मेरी भावना – छंद 5: व्याख्या और अर्थ
मैत्रीभाव जगत में मेरा सब जीवों से नित्य रहे, दीन-दुखी जीवों पर मेरे उरसे करुणा स्रोत बहे ।
दुर्जन-क्रूर-कुमार्ग रतों पर क्षोभ नहीं मुझको आवे, साम्यभाव रखूं मैं उन पर ऐसी परिणति हो जावे ॥5॥
आत्मा को सुंदर बनाने वाली चार श्रेष्ठ भावनाएँ
यदि हम अपने आत्म-परिणामों को पवित्र और जीवन को सुंदर बनाना चाहते हैं, तो भगवान श्रीमद् उमास्वामी देव ने तत्त्वार्थसूत्र अध्याय 7 में मैत्री-प्रमोद-कारुण्य-माध्यस्थानि च सत्त्व-गुणाधिक-क्लिश्यमानाविनयेषु ॥11॥ में चार महान भावनाओं का उपदेश दिया है।
तथा आचार्य अमितगति देव ने सामायिक पाठ की भावना द्वात्रिंशिका में सत्त्वेषु मैत्रीं गुणिषु प्रमोदं क्लिष्टेषु जीवेषु कृपापरत्वं विपरीतवृत्तौ माध्यस्थभावं में चार महान भावनाओं का उपदेश दिया है।
इन्हीं चार भावनाओं में से तीन भावनाओं का अत्यंत सरल, सहज और हृदयस्पर्शी वर्णन पंडित जुगलकिशोर जी मुख्तार ने ‘मेरी भावना’ के छंद 5 में किया है।
मैत्रीभाव – समस्त जीवों के प्रति मित्रता
कवि सबसे पहले भगवान से प्रार्थना करते हैं—
“मैत्रीभाव जगत में मेरा सब जीवों से नित्य रहे।”
सामान्यतः हम “मित्र” शब्द का अर्थ अपने परिचितों, रिश्तेदारों या साथ रहने वाले लोगों से लगाते हैं। परंतु यहां मैत्री का अर्थ इससे कहीं अधिक व्यापक है।
यहां मैत्री का अर्थ है—संसार के प्रत्येक जीव के प्रति ऐसा शुभभाव रखना कि हमारे मन, वचन और काय से किसी भी जीव को दुःख न पहुँचे। यह मित्रता किसी परिचय, जाति, धर्म, देश, भाषा या संबंध पर आधारित नहीं है। यह केवल एक सत्य पर आधारित है—सभी जीव आत्मा हैं और प्रत्येक आत्मा परमात्मा बनने की क्षमता रखती है।
अर्थात् हे प्रभु! तीनों लोकों में जितने भी जीव हैं, उन सभी के प्रति मेरा मित्रता का भाव सदा बना रहे। यह मित्रता किसी स्वार्थ, लाभ या संबंध पर आधारित नहीं है। इसका आधार है जीवत्व।
- जिस प्रकार मुझमें आत्मा है, उसी प्रकार प्रत्येक जीव में आत्मा है।
- जिस प्रकार मुझमें जानने और देखने की शक्ति है, उसी प्रकार प्रत्येक जीव में भी वही शक्ति विद्यमान है।
- जिस प्रकार मैं भगवान बनने की क्षमता रखता हूँ, उसी प्रकार संसार की प्रत्येक आत्मा भी परमात्मा बनने की सामर्थ्य रखती है।
इसीलिए वास्तव में हमारे बीच कोई मूलभूत भेद नहीं है। शरीर, नाम, रूप, जाति और परिस्थितियाँ अलग हो सकती हैं, लेकिन आत्मा का स्वभाव एक ही है।
संपूर्ण सृष्टि – हमारा मित्र परिवार
जैन दर्शन के अनुसार इस संसार में अनंतानंत जीव हैं। एकेन्द्रिय निगोद से लेकर पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पति कायिक जीवों तक, दो इन्द्रिय, तीन इन्द्रिय, चार इन्द्रिय, पंचेन्द्रिय, संज्ञी और असंज्ञी—हर जीव अपने अस्तित्व में समान रूप से महत्त्वपूर्ण है। इसलिए साधक केवल मनुष्यों से ही नहीं, बल्कि प्रत्येक जीव के प्रति मित्रता का भाव विकसित करता है।
यही संसार की सबसे विशाल और सबसे सशक्त मित्रता है—ऐसी मित्रता जिसमें कोई भी जीव छूटता नहीं।
राग-द्वेष से सावधान रहना आवश्यक है
आज का युग सूचना और समाचारों का युग है। अनेक बार हम ऐसे लोगों या देशों के प्रति भी द्वेष रखने लगते हैं, जिनसे हमारा कभी कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं रहा। समाचारों, प्रचार या सामाजिक वातावरण के प्रभाव में हम अनजाने में दूसरों के प्रति घृणा, विरोध या वैरभाव विकसित कर लेते हैं। साधक को यहाँ अत्यंत सावधान रहने की आवश्यकता है। किसी देश, समाज या व्यक्ति के प्रति द्वेष पालना सबसे पहले हमारी अपनी आत्मा को अशांत करता है। जिन लोगों से हमारा कोई प्रत्यक्ष संबंध भी नहीं है, उनके प्रति मन में नकारात्मक भाव रखकर हम स्वयं ही राग-द्वेष के बंधन में बँध जाते हैं। मैत्रीभाव हमें इन मानसिक विकारों से बचाता है।
मैत्रीभाव सीमाओं से परे है
हम अक्सर देश, भाषा, राजनीति या समाचारों के प्रभाव में आकर कुछ लोगों के प्रति अनजाने में द्वेष पाल लेते हैं। यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे देश का है, किसी दूसरे समाज का है, या हमारे विचारों से भिन्न है, तो भी वह सबसे पहले एक जीव है। समाचार, प्रचार या सामाजिक वातावरण हमारे भीतर राग-द्वेष उत्पन्न कर सकते हैं, लेकिन साधक का प्रयास यह होना चाहिए कि उसका मन इन बाहरी प्रभावों से ऊपर उठ सके। मैत्रीभाव हमें सिखाता है कि किसी भी जीव के प्रति घृणा, वैर या बुराई का भाव न रखें। संसार का प्रत्येक जीव हमारे समान ही चेतन सत्ता है।
खेल को खेल की दृष्टि से देखें
क्रिकेट या अन्य प्रतियोगिताओं के समय हम अक्सर जीत-हार को अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का विषय बना लेते हैं। यदि हमारी पसंदीदा टीम जीत जाए तो अत्यधिक प्रसन्न हो जाते हैं, और यदि हार जाए तो दुःखी या क्रोधित हो जाते हैं। कभी-कभी दूसरी टीम की हार में भी आनंद अनुभव करते हैं। वास्तव में यह मैत्रीभाव नहीं, बल्कि राग और द्वेष की अभिव्यक्ति है। खेल तो केवल खेल है। किसी की जीत या हार से हमारी आत्मा का क्या संबंध? यदि हम समभाव रखें, तो जीत और हार दोनों को सहजता से स्वीकार कर सकेंगे और हमारा मन अनावश्यक उत्तेजना से बचा रहेगा।
मैत्रीभाव का वास्तविक प्रभाव
जब हमारे भीतर सभी जीवों के प्रति मित्रता का भाव विकसित होता है, तब हमारे परिणाम स्वतः बदलने लगते हैं।
- किसी जीव को कष्ट पहुँचाने का भाव नहीं आता।
- हिंसा, द्वेष और प्रतिशोध की प्रवृत्ति समाप्त होने लगती है।
- प्रत्येक जीव के कल्याण की भावना जागृत होती है।
- दूसरों की उन्नति देखकर प्रसन्नता होती है।
- प्रत्येक प्राणी के जीवन, सुरक्षा और विकास के विषय में शुभ चिंतन उत्पन्न होता है।
मित्र कभी अपने मित्र का अहित नहीं चाहता। जब समस्त संसार हमारा मित्र बन जाता है, तब हमारे मन में किसी के प्रति बुरे परिणाम उत्पन्न ही नहीं होते।
मैत्रीभाव क्यों आवश्यक है?
जब हमारे भीतर मैत्रीभाव विकसित होता है, तब राग-द्वेष स्वतः कम होने लगते हैं।
- मन शांत होता है।
- क्रोध और वैर की अग्नि बुझने लगती है।
- दूसरों की उन्नति देखकर ईर्ष्या नहीं होती, बल्कि प्रसन्नता होती है।
यही भाव आगे चलकर करुणा, क्षमा और समता का आधार बनते हैं।
मैत्री – आध्यात्मिक साधना का प्रथम चरण
मैत्रीभाव केवल सामाजिक सद्भाव का संदेश नहीं देता, बल्कि यह आत्मा की शुद्धि का प्रथम चरण है। जब हम सभी जीवों को अपने समान समझने लगते हैं, तब राग-द्वेष स्वतः क्षीण होने लगते हैं। अहिंसा सहज बन जाती है और करुणा, क्षमा तथा समता जैसे दिव्य गुण हमारे जीवन में विकसित होने लगते हैं।
इसीलिए साधक प्रतिदिन भगवान से यही प्रार्थना करता है—
हे प्रभु! तीनों लोक के समस्त जीवों के प्रति मेरा मैत्रीभाव सदैव बना रहे। मैं प्रत्येक आत्मा में अपने समान ही शुद्ध आत्मस्वरूप का दर्शन कर सकूँ और किसी भी जीव के प्रति मेरे मन में कभी भी अहित का भाव उत्पन्न न हो।
यही मैत्रीभाव आत्मा को विशाल बनाता है, संसार को परिवार बना देता है और साधक को मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर करता है।
दीन-दुखी जीवों के प्रति करुणा का झरना बहे
मैत्रीभाव के बाद कविवर दूसरी महान भावना की प्रार्थना करते हैं— “दीन दुखी जीवों पर मेरे उर से करुणा स्रोत बहे।” यहाँ उर का अर्थ है हृदय, और करुणा स्रोत का अर्थ है करुणा का निरंतर बहने वाला झरना।
यहाँ “करुणा का झरना” केवल बाहरी दया नहीं, बल्कि हृदय से सहज रूप में प्रवाहित होने वाली संवेदना का प्रतीक है। करुणा वह भावना है जो किसी पीड़ित, असहाय और दुःखी जीव को देखकर स्वतः हमारे भीतर जाग उठती है।
मैत्री के बाद करुणा क्यों?
सभी जीवों के प्रति हमारा पहला भाव मैत्री होना चाहिए। यह एक सार्वभौमिक भावना है, जिसमें किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होता। जब हम समस्त जीवों को एक दृष्टि से देखते हैं, तब मैत्री का भाव उत्पन्न होता है। किन्तु जब हम किसी ऐसे जीव को देखते हैं जो असहाय है, दुःखी है, स्वयं अपनी रक्षा करने में असमर्थ है, तब वही मैत्री आगे बढ़कर करुणा का रूप धारण कर लेती है। अर्थात्—
- सभी के प्रति मैत्री।
- दुःखी और निर्बल के प्रति करुणा।
हे प्रभु! मेरे हृदय में ऐसी करुणा जागृत हो कि वह केवल एक क्षणिक भावना न रहे, बल्कि निरंतर प्रवाहित होने वाला करुणा का स्रोत बन जाए।
करुणा किनके प्रति?
दीन-दुखी केवल निर्धन मनुष्य ही नहीं हैं। वे सभी जीव इस श्रेणी में आते हैं | यह करुणा उन सभी जीवों के प्रति हो—
- जो दीन और असहाय हैं।
- जो दुःख और कष्टों से घिरे हुए हैं।
- जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं।
- जो दिव्यांग या विकलांग हैं।
- जो रोग, बीमारी या विपत्तियों से संघर्ष कर रहे हैं।
- जिनका जीवन अनेक समस्याओं से घिरा हुआ है।
- जो दूसरों पर आश्रित होकर जीवन व्यतीत कर रहे हैं।
- जो भीख माँगकर अपना जीवन-निर्वाह करने को विवश हैं।
- जो किसी भी प्रकार के मानसिक, शारीरिक या सामाजिक संकट से पीड़ित हैं।
- जो स्वयं अपनी रक्षा नहीं कर सकते।
- जो भयभीत होकर जीवन जी रहे हैं।
- जो जन्म से ही प्रतिकूल परिस्थितियों में हैं।
- जो हमारी अपेक्षा अधिक निर्बल हैं।
ऐसे प्रत्येक जीव के प्रति मेरे हृदय में करुणा का झरना अविरल बहता रहे। मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट-पतंगे—सभी इस भावना के अधिकारी हैं।
सर्प का उदाहरण
यदि कोई सर्प भयभीत होकर हमसे बचने के लिए भाग रहा हो, तो हमारा कर्तव्य उसे मारना नहीं, बल्कि सुरक्षित निकल जाने देना है। वह तो पहले से ही भय में जी रहा है। उसका स्वभाव ही छिपकर रहने का है। ऐसे जीव को केवल इसलिए मार देना कि वह हमारे सामने आ गया, करुणा के विपरीत आचरण है।
सच्ची करुणा क्या है?
करुणा केवल किसी को देखकर दया महसूस करने का नाम नहीं है। सच्ची करुणा वह है जो हमें उस जीव के दुःख को कम करने के लिए प्रेरित करे। जब हृदय में करुणा जागती है, तब हमारे भीतर उसकी रक्षा करने, उसका सहारा बनने और उसके जीवन को बेहतर बनाने की भावना उत्पन्न होती है। हम उसे केवल एक व्यक्ति, एक शरीर या एक परिस्थिति के रूप में नहीं देखते, बल्कि एक जीव के रूप में देखते हैं—ऐसी आत्मा के रूप में, जिसमें अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत सुख और अनंत वीर्य प्राप्त करने की क्षमता विद्यमान है।
करुणा केवल भावना नहीं, जीवनशैली है
यदि वास्तव में हमारे भीतर करुणा है, तो वह केवल विचारों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि हमारे दैनिक जीवन में भी दिखाई देगी। हम प्रत्येक वस्तु का उपयोग करने से पहले स्वयं से प्रश्न करेंगे—
- क्या इसके निर्माण में किसी जीव की हिंसा हुई है?
- क्या इसमें किसी पशु की पीड़ा छिपी हुई है?
- क्या मैं अनजाने में किसी जीव की हत्या को बढ़ावा तो नहीं दे रहा?
यही जागरूकता करुणा का वास्तविक प्रारम्भ है।
उपभोग में भी करुणा
आज बाजार में अनेक ऐसे उत्पाद उपलब्ध हैं जिनके निर्माण में पशुजन्य पदार्थों का उपयोग होता है। यदि हमें यह जानकारी हो कि किसी वस्तु के पीछे जीव-हिंसा जुड़ी हुई है, तो कम-से-कम एक बार हमारे मन में यह विचार अवश्य आना चाहिए—
“क्या मेरी सुविधा किसी अन्य जीव की पीड़ा पर आधारित तो नहीं?”
जब यह प्रश्न हमारे भीतर उठने लगे, तभी करुणा जीवंत होती है।
प्राकृतिक विकल्पों का महत्व
पूर्वकाल में लोग प्राकृतिक साधनों से दाँतों की स्वच्छता करते थे। आज भी सरसों का तेल, सेंधा या साधारण नमक तथा हल्दी जैसे प्राकृतिक पदार्थ दाँतों और मसूड़ों के लिए लाभकारी माने जाते हैं।
यहाँ उद्देश्य किसी विशेष उत्पाद का विरोध करना नहीं, बल्कि यह समझना है कि यदि अहिंसक और प्राकृतिक विकल्प उपलब्ध हों, तो उन्हें अपनाने का विचार भी करुणा भावना का ही विस्तार है।
विज्ञापन नहीं, विवेक
आज हमारे निर्णयों पर विज्ञापनों का बहुत प्रभाव है। बड़े-बड़े कलाकार जिन वस्तुओं का प्रचार करते हैं, वे हमें आकर्षक लगने लगती हैं। किन्तु एक साधक का जीवन विज्ञापन से नहीं, विवेक से चलता है।
हमें यह विचार करना चाहिए—
- मैं क्या उपयोग कर रहा हूँ?
- वह कैसे बना है?
- उसके पीछे किसी जीव की पीड़ा तो नहीं?
यही जागरूकता करुणा को व्यवहार में उतारती है।
घायल जीवों की सहायता
यदि मार्ग में कोई घायल पक्षी, दुर्घटनाग्रस्त पशु अथवा असहाय जीव दिखाई दे और हम उसकी सहायता कर सकें, उसे सुरक्षित स्थान पहुँचा सकें अथवा उपचार की व्यवस्था कर सकें, तो यह करुणा भावना का अत्यंत श्रेष्ठ रूप है। करुणा केवल किसी पर दया करने का नाम नहीं, बल्कि उसकी पीड़ा कम करने का प्रयास है।
पतंगबाजी और करुणा
करुणा का एक व्यावहारिक उदाहरण पतंगबाजी से भी जुड़ा है। आजकल प्रयुक्त होने वाला चाइनीज़ या काँच लगा मांझा असंख्य पक्षियों की मृत्यु का कारण बनता है। अनेक बार मनुष्यों की गर्दन तक कट जाती है। यदि हमारे भीतर करुणा है, तो हम स्वयं विचार करेंगे—
क्या मेरे मनोरंजन के कारण किसी निर्दोष जीव का जीवन संकट में पड़ना उचित है?
जब यह संवेदना जागती है, तब हम स्वेच्छा से ऐसे साधनों का त्याग कर देते हैं।
चमड़े और पशुजन्य वस्तुओं पर विचार
इसी प्रकार चमड़े (लेदर) से बनी वस्तुओं का उपयोग करते समय भी हमें यह समझना चाहिए कि चमड़ा किसी पशु की खाल से ही प्राप्त होता है। करुणा का अर्थ किसी पर दोषारोपण करना नहीं, बल्कि स्वयं सजग होकर अपने जीवन को अधिकाधिक अहिंसक बनाना है।
दुःख ईश्वर की देन नहीं, कर्मों का परिणाम है
जैन दर्शन हमें सिखाता है कि संसार में कोई भी जीव बिना कारण दुःख नहीं भोगता। आज कोई जीव गरीबी, बीमारी, असहायता या विपत्तियों में जीवन जी रहा है, तो यह किसी ईश्वर द्वारा दिया गया दंड नहीं है। यह उसके अपने पूर्वकृत कर्मों का उदय है। किन्तु यही सम्पूर्ण सत्य नहीं है। यदि वही जीव वर्तमान में शुभ विचारों, शुभ आचरण, संयम और पुण्य के मार्ग पर चलता है, तो वह अपने पापकर्मों का क्षय कर सकता है और अपने जीवन की दिशा बदल सकता है। इसीलिए हमें किसी पीड़ित व्यक्ति को तुच्छ समझने के स्थान पर उसके भीतर छिपी अनंत संभावनाओं को देखना चाहिए।
करुणा निष्क्रिय नहीं, सक्रिय बनाती है
सच्ची करुणा केवल सहानुभूति तक सीमित नहीं रहती, बल्कि सेवा का रूप धारण कर लेती है।
जब करुणा बढ़ती है, तब हमारे मन में यह विचार आता है—
- मैं इस जीव की सहायता कैसे करूँ?
- उसके दुःख को कैसे कम करूँ?
- उसके जीवन में आशा और उत्साह कैसे जगाऊँ?
- उसके कल्याण का साधन कैसे बनूँ?
यही करुणा धर्म को व्यवहार में उतारती है।
धर्म की वास्तविक परीक्षा
पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने करुणा का अत्यंत मार्मिक स्वरूप बताते हुए कहा है—
“अपनी पीड़ा में आँखों से आँसू आना आर्त ध्यान है, लेकिन दूसरों की पीड़ा देखकर आँखों में आँसू आ जाना धर्म ध्यान है।”
वास्तव में, दूसरे का दुःख हमारी करुणा की परीक्षा लेता है। जब किसी पीड़ित की पुकार सुनकर हमारा हृदय द्रवित होता है, जब किसी असहाय की वेदना देखकर हमारी संवेदनाएँ जागृत होती हैं, तभी पता चलता है कि हमारे भीतर धर्म कितना जीवित है। दूसरों की पीड़ा हमें यह अवसर देती है कि हम अपने भीतर छिपी करुणा, संवेदना और मानवता को पहचान सकें।
करुणा ही धर्म का हृदय है
मैत्री हमें सबके प्रति शुभभाव रखना सिखाती है, जबकि करुणा हमें दुःखी और पीड़ित जीवों के दुःख को दूर करने के लिए प्रेरित करती है। जब हृदय में करुणा का झरना बहने लगता है, तब सेवा सहज बन जाती है, अहिंसा स्वाभाविक हो जाती है और धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित न रहकर हमारे व्यवहार का हिस्सा बन जाता है। यही भावना साधक को आत्मकल्याण के साथ-साथ परकल्याण की दिशा में भी अग्रसर करती है।
“दुर्जन क्रूर कुमार्ग रतों पर क्षोभ नहीं मुझको आवे। साम्यभाव रखूँ मैं उन पर, ऐसी परिणति हो जावे॥”
करुणा भावना के पश्चात् कविवर तीसरी महान भावना की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करते हैं—
अब तक हमने दो भावों का चिंतन किया—
- सभी जीवों के प्रति मैत्री भाव।
- दीन-दुखियों के प्रति करुणा भाव।
किन्तु संसार में एक तीसरी श्रेणी भी है—दुर्जन, क्रूर और कुमार्ग में रत व्यक्ति।
ये वे लोग हैं जिन्हें दूसरों को कष्ट पहुँचाने में ही आनंद आता है। वे जान-बूझकर ऐसे कार्य करते हैं जिनसे हिंसा बढ़े, धर्म का विरोध हो या दूसरों की भावनाएँ आहत हों।
यहाँ दुर्जन से आशय उन लोगों से है जो बुरे आचरण में लिप्त हैं। कुमार्ग रत अर्थात् वे जो अधर्म, हिंसा, छल, कपट, अंधविश्वास और पापकर्मों के मार्ग पर चल रहे हैं। ऐसे लोग स्वयं तो भ्रमित हैं ही, अनेक निर्दोष जीवों को भी गलत रास्ते पर ले जाते हैं। कहीं हिंसा के नाम पर बलि दी जाती है, कहीं तंत्र-मंत्र के नाम पर लोगों को भयभीत और ठगा जाता है, तो कहीं लोभ और स्वार्थ के कारण धर्म का स्वरूप विकृत कर दिया जाता है।
ऐसे दृश्य देखकर साधक भगवान से प्रार्थना करता है—
हे प्रभु! मुझे ऐसे मार्गों के प्रति न आकर्षण हो, न उनमें जाने की इच्छा हो और न ही उनके प्रति कोई मोह उत्पन्न हो।
दुर्जन कौन है?
दुर्जन वह है जो सत्य को जानते हुए भी जानबूझकर विपरीत आचरण करता है। मान लीजिए किसी व्यक्ति से प्रेमपूर्वक कहा जाए कि किसी सर्प को मत मारो। वह यह जानते हुए भी कि सामने वाला अहिंसा का उपासक है, केवल विरोध करने के लिए उसी सर्प को मार दे। ऐसे व्यक्ति का उद्देश्य केवल हिंसा करना नहीं, बल्कि दूसरे के धर्मभाव को आहत करना भी होता है। ऐसे ही लोग दुर्जन या क्रूर प्रवृत्ति वाले कहलाते हैं।
यदि लोग हमारे धर्म का उपहास करें तो?
कई बार ऐसा भी होता है कि कोई व्यक्ति अहिंसक जीवन अपनाना चाहता है—
- शाकाहार का पालन करता है।
- जीव हिंसा से बचने का प्रयास करता है।
- सात्त्विक जीवन जीना चाहता है।
किन्तु कुछ लोग उसका उपहास उड़ाते हैं। वे जानबूझकर उसके सामने मांसाहार करते हैं, उसे उकसाते हैं या उसकी भावनाओं को ठेस पहुँचाने का प्रयास करते हैं। ऐसी स्थिति में साधक का कर्तव्य क्या है? कविवर उत्तर देते हैं—
“दुर्जन-क्रूर-कुमार्ग रतों पर, क्षोभ नहीं मुझको आवे।”
अर्थात् ऐसे लोगों को देखकर मेरे भीतर क्रोध, घृणा, प्रतिशोध या मानसिक अशान्ति उत्पन्न न हो।
क्षोभ का अर्थ
यहाँ क्षोभ का अर्थ केवल क्रोध नहीं है, बल्कि मन का विचलित हो जाना भी है। यदि कोई हमारे सिद्धान्तों का विरोध करे और उसके कारण हमारा मन अशान्त हो जाए, तो हमारी साधना कमजोर पड़ जाती है। दूसरों का व्यवहार उनके संस्कारों का परिणाम है, किन्तु मेरा परिणाम कैसा होगा—यह मेरे हाथ में है। इसीलिए साधक का प्रयास होना चाहिए कि वह परिस्थितियों से विचलित न होकर समता बनाए रखे।
दुर्जनों के प्रति हमारा भाव कैसा हो?
स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठता है कि जो व्यक्ति गलत मार्ग पर चल रहा है, उसके प्रति हमारा व्यवहार कैसा होना चाहिए?
कविवर इसका अत्यंत संतुलित उत्तर देते हैं—
“साम्यभाव रखूँ मैं उन पर।”
साम्यभाव का अर्थ है—
- न उनसे द्वेष करना।
- न उनके व्यवहार से मानसिक रूप से टूट जाना।
- न प्रतिशोध की भावना रखना।
- न उनके जैसे बन जाना।
बल्कि यह समझना कि प्रत्येक जीव अपने कर्मों के अनुसार व्यवहार कर रहा है और प्रत्येक को अपने कर्मों का फल स्वयं प्राप्त होगा।
यही है माध्यस्थ भाव—अर्थात् समता और उपेक्षा का भाव।
माध्यस्थता क्यों आवश्यक है?
कुछ लोग ऐसे होते हैं जो उचित समझाने पर भी सत्य को स्वीकार नहीं करते। उलटे क्रोधित हो जाते हैं, विरोध करने लगते हैं और अपने मिथ्या मार्ग पर और अधिक दृढ़ हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में उनसे विवाद करना, उनके प्रति घृणा रखना या उन्हें परास्त करने का अहंकार पालना—दोनों ही हमारे लिए हानिकारक हैं।
- यदि हम उनके प्रति अत्यधिक मोह रखें, तो संभव है हम स्वयं उनके प्रभाव में आ जाएँ।
- यदि हम उनके प्रति द्वेष रखें, तो हमारे भीतर क्रोध, घृणा और प्रतिशोध की कषायाएँ प्रबल होने लगेंगी।
दोनों ही स्थितियों में हानि हमारी आत्मा की होती है। इसीलिए जैन दर्शन हमें सिखाता है कि जहाँ सुधार की संभावना न हो, वहाँ अपनी आत्मा की शांति की रक्षा करते हुए माध्यस्थ भाव रखना ही श्रेष्ठ है।
उपेक्षा का अर्थ उदासीनता नहीं है
माध्यस्थता का अर्थ यह नहीं कि हम अधर्म का समर्थन करें। इसका अर्थ है—हम अपनी आत्मा को राग-द्वेष से बचाएँ। हम न तो उनके पापकर्मों में सहभागी बनें और न ही उनके प्रति घृणा और प्रतिशोध की अग्नि अपने भीतर जलाएँ। साधक का लक्ष्य दूसरों को हराना नहीं, बल्कि स्वयं को बचाना है।
विरोध का उत्तर द्वेष नहीं
इतिहास में अनेक अवसर ऐसे आए जब अहिंसा, शाकाहार अथवा धार्मिक मान्यताओं का विरोध किया गया। कई बार लोगों ने केवल विरोध करने के लिए ऐसे कार्य किए जो दूसरों की भावनाओं को आहत करें। किन्तु जैन दर्शन हमें यह शिक्षा नहीं देता कि हम भी उसी प्रकार प्रतिक्रिया करें। धर्म का उत्तर क्रोध से नहीं, बल्कि समता, धैर्य और आत्मसंयम से दिया जाता है।
जीवन में इसका प्रयोग
आज भी हमें अनेक परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है—
- कोई हमारी मान्यताओं का मज़ाक उड़ाए।
- कोई हमारी जीवनशैली की आलोचना करे।
- कोई जानबूझकर हमें उकसाने का प्रयास करे।
ऐसी प्रत्येक स्थिति में हमें स्वयं से एक प्रश्न पूछना चाहिए—
क्या मैं भी उसी के समान प्रतिक्रिया दूँ या अपनी आत्मा की शांति को बनाए रखूँ?
यही प्रश्न साधना का वास्तविक आरम्भ है।
अपनी आत्मा की रक्षा ही सबसे बड़ा धर्म है
जो व्यक्ति कुमार्ग पर चलता है, उसके संपर्क में आने से अनेक बार हमारे भीतर भी कषायाएँ भड़क उठती हैं। क्रोध का उत्तर क्रोध से देने पर शत्रुता बढ़ती है और शत्रुता का परिणाम अंततः दुःख ही होता है। इसलिए बुद्धिमानी इसी में है कि हम ऐसे वातावरण से यथासंभव दूरी बनाए रखें।
अर्थात्—
- न उनके मार्ग को अपनाएँ।
- न उनके पापकर्मों से प्रभावित हों।
- न उनके प्रति द्वेष पालें।
- न अपने मन की शांति को नष्ट करें।
यही आत्मरक्षा का आध्यात्मिक मार्ग है।
तीन भावों की साधना
अब तक “मेरी भावना” के माध्यम से तीन महत्वपूर्ण भाव सामने आते हैं—
- मैत्री भाव — सभी जीवों के प्रति मित्रता।
- करुणा भाव — दीन-दुखियों के प्रति दया और संवेदना।
- मध्यस्थ (साम्य) भाव — दुर्जनों और विरोध करने वालों के प्रति समता।
जब साधक इन तीनों भावों का निरंतर मनन और चिंतन करता है, तब उसके भीतर राग-द्वेष कम होने लगते हैं और आत्मा अधिक निर्मल होती जाती है।
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