद होगा, तेरी आत्मा और पतित और पतित होती जाएगी।क्या होगा? तिरंचों में, नारकियों में, निगोदियाओं में तेरा जन्म होगा।
इसलिए अगर तू चाहता है तेरी आत्मा का कल्याण हो, पंचेंद्रियों के विषयों को छोड़, देख इसमें सार नहीं।
मुझे बताओ, कौन जीव ऐसा है जो इन पंचेंद्रियों के विषयों से तृप्त हुआ हो? 96 हजार रानियां चक्रवर्ती की थीं, उन्होंने उनको भी क्यों छोड़ा? उनमें उलझे रहते ना।पर नहीं, उन्होंने समझ लिया इनमें सुख नहीं, सुख तो इनके छोड़ने में है, इसलिए उन्होंने उनको छोड़ दिया।और छोड़ने के बाद जब वह जंगल में गए, मुनि बनने के बाद आत्मध्यान में लीन हुए, तब उन्होंने कहा आनंद तो यहां है, अभी तक मैंने जिसको आनंद समझा था, वह आनंद था कहां?
इसलिए एक सम्यक ज्ञान ही ऐसा है, जो पंचेंद्रियों के विषयों से हटाने का रास्ता बताता है, बाकी कोई नहीं बताता।
संसार की इतनी विद्याएं हैं, कमाने की और भोगने की चर्चा करती हैं। ये बना लो, ऐसे कमाओ, ऐसे भोगो, ऐसे कमाओ, ऐसे भोगो, लेकिन एक अध्यात्म विद्या, एक सम्यक ज्ञान ऐसा है, जो यह बताता है इनको छोड़।जितना तू पकड़ेगा, उतना दुखी होगा, जितना तू छोड़ेगा, उतना सुखी होगा।
जिन जीवों ने जिनवाणी में इन बातों को पढ़ा और इन बातों का अनुसरण किया, उन्होंने ज्ञान प्राप्त करके, सम्यक दृष्टि बनके, सम्यक ज्ञानी हो के, तदनुसार अपना आचरण किया।और आचरण करके, सब कर्मों को नष्ट करके मोक्ष प्राप्त कर लिया।
इसलिए तो यहां लिखा हुआ है, आज तक जो भी मोक्ष गए हैं, सम्यक ज्ञान के कारण, जा रहे हैं, सम्यक ज्ञान के कारण, आगे भी जो जाएंगे, वह भी सम्यक ज्ञान के कारण। सम्यक ज्ञान और सम्यक दर्शन दोनों मिले हुए हैं यहां, बिना सम्यक दर्शन सम्यक ज्ञान नहीं होगा।
बिना उसके मोक्ष कभी होगा नहीं, सम्यक ज्ञान प्राप्त किया, तदनुसार अपना आचरण चरित्र रूप धारण किया, कर्मों को नष्ट करेंगे और मोक्ष प्राप्त हो जाएगा।
हम सबको क्या आज सोचना है कि अगर संसार के भ्रमण से बचना है, सच्चे देव-शास्त्र-गुरु का श्रद्धान करो, शास्त्रों का अध्ययन करो, और अपने आचरण को धीरे-धीरे अच्छा बनाओ।
गृहस्ती में रहकर जितना आचरण बन जाए उतना बनाएं, हम पुरुष हैं, हम मुनि बन सकें, वृत्ति बन सकें, छुल्लक-एलक बन सकें, वहां तक बनें, संस्कारित तो हो जाएं, ताकि अगले जन्मों में फिर विषयों में नहीं उलझें, और जहां भी जाएं, हमें मोक्ष मार्ग दिखाई पड़ता रहे।
यही भावना है, सम्यक ज्ञान के कारण, सम्यक ज्ञान के द्वारा हम सही मार्ग प्राप्त करें और उसमें लगें।
छहढाला पहली ढाल छंद 1 व 2 | छंद 3 व 4 | छंद 5 व 6 | छंद 7 व 8 | छंद 9 व 10 | छंद 11 व 12 | छंद 13 व 14 | छंद 15 व 16 |
दूसरी ढाल छंद 1 व 2 | छंद 3 व 4 | छंद 5 व 6 | छंद 7 व 8 | छंद 9 व 10 | छंद 11 से 13 | छंद 14 व 15 |
तीसरी ढाल छंद 1 व 2 | छंद 3 व 4 | छंद 5 व 6 | छंद 7 व 8 | छंद 9 व 10 | छंद 11 व 12 | छंद 13 व 14 | छंद 15 व 16 | छंद 17
चौथी ढाल दोहा और छंद 1 | छंद 2 व 3 |




