मेरी भावना – छंद 11: व्याख्या और अर्थ
फैले प्रेम परस्पर जग में मोह दूर ही रहा करे, अप्रिय-कटुक-कठोर शब्द नहिं कोई मुख से कहा करे ।
बनकर सब युगवीर हृदय से देशोन्नति-रत रहा करें, वस्तु-स्वरूप विचार खुशी से सब दुख संकट सहा करें ॥11॥
पंडित प्रवर, कविवर महान, राष्ट्रहित चिंतक जुगलकिशोर जी ‘मुख्तार’ ‘युगवीर’ जी ने मेरी भावना की इन पंक्तियों में विश्वकल्याण का अमृत भर दिया है। उन्होंने ऐसी सुंदर, सार्वभौमिक और सर्वहितकारी भावनाओं को इसमें समाहित किया है, जिनमें संपूर्ण मानवता के कल्याण की कामना दिखाई देती है।
वास्तव में, संसार में जितनी भी श्रेष्ठ भावनाएँ, मंगलकारी प्रार्थनाएँ और कल्याणकारी चिंतन हो सकते हैं, उनका सार इस छोटी-सी रचना मेरी भावना में समाहित दिखाई देता है। यही कारण है कि मेरी भावना केवल किसी एक व्यक्ति, जाति, संप्रदाय या समाज की भावना न रहकर समूचे विश्व की भावना बन गई है। प्रत्येक जाति, प्रत्येक पंथ और प्रत्येक समाज का व्यक्ति इसे पढ़कर अपने जीवन को श्रेष्ठ बनाने की प्रेरणा प्राप्त कर सकता है।
आज अनेक विद्यालयों और महाविद्यालयों में मेरी भावना को प्रार्थना के रूप में अपनाया गया है। मध्य प्रदेश सरकार ने भी इसे कक्षा सात की पाठ्यपुस्तक में स्थान दिया है। इसके भाव इतने सार्वभौमिक और जनकल्याणकारी हैं कि इसका अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ है और विभिन्न स्थानों पर इसे श्रद्धा एवं सम्मान के साथ पढ़ा जाता है। मेरी भावना के प्रारंभ से लेकर इन अंतिम पंक्तियों तक जीवन को निर्मल बनाने वाली अनेक भावनाएँ क्रमशः हमारे सामने आती हैं—अहंकार के त्याग से लेकर आत्मशुद्धि, सहनशीलता, करुणा, प्रेम, परस्पर सद्भाव, देशहित और अंततः सर्वजीव कल्याण की भावना तक।
अब जब हम मेरी भावना के इस अंतिम छंद को पढ़ते हैं, तो केवल इसके शब्दों का उच्चारण करना ही पर्याप्त नहीं है। हमें इसके भावों को अपने चित्त में उतारना है। जिसने इतनी सुंदर भावनाएँ लिखीं, हमारा भी संकल्प होना चाहिए कि इन भावनाओं को पढ़कर और सुनकर हम अपने मन को अधिक सुंदर, निर्मल और विशुद्ध बनाएँ।
आइए, आज हम एक छोटा-सा संकल्प लें—कम-से-कम प्रत्येक 24 घंटे में एक बार ‘मेरी भावना’ को पढ़ेंगे, सुनेंगे अथवा गुनगुनाएँगे। यदि पूरी मेरी भावना पढ़ना संभव न हो, तो कम-से-कम इसकी अंतिम बारह पंक्तियाँ—
“सुखी रहें सब जीव जगत के…” से लेकर “…सब दुख-संकट सहा करें॥” तक प्रतिदिन पढ़ें, सुनें और मनन करें।
क्योंकि जब ये पंक्तियाँ केवल हमारी वाणी में नहीं, बल्कि हमारे विचारों, व्यवहार और जीवन में उतरेंगी, तभी मेरी भावना वास्तव में हमारी भावना बनेगी। हमारा यह छोटा-सा दैनिक अभ्यास हमारे आत्मकल्याण का माध्यम बने और साथ ही संसार के प्रत्येक जीव के प्रति प्रेम, करुणा, मैत्री और मंगल की भावना को विकसित करे—यही इस महान रचना का वास्तविक उद्देश्य है।
फैले प्रेम परस्पर जग में मोह दूर ही रहा करे
प्रेम और मोह में सूक्ष्म अंतर
कवि इस छंद में एक अत्यंत व्यावहारिक एवं आध्यात्मिक संदेश देते हैं कि संसार में सभी जीवों के प्रति परस्पर प्रेम और वात्सल्य होना चाहिए, किंतु अंध-मोह नहीं होना चाहिए।
- प्रेम भाव: किसी व्यक्ति या वस्तु का आदर करना, उसकी देखभाल करना, उसे व्यवस्थित व सुरक्षित रखना तथा उसके प्रति सद्भावना रखना ‘प्रेम’ है। प्रेम का वास्तविक अर्थ “जियो और जीने दो” के सिद्धांत पर चलना है। जब हम स्वयं भी खुश रहते हैं और सभी जीवों के सुख तथा स्वतंत्रता की मंगल कामना करते हैं, तो वह ‘प्रेम भाव’ है। प्रेम सबके साथ समान रूप से होता है।
- मोह भाव: किसी वस्तु या व्यक्ति के प्रति अति-आसक्ति रखना, उसे अपना मानकर पकड़ना और यह सोचना कि “इसके बिना मेरा अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा”—यह ‘मोह’ है, जो केवल दुख और बंधन का कारण बनता है। जब हमारी प्रसन्नता किसी एक ही व्यक्ति या वस्तु पर निर्भर हो जाती है और हम सोचने लगते हैं कि “हम केवल उसी के साथ खुश रह सकते हैं,” तो वह ‘मोह’ बन जाता है। मोह का परिणाम दुख और मानसिक बंधन है।
अतः मन में यह भावना निरंतर होनी चाहिए कि हम संसार के प्रत्येक जीव के प्रति प्रेम और वात्सल्य रखें, किंतु किसी भी भौतिक वस्तु या व्यक्ति के प्रति अंधे मोह से मुक्त रहें।
जिस प्रकार कोरोना का संक्रमण बहुत तेजी से एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक फैल गया था, उसी प्रकार हे भगवान! प्रेम का ऐसा संक्रमण संसार में फैले कि हर व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को प्रेम की दृष्टि से देखने लगे। एक-दूसरे के प्रति अच्छे विचार रखने लगे, एक-दूसरे के सुख की कामना करने लगे और परस्पर सहयोग एवं सद्भाव के साथ जीवन जीने लगे।
आज संसार को सबसे अधिक आवश्यकता इसी प्रेम की है। यदि प्रेम की भावना वास्तव में मनुष्य के भीतर जाग जाए, तो बहुत-से संघर्ष, विवाद, वैमनस्य और कटुता अपने आप समाप्त हो सकते हैं। लेकिन कवि साथ में एक बहुत महत्वपूर्ण बात कहते हैं—
“मोह दूर ही रहा करे।” अर्थात् प्रेम तो बढ़े, लेकिन मोह न बढ़े।
प्रेम और मोह देखने में एक जैसे लग सकते हैं, लेकिन दोनों में बहुत बड़ा अंतर है।
प्रेम कहता है—“तुम सुखी रहो।”
मोह कहता है—“तुम मेरे कारण सुखी रहो।”
प्रेम में सामने वाले के सुख की भावना होती है, जबकि मोह में ममत्व आ जाता है—“यह मेरा है”, “यह केवल मेरे लिए है”, “इस पर मेरा अधिकार है।” यही “मेरा-मेरा” की भावना मोह है।
जब हम किसी व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति के प्रति अत्यधिक ममत्व विकसित कर लेते हैं, तो उसके साथ आसक्ति जुड़ जाती है। फिर उसके मिलने पर अत्यधिक प्रसन्नता और उसके छूटने पर अत्यधिक दुःख होने लगता है। यही मोह धीरे-धीरे हमारे विवेक को प्रभावित करता है और कर्मबंधन का कारण बनता है। इसलिए भगवान से प्रार्थना है—
प्रेम सबके प्रति हो, लेकिन मोह किसी के प्रति न हो।
प्रेम शाश्वत हो सकता है, क्योंकि वह जीव मात्र के प्रति मैत्री और कल्याण की भावना है। लेकिन जब वही प्रेम “यह मेरा है” की भावना में बदल जाता है, तो वह मोह का रूप ले लेता है। हमें संसार के प्रत्येक जीव के प्रति प्रेम रखना है, लेकिन किसी को अपना मानकर उसके प्रति आसक्त नहीं होना है। यही मेरी भावना का अत्यंत सुंदर संदेश है—
“प्रेम बढ़े, ममत्व घटे;
मैत्री बढ़े, आसक्ति घटे;
सद्भाव बढ़े, स्वार्थ घटे।”
अप्रिय-कटुक-कठोर शब्द नहिं कोई मुख से कहा करे
कटुक अर्थात् कड़वे शब्द और कठोर अर्थात् कर्कश, चुभने वाले शब्द। हे भगवान! ऐसा हमारा मुख हो कि जब भी हम बोलें, तो हमारे मुख से किसी के लिए अप्रिय, कड़वे या कठोर शब्द न निकलें। हमारी वाणी से हमेशा प्रिय, मधुर, सरल, सुंदर और कोमल शब्द ही निकलें।
हमारी वाणी ऐसी हो जो किसी के हृदय को चोट न पहुँचाए। हमारे शब्द किसी को तोड़ने वाले नहीं, बल्कि जोड़ने वाले हों।
क्योंकि मनुष्य की पहचान केवल उसके विचारों से नहीं, बल्कि उसकी वाणी और व्यवहार से भी होती है। इसलिए हमारी भावना हो कि हम जो भी बोलें, सोच-समझकर बोलें और ऐसा बोलें जिससे सामने वाले के मन में प्रसन्नता और शांति उत्पन्न हो।
छंद की पंक्ति केवल मुख से बोले जाने वाले शब्दों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आज के डिजिटल युग में हमारे ऑनलाइन आचरण पर भी उतनी ही लागू होती है:
वाणी में संयम: मुख से कभी भी किसी के लिए अप्रिय, कड़वे या कठोर शब्द न निकलें, क्योंकि कटु वचन दूसरों के हृदय को आघात पहुँचाते हैं।
- अपशब्द और कटु वाणी का त्याग: किसी को नीचा दिखाना, गाली-गलौज करना या कड़वे वचन बोलना व्यक्ति के चरित्र को गिराता है।
- डिजिटल माध्यमों (WhatsApp/Social Media) का विवेकपूर्ण उपयोग:
- आज के समय में लोग केवल मुख से नहीं बोलते, बल्कि मैसेज और चैट के माध्यम से भी अप्रिय, कटु और भ्रामक बातें फैलाते हैं।
- किसी की निंदा, अफ़वाह या चरित्र-हनन करने वाले मैसेज को आगे फॉरवर्ड (forward) करना भी असंयमित वाणी और हिंसा का ही एक रूप है।
- समाधान: यदि हमारे पास कोई ऐसा अनर्गल या अप्रिय संदेश आता है, तो उसे आगे भेजने के बजाय वहीं रोक देना (Delete कर देना) ही सामाजिक शांति और धर्म के अनुकूल आचरण है।
बनकर सब युगवीर, हृदय से देशोन्नति-रत रहा करे
मेरी-भावना के रचयिता पंडित जुगलकिशोर ‘मुख्तार’ जी को उनके साहस, निडरता और धर्म-प्रचार के क्रांतिकारी कार्यों के कारण ‘युगवीर’ की उपाधि दी गई थी। उनका आह्वान है कि प्रत्येक व्यक्ति समाज, देश और धर्म की उन्नति में अपना सक्रिय और सकारात्मक योगदान देकर स्वयं अपने समय का ‘युगवीर’ बने।
हे भगवान! प्रत्येक जीव अपने हृदय से युगवीर बने। केवल नाम से नहीं, बल्कि अपने समय का श्रेष्ठ व्यक्ति बनकर जिए। उसके भीतर ऐसी मंगलकारी, पवित्र और कल्याणकारी भावनाएँ उत्पन्न हों, जिनकी प्रेरणा हमें मेरी भावना की इन पंक्तियों में मिलती है। यदि प्रत्येक बच्चा, प्रत्येक युवा, प्रत्येक व्यक्ति ऐसी ही पावन विचारधारा से युक्त हो जाए, यदि प्रत्येक हृदय में प्रेम, करुणा, मैत्री, त्याग, अहिंसा और देशहित की भावना भर जाए, तो देश की उन्नति को कोई रोक नहीं सकता। सभी नागरिक अपने हृदय से देश और समाज की प्रगति (देशोन्नति) के कार्यों में निरंतर लगे रहें।
वस्तु-स्वरूप विचार, खुशी से सब दुख-संकट सहा करे
जीवन में आने वाले दुखों और संकटों से घबराने के बजाय, व्यक्ति को ‘वस्तु-स्वरूप’ (संसार की अनित्यता और कर्म-सिद्धांत) पर विचार करना चाहिए। जब हम यह समझ लेते हैं कि सुख-दुख जीवन के स्वाभाविक अंग हैं, तो हम कठिन से कठिन परिस्थिति और संकट को भी सहर्ष तथा समता-भाव से सहन कर पाते हैं।
प्रत्येक जीव को अपने-अपने कर्मों के अनुसार ही सुख या दुख प्राप्त होता है। जब व्यक्ति संसार और पदार्थों के वास्तविक स्वरूप (अनित्यता और कर्म-सिद्धांत) को समझ लेता है, तो वह जीवन में आने वाले किसी भी दुख या संकट से घबराता नहीं है, बल्कि सहर्ष और समता-भाव से उसका सामना करता है।
वस्तु के स्वरूप को समझो।
जो वस्तु जैसी है, उसका स्वरूप वैसा ही है। उसके स्वभाव और परिणमन को समझना ही वस्तु-स्वरूप का विचार करना है।
जैसे अग्नि का स्वभाव जलाना है। अब अग्नि खंडवा की हो या मंडवा की, फरीदाबाद की हो या पुणे की, बेंगलुरु की हो या अमेरिका की—यदि वह वास्तव में अग्नि है, तो उसका स्वभाव जलाना ही होगा।
मान लीजिए कोई कहे—
“हमारे खंडवा में ऐसी अग्नि है जिसमें हाथ डालने पर हाथ नहीं जलता।”
तो भैया, ऐसी अग्नि को हाथ लगाकर देख लो! अग्नि चाहे कहीं की भी हो, अग्नि का स्वभाव जलाना ही है।
यही है वस्तु का स्वरूप। स्थान बदलने से वस्तु का स्वभाव नहीं बदलता।
इसी प्रकार हमें जीवन की प्रत्येक वस्तु और प्रत्येक परिस्थिति के स्वरूप को समझना चाहिए। हमें विचार करना चाहिए कि जो वस्तु जैसी है, वह वैसी ही क्यों परिणमित हो रही है।
और यही विचार हमें जीवन के दुख-संकटों को समझने और सहन करने की शक्ति देता है।
उदाहरण के लिए—जो जन्मा है, वह नियम से मरेगा। यह कोई निराशावादी विचार नहीं है, बल्कि वस्तु-स्वरूप का विचार है।
जो जीव एक पर्याय को प्राप्त हुआ है, उस पर्याय का छूटना भी निश्चित है। जन्म हुआ है तो मरण होगा। जो आया है, वह जाएगा। जो उत्पन्न हुआ है, उसका विनाश होगा। यहाँ कोई भी पर्याय शाश्वत नहीं है।
जो वास्तव में अजर-अमर है, वह हमारी यह देह या वर्तमान पर्याय नहीं, बल्कि आत्मा का शुद्ध स्वरूप है। और आत्मा का अंतिम लक्ष्य इस संसार में बार-बार जन्म लेते रहना नहीं, बल्कि सिद्धालय की ओर बढ़ना है—इस भवसागर से पार होना है।
वस्तु-स्वरूप’ और कर्म का सिद्धांत
संसार में हर व्यक्ति के जीवन में कुछ न कुछ कमी अवश्य रहती है। किसी के पास धन है तो स्वास्थ्य नहीं, किसी के पास सुविधाएँ हैं तो शांति नहीं। यह भिन्नता और अपूर्णता ही संसार का ‘वस्तु-स्वरूप’ है।
- पूर्व जन्मों के कर्मफल: हमारे जीवन में मिलने वाले सुख-दुख, अनुकूल परिस्थितियाँ या अकारण कष्ट देने वाले लोग—यह सब हमारे ही पूर्व जन्मों के कर्मों का फल होता है।
- अकारण कुछ भी नहीं: संसार में बिना किसी कारण के कुछ भी घटित नहीं होता। यदि कोई व्यक्ति बिना किसी वजह के भी हमें मानसिक या व्यावहारिक रूप से परेशान करता है, तो वह भी हमारे ही किसी पुरातन कर्म का उदय है।
- समता भाव: जब हम यह समझ लेते हैं कि यह हमारे ही कर्मों का परिणाम है, तो हम दूसरों को दोष देना छोड़ देते हैं और आने वाले दुखों व संकटों को समता-भाव तथा धैर्यपूर्वक सहन करने की शक्ति प्राप्त करते हैं।
इसलिए जब जीवन में कोई दुख आता है, कोई संकट आता है, कोई वियोग होता है, कोई प्रतिकूल परिस्थिति आती है, तब हमें केवल यह नहीं कहना चाहिए कि—
“मेरे साथ ही ऐसा क्यों हुआ?”
बल्कि वस्तु-स्वरूप का विचार करना चाहिए—
“इस परिस्थिति का स्वरूप क्या है?
इसका कारण क्या है?
इसका परिणमन किस प्रकार होना स्वाभाविक है?”
जब यह समझ विकसित होगी, तब दुख के प्रति हमारी दृष्टि बदल जाएगी। हम परिस्थिति को अधिक समता से स्वीकार कर पाएँगे और खुशी से अपने दुख और संकटों को सहन करने की शक्ति हमारे भीतर उत्पन्न होगी। और यही शक्ति धीरे-धीरे हमें आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ाएगी।
‘मेरी-भावना’ पाठ का वास्तविक फल तब मिलेगा जब हम:
- परस्पर प्रेम और मैत्री: संसार के समस्त जीवों के प्रति वात्सल्य और निष्काम प्रेम भाव रखें।Cultivate affection, compassion, and selfless love toward all living beings in the world.
- वाणी और आचरण का संयम: कटु शब्दों और असंयमित जीवनशैली का त्याग करें।Refrain from harsh words and practice a disciplined and balanced way of life.
- नीति और न्याय Ethics and Justice : शासन और समाज में धर्मनिष्ठता तथा न्यायप्रियता का समर्थन करें।
- समता और धर्म-दृढ़ता: कर्म-सिद्धांत (वस्तु-स्वरूप) को समझकर सुख और दुख दोनों परिस्थितियों में समता-भाव धारण करें। Understand the law of karma and the true nature of things, and maintain equanimity in both happiness and adversity.
इन्हीं पावन भावनाओं को अपने हृदय में धारण करने से ही हमारा और संपूर्ण विश्व का कल्याण संभव है।
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