मेरी भावना – छंद 3: व्याख्या और अर्थ
रहे सदा सत्संग उन्हीं का ध्यान उन्हीं का नित्य रहे, उन ही जैसी चर्या में यह चित्त सदा अनुरक्त रहे ।
नहीं सताऊँ किसी जीव को, झूठ कभी नहीं कहा करूं,पर-धन-वनिता पर न लुभाऊं, संतोषामृत पिया करूं ॥3॥
“रहे सदा सत्संग उन्हीं का, ध्यान उन्हीं का नित्य रहे”
मेरी भावना के तृतीय छंद में पंडित श्री जुगलकिशोर जी केवल गुरुओं की वंदना करने की प्रेरणा नहीं देते, बल्कि उनके समान बनने की भावना जगाते हैं। वे बताते हैं कि सच्ची श्रद्धा केवल प्रणाम करने में नहीं, बल्कि उनके आदर्शों को अपने जीवन में उतारने के निरंतर प्रयास में है। हर व्यक्ति की सामर्थ्य अलग-अलग होती है। कोई महाव्रत धारण कर सकता है, कोई छोटे-छोटे नियम निभा सकता है। परंतु यदि अभी हम उनके समान आचरण नहीं कर पा रहे हैं, तो भी कम से कम उनके प्रति अटूट श्रद्धा अवश्य रखें। बिना श्रद्धा के आत्मकल्याण का मार्ग कभी प्रशस्त नहीं होता।
यह केवल संतों के पास बैठने की बात नहीं है, बल्कि ऐसे ज्ञानी, वीतराग और आत्मकल्याण के पथ पर अग्रसर महापुरुषों की संगति में रहने की भावना है।
पिछले छंदों में जिन दिगंबर मुनियों का वर्णन किया गया, वे—
- विषय-वासना से रहित हैं।
- समता रूपी धन को धारण किए हुए हैं।
- अपने और दूसरों के आत्महित में निरंतर लगे रहते हैं।
- स्वार्थ का पूर्ण त्याग कर कठिन साधना में जीवन व्यतीत करते हैं।
ऐसे ज्ञानी साधुओं का सत्संग ही जीवन की सबसे बड़ी संपत्ति है।
सत्संग का अर्थ केवल प्रवचन सुन लेना नहीं है। सत्संग वह है जहाँ आत्मा का कल्याण हो, जहाँ राग-द्वेष कम हों, जहाँ वैराग्य जागृत हो और जीवन की दिशा बदलने का संकल्प उत्पन्न हो।
गुरु के चरणों में जाकर क्या माँगें?
अक्सर लोग मुनिराजों के दर्शन तो कर लेते हैं, परंतु आत्मकल्याण की बात नहीं पूछते। जब भी किसी वीतराग साधु के चरणों में जाने का अवसर मिले, सबसे पहले यही प्रार्थना करनी चाहिए—
“हे गुरुदेव! हमारी आत्मा का कल्याण कैसे हो? हमें ऐसा मार्ग बताइए, ऐसा नियम या संकल्प दीजिए, जिससे हमारा जीवन आत्मोन्नति की दिशा में आगे बढ़ सके और यह भवसागर पार करने का साधन बन जाए।”
यही वास्तविक सत्संग है।
ध्यान उन्हीं का नित्य रहे
केवल कभी-कभी दर्शन कर लेना पर्याप्त नहीं है। “ध्यान उन्हीं का नित्य रहे” का अर्थ है कि हमारे जीवन, विचार और व्यवहार में सदैव गुरु के आदर्श उपस्थित रहें।
हर निर्णय के समय मन स्वयं से पूछे—
- क्या यह कार्य मेरे गुरुओं को स्वीकार होगा?
- क्या यह व्यवहार समता के अनुकूल है?
- क्या इसमें लोभ, क्रोध, मान या माया तो नहीं है?
यदि यह स्मरण निरंतर बना रहे, तो जीवन स्वतः परिवर्तित होने लगता है।
केवल उपासक नहीं, अनुयायी बनें
हम स्वयं को निर्ग्रन्थ गुरुओं का उपासक कहते हैं।
परंतु यदि हमारे भीतर लोभ, क्रोध, असमानता और स्वार्थ ही बना रहे, तो संसार यह न कह दे कि—
“जो समता के उपासक हैं, वही सबसे अधिक असमता में जी रहे हैं।”
गुरु की वास्तविक पूजा उनके गुणों को अपनाने में है, केवल उनकी वंदना करने में नहीं।
उन्हीं जैसी चर्या में यह चित्त सदा अनुरक्त रहे
यह केवल मुनियों की प्रशंसा करने की बात नहीं है, बल्कि उनके आचरण के प्रति गहरा अनुराग रखने की भावना है। प्रार्थना यह है कि मेरा मन सदैव उन्हीं जैसी चर्या में लगे, उनके समान बनने की प्रेरणा मेरे भीतर बार-बार जागे और मेरा जीवन उसी दिशा में आगे बढ़े।
चर्या क्या है?
यहाँ “चर्या” का अर्थ केवल बाहरी वेश या दिनचर्या नहीं है, बल्कि वह संपूर्ण जीवन-पद्धति है जो आत्मा को मोक्ष की ओर ले जाती है। वीतरागता, संयम, अहिंसा, समता, त्याग और आत्मचिंतन से युक्त जीवन ही वास्तविक चर्या है। यही जिनेन्द्र भगवान द्वारा प्रतिपादित मोक्षमार्ग है।
चर्या का अर्थ केवल बाहरी वेश नहीं है। चर्या अर्थात्—
- जीवन जीने की शैली, विचार,
- व्यवहार, संयम,
- तप,
- विनय,करुणा,
- अहिंसा,
- आत्म-साधना।
अनुरक्त
यहाँ “अनुरक्त“ का अर्थ प्रेमपूर्वक लीन हो जाना, उसी में डूब जाना, उसी में मन लग जाना। अनुरक्त होने का अर्थ केवल पसंद करना नहीं है, बल्कि किसी श्रेष्ठ आदर्श के प्रति इतना आकर्षित होना कि मन बार-बार उसी दिशा में जाने लगे | हमें विनम्रता से स्वीकार करना चाहिए— “हे प्रभु! हम अभी मुनि नहीं बन पाए। यह हमारे चारित्र मोहनीय कर्म का प्रबल उदय है। हमारी पात्रता अभी इतनी नहीं बन सकी कि हम पूर्ण संयम धारण कर सकें।”
किन्तु इस स्वीकार के साथ एक सत्य कभी नहीं भूलना चाहिए कि मार्ग यही है। मोक्ष का कोई दूसरा मार्ग नहीं है। आज तक किसी जीव ने संयम और चारित्र के बिना मुक्ति प्राप्त नहीं की और न भविष्य में कभी कर सकेगा।
दोष देखने से पहले स्वयं को परखें
अक्सर लोग साधुओं में दोष खोजने लगते हैं। कोई कहता है— “फलाँ मुनि ऐसे हैं, उनमें यह कमी है, वे वैसे नहीं हैं…”
मान लीजिए किसी साधु में कुछ मानवीय सीमाएँ दिखाई भी दें, तो क्या इससे संयम का आदर्श छोटा हो जाता है? यदि कोई कहे कि “ये सच्चे मुनि नहीं हैं”, तो पहले स्वयं से एक प्रश्न पूछना चाहिए—
क्या मैं एक दिन के लिए भी मुनि-मुद्रा धारण कर सकता हूँ?
यदि उत्तर “नहीं” है, तो आलोचना करने से पहले उस कठिन साधना की गंभीरता को समझना चाहिए। कल्पना कीजिए कि एक दिन के लिए भी सब कुछ छोड़कर दिगंबर मुनि का जीवन जीना पड़े। न घर, न परिवार, न धन, न सुविधा, न भोजन की इच्छा, न संग्रह, न सुरक्षा—केवल आत्मसाधना। तभी समझ में आएगा कि इस पंचम काल में भी जो मुनि इस मार्ग पर चल रहे हैं, वे कितनी महान तपस्या कर रहे हैं।
मुनि जीवन का आधार – पाँच महाव्रत
दिगंबर मुनि केवल वस्त्रों का त्याग नहीं करते, बल्कि वे पाँच महान व्रतों को पूर्ण रूप से धारण करते हैं—
- अहिंसा महाव्रत – किसी भी जीव को मन, वचन और काया से पीड़ा न पहुँचाना।
- सत्य महाव्रत – पूर्ण सत्य का पालन।
- अचौर्य महाव्रत – किसी भी प्रकार के परद्रव्य का ग्रहण न करना।
- ब्रह्मचर्य महाव्रत – संपूर्ण इन्द्रिय-विजय और विषयों से पूर्ण विरक्ति।
- अपरिग्रह महाव्रत – हर प्रकार के संग्रह और ममता का पूर्ण त्याग।
ये केवल नियम नहीं हैं; ये आत्मा को कर्मबंधन से मुक्त करने वाले महान साधन हैं।
यदि महाव्रत नहीं धारण कर सकते, तो श्रद्धा तो रखें
हममें से अधिकांश लोग स्वीकार करते हैं कि—
“मैं अभी इन पाँच महाव्रतों को पूर्ण रूप से धारण करने की पात्रता नहीं रखता।”
यह स्वीकार करना कमजोरी नहीं, बल्कि आत्मसत्य है। किन्तु यदि हम स्वयं इस ऊँचाई तक नहीं पहुँच पाए हैं, तो कम से कम उस आदर्श के प्रति श्रद्धा बनाए रखें। अपने जीवन में जितना संभव हो, उतना अणुव्रत, संयम, त्याग और सदाचार अपनाने का प्रयास करें। यही भावना इस पंक्ति का वास्तविक संदेश है— अर्थात् चाहे आज मैं उस अवस्था तक न पहुँच पाया हूँ, पर मेरा मन, मेरी श्रद्धा और मेरी दिशा सदैव उसी मोक्षमार्ग की ओर बनी रहे। यही सच्ची साधना की शुरुआत है।
जितनी शक्ति है उतना करो। यदि करने की शक्ति नहीं है तो कम से कम श्रद्धा तो रखो। श्रद्धा भी नहीं होगी, तो आगे बढ़ना कठिन होगा।
इसलिए तीन चरण हैं—
- पहले श्रद्धा,
- फिर अभ्यास,
- फिर आचरण।
नहीं सताऊँ किसी जीव को – गृहस्थ का अहिंसा व्रत
मुनि जीवन का आदर्श अत्यंत ऊँचा है। हम सब अभी उस अवस्था तक नहीं पहुँच पाए हैं। इसलिए प्रश्न उठता है—एक गृहस्थ अपने जीवन में कैसी भावना रखे? यही गृहस्थ के अहिंसा-व्रत का सार है। यदि हम केवल इतना संकल्प कर लें कि मेरे कारण कोई भी जीव दुःखी या परेशान न हो, तो यह अहिंसा की दिशा में बहुत बड़ा कदम होगा।
अहिंसा का वास्तविक अर्थ
अक्सर हम अहिंसा को केवल छोटे-छोटे जीवों की रक्षा तक सीमित कर देते हैं। चींटी को बचाना, पक्षियों को दाना डालना या गौसेवा करना निश्चय ही पुण्य का कार्य है।
किन्तु पंडित जी संकेत करते हैं कि सबसे कठिन अहिंसा अपने निकट रहने वाले लोगों के प्रति होती है।
- माता-पिता
- पति-पत्नी
- पुत्र-पुत्री
- भाई-बहन
- परिवार के सदस्य
- कर्मचारी, सहयोगी और सेवक
इनके साथ ऐसा व्यवहार करना कि वे हमारे कारण मानसिक पीड़ा न अनुभव करें—यही वास्तविक अहिंसा की परीक्षा है।
क्या हम किसी को सताते हैं?
कई बार हम सोचते हैं कि हमने किसी को मारा नहीं, इसलिए हम अहिंसक हैं। लेकिन क्या केवल शारीरिक हिंसा ही हिंसा है? यदि हमारे व्यवहार, वचन, हठ या अहंकार से किसी का मन बार-बार आहत होता है, तो वह भी एक प्रकार का सताना ही है। कभी-कभी हम ऐसा आचरण करते हैं जो हमारे अपने परिवार को भी स्वीकार नहीं होता। हम न उनकी भावनाओं को समझते हैं, न उनके साथ सामंजस्य बैठाते हैं। परिणामस्वरूप घर में तनाव, कटुता और अशांति का वातावरण बन जाता है।
ऐसी स्थिति में अहिंसा का पहला अभ्यास यही है कि हम अपने व्यवहार से किसी को अनावश्यक कष्ट न दें।
गृहस्थ का धर्म – सामंजस्य
यदि कोई व्यक्ति पूर्ण वैराग्य लेकर मुनि बन जाता है, तो उसके लिए गृहस्थ जीवन के दायित्व समाप्त हो जाते हैं। किन्तु जब तक हम गृहस्थ हैं, तब तक परिवार के साथ प्रेम, सम्मान और सामंजस्यपूर्वक रहना ही हमारा धर्म है।
- माता-पिता की उचित आज्ञा का सम्मान करना।
- पति-पत्नी का एक-दूसरे के अनुरूप ढलना।
- परिवार में संवाद और सहयोग बनाए रखना।
यही गृहस्थ के अहिंसा-व्रत की व्यावहारिक अभिव्यक्ति है।
यदि दोनों केवल एक-दूसरे को बदलने का प्रयास करेंगे और स्वयं बदलने को तैयार नहीं होंगे, तो परिणाम केवल क्लेश, क्रोध और कषाय होगा।
“जियो और जीने दो” – अहिंसा का सरल सूत्र
अपने जीवन में कम से कम उन चार-पाँच लोगों के प्रति यह संकल्प अवश्य करें, जो प्रतिदिन हमारे साथ रहते हैं— “मेरे कारण इन्हें कोई कष्ट न हो और इनके कारण मेरे मन में भी द्वेष उत्पन्न न हो।” यही “जियो और जीने दो” की भावना है। यदि परिवार में इतना भी सामंजस्य आ जाए, तो गृहस्थ जीवन साधना का केंद्र बन सकता है।
झूठ कभी नहीं कहा करूँ – सत्य का वास्तविक स्वरूप
यहाँ केवल तथ्यात्मक झूठ न बोलने की बात नहीं कही गई है। इसका व्यापक अर्थ है— ऐसा कोई वचन मेरे मुख से न निकले जिससे किसी के हृदय को पीड़ा पहुँचे।
हममें से अधिकांश लोग बड़े-बड़े झूठ नहीं बोलते। लेकिन अनजाने में ऐसे कटु शब्द बोल देते हैं जो वर्षों तक किसी के मन में चुभते रहते हैं। इसलिए सत्य का अर्थ केवल सच बोलना नहीं, बल्कि हितकारी, मधुर और कल्याणकारी सत्य बोलना है।
कब मौन रहना अधिक उचित है?
कई बार परिस्थितियाँ ऐसी होती हैं जब बोलने की अपेक्षा मौन रहना अधिक हितकारी होता है।
विशेषकर जब—
- अत्यधिक क्रोध हो,
- लोभ या स्वार्थ मन पर हावी हो,
- भय या घबराहट हो,
- या अत्यधिक हँसी-मज़ाक का वातावरण हो।
ऐसे समय में कहा गया एक शब्द भी किसी के हृदय को गहरी चोट पहुँचा सकता है। इसलिए संयमित वाणी भी सत्य-व्रत का महत्वपूर्ण अंग है।
आज के समय का “झूठ”
आज संचार के साधन बदल गए हैं। सोशल मीडिया, व्हाट्सऐप, स्टेटस और रील्स हमारे जीवन का हिस्सा बन चुके हैं। कभी-कभी हम सीधे कुछ नहीं कहते, लेकिन किसी विशेष व्यक्ति को लक्ष्य बनाकर कोई स्टेटस, व्यंग्य या संकेतात्मक संदेश डाल देते हैं। बाहर से कुछ और दिखाना और भीतर कुछ और रखना—यह भी एक प्रकार की असत्यता है। यदि हमारे शब्द, संदेश या पोस्ट किसी के मन में तनाव, अपमान या पीड़ा उत्पन्न करें, तो हमें आत्मचिंतन करना चाहिए।
परधन पर न लुभाऊँ – अचौर्य का वास्तविक अर्थ
अर्थात् दूसरे के धन, संपत्ति या अधिकार के प्रति मेरे मन में लोभ उत्पन्न न हो। यह केवल चोरी न करने की शिक्षा नहीं है। वास्तविक चोरी पहले मन में होती है। जब दूसरे का धन, बंगला, गाड़ी या संपत्ति देखकर हमारा चित्त उसी में अटक जाता है, तब भीतर लोभ जन्म लेता है। यही आगे चलकर अनेक पापों का कारण बनता है।
इसलिए पंडित जी कहते हैं—
अपने पुरुषार्थ से जितना कमाना हो, उतना कमाओ; पर कभी भी दूसरे के एक पैसे पर भी अपनी नीयत खराब मत होने दो।
सबसे पहले परीक्षा अपने ही घर में होती है
अचौर्य-व्रत की परीक्षा किसी अजनबी के धन से पहले अपने ही परिवार में होती है।
- पिता की संपत्ति,
- भाई का अधिकार,
- रिश्तेदारों की वस्तुएँ,
- मित्र का विश्वास—
इन सबके प्रति भी मन में अन्यायपूर्ण अधिकार का भाव न आए। आज अधिकांश चोरियाँ डकैती से नहीं होतीं; वे छल, कपट, कागज़ी हेरफेर, विश्वासघात और अनुचित लाभ के माध्यम से होती हैं। जैन धर्म केवल बाहरी चोरी से नहीं, बल्कि चित्त की चोरी से भी बचने की प्रेरणा देता है।
धन कमाना दोष नहीं, लोभ दोष है
धन कमाना पाप नहीं है। यदि पुरुषार्थ, ईमानदारी और धर्मपूर्वक कमाया गया धन है, तो वह समाज और परिवार के कल्याण का साधन बन सकता है। दोष तब उत्पन्न होता है जब हमारा मन दूसरों की संपत्ति पर अधिकार जमाने लगे। इसलिए संकल्प यही होना चाहिए—
“हे प्रभु! मुझे इतनी सामर्थ्य दें कि मैं अपने पुरुषार्थ से भरपूर कमाऊँ, पर कभी किसी दूसरे की संपत्ति पर लोभ न करूँ।”
पर वनिता पर न लुभाऊँ – ब्रह्मचर्य का व्यावहारिक स्वरूप
यहाँ “वनिता” का अर्थ है पत्नी या स्त्री। अतः पुरुष के लिए भावना है कि वह किसी अन्य की पत्नी या स्त्री के प्रति आकर्षित न हो, और स्त्री के लिए यही भावना है कि वह किसी अन्य पुरुष के प्रति आसक्त न हो।
यह विषय आज भले ही संकोच का कारण बन गया हो, परंतु आध्यात्मिक दृष्टि से यह अत्यंत महत्वपूर्ण है। जिन विषयों पर चर्चा करने में समाज लज्जा अनुभव करता है, वही विषय अनेक पारिवारिक और सामाजिक संकटों का कारण बन जाते हैं।
आकर्षण का युग और मन की सजगता
आज आकर्षण केवल प्रत्यक्ष मिलने-जुलने तक सीमित नहीं रह गया है। मोबाइल, टेलीविजन, सोशल मीडिया, व्हाट्सऐप, फेसबुक, इंस्टाग्राम और अन्य डिजिटल माध्यमों के द्वारा हम प्रतिदिन अनगिनत लोगों के जीवन, रहन-सहन, पहनावे, घूमने-फिरने और जीवनशैली को देखते रहते हैं। धीरे-धीरे हमारा चित्त उन्हीं की ओर आकर्षित होने लगता है। हम सोचने लगते हैं—
- “उसके जैसा जीवन मुझे भी चाहिए।”
- “वह जहाँ घूमने गया, मैं क्यों नहीं गया?”
- “उसके पास जो है, मेरे पास क्यों नहीं है?”
यहीं से तुलना, आकर्षण और असंतोष जन्म लेते हैं। आज अनेक घरों में कलह और अशांति का एक बड़ा कारण यही निरंतर तुलना है। इसलिए इस पंक्ति का अर्थ केवल पर-स्त्री या पर-पुरुष से बचना नहीं, बल्कि हर प्रकार के अनुचित आकर्षण से अपने मन की रक्षा करना है।
आकर्षण स्वाभाविक है, पर दिशा हमारी जिम्मेदारी है
किशोरावस्था और युवावस्था में शरीर में स्वाभाविक परिवर्तन होते हैं। लगभग 14 से 24 वर्ष की आयु के बीच विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण उत्पन्न होना एक सामान्य जैविक प्रक्रिया है।
धर्म इस स्वाभाविक आकर्षण का निषेध नहीं करता, बल्कि उसके सही दिशा-निर्देशन की शिक्षा देता है।
आकर्षण को दबाया नहीं जा सकता, लेकिन उसे सही दिशा दी जा सकती है—
- अच्छे विचारों द्वारा,
- श्रेष्ठ साहित्य के अध्ययन द्वारा,
- स्वाध्याय द्वारा,
- संस्कारों द्वारा,
- आत्मानुशासन और आध्यात्मिक प्रेरणा द्वारा।
जब मन को ऊँचा लक्ष्य मिल जाता है, तो वही ऊर्जा व्यक्तित्व निर्माण का आधार बन जाती है।
डिजिटल युग में ब्रह्मचर्य की नई चुनौती
आज का समय केवल बाहरी प्रलोभनों का नहीं, बल्कि डिजिटल प्रलोभनों का भी है। एक क्षण की असावधानी—
- एक फोटो,
- एक वीडियो,
- एक चैट,
- एक निजी संदेश,
- या एक अनुचित साझा किया गया चित्र,
पूरे जीवन को कठिनाई में डाल सकता है। डिजिटल माध्यमों पर साझा की गई सामग्री कई बार स्थायी रिकॉर्ड का रूप ले लेती है। इसलिए आज पहले से कहीं अधिक सजग रहने की आवश्यकता है।
विशेष रूप से किशोरों और युवाओं को यह समझाना आवश्यक है कि—
- किसी भी व्यक्ति के साथ अनुचित परिस्थितियों में अकेले रहने से बचें।
- किसी भी निजी फोटो या वीडियो को साझा करने से पहले गंभीरता से सोचें।
- इंटरनेट पर क्या खोज रहे हैं, क्या देख रहे हैं और क्या साझा कर रहे हैं—इसके प्रति सजग रहें।
डिजिटल दुनिया सुविधा भी है और जिम्मेदारी भी।
आत्मसंयम ही वास्तविक सुरक्षा है
बाहरी नियंत्रण से अधिक आवश्यक है आंतरिक संयम। जो व्यक्ति अपने मन को नियंत्रित कर लेता है, उसे बाहरी प्रलोभन डिगा नहीं सकते।
इसलिए मेरी भावना केवल निषेध नहीं है, बल्कि आत्मरक्षा का सूत्र है — “हे प्रभु! मेरे भीतर इतनी शालीनता, मर्यादा और आत्मसंयम उत्पन्न हो कि किसी भी प्रकार का अनुचित आकर्षण मेरे चित्त को विचलित न कर सके।”
संतोष अमृत पिया करूँ – अपरिग्रह अणुव्रत
यह केवल एक पंक्ति नहीं, बल्कि संपूर्ण जीवन को तनावमुक्त, आनंदमय और शांत बनाने का सूत्र है। पंडित जुगलकिशोर जी ‘मुख्तार’ इस भावना के माध्यम से हमें बताते हैं कि बाहरी उपलब्धियों से अधिक महत्वपूर्ण है भीतर का संतोष।
संतोष क्या है?
संतोष का अर्थ आलस्य या पुरुषार्थ छोड़ देना नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ है— “जो प्राप्त है, वह पर्याप्त है।”
यह भावना हमें वर्तमान में जीना सिखाती है। इसका अर्थ यह नहीं कि हम प्रगति न करें, बल्कि यह कि प्रगति करते हुए भी मन में अभाव, ईर्ष्या और तुलना का विष न आने दें।
प्रतिदिन सुबह यदि हम अपने आप से कहें—
“मैं स्वयं में परिपूर्ण हूँ। ईश्वर ने मुझे जो दिया है, उसके लिए मैं कृतज्ञ हूँ।”
तो यह भावना धीरे-धीरे हमारे मन को स्थिर और शांत बना देती है।
तुलना ही अशांति का कारण है
आज अधिकांश लोगों का दुःख उनकी अपनी कमी से नहीं, बल्कि दूसरों की उपलब्धियों से उत्पन्न होता है। कोई नई गाड़ी खरीदता है, कोई विदेश यात्रा पर जाता है, कोई नई उपलब्धि प्राप्त करता है और उसे सोशल मीडिया पर साझा करता है। उसे देखकर अनेक लोगों के मन में अनायास ही तुलना प्रारम्भ हो जाती है।
विचार आता है—
- “उसके पास इतना है, मेरे पास क्यों नहीं?”
- “वह इतना आगे कैसे निकल गया?”
- “मैं उससे पीछे क्यों रह गया?”
यही तुलना धीरे-धीरे ईर्ष्या, असंतोष और मानसिक तनाव का कारण बन जाती है।
इसलिए मेरी भावना हमें सिखाती है—
“न परधन पर लुभाऊँ, न पर-वैभव पर, न दूसरों की सुविधाओं पर; बल्कि जो मेरे पास है, उसी में आनंद अनुभव करूँ।”
सोशल मीडिया और असंतोष
आज सोशल मीडिया का सबसे बड़ा प्रभाव यह है कि वह हमें निरंतर दूसरों के जीवन से तुलना करने के लिए प्रेरित करता है। किसी का यात्रा-वृत्तांत, किसी की सफलता, किसी का नया घर, किसी की नई गाड़ी या किसी का उत्सव—यदि हमारा मन परिपक्व न हो, तो यह सब प्रेरणा देने के स्थान पर असंतोष का कारण बन सकता है।
इसका अर्थ यह नहीं कि सोशल मीडिया का उपयोग ही न किया जाए, बल्कि यह कि उसका उपयोग विवेकपूर्वक किया जाए और तुलना का माध्यम न बनने दिया जाए।
यदि किसी की सफलता देखकर प्रेरणा मिले, तो वह उपयोगी है; यदि ईर्ष्या और हीनभावना उत्पन्न हो, तो उससे दूरी बनाना ही हितकर है।
संतोष – मानसिक शांति का अमृत
यदि मन में शांति चाहिए, तो प्रतिदिन स्वयं को यह स्मरण कराएँ—
“मेरे पास जो है, वही मेरे लिए पर्याप्त है। मैं अपने पुरुषार्थ से आगे बढ़ूँगा, लेकिन तुलना नहीं करूँगा।”
संतोष का अर्थ यह नहीं कि हम प्रयास करना छोड़ दें, बल्कि यह कि प्रयास के साथ मन की शांति भी बनी रहे।
यह उपदेश केवल जैनों के लिए नहीं
मेरी भावना की विशेषता यह है कि इसमें वर्णित सिद्धांत किसी एक धर्म, समाज या समुदाय तक सीमित नहीं हैं।
ये सार्वभौमिक जीवन-मूल्य हैं—
- किसी को कष्ट न देना।
- सत्य और हितकारी वाणी बोलना।
- दूसरे के धन और संबंधों पर लोभ न करना।
- संतोषपूर्वक जीवन जीना।
जो भी व्यक्ति इन सिद्धांतों को अपनाएगा, उसका जीवन अधिक शांत, संतुलित और सार्थक बनेगा।
अपने व्यक्तित्व को इतना ऊँचा बनाइए
आज लोग अपने “स्टेटस” को ऊँचा दिखाने में लगे हैं, जबकि मेरी भावना हमें अपना चरित्र ऊँचा बनाने की प्रेरणा देती है। यदि हम दूसरों के जीवन को देखने में कम और अपने जीवन को सँवारने में अधिक समय दें, तो एक दिन स्थिति ऐसी होगी कि—
लोग आपके स्टेटस को नहीं, बल्कि आपके व्यक्तित्व को अपना आदर्श बनाएँगे।
सच्ची प्रतिष्ठा दिखावे से नहीं, बल्कि चरित्र से प्राप्त होती है।
कठिन शब्दों का सरल अर्थ
इस छंद में आए कुछ महत्वपूर्ण शब्दों को समझना भी आवश्यक है—
- सत्संग – सत्य, सदाचार और आत्मकल्याण की दिशा में ले जाने वाली संगति।
- अनुरक्त – किसी श्रेष्ठ आदर्श में प्रेमपूर्वक लीन हो जाना।
- चित्त – मन, अंतःकरण या भाव-जगत।
- परधन – दूसरे व्यक्ति का धन या संपत्ति।
- परवनिता – दूसरे की पत्नी अथवा दूसरे के जीवनसाथी के प्रति अनुचित आकर्षण।
- संतोष – “जो प्राप्त है, वही पर्याप्त है” की कृतज्ञ भावना।
मेरी भावना का यह तृतीय छंद केवल कुछ नैतिक उपदेशों का संग्रह नहीं है, बल्कि जीवन को भीतर से बदलने का साधना-पथ है।
इस छंद की प्रथम दौ पंक्तियों में आध्यात्मिक प्रगति का पूरा क्रम समाया है—
- सत्संग — श्रेष्ठ व्यक्तियों की संगति करो।
- ध्यान — उनके गुणों का निरंतर स्मरण करो।
- चर्या — धीरे-धीरे उन्हीं के समान जीवन जीने का प्रयास करो।
अंतिम दौ पंक्तियों में गृहस्थ जीवन के पाँच अणुव्रत समाहित हैं
- अहिंसा – किसी भी जीव को कष्ट न देना।
- सत्य – ऐसी वाणी बोलना जिससे किसी का हृदय न दुखे।
- अचौर्य – दूसरे के धन, सम्पत्ति और संबंधों पर कभी बुरी दृष्टि न रखना।
- ब्रह्मचर्य – दूसरे के स्त्री और संबंधों पर कभी बुरी दृष्टि न रखना।
- अपरिग्रह– अपने पुरुषार्थ पर विश्वास रखते हुए जो प्राप्त है उसमें प्रसन्न रहना।
इसीलिए इन भावनाओं का अभ्यास कुछ दिनों या कुछ महीनों के लिए नहीं, बल्कि जब तक आत्मा अपने परम लक्ष्य—भगवत्पद—को प्राप्त न कर ले, तब तक निरंतर करते रहना चाहिए। यही मेरी भावना का सार है।
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