जैन धर्म का महान ग्रंथ: महापुराण (त्रिषष्ठिलक्षण महापुराण) एक परिचय
महापुराण (त्रिषष्ठिलक्षण महापुराण) जैन धर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण, प्रामाणिक और विशाल ग्रंथ है। यह दिगम्बर जैन साहित्य की महान कृतियों में से एक माना जाता है। इस ग्रंथ में जैन परंपरा के तिरसठ (63) महापुरुषों—24 तीर्थंकरों, 12 चक्रवर्तियों, 9 बलदेवों, 9 नारायणों और 9 प्रतिनारायणों—के जीवन, चरित्र, आध्यात्मिक साधना, धर्मोपदेश तथा उनके युगों की घटनाओं का विस्तृत वर्णन किया गया है। इसी कारण इसे “त्रिषष्ठिलक्षण महापुराण” कहा जाता है, अर्थात् तिरसठ महान पुरुषों के लक्षणों और चरित्रों का वर्णन करने वाला महाग्रंथ।
रचना और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
इस ग्रंथ की रचना का इतिहास भारत के स्वर्ण युग की याद दिलाता है। इसकी रचना 9वीं शताब्दी ईस्वी में हुई थी।
- मुख्य रचनाकार: इस ग्रंथ को लिखने की शुरुआत महान जैन विद्वान आचार्य जिनसेन ने की थी।
- संरक्षक: इसकी रचना राष्ट्रकूट साम्राज्य के प्रतापी शासक अमोघवर्ष (प्रथम) के शासनकाल में हुई थी, जो स्वयं जैन धर्म और साहित्य के बड़े संरक्षक थे।
- पूर्णता: दुर्भाग्यवश, आचार्य जिनसेन इस विशाल ग्रंथ को अपने जीवनकाल में पूरा नहीं कर सके। उनके अधूरे कार्य को उनके योग्य शिष्य आचार्य गुणभद्र ने पूरा किया।
महापुराण की संरचना (ग्रंथ के दो भाग)
महापुराण कोई साधारण पुस्तक नहीं है, बल्कि यह एक विशाल महाकाव्य है। कुल श्लोकों की संख्या 18584 है। इस ग्रंथ को अध्ययन की सुविधा और रचनाकारों के आधार पर मुख्य रूप से दो भागों में बांटा गया है:
| भाग का नाम | रचनाकार | विवरण |
| 1. आदि पुराण कुल श्लोकों की संख्या = 10,980 | आचार्य जिनसेन (पर्व 1 से पर्व 42 ) तथा 43वें पर्व के केवल तीन श्लोक आचार्य गुणभद्र (पर्व 43 से पर्व 47 ) | यह महापुराण का पहला और अत्यंत महत्वपूर्ण भाग है। इसे आचार्य जिनसेन ने संस्कृत भाषा में बड़े ही काव्यात्मक और सुंदर ढंग से लिखा था। इसमें मुख्य रूप से प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव (आदिनाथ) और प्रथम चक्रवर्ती भरत के जीवन का वर्णन है। |
| 2. उत्तरपुराण कुल श्लोकों की संख्या = 7604 | आचार्य गुणभद्र | यह महापुराण का दूसरा और अंतिम भाग है। आचार्य जिनसेन शिष्य गुणभद्र ने इस भाग को लिखकर महापुराण को पूर्णता प्रदान की। इसमें शेष 23 तीर्थंकरों और अन्य शलाका पुरुषों का जीवन-चरित्र शामिल है। |
| पर्व संख्या | कुल श्लोक | पर्व संख्या | कुल श्लोक | पर्व संख्या | कुल श्लोक | पर्व संख्या | कुल श्लोक | पर्व संख्या | कुल श्लोक |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| पर्व 1 | 210 | पर्व 17 | 257 | पर्व 33 | 202 | पर्व 49 | 59 | पर्व 65 | 192 |
| पर्व 2 | 162 | पर्व 18 | 209 | पर्व 34 | 223 | पर्व 50 | 70 | पर्व 66 | 125 |
| पर्व 3 | 239 | पर्व 19 | 192 | पर्व 35 | 249 | पर्व 51 | 87 | पर्व 67 | 473 |
| पर्व 4 | 198 | पर्व 20 | 273 | पर्व 36 | 212 | पर्व 52 | 70 | पर्व 68 | 732 |
| पर्व 5 | 296 | पर्व 21 | 268 | पर्व 37 | 205 | पर्व 53 | 56 | पर्व 69 | 92 |
| पर्व 6 | 208 | पर्व 22 | 316 | पर्व 38 | 313 | पर्व 54 | 276 | पर्व 70 | 497 |
| पर्व 7 | 318 | पर्व 23 | 196 | पर्व 39 | 211 | पर्व 55 | 62 | पर्व 71 | 462 |
| पर्व 8 | 257 | पर्व 24 | 186 | पर्व 40 | 223 | पर्व 56 | 96 | पर्व 72 | 288 |
| पर्व 9 | 195 | पर्व 25 | 290 | पर्व 41 | 158 | पर्व 57 | 100 | पर्व 73 | 170 |
| पर्व 10 | 208 | पर्व 26 | 150 | पर्व 42 | 208 | पर्व 58 | 124 | पर्व 74 | 549 |
| पर्व 11 | 221 | पर्व 27 | 152 | पर्व 43 | 339 | पर्व 59 | 319 | पर्व 75 | 691 |
| पर्व 12 | 273 | पर्व 28 | 221 | पर्व 44 | 367 | पर्व 60 | 85 | पर्व 76 | 578 |
| पर्व 13 | 216 | पर्व 29 | 169 | पर्व 45 | 219 | पर्व 61 | 130 | ||
| पर्व 14 | 213 | पर्व 30 | 129 | पर्व 46 | 369 | पर्व 62 | 513 | ||
| पर्व 15 | 224 | पर्व 31 | 159 | पर्व 47 | 403 | पर्व 63 | 510 | ||
| पर्व 16 | 275 | पर्व 32 | 199 | पर्व 48 | 143 | पर्व 64 | 55 |
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation
आदिपुराण पर्व 1 – कथामुखवर्णन
पर्व 1 – श्लोक 1 | श्लोक 2 से 15 | श्लोक 16 से 25 | श्लोक 26 से 35 | श्लोक 36 से 45 | श्लोक 46 से 55 | श्लोक 56 से 65 | श्लोक 66 से 75 | श्लोक 76 से 85 | श्लोक 86 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 116 | श्लोक 117 से 126 | श्लोक 127 से 136 | श्लोक 137 से 146 | श्लोक 147 से 156 | श्लोक 157 से 166 | श्लोक 167 से 171 | श्लोक 172 से 180 | श्लोक 181 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 210
अनंतचतुष्टय और अष्टप्रातिहार्य से युक्त श्री अर्हंतदेव को नमस्कार है। जिनेंद्र सूर्य-से अज्ञान नष्ट करते हैं। वृषभदेव ने वैभव को तुच्छ मानकर दीक्षा ली। उनके साथ हजारों राजाओं ने तप सहे। केवलज्ञान से वे प्रकाशित हुए। अजितनाथ से महावीर तक तीर्थंकरों और गणधरों की स्तुति हुई। त्रेसठ शलाकापुरुषों का पुराण संग्रह करने का संकल्प लिया। यह ग्रंथ प्राचीन और कल्याणकारी है। अल्पज्ञ ग्रंथकार भक्ति से इसे कहता है। सिद्धसेन, समंतभद्र जैसे कवियों का सम्मान किया गया। धर्मकथा से युक्त काव्य प्रशंसनीय है। सज्जन गुण और दुर्जन दोष ग्रहण करते हैं। काव्य अलंकार और गुणों से युक्त हो। यह धर्मकथा कल्पलता-सी फलदायी और सरोवर-सी गंभीर है। कथा में सात अंग होते हैं। वक्ता सदाचारी और निपुण हो। श्रोता गाय-हंस जैसे उत्तम हों। तृतीय काल में ऋषभदेव कैलास पर आए। देवों ने पूजा की। समवसरण में केवलज्ञान प्राप्त हुआ। भरत ने स्तुति कर प्रश्न पूछे। वे तीर्थंकर, चक्रवर्ती, और युगों का स्वरूप जानना चाहते हैं। सभा ने प्रशंसा की। भगवान की वाणी से पुराण कहा गया। यह एकरूप होकर अनेकरूप हुई। वृषभसेन ने इसे पुराण बनाया। महावीर और गौतम ने इसे प्रकाशित किया। यह गुरुपरंपरा से चला। यह पुण्य, यश, और मोक्ष देता है। ग्रंथकर्ता इसे शक्ति से कहता है। यह मिथ्यामत नष्ट कर जयशील रहे।
आदिपुराण पर्व 2 – कथामुखवर्णन
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155 | श्लोक 156 से 162
ग्रंथकर्ता वृषभदेव को नमस्कार कर पुराण का विस्तार करता है। श्रेणिक ने गौतम से महावीर द्वारा सुना पुराण ग्रंथरूप में पूछा। गौतम अकारण बंधु हैं। उनकी किरणें अज्ञान नष्ट करती हैं। समवसरण में पशु धन्य हैं। हरिण और हथिनियाँ शांतिपूर्वक रहते हैं। तपोवन दयावन-सा है। श्रेणिक ने पाप स्वीकार कर पुराण सुनने की प्रार्थना की। मुनियों ने उनकी प्रशंसा की। धर्म वृक्ष है, जो अर्थ और मोक्ष देता है। पुराण में क्षेत्र, काल, और तीर्थ हैं। श्रेणिक का प्रश्न गंभीर है। मुनि गौतम की स्तुति करते हैं। गौतम महायोगी और ऋद्धिधारी हैं। वे पुराण सुनाने को तैयार हुए। गौतम ने वृषभदेव द्वारा भरत को कहा पुराण श्रेणिक के लिए कहा। श्रुतस्कंध के चार अनुयोग हैं। प्रथमानुयोग में सत्पुरुषों का चरित्र है। इसमें 2554423107500 श्लोक हैं। यह तीर्थंकरों और लोकों का वर्णन करता है। इसमें 63 या 24 अधिकार हैं। दुःषम काल में यह घटेगा। सुधर्माचार्य और जंबूस्वामी इसे प्रकाशित करेंगे। 683 वर्ष बाद यह अल्प होगा। जिनसेन जैसे कवि इसे स्मरण करेंगे। वृषभनाथ का पुराण पहले कहा जाएगा। सभा श्रेणिक के साथ सुनने को सावधान हुई। यह पुराण पाप धोकर शुद्धि देता है।
आदिपुराण पर्व 3 – पीठिकावर्णन
पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
ग्रंथकर्ता वृषभनाथ को नमस्कार कर पीठिका शुरू करता है। कालद्रव्य अनादि और सूक्ष्म है। यह लोकाकाश में सहकारी कारण है। व्यवहारकाल इसके भेद हैं। उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी काल के छह-छह भेद हैं। सुषमासुषमा में मनुष्यों की आयु तीन पल्य और ऊँचाई 6000 धनुष थी। वे कल्पवृक्षों से भोग प्राप्त करते थे। सुषमा में आयु दो पल्य और ऊँचाई 4000 धनुष थी। सुषमादुःषमा में आयु एक पल्य और ऊँचाई एक कोश थी। प्रतिश्रुति पहले कुलकर थे। इन्होंने सूर्य-चंद्रमा का भय दूर किया। सन्मति ने तारों का भय हटाया। क्षेमंकर ने पशुओं से रक्षा सिखाई। क्षेमंधर ने लाठी का उपदेश दिया। सीमंकर और सीमंधर ने कल्पवृक्षों की सीमाएँ नियत कीं। विमलवाहन ने सवारी का उपदेश दिया। चक्षुष्मान ने पुत्र-मुख देखने की प्रथा शुरू की। यशस्वान ने आशीर्वाद की रीत चलाई। अभिचंद्र ने चंद्रमा के साथ क्रीड़ा सिखाई। चंद्राभ ने संतानों के साथ जीवित रहने की प्रथा लाई। मरुदेव ने नाव और सीढ़ियाँ बनवाईं। प्रसेनजित ने जरायु हटाना सिखाया। नाभिराज ने नाल काटने का उपदेश दिया। उनके समय मेघ आए और धान्य उत्पन्न हुए। प्रजा ने नाभिराज से उपयोग पूछा। उन्होंने वृक्षों और ओषधियों का उपयोग बताया। चौदह कुलकरों ने पुण्य से यहाँ जन्म लिया। इन्होंने दंड व्यवस्था बनाई। उनकी आयु संख्याएँ पूर्व, पर्व आदि हैं। गौतम ने यह कथा कही। सभा आनंदित हुई। वे वृषभदेव का पुराण कहने को तैयार हुए।
आदिपुराण पर्व 4 – श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन
पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
तीन पर्वों का अध्ययन करने वाला आनंद पाता है। अब वृषभदेव का चरित कहा जाएगा। पुराण में आठ आख्यान होते हैं। लोक अकृत्रिम और नित्य है। सृष्टिवाद असंगत है। कर्म ही शरीर बनाते हैं। लोक तीन भागों में है। मध्यलोक में जंबूद्वीप और गंधिल देश है। यहाँ प्रजा सुखी और धार्मिक है। विजयार्ध पर्वत शोभित है। इसकी उत्तर श्रेणी में अलकापुरी है। यह नगरी समृद्ध और सुंदर है। इसका राजा अतिबल शत्रुजयी था। उसका पुत्र महाबल हुआ। अतिबल ने उसे युवराज बनाया। बाद में अतिबल ने राज्य छोड़कर दीक्षा ली। उनका तप कठिन और निर्मल था। महाबल ने राज्य संभाला। वह मध्यम वृत्ति से शासन करता था। उसका राज्य अन्याय से मुक्त था। उसका रूप सुंदर और लोकप्रिय था। उसके चार मंत्री थे। स्वयंबुद्ध सम्यग्दृष्टि था। महाबल मंत्रशक्ति से विजयी था। वह उपवनों में विहार करता था। उसे तीर्थंकर पद मिलने वाला था।
आदिपुराण पर्व 5 – ललितांग स्वर्गभोग वर्णन
पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
राजा महाबल का जन्मोत्सव मंगलगीत और नृत्य से शोभित था। वे सिंहासन पर विद्याधरों और वारांगनाओं से घिरे थे। स्वयंबुद्ध मंत्री ने धर्म की महिमा बताई। धर्म से सुख और संपदा मिलती है। महामति ने भूतवाद से आत्मा का खंडन किया। संभिन्नमति ने विज्ञानवाद से जगत् को क्षणिक माना। शतमति ने शून्यवाद से सबको मिथ्या कहा। स्वयंबुद्ध ने इनका खंडन कर आत्मा और धर्म की सिद्धि की। सभा ने आत्मा स्वीकारी। स्वयंबुद्ध ने चार कथाएँ सुनाईं: अरविंद नरक गया, दंड अजगर बना, शतबल देव हुआ, सहस्त्रबल मोक्ष को प्राप्त हुआ। चार ध्यानों का फल बताया। महाबल ने धर्म स्वीकारा। स्वयंबुद्ध मेरु पर गए। वहाँ मुनियों ने महाबल को भव्य और तीर्थंकर बताया। महाबल ने स्वप्न देखे। स्वयंबुद्ध ने उन्हें समझाया। महाबल ने राज्य छोड़ा। उन्होंने संन्यास लिया। बाईस दिन सल्लेखना कर ऐशानस्वर्ग में ललितांग देव बने। वहाँ उन्होंने भोग भोगे। स्वयंबुद्ध ने धर्मोपदेश दिया। जैन धर्म की सेवा का आह्वान किया।
आदिपुराण पर्व 6 – ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन
पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
ललितांगदेव के आभूषण अचानक निस्तेज हो गए। उनकी कंठमाला म्लान हो गई। कल्पवृक्ष काँपने लगे। उनके शरीर की कांति मंद पड़ गई। ऐशानस्वर्ग के देव शोक में उन्हें देख न सके। सेवक भी दीन हो गए। उनके सुख दुःख बन गए। म्लानता का समाचार स्वर्ग में फैल गया। सामानिक देवों ने उन्हें धैर्य बंधाया। उन्होंने कहा कि जन्म-मरण सबको प्राप्त होते हैं। स्वर्ग से च्युति साधारण है। पुण्य क्षीण होने पर स्वर्ग अंधकारमय हो जाता है। पाप से अस्नेह और जँभाई बढ़ती है। देवों ने धर्म की शरण लेने को कहा। ललितांगदेव ने धैर्य लिया। उन्होंने पंद्रह दिन तक जिन-चैत्यालयों की पूजा की। फिर अच्युत स्वर्ग में चैत्यवृक्ष के नीचे नमस्कार मंत्र पढ़ते हुए अदृश्य हो गए।
विदेह क्षेत्र के पुष्कलावती देश में उत्पलखेटक नगर था। वहाँ राजा वज्रबाहु और रानी वसुंधरा थे। ललितांगदेव स्वर्ग से च्युत होकर उनका पुत्र वज्रजंघ हुआ। वह शत्रुओं को संकुचित और मित्रों को प्रसन्न करता था। यौवन में उसकी रूप-संपदा अनुपम हुई। उसके काले बाल कामदेव के सर्प जैसे शोभते थे। उसका मुख मनोहर वाणी से युक्त था। नेत्र शास्त्रज्ञान से सुशोभित थे। उसका हार निर्मल कांति वाला था। चंदन से वक्षस्थल मेरु जैसा लगता था। उसकी जंघाएँ स्थिर थीं। चरण लक्ष्मी के कमल जैसे थे। वह शास्त्रज्ञ, विनयी और कुशल था। राज्यलक्ष्मी उसका आश्रय चाहती थी। वह स्वयंप्रभा से प्रेम करता था।
स्वयंप्रभा ललितांग के च्युत होने से शोकाकुल हुई। दृढ़धर्म देव ने उसे धर्म का उपदेश दिया। वह छह मास तक जिन-पूजा करती रही। फिर सौमनस वन में समाधि से स्वर्ग से च्युत हुई। वह पुंडरीकिणी नगरी में वज्रदंत और लक्ष्मीमती की पुत्री श्रीमती बनी। उसका रूप कामदेव को मोहने वाला था। उसके चरण कमल जैसे थे। जंघाएँ तरकस जैसी थीं। नाभि भँवर जैसी थी। स्तन कलश जैसे थे। मुख चंद्रमा और कमल की शोभा धारण करता था। वह सूर्य-किरणों जैसे भवन में सो रही थी। यशोधर गुरु को केवलज्ञान हुआ। देवों का कोलाहल सुनकर वह जागी। ललितांग का स्मरण कर मूर्च्छित हुई। सखियों ने उसे सचेत किया। माता-पिता शोकाकुल हुए। वज्रदंत ने उसे यौवन का विकार माना।
वज्रदंत ने यशोधर की पूजा की। उन्हें अवधिज्ञान मिला। उन्होंने जाना कि श्रीमती स्वयंप्रभा थी। वह दिग्विजय को गए। पंडिता धाय ने श्रीमती को समझाया। श्रीमती ने पूर्वभव बताया। वह गंधिला देश में निर्नामा थी। पिहितास्रव मुनि से कर्म-कारण पूछा। मुनि ने कहा कि वह धनश्री थी और मुनि का अपमान किया था। उसने क्षमा माँगी। व्रत कर स्वर्ग गई। वहाँ स्वयंप्रभा बनी। यहाँ श्रीमती हुई। वह ललितांग को खोज रही थी। पंडिता से चित्रपट बनवाकर उसे खोजने को कहा। पंडिता जिनमंदिर गई। वज्रदंत दिग्विजय से लौटा। उसने राज्याभिषेक प्राप्त किया। वह पुण्य से चक्रवर्ती बना। उसकी कीर्ति लोक में फैली। वह श्रीमती के विवाह की चिंता में था।
आदिपुराण पर्व 7 – श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन
पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
चक्रवर्ती वज्रदंत ने अपनी शोकाकुल पुत्री श्रीमती को बुलाकर सांत्वना दी। उन्होंने कहा कि वह शोक न करे, क्योंकि अवधिज्ञान से उन्हें उसके पति ललितांग का वृत्तांत मालूम है। उन्होंने श्रीमती को स्नान करने, अलंकार धारण करने और सखियों संग भोजन करने को कहा, यह भविष्यवाणी करते हुए कि उसका पति शीघ्र मिलेगा। वज्रदंत ने यशोधर के केवलज्ञान महोत्सव के समय प्राप्त अवधिज्ञान से अपने, श्रीमती और उसके पति के पूर्वजन्मों का वर्णन किया।
उन्होंने बताया कि पाँच भव पहले वह पुंडरीकिणी नगरी में अर्धचक्रवर्ती के पुत्र चंद्रकीर्ति थे। मित्र जयकीर्ति संग राज्य सुख भोगा। गृहस्थ रहते हुए अणुव्रत लिए, फिर गुरु चंद्रसेन से संन्यास लेकर माहेंद्र स्वर्ग में देव बने। वहाँ से च्युत होकर पुष्कर द्वीप के रत्नसंचय नगर में श्रीधर के पुत्र बलभद्र श्रीवर्मा हुए, और जयकीर्ति उनके भाई नारायण विभीषण बने। पिता श्रीधर ने दीक्षा ली और सिद्ध हुए। माता मनोहरा ने व्रत पालकर स्वर्ग में ललितांगदेव बनीं। विभीषण की मृत्यु पर ललितांग ने वज्रदंत को शोक त्यागने का उपदेश दिया। इसके बाद वज्रदंत ने युगंधर मुनि से दीक्षा ली, तप कर अवधिज्ञान प्राप्त किया और अच्युत स्वर्ग में इंद्र बने। वहाँ उन्होंने माता ललितांग का सत्कार किया।
ललितांग आगे गंधर्वपुर में महीधर बने। वासव और प्रभावती ने तप कर मोक्ष और स्वर्ग प्राप्त किया। महीधर ने विद्याएँ सिद्ध कीं। वज्रदंत ने प्रभाकरी नगरी में महीधर को उपदेश देकर वैराग्य उत्पन्न किया। महीधर ने दीक्षा ली और प्राणत स्वर्ग में इंद्र बने। वहाँ से च्युत होकर अयोध्या में अजितंजय बने, जिन्हें पिहितास्रव नाम मिला। वज्रदंत ने उन्हें विषयों से विरक्ति का उपदेश दिया। पिहितास्रव ने दीक्षा ली और श्रीमती को पूर्वभव में व्रत दिए थे। वज्रदंत ने बताया कि अंतिम ललितांग श्रीमती का पति है, जो अब मनुष्यलोक में है।
श्रीमती ने पिता के उपदेश से पूर्वभव स्मरण किया। वज्रदंत ने पंडिता से ललितांग की खोज कराई। पंडिता ने चित्रपट लेकर महापूत जिनालय में वज्रजंघ को पाया, जो ललितांग का जीव था। वज्रजंघ ने चित्रपट देखकर स्वयंप्रभा संग अपने पूर्वभव को पहचाना और मूर्च्छित हो गया। सचेत होने पर उसने पंडिता से श्रीमती के बारे में पूछा। पंडिता ने बताया कि श्रीमती उसकी खोज में है। वज्रजंघ ने अपना चित्रपट देकर पंडिता को विदा किया।
पंडिता ने श्रीमती को समाचार सुनाया और चित्रपट दिखाया। श्रीमती प्रसन्न हुई। वज्रदंत ने वज्रबाहु और उनके परिवार का स्वागत किया। वज्रबाहु ने श्रीमती का हाथ वज्रजंघ के लिए माँगा। वज्रदंत ने सहमति दी, यह कहते हुए कि दोनों का प्रेम जन्मांतरों से चला आ रहा है। विवाह की तैयारियाँ हुईं। विश्वकर्मा ने रत्नजड़ित मंडप बनाया। शुभ मुहूर्त में श्रीमती और वज्रजंघ का विवाह संपन्न हुआ। दोनों ने आभूषण धारण किए और रत्नवेदी पर बैठे। पाणिग्रहण के साथ विवाह पूर्ण हुआ।
सभी ने इस विवाह की प्रशंसा की और पूर्वजन्म के पुण्य को इसका कारण माना। अगले दिन वज्रजंघ और श्रीमती ने महापूत चैत्यालय में जिनपूजा की। वज्रजंघ ने जिनेंद्र की स्तुति की, उनके गुणों का स्मरण किया और मोक्ष की कामना की। फिर पुंडरीकिणी नगरी में प्रवेश कर राज्याभिषेक प्राप्त किया। बत्तीस हजार राजाओं ने उनका सम्मान किया। श्रीमती संग वह दीर्घकाल तक सुख भोगते रहे।
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन
पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
विवाह के पश्चात् वज्रजंघ ने चक्रवर्ती के भवन में, जहाँ नित्य उत्सव होते थे, श्रीमती के साथ उत्तम भोगों का अनुभव करते हुए दीर्घकाल तक निवास किया। श्रीमती के सौंदर्य, स्पर्श और मधुर व्यवहार से वह संतुष्ट रहता था, किंतु कामसेवन से उसकी तृप्ति नहीं होती थी। दोनों ने एक-दूसरे के साथ विभिन्न क्रीडाओं में समय व्यतीत किया—कभी उद्यानों में, कभी नदीतट पर, तो कभी जलक्रीडा में। श्रीमती की शारीरिक शोभा और प्रेम ने वज्रजंघ का मन मोह लिया। दोनों ने जिनेंद्र पूजा, दान और उत्सवों के माध्यम से भी समय बिताया।
वज्रजंघ की बहन अनुंधरी का विवाह चक्रवर्ती के पुत्र अमिततेज से हुआ। चक्रवर्ती वज्रदंत ने दोनों दंपतियों को दहेज सहित विदा किया। वज्रजंघ और श्रीमती उत्पलखेटक नगर पहुँचे, जहाँ उनका भव्य स्वागत हुआ। वहाँ उन्होंने 98 पुत्र उत्पन्न किए। एक दिन वज्रबाहु ने बादलों के क्षणभंगुर स्वरूप को देख वैराग्य लिया और दीक्षा ग्रहण कर मोक्ष प्राप्त किया। उनके पुत्र भी दीक्षित हुए।
वज्रदंत ने भी कमल में मरे भ्रमर को देखकर वैराग्य लिया। उन्होंने राज्य अपने पौत्र पुंडरीक को सौंपकर दीक्षा ली। लक्ष्मीमती ने वज्रजंघ को सहायता के लिए बुलाया। वज्रजंघ ने मुनियों से अपने और श्रीमती के पूर्वभव सुने, जिसमें वह ललितांगदेव और श्रीमती स्वयंप्रभा थीं। मुनियों ने भविष्यवाणी की कि वज्रजंघ भविष्य में वृषभनाथ तीर्थंकर होंगे। इसके बाद वज्रजंघ पुंडरीकिणी नगरी पहुँचे, पुंडरीक के राज्य को स्थिर किया और वापस उत्पलखेटक लौट आए। वहाँ वे श्रीमती के साथ सुखपूर्वक भोग भोगते रहे, जैन धर्म का पालन करते हुए अपनी कीर्ति फैलाते रहे।
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन
पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195
वज्रजंघ ने श्रीमती के साथ धर्म, अर्थ और काम के संयोग से राज्य करते हुए छहों ऋतुओं में भोगों का आनंद लिया। शरद् में वह तालाबों और वनों में, हेमंत में सुगंधित शयनागार में, शिशिर में श्रीमती को आलिंगन देकर, वसंत में आम्रवनों में, ग्रीष्म में जलक्रीडा करते हुए और वर्षा में मेघों के बीच क्रीडा करता रहा। एक रात शयनागार में धूप के धुएं से दोनों की मृत्यु हो गई। पुण्य के प्रभाव से वे उत्तरकुरु भोगभूमि में जन्मे, जहाँ दस प्रकार के कल्पवृक्ष भोग प्रदान करते हैं। वहाँ तीन पल्य की आयु तक उन्होंने सुख भोगा।
उत्तरकुरु में जन्मे जीव सात सप्ताह में परिपक्व होकर भोग भोगते हैं। वहाँ न दुःख है, न रोग, न ऋतु परिवर्तन। वज्रजंघ और श्रीमती ने वहाँ सुखमय जीवन जिया। मतिवर आदि चार मंत्रियों ने उनकी मृत्यु पर दीक्षा ली और स्वर्ग में अहमिंद्र बने। एक दिन वज्रजंघ को सूर्यप्रभ देव के विमान को देखकर जातिस्मरण हुआ। तभी दो चारण मुनि आए, जिनमें से एक स्वयंबुद्ध मंत्री का जीव था। उन्होंने वज्रजंघ और श्रीमती को सम्यग्दर्शन का उपदेश दिया, जिसे दोनों ने ग्रहण किया। नकुल आदि चार जीवों ने भी सम्यग्दर्शन प्राप्त किया।
मुनियों के जाने के बाद वज्रजंघ ने उनके गुणों का चिंतन किया और सम्यक्त्व में दृढ़ हुआ। तीन पल्य की आयु पूर्ण कर दोनों ऐशान स्वर्ग पहुँचे—वज्रजंघ श्रीधर देव और श्रीमती स्वयंप्रभा देव के रूप में। नकुल आदि चार जीव भी वहाँ देव बने। श्रीधर देव ने देवांगनाओं के साथ भोग भोगते हुए सुखमय जीवन जिया, जो भविष्य में तीर्थंकर बनने का संकेत था।
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन
पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीधरदेव को अवधिज्ञान से पता चला कि उनके गुरु प्रीतिंकर मुनि श्रीप्रभ पर्वत पर केवलज्ञानी बन गए हैं। वे उनकी पूजा के लिए गए, नमस्कार किया और पूछा कि महाबल भव के तीन मिथ्यादृष्टि मंत्री कहाँ हैं। प्रीतिंकर ने बताया कि महामति और संभिन्नमति निगोद में, शतमति नरक में हैं। उन्होंने नरक के भयंकर दुःखों का वर्णन किया, जहाँ पापी जीव हिंसा आदि से सात पृथ्वियों में कष्ट भोगते हैं। वहाँ तीक्ष्ण शस्त्र, अग्नि, लोहे की पुतलियाँ, असिपत्र वन आदि से नारकियों को असीम पीड़ा मिलती है। शतमति द्वितीय नरक में दुःख भोग रहा था।
श्रीधरदेव ने शतमति को सम्यग्दर्शन दिलाया। वह नरक से मुक्त होकर पूर्व विदेह क्षेत्र में जयसेन के रूप में जन्मा, दीक्षा ली और ब्रह्मस्वर्ग में इंद्र बना। श्रीधरदेव स्वर्ग से च्युत होकर पूर्व विदेह के सुसीमानगर में सुविधि राजा के पुत्र बने। सुंदर और गुणी सुविधि ने मनोरमा से विवाह किया। उनका पुत्र केशव (पूर्व की श्रीमती) हुआ। सिंह आदि चार जीव भी राजपुत्र बने। सभी ने विमलवाह जिनेंद्र की वंदना कर दीक्षा ली, सिवाय सुविधि के, जो श्रावक बन ग्यारह प्रतिमाएँ धारण कर तप करने लगा।
आयु पूर्ण कर सुविधि ने दीक्षा ली और अच्युत स्वर्ग में इंद्र बने, जहाँ उनकी आयु बीस सागर थी। केशव भी दीक्षित हो प्रतींद्र बना। सुविधि अच्युतेंद्र के रूप में दिव्य शरीर, विमान, देवियाँ और भोगों के साथ क्रीड़ा करता रहा। उनकी शोभा अपार थी, और वे जिनपूजा में रत रहे।
आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन
पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
जिनेंद्रदेव की स्तोत्र-पूजा से रत्नत्रय प्राप्त होता है, जो भव्य जीवों को पवित्र करता है। अच्युतेंद्र वज्रनाभि ने स्वर्ग छोड़ने से पहले माला मुरझाने का चिह्न देखा, पर धैर्य रखा। अंतिम छह माह में उसने अर्हंत की पूजा की और स्वर्ग से च्युत होकर जंबूद्वीप के पूर्व विदेह क्षेत्र में पुंडरीकिणी नगरी में वज्रसेन और श्रीकांता के पुत्र वज्रनाभि के रूप में जन्म लिया। उनके भाई विजय आदि और धनदेव भी वहीं जन्मे।
वज्रनाभि का यौवनकालीन रूप सूर्य-सा देदीप्यमान था। उनके गुणों से लक्ष्मी और सरस्वती आकर्षित थीं। वज्रसेन ने उन्हें राज्य सौंपकर दीक्षा ली। वज्रनाभि चक्रवर्ती बने, चक्ररत्न से पृथ्वी जीती, पर पिता वज्रसेन तीर्थंकर से रत्नत्रय जानकर राज्य त्यागा। उन्होंने पुत्र वज्रदंत को राज्य देकर सोलह हजार राजाओं सहित दीक्षा ली। पांच महाव्रत, समिति-गुप्ति और सोलह भावनाओं का पालन करते हुए वे तीर्थंकर पद के योग्य बने।
उन्होंने कठिन तप किया, चार ऋद्धियाँ प्राप्त कीं और उपशम श्रेणी से ग्यारहवें गुणस्थान तक पहुँचे। आयुांत में श्रीप्रभ पर्वत पर प्रायोपवेशन संन्यास लिया, बाईस परिषह सहन किए, दस धर्म और बारह अनुप्रेक्षाएँ धारण कीं। अंततः सर्वार्थसिद्धि में अहमिंद्र बने। वहाँ उनका शरीर दिव्य, एक हाथ ऊँचा और सुखमय था। वे जिन-पूजा और तत्त्वचर्चा में रत रहे। उनके भाई और धनदेव भी अहमिंद्र बने।
अहमिंद्र का सुख प्रवीचाररहित और विषयों से मुक्त था। विषय-सुख तृष्णा बढ़ाता है, पर अहमिंद्र का सुख आत्मिक था। यह सिद्धों के सुख से कम, पर स्वर्गीय सुख से श्रेष्ठ था। पुण्य से सर्वार्थसिद्धि और पाप से नरक मिलता है। वज्रनाभि ने शम-दम-यम से यह सुख पाया, जो बुद्धिमानों को प्रेरित करता है।
आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन
पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273
गौतम स्वामी ने मुनियों को बताया कि वज्रनाभि अहमिंद्र स्वर्ग से च्युत होकर पृथ्वी पर अवतरित हुए। उन्होंने जंबूद्वीप के भरत क्षेत्र में अंतिम कुलकर नाभिराज और उनकी पत्नी मरुदेवी के यहाँ जन्म लिया। मुनियों ने गौतम स्वामी से पूछा कि भोगभूमि के अंत और कर्मभूमि के प्रारंभ के समय नाभिराज ने ऋषभदेव को किस आश्रम में उत्पन्न किया और उनके कल्याणकों का ऐश्वर्य कैसा था। गौतम स्वामी ने इसका वर्णन शुरू किया।
नाभिराज भरत क्षेत्र के मध्यम-आर्य खंड में चौदह कुलकरों में अंतिम परंतु श्रेष्ठ थे। वे सूर्य-से तेजस्वी, चंद्र-से विद्या-संपन्न, इंद्र-से ऐश्वर्यशाली और कल्पवृक्ष-से फलदायी थे। उनकी पत्नी मरुदेवी रूप, सौंदर्य, बुद्धि और शोभा में इंद्राणी-सी थीं। उनका शरीर कृश, ओठ बिंबफल-से, भौंहें और चरण कमल-से थे। उनके गुणों से संगीत और नाट्यशास्त्र की रचना प्रेरित मालूम होती थी। वे अन्य स्त्रियों के सौंदर्य को मात देती थीं।
नाभिराज और मरुदेवी का विवाह देवों ने भव्यता से संपन्न कराया। दोनों पुण्यवान थे। इंद्र ने उनकी नगरी अयोध्या बनाई, जो साकेत, सुकोशला और विनीता नामों से भी जानी गई। यह नगरी स्वर्ग-सी सुंदर, प्राकार और परिखा से युक्त थी। दोनों ने वहाँ निवास शुरू किया। छह माह बाद ऋषभदेव के अवतार की सूचना पर देवों ने रत्नवर्षा की, जो नौ माह तक चली।
मरुदेवी ने एक रात सोलह शुभ स्वप्न देखे: हाथी, बैल, सिंह, लक्ष्मी, मालाएँ, चंद्रमा, सूर्य, कलश, मछलियाँ, सरोवर, समुद्र, सिंहासन, विमान, नागभवन, रत्नराशि और अग्नि। सुवर्णमय बैल उनके मुख में प्रवेश करता दिखा। जागकर उन्होंने नाभिराज को बताया। नाभिराज ने फल बताया कि उनका पुत्र बलशाली, सर्वज्ञ, तीर्थंकर और मोक्षदायी होगा।
ऋषभदेव मरुदेवी के गर्भ में अवतीर्ण हुए। देवों ने गर्भकल्याणक मनाया। दिक्कुमारियाँ उनकी सेवा में लगीं, शोभा और गुण बढ़ाए। मरुदेवी तेजस्वी हुईं। देवियों ने नृत्य, संगीत, काव्य और पहेलियों से उनका मनोरंजन किया। गर्भ में ऋषभदेव होने पर भी मरुदेवी को कष्ट नहीं हुआ। वे लक्ष्मी-सी शोभित हुईं, और नाभिराज धैर्यपूर्वक पुत्र की प्रतीक्षा करते रहे।
आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन
पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 216
आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन
पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 209 | श्लोक 210 से 213
आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन
पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 224
आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन
पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 192 | श्लोक 193 से 208 | श्लोक 209 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 275
आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन
पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 257
आदिपुराण पर्व 18 – धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन
पर्व 18 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 202 | श्लोक 203 से 209
आदिपुराण पर्व 19 – नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन
पर्व 19 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192
आदिपुराण पर्व 20 – भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन
पर्व 20 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 193 | श्लोक 194 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 253 | श्लोक 254 से 261 | श्लोक 262 से 273
आदिपुराण पर्व 21 – ध्यानतत्त्व का वर्णन
पर्व 21 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 95 | श्लोक 96 से 111 | श्लोक 112 से 120 | श्लोक 121 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 205 | श्लोक 206 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 268
आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन
पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 316
आदिपुराण पर्व 23 – समवसरणविभूति का वर्णन
पर्व 23 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 196
आदिपुराण पर्व 24 – भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन
पर्व 24 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 172 | श्लोक 173 से 181 | श्लोक 182 से 186
आदिपुराण पर्व 25 – भगवान के विहार का दर्शन करने वाला
पर्व 25 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 110 | श्लोक 111 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 143 | श्लोक 144 से 155 | श्लोक 156 से 167 | श्लोक 168 से 178 | श्लोक 179 से 190 | श्लोक 191 से 203 | श्लोक 204 से 217 | श्लोक 218 से 231 | श्लोक 232 से 244 | श्लोक 245 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 290
आदिपुराण भाग – 2
आदिपुराण पर्व 26 – भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन
पर्व 26 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 128 | श्लोक 129 से 147 | श्लोक 148 से 150
आदिपुराण पर्व 27 – भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन
पर्व 27 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152
आदिपुराण पर्व 28 – पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन
पर्व 28 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला
पर्व 29 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 66 | श्लोक 67 से 81 | श्लोक 82 से 90 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 169
आदिपुराण पर्व 30 – पश्चिम समुद्र के द्वारका विजय वर्णन
पर्व 30 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 34 | श्लोक 35 से 50 | श्लोक 51 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 129
आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन
पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 159
आदिपुराण पर्व 32 -उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन
पर्व 32 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 130 | श्लोक 131 से 141 | श्लोक 142 से 154 | श्लोक 155 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 199
आदिपुराण पर्व 33 – भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन
पर्व 33 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 27 | श्लोक 28 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 164 | श्लोक 165 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 202
आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन
पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223
आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन
पर्व 35 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 249
आदिपुराण पर्व 36 – बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन
पर्व 36 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 212
आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन
पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 201 | श्लोक 202 से 205
आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन
पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223 | श्लोक 224 से 231 | श्लोक 232 से 240 | श्लोक 241 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 293 | श्लोक 294 से 303 | श्लोक 304 से 313
आदिपुराण पर्व 39 – दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन
पर्व 39 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211
आदिपुराण पर्व 40 – द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन
पर्व 40 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 31 | श्लोक 32 से 42 | श्लोक 43 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223
आदिपुराण पर्व 41 – भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन
पर्व 41 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 158
आदिपुराण पर्व 42 – भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला
पर्व 42 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन
पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 46 | श्लोक 47 से 69 | श्लोक 70 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 264 | श्लोक 265 से 275 | श्लोक 276 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 339
आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन
पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 103 | श्लोक 104 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 203 | श्लोक 204 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 322 | श्लोक 323 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 352 | श्लोक 353 से 361 | श्लोक 362 से 367
आदिपुराण पर्व 45 – जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन
पर्व 45 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 103 | श्लोक 104 से 113 | श्लोक 114 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 160 | श्लोक 161 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 219
आदिपुराण पर्व 46 – जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन
पर्व 46 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 100 | श्लोक 101 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 170 | श्लोक 171 से 181 | श्लोक 182 से 194 | श्लोक 195 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 255 | श्लोक 256 से 271 | श्लोक 272 से 286 | श्लोक 287 से 296 | श्लोक 297 से 313 | श्लोक 314 से 322 | श्लोक 323 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 361 | श्लोक 362 से 369
आदिपुराण पर्व 47 – प्रथम तीर्थंकर और प्रथम चक्रवर्ती का वर्णन
पर्व 47 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 30 | श्लोक 31 से 45 | श्लोक 46 से 64 | श्लोक 65 से 108 | श्लोक 109 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223 | श्लोक 224 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 273 | श्लोक 274 से 283 | श्लोक 284 से 303 | श्लोक 304 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 342 | श्लोक 343 से 354 | श्लोक 355 से 371 | श्लोक 372 से 381 | श्लोक 382 से 391 | श्लोक 392 से 403
उत्तरपुराण पर्व 48 अजितनाथ तीर्थंकर तथा सगर चक्रवर्ती का वर्णन
पर्व 48 – श्लोक 1 से 8 | श्लोक 9 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 73 | श्लोक 74 से 84 | श्लोक 85 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 143
उत्तरपुराण पर्व 49 संभवनाथ तीर्थंकर का पुराण वर्णन
पर्व 49 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 59
उत्तरपुराण पर्व 50 श्री अभिनन्दनस्वामी का पुराण वर्णन
पर्व 50 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 53 | श्लोक 54 से 63 | श्लोक 64 से 70
उत्तरपुराण पर्व 51 सुमतिनाथ तीर्थंकर का पुराण वर्णन
पर्व 51 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 87
उत्तरपुराण पर्व 52 पद्मप्रभ भगवान् के पुराण का वर्णन
पर्व 52 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 43 | श्लोक 44 से 52 | श्लोक 53 से 64 | श्लोक 65 से 70
उत्तरपुराण पर्व 53 सुपार्श्वनाथ स्वामीका पुराण का वर्णन
पर्व 53 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 34 | श्लोक 35 से 42 | श्लोक 43 से 51 | श्लोक 52 से 56
उत्तरपुराण पर्व 54 चन्द्रप्रभ पुराण का वर्णन
पर्व 54 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 |श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 |श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 193 | श्लोक 194 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 272 | श्लोक 273 से 276
उत्तरपुराण पर्व 55 पुष्पदन्त (सुविधिनाथ) पुराण का वर्णन
पर्व 55 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 | श्लोक 32 से 42 | श्लोक 43 से 51 | श्लोक 52 से 62
उत्तरपुराण पर्व 56 शीतल पुराण का वर्णन
पर्व 56 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 55 | श्लोक 56 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 96
उत्तरपुराण पर्व 57
श्रेयांसनाथ तीर्थकर त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 57 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 62 | श्लोक 63 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 100
उत्तरपुराण पर्व 58
श्री वासुपूज्य जिनेन्द्र, द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण का वर्णन पर्व 58 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 53 | श्लोक 54 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 124
उत्तरपुराण पर्व 59
विमलनाथ तीर्थंकर, धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर का वर्णन पर्व 59 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 125 | श्लोक 126 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 |श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 242 | श्लोक 243 से 252 | श्लोक 253 से 262 | श्लोक 263 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 312 | श्लोक 313 से 319
उत्तरपुराण पर्व 60
अनन्तनाथ तीर्थंकर, सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायणके पुराणका वर्णन पर्व 60 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 42 | श्लोक 43 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 85
उत्तरपुराण पर्व 61
धर्मनाथ तीर्थकर, सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 61 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 90 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 130
उत्तरपुराण पर्व 62
अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 21 |श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 82 | श्लोक 83 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 |श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 240 | श्लोक 241 से 252 | श्लोक 253 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 283 | श्लोक 284 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 |श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 363 | श्लोक 364 से 371 | श्लोक 372 से 382 | श्लोक 383 से 390 | श्लोक 391 से 401 | श्लोक 402 से 411 | श्लोक 412 से 421 | श्लोक 422 से 433 | श्लोक 434 से 442 | श्लोक 443 से 451 | श्लोक 452 से 462 | श्लोक 463 से 472 | श्लोक 473 से 481 | श्लोक 482 से 491 | श्लोक 492 से 501 | श्लोक 502 से 513
उत्तरपुराण पर्व 63
शान्तिनाथ तीर्थंकर तथा चक्रवर्ती का पुराण वर्णन पर्व 63 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 |श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 102 | श्लोक 103 से 114 | श्लोक 115 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 244 | श्लोक 245 से 254 | श्लोक 255 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 293 | श्लोक 294 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 361 | श्लोक 362 से 371 | श्लोक 372 से 381 | श्लोक 382 से 393 | श्लोक 394 से 404 | श्लोक 405 से 412 | श्लोक 413 से 421 | श्लोक 422 से 431 | श्लोक 432 से 441 | श्लोक 442 से 451 | श्लोक 452 से 462 | श्लोक 463 से 475 | श्लोक 476 से 491 | श्लोक 492 से 501 | श्लोक 502 से 510
उत्तरपुराण पर्व 64
कुन्थुनाथ तीर्थकर तथा चक्रवर्ती का पुराण वर्णन पर्व 64 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 50 | श्लोक 51 से 55
उत्तरपुराण पर्व 65
अरनाथ तीर्थकर चक्रवर्ती, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 65 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 34 | श्लोक 35 से 50 | श्लोक 51 से 64 | श्लोक 65 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 104 | श्लोक 105 से 117 | श्लोक 118 से 131 | श्लोक 132 से 143 | श्लोक 144 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 192
उत्तरपुराण पर्व 66
मल्लिनाथ तीर्थकर, पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण के पुराण का वर्णन पर्व 66 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 42 | श्लोक 43 से 52 | श्लोक 53 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 125
उत्तरपुराण पर्व 67
मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 33 | श्लोक 34 से 43 | श्लोक 44 से 52 | श्लोक 53 से 64 | श्लोक 65 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 135 | श्लोक 136 से 152 | श्लोक 153 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 203 | श्लोक 204 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 231 | श्लोक 232 से 242 | श्लोक 243 से 254 | श्लोक 255 से 273 | श्लोक 274 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 304 | श्लोक 305 से 321 | श्लोक 322 से 332 | श्लोक 333 से 343 | श्लोक 344 से 353 | श्लोक 354 से 370 | श्लोक 371 से 390 | श्लोक 391 से 401 | श्लोक 402 से 411 | श्लोक 412 से 426 | श्लोक 427 से 443 | श्लोक 444 से 461 | श्लोक 462 से 471 | श्लोक 472 से 473
राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 16 | श्लोक 17 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 50
द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय – आदिपुराण
द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय – आदिपुराण भाग – 2
द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय उत्तरपुराण
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आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
आदिपुराण भाग – 2 Adi purana Part-2 by Acharya Jinasena
महापुराण केवल एक धार्मिक आख्यान नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति, इतिहास, दर्शन, नैतिक मूल्यों और आध्यात्मिक चिंतन का भी महत्वपूर्ण स्रोत है। इसकी भाषा, काव्यशैली, दार्शनिक गहराई और चरित्र-चित्रण इसे संस्कृत साहित्य तथा जैन वाङ्मय की अमूल्य धरोहर बनाते हैं। जैन धर्म के इतिहास, पुराण साहित्य और आध्यात्मिक परंपरा को समझने के लिए महापुराण का अध्ययन अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।