सोलह कारण विधान – कविवर श्री टेकचंद जी कृत
7. तपो भावना पूजा
(अडिल्ल छन्द)
तप ही वज्रसमान, पापगिरि को सही, तप ही भवदधि-नाव, धरे शिव की मही।
तप ही भव शरण, हरे भव दुख सबै, सो तप मैं इहां थापि, जजों मन वच अबै।।
अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननम् । ॐ ह्रीं श्री तपो भावना
ॐ ह्रीं श्री तपो भावना अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् ।
ॐ ह्रीं श्री तपो भावना । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधापनम् ।
(गीता छन्द)
पदमद्रह को नीर निर्मल, कनकझारी में धरों।
उर भक्ति करि गुण गाय तपके, शीशर्ते नमकी करो ।।
इह भली भावन तप सु केरी, कौन उपमा गाय है।
मैं जजों तप मनवचन काय, तीर्थपद की दाय है।।
ॐ ह्रीं श्री तपोभावनायै जलम् निर्वपामीति स्वाहा।
घसि अगर चन्दन नीर सेती, महागंध का भारजी।
मैं कनकझारी मांहि धरिहों, नमों तप गुन धारजी ।।
ताफलै भव आताप नाशे होय समता भाय है।
मैं जजों शुभ तप भावना को, तीर्थपद की दाय है।।
ॐ ह्रीं श्री तपोभावनायै चंदनम् निर्वपामीति स्वाहा।
अक्षत अखण्डित धवल नखसिख, शुद्ध गन्ध मई कहै।
धरि सुभग पातर भावनातें, आपने कर में लहै।।
पद अखय पावन चाह मेरे, तास यों मन भाय है।
सो स्वाध्याय तप ठाठ, मैं पूजों जल आदितैं ।। ॐ ह्रीं श्री स्वाध्यायतपोभावनायै अर्घ्यम् निर्वपामीति स्वाहा। तनर्ते ममत निवार, इक थल तिष्ठै धैर्यसो। सो व्युत्सर्ग तप सार, मैं पूजों जल आदितैं।। ॐ ह्रीं श्री व्युत्सर्गतपोभावनायै अर्घ्यम् निर्वपामीति स्वाहा। मन वच तन इक ठाम, चिंते वृष शुध भावना। ध्यान तिको शुभ नाम, मैं पूजों जल आदितैं।। ॐ ह्रीं श्री ध्यानतपोभावनायै अर्घ्यम् निर्वपामीति स्वाहा। ये तप द्वादश जान, दुविध महा अघ के हरा। कर्मन वज्र-समान, मैं पूजों जल आदितैं।। ॐ ह्रीं श्री द्वादशतपोभावनायै अर्घ्यम् निर्वपामीति स्वाहा।
जयमाला बेसरी (छन्द)
जा, तप कर हरे अध सारा, होयसकल कर्मनते न्यारा। ये तप परभव के सगसाथी, ये तप कर्मदलन को हाथी।। तप ही भवदधि नाव बताया, तपबलतै सबने शिव पाया। तप की अग्नि ददै विधिकाठा, तपतें रहे नहीं अरि आठा ।। तप की चाह करें सुरपति से, तपकों राज तजें नरपति से। तप को जजे वो हि तप पावे, तप बिन प्राणी जगत भ्रमावे ।। तप दे कल्पवृक्ष मन चाया, तप आगम में बन्धु बताया।। तप को तपें कीर्ति को पावें, कनक जिसो बन्हीं संग थावे ।। तपको चहे चित्त भर प्रानी, तपको करे तिनै धुनि जानी। तपको पूजे सो तप चेरा, तप धारें सो साहिब मेरा ।। मैं तो तप की सेव कराऊं, कब तप मिले भावना भाऊं। जबलों मिले नहीं तप त्राता, तबलों मैं तप पूजों भ्राता। तप का शरण भवान्तर पाऊं, तप को भव भव में सिर नाऊं। तप ही लें गुरु देव कहावे, तप जगबन्धु सकल सुख पावे ।।
दोहा
तरुणपने तप जे धरें, तिरें नेम जिन जेम। तातें मैं तपकों नमों, वसु द्रव ले धर प्रेम ।। ॐ ह्रीं श्री तपोभावनायै पूर्णार्यम् निर्वपामीति स्वाहा।
English Meaning with Transliteration
7. तपो भावना पूजा (Tapo Bhāvanā Pūjā):
Opening Verse
Transliteration:
Tapa hī vajra-samān, pāpa-giri ko sahī।
Tapa hī bhavadadhi-nāv, dhare śiva kī mahī॥
Tapa hī bhava-śaraṇa, hare bhava-dukh sabai।
So tapa mai ihāṁ thāpi, jajoṁ mana-vaca abai॥
English Meaning:
Austerity (Tapa) is like a thunderbolt, capable of destroying the mountain of sins.
It is the boat that helps cross the ocean of worldly existence, sustaining the path of liberation.
Tapa is the true refuge, removing all sorrows of worldly life.
Therefore, I establish this Tapo Bhāvanā Pūjā with mind, speech, and body.
Mantras:
अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननम्। ॐ ह्रीं श्री तपो भावना।
ॐ ह्रीं श्री तपो भावना अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम्।
ॐ ह्रीं श्री तपो भावना अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधापनम्।
Verse 1 – Offering of Water (जल अर्पण)
Transliteration:
Padma-daraha ko nīra nirmala, kanaka-jhārī meṁ dharo।
Ura bhakti kari guṇa gāya tapake, śīśarte namakī karo॥
Iha bhalī bhāvana tapa su kerī, kauna upamā gāya hai।
Maiṁ jajoṁ tapa mana-vacana kāya, tīrtha-pada kī dāya hai॥
English Meaning:
I offer the pure water of lotus-lakes in golden vessels.
With devotion, I sing the virtues of austerity and bow my head in reverence.
Such noble is the contemplation of Tapa, beyond comparison.
By worshipping Tapa with mind, speech, and body, one attains the gift of the supreme path of liberation.
Mantra:
ॐ ह्रीं श्री तपोभावनायै जलम् निर्वपामीति स्वाहा।
Verse 2 – Offering of Sandal (चंदन अर्पण)
Transliteration:
Ghasi agar candana nīra setī, mahā-gandha kā bhārjī।
Maiṁ kanaka-jhārī māṁhi dharihōṁ, namoṁ tapa guṇa dhārjī॥
Tāphalai bhava-ātāpa nāśe, hoya samatā bhāya hai।
Maiṁ jajoṁ śubha tapa bhāvanā ko, tīrtha-pada kī dāya hai॥
English Meaning:
I prepare pure sandal paste with fragrant water,
And place it in golden vessels with deep reverence, saluting the glory of Tapa.
As a result, the burning heat of worldly miseries is destroyed, and equanimity arises.
I worship the auspicious Tapo Bhāvanā, which bestows the supreme path of liberation.
Mantra:
ॐ ह्रीं श्री तपोभावनायै चंदनम् निर्वपामीति स्वाहा।
8. साधुसमाधि भावना पूजा Sadhu-Samadhi Bhavana Puja
1. दर्शनविशुद्धि भावना पूजा | प्रत्येकार्घ्य | जयमाला | 2. विनय सम्पन्नता भावना पूजा | 3. शीलव्रतेष्वनतिचार भावना पूजा | 4. अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोग भावना पूजा | 5. संवेग भावना पूजा | 6. त्याग भावना पूजा | 7. तपो भावना पूजा | 8. साधुसमाधि भावना पूजा | 9. वैयावृत्य भावना पूजा | 10. अर्हद्भक्ति भावना पूजा | 11. आचार्यभक्ति भावना पूजा | 12. बहुश्रुतभक्ति भावना पूजा | 13 प्रवचनभक्ति भावना पूजा | 14. षट् आवश्यक भावना पूजा | 15. मार्गप्रभावना भावना पूजा | 16 प्रवचनवात्सल्य भावना पूजा | समुच्चय जयमाला