दर्शन स्तुति – छंद 6 से 8 – अर्थ एवं व्याख्या
मिट गयो तिमिर मिथ्यात मेरो, उदय रवि आतम भयो |
मो उर हरष ऐसो भयो, मनु रंक चिंतामणि लयो ||(6)
कठिन शब्दों के अर्थ
तिमिर का अर्थ है—अंधकार।
मिथ्यात्व का अर्थ है—विपरीत श्रद्धा या गलत मान्यता।
रवि का अर्थ है—सूर्य।
उर का अर्थ है—हृदय।
हर्ष का अर्थ है—आनंद या प्रसन्नता।
रंक का अर्थ है—गरीब या भिखारी।
चिंतामणि एक ऐसे रत्न की कल्पना है जिसके विषय में माना जाता है कि उससे इच्छित वस्तु की प्राप्ति हो सकती है।
मिट गयो तिमिर मिथ्यात्व मेरो: मिट गया (अर्थात् समाप्त हो गया) तिमिर (अर्थात् अंधकार)। कौन-सा अंधकार? मिथ्यात्व रूपी अंधकार! हे प्रभु! आपके इस दिव्य और अलौकिक स्वरूप का दर्शन करके मेरा मिथ्यात्व समाप्त हो गया—बुरे विचार और गलत धारणाएँ धीरे-धीरे नष्ट हो गईं। हे भगवान! आपके दर्शन करने से मेरे भीतर का मिथ्यात्व रूपी अंधकार समाप्त हो गया। जिस प्रकार सूर्य के उदय होने पर अंधकार दूर हो जाता है, उसी प्रकार आपके दर्शन से मेरे भीतर का मिथ्या अज्ञान दूर हो गया और आत्मस्वरूप का प्रकाश प्रकट हुआ।
उदय रवि आतम भयो: और मेरी आत्मा में सम्यक् ज्ञान रूपी सूर्य का प्रकाश हो गया है! अब मुझे बाहर के उजाले की आवश्यकता नहीं है, मेरी आत्मा में ही सम्यक् ज्ञान का प्रकाश आ गया है। अनादि काल से संसार में परिभ्रमण करने का सबसे बड़ा कारण मिथ्या मान्यता है। सच्चे देव को न मानकर अन्य मिथ्या देवों को अपना हितकारी मानना भी इसी मिथ्यात्व का परिणाम है।
मुझे कैसा लग रहा है? मुझे ऐसा लग रहा है: “मो उर हरष ऐसो भयो, मानों रंक चिंतामणि लहो।” हे भगवान! जैसे जन्मों-जन्मों के किसी भिखारी को चिंतामणि रत्न मिल जाए, उसे जितना आनंद होता है, उससे कहीं ज़्यादा आनंद मुझे आज आपका दर्शन करके हो रहा है। मेरे हृदय में इतना उत्साह है, इतना हर्ष है, इतनी प्रसन्नता है, इतनी हैप्पीनेस (खुशी) है, इतना एक्साइटमेंट है, जैसे किसी जन्मों-जन्मों के भिखारी को—जिसे रोटियों के लाले पड़ रहे थे—उसे चिंतामणि रत्न मिल गया हो! चिंतामणि रत्न मतलब? जिसके सामने जो कुछ माँगोगे, वही भोग-सामग्री मिल जाएगी। मानो ‘खुल जा सिम सिम’ हो गया उसके साथ, अब तो जादू हो गया! हाँ, चिंतामणि रत्न उसको मिल गया। आपके दर्शन से मेरे हृदय में आत्मस्वरूप का प्रकाश उत्पन्न हुआ। आपके दर्शन के कारण मेरा मिथ्यात्व रूपी अंधकार समाप्त हुआ और मुझे सम्यक्त्व की प्राप्ति का मार्ग मिला।
मैं हाथ जोड़ नवाय मस्तक, वीनऊँ तुव चरन जी |
सर्वोत्कृष्ट त्रिलोकपति जिन, सुनहु तारन तरन जी ||(7)
कठिन शब्दों के अर्थ
नवाऊँ का अर्थ है—झुकाना या नमस्कार करना।
मस्तक का अर्थ है—सिर।
सर्वोत्कृष्ट का अर्थ है—सर्वश्रेष्ठ या सर्वोच्च।
त्रिलोकपति का अर्थ है—तीनों लोकों के स्वामी।
तारण का अर्थ है—दूसरों को संसार-सागर से पार उतारने वाले।
तरण का अर्थ है—स्वयं पार उतरने वाले।
मैं हाथ जोड़ि नवाऊँ मस्तक: हे भगवान! आपकी इस महिमा को देखकर मैं दोनों हाथ जोड़कर और अपना मस्तक (माथा) आपके चरणों में नवाता हूँ। जिनेंद्र भगवान का जिनालय देखते ही मेरे भव का ताप मिट गया! जहाँ से वह मंदिर पहली बार दिखा, पहली नज़र उस मंदिर से मिली, वहीं से कहो—”हे भगवन! जय हो, जय हो, जय हो!” भगवान को देखते ही दोनों हाथ जुड़ जाने चाहिए। हे भगवान! मैं आपके चरणों में हाथ जोड़कर अपना मस्तक झुकाता हूँ और विनयपूर्वक आपकी शरण ग्रहण करता हूँ।
जैसे किसी राजा-महाराजा के सामने आप जाते हैं, तो बड़ी विनम्रता और शालीनता से एक-एक कदम बढ़ाते हैं; तो ये तो तीनों लोकों के अधिपति हैं! भले ही भगवान कुछ बोल नहीं रहे हैं, मूर्ति है तो हाथ पकड़कर रोकेगी नहीं, पर भावना ऐसी लाओ जैसे साक्षात तीनों लोकों के अधिपति विराजमान हैं। जब एक छोटे से मंत्री, विधायक या कलेक्टर के सामने हम इतने अदब से पेश आते हैं, तो तीन लोक के नाथ के सामने हमें कैसे रहना चाहिए? यह शालीनता और समभाव हमें अपने अंदर विकसित करना है, तब जाकर मंदिर में सच्ची भक्ति हो पाएगी। अन्यथा क्या सोचेंगे? ‘अरे! पत्थर की मूर्ति है, हमारा क्या बिगाड़ लेगी!’ तो वह कुछ बिगाड़ेगी नहीं, तो आपको कुछ पुण्य का संचय भी नहीं होगा। पुण्य का संचय तब होगा जब उस प्रतिमा को साक्षात भगवान मानोगे।
“सर्वोत्कृष्ट त्रिलोकपति जिन…” हे भगवान! मैं हाथों को जोड़कर अपने मस्तक को झुकाता हूँ। यह उत्तमांग (मस्तक) सबके सामने नहीं झुकता, सुनो! यह अच्छे-अच्छों के सामने नहीं झुकता। दुनिया की कोई ताकत, कोई पैसा, कोई रुतबा इस मस्तक को झुका नहीं सकता! हे भगवन! आप ही हैं जो तीनों लोकों में सर्वोत्कृष्ट हैं, त्रिलोकाधिपति हैं। महान हैं और तीनों लोकों—ऊर्ध्वलोक, मध्यलोक और अधोलोक—के नाथ हैं। आपसे हमें समझ में आ गया कि इससे बड़ा कोई श्रद्धा का स्थान नहीं है, इसलिए आज मस्तक हम यहाँ झुकाने आए हैं। आप स्वयं संसार-सागर से पार हो चुके हैं और हम जैसे अनेक भव्य जीवों को भी संसार-सागर से पार उतारने वाले हैं।
और तीन-तीन बार बड़ी श्रद्धा से खड़े होकर इस प्रकार विधि की जाती है—तीन बार आवर्त करता है, तीन बार पंचांग प्रणाम/दंडवत देता है और तीन बार झुककर उन भगवान को नमस्कार करता है।
कैसे करता है? देखो, अच्छी तरह खड़े होकर इस तरह से तीन बार हाथ को घुमाता है (आवर्त करता है), फिर उसी स्थान पर बैठकर अपने मस्तक को ज़मीन से लगाकर नमस्कार करता है। फिर व्यवस्थित खड़ा होता है, फिर तीन बार हाथ को घुमाता है, फिर बैठता है और नमस्कार करता है। फिर खड़ा होता है, तीन बार हाथ घुमाता है और नमस्कार करता है।
“अरे भैया जी! इतनी कठिन वंदना है, हमारे तो पैर, घुटने, कमर कोई काम ही नहीं करते, कैसे काम होगा?”
जो भगवान की भक्ति इस व्यवस्था के साथ जीवन-पर्यंत करेगा, उसके सारे रोग अपने आप ही समाप्त हो जाएँगे! और अब रोग हो गए हैं, तो क्या करें? तो थोड़े संभलकर करें, ठीक है!
इसीलिए मैं आपके चरणों में विनम्र होकर प्रार्थना करता हूँ कि मेरी इस विनती को स्वीकार करें। आपके चरण ही मेरे लिए वास्तविक शरण हैं और आपका उपदेश ही संसार से मुक्त होने का मार्ग दिखाता है।
जाचूँ नहीं सुरवास पुनि, नर राज परिजन साथ जी |
‘बुध’ जाचहूँ तुव भक्ति भव भव, दीजिये शिवनाथ जी ||(8)
कठिन शब्दों के अर्थ
जाचू का अर्थ है—माँगता हूँ या चाहता हूँ।
सुरवास का अर्थ है—देवताओं के बीच निवास या इंद्र पद की प्राप्ति।
नरराज का अर्थ है—मनुष्यों में श्रेष्ठ, अर्थात् चक्रवर्ती आदि का पद।
परिजन का अर्थ है—परिवार के सदस्य, जैसे पुत्र, मित्र, स्त्री आदि।
भव-भव का अर्थ है—प्रत्येक भव या जन्म-जन्मांतर।
शिवनाथ का अर्थ है—मोक्ष के नाथ या मोक्ष के स्वामी।
जाचूँ नहीं सुर बास: ‘जाचूँ’ अर्थात् माँगना (याचना करना)। हे भगवान! मैं नहीं माँगता, क्या नहीं माँगता? ‘सुरबास’ अर्थात् स्वर्ग का पद, इंद्र की विभूति, देवों का वैभव या देवलोक का निवास नहीं माँगता। हे भगवान! मैं आपसे संसार की कोई सांसारिक उपलब्धि नहीं माँगता। मुझे देवताओं का निवास, इंद्र पद, राज्य-संपदा, चक्रवर्ती का वैभव या सांसारिक परिवार और संबंध नहीं चाहिए।
पुनि नर राज परिजन साथ: और न ही मनुष्य संबंधी राज (चक्रवर्ती पद, राजा, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति या कलेक्टर आदि की पद-प्रतिष्ठा) माँगता हूँ, और न अपने परिजन-परिवार का साथ माँगता हूँ कि ‘ये बने रहें तो मेरा काम चलता रहे’।
दीजै बुध जन भक्ति भव-भव: ‘बुधजन’ (कविवर पंडित बुद्धजन जी, जिन्होंने इस सुंदर स्तुति की रचना की है) कहते हैं कि हे प्रभु! मैं तो बस यह माँगता हूँ कि आपकी भक्ति मुझे भव-भव (जन्म-जन्म) तक मिलती रहे! जिस भी गति में रहूँ, बस आपकी भक्ति करता रहूँ। मेरी एकमात्र इच्छा है कि प्रत्येक भव में आपकी भक्ति मुझे प्राप्त होती रहे। हे शिवनाथ! जब तक मुझे मोक्ष की प्राप्ति न हो जाए, तब तक प्रत्येक जन्म में आपके दर्शन, आपकी भक्ति और आपकी स्तुति करने का अवसर मिलता रहे।
दीजिये शिवनाथ: क्योंकि मुझे पता चल गया है कि आप ही ‘शिवनाथ’ (कल्याण के स्वामी/मोक्ष के नाथ) हैं, आप ही देवाधिदेव और तीनों लोकों के एकमात्र अधिपति हैं। मैं सांसारिक सुख-सुविधाओं की अपेक्षा केवल आपकी भक्ति चाहता हूँ। यही मेरी प्रार्थना है कि जन्म-जन्मांतर में जिनेंद्र भगवान के प्रति मेरी श्रद्धा और भक्ति बनी रहे और अंततः मुझे मोक्ष की प्राप्ति हो।
इस प्रकार दर्शन स्तुति केवल भगवान के दर्शन के समय पढ़ी जाने वाली स्तुति नहीं है, बल्कि सच्चे देव की पहचान, मिथ्यात्व का त्याग, आत्मकल्याण की भावना और मोक्ष की दिशा में आगे बढ़ने का संकल्प भी है।
प्रभु पतित पावन – दर्शन स्तुति | छंद 3 से 5