आलोचना पाठ – छंद 1 से 4 : अर्थ एवं व्याख्या
छंद 1
वंदो पांचो परम – गुरु, चौबिसों जिनराज
करूँ शुद्ध आलोचना, शुद्धि करन के काज ॥१॥
शब्दार्थ
- वंदो — मैं वंदना करता हूँ, नमस्कार करता हूँ।
- पांचो परम-गुरु — पाँच परम गुरु; जैन परंपरा के पंच परमेष्ठी।
- चौबिसों जिनराज — चौबीसों तीर्थंकर भगवान।
- शुद्ध आलोचना — अपने किए हुए दोषों और अपराधों की निष्कपट स्वीकारोक्ति।
- शुद्धि करन के काज — आत्मशुद्धि करने के उद्देश्य से।
मैं पंच परमेष्ठी (पाँचों परम गुरुओं) को प्रणाम करता हूँ तथा चौबीस तीर्थंकरों (जिनराजों) की भावभीनी वंदना करता हूँ। अपने आत्मा की निर्मलता और शुद्धि के निमित्त मैं यहाँ यह ‘शुद्ध आलोचना पाठ’ प्रस्तुत करता हूँ। जिस प्रकार शरीर या वस्त्र की सफाई के लिए जल की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार आत्मा की निर्मलता के लिए आलोचना पाठ रूपी क्षमा-भाव अनिवार्य है।
शुद्धिकरण करने के लिए कि अपने भाव शुद्ध हो जाएँ, परिणाम शुद्ध हो जाएँ, परिणामों में पवित्रता आ जाए, अपना जीवन पवित्र हो जाए, इस प्रकार की शुद्धि करने के लिए मैं अपने ही परिणामों की आलोचना करता हूँ। और ‘शुद्ध आलोचना’—इसमें कोई पक्षपात नहीं होगा, कोई पार्शियलिटी नहीं होगी। जो एक्चुअल (Actual) में जो हमने पाप किए हैं, जो मैंने पाप किए हैं, उनकी मैं आलोचना करता हूँ और वे सारे पाप नष्ट हो जाएँ, ऐसी भावना भाता हुआ अब क्रम से एक-एक छंद की ओर बढ़ते हैं।
छंद 2
सुनिए जिन अरज हमारी, हम दोष किये अति भारी
तिनकी अब निवृति काजा, तुम शरण लही जिनराजा ॥२॥
शब्दार्थ
- सुनिए — कृपापूर्वक सुनिए।
- जिन — हे जिनेंद्र भगवान!
- अरज — विनती, प्रार्थना।
- हम — मैंने/हमने।
- दोष — अपराध, पाप, अशुभ कर्म।
- अति भारी — बहुत अधिक, गंभीर।
- तिनकी — उन दोषों की।
- अब — अब आगे।
- निवृति — दूर करना, त्याग करना, पुनः न करना।
- काजा — कार्य/उद्देश्य से।
- शरण लही — शरण ग्रहण की है।
- जिनराजा — हे जिनराज, जिनेंद्र भगवान!
हे जिनेंद्र देव! मेरी प्रार्थना सुनिए। हमने तो अनादि काल से बहुत पाप और अपराध किए हैं। अब उन समस्त दोषों व दुखों को दूर करने के लिए मैंने केवल आपकी ही शरण ग्रहण की है।
सुनिए जिन अरज हमारी”—सुनिए माने सुनो। कौन सुने? जिन माने हे जिनेंद्र परमात्मा! क्या सुनो? “अरज हमारी”—मेरी अरज सुनो, अरज मतलब मेरी अर्जी सुनो, मेरी बात सुनो। इंग्लिश में जिसे एप्लीकेशन (Application) भी कहते हैं, एप्लीकेशन लगाते हैं, तो वहाँ अरज ही तो लगाते हैं। तो ऐसे यहाँ पर “सुनिए जिन अरज हमारी”—हे जिनेंद्र परमात्मा, मेरी अरज सुनो, विनती सुन लो।
क्या सुनो? “हम दोष किए अति भारी”—हम मतलब मैंने, दोष किए, दोष लगाए हैं जीवन में। कितने? अति भारी! बहुत सारे दोष लगाए हैं। दोष तो लगाए हैं, अब कौन-कौन से दोष हैं, उनकी चर्चा क्रम से करेंगे। लेकिन कहते हैं—“तिनकी अब निरवृत्ति काजे”—उनकी निर्वृत्ति के लिए, अब उनकी, माने अभी निर्वृत्ति के काज माने करने के लिए, उनकी निर्वृत्ति करने के लिए, “तुम शरण लही जिनराजे”—उनको निर्वृत्ति माने दूर करने के लिए तुम्हारी शरण मैंने ‘लही’ माने प्राप्त की है जिनराजे, माने हे जिनराज, हे जिनेंद्र परमात्मा! उन दोषों को दूर करने के लिए मैं आपकी शरण में आया हूँ, अब मेरे दोषों को दूर करो—ऐसी भावना भा रहे हैं।
यहाँ कोई सांसारिक वस्तु माँगने की प्रार्थना नहीं है। यह अपने आंतरिक दोषों की स्वीकारोक्ति है। यह विनय-भाव आलोचना की पहली आवश्यकता है। जब तक व्यक्ति अपने दोषों को स्वीकार करने के लिए भीतर से तैयार नहीं होता, तब तक वास्तविक आत्मशुद्धि कठिन है।अर्थात् मैंने बहुत गंभीर और अनेक प्रकार के दोष किए हैं। यहाँ अहंकार का त्याग दिखाई देता है। व्यक्ति सामान्यतः अपनी गलतियों को उचित ठहराने का प्रयास करता है—
- मजबूरी थी।
- परिस्थिति ऐसी थी,
- दूसरों ने ऐसा किया,
- मुझे पता नहीं था,
कवि केवल अपने दोषों को स्वीकार करके रुक नहीं जाता। वह कहता है कि अब उन दोषों की निवृत्ति करनी है। निवृत्ति के दो स्तर समझे जा सकते हैं—
वर्तमान दोषों से निवृत्ति जो गलत आचरण चल रहा है, उसे रोकना।
भविष्य में पुनरावृत्ति से बचना जिन दोषों को छोड़ने का संकल्प लिया है, उन्हें फिर से न करना।
छंद 3
इक बे ते चउ इंद्री वा, मनरहित सहित जे जीवा
तिनकी नहि करुणा धारी, निरदई हो घात विचारी ॥३॥
शब्दार्थ
- इक बे ते चउ इंद्री — एक, दो, तीन और चार इंद्रियों वाले जीव।
- मनरहित सहित — मन रहित तथा मन सहित जीव।
- जीवा — जीवों के प्रति।
- करुणा — दया, अनुकंपा।
- निरदई — निर्दयी होकर।
- घात विचारी — उनके घात/विनाश का विचार करना।
कितने प्रकार के जीव हो गए? एकेंद्रिय जीव, ‘बे’ माने दोइंद्रिय जीव, ‘ते’ माने तीनेंद्रिय जीव, ‘चौ’ माने चारइंद्रिय जीव, और मन रहित माने असंज्ञी पंचेंद्रिय जीव, मन सहित माने संज्ञी पंचेंद्रिय जीव—जे जीवा जो जीव हैं, “तिनकी नहिं करुणा धारी”—उन एक से लेके पंचेंद्रिय जीवों की हमने करुणा नहीं धारी, माने उन पर हमने दया नहीं की। “निरदयी ह्वै घात विचारी”—और निर्दयी ह्वै, माने निर्दयी होकर, क्रूर होकर, उनके घात का विचार किया, माने उनको मारने का भाव किया। कैसे किया? अनेक-अनेक प्रकार से किया। मैंने एक से लेकर चार इंद्रियों वाले तथा मनरहित और मन सहित जीवों के प्रति करुणा का भाव नहीं रखा। मैंने निर्दय होकर उनके घात अर्थात् हिंसा या विनाश के बारे में विचार किया और उस दिशा में प्रवृत्त हुआ।
जैन दर्शन में प्रत्येक जीव में आत्मा का अस्तित्व माना गया है। जीवों में इंद्रियों की संख्या भिन्न हो सकती है, लेकिन प्रत्येक जीव अपने अस्तित्व और सुख की इच्छा रखता है। इसलिए किसी जीव को छोटा या महत्वहीन समझकर उसके प्रति हिंसा करना उचित नहीं है।
आलोचना में यह स्वीकार कर रहे हैं कि उन्होंने केवल प्रत्यक्ष रूप से किसी जीव को कष्ट पहुँचाने की ही नहीं, बल्कि करुणा के अभाव और हिंसा के विचार की भी आलोचना की है। इससे यह महत्वपूर्ण बात सामने आती है कि हिंसा केवल शरीर से किया गया कार्य नहीं है; मन में किसी जीव के घात का विचार उत्पन्न होना भी दोषपूर्ण प्रवृत्ति का कारण बन सकता है। एकेंद्रिय आदि जीवों को कैसे हमने मारा, इसमें पूरा बताया भी गया है। तो अपन क्रम से इसमें से ही पढ़ेंगे।
छंद 4
समरम्भ समारंभ आरम्भ, मन वच तन कीने प्रारम्भ
कृत कारित मोदन करिके, क्रोधादि चतुष्टय धरिके ॥४॥
शब्दार्थ
- समरम्भ — हिंसा आदि कार्य की मानसिक तैयारी या संकल्प।
- समारंभ — उस कार्य के लिए साधन जुटाना/प्रवृत्ति प्रारंभ करना।
- आरम्भ — वास्तविक रूप से उस कार्य को करना।
- मन वच तन — मन, वचन और शरीर।
- कृत — स्वयं किया हुआ।
- कारित — दूसरे से करवाया हुआ।
- मोदन — किए हुए कार्य का अनुमोदन/समर्थन।
- क्रोधादि चतुष्टय — क्रोध, मान, माया और लोभ—चार कषाय।
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| समरम्भ समारंभ आरम्भ | हिंसा के तीन चरण — संकल्प/विचार (समरम्भ), साधन जुटाना (समारंभ), वास्तविक क्रिया (आरम्भ) |
| मन वच तन कीने प्रारम्भ | मन, वचन, काया — तीनों योगों से किए |
| कृत कारित मोदन करिके | स्वयं किया, दूसरों से कराया, और करने वाले का अनुमोदन (समर्थन) किया |
| क्रोधादि चतुष्टय धरिके | क्रोध, मान, माया, लोभ — इन चार कषायों को धारण करके |
मैंने मन, वचन और काय की प्रवृत्तियों द्वारा जीवों के प्रति दया व करुणा का भाव धारण नहीं किया। निर्दयी होकर छोटे-छोटे जीवों का घात किया तथा तनिक भी उनके जीवन का विचार नहीं किया।
तत्वार्थ सूत्र (Tattvartha sutra) अध्याय 6 आद्यंसंरम्भ-समारम्भारम्भयोगकृत-कारितानुमत-कषायविशेषैस्त्रि स्त्रिस्त्रिश्चतुश्चैकशः!!८!!
जो पाप किए हैं, कितने प्रकार से पाप किए? पाप करने के कितने प्रकार? तो कहा:
- संरंभ (समरंभ): किसी भी काम को करने का मन में संकल्प होना, संकल्प मात्र कहलाता है संरंभ। मन में किसी पाप या हिंसा का विचार या चिंतन करना।
- समारंभ: उस काम को करने के लिए सामग्री को जुटाना, इकट्ठा करना, मटेरियल कलेक्ट (Collect) करना, वह है समारंभ।
- आरंभ: उस काम को शुरू कर देना, स्टार्ट (Start) कर देना, उसका नाम होता है आरंभ।
तो प्लानिंग संकल्प—संरंभ, उसके लिए मटेरियल का कलेक्शन—समारंभ, और काम को स्टार्ट कर देना—आरंभ। ये तीन हो गए।
फिर “मन बच तन कीने प्रारंभ”—और मन, वचन, काय से ही वह काम चालू किया। मन में सोचा, वचनों से बोला, और काय की क्रिया से (हाथ आदिक से) किया। तो यह मन से, वचन से, काय से (३ प्रकार)।
और कैसे करते हैं काम? “कृत कारित मोदन करके”—
- कृत: स्वयं करना।
- कारित: दूसरों से कराना।
- मोदन (अनुमोदन): किसी ने कोई काम किया हो, उसकी सराहना करना, प्रशंसा करना—’वाह-वाह! बहुत बढ़िया, वेल डन, बहुत अच्छा, शाबाश!’ ऐसा कहना वह है अनुमोदन।
ऐसा करके (३ प्रकार)।
और “क्रोधादि चतुष्टय धरके”—और क्रोधादि चतुष्टय माने चार कषाय: क्रोध, मान, माया, लोभ। इनको धरके (४ प्रकार)।
देखो, हम भी पाप करते हैं, तो कभी स्वयं प्लान करते हैं, उसके लिए मटेरियल इकट्ठा करते हैं। अब जैसे घर-गृहस्थी के काम भी हैं, तो इनमें क्या है? हम प्लानिंग करते हैं कि नहीं? झाड़ू भी लगाएंगे तो प्लानिंग होती है, उसके लिए फिर झाड़ू को उठाते हैं—समारंभ होता है, और झाड़ने लग जाते हैं—आरंभ हो जाता है। तीन काम हुए कि नहीं? झाड़ू भी लगाने में संरंभ, समारंभ, आरंभ। मन से होता है, वचनों से बोलते भी हैं कि झाड़ू लगा रहे हैं, और हाथ से ऐसी लगा भी देते हैं, तो यह काय से भी हो जाता है। कभी स्वयं भी लगाते हैं, दूसरे से भी लगवाते हैं (अपने परिवार के सदस्यों से अथवा बाई तो आती है सबके यहाँ, तो उससे लगवाते हैं), और किसी ने झाड़ू अच्छी लगा दी—’बहुत बढ़िया’, यह है अनुमोदन।
तो स्वयं ने लगाई—कृत, दूसरे से लगवाई—कारित, और किसी ने लगाई—अनुमोदना। और इसमें भी कभी काम क्रोध से भी होता है, कभी मान से, कभी माया से, कभी लोभ से। कभी झाड़ू गुस्से से भी लगाई जाती है, कभी अपनी प्रशंसा हो इसलिए भी झाड़ू लगाई जाती है मान से, कभी मायाचारी से भी, और कभी कोई पुरस्कार मिल जाएगा उस लोभ से भी। तो झाड़ू में ही सारी चीजें घट गईं! और तो और, जितने भी प्रकार के काम होते हैं अपने घर-गृहस्थी के अथवा कोई भी पाप, उन सब में ये सारी चीजें ऐसी घटित हो जाती हैं। और इनका परस्पर में गुणा करते हैं तो १०८ भेद बन जाते हैं। उनसे पाप किए जाते हैं, जीव करते हैं, हमने भी किए हैं; और हमें उनका परिहार करना है, इसके लिए हम अपने ही ऐसे खोटे परिणामों की आलोचना कर रहे हैं।
१०८ पाप-भेदों का गणित एवं माला का रहस्य
कर्मों के आस्रव (आगमन) के मुख्य १०८ भेद बनते हैं:
- ३ क्रियाएँ: समरंभ × समारंभ × आरंभ = 3
- ३ करण (माध्यम): कृत × कारित × अनुमोदना = 3 x 3 = 9
- ३ योग: मन × वचन × काय = 9 x3 = 27
- ४ कषाय: क्रोध × मान × माया × लोभ = 27×4 = 108
इन १०८ निमित्तों से जीव अनजाने या जाने में कर्मों का बंध करता है। इन्हीं १०८ प्रकार की भूलों और प्रवृत्तियों से क्षमा माँगने के लिए जैन परंपरा में १०८ मनकों (मोतियों) की माला का जाप किया जाता है, ताकि प्रत्येक संभव दोष का प्रक्षालन हो सके।