नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 70- shlok 22 to 31
श्लोक ( Shlok ) 22 – 25
बसन्तसमयेऽन्येद्युर्नन्दीश्वरदिनेष्वसौ । जिनचैत्यानि सम्पूज्य तत्संस्तवनपूर्वकम् ॥ २२ ॥तत्र स्थितः स्वयं धर्मदेशनां विदधत्सुधीः । खाद् वियच्चारणौ साधू प्रापतुस्तस्थतुः पदः ॥ २३ ॥प्रणिपत्य तयोर्देवतास्तवावसितौ नृपः । सोपचारं समभ्येत्य श्रुत्वा धर्ममभाषत ॥ २४ ॥भगवन्तावहं पूज्यौ कचित्त्प्राग्दृष्टवानिति । ज्येष्ठो मुनिरुवाचैवं सत्यमावां त्वयेक्षितौ ॥ २५ ॥
किसी एक दिन वसन्त ऋतुकी आष्टाह्निकाके समय बुद्धिमान् राजा अपराजित जिन-प्रतिमाओंकी पूजाकर उनकी स्तुति कर वहीं पर बैठा हुआ था और धर्मोपदेश कर रहा था कि उसी समय आकाश से दो चारणऋद्धि धारी मुनिराज आकर वहीं पर विराजमान हो गये । जिनेन्द्र भगवान्की स्तुतिके समाप्त होने पर राजाने बड़ी विनयके साथ उनके सन्मुख जाकर उनके चरणोंमें नमस्कार किया, धर्मोपदेश सुना और तदनन्तर कहा कि हे पूज्य ! हे भगवन्! मैंने पहले कभी आपको देखा है। उन दोनों मुनियों-में जो ज्येष्ठ मुनि थे वे कहने लगे कि हाँ राजन् ! ठीक कहते हो, हम दोनोंको आपने देखा है ।। २२-२५ ।।
On a certain day during the Ashtahnika festival in the spring season, the wise King Aparajit, after worshiping and praising the idols of Jinendra Bhagavan, was seated right there giving a religious discourse. At that very moment, two Charan-Riddhi-Dhari Muniraj (ascetics possessing the miraculous power of sky-traveling) descended from the sky and seated themselves there.
Upon the conclusion of the praise of Jinendra Bhagavan, the King approached them with great humility, bowed at their feet, listened to their religious discourse, and then said, “O Holy One! O Lord! Have I seen you somewhere before?”
Among those two ascetics, the senior-most Muni began to say, “Yes, O King! You speak truly; you have indeed seen both of us.” [22-25]
श्लोक ( Shlok ) 26 – 29
त्वद्दर्शनप्रदेशं च वक्ष्यामि श्रृणु भूपते । पुष्करार्द्धापरादीन्द्रापरभागे महासरित् ॥ २६ ॥तस्याश्चास्त्युत्तरे भागे गन्धिलो विषयो महान् । तत्खगाद्युत्तरश्रेण्यां सूर्यप्रभपुराधिपः ॥ २७ ॥राजा सूर्यप्रभस्तस्य धारिणी प्राणवल्लभा । तयोश्चिन्तागतिज्येष्ठस्तनुजोऽनुमनोर्गार्दः ॥ २८ ॥ततश्चपलगत्याख्य स्निभिस्तैस्तौ मुदं गतौ । चिरं धर्मार्थकामैर्वा के न तुष्यन्ति सत्सुतैः ॥ २९ ॥
परन्तु कहाँ देखा है ? वह स्थान मैं कहता हूं सुनो। पुष्करार्ध द्वीपके पश्चिम सुमेरु की पश्चिम दिशामें जो महानदी है उसके उत्तर तट पर एक गन्धिल नामका महादेश है। उसके विजयार्ध पर्वतकी उत्तर श्रेणीमें सूर्यप्रभ नगरका स्वामी राजा सूर्यप्रभ राज्य करता था। उसकी स्त्री का नाम धारिणी था । उन दोनोंके बड़ा पुत्र चिन्तागति दूसरा मनोगति और तीसरा चपलगति इस प्रकार तीन पुत्र हुए थे। धर्म, अर्थ और कामके समान इन तीनों पुत्रोंसे वे दोनों माता-पिता सदा प्रसन्न रहते थे सो ठीक ही है क्योंकि उत्तम पुत्रोंसे कौन नहीं सन्तुष्ट होते हैं ? ॥। २६-२९ ।।
“But where have you seen us? Listen, as I describe that place. On the northern bank of the great river situated to the west of the Western Sumeru mountain in the Pushkarardha island, there is a vast country named Gandhil. In the northern range of its Vijayardha mountain, King Suryaprabha ruled as the master of Suryaprabha city. His wife’s name was Dharini.
To them were born three sons: the eldest was Chintagati, the second was Manogati, and the third was Chapalgati. Just like the three pursuits of life—Dharma (righteousness), Artha (wealth), and Kama (desire)—these two parents were always delighted with their three sons. And this is only fitting, for who would not be satisfied with such excellent sons?” [26-29]
श्लोक ( Shlok ) 30 – 31
तस्यामेवोचरश्रेण्यामरिन्दमपुरेश्वरात् । अरिन याख्यादजितसेनायामभवत्सुता ॥ ३० ॥सती प्रीतिमती मेरुगिरेः सकलखेचरान् । त्रिर्धान्त्या साऽजयच्चिन्तागतिं मुक्त्वा अस्वविद्यया ॥३१॥
उसी विजयार्ध पर्वतकी उत्तर श्रेणीमें अरिन्दमपुर नगरके राजा अरिञ्जय रहते थे उनकी अजितसेना नामकी रानी थी और दोनोंके प्रीतिमती नामकी सती पुत्री हुई थी। उसने अपनी विद्यासे चिन्ता-गतिको छोड़कर समस्त विद्याधरोंको मेरु पर्वतकी तीन प्रदक्षिणा देनेमें जीत लिया था ।।३०-३१।।
“In the same northern range of the Vijayardha mountain, there lived King Arinjaya of Arindampur city. His queen was named Ajitsena, and together they had a virtuous daughter named Pritimati. Using her mastery over knowledge (vidya), she defeated all the Vidyadharas (celestial/magical beings) in the challenge of performing three circumambulations around Mount Meru, with the sole exception of Chintagati.” [30-31]
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