आलोचना पाठ – समापन पद : अर्थ एवं व्याख्या
दोष रहित जिनदेव जी, निज पद दीज्यो मोय
सब जीवन के सुख बढ़े, आनन्द मंगल होय ॥
शब्दार्थ
- दोष रहित — समस्त राग-द्वेष आदि दोषों से रहित।
- जिनदेव — वीतराग जिनेंद्र भगवान।
- निज पद — अपना शुद्ध आत्मस्वरूप/परमात्म-पद।
- मोय — मुझे।
- सब जीवन — सभी जीवों के।
- सुख बढ़े — सुख और कल्याण की वृद्धि हो।
- आनंद मंगल होय — सर्वत्र आनंद और मंगल हो।
‘दोष रहित जिनदेव जी’, हे जिनेंद्र भगवान! आप तो सभी दोषों से रहित हैं। ‘निज पद दीजे मोय’, आपके समान पद मुझे भी प्राप्त हो। हे समस्त दोषों से रहित जिनदेव! मुझे अपने समान शुद्ध आत्मस्वरूप अर्थात् निज पद की प्राप्ति का मार्ग प्राप्त हो। ‘सब जीवन के सुख बढ़े’, हे जिनेंद्र भगवान! मेरी तो यही प्रार्थना है कि सभी जीव सुखी हों। ‘आनंद मंगल होय’, सभी जन, सभी जीव जो हैं आनंदित हों, मंगल हो सबका। मैं तो यही कामना करता हूँ।साथ ही संसार के सभी जीवों का सुख बढ़े और सबके जीवन में आनंद तथा मंगल हो।
यहाँ “निज पद” का अर्थ किसी बाहरी स्थान या सांसारिक पद से नहीं है। यह आत्मा के शुद्ध, वीतराग और परमात्म स्वरूप की ओर संकेत करता है।
पहले ही कह चुके हैं— “इन्द्रादिक पद नहिं चाहूँ” अर्थात् उन्हें इंद्रपद या कोई सांसारिक उपलब्धि नहीं चाहिए। यहाँ उसी भावना का विस्तार है—वे अपने शुद्ध आत्मस्वरूप की प्राप्ति चाहते हैं।
लेकिन इस प्रार्थना की विशेषता यह है कि केवल अपने लिए मुक्ति या सुख नहीं माँगते। वे कहते हैं—
“सब जीवन के सुख बढ़े।”
अर्थात् मेरी आत्मिक उन्नति के साथ-साथ सभी जीव सुखी हों, सबका मंगल हो।
यह भावना जैन धर्म की मैत्री, करुणा और सर्वजीव कल्याण की व्यापक दृष्टि को व्यक्त करती है।
अनुभव माणिक पारखी, जौहरी आप जिनन्द
येही वर मोहि दीजिये, चरण शरण आनन्द ॥
शब्दार्थ
- अनुभव — आत्मानुभूति, आत्मस्वरूप का प्रत्यक्ष अनुभव।
- माणिक — बहुमूल्य रत्न।
- पारखी — रत्न की वास्तविक पहचान करने वाला।
- जौहरी — रत्न का विशेषज्ञ।
- जिनन्द — जिनेंद्र भगवान।
- येही वर — यही वरदान।
- चरण शरण — जिनेंद्र के उपदेश एवं आदर्श की शरण।
- आनन्द — आत्मिक सुख/परमानंद।
अनुभव’, हे भगवन्! आप तो अनुभवी हैं। माणिक यानी जो कीमती रत्न होता है, आप तो उसके पारखी हैं, आप अनुपम जौहरी हैं। हे जिनेंद्र! आप आत्मानुभव रूपी अमूल्य माणिक के सच्चे पारखी और जौहरी हैं। आपने तो आत्मा को परख लिया है, आप तो बहुत उत्कृष्ट पारखी हैं। तो हे जिनेंद्र भगवान! ‘ये ही वर मोहि दीजिए’, मुझे भी यही वर दीजिए—’चरण शरण आनंद’, कि आपकी चरण की शरण का मैं आनंद प्राप्त कर सकूँ, मुझे आपकी चरण रूपी शरण मिल जाए, बस उसी में मैं आनंद का अनुभव करूँ। मुझे यही वरदान दीजिए कि मैं आपकी चरण-शरण में रहकर उस आत्मानंद को प्राप्त कर सकूँ।
यहाँ बहुत सुंदर “जौहरी–माणिक” का रूपक प्रयोग किया है।
जिस प्रकार एक सामान्य व्यक्ति और एक अनुभवी जौहरी में अंतर होता है—जौहरी ही असली और बहुमूल्य रत्न की पहचान कर सकता है—उसी प्रकार आत्मानुभव रूपी माणिक की वास्तविक पहचान वही कर सकता है जिसने आत्मस्वरूप को जाना है।
इसलिए जिनेंद्र को कहते हैं—
“अनुभव माणिक पारखी, जौहरी आप जिनन्द।”
यहाँ जौहरी केवल बाहरी रत्नों का पारखी नहीं, बल्कि आत्मा के वास्तविक रत्न—आत्मानुभव—का पारखी है।
“येही वर मोहि दीजिये”
अंतिम इच्छा अत्यंत स्पष्ट है—
न धन चाहिए,
न पद चाहिए,
न इंद्रिय-विषय चाहिए,
न सांसारिक वैभव चाहिए।
केवल— जिनेंद्र की चरण-शरण + आत्मानुभव + आत्मिक आनंद।
यही हमारे लिए सबसे बड़ा वरदान है।
आलोचना-पाठ का संपूर्ण सार
आलोचना-पाठ में साधक अपने द्वारा जाने-अनजाने, मन-वचन-काय से तथा अनेक प्रकार से किए गए पापों और दोषों को स्वीकार करते हुए पंच परमेष्ठी और जिनेन्द्र भगवान की शरण में जाकर आत्मशुद्धि एवं पापों की निवृत्ति की भावना प्रकट करता है।
पाठ का मूल भाव इस प्रकार है—
- जिनेंद्र भगवान एवं पंच परमेष्ठी की वंदना करके साधक अपने अपराधों को स्वीकार करने की विनम्र शुरुआत करता है। वह मानता है कि भगवान सर्वज्ञ हैं और उसके मन, वचन तथा कर्म से किए गए सभी दोषों को जानते हैं।
- साधक अपने किए हुए भारी दोषों और पापों को छिपाए बिना स्वीकार करता है। वह समझता है कि अज्ञान, प्रमाद, कषाय, असंयम और विषयों के कारण उससे अनेक अनुचित कर्म हुए हैं।
- वह स्वीकार करता है कि उसने मन, वचन और शरीर से, स्वयं करके, दूसरों से करवाकर तथा दूसरों के किए कार्यों का अनुमोदन करके भी पाप किए हैं। इन पापों के अनेक भेद और 108 प्रकार से पाप करने की बात भी स्वीकार की जाती है।
- साधक अपने द्वारा किए गए हिंसा, असत्य, चोरी, कुशील, परिग्रह, क्रोध, मान, माया, लोभ तथा अन्य कषायों और दोषपूर्ण प्रवृत्तियों के लिए आत्मग्लानि व्यक्त करता है।
- वह केवल बाहरी कर्मों के लिए ही नहीं, बल्कि मन में उत्पन्न बुरे विचार, वचन में हुई अनुचित बातें और व्यवहार में हुई गलतियों के लिए भी क्षमा चाहता है। इस प्रकार आलोचना केवल कर्मों की सूची नहीं, बल्कि आत्मनिरीक्षण और आत्मस्वीकार की प्रक्रिया बन जाती है।
- साधक यह भावना करता है कि उसके द्वारा किए गए सभी पापों का प्रायश्चित्त हो, उनकी निवृत्ति हो और भविष्य में वह उन दोषों को दोबारा न करे। वह अपने भीतर संयम, सावधानी और सदाचार विकसित करने का संकल्प करता है।
- अंततः वह केवलज्ञान से सब कुछ जानने वाले जिनेन्द्र भगवान के समक्ष अपनी भूलों को स्वीकार कर उनकी शरण ग्रहण करता है। उसका उद्देश्य किसी बाहरी भय से मुक्ति पाना नहीं, बल्कि अपने आत्मस्वरूप की शुद्धि करना है।
एक वाक्य में सार
आलोचना-पाठ आत्मनिरीक्षण, अपने द्वारा किए गए ज्ञात-अज्ञात एवं मन-वचन-काय से किए गए अनेक प्रकार के पापों की निष्कपट स्वीकृति, उनके प्रति पश्चात्ताप, क्षमा-याचना, पापों की निवृत्ति और भविष्य में शुद्ध आचरण का संकल्प करने का आध्यात्मिक पाठ है।
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