जैन धर्म का महान ग्रंथ: महापुराण (त्रिषष्ठिलक्षण महापुराण) एक परिचय
महापुराण (त्रिषष्ठिलक्षण महापुराण) जैन धर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण, प्रामाणिक और विशाल ग्रंथ है। यह दिगम्बर जैन साहित्य की महान कृतियों में से एक माना जाता है। इस ग्रंथ में जैन परंपरा के तिरसठ (63) महापुरुषों—24 तीर्थंकरों, 12 चक्रवर्तियों, 9 बलदेवों, 9 नारायणों और 9 प्रतिनारायणों—के जीवन, चरित्र, आध्यात्मिक साधना, धर्मोपदेश तथा उनके युगों की घटनाओं का विस्तृत वर्णन किया गया है। इसी कारण इसे “त्रिषष्ठिलक्षण महापुराण” कहा जाता है, अर्थात् तिरसठ महान पुरुषों के लक्षणों और चरित्रों का वर्णन करने वाला महाग्रंथ।
रचना और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
इस ग्रंथ की रचना का इतिहास भारत के स्वर्ण युग की याद दिलाता है। इसकी रचना 9वीं शताब्दी ईस्वी में हुई थी।
- मुख्य रचनाकार: इस ग्रंथ को लिखने की शुरुआत महान जैन विद्वान आचार्य जिनसेन ने की थी।
- संरक्षक: इसकी रचना राष्ट्रकूट साम्राज्य के प्रतापी शासक अमोघवर्ष (प्रथम) के शासनकाल में हुई थी, जो स्वयं जैन धर्म और साहित्य के बड़े संरक्षक थे।
- पूर्णता: दुर्भाग्यवश, आचार्य जिनसेन इस विशाल ग्रंथ को अपने जीवनकाल में पूरा नहीं कर सके। उनके अधूरे कार्य को उनके योग्य शिष्य आचार्य गुणभद्र ने पूरा किया।
महापुराण की संरचना (ग्रंथ के दो भाग)
महापुराण कोई साधारण पुस्तक नहीं है, बल्कि यह एक विशाल महाकाव्य है। कुल श्लोकों की संख्या 18584 है। इस ग्रंथ को अध्ययन की सुविधा और रचनाकारों के आधार पर मुख्य रूप से दो भागों में बांटा गया है:
| भाग का नाम | रचनाकार | विवरण |
| 1. आदि पुराण कुल श्लोकों की संख्या = 10,980 | आचार्य जिनसेन (पर्व 1 से पर्व 42 ) तथा 43वें पर्व के केवल तीन श्लोक आचार्य गुणभद्र (पर्व 43 से पर्व 47 ) | यह महापुराण का पहला और अत्यंत महत्वपूर्ण भाग है। इसे आचार्य जिनसेन ने संस्कृत भाषा में बड़े ही काव्यात्मक और सुंदर ढंग से लिखा था। इसमें मुख्य रूप से प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव (आदिनाथ) और प्रथम चक्रवर्ती भरत के जीवन का वर्णन है। |
| 2. उत्तरपुराण कुल श्लोकों की संख्या = 7604 | आचार्य गुणभद्र | यह महापुराण का दूसरा और अंतिम भाग है। आचार्य जिनसेन शिष्य गुणभद्र ने इस भाग को लिखकर महापुराण को पूर्णता प्रदान की। इसमें शेष 23 तीर्थंकरों और अन्य शलाका पुरुषों का जीवन-चरित्र शामिल है। |
| पर्व संख्या | कुल श्लोक | पर्व संख्या | कुल श्लोक | पर्व संख्या | कुल श्लोक | पर्व संख्या | कुल श्लोक | पर्व संख्या | कुल श्लोक |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| पर्व 1 | 210 | पर्व 17 | 257 | पर्व 33 | 202 | पर्व 49 | 59 | पर्व 65 | 192 |
| पर्व 2 | 162 | पर्व 18 | 209 | पर्व 34 | 223 | पर्व 50 | 70 | पर्व 66 | 125 |
| पर्व 3 | 239 | पर्व 19 | 192 | पर्व 35 | 249 | पर्व 51 | 87 | पर्व 67 | 473 |
| पर्व 4 | 198 | पर्व 20 | 273 | पर्व 36 | 212 | पर्व 52 | 70 | पर्व 68 | 732 |
| पर्व 5 | 296 | पर्व 21 | 268 | पर्व 37 | 205 | पर्व 53 | 56 | पर्व 69 | 92 |
| पर्व 6 | 208 | पर्व 22 | 316 | पर्व 38 | 313 | पर्व 54 | 276 | पर्व 70 | 497 |
| पर्व 7 | 318 | पर्व 23 | 196 | पर्व 39 | 211 | पर्व 55 | 62 | पर्व 71 | 462 |
| पर्व 8 | 257 | पर्व 24 | 186 | पर्व 40 | 223 | पर्व 56 | 96 | पर्व 72 | 288 |
| पर्व 9 | 195 | पर्व 25 | 290 | पर्व 41 | 158 | पर्व 57 | 100 | पर्व 73 | 170 |
| पर्व 10 | 208 | पर्व 26 | 150 | पर्व 42 | 208 | पर्व 58 | 124 | पर्व 74 | 549 |
| पर्व 11 | 221 | पर्व 27 | 152 | पर्व 43 | 339 | पर्व 59 | 319 | पर्व 75 | 691 |
| पर्व 12 | 273 | पर्व 28 | 221 | पर्व 44 | 367 | पर्व 60 | 85 | पर्व 76 | 578 |
| पर्व 13 | 216 | पर्व 29 | 169 | पर्व 45 | 219 | पर्व 61 | 130 | ||
| पर्व 14 | 213 | पर्व 30 | 129 | पर्व 46 | 369 | पर्व 62 | 513 | ||
| पर्व 15 | 224 | पर्व 31 | 159 | पर्व 47 | 403 | पर्व 63 | 510 | ||
| पर्व 16 | 275 | पर्व 32 | 199 | पर्व 48 | 143 | पर्व 64 | 55 |
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation
आदिपुराण पर्व 1 – कथामुखवर्णन
पर्व 1 – श्लोक 1 | श्लोक 2 से 15 | श्लोक 16 से 25 | श्लोक 26 से 35 | श्लोक 36 से 45 | श्लोक 46 से 55 | श्लोक 56 से 65 | श्लोक 66 से 75 | श्लोक 76 से 85 | श्लोक 86 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 116 | श्लोक 117 से 126 | श्लोक 127 से 136 | श्लोक 137 से 146 | श्लोक 147 से 156 | श्लोक 157 से 166 | श्लोक 167 से 171 | श्लोक 172 से 180 | श्लोक 181 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 210
अनंतचतुष्टय और अष्टप्रातिहार्य से युक्त श्री अर्हंतदेव को नमस्कार है। जिनेंद्र सूर्य-से अज्ञान नष्ट करते हैं। वृषभदेव ने वैभव को तुच्छ मानकर दीक्षा ली। उनके साथ हजारों राजाओं ने तप सहे। केवलज्ञान से वे प्रकाशित हुए। अजितनाथ से महावीर तक तीर्थंकरों और गणधरों की स्तुति हुई। त्रेसठ शलाकापुरुषों का पुराण संग्रह करने का संकल्प लिया। यह ग्रंथ प्राचीन और कल्याणकारी है। अल्पज्ञ ग्रंथकार भक्ति से इसे कहता है। सिद्धसेन, समंतभद्र जैसे कवियों का सम्मान किया गया। धर्मकथा से युक्त काव्य प्रशंसनीय है। सज्जन गुण और दुर्जन दोष ग्रहण करते हैं। काव्य अलंकार और गुणों से युक्त हो। यह धर्मकथा कल्पलता-सी फलदायी और सरोवर-सी गंभीर है। कथा में सात अंग होते हैं। वक्ता सदाचारी और निपुण हो। श्रोता गाय-हंस जैसे उत्तम हों। तृतीय काल में ऋषभदेव कैलास पर आए। देवों ने पूजा की। समवसरण में केवलज्ञान प्राप्त हुआ। भरत ने स्तुति कर प्रश्न पूछे। वे तीर्थंकर, चक्रवर्ती, और युगों का स्वरूप जानना चाहते हैं। सभा ने प्रशंसा की। भगवान की वाणी से पुराण कहा गया। यह एकरूप होकर अनेकरूप हुई। वृषभसेन ने इसे पुराण बनाया। महावीर और गौतम ने इसे प्रकाशित किया। यह गुरुपरंपरा से चला। यह पुण्य, यश, और मोक्ष देता है। ग्रंथकर्ता इसे शक्ति से कहता है। यह मिथ्यामत नष्ट कर जयशील रहे।
आदिपुराण पर्व 2 – कथामुखवर्णन
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155 | श्लोक 156 से 162
ग्रंथकर्ता वृषभदेव को नमस्कार कर पुराण का विस्तार करता है। श्रेणिक ने गौतम से महावीर द्वारा सुना पुराण ग्रंथरूप में पूछा। गौतम अकारण बंधु हैं। उनकी किरणें अज्ञान नष्ट करती हैं। समवसरण में पशु धन्य हैं। हरिण और हथिनियाँ शांतिपूर्वक रहते हैं। तपोवन दयावन-सा है। श्रेणिक ने पाप स्वीकार कर पुराण सुनने की प्रार्थना की। मुनियों ने उनकी प्रशंसा की। धर्म वृक्ष है, जो अर्थ और मोक्ष देता है। पुराण में क्षेत्र, काल, और तीर्थ हैं। श्रेणिक का प्रश्न गंभीर है। मुनि गौतम की स्तुति करते हैं। गौतम महायोगी और ऋद्धिधारी हैं। वे पुराण सुनाने को तैयार हुए। गौतम ने वृषभदेव द्वारा भरत को कहा पुराण श्रेणिक के लिए कहा। श्रुतस्कंध के चार अनुयोग हैं। प्रथमानुयोग में सत्पुरुषों का चरित्र है। इसमें 2554423107500 श्लोक हैं। यह तीर्थंकरों और लोकों का वर्णन करता है। इसमें 63 या 24 अधिकार हैं। दुःषम काल में यह घटेगा। सुधर्माचार्य और जंबूस्वामी इसे प्रकाशित करेंगे। 683 वर्ष बाद यह अल्प होगा। जिनसेन जैसे कवि इसे स्मरण करेंगे। वृषभनाथ का पुराण पहले कहा जाएगा। सभा श्रेणिक के साथ सुनने को सावधान हुई। यह पुराण पाप धोकर शुद्धि देता है।
आदिपुराण पर्व 3 – पीठिकावर्णन
पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
ग्रंथकर्ता वृषभनाथ को नमस्कार कर पीठिका शुरू करता है। कालद्रव्य अनादि और सूक्ष्म है। यह लोकाकाश में सहकारी कारण है। व्यवहारकाल इसके भेद हैं। उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी काल के छह-छह भेद हैं। सुषमासुषमा में मनुष्यों की आयु तीन पल्य और ऊँचाई 6000 धनुष थी। वे कल्पवृक्षों से भोग प्राप्त करते थे। सुषमा में आयु दो पल्य और ऊँचाई 4000 धनुष थी। सुषमादुःषमा में आयु एक पल्य और ऊँचाई एक कोश थी। प्रतिश्रुति पहले कुलकर थे। इन्होंने सूर्य-चंद्रमा का भय दूर किया। सन्मति ने तारों का भय हटाया। क्षेमंकर ने पशुओं से रक्षा सिखाई। क्षेमंधर ने लाठी का उपदेश दिया। सीमंकर और सीमंधर ने कल्पवृक्षों की सीमाएँ नियत कीं। विमलवाहन ने सवारी का उपदेश दिया। चक्षुष्मान ने पुत्र-मुख देखने की प्रथा शुरू की। यशस्वान ने आशीर्वाद की रीत चलाई। अभिचंद्र ने चंद्रमा के साथ क्रीड़ा सिखाई। चंद्राभ ने संतानों के साथ जीवित रहने की प्रथा लाई। मरुदेव ने नाव और सीढ़ियाँ बनवाईं। प्रसेनजित ने जरायु हटाना सिखाया। नाभिराज ने नाल काटने का उपदेश दिया। उनके समय मेघ आए और धान्य उत्पन्न हुए। प्रजा ने नाभिराज से उपयोग पूछा। उन्होंने वृक्षों और ओषधियों का उपयोग बताया। चौदह कुलकरों ने पुण्य से यहाँ जन्म लिया। इन्होंने दंड व्यवस्था बनाई। उनकी आयु संख्याएँ पूर्व, पर्व आदि हैं। गौतम ने यह कथा कही। सभा आनंदित हुई। वे वृषभदेव का पुराण कहने को तैयार हुए।
आदिपुराण पर्व 4 – श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन
पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
तीन पर्वों का अध्ययन करने वाला आनंद पाता है। अब वृषभदेव का चरित कहा जाएगा। पुराण में आठ आख्यान होते हैं। लोक अकृत्रिम और नित्य है। सृष्टिवाद असंगत है। कर्म ही शरीर बनाते हैं। लोक तीन भागों में है। मध्यलोक में जंबूद्वीप और गंधिल देश है। यहाँ प्रजा सुखी और धार्मिक है। विजयार्ध पर्वत शोभित है। इसकी उत्तर श्रेणी में अलकापुरी है। यह नगरी समृद्ध और सुंदर है। इसका राजा अतिबल शत्रुजयी था। उसका पुत्र महाबल हुआ। अतिबल ने उसे युवराज बनाया। बाद में अतिबल ने राज्य छोड़कर दीक्षा ली। उनका तप कठिन और निर्मल था। महाबल ने राज्य संभाला। वह मध्यम वृत्ति से शासन करता था। उसका राज्य अन्याय से मुक्त था। उसका रूप सुंदर और लोकप्रिय था। उसके चार मंत्री थे। स्वयंबुद्ध सम्यग्दृष्टि था। महाबल मंत्रशक्ति से विजयी था। वह उपवनों में विहार करता था। उसे तीर्थंकर पद मिलने वाला था।
आदिपुराण पर्व 5 – ललितांग स्वर्गभोग वर्णन
पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
राजा महाबल का जन्मोत्सव मंगलगीत और नृत्य से शोभित था। वे सिंहासन पर विद्याधरों और वारांगनाओं से घिरे थे। स्वयंबुद्ध मंत्री ने धर्म की महिमा बताई। धर्म से सुख और संपदा मिलती है। महामति ने भूतवाद से आत्मा का खंडन किया। संभिन्नमति ने विज्ञानवाद से जगत् को क्षणिक माना। शतमति ने शून्यवाद से सबको मिथ्या कहा। स्वयंबुद्ध ने इनका खंडन कर आत्मा और धर्म की सिद्धि की। सभा ने आत्मा स्वीकारी। स्वयंबुद्ध ने चार कथाएँ सुनाईं: अरविंद नरक गया, दंड अजगर बना, शतबल देव हुआ, सहस्त्रबल मोक्ष को प्राप्त हुआ। चार ध्यानों का फल बताया। महाबल ने धर्म स्वीकारा। स्वयंबुद्ध मेरु पर गए। वहाँ मुनियों ने महाबल को भव्य और तीर्थंकर बताया। महाबल ने स्वप्न देखे। स्वयंबुद्ध ने उन्हें समझाया। महाबल ने राज्य छोड़ा। उन्होंने संन्यास लिया। बाईस दिन सल्लेखना कर ऐशानस्वर्ग में ललितांग देव बने। वहाँ उन्होंने भोग भोगे। स्वयंबुद्ध ने धर्मोपदेश दिया। जैन धर्म की सेवा का आह्वान किया।
आदिपुराण पर्व 6 – ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन
पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
ललितांगदेव के आभूषण अचानक निस्तेज हो गए। उनकी कंठमाला म्लान हो गई। कल्पवृक्ष काँपने लगे। उनके शरीर की कांति मंद पड़ गई। ऐशानस्वर्ग के देव शोक में उन्हें देख न सके। सेवक भी दीन हो गए। उनके सुख दुःख बन गए। म्लानता का समाचार स्वर्ग में फैल गया। सामानिक देवों ने उन्हें धैर्य बंधाया। उन्होंने कहा कि जन्म-मरण सबको प्राप्त होते हैं। स्वर्ग से च्युति साधारण है। पुण्य क्षीण होने पर स्वर्ग अंधकारमय हो जाता है। पाप से अस्नेह और जँभाई बढ़ती है। देवों ने धर्म की शरण लेने को कहा। ललितांगदेव ने धैर्य लिया। उन्होंने पंद्रह दिन तक जिन-चैत्यालयों की पूजा की। फिर अच्युत स्वर्ग में चैत्यवृक्ष के नीचे नमस्कार मंत्र पढ़ते हुए अदृश्य हो गए।
विदेह क्षेत्र के पुष्कलावती देश में उत्पलखेटक नगर था। वहाँ राजा वज्रबाहु और रानी वसुंधरा थे। ललितांगदेव स्वर्ग से च्युत होकर उनका पुत्र वज्रजंघ हुआ। वह शत्रुओं को संकुचित और मित्रों को प्रसन्न करता था। यौवन में उसकी रूप-संपदा अनुपम हुई। उसके काले बाल कामदेव के सर्प जैसे शोभते थे। उसका मुख मनोहर वाणी से युक्त था। नेत्र शास्त्रज्ञान से सुशोभित थे। उसका हार निर्मल कांति वाला था। चंदन से वक्षस्थल मेरु जैसा लगता था। उसकी जंघाएँ स्थिर थीं। चरण लक्ष्मी के कमल जैसे थे। वह शास्त्रज्ञ, विनयी और कुशल था। राज्यलक्ष्मी उसका आश्रय चाहती थी। वह स्वयंप्रभा से प्रेम करता था।
स्वयंप्रभा ललितांग के च्युत होने से शोकाकुल हुई। दृढ़धर्म देव ने उसे धर्म का उपदेश दिया। वह छह मास तक जिन-पूजा करती रही। फिर सौमनस वन में समाधि से स्वर्ग से च्युत हुई। वह पुंडरीकिणी नगरी में वज्रदंत और लक्ष्मीमती की पुत्री श्रीमती बनी। उसका रूप कामदेव को मोहने वाला था। उसके चरण कमल जैसे थे। जंघाएँ तरकस जैसी थीं। नाभि भँवर जैसी थी। स्तन कलश जैसे थे। मुख चंद्रमा और कमल की शोभा धारण करता था। वह सूर्य-किरणों जैसे भवन में सो रही थी। यशोधर गुरु को केवलज्ञान हुआ। देवों का कोलाहल सुनकर वह जागी। ललितांग का स्मरण कर मूर्च्छित हुई। सखियों ने उसे सचेत किया। माता-पिता शोकाकुल हुए। वज्रदंत ने उसे यौवन का विकार माना।
वज्रदंत ने यशोधर की पूजा की। उन्हें अवधिज्ञान मिला। उन्होंने जाना कि श्रीमती स्वयंप्रभा थी। वह दिग्विजय को गए। पंडिता धाय ने श्रीमती को समझाया। श्रीमती ने पूर्वभव बताया। वह गंधिला देश में निर्नामा थी। पिहितास्रव मुनि से कर्म-कारण पूछा। मुनि ने कहा कि वह धनश्री थी और मुनि का अपमान किया था। उसने क्षमा माँगी। व्रत कर स्वर्ग गई। वहाँ स्वयंप्रभा बनी। यहाँ श्रीमती हुई। वह ललितांग को खोज रही थी। पंडिता से चित्रपट बनवाकर उसे खोजने को कहा। पंडिता जिनमंदिर गई। वज्रदंत दिग्विजय से लौटा। उसने राज्याभिषेक प्राप्त किया। वह पुण्य से चक्रवर्ती बना। उसकी कीर्ति लोक में फैली। वह श्रीमती के विवाह की चिंता में था।
आदिपुराण पर्व 7 – श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन
पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
चक्रवर्ती वज्रदंत ने अपनी शोकाकुल पुत्री श्रीमती को बुलाकर सांत्वना दी। उन्होंने कहा कि वह शोक न करे, क्योंकि अवधिज्ञान से उन्हें उसके पति ललितांग का वृत्तांत मालूम है। उन्होंने श्रीमती को स्नान करने, अलंकार धारण करने और सखियों संग भोजन करने को कहा, यह भविष्यवाणी करते हुए कि उसका पति शीघ्र मिलेगा। वज्रदंत ने यशोधर के केवलज्ञान महोत्सव के समय प्राप्त अवधिज्ञान से अपने, श्रीमती और उसके पति के पूर्वजन्मों का वर्णन किया।
उन्होंने बताया कि पाँच भव पहले वह पुंडरीकिणी नगरी में अर्धचक्रवर्ती के पुत्र चंद्रकीर्ति थे। मित्र जयकीर्ति संग राज्य सुख भोगा। गृहस्थ रहते हुए अणुव्रत लिए, फिर गुरु चंद्रसेन से संन्यास लेकर माहेंद्र स्वर्ग में देव बने। वहाँ से च्युत होकर पुष्कर द्वीप के रत्नसंचय नगर में श्रीधर के पुत्र बलभद्र श्रीवर्मा हुए, और जयकीर्ति उनके भाई नारायण विभीषण बने। पिता श्रीधर ने दीक्षा ली और सिद्ध हुए। माता मनोहरा ने व्रत पालकर स्वर्ग में ललितांगदेव बनीं। विभीषण की मृत्यु पर ललितांग ने वज्रदंत को शोक त्यागने का उपदेश दिया। इसके बाद वज्रदंत ने युगंधर मुनि से दीक्षा ली, तप कर अवधिज्ञान प्राप्त किया और अच्युत स्वर्ग में इंद्र बने। वहाँ उन्होंने माता ललितांग का सत्कार किया।
ललितांग आगे गंधर्वपुर में महीधर बने। वासव और प्रभावती ने तप कर मोक्ष और स्वर्ग प्राप्त किया। महीधर ने विद्याएँ सिद्ध कीं। वज्रदंत ने प्रभाकरी नगरी में महीधर को उपदेश देकर वैराग्य उत्पन्न किया। महीधर ने दीक्षा ली और प्राणत स्वर्ग में इंद्र बने। वहाँ से च्युत होकर अयोध्या में अजितंजय बने, जिन्हें पिहितास्रव नाम मिला। वज्रदंत ने उन्हें विषयों से विरक्ति का उपदेश दिया। पिहितास्रव ने दीक्षा ली और श्रीमती को पूर्वभव में व्रत दिए थे। वज्रदंत ने बताया कि अंतिम ललितांग श्रीमती का पति है, जो अब मनुष्यलोक में है।
श्रीमती ने पिता के उपदेश से पूर्वभव स्मरण किया। वज्रदंत ने पंडिता से ललितांग की खोज कराई। पंडिता ने चित्रपट लेकर महापूत जिनालय में वज्रजंघ को पाया, जो ललितांग का जीव था। वज्रजंघ ने चित्रपट देखकर स्वयंप्रभा संग अपने पूर्वभव को पहचाना और मूर्च्छित हो गया। सचेत होने पर उसने पंडिता से श्रीमती के बारे में पूछा। पंडिता ने बताया कि श्रीमती उसकी खोज में है। वज्रजंघ ने अपना चित्रपट देकर पंडिता को विदा किया।
पंडिता ने श्रीमती को समाचार सुनाया और चित्रपट दिखाया। श्रीमती प्रसन्न हुई। वज्रदंत ने वज्रबाहु और उनके परिवार का स्वागत किया। वज्रबाहु ने श्रीमती का हाथ वज्रजंघ के लिए माँगा। वज्रदंत ने सहमति दी, यह कहते हुए कि दोनों का प्रेम जन्मांतरों से चला आ रहा है। विवाह की तैयारियाँ हुईं। विश्वकर्मा ने रत्नजड़ित मंडप बनाया। शुभ मुहूर्त में श्रीमती और वज्रजंघ का विवाह संपन्न हुआ। दोनों ने आभूषण धारण किए और रत्नवेदी पर बैठे। पाणिग्रहण के साथ विवाह पूर्ण हुआ।
सभी ने इस विवाह की प्रशंसा की और पूर्वजन्म के पुण्य को इसका कारण माना। अगले दिन वज्रजंघ और श्रीमती ने महापूत चैत्यालय में जिनपूजा की। वज्रजंघ ने जिनेंद्र की स्तुति की, उनके गुणों का स्मरण किया और मोक्ष की कामना की। फिर पुंडरीकिणी नगरी में प्रवेश कर राज्याभिषेक प्राप्त किया। बत्तीस हजार राजाओं ने उनका सम्मान किया। श्रीमती संग वह दीर्घकाल तक सुख भोगते रहे।
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन
पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
विवाह के पश्चात् वज्रजंघ ने चक्रवर्ती के भवन में, जहाँ नित्य उत्सव होते थे, श्रीमती के साथ उत्तम भोगों का अनुभव करते हुए दीर्घकाल तक निवास किया। श्रीमती के सौंदर्य, स्पर्श और मधुर व्यवहार से वह संतुष्ट रहता था, किंतु कामसेवन से उसकी तृप्ति नहीं होती थी। दोनों ने एक-दूसरे के साथ विभिन्न क्रीडाओं में समय व्यतीत किया—कभी उद्यानों में, कभी नदीतट पर, तो कभी जलक्रीडा में। श्रीमती की शारीरिक शोभा और प्रेम ने वज्रजंघ का मन मोह लिया। दोनों ने जिनेंद्र पूजा, दान और उत्सवों के माध्यम से भी समय बिताया।
वज्रजंघ की बहन अनुंधरी का विवाह चक्रवर्ती के पुत्र अमिततेज से हुआ। चक्रवर्ती वज्रदंत ने दोनों दंपतियों को दहेज सहित विदा किया। वज्रजंघ और श्रीमती उत्पलखेटक नगर पहुँचे, जहाँ उनका भव्य स्वागत हुआ। वहाँ उन्होंने 98 पुत्र उत्पन्न किए। एक दिन वज्रबाहु ने बादलों के क्षणभंगुर स्वरूप को देख वैराग्य लिया और दीक्षा ग्रहण कर मोक्ष प्राप्त किया। उनके पुत्र भी दीक्षित हुए।
वज्रदंत ने भी कमल में मरे भ्रमर को देखकर वैराग्य लिया। उन्होंने राज्य अपने पौत्र पुंडरीक को सौंपकर दीक्षा ली। लक्ष्मीमती ने वज्रजंघ को सहायता के लिए बुलाया। वज्रजंघ ने मुनियों से अपने और श्रीमती के पूर्वभव सुने, जिसमें वह ललितांगदेव और श्रीमती स्वयंप्रभा थीं। मुनियों ने भविष्यवाणी की कि वज्रजंघ भविष्य में वृषभनाथ तीर्थंकर होंगे। इसके बाद वज्रजंघ पुंडरीकिणी नगरी पहुँचे, पुंडरीक के राज्य को स्थिर किया और वापस उत्पलखेटक लौट आए। वहाँ वे श्रीमती के साथ सुखपूर्वक भोग भोगते रहे, जैन धर्म का पालन करते हुए अपनी कीर्ति फैलाते रहे।
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन
पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195
वज्रजंघ ने श्रीमती के साथ धर्म, अर्थ और काम के संयोग से राज्य करते हुए छहों ऋतुओं में भोगों का आनंद लिया। शरद् में वह तालाबों और वनों में, हेमंत में सुगंधित शयनागार में, शिशिर में श्रीमती को आलिंगन देकर, वसंत में आम्रवनों में, ग्रीष्म में जलक्रीडा करते हुए और वर्षा में मेघों के बीच क्रीडा करता रहा। एक रात शयनागार में धूप के धुएं से दोनों की मृत्यु हो गई। पुण्य के प्रभाव से वे उत्तरकुरु भोगभूमि में जन्मे, जहाँ दस प्रकार के कल्पवृक्ष भोग प्रदान करते हैं। वहाँ तीन पल्य की आयु तक उन्होंने सुख भोगा।
उत्तरकुरु में जन्मे जीव सात सप्ताह में परिपक्व होकर भोग भोगते हैं। वहाँ न दुःख है, न रोग, न ऋतु परिवर्तन। वज्रजंघ और श्रीमती ने वहाँ सुखमय जीवन जिया। मतिवर आदि चार मंत्रियों ने उनकी मृत्यु पर दीक्षा ली और स्वर्ग में अहमिंद्र बने। एक दिन वज्रजंघ को सूर्यप्रभ देव के विमान को देखकर जातिस्मरण हुआ। तभी दो चारण मुनि आए, जिनमें से एक स्वयंबुद्ध मंत्री का जीव था। उन्होंने वज्रजंघ और श्रीमती को सम्यग्दर्शन का उपदेश दिया, जिसे दोनों ने ग्रहण किया। नकुल आदि चार जीवों ने भी सम्यग्दर्शन प्राप्त किया।
मुनियों के जाने के बाद वज्रजंघ ने उनके गुणों का चिंतन किया और सम्यक्त्व में दृढ़ हुआ। तीन पल्य की आयु पूर्ण कर दोनों ऐशान स्वर्ग पहुँचे—वज्रजंघ श्रीधर देव और श्रीमती स्वयंप्रभा देव के रूप में। नकुल आदि चार जीव भी वहाँ देव बने। श्रीधर देव ने देवांगनाओं के साथ भोग भोगते हुए सुखमय जीवन जिया, जो भविष्य में तीर्थंकर बनने का संकेत था।
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन
पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीधरदेव को अवधिज्ञान से पता चला कि उनके गुरु प्रीतिंकर मुनि श्रीप्रभ पर्वत पर केवलज्ञानी बन गए हैं। वे उनकी पूजा के लिए गए, नमस्कार किया और पूछा कि महाबल भव के तीन मिथ्यादृष्टि मंत्री कहाँ हैं। प्रीतिंकर ने बताया कि महामति और संभिन्नमति निगोद में, शतमति नरक में हैं। उन्होंने नरक के भयंकर दुःखों का वर्णन किया, जहाँ पापी जीव हिंसा आदि से सात पृथ्वियों में कष्ट भोगते हैं। वहाँ तीक्ष्ण शस्त्र, अग्नि, लोहे की पुतलियाँ, असिपत्र वन आदि से नारकियों को असीम पीड़ा मिलती है। शतमति द्वितीय नरक में दुःख भोग रहा था।
श्रीधरदेव ने शतमति को सम्यग्दर्शन दिलाया। वह नरक से मुक्त होकर पूर्व विदेह क्षेत्र में जयसेन के रूप में जन्मा, दीक्षा ली और ब्रह्मस्वर्ग में इंद्र बना। श्रीधरदेव स्वर्ग से च्युत होकर पूर्व विदेह के सुसीमानगर में सुविधि राजा के पुत्र बने। सुंदर और गुणी सुविधि ने मनोरमा से विवाह किया। उनका पुत्र केशव (पूर्व की श्रीमती) हुआ। सिंह आदि चार जीव भी राजपुत्र बने। सभी ने विमलवाह जिनेंद्र की वंदना कर दीक्षा ली, सिवाय सुविधि के, जो श्रावक बन ग्यारह प्रतिमाएँ धारण कर तप करने लगा।
आयु पूर्ण कर सुविधि ने दीक्षा ली और अच्युत स्वर्ग में इंद्र बने, जहाँ उनकी आयु बीस सागर थी। केशव भी दीक्षित हो प्रतींद्र बना। सुविधि अच्युतेंद्र के रूप में दिव्य शरीर, विमान, देवियाँ और भोगों के साथ क्रीड़ा करता रहा। उनकी शोभा अपार थी, और वे जिनपूजा में रत रहे।
आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन
पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
जिनेंद्रदेव की स्तोत्र-पूजा से रत्नत्रय प्राप्त होता है, जो भव्य जीवों को पवित्र करता है। अच्युतेंद्र वज्रनाभि ने स्वर्ग छोड़ने से पहले माला मुरझाने का चिह्न देखा, पर धैर्य रखा। अंतिम छह माह में उसने अर्हंत की पूजा की और स्वर्ग से च्युत होकर जंबूद्वीप के पूर्व विदेह क्षेत्र में पुंडरीकिणी नगरी में वज्रसेन और श्रीकांता के पुत्र वज्रनाभि के रूप में जन्म लिया। उनके भाई विजय आदि और धनदेव भी वहीं जन्मे।
वज्रनाभि का यौवनकालीन रूप सूर्य-सा देदीप्यमान था। उनके गुणों से लक्ष्मी और सरस्वती आकर्षित थीं। वज्रसेन ने उन्हें राज्य सौंपकर दीक्षा ली। वज्रनाभि चक्रवर्ती बने, चक्ररत्न से पृथ्वी जीती, पर पिता वज्रसेन तीर्थंकर से रत्नत्रय जानकर राज्य त्यागा। उन्होंने पुत्र वज्रदंत को राज्य देकर सोलह हजार राजाओं सहित दीक्षा ली। पांच महाव्रत, समिति-गुप्ति और सोलह भावनाओं का पालन करते हुए वे तीर्थंकर पद के योग्य बने।
उन्होंने कठिन तप किया, चार ऋद्धियाँ प्राप्त कीं और उपशम श्रेणी से ग्यारहवें गुणस्थान तक पहुँचे। आयुांत में श्रीप्रभ पर्वत पर प्रायोपवेशन संन्यास लिया, बाईस परिषह सहन किए, दस धर्म और बारह अनुप्रेक्षाएँ धारण कीं। अंततः सर्वार्थसिद्धि में अहमिंद्र बने। वहाँ उनका शरीर दिव्य, एक हाथ ऊँचा और सुखमय था। वे जिन-पूजा और तत्त्वचर्चा में रत रहे। उनके भाई और धनदेव भी अहमिंद्र बने।
अहमिंद्र का सुख प्रवीचाररहित और विषयों से मुक्त था। विषय-सुख तृष्णा बढ़ाता है, पर अहमिंद्र का सुख आत्मिक था। यह सिद्धों के सुख से कम, पर स्वर्गीय सुख से श्रेष्ठ था। पुण्य से सर्वार्थसिद्धि और पाप से नरक मिलता है। वज्रनाभि ने शम-दम-यम से यह सुख पाया, जो बुद्धिमानों को प्रेरित करता है।
आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन
पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273
गौतम स्वामी ने मुनियों को बताया कि वज्रनाभि अहमिंद्र स्वर्ग से च्युत होकर पृथ्वी पर अवतरित हुए। उन्होंने जंबूद्वीप के भरत क्षेत्र में अंतिम कुलकर नाभिराज और उनकी पत्नी मरुदेवी के यहाँ जन्म लिया। मुनियों ने गौतम स्वामी से पूछा कि भोगभूमि के अंत और कर्मभूमि के प्रारंभ के समय नाभिराज ने ऋषभदेव को किस आश्रम में उत्पन्न किया और उनके कल्याणकों का ऐश्वर्य कैसा था। गौतम स्वामी ने इसका वर्णन शुरू किया।
नाभिराज भरत क्षेत्र के मध्यम-आर्य खंड में चौदह कुलकरों में अंतिम परंतु श्रेष्ठ थे। वे सूर्य-से तेजस्वी, चंद्र-से विद्या-संपन्न, इंद्र-से ऐश्वर्यशाली और कल्पवृक्ष-से फलदायी थे। उनकी पत्नी मरुदेवी रूप, सौंदर्य, बुद्धि और शोभा में इंद्राणी-सी थीं। उनका शरीर कृश, ओठ बिंबफल-से, भौंहें और चरण कमल-से थे। उनके गुणों से संगीत और नाट्यशास्त्र की रचना प्रेरित मालूम होती थी। वे अन्य स्त्रियों के सौंदर्य को मात देती थीं।
नाभिराज और मरुदेवी का विवाह देवों ने भव्यता से संपन्न कराया। दोनों पुण्यवान थे। इंद्र ने उनकी नगरी अयोध्या बनाई, जो साकेत, सुकोशला और विनीता नामों से भी जानी गई। यह नगरी स्वर्ग-सी सुंदर, प्राकार और परिखा से युक्त थी। दोनों ने वहाँ निवास शुरू किया। छह माह बाद ऋषभदेव के अवतार की सूचना पर देवों ने रत्नवर्षा की, जो नौ माह तक चली।
मरुदेवी ने एक रात सोलह शुभ स्वप्न देखे: हाथी, बैल, सिंह, लक्ष्मी, मालाएँ, चंद्रमा, सूर्य, कलश, मछलियाँ, सरोवर, समुद्र, सिंहासन, विमान, नागभवन, रत्नराशि और अग्नि। सुवर्णमय बैल उनके मुख में प्रवेश करता दिखा। जागकर उन्होंने नाभिराज को बताया। नाभिराज ने फल बताया कि उनका पुत्र बलशाली, सर्वज्ञ, तीर्थंकर और मोक्षदायी होगा।
ऋषभदेव मरुदेवी के गर्भ में अवतीर्ण हुए। देवों ने गर्भकल्याणक मनाया। दिक्कुमारियाँ उनकी सेवा में लगीं, शोभा और गुण बढ़ाए। मरुदेवी तेजस्वी हुईं। देवियों ने नृत्य, संगीत, काव्य और पहेलियों से उनका मनोरंजन किया। गर्भ में ऋषभदेव होने पर भी मरुदेवी को कष्ट नहीं हुआ। वे लक्ष्मी-सी शोभित हुईं, और नाभिराज धैर्यपूर्वक पुत्र की प्रतीक्षा करते रहे।
आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन
पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 216
आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन
पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 209 | श्लोक 210 से 213
आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन
पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 224
आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन
पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 192 | श्लोक 193 से 208 | श्लोक 209 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 275
आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन
पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 257
आदिपुराण पर्व 18 – धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन
पर्व 18 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 202 | श्लोक 203 से 209
आदिपुराण पर्व 19 – नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन
पर्व 19 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192
आदिपुराण पर्व 20 – भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन
पर्व 20 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 193 | श्लोक 194 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 253 | श्लोक 254 से 261 | श्लोक 262 से 273
आदिपुराण पर्व 21 – ध्यानतत्त्व का वर्णन
पर्व 21 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 95 | श्लोक 96 से 111 | श्लोक 112 से 120 | श्लोक 121 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 205 | श्लोक 206 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 268
आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन
पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 316
आदिपुराण पर्व 23 – समवसरणविभूति का वर्णन
पर्व 23 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 196
आदिपुराण पर्व 24 – भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन
पर्व 24 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 172 | श्लोक 173 से 181 | श्लोक 182 से 186
आदिपुराण पर्व 25 – भगवान के विहार का दर्शन करने वाला
पर्व 25 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 110 | श्लोक 111 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 143 | श्लोक 144 से 155 | श्लोक 156 से 167 | श्लोक 168 से 178 | श्लोक 179 से 190 | श्लोक 191 से 203 | श्लोक 204 से 217 | श्लोक 218 से 231 | श्लोक 232 से 244 | श्लोक 245 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 290
आदिपुराण भाग – 2
आदिपुराण पर्व 26 – भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन
पर्व 26 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 128 | श्लोक 129 से 147 | श्लोक 148 से 150
आदिपुराण पर्व 27 – भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन
पर्व 27 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152
आदिपुराण पर्व 28 – पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन
पर्व 28 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला
पर्व 29 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 66 | श्लोक 67 से 81 | श्लोक 82 से 90 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 169
आदिपुराण पर्व 30 – पश्चिम समुद्र के द्वारका विजय वर्णन
पर्व 30 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 34 | श्लोक 35 से 50 | श्लोक 51 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 129
आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन
पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 159
आदिपुराण पर्व 32 -उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन
पर्व 32 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 130 | श्लोक 131 से 141 | श्लोक 142 से 154 | श्लोक 155 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 199
आदिपुराण पर्व 33 – भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन
पर्व 33 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 27 | श्लोक 28 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 164 | श्लोक 165 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 202
आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन
पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223
आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन
पर्व 35 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 249
आदिपुराण पर्व 36 – बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन
पर्व 36 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 212
आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन
पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 201 | श्लोक 202 से 205
आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन
पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223 | श्लोक 224 से 231 | श्लोक 232 से 240 | श्लोक 241 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 293 | श्लोक 294 से 303 | श्लोक 304 से 313
आदिपुराण पर्व 39 – दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन
पर्व 39 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211
आदिपुराण पर्व 40 – द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन
पर्व 40 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 31 | श्लोक 32 से 42 | श्लोक 43 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223
आदिपुराण पर्व 41 – भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन
पर्व 41 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 158
आदिपुराण पर्व 42 – भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला
पर्व 42 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन
पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 46 | श्लोक 47 से 69 | श्लोक 70 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 264 | श्लोक 265 से 275 | श्लोक 276 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 339
आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन
पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 103 | श्लोक 104 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 203 | श्लोक 204 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 322 | श्लोक 323 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 352 | श्लोक 353 से 361 | श्लोक 362 से 367
आदिपुराण पर्व 45 – जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन
पर्व 45 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 103 | श्लोक 104 से 113 | श्लोक 114 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 160 | श्लोक 161 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 219
आदिपुराण पर्व 46 – जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन
पर्व 46 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 100 | श्लोक 101 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 170 | श्लोक 171 से 181 | श्लोक 182 से 194 | श्लोक 195 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 255 | श्लोक 256 से 271 | श्लोक 272 से 286 | श्लोक 287 से 296 | श्लोक 297 से 313 | श्लोक 314 से 322 | श्लोक 323 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 361 | श्लोक 362 से 369
आदिपुराण पर्व 47 – प्रथम तीर्थंकर और प्रथम चक्रवर्ती का वर्णन
पर्व 47 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 30 | श्लोक 31 से 45 | श्लोक 46 से 64 | श्लोक 65 से 108 | श्लोक 109 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223 | श्लोक 224 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 273 | श्लोक 274 से 283 | श्लोक 284 से 303 | श्लोक 304 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 342 | श्लोक 343 से 354 | श्लोक 355 से 371 | श्लोक 372 से 381 | श्लोक 382 से 391 | श्लोक 392 से 403
उत्तरपुराण पर्व 48 अजितनाथ तीर्थंकर तथा सगर चक्रवर्ती का वर्णन
पर्व 48 – श्लोक 1 से 8 | श्लोक 9 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 73 | श्लोक 74 से 84 | श्लोक 85 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 143
उत्तरपुराण के अड़तालीसवें पर्व में द्वितीय तीर्थंकर भगवान अजितनाथ और सगर चक्रवर्ती के जीवनचरित्र द्वारा धर्म, वैराग्य, तप, मित्रता और मोक्षमार्ग का महान उपदेश दिया गया है। प्रारम्भ में भगवान अजितनाथ की वंदना करते हुए उनके दिव्य गुणों, निर्मल वाणी और मोक्षदायक चरित्र का महत्त्व बताया गया है। पूर्वविदेह के वत्स देश के राजा विमलवाहन ने धर्म, वैराग्य और सोलह भावनाओं के प्रभाव से तीर्थंकर नामकर्म बाँधा, विजय अनुत्तर विमान में देव हुए और पुनर्जन्म लेकर भरतक्षेत्र में राजा जितशत्रु तथा रानी विजयसेना के यहाँ अजितनाथ के रूप में अवतीर्ण हुए। शुभ स्वप्नों, जन्मकल्याणक और राज्यकाल के पश्चात उन्होंने संसार की अस्थिरता को समझकर राज्य त्याग दिया, दीक्षा ग्रहण की, बारह वर्ष तप किया और केवलज्ञान प्राप्त कर विशाल धर्मसंघ सहित जगत को मोक्षमार्ग का उपदेश दिया। अंततः सम्मेदाचल पर शुक्लध्यान द्वारा समस्त कर्मों का क्षय कर उन्होंने निर्वाण प्राप्त किया।
इसी तीर्थ में सगर चक्रवर्ती का चरित्र आरम्भ होता है, जिसका पूर्वभव राजा जयसेन था। पुत्रशोक से वैराग्य प्राप्त कर जयसेन ने दीक्षा ली, देवगति प्राप्त की और पुनर्जन्म में अयोध्या के राजा समुद्रविजय के यहाँ सगर के रूप में उत्पन्न हुआ। सगर ने चक्ररत्न से दिग्विजय कर छह खण्डों पर राज्य किया, परंतु उसका मित्र मणिकेतु देव बार-बार उसे संसार की नश्वरता और मोक्षमार्ग का स्मरण कराता रहा। पुत्रमोह के कारण सगर प्रारम्भ में विरक्त नहीं हुआ। अंततः मणिकेतु ने नीति और करुणा से प्रेरित कठोर उपाय अपनाकर उसके साठ हजार पुत्रों के माध्यम से उसे गहन वैराग्य की ओर प्रवृत्त किया। पुत्रशोक से जाग्रत होकर सगर ने राज्य भगीरथ को सौंप दिया और दीक्षा ग्रहण कर तपमार्ग अपनाया। उसके पुत्रों ने भी जिनधर्म स्वीकार किया और सभी ने तप द्वारा अंततः मोक्ष प्राप्त किया। भगीरथ ने भी राज्यत्याग कर गंगातट पर तप किया, जिससे गंगा तीर्थरूप में प्रतिष्ठित हुई।
इस पर्व का मूल संदेश यह है कि साम्राज्य, यौवन, पुत्र, वैभव और भोग सब नश्वर हैं; सच्चा हितैषी मित्र वही है जो आत्मकल्याण के लिए सत्य मार्ग दिखाए; और धर्म, तप, सम्यग्दर्शन तथा वैराग्य ही जीव को संसार से मुक्त कर मोक्ष तक पहुँचाते हैं। भगवान अजितनाथ और सगर चक्रवर्ती दोनों के चरित्र आत्मविजय से परम सिद्धि तक की प्रेरणादायी यात्राएँ हैं।
उत्तरपुराण पर्व 49 संभवनाथ तीर्थंकर का पुराण वर्णन
पर्व 49 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 59
भगवान् संभवनाथ, जिनका ज्ञान दर्पण के समान समस्त पदार्थों को प्रकाशित करता है और जो मिथ्यात्व तथा पाखण्ड का नाश करने वाले हैं, उनके पूर्वभव का आरम्भ पूर्व विदेह क्षेत्र के क्षेमपुर नगर के राजा विमलवाहन से होता है। राजा विमलवाहन ने संसार की नश्वरता, मृत्यु की अनिवार्यता, आयु की क्षणभंगुरता और विषयभोगों की असारता पर गंभीर चिंतन किया। उन्होंने समझा कि जीव मोहवश मृत्यु के मुख में रहते हुए भी जागृत नहीं होता। इस वैराग्य से प्रेरित होकर उन्होंने राज्य अपने पुत्र को सौंप दिया, जिनदीक्षा धारण की, ग्यारह अंगों का अध्ययन किया और सोलह कारण भावनाओं द्वारा तीर्थंकर नामकर्म का बन्ध किया। जीवनांत में वे प्रथम ग्रैवेयक के सुदर्शन विमान में अहमिन्द्र देव हुए।
देवलोक से च्युत होकर वही जीव भरत क्षेत्र की श्रावस्ती नगरी में राजा दृढ़राज्य और रानी सुषेणा के यहाँ अवतरित हुआ। रानी ने गर्भाधान से पूर्व सोलह शुभ स्वप्न देखे, और कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान् संभवनाथ का जन्म हुआ। उनके जन्म से लोक में आनंद छा गया। देवों ने उनके दिव्य स्वरूप, अनुपम तेज, जन्मजात त्रिज्ञान और लोकहितकारी महिमा की स्तुति की। उनका नाम ‘संभव’ इस कारण प्रसिद्ध हुआ कि उनके जन्म मात्र से जीवों के सुख और कल्याण की संभावना प्रकट हुई।
दीर्घकाल तक राज्यवैभव और देवोपम सुखों का उपभोग करने के बाद भगवान् संभवनाथ ने मेघों की चंचलता देखकर पुनः संसार की अनित्यता का विचार किया। उन्होंने अनुभव किया कि आयुकर्म ही जीव का वास्तविक यम है, शरीर नाशवान है, विषय विषतुल्य हैं और लक्ष्मी विद्युत् के समान चंचल है। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि केवल आत्मज्ञान और वैराग्य ही मोक्ष का मार्ग है। अतः उन्होंने राज्य त्यागकर सहस्र राजाओं सहित दीक्षा ग्रहण की और दीक्षा लेते ही मनःपर्ययज्ञान प्राप्त किया।
चौदह वर्षों तक कठोर तप, संयम और मौनपूर्वक छद्मस्थ अवस्था में रहने के पश्चात् भगवान् संभवनाथ ने शाल्मली वृक्ष के नीचे ध्यानस्थ होकर चार घातिया कर्मों का नाश किया और केवलज्ञान प्राप्त किया। ज्ञानकल्याणक के अवसर पर देवों ने महोत्सव मनाया। तत्पश्चात् उन्होंने विशाल धर्मतीर्थ की स्थापना की, जिसमें असंख्य मुनि, आर्यिकाएँ, श्रावक, श्राविकाएँ, गणधर, केवलज्ञानी और देव सम्मिलित हुए। वे चौंतीस अतिशयों, आठ प्रातिहार्यों और दिव्यध्वनि से विभूषित होकर लोक-अलोक को प्रकाशित करते रहे।
भगवान् संभवनाथ का तेज, शुद्धता और धर्मप्रभाव चन्द्रमा से भी श्रेष्ठ कहा गया, क्योंकि उन्होंने केवल बाह्य अंधकार ही नहीं, बल्कि जीवों के आंतरिक अज्ञान का भी नाश किया। अंततः जब आयु का अंतिम समय निकट आया, तब वे सम्मेदशिखर पहुँचे, प्रतिमायोग धारण किया और चैत्र शुक्ल षष्ठी को निर्वाण प्राप्त कर सिद्धपद को प्राप्त हुए। इस प्रकार पूर्वभव के विमलवाहन राजा, फिर अहमिन्द्र देव और अंततः पंचकल्याणक सम्पन्न द्वितीय तीर्थंकर संभवनाथ भगवान् ने अनन्त जीवों के लिए मोक्षमार्ग को प्रकाशित किया।
उत्तरपुराण पर्व 50 श्री अभिनन्दनस्वामी का पुराण वर्णन
पर्व 50 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 53 | श्लोक 54 से 63 | श्लोक 64 से 70
श्री अभिनन्दननाथ स्वामी, जिनके सत्यस्वरूप से जिनवाणी की प्रमाणिकता प्रकट होती है, समस्त भक्तों के रक्षक और आनंददाता हैं। उनके पूर्वभव में वे पूर्व विदेह क्षेत्र के मंगलावली देश स्थित रत्नसंचय नगर के महाप्रतापी, न्यायशील और धर्मनिष्ठ राजा महाबल थे। उनके राज्य में प्रजा पूर्ण सुखी थी और अन्याय का नाम भी नहीं था। सांसारिक वैभव का दीर्घकाल उपभोग करने के बाद उनमें वैराग्य उत्पन्न हुआ। उन्होंने पुत्र धनपाल को राज्य देकर विमलवाहन मुनि से दीक्षा ली, ग्यारह अंगों का अध्ययन किया और सोलह कारण भावनाओं के चिंतन से तीर्थंकर नामकर्म का बंध किया।
समाधिमरण के पश्चात वे विजय अनुत्तर विमान में अहमिन्द्र देव बने। वहाँ से आयु पूर्ण होने पर भरत क्षेत्र की अयोध्या नगरी में इक्ष्वाकुवंशी राजा स्वयंवर और रानी सिद्धार्था के यहाँ गर्भावतार हुआ। रानी ने शुभ स्वप्न देखे और माघ शुक्ल द्वादशी को भगवान अभिनन्दननाथ का जन्म हुआ। इन्द्र ने सुमेरु पर्वत पर उनका जन्माभिषेक कर उन्हें ‘अभिनन्दन’ नाम दिया।
भगवान अभिनन्दननाथ का शरीर अत्यंत विशाल, स्वर्णमय आभायुक्त और अनुपम तेजस्वी था। युवावस्था में पिता द्वारा राज्य प्रदान किए जाने पर उन्होंने आदर्श शासन किया। उनके भीतर जन्मजात सम्यग्दर्शन, अद्भुत पुण्य, धर्मनिष्ठा और लोककल्याणकारी शक्ति विद्यमान थी। वे समस्त राजाओं के अधिपति होते हुए भी अंतर्मन से वैराग्य की ओर अग्रसर थे।
एक दिन मेघों में उत्पन्न होकर नष्ट होते महल को देखकर उन्हें संसार की क्षणभंगुरता का गहन बोध हुआ। उन्होंने शरीर, आयु और सम्पत्ति की अनित्यता पर विचार कर वैराग्य स्वीकार किया। लौकान्तिक देवों की प्रेरणा से उन्होंने हजार राजाओं सहित माघ शुक्ल द्वादशी को दीक्षा ग्रहण की और उसी समय मनःपर्ययज्ञान प्राप्त किया।
दीक्षा के पश्चात कठोर तप, मौन और साधना करते हुए अठारह वर्ष बाद पौष शुक्ल चतुर्दशी को असन वृक्ष के नीचे उन्हें केवलज्ञान प्राप्त हुआ। देवों ने समवसरण की रचना की और उन्होंने विशाल धर्मसंघ के साथ धर्मोपदेश देकर असंख्य जीवों का कल्याण किया। उनके संघ में लाखों मुनि, आर्यिकाएँ, श्रावक-श्राविकाएँ तथा असंख्य देव सम्मिलित थे।
भगवान अभिनन्दननाथ ने दीर्घकाल तक धर्मवृष्टि करते हुए आर्यखण्ड में विहार किया और अंततः सम्मेदगिरि पर वैशाख शुक्ल षष्ठी के दिन पुनर्वसु नक्षत्र में अनेक मुनियों सहित मोक्ष प्राप्त किया। इन्द्रों ने उनके पंचकल्याणकों की महिमा का स्तवन किया। इस प्रकार पूर्वभव के महाबल, देवभव के अहमिन्द्र और वर्तमान के तीर्थंकर अभिनन्दननाथ—तीनों अवस्थाओं से विभूषित प्रभु अभिनन्दननाथ समस्त भव्य जीवों को निर्भयता, सत्य और मोक्षमार्ग की प्रेरणा प्रदान करते हैं।
उत्तरपुराण पर्व 51 सुमतिनाथ तीर्थंकर का पुराण वर्णन
पर्व 51 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 87
उत्तरपुराण के इक्यावनवें पर्व में भगवान सुमतिनाथ तीर्थंकर के पूर्वभव, जन्म, वैराग्य, दीक्षा, केवलज्ञान और निर्वाण का अत्यंत प्रेरक वर्णन है। पूर्वजन्म में वे धातकीखण्ड द्वीप के पुण्डरीकिणी नगर के धर्मात्मा और न्यायप्रिय राजा रतिषेण थे, जिन्होंने संसार की नश्वरता और भोगों की सीमितता को समझकर यह निष्कर्ष निकाला कि केवल निष्पाप मुनिधर्म ही जीव का वास्तविक कल्याण कर सकता है। उन्होंने राज्य त्यागकर दीक्षा धारण की, कठोर तप किया और तीर्थंकर प्रकृति का बन्ध कर वैजयन्त विमान में अहमिन्द्र देव हुए। वहाँ से आयु पूर्ण होने पर वे अयोध्या के राजा मेघरथ और रानी मंगला के यहाँ गर्भस्थ हुए। रानी ने शुभ स्वप्न देखे और चैत्र शुक्ल एकादशी को भगवान सुमतिनाथ का जन्म हुआ। इन्द्रों ने सुमेरु पर्वत पर उनका जन्माभिषेक कर उन्हें ‘सुमति’ नाम प्रदान किया।
भगवान सुमतिनाथ का शरीर दिव्य लक्षणों, अनुपम सौन्दर्य और अद्वितीय तेज से युक्त था। कुमार और युवावस्था में वे राज्यवैभव, धर्म, अर्थ और लोककल्याण में स्थित रहे, परंतु विषयभोगों में आसक्त नहीं हुए। वे हिंसा, असत्य, चोरी, परिग्रह, आर्तध्यान और रौद्रध्यान से सर्वथा रहित थे। संसार की असारता का गहन चिंतन कर उनमें वैराग्य उत्पन्न हुआ और उन्होंने समझा कि आत्मस्वरूप की स्थिरता बिना सम्यग्ज्ञान और वैराग्य के संभव नहीं। तत्पश्चात लौकान्तिक देवों की प्रेरणा से उन्होंने वैशाख शुक्ल नवमी को सहस्र राजाओं सहित दीक्षा धारण की और मनःपर्ययज्ञान प्राप्त किया।
दीक्षा के उपरांत भगवान ने कठोर तप, संयम और साधना द्वारा कर्मक्षय किया। बीस वर्ष के तपश्चर्या पश्चात प्रियंगु वृक्ष के नीचे उन्हें केवलज्ञान प्राप्त हुआ। उनके समवसरण में असंख्य देव, मनुष्य, मुनि, आर्यिकाएँ, श्रावक और श्राविकाएँ उपस्थित हुए। उन्होंने अठारह क्षेत्रों में विहार कर दिव्यध्वनि द्वारा भव्य जीवों को रत्नत्रय, सम्यग्दर्शन और मोक्षमार्ग का उपदेश दिया। अंततः सम्मेदगिरि पर प्रतिमायोग धारण कर चैत्र शुक्ल एकादशी को उन्होंने निर्वाण प्राप्त किया। इस प्रकार राजा रतिषेण से अहमिन्द्र और फिर तीर्थंकर सुमतिनाथ तक की उनकी यात्रा आत्मशुद्धि, वैराग्य, तप, सर्वज्ञता और मोक्ष की परम साधना का आदर्श प्रस्तुत करती है।
उत्तरपुराण पर्व 52 पद्मप्रभ भगवान् के पुराण का वर्णन
पर्व 52 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 43 | श्लोक 44 से 52 | श्लोक 53 से 64 | श्लोक 65 से 70
उत्तरपुराण के बावनवें पर्व में छठे तीर्थंकर भगवान पद्मप्रभ के पूर्वभव, जन्म, राज्य, वैराग्य, दीक्षा, केवलज्ञान और निर्वाण का विस्तृत एवं प्रेरणादायक वर्णन है। पूर्वभव में वे धातकीखण्ड द्वीप के वत्स देश की सुसीमा नगरी के अपराजित नामक प्रतापी, सत्यनिष्ठ, दानी और धर्मपरायण राजा थे। उनके राज्य में समृद्धि, न्याय, दया और सुख की वृद्धि थी तथा प्रजा सर्वथा संतुष्ट थी। संसार की समस्त अवस्थाओं को क्षणभंगुर समझकर उनमें वैराग्य उत्पन्न हुआ। उन्होंने पुत्र को राज्य देकर दीक्षा धारण की, ग्यारह अंगों का अध्ययन किया, तीर्थंकर प्रकृति का बन्ध किया और समाधिमरण के पश्चात ऊर्ध्व ग्रैवेयक में अहमिन्द्र देव हुए।
अहमिन्द्र अवस्था पूर्ण होने पर वे जम्बूद्वीप की कौशाम्बी नगरी में राजा धरण और रानी सुसीमा के यहाँ गर्भस्थ हुए। रानी ने शुभ स्वप्न देखे और कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को लाल कमल के समान कान्तिवान पुत्र का जन्म हुआ। इन्द्रों ने मेरु पर्वत पर जन्माभिषेक कर उनका नाम ‘पद्मप्रभ’ रखा। भगवान पद्मप्रभ का रूप, तेज, सौन्दर्य और दिव्य लक्षण अनुपम थे। वे युवावस्था में एकछत्र सम्राट बने और उनके शासन में दरिद्रता, भय तथा अशांति समाप्त हो गई। समस्त राज्य में धर्म, सुख और समृद्धि का विस्तार हुआ।
पूर्वभव स्मरण और तत्त्वचिंतन से भगवान पद्मप्रभ को संसार, शरीर और विषयभोगों की नश्वरता का गहन बोध हुआ। उन्होंने अनुभव किया कि इन्द्रियसुख बार-बार भोगे जाने पर भी आत्मा को तृप्त नहीं कर सकते। शरीर रोगों का निवास है और केवल आत्मज्ञान ही वास्तविक कल्याण का मार्ग है। इस वैराग्य से प्रेरित होकर उन्होंने कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को एक हजार राजाओं सहित दीक्षा धारण की तथा मनःपर्ययज्ञान प्राप्त किया। कठोर तप, संयम, गुप्ति, समिति और चारित्र के द्वारा उन्होंने कर्मों का क्षय किया और छह माह की साधना के पश्चात केवलज्ञान प्राप्त किया।
केवलज्ञान के उपरांत भगवान पद्मप्रभ का विशाल धर्मसंघ स्थापित हुआ, जिसमें असंख्य मुनि, आर्यिकाएँ, श्रावक, श्राविकाएँ और देवगण सम्मिलित थे। उन्होंने दिव्यध्वनि द्वारा भव्य जीवों को सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और मोक्षमार्ग का उपदेश दिया। अंततः सम्मेदशिखर पर प्रतिमायोग धारण कर फाल्गुन कृष्ण चतुर्थी को उन्होंने निर्वाण प्राप्त किया। इस प्रकार राजा अपराजित से अहमिन्द्र और फिर तीर्थंकर पद्मप्रभ तक की उनकी यात्रा संसार की नश्वरता के बोध, वैराग्य, तप, आत्मज्ञान और मोक्ष की महान साधना का दिव्य आदर्श प्रस्तुत करती है।
उत्तरपुराण पर्व 53 सुपार्श्वनाथ स्वामीका पुराण का वर्णन
पर्व 53 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 34 | श्लोक 35 से 42 | श्लोक 43 से 51 | श्लोक 52 से 56
उत्तरपुराण के त्रेपन्नवें पर्व में सप्तम तीर्थंकर भगवान सुपार्श्वनाथ के पूर्वभव, जन्म, वैराग्य, दीक्षा, केवलज्ञान और निर्वाण का अत्यंत प्रेरक वर्णन किया गया है। पूर्वभव में वे धातकीखण्ड के पूर्व विदेह क्षेत्र के सुकच्छ देश की क्षेमपुर नगरी के राजा नन्दिषेण थे। वे बुद्धिमान, पराक्रमी, धर्मपरायण और लोकहितकारी शासक थे, जिनके राज्य में सुख, समृद्धि और नीति का साम्राज्य था। यद्यपि वे धर्म, अर्थ और काम तीनों पुरुषार्थों से सम्पन्न थे, फिर भी उन्होंने संसार के अनादि बन्धन, मोह और कर्मचक्र की पीड़ा को समझकर वैराग्य धारण किया। उन्होंने पुत्र धनपति को राज्य सौंपकर अर्हन्नन्दन मुनि से दीक्षा ली, ग्यारह अंगों का अध्ययन किया, सोलह कारण भावनाओं द्वारा तीर्थंकर नामकर्म का बन्ध किया और संन्यासमरण के पश्चात मध्यम ग्रैवेयक के सुभद्र विमान में अहमिन्द्र देव हुए।
अहमिन्द्र अवस्था पूर्ण होने पर वे जम्बूद्वीप के भारत क्षेत्र की काशी देश स्थित बनारस नगरी में राजा सुप्रतिष्ठ और रानी पृथिवीषेणा के यहाँ गर्भस्थ हुए। रानी ने शुभ स्वप्न देखे और ज्येष्ठ शुक्ल द्वादशी को भगवान सुपार्श्वनाथ का जन्म हुआ। इन्द्रों ने सुमेरु पर्वत पर जन्माभिषेक कर उनका नाम ‘सुपार्श्व’ रखा। वे प्रियंगु पुष्प के समान कान्तिमान, दिव्य लक्षणों से युक्त, तीन ज्ञानों के धारक और अलौकिक पुण्यसम्पन्न थे। युवावस्था में उन्होंने राज्य स्वीकार किया, किन्तु विपुल भोग-संपदा के बीच भी आत्मसंयम, धर्मनिष्ठा और वैराग्य बनाए रखा।
ऋतु परिवर्तन और संसार की नश्वरता के चिंतन से भगवान सुपार्श्वनाथ को राज्य, वैभव और भोगों की असारता का बोध हुआ। उन्होंने समझा कि मायामय संसार में आसक्ति दुःख का कारण है और आत्मज्ञान ही शाश्वत कल्याण का पथ है। लौकान्तिक देवों की प्रेरणा से उन्होंने ज्येष्ठ शुक्ल द्वादशी को सहेतुक वन में एक हजार राजाओं सहित दीक्षा धारण की तथा तत्काल मनःपर्ययज्ञान प्राप्त किया। इसके पश्चात उन्होंने नौ वर्ष तक कठोर तप, मौन, संयम और ध्यान का पालन किया। शिरीष वृक्ष के नीचे फाल्गुन कृष्ण षष्ठी को उन्होंने केवलज्ञान प्राप्त किया। उनके समवसरण में विशाल मुनिसंघ, आर्यिकाएँ, श्रावक-श्राविकाएँ और असंख्य देवगण उपस्थित हुए तथा उन्होंने धर्मामृतमयी दिव्यध्वनि द्वारा जीवों को सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और मोक्षमार्ग का उपदेश दिया।
अंततः आयु पूर्ण होने पर भगवान सुपार्श्वनाथ सम्मेदशिखर पहुँचे, प्रतिमायोग धारण किया और फाल्गुन कृष्ण सप्तमी को समस्त कर्मों का क्षय कर मोक्ष प्राप्त किया। देवों ने उनके निर्वाणकल्याणक का उत्सव मनाया। इस प्रकार राजा नन्दिषेण से अहमिन्द्र और फिर भगवान सुपार्श्वनाथ तक की उनकी आत्मयात्रा संसार की नश्वरता के बोध, वैराग्य, तप, केवलज्ञान और मोक्ष की परम साधना का उज्ज्वल आदर्श प्रस्तुत करती है।
उत्तरपुराण पर्व 54 चन्द्रप्रभ पुराण का वर्णन
पर्व 54 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 |श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 |श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 193 | श्लोक 194 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 272 | श्लोक 273 से 276
आचार्य गुणभद्राचार्य रचित ‘उत्तरपुराण’ के 54वें पर्व में भगवान चन्द्रप्रभ (आठवें तीर्थंकर) के सात भवों का विस्तृत और आध्यात्मिक वर्णन है। भगवान चन्द्रप्रभ का जीव अपने प्रारंभिक भवों में श्रीषेण नामक राजा था। धर्मानुराग और तप के प्रभाव से वह क्रमशः स्वर्गों में देव (श्रीधर) और पृथ्वी पर महान प्रतापी राजाओं (अजितसेन और पद्मनाभ) के रूप में जन्मा। प्रत्येक भव में उन्होंने राज्य वैभव का उपभोग करते हुए भी वैराग्य को प्रधानता दी। अंत में, पद्मनाभ के भव में ‘सोलहकारण भावनाओं’ का चिंतन कर उन्होंने ‘तीर्थंकर नामकर्म’ का बंध किया और स्वर्ग में अहमिन्द्र पद प्राप्त किया।
अहमिन्द्र की आयु पूर्ण कर भगवान का जीव चन्द्रपुर नगर के राजा महासेन और माता लक्ष्मणा के यहाँ पुत्र रूप में अवतरित हुआ। रानी द्वारा देखे गए 16 मंगलकारी स्वप्नों ने उनके तीर्थंकर होने की घोषणा की। पौष कृष्ण एकादशी को उनका जन्म हुआ। सौधर्म इन्द्र ने सुमेरु पर्वत पर उनका जन्माभिषेक किया और नीलकमलों के समान उनकी आभा देखकर उनका नाम ‘चन्द्रप्रभ’ रखा।
भगवान का शरीर 150 धनुष ऊँचा और आयु 10 लाख पूर्व थी। उन्होंने 2.5 लाख पूर्व तक कुमार अवस्था और फिर 6.5 लाख पूर्व तक राज्य पद का संचालन किया। एक दिन दर्पण में अपना मुख देखते समय उन्हें शारीरिक नश्वरता का आभास हुआ और वैराग्य उत्पन्न हो गया। उन्होंने स्वीकार किया कि यह संसार अनित्य है और आत्म-कल्याण ही वास्तविक सुख है।
लौकान्तिक देवों द्वारा स्तुति किए जाने पर भगवान ने अपने पुत्र वरचन्द्र को राज्य सौंपा और 1,000 राजाओं के साथ निर्ग्रन्थ दीक्षा धारण की। तीन माह की कठोर तपस्या के उपरांत, फाल्गुन कृष्ण सप्तमी के दिन उन्हें केवलज्ञान प्राप्त हुआ। इन्द्रों ने उनके समवशरण की रचना की, जहाँ उनकी दिव्यध्वनि से प्राणियों का आत्मिक मार्ग प्रशस्त हुआ।
ऐशानेन्द्र ने भगवान की भक्तिपूर्ण स्तुति करते हुए उनके ‘अनेकान्त’ और ‘स्याद्वाद’ सिद्धांतों की महत्ता बताई। इन्द्र ने स्पष्ट किया कि भगवान का मार्ग नास्तिकता और अकर्मण्यता दोनों का निषेध करता है। उन्होंने भगवान को समस्त जीवों का रक्षक और मोक्ष रूपी साम्राज्य का अधिपति स्वीकार किया।
अंत में, भगवान चन्द्रप्रभ विहार करते हुए सम्मेद शिखर पर्वत पर पहुँचे। वहाँ एक माह का योग-निरोध कर फाल्गुन शुक्ल सप्तमी के दिन उन्होंने समस्त कर्मों का क्षय कर सिद्ध पद प्राप्त किया। देवों ने उनके निर्वाण कल्याणक की पूजा की।
यह पर्व शिक्षा देता है कि उच्च कुल, वैभव और स्वर्ग के सुख भी नश्वर हैं। वास्तविक लक्ष्य केवलज्ञान के माध्यम से जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति पाना है, जिसे भगवान चन्द्रप्रभ ने अपने कठिन पुरुषार्थ से सिद्ध किया।
उत्तरपुराण पर्व 55 पुष्पदन्त (सुविधिनाथ) पुराण का वर्णन
पर्व 55 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 | श्लोक 32 से 42 | श्लोक 43 से 51 | श्लोक 52 से 62
आचार्य गुणभद्राचार्य रचित ‘उत्तरपुराण’ के 55वें पर्व में नौवें तीर्थंकर भगवान पुष्पदन्त (सुविधिनाथ) के जीवन चरित्र और उनके पूर्व भवों का वर्णन है। भगवान सुविधिनाथ का जीव अपने पूर्व भव में पुष्कलावती देश की पुण्डरीकिणी नगरी का प्रतापी राजा महापद्म था। वह प्रजावत्सल और नीतिवान शासक था, जिसके राज्य में प्रजा अत्यंत सुखी थी। एक दिन ‘भूतहित’ जिनराज के दर्शन और उनके उपदेश से राजा को आत्मज्ञान हुआ। संसार को दुखों का कारण मानकर उन्होंने अपने पुत्र धनद को राज्य सौंपा और दीक्षा धारण कर ली। सोलहकारण भावनाओं के चिंतन से उन्होंने तीर्थंकर नामकर्म का बंध किया और प्राणत स्वर्ग में इन्द्र हुए।
स्वर्ग से च्युत होकर भगवान का जीव काकन्दी नगरी के राजा सुग्रीव और रानी जयरामा के यहाँ अवतरित हुआ। मार्गशीर्ष शुक्ल प्रतिपदा को भगवान का जन्म हुआ। इन्द्रों ने सुमेरु पर्वत पर उनका जन्माभिषेक किया। उनकी देह की कान्ति कुन्द पुष्प के समान श्वेत थी और उनके दाँत अत्यंत सुंदर (पुष्प के समान) थे, इसलिए इन्द्र ने उनका नाम ‘पुष्पदन्त’ और श्रेष्ठ विधि के प्रदाता होने के कारण ‘सुविधिनाथ’ रखा।
भगवान का शरीर 100 धनुष ऊँचा और आयु 2 लाख पूर्व थी। उन्होंने लंबे समय तक राज्य सुखों का उपभोग किया। एक दिन आकाश में उल्कापात (टूटते तारे) को देखकर उन्हें संसार की क्षणभंगुरता का बोध हुआ। उन्होंने विचार किया कि यह शरीर और संसार इन्द्रजाल के समान मायावी हैं, केवल आत्मा ही शाश्वत सत्य है। इस बोध के साथ ही उन्होंने विरक्त होकर राज्य त्यागने का निर्णय लिया।
लौकान्तिक देवों की प्रार्थना पर भगवान ने पुत्र सुमति का राज्याभिषेक किया और 1,000 राजाओं के साथ निर्ग्रन्थ दीक्षा अंगीकार की। चार वर्ष की कठोर तपस्या और मौन साधना के बाद, कार्तिक शुक्ल द्वितीया के दिन उन्हें केवलज्ञान प्राप्त हुआ। इन्द्रों ने उनके लिए दिव्य समवशरण की रचना की, जहाँ से उन्होंने भव्य जीवों को मोक्षमार्ग का उपदेश दिया।
भगवान सुविधिनाथ के संघ में विदर्भ आदि 88 गणधर और 2 लाख मुनिराज थे। उन्होंने आर्य देशों में विहार कर धर्म की प्रभावना की। अंत में, वे सम्मेद शिखर पर्वत पर पहुँचे और 1,000 मुनियों के साथ योग निरोध किया। भाद्रपद शुक्ल अष्टमी के दिन भगवान ने समस्त कर्मों का क्षय कर निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त किया।
यह पर्व संदेश देता है कि चक्रवर्ती जैसा वैभव और स्वर्ग के सुख भी आत्मा को पूर्ण तृप्ति नहीं दे सकते। वास्तविक सुख की प्राप्ति केवल वैराग्य, आत्म-चिंतन और तप के माध्यम से मोक्ष प्राप्त करने में ही निहित है।
उत्तरपुराण पर्व 56 शीतल पुराण का वर्णन
पर्व 56 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 55 | श्लोक 56 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 96
इस पर्व में शीतलनाथ भगवान् के पूर्वभव, जन्म, वैराग्य, दीक्षा, केवलज्ञान और मोक्ष का वर्णन किया गया है। प्रारम्भ में राजा पद्मगुल्म का परिचय दिया गया है, जो अत्यन्त प्रतापी, नीतिज्ञ और धर्मपूर्वक राज्य करने वाले राजा थे। वसन्त ऋतु और विषय-भोगों में आसक्त होने के बाद उन्होंने संसार की नश्वरता का विचार किया और वैराग्य धारण कर राज्य त्यागकर मुनि दीक्षा ग्रहण की। तप और आराधना के प्रभाव से उन्होंने तीर्थंकर नामकर्म का बन्ध किया तथा मृत्यु के बाद आरण स्वर्ग में इन्द्र हुए।
इसके पश्चात् वे भरत क्षेत्र में राजा दृढ़रथ की रानी सुनन्दा के गर्भ में अवतीर्ण हुए। शुभ स्वप्नों और देवों की पूजा के मध्य भगवान् शीतलनाथ का जन्म हुआ। देवों ने सुमेरु पर्वत पर उनका अभिषेक कर उन्हें “शीतलनाथ” नाम दिया। युवावस्था में उन्होंने आदर्श रूप से राज्य संचालन किया, किन्तु संसार की अनित्यता का अनुभव होने पर वैराग्य उत्पन्न हुआ। उन्होंने राज्य त्यागकर दीक्षा ली, कठोर तप किया और अंततः केवलज्ञान प्राप्त किया। उनके विशाल धर्मसंघ में असंख्य मुनि, आर्यिकाएँ, श्रावक और श्राविकाएँ सम्मिलित थे।
भगवान् शीतलनाथ ने अनेक जीवों को सम्यक्त्व और धर्ममार्ग का उपदेश दिया तथा अन्त में सम्मेदशिखर पर मोक्ष प्राप्त किया। उनके मोक्ष के पश्चात् कालदोष से धर्म की शुद्ध परम्परा क्षीण होने लगी। राजा मेघरथ की सभा में दान के स्वरूप पर चर्चा हुई, जहाँ मंत्री सत्यकीर्ति ने शास्त्रदान, अभयदान और आहारदान को श्रेष्ठ बताया तथा शास्त्रदान को सर्वोपरि सिद्ध किया। परन्तु मुण्डशालायन नामक ब्राह्मण ने लौकिक दानों का समर्थन कर राजा को भ्रमित किया। परिणामस्वरूप कुपात्र दान और मिथ्या परम्पराओं का प्रचार होने लगा। इस प्रकार पर्व में धर्म की महिमा, वैराग्य, मोक्षमार्ग और कालान्तर में धर्म के पतन का मार्मिक वर्णन किया गया है।
उत्तरपुराण पर्व 57
श्रेयांसनाथ तीर्थकर त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 57 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 62 | श्लोक 63 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 100
इस पर्व में श्रेयांसनाथ भगवान् के पूर्वभव, जन्म, वैराग्य, केवलज्ञान और मोक्ष का वर्णन किया गया है, साथ ही प्रथम नारायण त्रिपृष्ठ, विजय बलभद्र और अश्वग्रीव प्रतिनारायण के चरित्र का भी निरूपण किया गया है। प्रारम्भ में नलिनप्रभ नामक धर्मात्मा राजा का वर्णन आता है, जिन्होंने जिनेन्द्र भगवान् के उपदेश से वैराग्य प्राप्त कर राज्य त्याग दिया और संयम धारण किया। तप एवं आराधना के प्रभाव से वे अच्युत स्वर्ग में इन्द्र हुए और पुनः भरत क्षेत्र में राजा विष्णु तथा रानी सुनन्दा के यहाँ श्रेयांसनाथ भगवान् के रूप में अवतीर्ण हुए।
भगवान् श्रेयांसनाथ के जन्म से संसार में हर्ष और शान्ति फैल गई। देवों ने सुमेरु पर्वत पर उनका जन्माभिषेक किया। युवावस्था में उन्होंने आदर्श रूप से राज्य संचालन किया, किन्तु संसार की अनित्यता का अनुभव होने पर वैराग्य धारण कर दीक्षा ले ली। कठोर तपस्या के पश्चात् उन्होंने केवलज्ञान प्राप्त किया और विशाल धर्मसंघ सहित अनेक जीवों को धर्ममार्ग का उपदेश दिया। अन्ततः सम्मेदशिखर पर योगनिरोध कर उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया।
इसके बाद प्रथम नारायण त्रिपृष्ठ, विजय बलभद्र और अश्वग्रीव प्रतिनारायण के पूर्वभवों का वर्णन है। विश्वभूति राजा के पुत्र विश्वनन्दी और उनके भाई विशाखभूति के पुत्र विशाखनन्दी के बीच वैर उत्पन्न हुआ। युद्ध और अपमान की घटनाओं से विश्वनन्दी को वैराग्य हुआ और उन्होंने दीक्षा ग्रहण की, किन्तु अन्त समय में शल्य रहने से वे महाशुक्र स्वर्ग में देव होकर पुनः त्रिपृष्ठ नारायण बने। विशाखभूति विजय बलभद्र हुए और विशाखनन्दी अश्वग्रीव प्रतिनारायण बना।
त्रिपृष्ठ और विजय ने मिलकर अश्वग्रीव को पराजित कर विशाल साम्राज्य स्थापित किया। त्रिपृष्ठ अत्यधिक परिग्रह और विषय-भोगों में आसक्त रहा, जिसके कारण वह मृत्यु के बाद सातवें नरक में गया। अश्वग्रीव भी अधोगति को प्राप्त हुआ। दूसरी ओर विजय बलभद्र ने वैराग्य ग्रहण कर संयम धारण किया, अनगार केवली बने और अन्ततः मोक्ष प्राप्त किया। पर्व के अन्त में यह निष्कर्ष दिया गया है कि कर्म के प्रभाव से ही जीव सुख और दुःख को प्राप्त होता है तथा मोक्षमार्ग ही वास्तविक कल्याण का पथ है।
उत्तरपुराण पर्व 58
श्री वासुपूज्य जिनेन्द्र, द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण का वर्णन पर्व 58 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 53 | श्लोक 54 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 124
प्रारम्भ में पद्मोत्तर नामक धर्मात्मा राजा का वर्णन है, जिसने युगन्धर जिनराज के उपदेश से संसार की असारता को समझकर वैराग्य धारण किया और दीक्षा लेकर तप किया। उसी पुण्य के प्रभाव से वह महाशुक्र स्वर्ग में इन्द्र हुआ और वहाँ से च्युत होकर चम्पा नगरी में राजा वसुपूज्य और रानी जयावती के यहाँ वासुपूज्य भगवान के रूप में अवतीर्ण हुए। देवों ने उनका जन्माभिषेक किया और वे आगे चलकर महान तप, वैराग्य और केवलज्ञान को प्राप्त कर बारहवें तीर्थंकर बने। उन्होंने विशाल संघ सहित धर्मप्रभावना की और अंत में मोक्ष प्राप्त किया।
इसके बाद सुषेण राजा, विन्ध्यशक्ति और गुणमंजरी की कथा आती है। गुणमंजरी को लेकर हुए अपमान और युद्ध में सुषेण पराजित हुआ। बाद में उसने धर्म ग्रहण किया, किन्तु भीतर के वैरभाव के कारण स्वर्ग में जन्म लिया। दूसरी ओर वायुरथ राजा ने भी तप करके उच्च देवगति प्राप्त की। यही दोनों जीव आगे चलकर द्विपृष्ठ नारायण और अचल बलभद्र के रूप में जन्मे। दोनों भाई अत्यन्त पराक्रमी, गुणवान और परस्पर प्रेमयुक्त थे।
पूर्वभव का विन्ध्यशक्ति बाद में तारक प्रतिनारायण बना। वह अत्यन्त क्रूर और अहंकारी था। उसने द्विपृष्ठ और अचल की उन्नति से ईर्ष्या कर उन्हें अपमानित करने के लिए दूत भेजा और युद्ध छेड़ दिया। युद्ध में तारक का चक्र उलटा द्विपृष्ठ के अधीन हो गया और उसी चक्र से तारक मारा गया। इसके बाद द्विपृष्ठ तीन खण्डों का स्वामी नारायण बना और अचल बलभद्र के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
अन्त में दोनों भाइयों का भिन्न परिणाम बताया गया है। द्विपृष्ठ नारायण भोग और परिग्रह में आसक्त रहने के कारण मृत्यु के बाद सातवें नरक में गया, जबकि अचल बलभद्र ने वैराग्य लेकर संयम धारण किया और मोक्ष प्राप्त किया। पर्व का निष्कर्ष यह है कि कर्मों के अनुसार ही जीव की गति होती है; इसलिए मनुष्य को पाप त्यागकर पुण्य, संयम और धर्म का आश्रय लेना चाहिए।
उत्तरपुराण पर्व 59
विमलनाथ तीर्थंकर, धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर का वर्णन पर्व 59 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 125 | श्लोक 126 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 |श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 242 | श्लोक 243 से 252 | श्लोक 253 से 262 | श्लोक 263 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 312 | श्लोक 313 से 319
इस पर्व में मुख्यतः बलभद्र, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, जयन्त, विद्युदंष्ट्र, मेरु और मन्दर आदि जीवों के अनेक जन्मों तथा उनके कर्मफल का वर्णन किया गया है। कथा के माध्यम से यह बताया गया है कि मोह, निदान, क्रोध, लोभ और वैर जीव को दुःख एवं दुर्गति में डालते हैं, जबकि समता, संयम, तप और धर्म अंततः मोक्ष का कारण बनते हैं।
बलभद्र ने सामायिक संयम धारण कर कठोर तप किया और सूर्य के समान तेजस्वी एवं निर्मल होकर मोक्ष को प्राप्त हुए। दूसरी ओर स्वयंभू और मधु मोह तथा पापकर्मों के कारण दुर्गतियों को प्राप्त हुए। सुकेतु जैसे तपस्वी भी निदान-बन्ध के कारण कुगति में गये, इसलिए निदान को अत्यन्त त्याज्य बताया गया है।
विमलवाहन तीर्थंकर के तीर्थ में मेरु और मन्दर नामक दो महान् गणधर हुए। उनके पूर्वभवों का वर्णन करते हुए संजयन्त और जयन्त नामक राजकुमारों की कथा कही गई है। दोनों भाइयों ने तीर्थंकर के उपदेश से वैराग्य ग्रहण किया और संयम धारण किया। संजयन्त मुनि ने केवलज्ञान प्राप्त कर मोक्ष पाया, जबकि जयन्त ने धरणेन्द्र पद का निदान कर लिया और उसी फलस्वरूप धरणेन्द्र बना।
पूर्वजन्म के वैर से प्रेरित विद्युदंष्ट्र नामक विद्याधर ने संजयन्त मुनि पर भयंकर उपसर्ग किया। उसने उन्हें नदी में फेंक दिया तथा अन्य विद्याधरों को भ्रमित कर उन पर आक्रमण करवाया। संजयन्त मुनि ने समता और शुक्लध्यान से सब उपसर्ग सहन कर मोक्ष प्राप्त किया। धरणेन्द्र क्रोधित होकर विद्युदंष्ट्र को दण्ड देना चाहता था, पर आदित्याभ देव ने संसार की परिवर्तनशीलता और कर्मफल का उपदेश देकर उसका वैर शांत कराया।
इसके बाद अनेक पूर्वभवों की विस्तृत श्रृंखला वर्णित है। सत्यघोष नामक मंत्री ने लोभवश भद्रमित्र सेठ के रत्न हड़प लिये, जिसके कारण उसे अपमान, दण्ड और दुर्गति प्राप्त हुई। भद्रमित्र की सत्यनिष्ठा से प्रसन्न होकर राजा ने उसे सम्मान दिया। सत्यघोष अनेक भवों में सर्प, नरकी, अजगर और व्याध आदि बना तथा अपने वैरभाव के कारण बार-बार पापकर्म करता रहा।
भद्रमित्र, सिंहसेन, रामदत्ता, पूर्णचन्द्र, सिंहचन्द्र, रश्मिवेग, वज्रायुध और रत्नमाला आदि जीव अनेक जन्मों में परस्पर माता, पुत्र, भाई, पति-पत्नी और मित्र के रूप में जन्म लेते रहे। कहीं उन्होंने धर्म अपनाया, कहीं मोह और निदान में फँसे, तो कहीं कठोर तप एवं संयम द्वारा उच्च देवगति अथवा मोक्ष प्राप्त किया। कथा में बार-बार यह प्रतिपादित किया गया है कि संसार में कोई स्थायी सम्बन्ध नहीं है; कर्मानुसार जीव निरन्तर विभिन्न सम्बन्धों और योनियों में भ्रमण करता रहता है।
वज्रायुध मुनि, रश्मिवेग मुनि और अन्य तपस्वियों ने भयंकर उपसर्ग सहकर भी धर्म नहीं छोड़ा और अंततः उच्च देवगति या मोक्ष को प्राप्त हुए। वहीं काम, लोभ और धर्मभ्रष्टता के कारण विचित्रमति, अतिदारुण तथा विद्युदंष्ट्र जैसे जीव दुर्गतियों में गये। चोरी, कपट, क्रोध और हिंसा के दोषों का भी विस्तार से वर्णन किया गया है।
अंत में आदित्याभ देव ने धरणेन्द्र को समझाया कि संसार में कोई स्थायी शत्रु या मित्र नहीं होता; सब कर्मवश परिवर्तित होता रहता है। इस उपदेश से धरणेन्द्र का वैर शांत हुआ। बाद में वही आदित्याभ और धरणेन्द्र क्रमशः मेरु और मन्दर नामक गणधर बने तथा विमलनाथ भगवान् के शिष्य होकर मोक्षमार्ग के अग्रणी साधु बने।
पर्व के उपसंहार में कहा गया है कि इन सभी जीवों ने अपने-अपने कर्मों के अनुसार अनन्त सुख-दुःख भोगे, परन्तु अंततः समता, संयम और शुद्ध ध्यान के प्रभाव से पापरहित होकर परमपद को प्राप्त हुए। संजयन्त मुनि की समता, शुक्लध्यान और उपसर्ग-सहन की महिमा तथा मेरु-मन्दर गणधरों की वीतरागता की विशेष प्रशंसा की गई है।
उत्तरपुराण पर्व 60
अनन्तनाथ तीर्थंकर, सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायणके पुराणका वर्णन पर्व 60 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 42 | श्लोक 43 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 85
धातकीखण्ड द्वीप के अरिष्ट नगर के राजा पद्मरथ ने जिनेन्द्र के उपदेश से संसार की अनित्यता का बोध प्राप्त किया। उन्होंने राज्य त्यागकर दीक्षा ग्रहण की, तीर्थंकर प्रकृति का बन्ध किया और देह त्यागकर अच्युत स्वर्ग में इन्द्र पद प्राप्त किया। वहाँ से च्युत होकर वे अयोध्या के राजा सिंहसेन और रानी जयश्यामा के यहाँ जन्मे तथा आगे चलकर भगवान अनन्तनाथ तीर्थंकर बने।
अनन्तनाथ ने दीर्घकाल तक राज्य करने के पश्चात वैराग्य धारण किया, पुत्र को राज्य सौंपकर दीक्षा ली और कठोर तपस्या की। दो वर्ष की साधना के बाद उन्हें केवलज्ञान प्राप्त हुआ। उन्होंने विशाल धर्मसंघ का नेतृत्व करते हुए असंख्य जीवों को सम्यग्दर्शन और मोक्षमार्ग का उपदेश दिया। अंत में सम्मेदशिखर पर शुक्लध्यान द्वारा मोक्ष प्राप्त किया।
इसी काल में सुप्रभ बलभद्र और पुरुषोत्तम नारायण के पूर्वभवों का वर्णन आता है। पोदनपुर के राजा वसुषेण की रानी नन्दा का चण्डशासन द्वारा हरण कर लिया गया, जिससे दुःखी होकर वसुषेण ने दीक्षा ग्रहण की और तप के प्रभाव से देवगति प्राप्त की। दूसरी ओर महाबल नामक धर्मात्मा राजा ने भी वैराग्य लेकर संयम धारण किया और स्वर्ग में उत्पन्न हुआ।
बाद में महाबल का जीव सुप्रभ बलभद्र और वसुषेण का जीव पुरुषोत्तम नारायण के रूप में जन्मे। दोनों ने महान वैभव और साम्राज्य का उपभोग किया। उधर चण्डशासन अनेक भवों के बाद वाराणसी का राजा मधुसूदन बना। अहंकारवश उसने सुप्रभ और पुरुषोत्तम से कर माँगा, जिसके परिणामस्वरूप युद्ध हुआ। युद्ध में पुरुषोत्तम ने मधुसूदन का वध कर दिया और दोनों भाइयों ने व्यापक राज्य का शासन किया।
आयु पूर्ण होने पर हिंसात्मक कर्मों के कारण पुरुषोत्तम नारायण नरकगति को प्राप्त हुआ, जबकि उसके वियोग से विरक्त हुए सुप्रभ ने दीक्षा ग्रहण कर साधना की और मोक्ष प्राप्त किया। इस प्रकार यह पर्व दर्शाता है कि समान वैभव और सामर्थ्य प्राप्त होने पर भी जीव की गति उसके कर्म, भाव और आचरण पर निर्भर करती है; शुभ प्रवृत्ति मोक्ष का कारण बनती है और अशुभ प्रवृत्ति अधोगति का।
उत्तरपुराण पर्व 61
धर्मनाथ तीर्थकर, सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 61 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 90 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 130
इस पर्व में पंद्रहवें तीर्थंकर धर्मनाथ भगवान् के तीन भवों, उनके जन्म, वैराग्य, दीक्षा, केवलज्ञान और मोक्ष का वर्णन किया गया है। पूर्वभव में वे सुसीमा नगरी के राजा दशरथ थे। चन्द्रग्रहण देखकर उन्हें संसार से वैराग्य हुआ, उन्होंने संयम धारण किया, तीर्थंकर नामकर्म का बन्ध किया और सर्वार्थसिद्धि विमान में अहमिन्द्र देव हुए। वहाँ से च्युत होकर वे रत्नपुर के राजा भानु और रानी सुप्रभा के पुत्र रूप में धर्मनाथ भगवान् के रूप में जन्मे।
धर्मनाथ भगवान् ने दीर्घकाल तक आदर्श राज्य किया। उल्कापात देखकर उन्हें संसार की नश्वरता का बोध हुआ और उन्होंने पुत्र सुधर्म को राज्य देकर एक हजार राजाओं के साथ दीक्षा ग्रहण कर ली। कठोर तप और ध्यान के बाद उन्हें केवलज्ञान प्राप्त हुआ। विशाल धर्मसंघ की स्थापना कर उन्होंने असंख्य जीवों को धर्मोपदेश दिया और अंत में सम्मेदशिखर पर मोक्ष प्राप्त किया।
इसके बाद सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण और मधुक्रीड़ प्रतिनारायण के चरित्र का वर्णन है। पूर्वजन्म में सुमित्र राजा पराजय के कारण वैराग्य तो धारण करता है, किन्तु बल की कामना रूप निदान बाँध लेता है। उसी कर्मफल से वह आगे चलकर पुरुषसिंह नारायण बनता है। दूसरी ओर नरवृषभ राजा तप के प्रभाव से सुदर्शन बलभद्र बनता है। दोनों भाई पराक्रमी होकर तीन खण्डों के अधिपति बनते हैं। युद्ध में मधुक्रीड़ प्रतिनारायण का वध होता है, किन्तु नारायण पुरुषसिंह नरकगति को प्राप्त होता है, जबकि सुदर्शन बलभद्र दीक्षा लेकर मोक्ष प्राप्त कर लेता है। इस प्रसंग से शुभ और अशुभ भावों के भिन्न परिणामों का प्रतिपादन किया गया है।
इसके पश्चात् तीसरे चक्रवर्ती मघवा का चरित्र आता है। पूर्वभव में नरपति राजा तप कर देवगति को प्राप्त हुआ था। बाद में मघवा चक्रवर्ती बनकर उसने छह खण्डों पर राज्य किया। अभयघोष केवली के उपदेश से उसे वैराग्य हुआ और उसने संयम धारण कर केवलज्ञान प्राप्त किया। अनेक जीवों को धर्ममार्ग का उपदेश देकर अंत में मोक्ष प्राप्त किया।
अन्तिम भाग में सनत्कुमार चक्रवर्ती का चरित्र वर्णित है। वे अनुपम रूप, वैभव और सामर्थ्य के स्वामी थे। देवों द्वारा शरीर, यौवन और सम्पत्ति की नश्वरता का स्मरण कराने पर उन्हें गहन वैराग्य उत्पन्न हुआ। उन्होंने राज्य त्यागकर दीक्षा ग्रहण की, कठोर साधना की, परिषहों को जीता, केवलज्ञान प्राप्त किया और अनेक भव्य जीवों को मोक्षमार्ग का उपदेश दिया। अंततः समस्त कर्मों का क्षय कर उन्होंने मोक्ष पद प्राप्त किया।
इस प्रकार पर्व 61 में धर्मनाथ तीर्थंकर, सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा चक्रवर्ती तथा सनत्कुमार चक्रवर्ती के चरित्रों के माध्यम से वैराग्य, संयम, तप, कर्मफल और मोक्षमार्ग की महिमा का प्रतिपादन किया गया है।
उत्तरपुराण पर्व 62
अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 21 |श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 82 | श्लोक 83 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 |श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 240 | श्लोक 241 से 252 | श्लोक 253 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 283 | श्लोक 284 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 |श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 363 | श्लोक 364 से 371 | श्लोक 372 से 382 | श्लोक 383 से 390 | श्लोक 391 से 401 | श्लोक 402 से 411 | श्लोक 412 से 421 | श्लोक 422 से 433 | श्लोक 434 से 442 | श्लोक 443 से 451 | श्लोक 452 से 462 | श्लोक 463 से 472 | श्लोक 473 से 481 | श्लोक 482 से 491 | श्लोक 492 से 501 | श्लोक 502 से 513
उत्तरपुराण के बासठवें पर्व में भावी सोलहवें तीर्थंकर भगवान धर्मनाथ के पूर्वभवों, उनके कर्मों, आध्यात्मिक उत्कर्ष तथा उनसे सम्बद्ध अनेक चरित्रों का विस्तृत वर्णन किया गया है। प्रारम्भ में जीव के संसार-भ्रमण, कर्मबन्ध के कारणों, मिथ्यात्व, असंयम, प्रमाद, कषाय और योग के स्वरूप का निरूपण किया गया है। बताया गया है कि जीव इन्हीं कारणों से कर्मों का बन्ध करता हुआ अनादिकाल से जन्म-मरण के चक्र में भटकता रहता है, किन्तु सम्यग्दर्शन, व्रत, संयम और शुक्लध्यान के द्वारा मोक्षमार्ग प्राप्त कर सकता है।
विद्याधरों के राजा अमिततेज ने जिनेन्द्र भगवान के उपदेश से सम्यग्दर्शन प्राप्त किया और अपने पूर्वभवों तथा कर्मों का रहस्य जाना। भगवान ने कपिल, सत्यभामा, श्रीषेण, इन्द्रसेन, उपेन्द्रसेन तथा अन्य पात्रों के पूर्वजन्मों का वर्णन कर कर्मफल की अद्भुत व्यवस्था स्पष्ट की। अनेक पात्र पुण्य और पाप के अनुसार स्वर्ग, मनुष्य अथवा दुर्गति में जन्म लेते हैं और सत्संग तथा धर्म के प्रभाव से वैराग्य प्राप्त कर मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर होते हैं।
अमिततेज ने धर्म, दान, पूजा, व्रत और संयम का पालन करते हुए अनेक विद्याओं को सिद्ध किया तथा विद्याधरों का चक्रवर्ती बना। बाद में वैराग्य धारण कर उसने प्रायोपगमन संन्यास लिया और उत्तम देवगति को प्राप्त हुआ। उसके साथ श्रीविजय ने भी धर्माराधना कर उच्च देवगति प्राप्त की।
अगले भव में वही जीव अपराजित और अनन्तवीर्य नामक दो राजकुमारों के रूप में जन्मे। दोनों भाई रूप, नीति, पराक्रम और धर्म में अद्वितीय थे। उनके पिता ने राज्य त्यागकर संयम धारण किया और दोनों को राज्यभार सौंप दिया। इसी बीच नारद के कारण राजा दमितारि और दोनों भाइयों के बीच संघर्ष की भूमिका बनी। दमितारि की पुत्री कनकश्री, अनन्तवीर्य के गुणों से प्रभावित होकर उससे अनुरक्त हुई और अंततः दोनों भाइयों द्वारा अपने साथ ले जाई गई।
इस घटना से उत्पन्न युद्ध में अपराजित और अनन्तवीर्य ने असाधारण वीरता दिखाई। दमितारि की विशाल सेना पराजित हुई और अन्ततः अनन्तवीर्य ने उसी के चक्र से उसका वध कर दिया। युद्ध के पश्चात दोनों भाइयों को केवलज्ञानी जिनेन्द्र का दर्शन हुआ। वहाँ कनकश्री ने अपना पूर्वभव पूछा और ज्ञात किया कि पूर्वजन्म में साध्वी के प्रति घृणा करने के कारण उसे वर्तमान जीवन में दुःख भोगना पड़ा। इस उपदेश से उसे वैराग्य उत्पन्न हुआ, उसने दीक्षा ग्रहण की और आगे चलकर देवगति प्राप्त की।
अपराजित ने विद्याधरों का अधिपति तथा बलभद्र पद प्राप्त किया और अनन्तवीर्य महान् नारायण के रूप में प्रसिद्ध हुआ। दोनों ने धर्म, नीति और पराक्रम से राज्य का संचालन किया तथा लोककल्याण में जीवन लगाया। भगवान ने यह भी भविष्यवाणी की कि यही जीव आगे चलकर नवम भव में चक्रवर्ती तथा तत्पश्चात सोलहवें तीर्थंकर भगवान धर्मनाथ के रूप में जन्म लेकर अनन्त जीवों का कल्याण करेंगे।
उत्तरपुराण पर्व 63
शान्तिनाथ तीर्थंकर तथा चक्रवर्ती का पुराण वर्णन पर्व 63 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 |श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 102 | श्लोक 103 से 114 | श्लोक 115 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 244 | श्लोक 245 से 254 | श्लोक 255 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 293 | श्लोक 294 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 361 | श्लोक 362 से 371 | श्लोक 372 से 381 | श्लोक 382 से 393 | श्लोक 394 से 404 | श्लोक 405 से 412 | श्लोक 413 से 421 | श्लोक 422 से 431 | श्लोक 432 से 441 | श्लोक 442 से 451 | श्लोक 452 से 462 | श्लोक 463 से 475 | श्लोक 476 से 491 | श्लोक 492 से 501 | श्लोक 502 से 510
उत्तरपुराण के तिरसठवें पर्व में सोलहवें तीर्थंकर भगवान् शान्तिनाथ के पूर्वभव, जन्म, वैराग्य, दीक्षा, केवलज्ञान, धर्मप्रभावना और निर्वाण का विस्तृत वर्णन किया गया है। पूर्वभव में वे मेघरथ राजा थे, जिन्होंने घनरथ तीर्थंकर से श्रावकधर्म, सम्यग्दर्शन और तीर्थंकर-नामकर्म के सोलह कारणों का उपदेश सुनकर संसार की नश्वरता का विचार किया। उन्होंने राज्य अपने पुत्र को सौंपकर छोटे भाई दृढ़रथ तथा अनेक राजाओं के साथ दीक्षा धारण की। कठोर तप और तीर्थंकर-नामकर्म की भावनाओं के प्रभाव से उन्होंने श्रेष्ठ आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त की और अंत में अहमिन्द्र देव हुए।
कालान्तर में उनका जीव भरतक्षेत्र के समृद्ध कुरुजाङ्गल देश की राजधानी हस्तिनापुर में राजा विश्वसेन और रानी ऐरा के यहाँ अवतीर्ण हुआ। रानी ने सोलह शुभ स्वप्न देखे और ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी को भगवान् शान्तिनाथ का जन्म हुआ। देवों ने जन्मकल्याणक मनाया, इन्द्र ने सुमेरु पर्वत पर उनका अभिषेक किया और उनका नाम शान्तिनाथ रखा।
भगवान् शान्तिनाथ बाल्यकाल से ही असाधारण सौन्दर्य, तेज, ज्ञान और ऐश्वर्य से सम्पन्न थे। यौवन प्राप्त करने पर उनका विवाह हुआ और बाद में वे चक्रवर्ती सम्राट बने। चौदह रत्न और नौ निधियों से युक्त विशाल साम्राज्य का दीर्घकाल तक संचालन करने के पश्चात् दर्पण में दो प्रतिबिम्ब देखकर उन्हें संसार की अनित्यता का बोध हुआ। पूर्वभवों का स्मरण होने पर उन्होंने वैराग्य धारण किया और लौकान्तिक देवों के अनुरोध पर पुत्र नारायण को राज्य देकर दीक्षा ग्रहण कर ली।
सहस्राम्रवन में उन्होंने केशलोंच कर दिगम्बर मुनि की दीक्षा ली। चक्रायुध सहित एक हजार राजाओं ने भी उनके साथ संयम स्वीकार किया। कठोर तप, ध्यान और चारित्र की साधना करते हुए उन्होंने घातिया कर्मों का क्षय किया और पौष शुक्ल दशमी को केवलज्ञान प्राप्त किया। देवों ने समवसरण की रचना की, जहाँ भगवान् ने विशाल धर्मसंघ के साथ सम्यक् धर्म का उपदेश दिया। उनके संघ में हजारों मुनि, आर्यिकाएँ, श्रावक और श्राविकाएँ सम्मिलित थे।
दीर्घकाल तक धर्मतीर्थ का संचालन करने के बाद जब आयु का अंतिम समय आया, तब भगवान् शान्तिनाथ सम्मेदशिखर पहुँचे। वहाँ शुक्लध्यान में स्थित होकर उन्होंने समस्त कर्मों का पूर्ण क्षय किया और सिद्धपद प्राप्त कर निर्वाण को प्राप्त हुए। उनके साथ चक्रायुध सहित अनेक मुनियों ने भी मोक्ष प्राप्त किया।
इस पर्व के उपसंहार में आचार्य गुणभद्र भगवान् शान्तिनाथ की महिमा का वर्णन करते हुए बताते हैं कि उन्होंने अखण्ड रूप से चलने वाले मोक्षमार्ग का प्रवर्तन किया। उनके पूर्वभवों की निरन्तर आध्यात्मिक उन्नति, चक्रायुध के साथ उनका दिव्य सम्बन्ध तथा समस्त जीवों को शान्ति प्रदान करने वाला उनका जीवन आदर्श रूप में प्रस्तुत किया गया है। अतः भगवान् शान्तिनाथ की शरण और उनका ध्यान ही कल्याण, शान्ति तथा मोक्ष का श्रेष्ठ साधन बताया गया है।
उत्तरपुराण पर्व 64
कुन्थुनाथ तीर्थकर तथा चक्रवर्ती का पुराण वर्णन पर्व 64 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 50 | श्लोक 51 से 55
इस पर्व में सत्रहवें तीर्थंकर भगवान् कुन्थुनाथ के पूर्वभव, गर्भ, जन्म, राज्य, वैराग्य, दीक्षा, केवलज्ञान और मोक्ष का वर्णन किया गया है। पूर्वभव में वे पूर्वविदेह क्षेत्र के सुसीमा नगर के राजा सिंहरथ थे। उल्कापात देखकर उन्हें संसार की अनित्यता का बोध हुआ। उन्होंने यतिवृषभ मुनि से धर्मोपदेश सुनकर राज्य त्याग दिया, संयम धारण किया और सोलह कारण भावनाओं के प्रभाव से तीर्थंकर नामकर्म का बन्ध किया। समाधिमरण के पश्चात् वे सर्वार्थसिद्धि विमान में देव हुए।
आयु पूर्ण होने पर उनका जीव हस्तिनापुर के राजा सूरसेन की रानी श्रीकान्ता के गर्भ में अवतीर्ण हुआ। रानी ने सोलह शुभ स्वप्न देखे और देवों ने गर्भकल्याणक का उत्सव मनाया। वैशाख शुक्ल प्रतिपदा को भगवान् कुन्थुनाथ का जन्म हुआ। इन्द्र सहित देवों ने सुमेरु पर्वत पर उनका जन्माभिषेक किया और उनका नाम ‘कुन्थु’ रखा। कुमारकाल के पश्चात् वे राजा बने और आगे चलकर चक्रवर्ती पद को प्राप्त हुए।
एक दिन तपस्वी मुनि को देखकर उनके मन में वैराग्य उत्पन्न हुआ। उन्होंने परिग्रह को संसार का कारण बताकर राज्य का त्याग किया और एक हजार राजाओं के साथ दीक्षा ग्रहण कर ली। दीक्षा के समय उन्हें मनःपर्ययज्ञान प्राप्त हुआ। सोलह वर्षों तक कठोर तप करने के बाद चैत्र शुक्ल तृतीया को तिलक वृक्ष के नीचे उन्हें केवलज्ञान प्राप्त हुआ। देवों ने चतुर्थ कल्याणक की पूजा की और उनके विशाल धर्मसंघ की स्थापना हुई।
भगवान् कुन्थुनाथ ने दिव्यध्वनि द्वारा असंख्य जीवों को धर्मोपदेश दिया और दीर्घकाल तक विहार किया। आयु का अन्त निकट आने पर वे एक हजार मुनियों के साथ सम्मेदशिखर पहुँचे। वहाँ प्रतिमायोग धारण कर वैशाख शुक्ल प्रतिपदा के दिन समस्त कर्मों का क्षय कर मोक्ष प्राप्त किया। देवों ने उनके निर्वाण कल्याणक का महोत्सव मनाया। अंत में आचार्य गुणभद्र भगवान् कुन्थुनाथ की महिमा का स्तवन करते हुए उन्हें मोक्षमार्ग का प्रदर्शक और अनन्त गुणों का भण्डार बताते हैं।
उत्तरपुराण पर्व 65
अरनाथ तीर्थकर चक्रवर्ती, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 65 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 34 | श्लोक 35 से 50 | श्लोक 51 से 64 | श्लोक 65 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 104 | श्लोक 105 से 117 | श्लोक 118 से 131 | श्लोक 132 से 143 | श्लोक 144 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 192
इस पर्व में अठारहवें तीर्थंकर भगवान् अरनाथ के पूर्वभव, जन्म, वैराग्य, केवलज्ञान और मोक्ष का वर्णन किया गया है। पूर्वभव में वे क्षेमपुर के राजा धनपति थे। अर्हन्नन्दन तीर्थंकर की दिव्यध्वनि सुनकर उन्होंने वैराग्य धारण किया, दीक्षा लेकर सोलह कारण भावनाओं का आराधन किया और तीर्थंकर-नामकर्म का बन्ध किया। मृत्यु के पश्चात् वे जयन्त विमान में अहमिन्द्र देव हुए। वहाँ से च्युत होकर हस्तिनापुर के राजा सुदर्शन और रानी मित्रसेना के यहाँ जन्म लेकर अरनाथ भगवान् बने। उन्होंने चक्रवर्ती पद का वैभव भोगने के बाद संसार की नश्वरता का अनुभव किया, राज्य त्यागकर दीक्षा ग्रहण की, कठोर तप किया और केवलज्ञान प्राप्त किया। विशाल धर्मसंघ का संचालन करते हुए उन्होंने धर्मोपदेश दिया तथा अन्त में सम्मेदशिखर पर मोक्ष प्राप्त किया।
इसके पश्चात् सुभौम चक्रवर्ती का चरित्र वर्णित है। पूर्वभव में भूपाल नामक राजा ने दीक्षा तो ग्रहण की, किन्तु चक्रवर्ती पद की कामना रूप निदान कर लिया। उसी कर्म के प्रभाव से वह महाशुक्र स्वर्ग का देव और फिर सुभौम चक्रवर्ती बना। दूसरी ओर जमदग्नि, रेणुकी, परशुराम तथा सहस्रबाहु की कथा आती है। कृतवीर द्वारा जमदग्नि की हत्या के बाद उनके पुत्रों ने प्रतिशोध लिया। रानी चित्रमती के गर्भ से जन्मे सुभौम का पालन गुप्त रूप से हुआ और युवावस्था में उसने परशुराम का वध कर चक्रवर्ती पद प्राप्त किया।
सुभौम ने दीर्घकाल तक अपार वैभव और भोगों का उपभोग किया, किन्तु एक रसोइये के प्रति अन्याय करने से वैर का बीज बो दिया। वही रसोइया अगले जन्म में देव बनकर उसे स्वादिष्ट फलों के लोभ में फँसाकर समुद्र के मध्य ले गया और उसका वध कर दिया। रौद्रध्यान में मृत्यु होने से सुभौम नरकगति को प्राप्त हुआ। इस प्रसंग द्वारा लोभ, आसक्ति, राग और द्वेष के दुष्परिणामों का निरूपण किया गया है।
इसके बाद नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण की कथा आती है। पुण्डरीक और नन्दिषेण दोनों भाई अत्यन्त प्रेमपूर्वक राज्य करते थे। पुण्डरीक का विवाह पद्मावती से हुआ। पूर्वजन्म का शत्रु निशुम्भ प्रतिनारायण बनकर उसके विरुद्ध युद्ध करने आया, किन्तु पुण्डरीक ने उसे पराजित कर मार डाला। यद्यपि पुण्डरीक महान् पराक्रमी और विजयी था, फिर भी भोगों, परिग्रह और आसक्ति में फँसकर उसने पापकर्मों का बन्ध किया और मृत्यु के बाद छठे नरक में उत्पन्न हुआ।
दूसरी ओर भाई के वियोग से नन्दिषेण के मन में गहरा वैराग्य उत्पन्न हुआ। उसने शिवघोष मुनि के पास संयम ग्रहण किया, बाह्य और आभ्यन्तर तप का उत्कृष्ट आराधन किया तथा समस्त कर्मों का क्षय कर मोक्ष प्राप्त किया। इस प्रकार पर्व का निष्कर्ष यह है कि वैभव, शक्ति और राज्य होने पर भी राग, द्वेष, लोभ और परिग्रह जीव को अधोगति में ले जाते हैं, जबकि सम्यक्त्व, संयम, तप और वैराग्य मोक्ष के मार्ग को प्रशस्त करते हैं। भगवान् अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण के चरित्रों के माध्यम से धर्म, वैराग्य और कर्मफल का गहन उपदेश प्रस्तुत किया गया है।
उत्तरपुराण पर्व 66
मल्लिनाथ तीर्थकर, पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण के पुराण का वर्णन पर्व 66 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 42 | श्लोक 43 से 52 | श्लोक 53 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 125
इस पर्व में भगवान मल्लिनाथ तीर्थंकर, पद्म चक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलभद्र, दत्त नारायण तथा बलीन्द्र प्रतिनारायण के पूर्वभव, वैराग्य, तप, आध्यात्मिक उत्कर्ष एवं कर्मफल का वर्णन किया गया है।
वैश्रवण राजा एक वटवृक्ष के विनाश को देखकर संसार की अनित्यता का अनुभव करते हैं। वे राज्य त्यागकर दीक्षा ग्रहण करते हैं, कठोर तप एवं सोलह कारण-भावनाओं के प्रभाव से तीर्थंकर नामकर्म का बंध करते हैं और अपराजित अनुत्तर विमान में देव बनते हैं। वहाँ से च्युत होकर वे मिथिला के राजा कुम्भ और रानी प्रजावती के यहाँ भगवान मल्लिनाथ के रूप में जन्म लेते हैं। देवों द्वारा जन्माभिषेक सम्पन्न होता है। युवावस्था में विवाह की तैयारियाँ देखकर उन्हें वैराग्य उत्पन्न होता है। वे दीक्षा लेकर अल्पकाल में केवलज्ञान प्राप्त करते हैं, विशाल धर्मसंघ का संचालन करते हुए अनेक जीवों का कल्याण करते हैं और अंत में सम्मेदशिखर पर मोक्ष प्राप्त करते हैं।
इसके पश्चात पद्म चक्रवर्ती के पूर्वभव का वर्णन है। प्रजापाल राजा संसार की नश्वरता का अनुभव कर संयम ग्रहण करते हैं और अच्युत स्वर्ग में देव बनते हैं। पुनर्जन्म में पद्म चक्रवर्ती होकर धर्मपूर्वक राज्य करते हैं। शून्यवादी मन्त्री के साथ आत्मा और परलोक पर हुए तर्कपूर्ण संवाद में वे आत्मा के अस्तित्व को सिद्ध करते हैं। तत्पश्चात राज्य त्यागकर दीक्षा लेते हैं, केवलज्ञान प्राप्त करते हैं और अंततः मोक्ष को प्राप्त होते हैं।
अन्तिम भाग में नन्दिमित्र बलभद्र और दत्त नारायण के पूर्वभव का वर्णन है। दोनों राजकुमार पूर्वभव में दीक्षा लेकर स्वर्ग जाते हैं तथा पुनर्जन्म में वाराणसी के राजकुमार बनते हैं। पूर्वजन्म का मन्त्री बलीन्द्र नामक विद्याधर बनकर उनसे वैर करता है। युद्ध में दत्त नारायण बलीन्द्र का वध करते हैं और तीनों खण्डों पर विजय प्राप्त करते हैं। किन्तु हिंसात्मक कर्मों के कारण दत्त नारायण सातवें नरक में जाते हैं, जबकि नन्दिमित्र वैराग्य ग्रहण कर दीक्षा लेते हैं, केवलज्ञान प्राप्त करते हैं और मोक्ष को प्राप्त होते हैं।
उत्तरपुराण पर्व 67
मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 33 | श्लोक 34 से 43 | श्लोक 44 से 52 | श्लोक 53 से 64 | श्लोक 65 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 135 | श्लोक 136 से 152 | श्लोक 153 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 203 | श्लोक 204 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 231 | श्लोक 232 से 242 | श्लोक 243 से 254 | श्लोक 255 से 273 | श्लोक 274 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 304 | श्लोक 305 से 321 | श्लोक 322 से 332 | श्लोक 333 से 343 | श्लोक 344 से 353 | श्लोक 354 से 370 | श्लोक 371 से 390 | श्लोक 391 से 401 | श्लोक 402 से 411 | श्लोक 412 से 426 | श्लोक 427 से 443 | श्लोक 444 से 461 | श्लोक 462 से 471 | श्लोक 472 से 473
भगवान मुनिसुव्रतनाथ की स्तुति के उपरान्त चम्पापुर के राजा हरिवर्मा अनन्तवीर्य मुनिराज से जीव, कर्म, बन्ध, संवर, निर्जरा और मोक्ष का तत्त्वज्ञान सुनकर वैराग्य धारण करते हैं। वे राज्य त्यागकर संयम ग्रहण करते हैं, तीर्थंकर नामकर्म का बन्ध करते हैं और प्राणत स्वर्ग में देव बनते हैं। तत्पश्चात वे राजगृह के राजा सुमित्र और रानी सोमा के यहाँ मुनिसुव्रतनाथ के रूप में जन्म लेते हैं। राज्य संचालन के बाद वैराग्य उत्पन्न होने पर वे दीक्षा ग्रहण करते हैं, कठोर तप से केवलज्ञान प्राप्त करते हैं, विशाल धर्मसंघ की स्थापना कर धर्मप्रचार करते हैं और अंत में सम्मेदशिखर से मोक्ष प्राप्त करते हैं।
इसके बाद हरिषेण चक्रवर्ती का चरित्र आता है। वे पूर्वभव के पुण्य से चक्रवर्ती बनते हैं, दिग्विजय कर समस्त ऐश्वर्य प्राप्त करते हैं, किन्तु संसार की नश्वरता का बोध होने पर राज्य त्यागकर संयम धारण करते हैं और उच्च देवगति को प्राप्त होते हैं।
आगे राम और लक्ष्मण के पूर्वभव का वर्णन है। राजकुमार चन्द्रचूल और मन्त्रीपुत्र विजय दुराचार के कारण मृत्युदण्ड के अधिकारी बनते हैं, परन्तु मन्त्री की दूरदर्शिता से वे मुनियों के सम्पर्क में आकर संयम ग्रहण करते हैं। तप के प्रभाव से वे अगले जन्म में अयोध्या के राजा दशरथ के यहाँ क्रमशः लक्ष्मण (नारायण) और राम (बलभद्र) के रूप में जन्म लेते हैं।
मिथिला के राजा जनक द्वारा यज्ञ की रक्षा हेतु राम-लक्ष्मण को आमंत्रित करने के प्रसंग में यज्ञ के वास्तविक स्वरूप पर चर्चा होती है। अतिशयमति मन्त्री स्पष्ट करते हैं कि वास्तविक यज्ञ अहिंसा, जिनपूजा, दान, आत्मसंयम और सदाचार है; पशुबलि धर्म नहीं है। इसके समर्थन में सगर, मधुपिङ्गल, महाकाल, पर्वत, नारद और राजा वसु की विस्तृत कथा दी गई है, जिसमें महाकाल असुर प्रतिशोधवश हिंसात्मक यज्ञ की परम्परा चलाता है। उसके छल में आकर सगर, वसु, पर्वत और अन्य अनेक लोग अधर्म तथा नरकगति को प्राप्त होते हैं, जबकि नारद सत्य, तर्क और अहिंसा की स्थापना कर धर्म की रक्षा करते हैं तथा अंततः उच्च देवगति प्राप्त करते हैं।
उत्तरपुराण पर्व 68
राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 16 | श्लोक 17 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 50 | श्लोक 51 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 104 | श्लोक 105 से 123 | श्लोक 124 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 174 | श्लोक 175 से 184 | श्लोक 185 से 193 | श्लोक 194 से 203 | श्लोक 204 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 235 | श्लोक 236 से 252 | श्लोक 253 से 262 | श्लोक 263 से 276 | श्लोक 277 से 291 | श्लोक 292 से 302 | श्लोक 303 से 317 | श्लोक 318 से 332 | श्लोक 333 से 353 | श्लोक 354 से 364 | श्लोक 365 से 382 | श्लोक 383 से 401 | श्लोक 402 से 412 | श्लोक 413 से 422 | श्लोक 423 से 435 | श्लोक 436 से 452 | श्लोक 453 से 462 | श्लोक 463 से 472 | श्लोक 473 से 484 | श्लोक 485 से 493 | श्लोक 494 से 501 | श्लोक 502 से 515 | श्लोक 516 से 531 | श्लोक 532 से 542 | श्लोक 543 से 551 | श्लोक 552 से 560 | श्लोक 561 से 575 | श्लोक 576 से 585 | श्लोक 586 से 594 | श्लोक 595 से 604 | श्लोक 605 से 622 | श्लोक 623 से 631 | श्लोक 632 से 641 | श्लोक 642 से 651 | श्लोक 652 से 661 | श्लोक 662 से 672 | श्लोक 673 से 681 | श्लोक 682 से 691 | श्लोक 692 से 701 | श्लोक 702 से 711 | श्लोक 712 से 721 | श्लोक 722 से 732
उत्तरपुराण के अड़सठवें पर्व में श्रीराम, लक्ष्मण, सीता और रावण के चरित्र का जैन परम्परा के अनुसार विस्तृत वर्णन किया गया है। विभीषण के राम की शरण में आने के बाद राम की सेना लंका पहुँचती है। हनुमान लंका में प्रवेश कर वन का विनाश करते हैं और रावण को युद्ध के लिए ललकारते हैं। इसके बाद दोनों पक्षों के बीच भीषण युद्ध आरम्भ होता है। रावण मायायुद्ध और छल का आश्रय लेता है, किन्तु राम और लक्ष्मण उसके सभी उपायों को विफल कर देते हैं।
युद्ध के निर्णायक चरण में लक्ष्मण चक्ररत्न के द्वारा रावण का वध करते हैं। रावण अपने पापकर्मों के कारण नरकगति को प्राप्त होता है। राम विभीषण को लंका का राजा बनाते हैं और सीता का सम्मानपूर्वक पुनर्मिलन होता है। इसके पश्चात् राम और लक्ष्मण का भव्य अभिषेक होता है तथा लक्ष्मण दिग्विजय कर तीन खण्डों के सम्राट के रूप में अपनी सार्वभौम सत्ता स्थापित करते हैं।
अयोध्या लौटकर दोनों भाई दीर्घकाल तक धर्मपूर्वक राज्य करते हैं। शिवगुप्त जिनेन्द्र के उपदेश से राम श्रावकधर्म ग्रहण करते हैं, जबकि भोगासक्ति और निदान के कारण लक्ष्मण सम्यग्दर्शन ग्रहण नहीं कर पाते और अशुभ कर्मों का बन्ध कर लेते हैं। आगे चलकर लक्ष्मण असाध्य रोग से मृत्यु को प्राप्त होकर चौथे नरक में जन्म लेते हैं।
लक्ष्मण की मृत्यु से राम के मन में गहन वैराग्य उत्पन्न होता है। वे राज्य उत्तराधिकारियों को सौंपकर सीता, हनुमान, सुग्रीव, विभीषण तथा अनेक राजाओं के साथ संयम धारण करते हैं। कठोर तप, ध्यान और आत्मसाधना के फलस्वरूप राम केवलज्ञान प्राप्त करते हैं तथा अंत में सम्मेदशिखर पर मोक्ष प्राप्त कर सिद्धपद को प्राप्त होते हैं। सीता सहित अनेक आर्यिकाएँ उच्च देवगति को प्राप्त होती हैं, जबकि लक्ष्मण भविष्य में नरक से निकलकर संयम धारण कर मोक्ष प्राप्त करने योग्य बनते हैं।
पर्व के अंतिम भाग में राम, लक्ष्मण, सीता और रावण के पूर्वभवों का वर्णन करते हुए यह स्पष्ट किया गया है कि जीव का भविष्य उसके कर्म, भाव और आन्तरिक प्रवृत्ति पर निर्भर करता है। समान वैभव और पराक्रम प्राप्त होने पर भी राम सम्यक् श्रद्धा, संयम और वैराग्य के कारण मोक्ष को प्राप्त होते हैं, जबकि लक्ष्मण भोगासक्ति और निदान के कारण नरकगति को प्राप्त होते हैं। इस प्रकार यह पर्व धर्म, अहिंसा, सम्यग्दर्शन, वैराग्य तथा कर्मफल की महत्ता का प्रभावशाली प्रतिपादन करता है और यह शिक्षा देता है कि भोगों की आकांक्षा (निदान) आध्यात्मिक पतन का कारण है, जबकि संयम और सम्यक् भाव ही मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
उत्तरपुराण पर्व 69
नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 65 | श्लोक 66 से 82 | श्लोक 83 से 92
उत्तरपुराण पर्व 70
नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 43 | श्लोक 44 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 94 | श्लोक 95 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 131 | श्लोक 132 से 144 | श्लोक 145 से 153 | श्लोक 154 से 164 | श्लोक 165 से 181 | श्लोक 182 से 202 | श्लोक 203 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 243 | श्लोक 244 से 252 | श्लोक 253 से 273 | श्लोक 274 से 283 | श्लोक 284 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 363 | श्लोक 364 से 375 | श्लोक 376 से 392 | श्लोक 393 से 402 | श्लोक 403 से 411 | श्लोक 412 से 421 | श्लोक 422 से 431 | श्लोक 432 से 441 | श्लोक 442 से 455 | श्लोक 456 से 471 | श्लोक 472 से 481 | श्लोक 482 से 491 | श्लोक 492 से 497
उत्तरपुराण पर्व 71
नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 51 | श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 130 | श्लोक 131 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 257 | श्लोक 258 से 272 | श्लोक 273 से 282 | श्लोक 283 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 315 | श्लोक 316 से 324 | श्लोक 325 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 362 | श्लोक 363 से 372 | श्लोक 373 से 382 | श्लोक 383 से 391 | श्लोक 392 से 403 | श्लोक 404 से 413 | श्लोक 414 से 421 | श्लोक 422 से 431 | श्लोक 432 से 441 | श्लोक 442 से 459 | श्लोक 460 से 462
उत्तरपुराण पर्व 72
नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म नामक बलभद्र, कृष्ण नामक अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त नामक सकल चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 22 | श्लोक 23 से 34 | श्लोक 35 से 46 | श्लोक 47 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 123 | श्लोक 124 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 234 | श्लोक 235 से 248 | श्लोक 249 से 259 | श्लोक 260 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 288
उत्तरपुराण पर्व 73
पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 24 | श्लोक 25 से 32 | श्लोक 33 से 43 | श्लोक 44 से 53 | श्लोक 54 से 66 | श्लोक 67 से 79 | श्लोक 80 से 92 | श्लोक 93 से 105 | श्लोक 106 से 114 | श्लोक 115 से 124 | श्लोक 125 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 170
उत्तरपुराण पर्व 74
अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन
उत्तरपुराण पर्व 75
चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन
उत्तरपुराण पर्व 76
राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन
करते हुए कल्कियों का वर्णन , कल्किके पुत्र अजितंजयका , प्रलय काल का वर्णन , आगामी तीर्थकर आदि शलाकापुरुषोंका
वर्णन , महावीर भगवान् की शिष्य परम्परा
द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय – आदिपुराण
द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय – आदिपुराण भाग – 2
द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय उत्तरपुराण
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आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
आदिपुराण भाग – 2 Adi purana Part-2 by Acharya Jinasena
महापुराण केवल एक धार्मिक आख्यान नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति, इतिहास, दर्शन, नैतिक मूल्यों और आध्यात्मिक चिंतन का भी महत्वपूर्ण स्रोत है। इसकी भाषा, काव्यशैली, दार्शनिक गहराई और चरित्र-चित्रण इसे संस्कृत साहित्य तथा जैन वाङ्मय की अमूल्य धरोहर बनाते हैं। जैन धर्म के इतिहास, पुराण साहित्य और आध्यात्मिक परंपरा को समझने के लिए महापुराण का अध्ययन अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।