पहली ढाल छंद 1 – ग्रन्थ का उद्देश्य
जे त्रिभुवन में जीव अनन्त, सुख चाहेँ दुखतैं भयवन्त ।
तातैं दुखहारी सुखकार, कहैं सीख गुरु करुणाधार ॥1 ॥
अन्वयार्थ – (त्रिभुवन में) तीनों लोकों में (जे) जो (अनन्त) अनन्त (जीव) प्राणी हैं, वे (सुख) सुख को (चाहैं) चाहते हैं और (दुखतैं) दुख से (भयवन्त) डरते हैं (तातैं) इसलिए (गुरु) निर्ग्रन्थ गुरु (करुणाधार) दया करके (दुखहारी) दुःख को नष्ट करने वाली और (सुखकार) सुख देने वाली (सीख) शिक्षा (कहैं) कहते हैं।
अर्थ – तीनों लोकों में अनन्त जीव हैं। प्रत्येक जीव की मूल इच्छा सुख प्राप्त करना और दुःख से बचना है। कोई भी जीव स्वेच्छा से दुःख नहीं चाहता। मनुष्य हो या अन्य कोई जीव, सभी अपने-अपने ढंग से सुख की खोज करते हैं। इसी सार्वभौमिक इच्छा को देखकर निर्ग्रन्थ गुरु करुणा से प्रेरित होकर ऐसा उपदेश देते हैं जो जीव के दुःख को दूर करने वाला और उसे वास्तविक सुख प्रदान करने वाला है।
यहाँ ‘सुख’ से केवल सांसारिक सुख का अभिप्राय नहीं है। सांसारिक सुख परिवर्तनशील है और उसके साथ दुःख भी जुड़ा हुआ है। गुरु जिस सुख का मार्ग बताते हैं, वह आत्मा का शाश्वत और वास्तविक सुख है।
इस छन्द में गुरु को ‘करुणाधार’ कहा गया है। अर्थात् गुरु करुणा के आधार हैं। वे जीवों की संसार में भटकती हुई अवस्था को देखकर उन्हें मुक्ति का मार्ग बताते हैं। गुरु का उपदेश केवल ज्ञान देने के लिए नहीं है, बल्कि जीव को उसके वास्तविक स्वरूप का बोध कराने और दुःख के मूल कारण से मुक्त करने के लिए है।
छंद 2 – गुरु शिक्षा सुनने का उपदेश और संसार में भ्रमण का कारण
ताहि सुनो भवि मन थिर आन, जो चाहो अपनो कल्यान ।
मोह-महामद पियो अनादि, भूल आपको भरमत वादि ॥2॥
अन्वयार्थ (भवि) हे भव्यजीवों! (जो) यदि (अपनो) अपना (कल्यान) हित (चाहो) चाहते हो (तो) (ताहि) गुरु की उस शिक्षा को (मन) चित्त (थिर) स्थिर-एकाग्र (आन) करके (सुनो) सुनो (कि इस संसार में प्रत्येक जीव) (अनादि) अनादिकाल से (मोहमहामद) मोहरूपी तेज मदिरा को (पियो) पीकर (आपको) अपने आप को (भूल) भूलकर (वादि) व्यर्थ (भरमत) भटकता है।
अर्थ – जीव अनादिकाल से मोह रूपी मदिरा का सेवन कर रहा है। इस मोह के कारण वह अपने वास्तविक आत्मस्वरूप को भूल गया है। ‘मोह-महामद’ एक अत्यंत सुंदर रूपक है। जिस प्रकार मदिरा पीने वाला व्यक्ति अपने विवेक को खो देता है, उसी प्रकार मोह से ग्रस्त जीव भी अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाता है। वह शरीर को अपना स्वरूप मानता है, सांसारिक वस्तुओं में सुख खोजता है और धन, परिवार, प्रतिष्ठा, मान-सम्मान तथा इच्छाओं में उलझा रहता है। इस प्रकार वह संसार में बार-बार भटकता रहता है।
इस छन्द की सबसे महत्वपूर्ण पंक्ति है— ‘भूल आपको’
अर्थात् जीव ने अपने आपको ही भुला दिया है। जैन दर्शन के अनुसार जीव का वास्तविक स्वरूप चेतन और ज्ञानमय है। लेकिन मोह के कारण वह अपने आत्मस्वरूप को पहचानने के बजाय शरीर और बाहरी पदार्थों के साथ अपनी पहचान जोड़ लेता है। यही आत्म-विस्मृति संसार में भ्रमण का प्रमुख कारण बनती है।
छंद 3 व 4
छहढाला पहली ढाल छंद 1 व 2 | छंद 3 व 4 | छंद 5 व 6 | छंद 7 व 8 | छंद 9 व 10 | छंद 11 व 12 | छंद 13 व 14 | छंद 15 व 16 |
स्वाध्याय
छहढाला पहली ढाल छंद 1 व 2 पर आधारित बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ)