चक्रवर्ती भरत, कैलास पर्वत से उतरकर अपनी सेना के साथ अयोध्या की ओर प्रस्थान करते हैं, जो नदियों के साथ समुद्र की ओर बहती गंगा के समान शोभायमान है। अयोध्या नगरी साफ-सुथरी और चंदन से सुगंधित होकर स्वागत के लिए तैयार है। नगरी के समीप पहुंचने पर भरत का चक्ररत्न गोपुर द्वार पर रुक जाता है, जिससे नगरी कुंकुम जैसी लालिमा और चमक से युक्त प्रतीत होती है। लोग चक्र के रुकने को सूर्य के समान या किसी क्रूर ग्रह के प्रभाव से जोड़कर आश्चर्य और भय मिश्रित विचार करते हैं, यह मानते हुए कि कोई शत्रु अभी भी जीतने योग्य हो सकता है।
सेनापतियों द्वारा चक्ररत्न के रुकने की सूचना मिलने पर भरत आश्चर्यचकित होकर विचार करते हैं कि उनकी अजेय गति वाला चक्र आज क्यों रुका। वे पुरोहित को बुलाकर गंभीर वचनों में कारण जानने का आदेश देते हैं। भरत की वाणी विजयलक्ष्मी की दूती-सी प्रतीत होती है। वे प्रश्न करते हैं कि सभी दिशाओं को जीतने वाला चक्र उनके अपने नगर के द्वार पर क्यों रुका, और क्या कोई शत्रु या द्वेषी उनके घर में ही मौजूद है। वे यह भी विचार करते हैं कि दुष्ट हृदय वाले लोग प्रायः महान पुरुषों की उन्नति से ईर्ष्या करते हैं।
भरत कहते हैं कि महापुरुष दूसरों की उन्नति पर ईर्ष्या नहीं करते, परंतु क्षुद्र लोग ऐसा करते हैं। वे संदेह करते हैं कि कोई अहंकारी उनके घर में ही उनकी आज्ञा का पालन नहीं कर रहा, जिसके कारण चक्र रुक गया। वे कहते हैं कि छोटे शत्रु को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, जैसे आंख में पड़ी धूल या पैर में चुभा कांटा दुख देता है। चक्ररत्न के रुकने का कारण गंभीर है, क्योंकि यह राज्य का प्रमुख अंग है। भरत पुरोहित से इसका कारण जानने को कहते हैं, क्योंकि वे ही इस रहस्य को समझ सकते हैं। पुरोहित को संबोधित कर भरत संक्षिप्त वचनों में अपनी बात रखते हैं।
पुरोहित भरत की प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि उनकी वाणी में माधुर्य और सरलता अद्वितीय है। वे स्वीकार करते हैं कि वे केवल शास्त्रज्ञ हैं, परंतु भरत जैसे राजा को राजनीति की समझ में कोई समकक्ष नहीं। पुरोहित बताते हैं कि चक्ररत्न तब तक नहीं रुकता जब तक दिग्विजय पूर्ण न हो। वे संकेत देते हैं कि भरत ने बाहरी शत्रुओं को जीत लिया, परंतु घर के भीतर (अंतर्मंडल) अभी शुद्धता की आवश्यकता है। विशेष रूप से, उनके भाई उनकी आज्ञा का पालन नहीं कर रहे, जो चक्र के रुकने का कारण हो सकता है।
पुरोहित कहते हैं कि सजातीय लोग भी बलवान की राह में बाधा बन सकते हैं, जैसे सूर्यकांत मणि सूर्य के सामने चमकती है। भरत के निन्यानबे भाई, विशेषकर बाहुबली, अहंकारवश केवल आदिनाथ को प्रणाम करने का निश्चय करते हैं। पुरोहित सुझाते हैं कि शीघ्र प्रतिकार आवश्यक है, क्योंकि शत्रु, ऋण, या अग्नि का छोटा अंश भी उपेक्षित नहीं करना चाहिए। वे कहते हैं कि पृथिवी का शासन केवल भरत को करना चाहिए, न कि अनेक राजाओं को। यदि भाई आज्ञाकारी न हों, तो दूतों के माध्यम से या युद्ध द्वारा उन्हें वश में करना होगा।
पुरोहित कहते हैं कि राज्य और कुलवती स्त्रियां एक ही पुरुष के अधीन होनी चाहिए। भाइयों को या तो भरत को प्रणाम करना होगा या जैन धर्म की शरण लेनी होगी। सजातीय लोग परस्पर विरोध से जलते हैं, परंतु अनुकूल रहकर आनंद देते हैं। पुरोहित सुझाते हैं कि भाई शांति से भरत की आज्ञा मानें। इसके जवाब में, भरत क्रोधित होकर कहते हैं कि उनके भाई बिना कारण वैर कर रहे हैं। वे उन्हें दंड देने की बात कहते हैं, यह मानते हुए कि उनके अहंकार को चक्र के संताप से ठीक करना होगा।
भरत कहते हैं कि उनके भाई, विशेषकर बाहुबली, यौवन के उन्माद में योद्धा होने का दंभ पाले हैं। वे घोषणा करते हैं कि पृथिवी का उपभोग केवल वही करेंगे, और भाइयों को उनकी आज्ञा माननी होगी, अन्यथा युद्ध अपरिहार्य है। वे बाहुबली के अहंकार को विशेष रूप से निंदनीय मानते हैं, क्योंकि वह बुद्धिमान और प्रेमी होने के बावजूद विरोध कर रहा है। क्रोध में बढ़-चढ़कर बोलने पर पुरोहित उन्हें शांत करते हैं और उपायपूर्वक कार्य शुरू करने का सुझाव देते हैं, जिसे भरत स्वीकार करते हैं।
पुरोहित चक्रवर्ती भरत को समझाते हैं कि क्रोध जितेंद्रिय पुरुषों के लिए अनुचित है, क्योंकि उन्होंने छह अंतःशत्रुओं (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य) को जीत लिया है। वे कहते हैं कि क्रोध कार्य की सिद्धि में संदेह पैदा करता है और जो राजा अपने अंतःशत्रुओं को नहीं जीत सकता, वह कार्य-अकार्य का ज्ञान नहीं कर सकता। पुरोहित सुझाते हैं कि क्षमा ही पृथिवी को जीतने का श्रेष्ठ साधन है और भरत को शांत रहकर दूतों के माध्यम से भाइयों को वश में करना चाहिए। वे सलाह देते हैं कि दूत पत्र और भेंट के साथ भाइयों को भरत की सेवा करने का संदेश दें, क्योंकि उनकी सेवा पितृ-समान और लाभकारी है।
पुरोहित कहते हैं कि भाइयों के बिना भरत का राज्य संतोषजनक नहीं, क्योंकि साम्राज्य भाइयों के साथ ही आनंददायक होता है। दूतों को भाइयों को विश्वास दिलाने और पत्र के माध्यम से संदेश देने को कहा जाता है। यदि शांतिपूर्ण प्रयास विफल हों, तो आगे की कार्रवाई पर विचार करना चाहिए। पुरोहित लोकापवाद से बचने और यश की रक्षा की सलाह देते हैं। भरत उनकी बात मानकर क्रोध छोड़ देते हैं और दूतों को भाइयों के पास भेजते हैं। दूत संदेश सुनाते हैं, जिसे सुनकर भाई कहते हैं कि बड़ा भाई पूज्य है, परंतु वे केवल अपने पिता आदिनाथ की आज्ञा मानते हैं।
भाई स्वीकार करते हैं कि भरत का संदेश उचित है, परंतु वे अपने पिता वृषभदेव को ही प्रमाण मानते हैं, जिन्होंने उन्हें ऐश्वर्य प्रदान किया। वे कहते हैं कि वे स्वतंत्र नहीं, बल्कि पिता की आज्ञा के अधीन हैं और भरत से कुछ लेना-देना नहीं चाहते। भाइयों ने दूतों का सत्कार किया, उपहार और पत्र के साथ उन्हें विदा किया, और फिर अपने पिता वृषभदेव के पास पहुंचे। वहां उन्होंने विधिपूर्वक प्रणाम और पूजा की, यह कहते हुए कि वे केवल उनकी ही उपासना करेंगे, क्योंकि उनकी कृपा से ही उन्हें समृद्धि मिली है।
भाई कहते हैं कि वे केवल वृषभदेव को प्रणाम करेंगे, क्योंकि उनका मन अन्य को नमन करने में संतुष्ट नहीं। वे उपमाएं देते हैं, जैसे राजहंस का मानसरोवर छोड़कर अन्य तालाब न जाना, या चातक का मेघ जल के अतिरिक्त अन्य जल न पीना। वे वृषभदेव की शरण में दीक्षा लेकर भय और मानभंग से मुक्त होना चाहते हैं। वे उनसे हितकारी और सुखदायी मार्ग बताने की प्रार्थना करते हैं, ताकि उनकी भक्ति दृढ़ हो और वे दोनों लोकों में उनकी सेवा में रहें।
वृषभदेव राजकुमारों को समझाते हैं कि अभिमानी और बलवान होने के बावजूद उन्हें दूसरों के सेवक नहीं बनना चाहिए। वे कहते हैं कि विनाशी राज्य, चंचल जीवन, और यौवन का उन्माद व्यर्थ है। सेनाएं, धन, और विषय भोग तृष्णा को बढ़ाते हैं और तृप्ति नहीं देते। वे कहते हैं कि भाइयों ने सभी विषयों का आस्वादन किया, फिर भी संतोष नहीं मिला। वृषभदेव सलाह देते हैं कि जब तक पुण्य का उदय है, भरत को राज्य करने देना चाहिए और इस अस्थिर राज्य के लिए व्यर्थ विवाद नहीं करना चाहिए।
वृषभदेव कहते हैं कि धर्मरूपी वृक्ष का दयारूपी फूल धारण करने से मुक्तिरूपी फल प्राप्त होता है। तप ही अभिमान की रक्षा करता है और दीक्षा, गुण, और दया से युक्त तपस्वी जीवन ही श्रेष्ठ राज्य है। उनके उपदेश से राजकुमारों में वैराग्य जागता है और वे दीक्षा ग्रहण कर वन की ओर प्रस्थान करते हैं। दीक्षा को राजकन्या की तरह ग्रहण कर वे सुखी होते हैं। तीव्र तप से उनका शरीर कृश, परंतु तप की लक्ष्मी से देदीप्यमान होता है। वे जिनकल्प चारित्र में स्थित होकर तप करते हैं।
राजकुमार तपरूपी लक्ष्मी के प्रति समर्पित होकर राज्यलक्ष्मी को भूल जाते हैं। उन्होंने द्वादशांग श्रुतस्कंध का अध्ययन कर आत्मा को तप से अलंकृत किया। स्वाध्याय से मन और इंद्रियों का निरोध कर वे आचारांग से मुनि आचरण, सूत्रकृतांग से धर्मक्रियाएं, स्थानाध्ययन से तत्त्वरत्न, समवाय से द्रव्य ज्ञान, व्याख्याप्रज्ञप्ति से प्रश्न-उत्तर, धर्मकथानास से कथाएं, और उपासकाध्ययन से श्रावकाचार का ज्ञान प्राप्त किया। इस प्रकार, वे विशुद्ध चारित्र और ज्ञान से युक्त होकर धर्म का प्रचार करते हैं।
राजकुमारों ने द्वादशांग श्रुतस्कंध के अध्ययन से गहन ज्ञान प्राप्त किया। उन्होंने अन्तःकृत और अनुत्तर विमानौपपादिक अंगों से तीर्थंकरों के उपसर्गों और अनुत्तर विमानों में उत्पन्न मुनियों का वृत्तांत जाना। प्रश्नव्याकरण से जीवों के सुख-दुख का वर्णन, विपाकसूत्र से कर्मों की प्रकृतियों का ज्ञान, और दृष्टिवाद से दृष्टि के भेद समझकर वे जैन शास्त्रों में भक्ति और तीव्र तप में लीन हो गए। चौदह पूर्वों का अध्ययन कर वे श्रुतज्ञान से विशुद्ध तप करने लगे। ग्रीष्म में सूर्य की तपन सहते हुए वे आतापन योग में तप करते थे।
मुनिराज ग्रीष्म में तपी हुई शिलाओं पर खड़े होकर, वर्षा में वृक्षों के नीचे रात बिताकर, और शीत में बर्फ सहते हुए कठिन तप करते थे। वे मौन और धैर्य के साथ प्रकृति के संताप को सहन करते थे। ग्रीष्म के दावानल, वर्षा के मूसलधार जल, और शीत की बर्फ में भी वे अडिग रहकर आतापन, ध्यान, और निश्चल योग धारण करते थे। उनका धैर्य और तप उनकी आत्मा को समुद्र की तरंगों-सा देदीप्यमान करता था, और वे तीनों कालों में कठिन योग को धारण करते थे।
मुनियों ने भोगों को माला के समान तुच्छ मानकर त्याग दिया और जीवन को चंचल समझकर मोक्षमार्ग में दृढ़ता अपनाई। वे जिनेन्द्रदेव के मार्ग में संतोष के साथ संलग्न थे। जैन धर्म के प्रति उनकी श्रद्धा अटल थी, और वे छह महाव्रतों (अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, परिग्रहत्याग, रात्रिभोजनत्याग) का पालन करते थे। परिग्रह और ममता से मुक्त होकर वे जिनेन्द्रदेव के मोक्षमार्ग की आराधना में तत्पर थे, और उनकी आत्मा विशुद्धता की ओर अग्रसर थी।
मुनिराज परिग्रह त्यागकर एकांत और पवित्र स्थानों में निवास करते थे। वे गाँवों में एक दिन और नगरों में पाँच दिन से अधिक नहीं ठहरते थे। सिंह, व्याघ्र, और अन्य हिंसक जीवों से भरे जंगलों और गुफाओं में वे निर्भय होकर रहते थे। श्मशानभूमियों में डाकिनियों, उल्लुओं, और शृगालों के बीच भी वे ध्यानमग्न रहते थे। उनकी निर्भयता और धैर्य उन्हें जिनेन्द्रदेव के उपदेशों के अनुसार शांत और स्थिर रखते थे।
मुनिराज अंधेरी रातों में भयंकर वनों और जंगली हाथियों के बीच ध्यानमग्न रहते थे। वे स्वाध्याय और ध्यान में लीन होकर रात नहीं सोते थे, बल्कि सूत्रों के चिंतन में जागते रहते थे। पर्यंकासन या वीरासन में रात बिताते थे। परिग्रह और ममता से मुक्त होकर वे आकाश-से निर्लेप थे। वे सभी प्राणियों को पुत्र-सा मानकर मातृवत व्यवहार करते थे, और जीव-अजीव के भेद को जानकर प्रासुक स्थानों में निवास करते थे।
मुनियों ने रत्नत्रय (समीचीन दर्शन, ज्ञान, चारित्र) के लिए सावद्य कार्यों का त्याग किया। वे छह काय जीवों की रक्षा करते थे और दीनता से मुक्त होकर मोक्ष को लक्ष्य बनाए रखते थे। तीन गुप्तियों (मन, वचन, काय की संयम) के धारक थे और कामभोगों से उदासीन रहते थे। वे शुद्ध अन्न ही ग्रहण करते थे, और शंकित, अभिहृत, उद्दिष्ट, या क्रयक्रीत आहार से बचते थे। मौन और ईर्यासमिति के साथ भिक्षा लेते थे, और सुख-दुख, मान-अपमान को समान मानते थे।
मुनिराज शरीर की स्थिति के लिए न्यूनतम आहार लेते थे, जैसे गाड़ी के लिए चिकनाई। वे आहार मिलने पर संतुष्ट नहीं होते थे और न मिलने पर विषाद करते थे। गोचरीवृत्ति के साथ शुद्ध भोजन ग्रहण कर तपोवन की ओर प्रस्थान करते थे। तप से उनका शरीर कृश हो गया, पर उनकी प्रतिज्ञा अडिग रही। परीषहों (कष्टों) को जीतकर उनकी आत्मा तपे हुए स्वर्ण-सी चमकने लगी। तप की अग्नि से उनकी आत्मा विशुद्ध होकर मोक्ष की ओर अग्रसर थी।
तप से मुनियों के शरीर चमड़ा और हड्डी मात्र रह गए, पर वे ध्यान की विशुद्धता में लीन थे। तप से अणिमा-महिमा जैसी ऋद्धियां प्रकट हुईं। उन्होंने तप को यज्ञ मानकर भगवान वृषभदेव के वचनों को मंत्र, दया को दक्षिणा, और मोक्ष को फल बनाया। वे मुनि भावनाओं का पालन करते हुए सभी विकारों को त्यागकर मोक्षमार्ग पर अग्रसर थे। भगवान वृषभदेव के पुत्रों ने दीक्षा लेकर तीर्थरूपी मानसरोवर के राजहंस बनकर मोक्ष की कामना की। भरत उन्हें वश में न कर सका, पर वे अपने पिता के मार्ग पर चलकर पापों का नाश करने वाले बने।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 34 – Shlok 1 to 11
श्लोक ( Shlok ) 1
अथावरुह्य कैलासादद्रीन्द्रादिव देवराट् । चक्री प्रयाणमकरोद् विनीताभिमुखं कृती ॥१॥
अथानन्तर-सुमेरु पर्वतसे इन्द्रकी तरह कैलास पर्वतसे उतरकर उस बुद्धिमान् चक्रवर्ती ने अयोध्याकी ओर प्रस्थान किया ।।१।।
“Thereafter, descending from Mount Kailāsa as Indra would from the golden heights of Mount Sumeru, that wise and noble emperor set forth toward Ayodhyā.”1
श्लोक ( Shlok ) 2
सैन्यैरनुगतो रेजे ‘प्रयांश्चक्री निजालयम् । गङ्गौव इव दुर्वारः सरिदोघैरपाम्पतिः ॥२॥
सेनाके साथ-साथ अपने घरकी ओर प्रस्थान करता हुआ चक्रवर्ती ऐसा सुशोभित होता था मानो नदियोंके समूहके साथ किसीसे न रुकनेवाला गङ्गाका प्रवाह समुद्रकी ओर जा रहा हो ।। २ ।।
“Proceeding homeward with his mighty host, the emperor shone resplendent, like the unstoppable flow of the sacred Gaṅgā journeying toward the ocean, accompanied by a multitude of rivers.”2
श्लोक ( Shlok ) 3
ततः कतिपयैरेव प्रयाणश्चक्रिणो बलम् । अयोध्यां प्रापदाबद्धतोरणां चित्रकेतनाम् ॥३॥
“Thereafter, traversing many halting grounds, the emperor’s army—adorned with festooned arches and fluttering with countless banners—at last drew near to the resplendent city of Ayodhyā.”3
श्लोक ( Shlok ) 4
चन्दनद्रवसंसिक्त सुसम्मृष्ट “महीतला । पुरी स्नातानुलिप्तेव सा रेजे पत्युरागमे ॥४॥
जिसकी बुहारकर साफ की हुई पृथिवी घिसे हुए गीले चन्दनसे सींची गई है ऐसी वह अयोध्यानगरी उस समय इस प्रकार सुशोभित हो रही थी मानो उसने पतिके आनेपर स्नान कर चन्दनका लेप ही किया हो ।।४।।
“The city of Ayodhyā, its streets swept clean and sprinkled with fragrant, moistened sandalpaste, shone at that moment as though, in joyous welcome of her lord’s return, she had bathed and anointed herself with sandalwood balm.”4
श्लोक ( Shlok ) 5
नातिदूरे निविष्टस्य प्रवेशसमये प्रभोः । चक्रमस्तारि चक्रं च नाक्रंस्त’ पुरगोपुरम् ॥५॥
महाराज भरत नगरीके समीप ही ठहरे हुए थे वहाँसे नगरीमें प्रवेश करते समय जिसने समस्त शत्रुओंके समूहको नष्ट कर दिया है ऐसा उनका चक्ररत्न नगरके गोपुरद्वारको उल्लंघन कर आगे नहीं जा सका-बाहर ही रुक गया ।।५।।
“As King Bharata stood encamped near the city, the Discus Jewel of the emperor—he who had vanquished all hosts of enemies—could advance no further upon entering Ayodhyā; it halted at the city’s gateway, unable to pass beyond the towering gopura.”5
श्लोक ( Shlok ) 6
सा पुरी गोपुरोपान्तस्थितचक्रांशुरञ्जिता । घृतसन्ध्यातपेवासीत् कुङ्कुमापिञ्जरच्छविः ॥६॥
गोपुरके समीप रुके हुए चक्रकी किरणोंसे अनुरक्त होनेके कारण जिसकी कान्ति कुंकुमके समान कुछ कुछ पीली हो रही है ऐसी वह नगरी उस समय इस प्रकार जान पड़ती थी मानो उसने संध्याकी लालिमा ही धारण की हो ॥६॥
“Bathed in the rays of the Discus, which stood motionless near the city gate, Ayodhyā at that moment seemed tinged with a golden hue, like the soft glow of saffron—appearing as though she had draped herself in the crimson mantle of twilight.”6
श्लोक ( Shlok ) 7
सत्यं भरतराजोऽयं धौरेयश्चक्रिणामिति । धृतदिव्येव सा जज्ञे ज्वलच्चक्रा पुरः पुरी ॥७॥
जिसके आगे चक्र-रत्न देदीप्यमान हो रहा है ऐसी वह नगरी उस समय ऐसी जान पड़ती थी मानो यह भरतराज सचमुच ही सब चक्रतियोंमें मुख्य है इसलिये उसने दिव्य शक्ति धारण की हो अथवा अपनी बातकी प्रामाणिकता सिद्ध करनेके लिये उसने तप्त अयोगोलक आदिको धारण किया हो ।।७।।
“With the radiant Discus Jewel gleaming before her, the city at that moment appeared as though King Bharata, truly foremost among all emperors, had endowed her with a divine brilliance—or as if, to affirm the truth of his word, he had taken upon himself the blazing orb of celestial fire.”7
श्लोक ( Shlok ) 8
ततः कतिपये देवाश्चक्ररत्नाभिरक्षिणः । स्थितमेकपदे चक्रं वीक्ष्य विस्मयमाययुः ॥८॥
तदनन्तर चक्ररत्नकी रक्षा करनेवाले कितने ही देव चक्रको एक स्थानपर खड़ा हुआ देख कर आश्चर्य को प्राप्त हुए ॥८॥
“Thereafter, many of the celestial beings assigned to guard the Discus Jewel beheld it standing still in one place, and were filled with wonder and astonishment.”8
श्लोक ( Shlok ) 9
सुरा जातरुषः केचित्किं किमित्युच्चरङ्गिरः । अलातचक्रव ” भ्द्रेमुः करवालार्पितैः करैः ॥९॥
जिन्हें क्रोध उत्पन्न हुआ है ऐसे कितने ही देव, क्या है ? क्या है ? इस प्रकार चिल्लाते हुए हाथमें तलवार लेकर अलातचक्रकी तरह चारों ओर घूमने लगे ।।९।।
“Then many of the gods, stirred with wrath, began to cry out, ‘What is this? What has happened?’—and, seizing their swords, they whirled about in all directions like blazing wheels of fire.”9
श्लोक ( Shlok ) 10
किमम्बरमणेर्बिम्बमम्बरात्परिलम्बते । प्रतिसूर्यः किमुद्भूत इत्यन्ये “मुमुहुर्मुहुः ॥१०॥
क्या यह आकाशसे सूर्यका बिम्ब लटक पड़ा है ? अथवा कोई दूसरा ही सूर्य उदित हुआ है ? ऐसा विचार कर कितने ही लोग बार बार मोहित हो रहे थे ।।१०।।
“Some wondered, ‘Has the image of the sun descended from the heavens? Or is it a new sun that has risen?’ And many, lost in repeated fascination, found themselves captivated by this celestial mystery.”10
श्लोक ( Shlok ) 11
कस्याप्यकालचक्रेण पतितव्यं विरोधिनः । क्रूरेणेव ग्रहेणाद्य यतश्चक्रेण वक्रितम् ॥११॥
आज यह चक्र क्रूरग्रहके समान वक्र हुआ है इसलिये अकालचत्र के समान किसी विरोधी शत्रु पर अवश्य ही पड़ेगा ।।११।।
“Today, this Discus has curved like the malignant influence of a cruel planet; thus, it is certain to strike down an adversary, like the ominous shadow of a famine-bearing storm.”11
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129
आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 159
आदिपुराण पर्व 32 -उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 130 | श्लोक 131 से 141 | श्लोक 142 से 154 | श्लोक 155 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 199
आदिपुराण पर्व 33 – भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 27 | श्लोक 28 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 164 | श्लोक 165 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 202
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आदिपुराण भाग – 2 Adi purana Part-2 by Acharya Jinasena
आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena