मेरी भावना – छंद 7: व्याख्या और अर्थ
कोई बुरा कहो या अच्छा, लक्ष्मी आवे या जावे, लाखों वर्षों तक जीऊं या मृत्यु आज ही आ जावे ।
अथवा कोई कैसा ही भय या लालच देने आवे, तो भी न्याय मार्ग से मेरे कभी न पद डिगने पावे ॥7॥
“मेरी भावना” में जो भी श्रेष्ठ और मंगल भावनाएं हो सकती हैं, उन सभी का समावेश किया गया है। पिछले छंदों में मैत्री, करुणा, प्रमोद और माध्यस्थ भाव की चर्चा की गई थी उसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए, यहाँ पंडित जुगलकिशोर जी मुख्तार हमें हमारे विचारों में स्थिरता और दृढ़ता लाने के लिए यहाँ कुछ और भावनाएं बताते हैं :
कोई बुरा कहो या अच्छा, लक्ष्मी आवे या जावे
जीवन की व्यावहारिक परिस्थितियाँ और मानसिक द्वंद्व
ये पंक्तियाँ और भावनाएं अपने अंतर्मन को मजबूत बनाने के लिए हैं। जब हम समाज, नगर या देश में रहते हैं, तो समय-समय पर हमारे सामने कई तरह की परिस्थितियाँ बनती हैं। कभी-कभी हम हर तरह से परेशान और दुखी भी होते हैं।
एक सबसे बड़ी व्यावहारिक परेशानी यह है कि जो लोग अच्छा कार्य करते हैं, उन्हें अक्सर अपनी अच्छाई का तुरंत या उचित प्रतिफल देखने को नहीं मिलता। जब वे अपने आस-पास देखते हैं, तो पाते हैं कि कुछ लोगों के पास विशेष योग्यता न होने पर भी उनकी वाह-वाही ज्यादा हो रही है, जबकि योग्यता रखने वाले व्यक्तियों की प्रशंसा कम होती है। कई बार आपके अच्छे कामों के बावजूद लोग आपकी बुराई कर सकते हैं या आपके सद्गुणों की उपेक्षा करके आपकी छोटी-मोटी कमियों को उजागर कर आपको परेशान कर सकते हैं।
यह सब होना संभव है और हर जगह होता है—चाहे घर-परिवार हो या कार्यस्थल (ऑफिस)। घर की परेशानियाँ अपनी तरह की होती हैं और ऑफिस की अपनी, लेकिन इन सब के मूल में मनुष्य की अपनी कषायें (क्रोध, मान, माया, लोभ आदि) ही कार्य करती हैं।
लोक-निंदा और प्रशंसा से अप्रभावित मन
कवि कहते हैं—“कोई बुरा कहो या अच्छा”—चाहे दुनिया आपकी प्रशंसा करे या आलोचना, आपको अपने मार्ग से विचलित नहीं होना है।
उदाहरण के लिए, जब कोई व्यक्ति धर्म-मार्ग पर चलता है (जैसे रात्रि-भोजन का त्याग करता है), तो कई बार चार लोग मिलकर उसका उपहास उड़ाते हैं। कुछ लोग मित्रों के दबाव या संगति छूटने के भय से अपने नियम और न्याय मार्ग को छोड़ देते हैं। इसीलिए पंडित जी समझाते हैं कि दुनिया में कहने वाले तो कहते ही रहेंगे। यदि दुनिया वाले आलोचना नहीं करेंगे, तो उनका सांसारिक स्वभाव कैसे दिखेगा? इसलिए उनकी परवाह किए बिना अपने सत्य और धर्म के मार्ग पर निष्ठापूर्वक टिके रहना चाहिए।
धन-वैभव (लक्ष्मी) के प्रति समभाव
“लक्ष्मी आवे या जावे” का अर्थ है—चाहे धन-संपत्ति आए या चली जाए, हमें ईमानदारी और धर्म के मार्ग को कभी नहीं छोड़ना चाहिए।
- संतोष का महत्व: धर्म के मार्ग पर रहते हुए यदि थोड़ा कम भी धन मिले, तो उसमें संतुष्ट रहना श्रेष्ठ है।
- अधर्म का परिणाम: अधर्म और अनैतिकता के मार्ग से यदि अत्यधिक धन आ भी जाए, तो पाप कर्म का उदय आने पर वह सब कुछ नष्ट कर देता है।
कवि समझाते हैं कि धन का आना-जाना हमारे अपने पूर्व कृत कर्मों (पुण्य-पाप के उदय और लाभ-अंतराय कर्म के क्षयोपशम या उदय) पर निर्भर करता है। जब लाभ-अंतराय का क्षयोपशम होता है तो समृद्धि आती है, और जब अंतराय का उदय आता है तो संपत्ति चली जाती है।
अतः धन के लालच में गलत रास्ते पर नहीं जाना चाहिए। असत्य और अधर्म के मार्ग पर चलने से नए पाप कर्मों का बंध (आश्रव) होता है, जो भविष्य में केवल दुःख, तनाव और डिप्रेशन ही उत्पन्न करते हैं। इसीलिए जीवन को कभी भी बुरे मार्ग पर नहीं ले जाना चाहिए।
कषायों का प्रभाव और आत्म-बोध
जब हमारे अंदर किसी कषाय का उदय होता है, तब यह बोध होना आवश्यक है कि अपनी ही कषायों के कारण हम दुखी हो रहे हैं और उन्हीं के वशीभूत होकर हम दूसरों को भी दुखी कर सकते हैं।
अक्सर यह प्रश्न उठता है: “जब हम इतना अच्छा करते हैं, तब भी लोग हमारी बुराई क्यों करते हैं या हमें परेशान क्यों करते हैं? ऐसे समय में हम क्या करें?”
वास्तव में, हर कोई किसी न किसी स्तर पर परेशान है—घर-परिवार के लोग हों, नौकरी करने वाले हों, या फिर पढ़ने-लिखने वाले बच्चे। किसी को अंक (marks) कम आने की चिंता है, किसी को करियर में आगे बढ़ने की, तो किसी को पारिवारिक जीवन या संतान से जुड़ी समस्याएँ घेरे रहती हैं।
न्याय मार्ग पर निष्ठा
ऐसी परिस्थितियों में “मेरी भावना” की ये पंक्तियाँ अत्यंत प्रासंगिक और संबल देने वाली सिद्ध होती हैं। यद्यपि ये बातें कहने और सुनने में सरल लगती हैं, किंतु व्यावहारिक जीवन में इन्हें उतारना बहुत कठिन होता है। उपदेश मिलना या सुनना तो सहज है, लेकिन यदि हम इसके अर्थ को गहराई से समझें और अपने आचरण में ढालें, तो जीवन में कभी भी न्याय के मार्ग से विचलित नहीं होंगे।
मानसिक विचलन और समभाव की चुनौती
यदि हम इन उच्च विचारों को अपने पास रखें, तो जब भी ऐसी विषम परिस्थितियों से सामना होगा, हमारा मन विचलित नहीं होगा। तभी यह उपदेश वास्तव में सार्थक सिद्ध होता है।
यद्यपि, “कोई बुरा कहे या अच्छा”—इसे केवल सुनना या बोलना बहुत सहज है। जब तक सब अच्छा चल रहा होता है, तब तक समभाव में रहना सरल लगता है। किंतु, जब वास्तव में कोई थोड़ा-सा भी बुरा बोल देता है, तो गहरा आघात लगता है। यहाँ तक कि यदि हमारे अपेक्षित मान-सम्मान में थोड़ी-सी भी कमी आ जाए, तो भी मन खिन्न हो जाता है।
उदाहरण के लिए, यदि चार लोग खड़े हों और किसी ने आपके प्रति सीधे तौर पर कुछ बुरा न भी कहा हो, लेकिन अन्य तीन लोगों का हाल-चाल पूछकर अनजाने में ही आपको अनदेखा कर दिया हो, तो भी मन में ठेस लग जाती है। यह मानसिक उपेक्षा इतनी सूक्ष्म होती है कि इसका प्रभाव कहीं भी और कभी भी हमारे मन को अशान्त कर सकता है।
अपेक्षाएँ और मन की खिन्नता
अक्सर ऐसा होता है कि हम किसी समारोह या उत्सव में बहुत प्रसन्नचित्त होकर और सज-धजकर जाते हैं, किंतु वहाँ से लौटते समय मन भारी और दुखी होता है। कारण पूछने पर पता चलता है कि किसी ने सीधे तौर पर कुछ नहीं कहा, फिर भी वहाँ का वातावरण, लोगों का आपसी व्यवहार या हमारी अपेक्षा के अनुसार आदर न मिलना मन को उदास कर देता है।
अतः, सीधी बुराई होना तो दूर की बात है; यदि आपकी अपेक्षाओं की पूर्ति न हो, या जैसा आपने सोचा था वैसा वातावरण न मिले, तो भी मन दुखी हो जाता है।
दुःखी होने का वास्तविक कारण: बाह्य स्थिति या आंतरिक मन?
यहाँ विचारणीय प्रश्न यह है कि यह कड़वाहट या उदासी आती कहाँ से है? यदि यह केवल बाहरी परिस्थितियों से आती, तो बिना किसी के कुछ कहे भी हमारा मन खराब क्यों होता?
इससे यह स्पष्ट होता है कि परेशानी का कारण केवल बाहरी परिस्थितियाँ नहीं हैं, बल्कि हमारा अपना मन है। जिस मन में सम्यक् ज्ञान, परिपक्वता और अच्छे संस्कारों का अभाव होता है, वह मन बात-बात पर दुखी होने लगता है।
हम प्रायः छोटे बच्चों की शिकायत करते हैं कि वे बहुत जल्दी बुरा मान जाते हैं। किंतु, यदि वयस्क और माताएँ स्वयं के अंतर्मन में झांककर देखें, तो पाएँगी कि वे भी अपने जीवनसाथी या परिवार के अन्य सदस्यों की बातों का कितनी ही बार बुरा मानती हैं।
समभाव का व्यावहारिक अभ्यास
‘मेरी भावना’ का मुख्य उद्देश्य यही है कि जब भी जीवन में ऐसी विपरीत परिस्थितियाँ आएँ, तो हमारे भीतर से यह विवेकपूर्ण आवाज़ गूँजनी चाहिए: “कोई बुरा कहे या अच्छा, इससे क्या फ़र्क पड़ता है?”
यदि किसी एक व्यक्ति ने हमें बुरा कह भी दिया, तो क्या हम सर्वथा बुरे हो गए? किसी एक की दृष्टि में हम भले ही अप्रिय हों, किंतु क्या पूरी दुनिया के लिए बुरे हो गए? ऐसा कभी नहीं होता कि कोई व्यक्ति सभी के लिए निष्प्रयोजन या बुरा हो जाए। किंतु, मोहवश जब घर या समाज में कोई एक व्यक्ति भी हमें कुछ कह देता है, तो हम संपूर्ण सत्य को भूलकर दुःखी होने लगते हैं।
सकारात्मक दृष्टिकोण और आत्म-विश्वास
जब घर या समाज में कोई एक-दो लोग हमें बुरा कहते हैं, तो हम अक्सर यह सोचने लगते हैं कि जैसे हम ही दुनिया में सबसे बुरे व्यक्ति हो गए हैं। किंतु, क्या हम यह सोच पाते हैं कि यह तो केवल एक या दो व्यक्तियों का मत है? हमारे अनेक मित्र, शुभचिंतक और अन्य लोग तो हमें बहुत अच्छा मानते हैं और हमारे प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हैं।
इसलिए, हमें अपने विचार बदलने होंगे और अपने भीतर यह सकारात्मकता लानी होगी। मन में यह सोचना पड़ेगा कि: “कोई बुरा कहे या अच्छा, क्या फ़र्क पड़ता है?”
अच्छा कार्य करने वालों को हतोत्साहित करने के प्रयास
प्रायः अच्छे मार्ग पर चलने वाले लोगों की बुराई ईर्ष्यालु लोग अधिक करते हैं, ताकि वे अच्छाई के पथ से हट जाएँ।
- यदि वास्तविक कमी हो: यदि हमारे अंदर कोई वास्तविक बुराई है, तब तो हमें स्वयं आत्म-निरीक्षण करना चाहिए और उस कमी को सुधारने का प्रयास करना चाहिए।
- यदि केवल अच्छाई के कारण विरोध हो: किंतु, जब आप निष्कपट भाव से सबके हित के लिए श्रेष्ठ कार्य कर रहे हों और फिर भी लोग आपकी आलोचना करें, तब आप क्या करेंगे? क्या अच्छा काम करना छोड़ देंगे? या बुराई का मार्ग अपना लेंगे? बिल्कुल नहीं।
संसार में बहुत से लोग केवल इसीलिए तत्पर रहते हैं कि यदि कोई व्यक्ति अच्छा कार्य कर रहा है, तो उसे कैसे बाधित या परेशान किया जाए। किसी भी श्रेष्ठ व्यक्ति को उसके लक्ष्य से भटकाने का सबसे आसान तरीका यह है कि उसकी आलोचना और बुराई शुरू कर दी जाए।
आजकल तो सोशल मीडिया और मैसेजिंग ऐप्स के माध्यम से किसी के भी विरुद्ध झूठी बातें फैलाना बहुत आसान हो गया है। यदि कोई व्यक्ति इन बातों के चक्कर में आ जाता है और यह सोचने लगता है कि: “मेरी इतनी आलोचना हो रही है, इतने संदेश फैलाए जा रहे हैं…” तो उसका मनोबल (confidence) टूट जाता है। मनोबल गिरते ही वह अपने उज्ज्वल भविष्य के लिए जो योजनाएँ बना रहा था, उन्हें कार्यान्वित नहीं कर पाता। विरोधी लोगों का उद्देश्य भी यही होता है कि आपकी प्रगति में बाधा उत्पन्न की जाए।
लक्ष्य-निष्ठ व्यक्ति और समभाव के दृष्टांत
यदि आप जीवन में ऊँचा उठना चाहते हैं और कुछ सार्थक करना चाहते हैं, तो यह बात सदैव मानकर चलिए कि राह में आलोचनाएँ और विघ्न आएँगे ही। जो व्यक्ति इस यथार्थ को स्वीकार कर लेता है और अपनी दृष्टि केवल अपने लक्ष्य पर रखता है, वह ऐसी बाधाओं से कभी नहीं डरता।
इसे इस प्रसिद्ध दृष्टांत से समझा जा सकता है: जब मार्ग पर हाथी अपनी मस्त चाल में चलता है, तो कुत्ते भोंकते रहते हैं। यह कुत्तों का स्वभाव है। किंतु, यदि हाथी उनसे उलझने लगे या मार्ग बदल दे, तो उसके स्वाभिमान का क्या होगा? हाथी अपनी ही धुन में, अपनी सूंड लहराते हुए आगे बढ़ता जाता है। वह भोंकने वालों से प्रभावित होकर अपना मार्ग नहीं छोड़ता।
इसी प्रकार, यह उदाहरण किसी का अपमान करने के लिए नहीं, बल्कि यह समझाने के लिए है कि श्रेष्ठ मार्ग पर बढ़ते समय हमें अपनी मानसिक स्थिति को अचल रखना चाहिए।
सद्भाव और निरंतरता की शक्ति
धुआँ निकलना जिस प्रकार अग्नि की स्वाभाविक प्रवृत्ति से जुड़ा है, उसी प्रकार समाज में अच्छाई के साथ-साथ आलोचना का होना भी स्वाभाविक है। यहाँ तक कि एक श्रेष्ठ व्यक्ति के भीतर भी कोई न कोई मानवीय कमी हो सकती है। किंतु, यदि वह भला इंसान निरंतर निष्कपट भाव से शुभ कार्य करता रहे, तो उसकी आलोचना करने वाले लोग स्वयं समय के साथ अपनी भूल समझ जाते हैं और एक दिन वही लोग उसकी प्रशंसा करने लगते हैं।
सफलता की राह और मानसिक परिपक्वता
सफलता की ओर बढ़ते समय हमारे साथ जुड़े लोग कैसा व्यवहार करते हैं, उससे निपटने के लिए हमारी मानसिकता क्या होनी चाहिए—यह समझना अत्यंत आवश्यक है।
अक्सर कहा जाता है: “कोई बुरा कहे या अच्छा, चिंता मत करो (Don’t mind it)।” किंतु इसका वास्तविक अर्थ क्या है?
निंदा और प्रशंसा का सूत्र: यदि आप प्रशंसा से प्रभावित होते हैं, तो निश्चित रूप से आपको निंदा से भी फ़र्क पड़ेगा। किंतु, यदि आपको अपनी प्रशंसा से कोई फ़र्क नहीं पड़ता, तो दूसरों की निंदा आपके लिए निरर्थक हो जाती है।
जब आपके भीतर यह भाव आ जाता है कि: “मैं जो कर रहा हूँ, सही और श्रेष्ठ उद्देश्य से कर रहा हूँ। यदि लोग अभी इसे नहीं समझ पा रहे हैं, तो सफलता मिलने पर स्वतः समझ जाएँगे,”—तभी आप जीवन में निर्भीक होकर आगे बढ़ सकते हैं। अन्यथा, व्यक्ति अपने-अपने क्षेत्र और पेशे में उलझकर केवल परेशान ही होता रहेगा।
लाखों वर्षों तक जीऊं या मृत्यु आज ही आ जावे
जीवन और मृत्यु में समभाव
चाहे लाखों वर्षों की लंबी आयु मिले या आज ही जीवन का अंत हो जाए, दोनों ही स्थितियों में मुझे स्थिर और समभाव में रहना है। अपने न्याय और धर्म के मार्ग से एक कदम भी विचलित नहीं होना है।
अक्सर व्यक्ति दो तरह की सोच में पड़कर धर्म मार्ग छोड़ देता है:
- दीर्घायु का भय: “अरे! अभी तो लाखों वर्षों तक जीना है, इतने लंबे समय तक कठिन नियमों का पालन कैसे कर पाऊँगा?”—ऐसा सोचकर व्यक्ति साधना के पथ से डिग जाता है।
- आसन्न मृत्यु का मोह: “जब आज ही मरना है, तो अंतिम क्षणों में जो मन आए वह भोग भोग लूँ, आनंद कर लूँ!”—ऐसा सोचकर व्यक्ति संयम और न्याय के मार्ग से पतित हो जाता है।
इसीलिए कवि प्रभु से यही शक्ति माँगते हैं कि ऐसी दोनों परिस्थितियों में मैं अपने विवेक और न्याय-मार्ग पर अडिग रहूँ। जीवन और मृत्यु, दोनों ही मुझे समभाव से सहर्ष स्वीकार हों।
सल्लेखना और आत्म-दृढ़ता
- यदि लाखों वर्षों का जीवन मिले: तो मैं उस संपूर्ण आयु को सत्य, न्याय और धर्ममय आचरण के साथ व्यतीत करने के लिए तैयार हूँ।
- यदि आज ही मृत्यु आ जाए: तो मैं बिना किसी भय, संताप या संक्लेश के, सल्लेखना (समाधिमरण) और प्रभु-स्मरण पूर्वक इस देह का त्याग करने के लिए सहर्ष तैयार हूँ।
परिस्थिति चाहे जीवन की हो या मरण की, किंतु अपने सत्य और धर्म के मार्ग को छोड़ने का विचार भी मन में कभी नहीं आना चाहिए। इतनी परम दृढ़ता और आत्म-विश्वास के साथ ही मुमुक्षु जीव मोक्ष और धर्म के मार्ग पर अग्रसर होता है।
जीवन का स्वर्णिम सूत्र: ज्ञान और साधना का संतुलन
कविवर पंडित जी के इस संदेश को जीवन में उतारने के लिए एक अत्यंत प्रेरणादायी और सुंदर सूक्ति (कोटेशन) सदैव अपने पास लिखकर रखनी चाहिए:
“जीवन में इतना सीखें, जैसे जीवन अनंत हो। और जीवन जिएं ऐसे, जैसे आज ही अंत हो॥”
यह सूक्ति ‘मेरी भावना’ की उसी पंक्ति—“लाखों वर्षों तक जीऊं या मृत्यु आज ही आ जावे”—का व्यावहारिक और मर्मस्पर्शी सार प्रस्तुत करती है।
प्रतिस्पर्धा और आत्मनिर्भरता का मार्ग
आज हर क्षेत्र में अत्यधिक प्रतिस्पर्धा और भीड़ है। यह सोचकर कभी मत चलिए कि इस भीड़ में लोग आपके लिए स्वयं रास्ता छोड़ देंगे या पलक-पावड़े बिछाकर आपको आगे बढ़ाएँगे। चाहे पारिवारिक जीवन हो, नौकरी हो, व्यवसाय हो या सी.ए. (CA), एम.बी.ए. (MBA) जैसे पेशेवर पाठ्यक्रम हों—हर स्थान पर आपको दो तरह के लोग मिलेंगे:
- कुछ लोग जो आपके प्रशंसक और सहयोगी होंगे।
- कुछ लोग जो आपकी टाँग खींचेंगे, आप पर आरोप लगाएँगे और आपको पीछे धकेलने का प्रयास करेंगे।
ऐसे समय में विकल्प आपका अपना है: क्या आप इन विघ्नों से परेशान होकर रुक जाना चाहते हैं, या साहस रखकर आगे बढ़ना चाहते हैं? इस भीड़ भरी दुनिया में कोई किसी को सहज ही मार्ग नहीं देता; यदि आपमें क्षमता और सामर्थ्य है, तो आपको अपना मार्ग स्वयं बनाना होगा।
सहारा भी उसी व्यक्ति को दिया जाता है जिसके पैर ज़मीन पर टिके हों। जो पूरी तरह दूसरों पर आश्रित है, उसे कोई कब तक संभालेगा? अतः व्यक्ति हमेशा अपने आत्मबल, हिम्मत और आत्मविश्वास के बल पर ही ऊँचा उठता है।
जीवन की अनिश्चितता और आर्थिक जोखिम
‘मेरी भावना’ की प्रारंभिक पंक्तियाँ जीवन की अनिश्चित परिस्थितियों को दर्शाती हैं:
- कोई आपकी प्रशंसा करे या निंदा,
- धन-वैभव (लक्ष्मी) आए या चला जाए,
- जीवन लंबा हो या मृत्यु आज ही आ जाए,
- कोई भय दिखाए या लालच दे…
ये सभी बाह्य परिस्थितियाँ हैं, जो घटित हो सकती हैं। किंतु, सबसे महत्वपूर्ण संदेश इसकी अंतिम पंक्ति में निहित है—“तो भी न्याय मार्ग से मेरे कभी न पद डिगने पावे।” परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी प्रतिकूल क्यों न हों, हमें अपने सत्य, नीति और न्याय के मार्ग से कभी विचलित नहीं होना चाहिए।
जीवन में परिस्थितियाँ पलभर में बदल सकती हैं। व्यापार या निवेश में अनिश्चितता सदैव बनी रहती है—चाहे आपने शेयर बाज़ार में पैसा लगाया हो या किसी अन्य व्यवसाय में। कभी बड़ा लाभ हो सकता है, तो कभी अप्रत्याशित घाटा।
अनेक बार लोग बिना सोचे-समझे किसी साथी के साथ अनाधिकृत या अनैतिक लेन-देन (दो नंबर का काम) कर बैठते हैं। यदि अनहोनी से उस साझेदार को कुछ हो जाए, तो पूरी पूँजी डूब जाती है।
यही स्थिति स्वास्थ्य और जीवन की भी है। मनुष्य वर्षों आगे की योजनाएँ बनाता है, किंतु महामारी (जैसे कोरोना) या कोई असाध्य बीमारी अचानक आ खड़ी होती है। 8-10 दिन से लगातार बुखार आए और नियंत्रण में न हो, तो जीवन और मृत्यु के बीच की रेखा बहुत बारीक हो जाती है। ऐसी स्थिति में जीवन बच भी सकता है और समाप्त भी हो सकता है—दोनों ही संभावनाएँ बनी रहती हैं।
भय और लालच का चक्रव्यूह
“अथवा कोई कैसा ही भय या लालच देने आवे।”
जब हम किसी गलत मार्ग का चयन करते हैं, तो हमारे भीतर दो ही मुख्य विकार उत्पन्न होते हैं—भय या लालच। यदि व्यक्ति किसी के बहकावे में आकर अत्यधिक लालच में पड़ जाता है, तो अंततः वह लालच ही उसके भीतर गहरे भय को जन्म देता है।
जब कोई हमें बड़े-बड़े सपने दिखाकर बड़ी योजनाओं में सब कुछ दांव पर लगवा देता है, और उसके बाद हमारी रातों की नींद उड़ जाए, दिन की भूख-प्यास खत्म हो जाए, तो समझ लेना चाहिए कि हम गलत राह पर हैं।
यदि किसी काम को करने से मन में लगातार यह डर बना रहे कि: “यदि पैसा डूब गया तो क्या होगा? यदि भारी नुकसान हो गया तो क्या होगा?”—तो यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि हम न्याय और धर्म के मार्ग पर नहीं चल रहे हैं। ऐसा अनियंत्रित भय व्यक्ति को मानसिक रूप से खोखला कर देता है।
संसार में अनेक बार व्यक्ति को डराया जाता है या भांति-भांति के प्रलोभन दिए जाते हैं। कोई कह सकता है कि “हमारे पास आओ, हम इस तंत्र-मंत्र या देवी-देवता के माध्यम से तुम्हारे सारे अटके कार्य सिद्ध कर देंगे,” अथवा कोई अनैतिक मार्ग से शीघ्र धनवान बनने का लालच दे सकता है। दूसरी ओर, कोई डरा भी सकता है कि “यदि तुमने यह बात नहीं मानी या इस रास्ते पर चले, तो तुम्हें इसका भारी दुष्परिणाम भोगना पड़ेगा।”
ऐसी विषम परिस्थितियों में भी धर्मनिष्ठ व्यक्ति का उत्तर यही होना चाहिए: “परिणाम चाहे जो हो, मैं न्याय और धर्म के मार्ग से एक कदम भी पीछे नहीं हटूंगा।”
जब व्यक्ति सत्य के पथ पर दृढ़ता से आगे बढ़ता है, तो उसे पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहिए। जैसे कहा भी जाता है— “लगन तुमसे लगा बैठे, जो होगा देखा जाएगा।” अर्थात् जब परमात्मा और धर्म के सत्य स्वरूप से लौ लग गई है, तो फिर संसार के भय या लालच से डरकर पैर (पग) डगमगाने नहीं चाहिए।
“सब दिन और सबके दिन एक से नहीं होते”
जीवन का एक बहुत बड़ा सूत्र-वाक्य (महामंत्र) सदैव स्मरण रखना चाहिए: “सब दिन और सबके दिन एक समान नहीं होते।”
- वर्तमान का उपयोग: यदि आज हमारा मन धर्म, स्वाध्याय और शुभ कार्यों में लग रहा है, तो आज ही उसे कर लेना चाहिए; क्योंकि कल का कोई भरोसा नहीं है।
- कल का भ्रम: प्रायः लोग सोचते हैं कि “अभी तो उम्र पड़ी है, बुढ़ापा आने पर धर्म-ध्यान कर लेंगे।” किंतु बुढ़ापा किसने देखा है?
जब तक शरीर के सभी अंग-उपांग (इंद्रियाँ) भली-भांति कार्य कर रहे हैं, कान सुन पा रहे हैं, आँखें देख पा रही हैं और बुद्धि में जिनवाणी के मनन-चिंतन का विवेक जग रहा है—तभी तक धर्म साधना का स्वर्णिम अवसर है। कल यदि कोई असाध्य बीमारी आ गई या पारिवारिक परिस्थितियाँ प्रतिकूल हो गईं, तो मन और उपयोग बदलते देर नहीं लगती।
ज्ञानार्जन ऐसे करें जैसे जीवन अनंत हो
हमे अपने जीवन को इतना व्यवस्थित, अनुशासित और ज्ञानवान बनाना चाहिए कि मानों हमारे पास अनंत काल का समय है।
- विवेक और विद्या का संचय: हमें निरंतर सीखते रहना चाहिए ताकि विद्या, ज्ञान और विवेक के बल पर हम स्वयं को और अपने धर्म-मार्ग को सदा सुरक्षित रख सकें।
- दीर्घकालिक तैयारी: ज्ञान का अर्जन इस गहराई से होना चाहिए कि लाखों वर्षों की आयु भी मिले, तो वह सम्यक् ज्ञान हमें कभी पथभ्रष्ट न होने दे।
जीवन ऐसे जिएं जैसे आज ही अंतिम दिन हो
जीवन जीने की शैली ऐसी होनी चाहिए मानों आज ही इस देह का अंतिम दिन है। जब मनुष्य यह मानकर चलता है कि आज का दिन अंतिम हो सकता है, तो उसका पूरा दृष्टिकोण बदल जाता है:
- समभाव और क्षमावाणी: मरणकाल के अंतिम क्षणों का इंतज़ार किए बिना, हमें आज ही सबसे क्षमा-भाव धारण कर लेना चाहिए। मन में किसी के प्रति बैर, ईर्ष्या या ग्रंथि नहीं रखनी चाहिए।
- मधुर व्यवहार और संवाद: आज जो भी लोग हमसे मिलें, उनके साथ हमारे भाव, संवाद और व्यवहार अत्यंत पवित्र, सहृदय और प्रेमपूर्ण होने चाहिए; क्योंकि कल का कोई भरोसा नहीं कि कौन रहेगा और कौन नहीं।
- तत्परता: जीवन की समराइजिंग (समीक्षा) और शुभ कार्यों को टालने के बजाय ‘आज और अभी’ ही पूरा कर लेना चाहिए।
तो भी न्याय मार्ग से मेरे कभी न पद डिगने पावे
‘न्याय मार्ग’ का वास्तविक अर्थ और आत्म-संतोष
जब मन में यह बोध जागृत हो जाता है, तो फिर मरण का भय समाप्त हो जाता है और व्यक्ति न्याय के मार्ग से कभी नहीं डिगता। हमें अपने अंतर्मन में यह दृढ संकल्प करना चाहिए:
“रास्ता तो यही है—अहिंसा, सत्य, न्याय और धर्म का। आज नहीं तो कभी नहीं, अभी नहीं तो कभी नहीं!”
संसार के समस्त जीवों को अंततः शांति और मुक्ति के लिए इसी सत्य एवं न्याय के मार्ग पर लौटकर आना होगा। यह हमारा परम सौभाग्य है कि हम आज इस मार्ग को पहचान पाए हैं।
अतः अब परिस्थितियाँ चाहे जैसी भी हों—भय हो, प्रलोभन हो, संकट हो या शारीरिक कष्ट हो—मैं उन सभी को सहने की आत्म-शक्ति विकसित करूँ, किंतु इस धर्म-मार्ग से कभी पीछे न हटूँ। मैं परम दृढ़ता के साथ इसी सन्मार्ग का अनुसरण करता रहूँ।
न्याय मार्ग का अर्थ है:
- नैतिकता और नीतिबद्धता: ईमानदारी और न्यायसंगत तरीके से आजीविका कमाना।
- सीमित जोखिम और शांति: भले ही धन थोड़ा कम मिले, लेकिन वह शांति और संतोष देने वाला हो। न किसी से अत्यधिक अनुचित लेन-देन हो, और न ही इतनी अधिक उधारी हो कि हर समय डूबने का संशय बना रहे।
- मानसिक सुकून: दिनभर की मेहनत के बाद व्यक्ति घर आकर परिवार के साथ शांति से बैठकर भोजन कर सके, सहज भाव से बातचीत कर सके और रात को गहरी-निश्चिंत नींद सो सके।
धर्म, अर्थ और न्यायसंगत आजीविका
यदि आप धर्म पुरुषार्थ को ध्यान में रखते हुए अर्थ पुरुषार्थ (धनार्जन) करेंगे और आपके विचारों में न्याय का भाव रहेगा, तो आपको जीवन में कोई विचलित नहीं कर पाएगा।
अनेक विवेकशील व्यक्ति कहते हैं: “महाराज! हम थोड़े में ही संतुष्ट हैं। हमें न तो अनावृत रूप से किसी से उधार लेना है और न देना है। जितनी हमारी सामर्थ्य है, हम उसी के भीतर रहते हैं।”
इसी विचार से वह प्रसिद्ध लोकोक्ति बनी है:
“जितनी चादर हो, उतने ही पैर पसारो।”
यह केवल सोने का नियम नहीं, बल्कि जीवन जीने की शैली है। जीवन में इतना संतोष और संतुलन होना आवश्यक है कि बाद में मन में यह संशय और तनाव न बने कि “यदि कुछ अनहोनी हो गई, तो क्या होगा?”
दिखावे का जाल और ऋण (लोन) का संकट
आजकल समाज में अपनी प्रतिष्ठा (reputation) और लाइफस्टाइल दिखाने के लिए लोग अत्यधिक कर्ज़ ले लेते हैं। उदाहरण के लिए, किसी युवा को नौकरी मिली और ₹5-10 लाख का पैकेज तय हुआ। उत्साह में आकर उसने बिना भविष्य का विचार किए महंगे लोन ले लिए, कि अगले कुछ महीनों या वर्षों में सब चुकता हो जाएगा।
किंतु, यदि अचानक कंपनी में छंटनी हो जाए, व्यवसाय में मंदी आ जाए या आय का साधन बंद हो जाए, तो व्यक्ति भारी संकट में फँस जाता है।
आज कई लोग केवल लोन के सहारे अपना कृत्रिम स्टेटस बनाए हुए हैं। किंतु, बैंक या वित्तीय संस्थाएँ तो अंततः अपना पैसा वापस लेंगी ही। यदि सही समय पर प्रबंधन न हो पाए, तो स्थिति अत्यंत दयनीय हो जाती है।
सादगी और आत्म-संतोष में ही वास्तविक सुख
इसलिए कहा जाता है कि घर पर थोड़ी सादी या सूखी रोटी भी शांति से खा लेना बेहतर है, बजाय इसके कि अत्यधिक लिप्तता या लालच में पड़कर भारी नुकसान उठाना पड़े। सूखी रोटी खाकर भी व्यक्ति चैन की नींद सो सकता है।
जब घर का एक सदस्य अत्यधिक कर्ज़ या अनैतिक लेन-देन के कारण तनाव में आता है, तो पूरा परिवार मानसिक और आर्थिक रूप से व्यथित होता है। यदि आज समाज का सर्वेक्षण किया जाए, तो हर पाँच में से एक व्यक्ति इस अनुचित जोखिम और कर्ज़ के तनाव से जूझता हुआ मिल जाएगा।
जोखिम (Risk) और अपनी क्षमता का आकलन
आजकल युवाओं को यह सिखाया जाता है कि “बड़ा सोचो और बड़ा रिस्क (Risk) लो; रिस्क लेने वाले ही साहसी होते हैं।”
जोखिम लेना अपनी जगह ठीक हो सकता है, लेकिन सबसे पहले व्यक्ति को स्वयं से यह पूछना चाहिए: “क्या मेरे मन में और मेरी परिस्थितियों में उस जोखिम को झेलने का सामर्थ्य है?” केवल बातों से या दूसरों की देखा-देखी जीवन नहीं चलता; विषम परिस्थितियों को सँभालने की क्षमता भी होनी चाहिए।
जब व्यक्ति अपनी क्षमता से अधिक भार अपने सिर पर ले लेता है और रात-दिन तनाव में रहता है, तो उसका प्रभाव मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। अवसाद (depression), हृदयघात (heart attack) और यहाँ तक कि आत्महत्या जैसी दुखद घटनाओं के पीछे अक्सर यही अत्यधिक तनाव और अनियंत्रित कर्ज़ का बोझ होता है।
शरीर के साथ अतिशयता और स्वास्थ्य का संतुलन
अक्सर हम अपने शरीर की क्षमताओं से अधिक उस पर दबाव डालते हैं। कई बार शरीर हमारी गलतियों और तनाव को सह लेता है और दो-चार दिनों में स्वतः ठीक हो जाता है। किंतु यदि हम लगातार शरीर और मन के साथ अन्याय करते रहें, तो एक दिन उसकी सहनशक्ति समाप्त हो जाती है और वह गंभीर व्याधियों से ग्रस्त हो जाता है।
अतः यदि किसी दिन आपकी नींद उड़ जाए या मन अत्यधिक बेचैन हो, तो रुककर विचार करें कि ऐसा क्यों हो रहा है। उस मानसिक दबाव के जाल से तुरंत बाहर निकलने का प्रयास करें।
पूर्ण और स्वस्थ जीवन जीने के दो मूलभूत आधार हैं:
- समय पर उचित भूख लगना।
- समय पर गहरी नींद आना।
आयुर्वेद का भी यही शाश्वत सिद्धांत है:
“अर्ध रोग हरी निद्रा, सर्व रोग हरी क्षुधा।”
अर्थात् यदि आपको पर्याप्त और गहरी नींद आती है, तो आपके आधे रोग तो सोने मात्र से दूर हो जाते हैं। और यदि समय पर स्वाभाविक भूख लगती है व सात्विक भोजन प्राप्त होता है, तो शरीर के समस्त विकार नष्ट हो जाते हैं। जब हम इन प्राकृतिक नियमों को तोड़ते हैं, तो हमारा पूरा जीवन असंतुलित हो जाता है।
न्याय मार्ग का दायरा और सीमित जोखिम (Risk)
न्याय मार्ग केवल नैतिकता तक सीमित नहीं है, यह जीवन शैली का नियम है:
- भोजन में लालच करके अत्यधिक खा लेना भी शरीर के प्रति अन्याय है।
- धन और व्यापार के लालच में आकर क्षमता से अधिक जोखिम ले लेना भी मन और आत्मा के प्रति अन्याय है।
जितना हमारे और हमारे परिवार के सुचारू संचालन के लिए आवश्यक और न्यायसंगत है, उतना पुरुषार्थ करना न्याय है। किंतु लालच में आकर मर्यादा से बाहर चले जाना ही अन्याय और अशांति की शुरुआत है।
विवेकपूर्ण जोखिम (Risk Management) का नियम
जीवन या व्यापार में जोखिम (Risk) केवल तभी लेना चाहिए जब आपके पास बैकअप (Option B) उपलब्ध हो।
- सही जोखिम का सिद्धांत: यदि आप किसी योजना में असफल भी हो जाएँ, तो आपके पास जीविका चलाने के अन्य विकल्प होने चाहिए ताकि आपका जीवन और मानसिक संतुलन प्रभावित न हो। यदि सफलता मिली तो बहुत अच्छा, और न मिली तो भी आपके पास सँभलने का आधार है।
- गलत जोखिम: सब कुछ दांव पर लगा देना, जहाँ असफलता का अर्थ सर्वस्व विनाश या जीवनलीला समाप्त होना हो—यह साहस नहीं, बल्कि अविवेक है।
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