आलोचना पाठ – छंद 14 व 15 : अर्थ एवं व्याख्या
निद्रावश शयन कराई, सुपने मधि दोष लगाई
फिर जागी विषय वन धायो, नाना विध विष फल खायो ॥14॥
शब्दार्थ
- निद्रावश — नींद के वश होकर।
- शयन — सोना।
- सुपने — स्वप्न में।
- दोष लगाई — दोषपूर्ण भाव उत्पन्न किए।
- जागी — जागने पर।
- विषय वन — इंद्रिय-विषयों का संसार।
- धायो — दौड़ा/प्रवृत्त हुआ।
- विष फल — विष के समान हानिकारक विषय।
- नाना विध — अनेक प्रकार के।
निद्रावश शयन कराई – निद्रा और स्वप्न के दोष
निद्रा के वश होकर शरीर को शयन कराया। सोचा कि सोते समय पापों से बच जाएँगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। सोते समय हम हमारी आत्मा को पतित करते हैं, क्योंकि क्या है, आत्मा का गुण क्या है? ज्ञान और दर्शन, जानना-देखना। और यदि हम सोते हैं, तो हम हमारी आत्मा की शक्ति को क्षीण करते हैं। निद्रा के वश होकर के सोए स्वप्न में भी अनेक प्रकार के दोष लगाए और पाप बांधे। यह पद मनुष्य की अवचेतन और जाग्रत दोनों अवस्थाओं की ओर संकेत करता है। दोष केवल जाग्रत अवस्था में ही नहीं रहे; स्वप्न में भी मन विभिन्न विषयों और वासनाओं में उलझता रहा। इसीलिए हमारे दर्शन में तो ऐसा कहा है कि दोपहर को नींद बिल्कुल भी नहीं लेनी चाहिए। दोपहर में जो नींद लेते हैं, वह बिल्कुल भी योग्य नहीं है; उससे तीव्र दर्शनावर्णीय कर्म का घोर बंध होता है। रात को कम से कम जल्दी सोकर जल्द से जल्द उठना चाहिए। ब्रह्म मुहूर्त में उठना चाहिए। मुनिराज तो मात्र अंतर्मुहूर्त की नींद लेते हैं।
जैसा जिसका संस्कार होता है, जैसी जिसकी परिणति होती है, उसी तरह के उसको सपने भी आते रहते हैं। जैसे कोई विद्यार्थी (स्टूडेंट) है, तो उसके सपने पढ़ाई से संबंधित आएंगे। कोई व्यापार कर रहा है या कोई गृहणी (हाउसवाइफ) है, तो उसको उस संबंधित सपने आएंगे।जिस वातावरण में जैसा जिसका संस्कार पड़ा हुआ है, उसी तरह से उसको सपने आते रहते हैं। अब क्या होता है कि जो सपने आते हैं, उस सपने में भी यह जीव राग करता है। वह जो राग होता है, उसका इसको बहुत दोष लगता है। किसी को विषय-भोगों की लोलुपता हो, तो उसको उसी संबंधित रात को सपने आते रहते हैं। स्वप्न में भी उसने राग किया, तो राग का उसको बहुत दोष लगता है। इसलिए हमें स्वप्न में हुए दोषों का भी प्रायश्चित लेना चाहिए। सुबह उठकर प्रतिदिन उसका प्रायश्चित लेना चाहिए।
फिर जागी विषय वन धायो – जागने के बाद विषयों की ओर दौड़
‘फिर जागी विषयवन धायो’, और जब मैं जागा, जागृत अवस्था में था, तो मैंने क्या करा? मैंने विषय-कषायों को भोगा। विषय-कषायों को खूब भोगा। जागने के बाद मन फिर से रूप, रस, गंध, स्पर्श और शब्द जैसे विषयों की ओर दौड़ पड़ता है। सुबह जागते ही पुनः पाँचों इंद्रियों के विषय-रूपी वन की ओर दौड़े और अनेक प्रकार के विष-रूपी फल (विषय-भोग) का भक्षण किया।
‘नाना विधि विषफल खायो‘, और इसी तरह से मैंने जो है बहुत सारा विषफल खाया, यानी कि अपनी आत्मा को बहुत तरीके से पतित किया।“विषय वन” एक सुंदर रूपक है। संसार के इंद्रिय-विषयों को कवि ऐसे वन के समान बताते हैं जिसमें अनेक प्रकार के आकर्षक फल हैं, लेकिन उनमें से अनेक “विष फल” के समान हैं—अर्थात् बाहर से आकर्षक, पर आत्मकल्याण की दृष्टि से हानिकारक। यहाँ “विष” का अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक इंद्रिय-विषय अपने आप में विष है; बल्कि उनके प्रति आसक्ति और अनियंत्रित भोग आत्मा के लिए विष के समान परिणामकारी हो सकता है।
छंद 15
आहार विहार निहारा, इनमे नहि जतन विचारा
बिन देखि धरी उठाई, बिन शोधी वस्तु जु खाई ॥15॥
शब्दार्थ
- आहार — भोजन एवं ग्रहण करने योग्य वस्तुएँ।
- विहार — चलना-फिरना तथा दैनिक शारीरिक गतिविधियाँ।
- निहारा — व्यवहार किया/प्रवृत्ति की।
- जतन — सावधानी, यत्न।
- बिन देखि — बिना देखे।
- धरी उठाई — रखी हुई वस्तु को उठा लिया।
- बिन शोधी — बिना जाँच-पड़ताल या शुद्धि किए।
- वस्तु — खाने-पीने या उपयोग की वस्तु।
आहार विहार निहारा – आहार-विहार में असावधानी
आहार: भोजन करते समय हमने शोधनपूर्वक आहार नहीं किया, भक्ष-अभक्ष का विचार नहीं किया।हमें यह कहा है कि आहार (भोजन) लेते समय भी देखो, उसमें अपना विवेक लगाओ।
विहार: आप जब कहीं गमनागमन करते हो, आते-जाते हो, उसमें भी विवेक लगा के आओ-जाओ। जब हम गाड़ियों, ट्रेनों या विमानों में यात्रा करते हैं, तो वहां पंखों या अन्य साधनों से कई जीवों की हिंसा हो जाती है। हमें वास्तव में ईर्या समितिपूर्वक (देखकर) चलना चाहिए।
निहार: यानी कि आप मल-मूत्र विसर्जन (शौच) आदि जो क्रियाएं करते हैं, उसमें भी विवेक लगा के करो ताकि हिंसा कम से कम हो। वर्तमान काल में विदेशी टॉयलेट या फ्लश का अत्यधिक (99%) उपयोग होता है। अनछना पानी एसिड में जाने से अनेक त्रस जीवों की हिंसा होती है। फ्लश में लीकेज होने से भी बहुत पानी बर्बाद होता है और जीवों की हत्या होती है।
बिना देखे वस्तु रखी और उठाई, तथा बिना शोधे ही पदार्थों का भक्षण किया, जिससे जीवों की हिंसा हुई और पाप का बंध हुआ। जैन धर्म में सावधानी (समिति) का बहुत महत्व है। मतलब कोई भी चीज यदि हम उठाते हैं या हम उसको रखते हैं, तो जिनेंद्र भगवान ने कहा है कि उसमें अपना विवेक लगाओ कि कहीं हमारे जो है रखने में किसी जीव की हिंसा तो नहीं हो रही है? या फिर हमने उठा के किसी जीव का जो है घर उजाड़ तो नहीं लिया है? तो इस तरह से किसी भी चीज को उठाना और धरना बहुत सोच-समझ के है। और हमें जो भी भोजन हमको खाना है, वह भी देख-शोध के खाना है कि कहीं उसमें किसी जीव की हिंसा तो नहीं हो रही है। जैसे जूते पहनते समय एक बार अंदर देख लेना चाहिए कि कहीं चींटी तो नहीं चढ़ी है। गद्दे, नोटबुक या बर्तन रखते समय भी देख-शोधकर रखना चाहिए। यत्नाचार पूर्वक क्रिया करने से हमारी विशुद्धि बहुत बढ़ती है और प्रत्येक जीव के प्रति भगवान आत्मा का भाव बना रहता है।
तो मैंने यह सब कार्य नहीं करा।क्योंकि असावधानी से अनजाने में भी सूक्ष्म जीवों की हिंसा हो सकती है। इसलिए साधक को अपने दैनिक कार्यों में जागरूक रहना चाहिए। स्वीकार करते हैं कि —
- भोजन करते समय पर्याप्त सावधानी नहीं रखी,
- वस्तुओं को बिना देखे उठा लिया,
- बिना जाँच किए उनका सेवन किया,
- अपने आवागमन और दैनिक व्यवहार में भी आवश्यक सावधानी नहीं रखी।
यहाँ “बिन देखि” और “बिन शोधी” केवल भोजन की सफाई या स्वच्छता तक सीमित नहीं हैं। इनका व्यापक भाव है—किसी वस्तु या कार्य को बिना विवेक और सावधानी के ग्रहण करना।
छंद 16 व 17 – अर्थ
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