मेरी भावना – छंद 1: व्याख्या और अर्थ
जिसने राग-द्वेष कामादिक, जीते सब जग जान लिया, सब जीवों को मोक्ष मार्ग का निस्पृह हो उपदेश दिया ।
बुद्ध, वीर जिन, हरि, हर ब्रह्मा या उसको स्वाधीन कहो, भक्ति-भाव से प्रेरित हो यह चित्त उसी में लीन रहो ॥1॥
सच्चे आराध्य के तीन लक्षण
“मेरी भावना” के प्रथम छंद में पंडित जुगलकिशोर जी सबसे पहले हमारे आराध्य, भगवान और परमात्मा के वास्तविक स्वरूप का परिचय कराते हैं। वे बताते हैं कि हमें किसकी आराधना करनी चाहिए और सच्चे भगवान के लक्षण क्या हैं।
यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि जिनकी हम स्तुति करते हैं, जिनकी वंदना करते हैं और जिन्हें नमस्कार करते हैं, उन्हीं के गुण हमारे जीवन का आदर्श बनते हैं। इसलिए सबसे पहले यह स्पष्ट होना आवश्यक है कि सच्चा देव कौन है?
प्रथम छंद में भगवान के तीन प्रमुख लक्षण बताए गए हैं—
1. वीतरागता – जिसने राग-द्वेष को जीत लिया
सबसे पहले कहा गया है—
“जिनने राग द्वेष कामादिक जीते।”
अर्थात वह आत्मा जिसने राग, द्वेष, मोह, काम, क्रोध, लोभ, वासना तथा सभी प्रकार के विकारी भावों पर पूर्ण विजय प्राप्त कर ली है। जिसके चित्त में अब एक क्षण के लिए भी कोई विकार नहीं ठहरता, वही जिन या जिनेन्द्र कहलाता है। “जिन” का अर्थ ही है—जिसने अपने भीतर के शत्रुओं को जीत लिया हो। इस प्रकार भगवान का पहला और सबसे महत्वपूर्ण लक्षण है वीतरागता—राग और द्वेष से पूर्णतः मुक्त होना।
2. सर्वज्ञता – जिसने सब कुछ जान लिया
दूसरा लक्षण है—
“सब जग जान लिया।”
यह ज्ञान किसी पुस्तक, शिक्षक या बाहरी साधन से प्राप्त नहीं हुआ। यह उनकी अपनी आत्मशक्ति का परिणाम है। जब आत्मा पर पड़े ज्ञानावरण कर्म पूर्णतः नष्ट हो जाते हैं, तब आत्मा का स्वाभाविक ज्ञान पूर्ण रूप से प्रकट होता है। इसी अवस्था को केवलज्ञान कहा जाता है। केवलज्ञानी भगवान एक ही समय में समस्त द्रव्यों, समस्त क्षेत्रों, समस्त कालों और समस्त भावों को प्रत्यक्ष जान लेते हैं। इसलिए उन्हें सर्वज्ञ कहा जाता है। अतः भगवान का दूसरा लक्षण है सर्वज्ञता—ऐसा पूर्ण ज्ञान जिसके सामने कुछ भी अज्ञात नहीं रहता।
3. हितोपदेशी – जिसने निस्पृह होकर मोक्षमार्ग का उपदेश दिया
तीसरा लक्षण है—
“सब जीवों को मोक्ष मार्ग का, निस्पृह हो उपदेश दिया।”
भगवान का उपदेश किसी विशेष जाति, पंथ, संप्रदाय या समुदाय के लिए नहीं था। उनके हृदय में प्रत्येक जीव के कल्याण की समान भावना थी। उन्होंने किसी प्रतिफल, सम्मान, प्रसिद्धि या लाभ की इच्छा से उपदेश नहीं दिया। उनके भीतर कोई स्वार्थ नहीं था। वे पूर्णतः निस्पृह थे। इसी निष्पक्ष और निष्काम भाव से उन्होंने प्रत्येक जीव को आत्मकल्याण का मार्ग बताया—
- पापों से बचो।
- शुभ कर्मों में प्रवृत्त हो।
- और अंततः शुभ-अशुभ दोनों से ऊपर उठकर अपनी आत्मा के शुद्ध स्वरूप को प्राप्त करो।
यही मोक्षमार्ग है और यही आत्मा के परमात्मा बनने की यात्रा है। इसीलिए भगवान को हितोपदेशी कहा जाता है—अर्थात् जो बिना किसी स्वार्थ के सभी जीवों का वास्तविक हित बताने वाले हों।
निष्पृहता ही सत्य का आधार है
जिस व्यक्ति के भीतर स्वार्थ होता है, वह पूर्ण न्याय नहीं कर सकता। जिसके मन में कुछ पाने की इच्छा शेष है, वह परिस्थितियों के अनुसार अपने विचार बदल सकता है। किन्तु वीतराग भगवान किसी से कुछ भी प्राप्त करना नहीं चाहते। वे न किसी को प्रसन्न करने के लिए बोलते हैं और न किसी के विरोध में। उनका प्रत्येक उपदेश केवल और केवल जीवों के कल्याण के लिए होता है। इसी कारण उनका वचन शाश्वत सत्य होता है।
सच्चे देव की पहचान
पंडित श्री जुगलकिशोर जी ‘मुख्तार’ अंतर्निहित रूप से हमें एक अत्यंत महत्वपूर्ण संदेश देते हैं कि भगवान का नाम, भाषा या संबोधन मुख्य नहीं है। मुख्य बात उनके लक्षण हैं।
यदि किसी में ये तीन गुण विद्यमान हैं, वही सच्चे अर्थों में आराध्य है—
- वीतरागता — राग-द्वेष से पूर्ण मुक्ति।
- सर्वज्ञता — समस्त सत्य का प्रत्यक्ष ज्ञान।
- हितोपदेशिता — निष्पक्ष एवं निस्पृह होकर सभी जीवों के कल्याण का उपदेश।
यही तीन लक्षण सच्चे देव, सच्चे गुरु और सच्चे परमात्मा की वास्तविक पहचान हैं। जब हमारी श्रद्धा ऐसे वीतराग, सर्वज्ञ और हितोपदेशी भगवान में स्थिर होती है, तभी हमारी आराधना सही दिशा में अग्रसर होती है और हमारा आध्यात्मिक जीवन सार्थक बनता है।
प्रथम छंद के अगले चरण में पंडित जी एक अत्यंत गहन और उदार दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं—
“बुद्ध, वीर, जिन, हरि, हर, ब्रह्मा, या उसको स्वाधीन कहो।”
इस एक पंक्ति में वे स्पष्ट कर देते हैं कि परमात्मा की पहचान उनके नाम से नहीं, बल्कि उनके गुणों से होती है।
कोई उन्हें बुद्ध कहे—अर्थात् पूर्ण रूप से जागृत आत्मा।
कोई उन्हें वीर कहे—जिसने अपने भीतर के सभी विकारों पर विजय प्राप्त कर ली हो।
कोई उन्हें जिन कहे—जिसने राग, द्वेष, मोह और समस्त कषायों को जीत लिया हो।
कोई उन्हें हरि कहे—जो कर्मरूपी शत्रुओं का हरण करने वाले हों।
कोई उन्हें हर कहे—जो समस्त कर्मों और विकारों का नाश कर चुके हों।
कोई उन्हें ब्रह्मा कहे — सृष्टिकर्ता या सर्वोच्च सत्ता के रूप में प्रयुक्त नाम।
कोई उन्हें स्वाधीन कहे—अर्थात् जो पूर्णतः अपनी आत्मा के अधीन हों, किसी बाहरी परिस्थिति या कर्म के अधीन नहीं।
नाम चाहे जो भी हो, यदि उनमें परमात्मा के वास्तविक गुण विद्यमान हैं, तो वे ही हमारे आराध्य हैं। पंडित जी मानो कह रहे हैं कि हमें नामों के विवाद में नहीं पड़ना चाहिए। हमारा ध्यान केवल इस बात पर होना चाहिए कि जिस व्यक्तित्व को हम भगवान मान रहे हैं, क्या उसमें परमात्मा के ये तीन अनिवार्य लक्षण हैं—
- वीतरागता – राग-द्वेष से पूर्ण मुक्ति।
- सर्वज्ञता – समस्त सत्य का प्रत्यक्ष ज्ञान।
- हितोपदेशिता – सभी जीवों के कल्याण के लिए निष्पक्ष एवं निस्पृह उपदेश।
यदि ये तीनों गुण विद्यमान हैं, तो उनका नाम चाहे ऋषभदेव हो, श्रीराम हो, हनुमान हो, युधिष्ठिर हो, गजकुमार हो, नागकुमार हो या प्रद्युम्नकुमार—वे हमारे लिए वंदनीय हैं। हमारी श्रद्धा नाम में नहीं, बल्कि उनके गुणों में है।
भक्ति के दो मार्ग
इसके बाद पंडित जी भक्ति का अत्यंत सुंदर स्वरूप प्रस्तुत करते हैं—
“भक्ति भाव से प्रेरित हो, या चित्त उसी में लीन रहो।”
भगवान की उपासना दो प्रकार से की जा सकती है।
1. बाह्य भक्ति
भक्ति-भाव से प्रेरित होकर भगवान की पूजा करना, स्तुति करना, भजन गाना, अर्घ्य अर्पित करना, गुणगान करना, नाम-स्मरण करना—ये सभी बाह्य भक्ति के रूप हैं। इनसे हृदय में श्रद्धा, प्रेम और समर्पण की भावना जागृत होती है।
2. आंतरिक भक्ति
दूसरा मार्ग है—चित्त को भगवान के गुणों में लीन कर देना।
ध्यान में बैठकर उनके वीतराग स्वरूप का चिंतन करना, उनके गुणों को अपने जीवन का आदर्श बनाना और निरंतर उनकी स्मृति में स्थित रहना—यही वास्तविक आंतरिक आराधना है। बाह्य रूप से पूजा करें, भजन गाएँ, स्तुति करें; किन्तु भीतर मन भगवान के गुणों में निरंतर डूबा रहे। यही पंडित जी का संदेश है।
वीतरागता का वास्तविक अर्थ
प्रथम छंद में वर्णित वीतरागता केवल राग-द्वेष का अभाव नहीं है, बल्कि समस्त सांसारिक विकारों से पूर्ण मुक्ति की अवस्था है। ऐसे परमात्मा के भीतर अब न भूख है, न प्यास; न राग है, न द्वेष; न मोह है, न भय; न जन्म है, न मृत्यु; न बुढ़ापा है और न ही किसी प्रकार का मानसिक या शारीरिक विकार। जैन आगमों में अरिहंत भगवान के अठारह दोषों से रहित होने का वर्णन मिलता है। वे इन सभी सीमाओं से परे, पूर्णतः शुद्ध और स्वतंत्र आत्मा हैं। इसलिए उन्हें वीतराग कहा जाता है।
सर्वज्ञ और हितोपदेशी
वे केवल वीतराग ही नहीं, सर्वज्ञ भी हैं। उनके लिए कोई वस्तु, कोई काल, कोई स्थान और कोई भाव अज्ञात नहीं है। साथ ही वे हितोपदेशी हैं। उनका प्रत्येक उपदेश केवल जीवों के कल्याण के लिए है। उसमें न किसी प्रकार का स्वार्थ है, न प्रसिद्धि की इच्छा और न किसी प्रतिफल की अपेक्षा। वे निस्पृह होकर समस्त संसार को मोक्षमार्ग बताते हैं। उनका उद्देश्य केवल इतना है कि प्रत्येक आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप को पहचाने और परमात्मा बनने की दिशा में अग्रसर हो।
गुणों में खो जाना ही सच्ची भक्ति है
पंडित जुगलकिशोर जी मुख्तार का संदेश अत्यंत स्पष्ट है—परमात्मा का नाम चाहे कुछ भी हो, यदि उनमें वीतरागता, सर्वज्ञता और हितोपदेशिता के गुण हैं, तो वही हमारे आराध्य हैं। इसलिए साधक का लक्ष्य नामों के विवाद में उलझना नहीं, बल्कि भगवान के गुणों में खो जाना होना चाहिए। जब श्रद्धा नाम से ऊपर उठकर गुणों पर केंद्रित हो जाती है, तभी भक्ति अपने वास्तविक स्वरूप को प्राप्त करती है।
यही “मेरी भावना” के प्रथम छंद का सार्वभौमिक और कालातीत संदेश है।
छंद 2 – अर्थ
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स्वाध्याय
मेरी भावना – छंद 1 पर आधारित बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ)
- “मेरी भावना” का वास्तविक अर्थ क्या है?
- (A) केवल प्रार्थना करना
- (B) पूजा करना
- (C) अपने भीतर श्रेष्ठ भावों का विकास करना
- (D) केवल शास्त्र पढ़ना
- “मेरी भावना” का नियमित चिंतन करने से क्या होता है?
- (A) धन की प्राप्ति
- (B) सकारात्मकता बनी रहती है
- (C) प्रसिद्धि मिलती है
- (D) शक्ति बढ़ती है
- सच्चे भगवान का पहला लक्षण क्या है?
- (A) दानशीलता
- (B) सर्वज्ञता
- (C) वीतरागता
- (D) तपस्या
- वीतरागता का अर्थ है—
- (A) संसार छोड़ देना
- (B) सभी आंतरिक विकारों पर विजय प्राप्त करना
- (C) केवल मौन रहना
- (D) वन में रहना
- भगवान किन विकारों पर विजय प्राप्त कर चुके होते हैं?
- (A) राग-द्वेष
- (B) क्रोध-लोभ
- (C) मोह-काम
- (D) उपर्युक्त सभी
- भगवान को ‘जिन’ या ‘जिनेन्द्र’ क्यों कहा जाता है?
- (A) क्योंकि वे राजा हैं
- (B) क्योंकि उन्होंने विकारों को जीत लिया है
- (C) क्योंकि वे तपस्वी हैं
- (D) क्योंकि वे उपदेश देते हैं
- भगवान का दूसरा प्रमुख लक्षण क्या है?
- (A) दया
- (B) त्याग
- (C) सर्वज्ञता
- (D) तप
- सर्वज्ञता का अर्थ है—
- (A) सभी भाषाएँ जानना
- (B) सभी शास्त्र पढ़ना
- (C) सब कुछ प्रत्यक्ष जानना
- (D) केवल भविष्य जानना
- भगवान ने केवलज्ञान किसके बल पर प्राप्त किया?
- (A) गुरु की कृपा से
- (B) पुस्तकों से
- (C) आत्मशक्ति से
- (D) देवताओं से
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