श्री पद्मप्रभ विधान- आर्यिका विज्ञानमति
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पीठिका
(दोहा)
पद्मप्रभ की अर्चना, करने शुभ-आरंभ । कहूँ पीठिका पूर्व में, तजकर पापारम्भ ॥१॥
(ज्ञानोदय)
नगर सुसीमा धन-धान्यों से, जैसे था परिपूर्ण अरे। वैसे ही था अधिपति उसका, श्रेष्ठ कार्य को पूर्ण करे ॥ नहीं पराजित हुआ तभी तो नाम रहा, अपराजित था। जिनेन्द्र पूजा गुरु की सेवा, कर पद पाया अरिजित था ॥२॥
दान दिया था इतना जिससे, नहीं दरिद्री शेष रहा। नहीं दुखी था कोई भी सो, भाग्यवान वह देश कहा ।। इक दिन भव भोगों का उसके, विचार मन में जब आया। पिहितास्रव जिनवर के पद में, दीक्षा लेकर सुख पाया ॥३॥
फिर भायी थी सोलह कारण, भावन पावन मुनि बनकर । तीर्थंकर शुभ कर्म बाँधकर, सुर पाया था सब सुखकर ।। अन्त समय में स्वर्ग छोड़ जब, भूमि पधारे आप तदा । छह महिने पहले से रत्नों को बरसाया खूब यहाँ ॥४॥
पौन वर्ष तक गर्भ विराजे, तब भी सुरमय जलधर’ ने। हीरा-पन्ना माणिक मोती, से भर दी थी भूमि अरे ॥ जन्म हुआ तब श्वभ्रभूमि भी, क्षणभर को वा शुभ्र हुई। नरक निवासी जीवों ने भी, श्वास ग्रहण की सौख्यमयी ॥५॥
यौवन बीता तब तो इक दिन, बँधा देखकर गजवर को। पूर्व भवों का ज्ञान हुआ वैराग्य हुआ सो जिनवर को ॥ दीक्षा लेकर केवल पा फिर, समवसरण में शोभित हो । दिव्य देशना देकर सबके मन को करके मोहित औ ॥६॥
गाँव-गाँव में नगर-नगर में, भव्यों को उपदेश दिया। बारह कोठों में बैठे सब, जीवों को संदेश दिया ॥ तुम भी जल्दी वृष धारण कर मुक्ति रमा का वरण करो। उसको पाने भूल कभी नहिं, पर द्रव्यों को ग्रहण करो ॥७॥
यही देशना सुन करके तो, भव्य जीव कृतकाज हुए। तेरा ही पथ अपनाया था, जिससे शिव का राज्य मिले ।। अहो आपका गमन देशना, चलना आदिक सहज हुए। नहिं इच्छा नहिं फल की वांछा, नहीं कर्म के करण’हुए ॥८॥
फिर सम्मेदाचल पर जाकर, योग क्रिया को तज करके । शिव पाया था, सुख पाया था, निज में निज को भज करके ।। ऐसे श्रीमद् पद्मप्रभ के विधान की शुरुआत करूँ । और पूर्ण कर तव प्रसाद से, मोक्ष महल को पास करूँ ॥९॥
परिपुष्पाञ्जलिं क्षिपामि/क्षिपेत्
विधान प्रारम्भ
स्थापना
(ज्ञानोदय)
खिले कमल सम खिला हुआ ही पद्मप्रभ का आनन है। चिह्न पद्म है वर्ण पद्म सा, सच्चे ये चतुरानन हैं ।॥ महामनोहर कूट सुमोहन, आप योग से श्रेष्ठ बना। ऐसे पद्मप्रभ स्वामी तुम, तीन लोक में ज्येष्ठ महा ॥
(दोहा)
छटवें प्रभु श्री पद्म का, आह्वानन है आज । सन्निधि स्थापन मैं करूँ, पूजा करने आज ।।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्ह श्री पद्मप्रभ जिनेन्द्र अत्र अवतर अवतर संवौषट् इति आह्वाननं !
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्ह श्री पद्मप्रभ जिनेन्द्र अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनं !
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्ह श्री पद्मप्रभ जिनेन्द्र अत्र मम सन्निहितो भव-भव वषट् सन्निधिकरणं !
अष्टक
जल लेकर के स्वर्ण कलश में, धारा देने आया हूँ। जन्म-मरण की परम्परा को, आज मिटाने आया हूँ ।। पद्मप्रभ को मुदित पद्म सम चित्त लगाकर पूजूँगा। सम्यक पाने हे स्वामी अब, मिथ्यातम को तज दूँगा ।।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्ह श्री पद्मप्रभ-जिनेन्द्राय नमः जन्म-जरा-मृत्यु-विनाशनाय जलं…।
चंदन शीतल रहा सुगन्धित फिर भी ताप न मेट सका । ताप मिटाने दुर्लभता से आज आपसे भेंट सका ॥
पद्मप्रभ को मुदित पद्म सम चित्त लगाकर पूजूँगा। सम्यक पाने हे स्वामी अब, मिथ्यातम को तज दूँगा ।।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्ह श्री पद्मप्रभ-जिनेन्द्राय नमः संसार-ताप-विनाशनाय चंदनं …।