नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 70- shlok 72 to 83
श्लोक ( Shlok ) 72
जीवितान्ते स संन्यस्य कल्पे सौधर्मनामनि । जातश्चित्राङ्गदो देवः प्रवीचारसुखाकरः ॥ ७२ ॥
आयुके अन्तमें संन्यास मरण कर वह प्रथम सौधर्म स्वर्ग में प्रवीचारकी खान स्वरूप चित्राङ्गद नामका देव हुआ ।। ७२ ।।
“At the end of his lifespan, he took Sannyasa (renunciation) and, upon passing away, became a celestial being (deva) named Chitrāngada in the first Saudharma Heaven, which is the very source of sensory enjoyment.”72
श्लोक ( Shlok ) 73
स श्रेष्ठी वनमाला च धर्मसिंहतपोभृते । दत्वा प्रासुकमाहारं निन्दित्वा निजदुष्कृतम् ॥ ७३ ॥
इधर सुमुख सेठ और वनमालाने भी किसी दिन धर्मसिंह नामक मुनिराजके लिए प्रासुक आहार देकर अपने पापकी निन्दा की ॥ ७३ ॥
“Meanwhile, on a certain day, Seth Sumukha and Vanamala also offered pure, acceptable food (Prasuk Ahara) to a holy monk named Dharmasimha, and deeply repented for their past sins.”73
श्लोक ( Shlok ) 74 – 77
अन्येद्युरशनेः पातात्संप्राप्य मरणं समम् । भरते हरिवर्षाख्ये देशे भोगपुरेशिनः ॥ ७४ ॥” प्रभञ्जनाख्यनृपतेर्मृकण्ड्वाख्या मनोरमा । हरिवंशेऽजनि श्रेष्ठी सिंहकेतुस्तयोः सुतः ॥ ७५ ॥’वस्वालयपुराधीशो वज्रचापमहीपतेः । तत्र वासी सुभामाश्च वनमालानुरूपिणी ॥ ७६ ॥विद्युन्मालेति भूत्वा तुक् विद्युदुद्योतहासिनी । आपूर्णयौवनस्यासीत्सिहकेतोः रतिप्रदा ॥ ७७ ॥
दूसरे ही दिन वज्रके गिरनेसे उन दोनोंकी साथ ही साथ मृत्यु हो गई। उनमेंसे सुमुखका जीव तो भरत क्षेत्रके हरिवर्ष नामक देशमें भोगपुर नगरके स्वामी हरिवंशीय राजा प्रभञ्जनकी मृकण्डु नामकी रानीसे सिंहकेतु नामका पुत्र हुआ और वनमालाका जीव उसी हरिवर्ष देशमें वस्वालय नगरके स्वामी राजा वज्रचाप की सुभा नामकी रानीसे बिजलीकी कान्तिको तिरस्कृत करनेवाली विद्युन्माला नामकी पुत्री हुई सिंहकेतुके पूर्ण यौवन होनेपर उसकी स्त्री हुई ।। ७४-७७ ॥
“On the very next day, both of them died together due to a sudden lightning strike. Among them, the soul of Sumukha was reborn in the Harivarsha country of the Bharata region as Simhaketu, the son of Queen Mrikandu and the Harivansh dynasty King Prabhanjana of Bhogapura city.
Meanwhile, the soul of Vanamala was reborn in that same Harivarsha country as Vidyunmala—a daughter whose radiant beauty eclipsed the brilliance of lightning—born to Queen Subha and King Vajrachapa of Vasvalaya city. When Simhaketu reached full youth, she became his wife.” 74 – 77
श्लोक ( Shlok ) 78
जातु तौ दम्पती ध्ष्ट्वा देवे विहरणे वने । चित्राङ्गन्दै समुद्धृत्य हनिष्यामीति गच्छति ॥ ७८ ॥
किसी दिन वन-विहार करते सः चित्राङ्गन्द देवने उन दोनों दम्पतियोंको देखा और ‘मैं इन्हें मारूँगा’ ऐसे विचारसे वह उन्हें उठा जाने लगा ।। ७८ ।।
“One day, while enjoying a stroll through the forest, the deity Chitrāngada spotted the couple. With the malicious intent, ‘I shall kill them,’ he picked them up and began to carry them away.”78
श्लोक ( Shlok ) 79 – 83
रघुः पुरातनो भूपः सुमुखस्य सखा प्रियः । अणुव्रतफलेनाभूत्कल्पे सौधर्मनामनि ॥ ७९ ॥वर्यः सूर्यप्रभो नाम वीक्ष्य चित्राङ्गदं तदा । शृणु मद्वचनं भन्द्र फलं किं तेऽनयोः मृतौ ॥ ८० ॥पापानुबन्धि कर्मेदमयुक्त’ युक्तिकारिणाम् । संसारदुमदुःखाभिधानं दुःखफलप्रदम् ।। ८१ ।।ततो मिथुनमेतत्त्वं विसृज्येत्यभ्यधान्मुहुः । श्रुत्वा तज्जातकारुण्यस्तदमुञ्चदसौ सुरः ॥ ८२ ॥तौ सम्बोध्य समाश्वास्य तयोश्चम्पापुरे वने । सुखाप्ति भाविनीं बुद्ध्वा सूर्यतेजो व्यसर्जयत् ॥ ८३ ॥
पहले जन्ममें सेठ सुमुखका प्रियमित्र राजा रघु अणुव्रतोंके फलसे सौधर्म स्वर्ग में सूर्यप्रभ नामका श्रेष्ठ देव हुआ था। वह उस समय चित्राङ्गद को देखकर कहने लगा कि ‘हे भद्र मेरे वचन सुन, इन दोनोंके मर जानेसे तुझे क्या फल मिलेगा ? यह काम पापका बन्ध करनेवा है, युक्तिपूर्वक काम करनेवालोंके अयोग्य है, संसार रूप वृक्षके दुःखरूपी दुष्ट फलका देनेवाला इसलिए तू यह जोड़ा छोड़ दे’ इस प्रकार उसने बार बार कहा। उसे सुनकर चित्राङ्गदको भी दया आ गई और उसने उन दोनोंको छोड़ दिया। तदनन्तर सूर्यप्रभ देवने उन दोनों दम्पतियोंको संबोध कर आश्वासन दिया और आगे होनेवाले सुखकी प्राप्तिका विचार कर उन्हें चम्पापुरके वनमें छोड़ दिया ।। ७९-८३ ॥
“In his previous birth, King Raghu—who was the dear friend of Seth Sumukha—had become an eminent deity named Suryaprabha in the Saudharma Heaven as a result of observing the Anuvratas (minor vows). At that moment, spotting Chitrangada, he said, ‘O gentle one, listen to my words! What will you gain by killing these two? This act will only bind you to sinful karma; it is utterly unworthy of those who act with wisdom and reason, and it yields nothing but the wicked, painful fruits of the tree of worldly existence (Samsara). Therefore, release this couple.’
He pleaded thus repeatedly. Hearing his words, Chitrangada was moved to compassion and released them both. Thereafter, the deity Suryaprabha consoled and reassured the couple and, envisioning the happiness destined for them in the future, safely left them in the forest of Champapura.”79 – 83
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नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21
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