पंडित दौलतराम जी द्वारा रचित छह ढाला ग्रंथ की पहली ढाल में, संसार में जीव के अनादि काल से जारी भ्रमण की अत्यंत सुंदर चर्चा की गई है। इस भ्रमण के दौरान निगोद, नरक, तिर्यंच और मनुष्य गति में इस जीव ने क्या-क्या दुख पाए, इसकी चर्चा पिछले छंद में हुई।
आज हम इस विषय पर चर्चा करेंगे कि जब यह जीव देव बनता है, तो देव गति में भी उसे तरह-तरह के दुख झेलने पड़ते हैं। हमारी सामान्य धारणा यह रहती है कि देव पर्याय में तो केवल सुख ही सुख है, वहाँ दुख का क्या काम? किंतु ऐसा नहीं है; देवों को भी भारी कष्ट सहने पड़ते हैं।
पहली ढाल छंद 15 – देवगति में भवनत्रिक के दुःख
कभी अकाम निर्जरा करै, भवनत्रिक में सुर-तन धरै।
विषय चाह दावानल दह्यो, मरत विलाप करत दुख सह्यो ॥15 ॥
अन्वयार्थ “इस जीव ने” (कभी) कभी (अकामनिर्जरा) अकामनिर्जरा (करै) की “तो, मरने पर” (भवनत्रिक) भवनवासी, व्यन्तर और ज्योतिषियों में (सुरतन) देवपर्याय (धेरै) धारण की “परन्तु वहाँ भी” (विषय चाह) पाँचों इन्द्रियों के विषयों की चाह रूप (दावानल) भयंकर अग्नि में (दह्यो) जला और (मरत) मरते समय (विलाप करत) रो-रो कर (दुख) दुःखों को (सह्यो) सहन किया।
अर्थ- यह जीव कभी मनुष्य गति में पहुँचता है और वहाँ ‘अकाम निर्जरा’ करता है। अकाम निर्जरा का अर्थ है कि जीवन में जब कोई परेशानी, कष्ट या समस्या आए, तो उसे बिना किसी दुर्भाव के शांतिपूर्वक सह लेना और कष्ट का आकुलता से अनुभव न करना। अकाम निर्जरा करने से पुण्य का बंध होता है, जिसके फलस्वरूप जीव देव पर्याय को प्राप्त कर लेता है।
जब यह जीव (मिथ्यादृष्टि अवस्था में) अकाम निर्जरा करता है, तो भवनत्रिक—अर्थात भवनवासी, व्यंतर और ज्योतिषी देवों में—देवता का शरीर धारण करता है। मनुष्य और तिर्यंच दो प्रकार के होते हैं: मिथ्यादृष्टि और सम्यग्दृष्टि। किंतु भवनत्रिक में जन्म लेने वाले जीव नियम से मिथ्यादृष्टि ही होते हैं; सम्यग्दृष्टि जीव कभी भवनवासी, व्यंतर या ज्योतिषी देवों में जन्म नहीं लेते।
देव बनने पर भी वास्तविक सुख नहीं मिलता। वहाँ मिथ्यादृष्टि जीव पंचेंद्रिय विषयों की चाह रूपी दावानल (जंगल की भीषण अग्नि) में निरंतर जलता रहता है। उसे सांसारिक विषयों में ही सुख की भ्रांति होती है, इसलिए वह और अधिक विषय पाने तथा उन्हें निरंतर भोगते रहने की तीव्र इच्छा से व्यथित रहता है। साथ ही, अपने से उच्च पद के देवों की उत्तम ऋद्धियाँ, वैभव और देवियों को देखकर उनसे ईर्ष्या और दाह भाव रखता है।
इसके अतिरिक्त, जब उसका मरण समय निकट आता है, तब वह अत्यंत रोता और विलाप करता हुआ भारी दुख सहता है। देवों की आयु समाप्त होने में जब छह माह शेष रह जाते हैं, तब उनके गले में धारण की हुई मंदार माला के पुष्प मुरझा जाते हैं। इससे उन्हें ज्ञात हो जाता है कि अब उनकी मृत्यु में केवल छह महीने ही शेष बचे हैं। यह जानकर वे अत्यंत दुखी हो जाते हैं कि अब यह सारा राज-वैभव, देवियाँ और सुख-सुविधाएँ छूट जाएँगी तथा उन्हें पुनः तिर्यंच या मनुष्य गति में जन्म लेना पड़ेगा। यह स्थिति वैसी ही है जैसे किसी व्यक्ति को चार दिन के लिए राजा बनाकर पुनः भिखारी बना दिया जाए। इसी कारण वे अंत समय में भारी विलाप करते हैं।
प्रश्न: देवों के पास इतना वैभव और सुख होता है, फिर भी वे निरंतर विषयों की चाह में क्यों जलते रहते हैं?
उत्तर: इसका मुख्य कारण उनका मिथ्यादृष्टि होना है।
- संतोष का अभाव: सम्यग्दृष्टि जीव अपने पास जो है उसमें संतोष रखता है, जबकि मिथ्यादृष्टि जीव का ध्यान सदा दूसरों के वैभव और उत्कृष्ट विषयों पर रहता है।
- विषय-कषाय की चाह: स्वर्ग में सब सुख, सुंदर शरीर, रोग-रहित जीवन और सुंदर देवियाँ होने के बावजूद, मिथ्यादृष्टि परिणति के कारण वे और अधिक विषय भोगने की तृष्णा में जलते रहते हैं। दूसरों की ऋद्धियों को देखकर ईर्ष्या करते हैं और इसी आकुलता में जीवन बिताकर अंत में दुर्गति को प्राप्त होते हैं।
प्रश्न: हमारे जीवन में ‘अकाम निर्जरा’ के प्रसंग किस प्रकार बनते हैं?
उत्तर: जब जीवन में अनचाहे संकट, प्रतिकूल परिस्थितियाँ, भूख, प्यास या शारीरिक कष्ट आएँ और हम उन्हें बिना किसी आर्त्तध्यान या क्रोध के शांतिपूर्वक सह लें, तो ‘अकाम निर्जरा’ होती है।
- व्यवहारिक उदाहरण:
- प्यास/अन्न का कष्ट: यात्रा के दौरान पानी समाप्त हो जाना, गाड़ी का जाम में फँस जाना और रात्रि-भोजन का नियम होने के कारण समताभाव से भूख-प्यास सह लेना।
- प्रतिकूल परिस्थितियाँ: जेल या आंदोलन आदि के समय प्राप्त होने वाले सादे/कठिन भोजन और असुविधाओं को शांतिपूर्वक स्वीकार करना।
- महिलाओं में देवियों की अधिकता का कारण: आचार्यों के अनुसार स्वर्ग में देवों की तुलना में देवियों की संख्या कम से कम 32 गुनी अधिक है। इसका कारण यह है कि स्त्रियों के जीवन में सहनशीलता और अकाम निर्जरा के प्रसंग बहुत अधिक आते हैं, जिससे वे पुण्य बंध करके देव पर्याय प्राप्त करती हैं।
प्रश्न: देव मरते समय विलाप क्यों करते हैं और मरण के पश्चात् कहाँ जाते हैं?
उत्तर: मरने से छह माह पूर्व जब देवों के गले की मंदार माला मुरझा जाती है, तो उन्हें अपने मरण का निश्चित ज्ञान हो जाता है।
मरणोत्तर गति: अंत समय में विलाप और आर्त्तध्यान करने के कारण वे भवनत्रिक देव मरकर नीच गतियों में—विशेषकर तिर्यंच (पशु-पक्षी) या हीन मनुष्यों के रूप में—जन्म लेते हैं।
विलाप का कारण: वे सोचने लगते हैं कि करोड़ों-लाखों वर्षों की आयु उन्होंने केवल भोग-विलास में व्यर्थ गँवा दी। अब यह सारा वैभव, सुंदर महल और देवियाँ छूट जाएँगी। इस वियोग के भय और भावी दुखों की आशंका से वे रो-रोकर विलाप करते हैं।
छंद 16 – देवगति में वैमानिक देवों के दुःख
जो विमानवासी हू थाय, सम्यग्दर्शन बिन दुख पाय।
तहँते चय थावर-तन धरै, यों परिवर्तन पूरे करै ॥16॥
अन्वयार्थ (जो) यदि (विमानवासी) वैमानिक देव (हू) भी (थाय) हुआ तो (सम्यग्दर्शन बिन) सम्यग्दर्शन के बिना (दुख) दुःख (पाय) पाया। और (तहँते) वहाँ से (चय) मरकर (थावर) स्थावर जीव का (तन) शरीर (धेरै) धारण किया (यों) इस तरह यह जीव (परिवर्तन) पँच परावर्तनों को (पूरे करै) पूर्ण किया करता है।
अर्थ: जीव यदि अपने पुण्य कर्मों के कारण इससे भी ऊँची वैमानिक देवगति को प्राप्त कर ले और स्वर्ग में विमानवासी देव बन जाए, तब भी यदि उसे सम्यग्दर्शन प्राप्त नहीं हुआ, तो वह संसार के दुःख से मुक्त नहीं हुआ। वैमानिक देव के रूप में भी वह कर्मों के अधीन रहता है।सम्यक्त्व के अभाव में वह देवलोक से च्युत (मरण) होकर पुनः देवगति से निकलने के बाद यह जीव स्थावर शरीर भी धारण कर सकता है।अर्थात् जो जीव कभी अत्यन्त सुखी देव था, वही कर्मों के परिणामस्वरूप आगे चलकर पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु या वनस्पति जैसे स्थावर जीव की पर्याय भी प्राप्त कर सकता है।और इस प्रकार पंच परावर्तन रूप संसार-चक्र को बढ़ाता रहता है।
प्रश्न: वैमानिक देवों में मिथ्यादृष्टि जीव कहाँ तक जन्म ले सकते हैं?
उत्तर: मिथ्यादृष्टि जीव 16 स्वर्गों तक तथा 9 ग्रैवेयक तक जन्म ले सकते हैं। यहाँ तक कि अभव्य जीव (जिसमें कभी सम्यक्त्व प्रकट होने की योग्यता ही नहीं होती) भी अपने कठिन मंद-कषाय रूप आचरण के कारण 9वें ग्रैवेयक तक पहुँच सकता है। 9वें ग्रैवेयक से ऊपर (अनुदिश और अनुत्तर विमानों में) केवल सम्यग्दृष्टि मुनिराज ही मरण करके जन्म लेते हैं।
प्रश्न: क्या सम्यग्दृष्टि वैमानिक देव विषयों का सेवन नहीं करते?
उत्तर: सम्यग्दृष्टि देव भी देवलोक के भोगों का उपभोग करते हैं, किंतु उनकी परिणति अलग होती है:
- निरासक्त भाव: वे भोगों को भोगते हुए भी उनसे आत्मिक रूप से विरक्त (निरासक्त) रहते हैं।
- ईर्ष्या का अभाव: वे अन्य उच्च देवों के वैभव या विषयों को देखकर जलते या ईर्ष्या नहीं करते।
- धर्म-ध्यान में समय: वे अपना अधिकांश समय अकृत्रिम चैत्यालयों की वंदना, जिनेंद्र देव की पूजा, तीर्थंकरों के कल्याणकों में भाग लेने और दिव्य ध्वनि सुनने में व्यतीत करते हैं।
प्रश्न: ‘पंच परावर्तन’ क्या है?
उत्तर: अनादि काल से जीव का संसार में पाँच प्रकार से भ्रमण करना ही ‘पंच परावर्तन’ कहलाता है:
- द्रव्य परावर्तन: संसार के सभी पुद्गल परमाणुओं को शरीर और कर्म रूप में ग्रहण करना और छोड़ना।
- क्षेत्र परावर्तन: तीनों लोकों के प्रत्येक आकाश प्रदेश पर जन्म-मरण धारण करना।
- काल परावर्तन: उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी काल के हर समय (समय-समय) में मरण व जन्म पाना।
- भव परावर्तन: चारों गतियों (नरक, तिर्यंच, मनुष्य, देव) की सभी आयु स्थितियों को अनगिनत बार धारण करना।
- भाव परावर्तन: कषाय और परिणामों के सभी सूक्ष्म व स्थूल स्तरों को भोगना।
ये परावर्तन क्रमशः बड़े होते हैं और प्रत्येक परावर्तन को पूरा करने में अनंत काल लगता है।
छहढाला (प्रथम ढाल) का सार एवं निष्कर्ष:
अनादि काल से यह जीव संसार चक्र में निरंतर भटक रहा है:
- अनंत काल तक निगोद में सूक्ष्म एकेन्द्रिय बनकर अत्यंत कष्ट सहे।
- वहाँ से निकलकर स्थावर और तिर्यंच गतियों में कभी क्रूर तो कभी असहाय प्राणी बनकर दुख भोगे।
- संक्लेश परिणामों के कारण नरक गति में जाकर भीषण ताड़ना और वेदना सहन की।
- पुण्य के प्रभाव से मनुष्य और देव पर्याय प्राप्त की, किंतु सम्यग्दर्शन के बिना वहाँ भी विषय-वासना और मरण के भय से व्यथित रहा।
यह संसार-भ्रमण की कथा किसी अन्य की नहीं, हमारी अपनी ही रामकहानी है। अब मनुष्य पर्याय प्राप्त होने पर इस अनादि परंपरा को तोड़ने का सुअवसर मिला है। अतः हमें आत्म-कल्याण के लिए सच्चा सम्यग्दर्शन प्राप्त करने का दृढ़ संकल्प और निरंतर पुरुषार्थ करना चाहिए।
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