दर्शन स्तुति – छंद 1 व 2 – अर्थ एवं व्याख्या
प्रथम छंद — पतित-पावन प्रभु की शरण
प्रभु पतित पावन मैं अपावन, चरण आयो सरन जी |
यों विरद आप निहार स्वामी, मेट जामन मरन जी ||(1)
कठिन शब्दों के अर्थ
पतित —अपवित्र या गिरे हुए।
पावन —पवित्र करने वाले।
शरण —किसी के चरणों का आश्रय प्राप्त करना।
विरद —यश या कीर्ति।
निहार —देखना।
मेट —नष्ट कर देना।
जामन —जन्म
मरण —मृत्यु।
हे प्रभु! आप पतित-पावन हैं, पतित पावन: अर्थात् आप तो पतितों को पावन बनाने वाले हैं। पतित मतलब गिरा हुआ, हीन, दीन, दुखी, दरिद्री। उसको आप क्या करने वाले हो? पतित (अर्थात् गिरे हुए) को पावन (अर्थात् पवित्र) करने वाले हो। अर्थात् अपवित्र जीवों को पवित्र करने वाले हैं। संसार में जो जीव गिर रहे हैं, भटक रहे हैं और संसार-सागर में डूबे हुए हैं, उन्हें पावन बनाने वाले आप ही हैं। मैं स्वयं अपवित्र हूँ, इसलिए आपके चरणों की शरण में आया हूँ। भक्ति में सबसे पहली भक्ति यही है कि सबसे पहले step (चरण) में आपको यह पता हो कि ‘मैं कमजोर हूँ और सामने वाला समर्थ है’।
हे भगवान! आप अपवित्र जनों को पवित्र करने वाले हैं। इसी कारण मैं आपके चरणों को अपनी शरण मानकर आपके पास आया हूँ।हे शरण को देने वाले! अर्थात् सबके लिए शरणभूत। शरण मतलब क्या होता है? शरण मतलब जिसे पाकर आत्मा कल्याण के मार्ग में लग जाए, उसे कहते हैं शरण। तो “चरण आयो शरण जी”— आप तो शरण के योग्य हैं, ऐसे मैं आपके चरणों (अर्थात् पैरों) में आया हूँ।
आपकी यह कीर्ति संसार में प्रसिद्ध है कि जो कोई जिनेंद्र भगवान के चरणों का सान्निध्य प्राप्त करता है, वह पतित से पावन और अपवित्र से पवित्र बन जाता है।
“यो विरद आप निहार स्वामी, मेट जामन मरण जी” यहाँ ‘विरद’ शब्द का अर्थ भक्त, वैभव या संपत्ति से है।
- पहला अर्थ: हे भगवान! आप अपना भक्त मुझे जानकर— “यो विरद आप निहार स्वामी” (निहार मतलब देखकर)— हे स्वामी! मेरे जन्म और मरण को मिटा दीजिए। इस प्रकार आपका भक्त मुझे देखकर/जानकर, हे स्वामी! मेरे जन्म-मरण को मिटा दीजिए।
- दूसरा अर्थ: “यो विरद…” इस प्रकार आपका वैभव देखकर। कैसा है आपका वैभव? जो अपवित्र (पतित) को पावन बनाने वाला है। ऐसा आपका वैभव देखकर, हे स्वामी! मैं अपने जन्म-मरण को मिटाने के लिए आपके चरण-शरण में आ गया हूँ।
आपकी इसी यश-कीर्ति को देखकर मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि मेरे जन्म-मरण के दुःख का विनाश कर दीजिए। संसार में जन्म और मरण का चक्र ही सबसे बड़ा दुःख है। इसी के कारण जीव निरंतर संसार में परिभ्रमण करता रहता है। अतः हे प्रभु! मेरे जन्म-मरण के इस रोग को नष्ट कर मुझे संसार-भ्रमण से मुक्त होने का मार्ग प्रदान कीजिए।
तो सबसे पहले क्या करना? मंदिर में जाकर—आज तो हमें क्या करना है? शांतिधारा करनी है। किसके लिए? ‘पेपर है ना, इसलिए।’ नहीं! जीवन के पेपर में एक बार पास होने के लिए कभी शांतिधारा करा के देखो, अलौकिक आनंद आएगा। एक बार भगवान की भक्ति, जीवन की परीक्षा, जन्म-मरण… अरे! किसी को बुखार आ गया तो आप बोलते हो, “हे प्रभु! रोग निवारणार्थ शांतिधारा करोमि।” ठीक है, पर एक बार भी भगवान को बोला कि ‘मेरे जन्म-मरण रूपी रोग नष्ट हो जाएँ, इसलिए मैं शांतिधारा या अभिषेक करता हूँ’?
तो यह कितनी सुंदर पंक्तियाँ हमारे सामने दे रहे हैं! हमें यह सिखला रहे हैं कि मंदिर में जाओ तो सबसे पहले यह महसूस करो—’मैं कमजोर हूँ, सामने वाला शक्तिशाली है। मैं अतीत हूँ, वह मेरा भविष्य हैं।’ उनको देखते ही भगवान से कहो—”हे प्रभु! आज ये आँखें धन्य-धन्य हो गईं।” कैसी धन्य हुई हैं? यह आँखें कह रही हैं कि: “हे प्रभु! जो आपका अतीत है, वह मेरा वर्तमान है; और जो आपका वर्तमान है, वह मेरा भविष्य हो।”
याद करो इस पंक्ति को, लिख लो अपने पास और जीवन-पर्यंत इस पंक्ति को गुनगुनाओ! जब-जब तीर्थों की वंदना करो, जब-जब मुनिराजों की वंदना करो, जब-जब जिनालय में भगवंत (अरिहंतों) की वंदना करो, इस पंक्ति को स्मरण में लाओ कि—”हे प्रभु! जो आज आपका वर्तमान है, वह मेरा भविष्य हो।” बस, और मेरी कोई प्रार्थना नहीं है।
तुम न पिछान्यो आन मान्यो, देव विविध प्रकार जी |
या बुद्धि सेती निज ना जान्यो, भ्रम गिन्यो हितकार जी ||(2)
कठिन शब्दों के अर्थ
पहिचान —पहचानना।
आन —अन्य या दूसरे।
मान्या —माना।
विविध —अनेक प्रकार के।
बुद्धि सेती —बुद्धि के कारण।
निज —अपना, अर्थात् आत्मा।
भ्रम —सही और गलत के संबंध में विपरीत धारणा।
हित —अपना कल्याण या आत्मा का हित।
हे प्रभु, “तुम न पिछान्यो“—पिछान मतलब पहचानना। हे भगवान! आज तक मैं अज्ञानी रहा, आज तक मैंने आपको नहीं पहचाना। ना आपका स्वरूप जान सका, ना आपके जीवन की वास्तविकता जान सका। आन मान्या“—दूसरों को मानता रहा (आन मतलब दूसरा, मान्या मतलब मानता रहा)। किनको? “देव विविध प्रकार जी”—संसार में जो अनेक (विविध मतलब अनेक-अनेक) प्रकार के देवी-देवता हैं, मैं इनको ही मनाता रहा। संसार में अनेक प्रकार के अन्य देवी-देवताओं को ही देव मानता रहा और आपकी वास्तविक पहचान नहीं कर पाया।
“या बुद्धि सेती निज ना जान्यो”—हे भगवान! इस बुद्धि सेती (सेती मतलब से), इस बुद्धि से निज न जान्य—जो ऊपर कही गई बुद्धि है, जिसने तुमको नहीं पहचाना भगवान, और अन्य देवी-देवताओं को मानती रही, वह बुद्धि आज तक अपने आप को नहीं जान पाई। मेरी बुद्धि में सही और गलत का निश्चय नहीं था। इसी भ्रम के कारण मैं अपने आत्मस्वरूप को भी नहीं पहचान पाया और जिन बातों को अपना हितकारी समझता रहा, वास्तव में वे मेरे आत्मकल्याण का कारण नहीं थीं।
जैन दर्शन के अनुसार सच्चे देव वे हैं जिनमें वीतरागता, सर्वज्ञता और हितोपदेशिता जैसे गुण विद्यमान हों। ऐसे वीतराग सर्वज्ञ जिनेंद्र भगवान ही सच्चे देव हैं। इनके अतिरिक्त संसार में भटकने वाले रागी-द्वेषी देवी-देवताओं को सच्चा देव मानना मिथ्या मान्यता है।
यदि हम संसार से पार होना चाहते हैं, तो मिथ्या देवों की मान्यता को छोड़कर सच्चे देव के स्वरूप को समझना आवश्यक है। भगवान जिनेंद्र के दर्शन और स्तुति करते समय हमारे भीतर यह भाव जागना चाहिए कि अब तक हम मिथ्या मान्यताओं के कारण भटकते रहे, परंतु अब हमने सच्चे देव को पहचान लिया है।
जैन कुल में जन्म लेना मात्र पर्याप्त नहीं है। अपने जैन कुलाचार, देव-दर्शन और जिनेंद्र भगवान के स्वरूप को समझना भी आवश्यक है। सच्चे देव के स्वरूप को समझने से हमें सही मार्ग का ज्ञान होता है और हम उस मार्ग पर आगे बढ़ सकते हैं।
इस पाठ का उद्देश्य भी यही है कि हम संसार के परिभ्रमण से मुक्त होने का मार्ग समझें, मिथ्या मान्यताओं से हटें, सच्चे देव के स्वरूप को पहचानें और जिनधर्म के वास्तविक मार्ग पर आगे बढ़ें।
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