सोलह कारण विधान – कविवर श्री टेकचंद जी कृत
1. दर्शनविशुद्धि भावना पूजा | प्रत्येकार्घ्य | जयमाला | 2. विनय सम्पन्नता भावना पूजा | 3. शीलव्रतेष्वनतिचार भावना पूजा | 4. अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोग भावना पूजा | 5. संवेग भावना पूजा | 6. त्याग भावना पूजा | 7. तपो भावना पूजा | 8. साधुसमाधि भावना पूजा | 9. वैयावृत्य भावना पूजा | 10. अर्हद्भक्ति भावना पूजा | 11. आचार्यभक्ति भावना पूजा | 12. बहुश्रुतभक्ति भावना पूजा | 13 प्रवचनभक्ति भावना पूजा | 14. षट् आवश्यक भावना पूजा | 15. मार्गप्रभावना भावना पूजा | 16 प्रवचनवात्सल्य भावना पूजा
समुच्चय जयमाला
– दोहा
सोलहकारण भावना, भावे जो भवि सोय। सो तीर्थंकर पद लहे, घनो कहे क्या कोय ।।
मुनियानन्द की चाल
षोडशकारण यह, भावना भाय है, तहां न मद आठ षट् नायतन पाय है।
अष्ट सम्यक तने, दोष नहिं जानिये, मूढता तीन नहिं, ज्ञान शुद्ध आनिये ।।
विनय गुरु देव की, राह जाने सही, भूल अविनय विषे, बुद्धि राखे नहीं। जगत जस पाय अघ, ढाय समता लहे, जीव जो भावना भाय षोडश यहे।। नारि पशु देव की, मनुष की जान जी, काठ चित्राम यह, जीव बिन मान जी। चार विध नारि तजि, शील भावन सही, कारण षोडश यह, भावनाएं कहीं।। ज्ञान उपयोग सो, पाठ जिनधुनि करे, श्रुतिअध्ययन में, नाँहि अन्तर परे। पढ़े उपदेश करि, प्रश्न बहु ले सही, कारण षोडश ये, भावनाएं कहीं।। देख जग चपल नहिं, विषयसुख राचि है, मात सुत नारि तन, मांहि नहिं माचि है। धरे वैराग्य उर, माँहि आनंद सही, कारण षोडश ये, भावनाएं कहीं।। त्याग धन तन करें राजलक्ष्मि सार जी, मात सुत पिता तिय देख बन्धकार जी। छाड़ि परभाव, निजमांहि राचे सही, कारण षोडश ये, भावनाएं कहीं।। करे तप दुर्धरा, देख कायर डरें, मास पक्ष लो, नांहि अनजल करें। शीश गिरि तरुतलें, नदी तट पै सही, कारण षोडश ये, भावनाएं कहीं।। मुनि तन विर्षे जिम, होय साता भली, सोहि विधि करें उर, भक्ति भावां मिली। साधू-समाधी यह, भावना है सही, कारण षोडश ये, भावनाएं कहीं।। राह जब चले मुनि खेद तन में लहे, तथा बहु तप थकी, काय निर्बल रहे। देख इन तबै भवि, पांव चंपै सही, कारण षोडश ये, भावनाएं कहीं।। देव जिनराय की, भक्ति पूजा करे, कण्ठ मधुरे थकी, गान शुभ उच्चरे।भक्ति अरिहन्त सो भाव जे हैं सही, कारण षोडश ये, भावनाएं कहीं।। संघपति जगतगुरु, तीस षट् गुण धरे, लखे पर मन तनी, भाव समता भरे। धर्म तीरथ तने, धीर धारी सही, कारण षोडश ये, भावनाएं कहीं।। अंग ग्यारह लखे, पूर्व दसचार जी, और गुन बने त्रय ज्ञान चव धार जी। भक्ति इन तनी यह भाव शुभदा सही, कारण षोडश ये, भावनाएं कहीं।। भक्ति जिनवाणि की, करे मन लाय जी, मुनि आवशि करें, भक्ति तिन भाय जी। भाव सो प्रवचन, ज्ञान सुखदा सही, कारण षोडश ये, भावनाएँ कहीं।। मनवचन काय धन, लाय हरषाय जी, धर्म उद्योत करि पुण्य उपजाय जी। मार्गपरभावना, अंग सुखदा सही, कारण षोडश ये, भावनाएं कहीं।। वानिजिनविनयतें, सुने पढ़ि है भली, भाव वात्सल्य, प्रवचन पुण्य की रली। या थकी भी महा, पुण्यफल ले सही, कारण षोडश ये, भावनाएं कहीं।।
दोहा
इत्यादिक ये भावना, षोडश भेद अनूप। भावे इनको भक्तितें, ‘टेक’ मोक्ष सिध रूप ।। ॐ ह्रीं श्री दर्शनविशुद्ध्यादि षोडशकारणेभ्यः महार्घ्यम् ।
(इति षोडशकारण विधान उद्यापन समाप्त)
English Meaning with Transliteration
🌸 Samucchaya Jayamālā
(Garland of Sixteen Reflections)
Doha
Sanskrit / Hindi:
सोलह कारण भावना, भावे जो भवि सोय।
सो तीर्थंकर पद लहे, घनो कहे क्या कोय।।
Transliteration:
Solaha kāraṇa bhāvanā, bhāve jo bhavi soya।
So tīrthaṅkara pada lahe, ghano kahe kyā koya।।
English Meaning:
The one who truly contemplates the Sixteen Spiritual Reflections (Ṣoḍaśa Kāraṇa Bhāvanā) will attain the exalted state of a Tīrthaṅkara. What greater goal could be described beyond this?
Muni Ānanda kī Chāl (Verses in sequence)
1.
षोडश कारण यह, भावना भाय है, तहां न मद आठ षट् नायतन पाय है।
अष्ट सम्यक तने, दोष नहिं जानिये, मूढता तीन नहिं, ज्ञान शुद्ध आनिये।।
Transliteration:
Ṣoḍaśa kāraṇa yah, bhāvanā bhāya hai,
Tahaṁ na mada āṭha ṣaṭ nāyatana pāya hai।
Aṣṭa samyaka tane, doṣa nahi jāniye,
Mūḍhatā tīna nahiṁ, jñāna śuddha āniye।।
English Meaning:
Where these Sixteen Reflections are practiced, there is no pride of the eight types of arrogance or attachment to the six external abodes.
The eight false beliefs do not arise, nor do the three types of delusion.
Instead, one attains pure knowledge.
2.
विनय गुरु देव की, राह जाने सही, भूल अविनय विषे, बुद्धि राखे नहीं।
जगत जस पाय अघ, ढाय समता लहे, जीव जो भावना भाय षोडश यहे।।
Transliteration:
Vinaya guru deva kī, rāha jāne sahī,
Bhūla avinaya viśe, buddhi rākhe nahīṁ।
Jagat jasa pāya agh, ḍhāya samatā lahe,
Jīva jo bhāvanā bhāya ṣoḍaśa yahe।।
English Meaning:
The soul cultivates reverence for the Guru and Devas, avoiding all disrespect.
Even amidst praise and blame in the world, one maintains equanimity.
Such is the spirit of these Sixteen Reflections.
3.
नारि पशु देव की, मनुष की जान जी, काठ चित्राम यह, जीव बिन मान जी।
चार विध नारि तजि, शील भावन सही, कारण षोडश यह, भावनाएं कहीं।।
English Meaning (summary):
The soul understands that worldly beings—whether women, animals, celestial or human—are like wooden dolls or painted figures, lifeless without true soul-consciousness.
One renounces attachment to the fourfold form of women and strengthens the vow of celibacy.
4.
ज्ञान उपयोग सो, पाठ जिनधुनि करे, श्रुतिअध्ययन में, नाँहि अन्तर परे।
पढ़े उपदेश करि, प्रश्न बहु ले सही, कारण षोडश ये, भावनाएं कहीं।।
Meaning:
One remains absorbed in the right use of knowledge, constantly studying the Jain scriptures.
He listens to discourses, asks questions with humility, and deepens understanding.
Such reflection leads toward liberation.
5.
देख जग चपल नहिं, विषयसुख राचि है, मात सुत नारि तन, मांहि नहिं माचि है।
धरे वैराग्य उर, माँहि आनंद सही, कारण षोडश ये, भावनाएं कहीं।।
Meaning:
The wise one sees the world’s pleasures as fleeting and does not get engrossed in attachments of body, spouse, or children.
Instead, he holds detachment (vairāgya) in his heart and finds true inner bliss.
