श्री बृहत् चारित्रशुद्धि विधान
समुच्चय पूजा
स्थापना
शम्भू छन्द
अरिहंत प्रभु शुभ समवसरण में, ध्यान लीन हो विराज रहे । निज आतम उद्धार हेतु हम, भक्त भक्ति में साज रहे ॥ आत्म शुद्धि चारित्र शुद्धि, के व्रत करने के भाव हुये । मन वचन काया से मैं पुकारूँ, आओ प्रभो अब आओ हिये ॥
ॐ ह्रीं अष्टादशदोषरहित षट्चत्वारिंशद् गुणसहित अर्हत् परमेष्ठिन् अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं।
ॐ ह्रीं अष्टादशदोषरहित षट् चत्वारिंशद् गुणसहित अर्हत् परमेष्ठिन् अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् ।
ॐ ह्रीं अष्टादशदोषरहित षट्चत्वारिंशद् गुणसहित अर्हत् परमेष्ठिन् अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्त्रिधिकरणं।
परिपुष्पांजलिं क्षिपेत् ।
दोह्य
चारित्र शुद्धि हुये बिना, मिले न मुक्ति धाम। इसीलिये, भक्ति करूँ, बारंबार प्रणाम ॥
चाल छंद (तर्ज-ऐ मेरे वतन)
संसार सिन्धु है गहरा, उसका जल भी है खारा। मैं शुद्ध भाव जल लाऊँ, प्रभु पूजन कर हर्षाऊँ ॥
चारित्र शुद्धि व्रत करना, आतम संताप को हरना। जिन मुद्रा हृदय बसाऊँ, चरणों में शीश झुकाऊँ ॥
ॐ ह्रीं अष्टादशदोषरहित पट् चत्वारिंशद गुण-सहित एकसहस्त्रद्विशतचतुश्त्रिंश चारित्र शुद्धि व्रत-मंडिताय अर्हत् परमेष्ठिने जन्मजरामृत्यु विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
करूँ तीन लोक की चिन्ता, ना पाया मुक्ति पंथा। निज चिन्तन में रम जाऊँ, प्रभु चित्र को चित्त बसाऊँ ॥
चारित्र शुद्धि व्रत सुन्दर, देते है सौख्य समन्दर। इस बिना न मुक्ति द्वारा, पायें न सौख्य अपारा ॥
ॐ ह्रीं अष्टादशदोषरहित षट्चत्वारिंशद गुण-सहित एकसहस्त्रद्विशतचतुश्त्रिंश चारित्र शुद्धि व्रत-मंडिताय अर्हत् परमेष्ठिने संसारताप विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा।
अक्षय धन है निज आतम, आतम मेरा परमातम। जिनवर को देख के जाना, निज आतम शुद्ध कराना ॥
चारित्र शुद्धि व्रत प्यारा, हो जायेंगे भव पारा। अक्षयपुर वासी जिनवर, करूँ भक्ति मैं भी मनहर ॥
ॐ ह्रीं अष्टादशदोषरहित षट् चत्वारिंशर गुण सहित एकसहस्त्रद्विशतचतुश्त्रिंश चारित्र मुद्धि छतः मडिताय अर्थात् परमेष्ठिने अक्षयपद प्राप्तये अक्षतं निर्वपामीतिस्वाहा।
भोगों का हूँ दीवाना, अपना स्वरूप न जाना। भोगों ने हमें भ्रमाया, तेरा स्वरूप अब भाया ॥
चारित्र शुद्धि व्रत पाया, भोगों से पिंड छुड़ाया। निज ज्ञान ध्यान मैं पाऊँ, चरणों में पुष्प चढ़ाऊँ ॥
ॐ ह्रीं अष्टादशदोषरहित षट् चत्वारिशद गुण-सहित एकसहस्त्रद्विशतचतुश्त्रिंश चारित्र शुद्धि व्रत- मंडिताय अहंत् परमेष्ठिनः कामबाणविनाशनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
है भूख एक बीमारी, जिससे दुनिया है हारी। चारित शुद्धि है दवाई, इससे ही होगी विदाई ॥
भोजन में संयम आये, सुख अपने पास बुलाये। अरिहत देव की पूजा, अब काम नहीं है दूजा ॥
ॐ ह्रीं अष्टादशदोषरहित षट् चत्वारिशद गुण सहित एकसहस्त्रद्विशतचतुश्त्रिंश चारित्र शुद्धि व्रत- मंडिताय अर्हत् परमेष्ठिनः क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जब अहंकार है आया, निज आतम में तम छाया। केवलज्ञानी की शरणा, निज आतम जगमग करना ॥
चारित्र शुद्धि व्रत धारूँ, कर्मों को शीघ्र पछाडूं। इसलिये करूँ मैं पूजा, मुझ को कुछ और ना सूझा ॥
ॐ ह्रीं अष्टादशदोषरहित षट् चत्वारिशद गुण-सहित एकसहस्त्रद्विशतचतुश्त्रिंश चारित्र शुद्धि व्रत-मंडिताय अर्हत् परमेष्ठिने मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
बंदी कर्मों ने बनाया, कर्मों को हमने बुलाया। कर्मों को कैसे भगाऊँ, तो प्रभू शरण में आऊँ ॥
चारित्र शुद्धि व्रत सार, देता आतम आधार। इसका फल निश्चित मुक्ति, आतमसुख की यह युक्ति ॥
ॐ ह्रीं अष्टादशदोषरहित षट्चत्वारिंशद गुण-सहित एकसहस्त्रद्विशतचतुस्त्रिंश चारित्र शुद्धि व्रत-मंडिताय अर्हत् परमेष्ठिने अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
छाया में तेरी पाऊँ, प्रभु उसमें पलना है। मैंने कदम बढ़ाया, प्रभु शक्ति दीजिये ॥७॥ चरणों में घन टिका रहे, जी भक्ति दीजिये। कैसे बई मैं मुक्तिपथ पे, मुक्ति दीजिये। कर्मों को करूँ नाश मुझे शक्ति दीजिये ॥
दोहा
चारित्र शुद्धि वत करूँ, करूँ, करूँ आपका ध्यान। तीन लोक के नाथ को ‘स्वस्ति’ का प्रणाम ॥
ॐ ह्रीं अष्टादशदोषरहित षट्चत्वारिंशद गुण-सहित एकसहस्त्रद्विशतचतुस्त्रिंश चारित्र शुद्धि व्रत-मंडिताय अर्हत् परमेष्ठिने अनध्यंपरप्राप्तये पूर्णाध्यै निर्वपामीति स्वाहा।
धर्मध्यान में वृद्धि हो, बढ़े भक्ति का भाव। श्री अरिहंत की भक्ति से पार होयगी नाव ॥
इत्याशीर्वादः परिपुष्पांजलिं क्षिपेत्
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