पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 –श्लोक 115 से 124 | श्लोक 125 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 74- shlok 1 to 11
श्लोक ( Shlok ) 1
‘वर्धमानो जिनः श्रीमान्नामान्वर्थ समुद्वहन् । देयान्मे वृद्धिमुद्धतघातिकर्मविनिर्मिताम् ॥ १ ॥
अथानन्तर – सार्थक नामको धारण करनेवाले श्रीमान् वर्धमान जिनेन्द्र, घातिया कर्मोंके नाशसे प्राप्त हुई वृद्धि मुझे दें ॥ १ ॥
“Thereafter, may the glorious Vardhamāna Jinendra—who truly embodies the profound meaning of His name—grant me the spiritual growth that arises from the destruction of the Ghatiya (destructive) karmas. (1)”
श्लोक ( Shlok ) 2
तत्त्वार्थनिर्णयात्प्राप्य सन्मतित्वं सुबोधवाक् । पूज्यो देवागमाद्भूत्वात्राकलङ्को बभूविथ ॥ २ ॥
जिनके वचनोंसे सम्यग्ज्ञान उत्पन्न होता है ऐसे आप तत्त्वार्थ का निर्णय करनेसे सन्मति नामको प्राप्त हुए और देवोंके आगमनसे पूज्य होकर आप अकलङ्क हुए हैं ॥ २ ॥
“You, through whose divine words right knowledge (Samyagjnana) is born, attained the name Sanmati by ascertaining the true nature of reality (Tattvartha); and by becoming worthy of worship through the arrival of the celestial gods, You became Akalanka (stainless/spotless). (2)”
श्लोक ( Shlok ) 3
वीरसेनो महावीरो वीरसेनेन्द्रतां गतः । वीरसेनेन्द्रवन्द्याप्रिंवीरसेनेन भावितः ॥ ३ ॥
आपका नाम वीरसेन है, रुद्रके द्वारा आप महावीर कहलाये हैं, ऋद्धिधारी मुनियोंकी सेनाके नायक हैं। गणधरदेव आपके चरण-कमलोंकी पूजा करते हैं, तथा अनेक मुनिराज आपका ध्यान करते हैं ।॥ ३ ॥
“Your name is Veersen; You were called Mahavira by Rudra (the king of gods/Indra); You are the leader of the army of ascetics who possess extraordinary spiritual powers (Riddhis). The Ganadharas (chief disciples) worship Your lotus-feet, and countless great sages meditate upon You. (3)”
श्लोक ( Shlok ) 4
देवालोकस्तवैवैको लोकालोकावलोकने । किमस्ति व्यस्तमप्यस्मिन्ननेनानवलोकितम् ॥ ४ ॥
हे देव ! लोक और अलोकके देखनेमें आपका ही केवलज्ञानरूपी प्रकाश मुख्य गिना जाता है जिसे आपका केवलज्ञान नहीं देख सका ऐसा क्या कोई फुटकर पदार्थ भी इस संसारमें है ? ॥ ४ ॥
“O Divine Lord! Your omniscience (Kevalajnana) alone is regarded as the supreme light capable of perceiving both the cosmic universe (Loka) and the infinite space beyond (Aloka). Is there any stray, hidden object left in this entire universe that Your omniscience has not perceived? [Indeed, there is none.] (4)”
श्लोक ( Shlok ) 5
रूपमेव तव ब्रूते नाथ कोपाद्यपोहनम् । मणेर्मलस्य वैकल्यं महतः केन कथ्यते ॥ ५ ॥
हे नाथ! आपका रूप ही आपके क्रोधादिकके अभावको सूचित करता है सो ठीक ही है क्योंकि बहुमूल्य मणियोंकी कालिमाके अभावको कौन कहता है ? भावार्थ – जिस प्रकार मणियोंकी निर्मलता स्वयं प्रकट हो जाती है उसी प्रकार आपका शान्ति भाव भी स्वयं प्रकट हो रहा है ।। ५ ।।
“O Lord! Your very countenance and form testify to the complete absence of anger and other passions within You. And this is only natural—for who needs to explicitly point out the absence of darkness or flaws in highly precious gems? (5)”
Explanatory Note (Bhavartha): Just as the brilliant clarity and purity of a flawless gem are self-evident and need no explanation, Your profound, absolute state of inner peace and serenity shines forth and manifests itself naturally through Your divine presence.
श्लोक ( Shlok ) 6
अतिक्रम्य कुतीर्थानि तव तीर्थ प्रवर्तते । सम्प्रत्यपीति नुत्वानु पुराणं तत्प्रवक्ष्यते ॥ ६ ॥
हे प्रभो ! अन्य अनेक कुतीर्थोका उल्लङ्घनकर आपका तीर्थ अब भी चल रहा है इसलिए स्तुतिके अनन्तर आपका पुराण कहा जाता है ॥ ६ ॥
“O Lord! Having outlasted and crossed over numerous other false paths and spiritual traditions (Kuteerthas), Your true path (Teertha) continues to flourish even today. Therefore, following this hymn of praise, Your sacred history (Purana) is narrated. (6)”
श्लोक ( Shlok ) 7
महापुराणवाराशिपारावारप्रतिष्ठया । जिनसेनानुगामित्वमस्माभिनिविवक्षुभिः ॥ ७ ॥
यह महापुराण एक महासागरके समान है इसके पार जानेके लिए कुछ कहनेकी इच्छा करनेवाले हम लोगोंको श्रीजिनसेन स्वामी-का अनुगामी होना चाहिये ॥ ७ ॥
“This Mahapurana is like a vast, unfathomable ocean. We, who desire to say something in order to cross to its other shore, must faithfully follow in the footsteps of the great master, Shri Jinasena Swami. (7)”
श्लोक ( Shlok ) 8
अगाधोऽयं पुराणाब्धिरपारश्च मतिर्भम । पश्योत्ताना सपारा च तं तितीर्षुः किलैतया ॥ ८ ॥
यह पुराण रूपी महासागर अगाध और अपार है तथा मेरी बुद्धि थोड़ी और पारसहित है फिर भी मैं इस बुद्धिके द्वारा इस पुराणरूपी महासागरको पार करना चाहता हूँ ।। ८ ।।
“This ocean-like Purana is fathomless and boundless, whereas my intellect is extremely limited and finite. Even so, through this very intellect of mine, I desire to cross this vast ocean of sacred history. (8)”
श्लोक ( Shlok ) 9
मतिरस्तु ममैषाल्पा पुराणं महदस्त्विदम् । नावेवाम्भोनिधेरस्य प्राप्तोहं पारमेतया ॥ ९ ॥
यद्यपि मेरी बुद्धि छोटी है और यह पुराण बहुत बड़ा है तो भी जिस प्रकार छोटी-सी नावसे समुद्रके पार हो जाते हैं उसी प्रकार मैं भी इस छोटी-सी बुद्धिसे इसके पार हो जाऊँगा ।। ९ ।।
“Even though my intellect is small and this Purana is immensely vast, just as one can successfully cross the great ocean using a tiny boat, I too will cross to the other shore of this sacred scripture with the help of this modest intellect of mine. (9)”
श्लोक ( Shlok ) 10
कथाकथकयोस्तावद्वर्णना प्राग्विधीयते । दोषं ताभ्यामदोषाभ्यां पुराणं नोपढौकते ॥ १० ॥
सबसे पहले कथा और कथाके कहनेवाले वक्ताका वर्णन किया जाता है क्योंकि यदि ये दोनों ही निर्दोष हों तो उनसे पुराणमें कोई दोष नहीं आता है ॥ १० ॥
“First of all, the nature of the scripture (Katha) and the qualifications of the speaker (Vakta) who narrates it are described. For if both of these are flawless and pure, no defect can ever creep into the sacred history (Purana). (10)”
श्लोक ( Shlok ) 11
सा कथा यां समाकर्ण्य हेयोपादेयनिर्णयः । कर्णकट्वीभिरन्याभिः किं कथाभिहिंताथिनाम् ॥ ११ ॥
कथा वही कहलाती है कि जिसके सुननेसे हेय और उपादेयका निर्णय हो जाता है। हित चाहनेवाले पुरुषोंके कानोंको कड़वी लगनेवाली अन्य कथाओंसे क्या प्रयोजन है ? ॥ ११ ॥
“That alone is truly called a sacred narrative (Katha) by the hearing of which one can discern what is to be abandoned (Heya) and what is to be adopted (Upadeya). What purpose is served by other worldly stories that sound bitter to the ears of those who seek their own true well-being? (11)”
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462 | नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 288
पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 24 | श्लोक 25 से 32 | श्लोक 33 से 43 | श्लोक 44 से 53 | श्लोक 54 से 66 | श्लोक 67 से 79 | श्लोक 80 से 92 | श्लोक 93 से 105 | श्लोक 106 से 114 | श्लोक 115 से 124 | श्लोक 125 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161
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