Vastu Tips for Staircase :–
1.सीढ़ियों का निर्माण भवन के दक्षिण या पश्चिम भाग में करना उत्तम रहता है।
2.सीढ़ियों का घुमाव दक्षिणावर्ती होना चाहिए।
3.सीढ़ियों के सामने कोई बन्द दरवाजा नहीं होना चाहिए।
4.सीढ़ियों के नीचे शौचालय कदापि नहीं होना चाहिए।
5.सीढ़ियां विषम संख्या में बनवानी चाहिए– इसके पीछे एक बहुत ही व्यावहारिक और मनोवैज्ञानिक कारण है। आमतौर पर जब हम चलना शुरू करते हैं, तो पहला कदम सीधे पैर (Right Foot) से आगे बढ़ाते हैं। यदि सीढ़ियों की संख्या विषम होगी, तो यात्रा समाप्त करते समय आपका अंतिम कदम भी सीधे पैर पर ही आएगा, जो संतुलन और शारीरिक गतिशीलता के लिहाज से बहुत सहज और शुभ माना जाता है।
6.While ascending the staircase, the face should be either towards the north or the east.
7.Stairs should always in clockwise direction.
8.No room should be built under the stair.
9. सीढ़ियों की नीचे और उपर द्वार रखना चाहिए। नीचे वाले दरवाजे से उपर वाला दरवाजा 12 भाग कम होना चाहिए।
10. यदि किसी मकान में सीढ़ियां पूर्व या उत्तर दिशा में बनी हों तो, उसके वास्तुदोष को कम करने के लिए दक्षिण-पश्चिम दिशा में एक कक्ष बनवाना देना चाहिए।
11.सीढ़ियों के नीचे किसी भी प्रकार का कबाड़, जूता-चप्पल आदि रखना परिवार के मुखिया के लिए अशुभकारी होता है।
12.वास्तुशास्त्र के नियम के अनुसार सीढ़ियों का निर्माण उत्तर से दक्षिण की ओर अथवा पूर्व से पश्चिम दिशा की ओर करवाना चाहिए। जो लोग पूर्व दिशा की ओर से सीढ़ी बनवा रहे हों उन्हें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि सीढ़ी पूर्व दिशा की दीवार से लगी हुई नहीं हो। पूर्वी दीवार से सीढ़ी की दूरी कम से कम 3 इंच होने पर घर वास्तुदोष से मुक्त होता है।
13.सीढ़ी के लिए नैऋत्य यानी दक्षिण दिशा उत्तम होती है। इस दिशा में सीढ़ी होने पर घर प्रगति की ओर अग्रसर रहता है। वास्तुशास्त्र के अनुसार उत्तर-पूर्व यानी ईशान कोण में सीढ़ियों का निर्माण नहीं करना चाहिए।
14. मकान की सीढ़ियां पूर्व से पश्चिम या उतर से दक्षिण की ओर जाने वाली होनी चाहिए। इस बात का ध्यान रखें सीढ़ियां जब पहली मंजिल की ओर निकलती हों तो हमारा मुख उतर-पश्चिम या दक्षिण-पूर्व में होना चाहिए।
15.सीढ़ियों के लिए भवन के पश्चिम, दक्षिण या र्नैत्य का क्षेत्र सर्वाधिक उपयुक्त होता है। नैत्य कोण या दक्षिण-पश्चिम का हिस्सा सीढ़ियां बनाने के लिए अत्यंत शुभ एवं कल्याणकारी होता है।
16. सीढ़ियां कभी भी उतरी या पूर्वी दीवार से जुड़ी हुई नहीं होनी चाहिए। उतरी या पूर्वी दीवार एवं सीढ़ियों के बीच कम से कम 3’’ (तीन इंच) की दूरी अवश्य होनी चाहिए।
17. घर के उतर-पूर्व या ईशान कोण में सीढ़ियों का निर्माण कभी नहीं करवाना चाहिए। इस क्षेत्र में सीढ़ियां बनवाने से आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। व्यवसाय मंे नुकसान एवं स्वास्थ्य की हानि भी होती है तथा गृह स्वामी के दिवालिया होने की संभावना भी निरंतर बनी रहती है। घर के आग्नेय कोण अर्थात् दक्षिण-पूर्व में सीढ़ियां बनवाने से संतान के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
18.सीढ़ियां यदि गोलाई में या घुमावदार बनवानी हों तो घुमाव सदैव पूर्व से दक्षिण, दक्षिण से पश्चिम, पश्चिम से उतर तथा उतर से पूर्व दिशा में होना चाहिए। यदि घर के ऊपर का हिस्सा किराये पर देना हो और स्वयं मकान मालिक को नीचे रहना हो तो ऐसी स्थिति में ऊपर तक पहुंचने के लिए सीढ़ियां कभी भी घर के सामने नहीं बनवानी चाहिए। ऐसी स्थिति में किरायेदार को आर्थिक लाभ होता है तथा मकान मालिक को आर्थिक हानि का सामना करना पड़ता है। सीढ़ियों के आरंभ एवं अंत द्वार अवश्य बनवाना चाहिए।
19.सीढ़ियों का द्वारा पूर्ण अथवा दक्षिण दिशा में ही होना चाहिए। एक सीढ़ी दूसरी सीढ़ी के मध्य लगभग 9’’ का अंतर होना चाहिए।
20. सीढ़ियों के दोनों ओर रेलिंग लगी होनी चाहिए।
21. सीढ़ियों का प्रारंभ त्रिकोणात्मक रूप में नहीं करना चाहिए।
22. अक्सर लोग सीढ़ियों के नीचे जूते, चप्पल रखने की रैक या अलमारी बनवा देते हैं। यह सर्वथा अनुचित है। सीढ़ियों के नीचे का स्थान हमेशा खुला रहना चाहिए। इससे घर के बच्चों को उच्च शिक्षा ग्रहण करने में सहायता मिलती है।
23.सीढ़ियां संबंधी वास्तु दोषों को दूर करने के उपाय: यदि घर बनवाते समय सीढ़ियों से संबंधित कोई वास्तु दोष रह गया हो तो उस स्थान पर बारिश का पानी मिट्टी के कलश में भरकर तथा मिट्टी के ढक्कन से ढककर जमीन के नीचे दबा दें। ऐसा करने से सीढ़ियों संबंधी वास्तु दोषों का नाश होता है। यदि यह उपाय करना भी संभव न हो तो घर में प्रत्येक प्रकार के वास्तु दोषों को दूर करने के लिए घर की छत पर एक म्टिटी के बर्तन में सतनाजा तथा दूसरे बर्तन में जल भरकर पक्षियों के लिए रखें ।
24. घर में घुसते ही किसी को सबसे पहले सीढीआं ही न दिख जाएं।
25. सीढ़ियों की संख्या हमेशा विषम होना चाहिए। सीढ़ियों की संख्या इस प्रकार होनी चाहिए कि उसे 3 से भाग दें तो 2 शेष रहे। जैसे- 5, 11, 17, 23, 29, 32, 36 आदि।
देव, मनुष्य और असुर’ का सूत्र (3 से भाग देने का नियम)
सीढ़ियों की सही संख्या निकालने के लिए वास्तु में एक पारंपरिक गणितीय सूत्र का उपयोग किया जाता है। अपनी प्रस्तावित सीढ़ियों की कुल संख्या को ३ से भाग (Divide) दें:
- शेषफल 1 बचे (देव): यह अत्यंत शुभ है। यह सफलता, सुख और मानसिक शांति लाता है।
- शेषफल 2 बचे (मनुष्य): यह भी अनुकूल और सामान्य है। यह जीवन में स्थिरता और प्रगति देता है।
- शेषफल 0 बचे (असुर): इसे वर्जित या अशुभ माना जाता है। यह घर में नकारात्मकता या कार्यों में रुकावटें ला सकता है।
उदाहरण के लिए:
यदि आप 18 सीढ़ियां रखते हैं: 18\3 = 6 (शेषफल 0 = असुर) -> अशुभ (इसे टालें)
यदि आप 17 सीढ़ियां रखते हैं: 17\3 = 5 (शेषफल 2 = मनुष्य) -> शुभ
यदि आप 19 सीढ़ियां रखते हैं: 19\3 = 6 (शेषफल 1 = देव) -> अत्यंत शुभ
