छहढाला – दूसरी ढाल छंद 5 – अजीव और आस्रव तत्त्व का विपरीत श्रद्धान
तन उपजत अपनी उपज जान, तन नशत आपको नाश मान।
रागादि प्रगट ये दुख दैन, तिनही को सेवत गिनत चैन ॥5 ॥
अन्वयार्थ “मिथ्यादृष्टि जीव मिथ्यादर्शन के प्रभाव से” (तन) शरीर के (उपजत) उत्पन्न होने को (अपनी) अपनी आत्मा की (उपज) उत्पन्न होना (जान) मानता है और (तन) शरीर के (नशत) मरण को (आपको) आत्मा का (नाश) मरण (जान) मानता है और (ये) जो (रागादि) राग, द्वेष आदि (प्रगट) स्पष्ट रूप से (दुख दैन) दुःख दाता हैं (तिनही को) उन्हीं को (सेवत) सेवन करता हुआ (चैन) सुख (गिनत) मानता है।
अर्थ
जैन दर्शन के अनुसार जीव को किसी ने बनाया नहीं है। जीव अनादि-निधन है—अर्थात् न उसका कोई आदि है और न अंत।
यदि अतीत की ओर जाते जाएँ, तो अनादि काल से जीव की सत्ता रही है और भविष्य की ओर देखते जाएँ, तो अनंत काल तक जीव की सत्ता बनी रहेगी। इस प्रकार काल की अपेक्षा से जीव का परिचय हुआ—मैं अनादि काल से हूँ, वर्तमान में भी हूँ और अनंत काल तक रहूँगा।
द्रव्य की अपेक्षा से मैं जीव द्रव्य हूँ।
क्षेत्र की अपेक्षा से भी जीव का अपना स्वरूप है। प्रत्येक जीव के प्रदेश उसके अपने होते हैं। जीव जिस शरीर को धारण करता है, उसके अनुरूप शरीर के आकार को ग्रहण करता हुआ दिखाई देता है। वह चाहे बहुत छोटे शरीर में हो या बहुत विशाल शरीर में, जीव का अपना द्रव्यत्व बना रहता है।
भाव की अपेक्षा से जीव का परिचय चैतन्य है। जीव का परिणामिक भाव—उसका जीवत्व और शुद्ध चैतन्य—उसका त्रिकालीन स्वरूप है।
इस प्रकार द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव की अपेक्षा से अपने वास्तविक स्वरूप को न पहचानने वाला बहिरात्मा मिथ्यादृष्टि जीव शरीर को ही अपना स्वरूप मान लेता है।
शरीर की उत्पत्ति को अपनी उत्पत्ति मानना
यही कारण है कि वह कहता है—“मेरा जन्म हुआ।”
शरीर माता-पिता के माध्यम से उत्पन्न हुआ और उसी समय को वह अपनी उत्पत्ति का समय मान लेता है। उसे यह स्मरण नहीं रहता कि इस शरीर से पहले भी जीव की सत्ता थी।
इसी भ्रम को पद में कहा गया है—
“तन उपजत अपनी उपज जान।” अर्थात् शरीर की उत्पत्ति को अपनी आत्मा की उत्पत्ति मान लेना मिथ्यादृष्टि है।
इसी प्रकार— “तन नशत आपको नाश मान।” शरीर के नष्ट होने को अपने नष्ट होने के रूप में मान लेना भी मिथ्यादर्शन का परिणाम है।
शरीर नष्ट होता है, लेकिन जीव द्रव्य नष्ट नहीं होता।
मृत्यु के प्रति भ्रम
अब इस बात को अपने भीतर झाँककर देखना चाहिए। हम बोलचाल में कहते हैं—“आत्मा तो अजर-अमर और अविनाशी है। शरीर ही मरता है।”
लेकिन जब वास्तव में मृत्यु सामने आती है, तब मनुष्य के भीतर कैसी अनुभूति होती है? मृत्यु के समय उत्पन्न होने वाली घबराहट और विकलता को ध्यान से देखें। उसमें कहीं न कहीं यह भावना दिखाई देती है कि “मैं समाप्त हो रहा हूँ।”
किसी को अपने संबंधों के टूटने का दुःख होता है। किसी को अगले जन्म की चिंता होती है। और किसी के भीतर यह भय होता है कि “अब मेरा ही अस्तित्व समाप्त हो जाएगा।”
लेकिन यदि आत्मा को जीव द्रव्य के रूप में समझ लिया जाए, तो स्पष्ट हो जाता है कि समाप्त होने वाला यह शरीर और वर्तमान जीवन की पर्याय है, जीव द्रव्य नहीं।
अर्थात्—
जीवन समाप्त होता है, जीव नहीं।
मृत्यु केवल वर्तमान शरीर और वर्तमान पर्याय का अंत है; जीव की यात्रा वहीं समाप्त नहीं हो जाती। इसलिए मृत्यु को जीव का पूर्ण विनाश मानना उचित नहीं है। मृत्यु एक पर्याय का परिवर्तन है। इसे यात्रा के उदाहरण से समझ सकते हैं।
मान लीजिए कोई व्यक्ति लंबी यात्रा पर जा रहा है। बीच में उसे एक ट्रेन छोड़कर दूसरी ट्रेन पकड़नी पड़ती है। क्या ट्रेन बदलने से उसकी यात्रा समाप्त हो जाती है?
नहीं।
केवल यात्रा का एक साधन बदलता है।
इसी प्रकार जीव की यात्रा भी चलती रहती है। एक शरीर समाप्त होता है और दूसरी पर्याय प्राप्त होती है। इस प्रकार जीव संसार में निरंतर भ्रमण करता रहता है।
“रागादि प्रगट ये दुःख दैन”
राग, द्वेष, क्रोध, मान, माया, लोभ, ईर्ष्या आदि विकारी भाव स्पष्ट रूप से दुःख देने वाले हैं।
क्रोध आता है तो भीतर शांति रहती है या अशांति?
ईर्ष्या होती है तो सुख मिलता है या दुःख?
द्वेष उत्पन्न होता है तो मन शांत होता है या बेचैन?
स्पष्ट है कि ये भाव मन को अशांत करते हैं। फिर भी मिथ्यादृष्टि जीव इन्हीं भावों का सेवन करता है और इन्हीं में सुख खोजता है।
यही इस पद की अगली पंक्ति है—
“तिनही को सेवत गिनत चैन।”
अर्थात् जो भाव वास्तव में दुःख देने वाले हैं, उन्हीं को वह अपनाता है और उनमें ही सुख-चैन मानता है।
सुख वस्तु में नहीं, मान्यता में
अब एक सूक्ष्म बात समझिए। मनुष्य कहता है—“अच्छी वस्तु खाने से मुझे सुख मिलता है।”
लेकिन क्या सुख वास्तव में उस वस्तु में है?
मान लीजिए आप अपनी पसंद की बहुत स्वादिष्ट वस्तु खा रहे हैं। उसी समय मोबाइल पर समाचार आता है कि आपके बच्चे का परिणाम खराब हो गया है। अब वही वस्तु, जो एक क्षण पहले बहुत स्वादिष्ट लग रही थी, क्या उसी प्रकार सुख देगी?
नहीं।
वस्तु तो वही है। स्वाद भी वही है। लेकिन मन की स्थिति बदल गई।
इससे समझ में आता है कि सुख केवल बाहरी वस्तु में नहीं है। हम जिस वस्तु में सुख की कल्पना करते हैं, उसके मिलने पर सुखी अनुभव करते हैं; और जिस वस्तु में सुख नहीं मानते, उसके मिलने पर भी सुख अनुभव नहीं होता।
सुख-दुःख और परिस्थितियों का परिवर्तन
मौसम का उदाहरण भी देखिए।
गर्मियों में ठंडी हवा, पंखा या कूलर अच्छा लगता है। वही ठंडी हवा सर्दियों में अप्रिय लग सकती है। सर्दियों में जिस गर्मी की आवश्यकता होती है, गर्मियों में वही गर्मी असहनीय लगने लगती है।
तो वस्तु अपने आप में सुख या दुःख का कारण नहीं बन जाती। हमारी मान्यता और राग-द्वेष उसके प्रति सुख-दुःख की अनुभूति उत्पन्न करते हैं।
जिससे राग हो जाता है, वह अच्छा लगने लगता है और जिससे द्वेष हो जाता है, वह बुरा लगने लगता है।
राग का अर्थ है—अपनी ओर आकर्षण या खिंचाव।
द्वेष का अर्थ है—दूर हटाने की भावना।
मनुष्य का बहुत-सा जीवन इसी में निकल जाता है कि इष्ट को प्राप्त करना और अनिष्ट को दूर करना।
लेकिन यह कार्य तो पशु-पक्षी भी करते हैं।
यदि किसी क्षेत्र में दूसरे मोहल्ले का कुत्ता आ जाए, तो वहाँ के कुत्ते उसे भगा देते हैं। और यदि कोई उन्हें रोटी डाल दे, तो वे उसके प्रति आकर्षित होकर उसके पीछे चलने लगते हैं।
यदि मनुष्य भी केवल इष्ट को पकड़ने और अनिष्ट को हटाने में ही जीवन बिता दे, तो मनुष्य पर्याय मिलने का वास्तविक प्रयोजन क्या रह गया?
मनुष्य जीवन का महत्त्व विवेक में है—यह समझने में कि सुख का वास्तविक स्वरूप क्या है और आत्मा का वास्तविक हित किसमें है।
राग-द्वेष की निरंतर सेवा
संसारी जीव दिन-रात राग-द्वेष में लगा रहता है।
जिस वस्तु की इच्छा होती है, उसे प्राप्त करने के लिए निरंतर विचार करता रहता है। कभी-कभी वही इच्छा स्वप्न में भी दिखाई देती है। जिस वस्तु को दिनभर मन चाहता रहा, वह स्वप्न में भी प्राप्त होती हुई दिखाई देती है।
इससे समझ में आता है कि हमारा मन किस प्रकार राग की वस्तुओं में उलझा हुआ है।
धन, प्रतिष्ठा, वस्तुएँ, मनोरंजन, भोग और अनेक प्रकार के आकर्षण—मनुष्य इन्हें प्राप्त करने में लगा रहता है। लेकिन प्राप्त हो जाने के बाद भी इच्छा समाप्त नहीं होती। एक वस्तु मिली तो दूसरी चाहिए, दूसरी मिली तो तीसरी चाहिए।
यही राग-द्वेष की प्रवृत्ति है—प्राप्त वस्तु से संतोष नहीं और अप्राप्त वस्तु की निरंतर इच्छा।
इस प्रकार मनुष्य इसे सुख और चैन मानता रहता है, लेकिन वास्तविक शांति उसे प्राप्त नहीं होती।
वह चैन गिनता है, लेकिन चैन पाता नहीं।
संसार के अनेक क्षेत्रों में मनुष्य धन, भोग, प्रतिष्ठा और उपलब्धियों के पीछे भागता रहता है। कुछ प्राप्त हो जाए तो उससे अधिक की इच्छा उत्पन्न हो जाती है। इस प्रकार पूरा जीवन इसी दौड़ में निकल जाता है।
वास्तविक सुख-चैन का स्वरूप क्या है, यह आगे विस्तार से समझाया जाएगा। अभी इतना समझना पर्याप्त है कि जिसको मिथ्यादृष्टि जीव सुख और चैन मान रहा है, वह वास्तव में आस्रवजन्य विकारी भावों का परिणाम है।
छंद 6 – बन्ध और संवर तत्त्व का विपरीत श्रद्धान
शुभअशुभ बन्ध के फल मँझार, रति अरति करै निजपद विसार ।
आतम-हित-हेतु विराग-ज्ञान, ते लखै आपको कष्ट दान ॥6॥
अन्वयार्थ “मिथ्यादृष्टि प्राणी मिथ्यादर्शन के प्रभाव से” (निज पद) आत्मस्वरूप को (विसार) भूलकर (बन्ध के) कर्मबन्ध के (शुभ) अच्छे (फल मँझार) फलों में (रति) प्रेम (करै) करता है और बन्ध के (अशुभ) खोटे (फल मँझार) फलों में (अरति) द्वेष (करै) करता है। तथा, जो (विराग) रागद्वेष का अभाव और (ज्ञान) सम्यग्ज्ञान (आत्महित) आत्मा के हित के (हेतु) कारण हैं (ते) उनको (आपको) आत्मा के (कष्ट दान) दुःखदायी (लखै) मानता है।
अर्थ – यहाँ सबसे पहले कहा गया है—“निजपद विसार”। अर्थात् जीव अपने वास्तविक चैतन्यस्वरूप को भूल गया है। जब उसे अपने आत्मस्वरूप की विस्मृति हो जाती है, तब वह पुण्य और पाप के फलों को ही सुख-दुःख का आधार मानने लगता है। पुण्य के फल में उसे प्रेम होता है और पाप के फल में द्वेष।
वास्तव में पुण्य और पाप दोनों ही कर्मबन्ध हैं। अंतर केवल इतना है कि पुण्य को हम सुखद अनुभव करते हैं और पाप को दुःखद। इसलिए सामान्य जीव पुण्य के बन्धन को अच्छा और पाप के बन्धन को बुरा मानता है।
इसे एक सरल उदाहरण से समझिए। बन्धन चाहे सोने का पिंजरा हो या लोहे का पिंजरा, बन्धन तो बन्धन ही है। तोते को यदि पिंजरे का दरवाजा खुला मिल जाए, तो वह उड़ जाता है और फिर उस पिंजरे में लौटकर नहीं आता। दूसरी ओर, कबूतर कितना ही ऊँचा उड़ ले, फिर भी अपने परिचित स्थान पर लौट आता है।
आचार्य इस उदाहरण के माध्यम से संसारी जीव की स्थिति समझाते हैं। संसार में जीव भी कबूतर की तरह है। वह संसार के दुःखों को भोगता है, फिर भी उसी संसार में लौट-लौटकर आता है। उसे संसार का वास्तविक स्वरूप समझ में नहीं आता। इसके विपरीत, जिसे आत्मस्वरूप का बोध हो जाता है, वह तोते की तरह बन्धन से मुक्त होने की दिशा में आगे बढ़ता है।
इसलिए शुभ और अशुभ दोनों बन्धन हैं। पुण्य को हम सोने की बेड़ी कह सकते हैं और पाप को लोहे की बेड़ी। दोनों में अंतर अवश्य है, लेकिन बन्धन की दृष्टि से दोनों आत्मा को संसार में ही बाँधे रखते हैं।
संसार की विभिन्न गतियों को देखिए। नरकगति दुःखद है और देवगति सुखद प्रतीत होती है। इसलिए सामान्य जीव नरक से द्वेष और देवगति से प्रेम करता है। लेकिन यदि आत्मा के परम हित की दृष्टि से देखें, तो नरकगति हो या देवगति—दोनों ही संसार के भीतर हैं। दोनों में संसार-परिभ्रमण समाप्त नहीं होता।
इसलिए केवल देवगति प्राप्त कर लेना आत्मा की अंतिम उपलब्धि नहीं है। देवगति में सुख मिल सकता है, अनुकूल परिस्थितियाँ मिल सकती हैं, देव-शास्त्र-गुरु का संयोग मिल सकता है, लेकिन केवल इन अनुकूल परिस्थितियों से मोक्ष प्राप्त नहीं होता।
यहीं सम्यग्दर्शन का महत्त्व सामने आता है। सम्यग्दर्शन प्राप्त जीव के भीतर तत्त्व-विवेक उत्पन्न होता है। वह समझता है कि बन्धन की दृष्टि से पुण्य और पाप दोनों से ऊपर उठना है। उसके लिए यह स्पष्ट हो जाता है कि लोहे की बेड़ी हो या सोने की बेड़ी—मुक्ति दोनों से चाहिए।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि अपनी वर्तमान भूमिका और कर्तव्यों को छोड़ दिया जाए। यहाँ तत्त्व-विवेक और भूमिका-विवेक दोनों को समझना आवश्यक है।
तत्त्व की दृष्टि से पुण्य और पाप दोनों बन्धन हैं और आत्मा को दोनों से मुक्त होना है। लेकिन वर्तमान भूमिका में रहते हुए यह देखना होगा कि अभी किसे छोड़ना संभव है और किसे स्वीकार करना आवश्यक है। पाप को छोड़ने के लिए पुण्य का आश्रय लेना पड़ सकता है। पुण्य के माध्यम से ही ऐसे अनुकूल अवसर प्राप्त होते हैं, जिनसे आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ा जा सके।
इसे काँटे के उदाहरण से समझ सकते हैं। पैर में काँटा चुभ गया हो तो उसे निकालने के लिए कई बार दूसरे काँटे का ही सहारा लेना पड़ता है। काँटा निकल जाने के बाद दोनों काँटों को छोड़ दिया जाता है। उसी प्रकार पाप से निकलने के लिए पुण्य का सहारा लिया जा सकता है, लेकिन अंतिम लक्ष्य पुण्य में आसक्त होना नहीं, बल्कि सभी बन्धनों से मुक्त होना है।
इसलिए जब यहाँ कहा गया है कि मिथ्यादृष्टि जीव पुण्य के बन्ध में रति और पाप के बन्ध में अरति करता है, तो उसका कारण यही है कि उसने अपने आत्मस्वरूप को भुला दिया है।
पुण्य और आत्महित
अब प्रश्न उठता है—आत्मा का वास्तविक हित किसमें है?
क्या पुण्य में आत्मा का अंतिम हित है? पुण्य के उदय से आत्मा को अनुकूल परिस्थितियाँ अवश्य प्राप्त हो सकती हैं। पुण्य के कारण देव-शास्त्र-गुरु का संयोग मिल सकता है, सत्संग प्राप्त हो सकता है और आत्मकल्याण के लिए उचित वातावरण बन सकता है। लेकिन पुण्य का उदय स्वयं आत्मा को मोक्ष प्रदान नहीं करता।
यहाँ एक महत्त्वपूर्ण बात समझनी चाहिए—गुरु तक पहुँचा देने वाला पुण्य, स्वयं निर्वाण तक नहीं ले जाता।
पुण्य के प्रति कृतज्ञता अवश्य होनी चाहिए, क्योंकि उसी के माध्यम से हमें देव, शास्त्र और गुरु का संयोग प्राप्त हो सकता है। लेकिन इसके बाद आत्मा को स्वयं अपने स्वरूप को समझना होगा और आत्मकल्याण की दिशा में पुरुषार्थ करना होगा।
इसीलिए अगली पंक्ति अत्यंत महत्त्वपूर्ण है—
“आतम-हित-हेतु विराग-ज्ञान।”
यहाँ हित का अर्थ है—आत्मा की भलाई और कल्याण।
हेतु का अर्थ है—उसका कारण।
और आत्मा के हित के हेतु कौन हैं?
विराग और ज्ञान।
अर्थात् राग-द्वेष से निवृत्ति तथा सम्यग्ज्ञान ही आत्मा के वास्तविक हित के कारण हैं।
लेकिन मिथ्यादृष्टि जीव की स्थिति क्या है? जिस विराग और ज्ञान को आत्मा के लिए हितकारी होना चाहिए, वही उसे “कष्टदायक” दिखाई देता है।
जब वैराग्य की बात आती है, तो उसे लगता है—“अब यह कठिन विषय आ गया!” त्याग, संयम और तपस्या की चर्चा सुनकर उसे कठिनाई दिखाई देती है। ज्ञान की चर्चा भी उसे बोझिल लग सकती है। क्योंकि उसका दृष्टिकोण अभी बाह्य सुखों पर टिका हुआ है।
वास्तव में केवल वैराग्य की चर्चा ही नहीं, बल्कि वैराग्य का प्रत्यक्ष जीवन भी मिथ्यादृष्टि जीव को कष्टदायक दिखाई देता है।
जब कोई मुनि त्यागमार्ग पर चलता है, तपस्या करता है, पैदल विहार करता है, आहारचर्या का पालन करता है, केशलोच जैसी कठिन साधनाएँ करता है, तब सामान्य व्यक्ति बाहर से देखकर सोच सकता है—“यह कितना कठिन जीवन है!”
उसे दिखाई देता है कि जिसने पहले अनेक प्रकार के भोजन, सुविधाएँ और इन्द्रिय-विषयों का उपभोग किया, उसने सब छोड़ दिया। अब उसके पास बाहरी दृष्टि से देखने पर कुछ भी नहीं है। न भौतिक सुविधाएँ, न विषय-सुख और न ही सांसारिक संग्रह।
लेकिन यहाँ दृष्टि का अंतर है।
रागी को दिखाई देता है कि वैरागी के पास बाहर कुछ नहीं है;
वैरागी अनुभव करता है कि भीतर आत्मिक शांति और स्वतंत्रता का मार्ग खुल रहा है।
रागी बाहरी वस्तुओं को सुख का आधार मानता है, इसलिए त्याग उसे दुःख दिखाई देता है। उसे लगता है कि जिसने सब कुछ छोड़ दिया, वह कितना कष्टपूर्ण जीवन जी रहा है। लेकिन वह यह नहीं देख पाता कि वैराग्य का उद्देश्य बाहरी सुखों को छोड़कर आत्मस्वरूप की ओर उन्मुख होना है।
इसी प्रकार मुनिराज की आहारचर्या, विहार, संयम, तपस्या और अन्य साधनाएँ मिथ्यादृष्टि जीव को कठिन और कष्टदायक दिखाई देती हैं। वह केवल बाहरी क्रिया को देखता है; उसके पीछे छिपे हुए आत्मिक आनंद और आत्मकल्याण को नहीं देख पाता।
इसलिए आचार्य कहते हैं कि मिथ्यादृष्टि जीव की सबसे बड़ी भूल यही है कि उसने निजपद को विसार दिया है। आत्मस्वरूप की विस्मृति के कारण उसे संसार के सुखद फल प्रिय लगते हैं और दुःखद फल अप्रिय। और जो वस्तुतः आत्मा के हित का कारण है—विराग और ज्ञान—वही उसे कष्टदायक प्रतीत होता है।
अतः दृष्टिकोण को बदलना आवश्यक है। जब आत्मस्वरूप का बोध जागता है, तब धीरे-धीरे यह विवेक उत्पन्न होता है कि संसार के सुख भी अंतिम सुख नहीं हैं और संसार के बन्धन से मुक्ति ही आत्मा का वास्तविक लक्ष्य है।
छहढाला पहली ढाल छंद 1 व 2 | छंद 3 व 4 | छंद 5 व 6 | छंद 7 व 8 | छंद 9 व 10 | छंद 11 व 12 | छंद 13 व 14 | छंद 15 व 16 |
दूसरी ढाल छंद 1 व 2 | छंद 3 व 4 |
स्वाध्याय
छहढाला दूसरी ढाल छंद 5 व 6 पर आधारित बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ)