श्री शांतिनाथ मंडल विधान
ताराचंद जैन (Tarachand jain)
इस विधान में चार वलयों की रचना की गई थी — प्रत्येक वलय का अपना विशेष आध्यात्मिक अर्थ और साधक के जीवन में गहन प्रतीकात्मक महत्व था।
1️⃣ प्रथम वलय – 8 अर्घ्य
इस वलय में भगवान के आठ प्रातिहार्यों — सिंहासन, छत्र, चामर, ध्वज, अशोक वृक्ष, दिव्य ध्वनि, समवसरण और देव-इंद्रों की आराधना — के प्रतीक आठ अर्घ्य अर्पित किए गए।
इन अर्घ्यों द्वारा भगवान के सर्वज्ञत्व और शांत स्वरूप का स्मरण किया गया।
2️⃣ द्वितीय वलय – 16 अर्घ्य
इस वलय में पंचपरमेष्ठी और रत्नत्रय (सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चरित्र) के आठ अर्घ्य चढ़ाए गए।
इसके पश्चात अष्टकर्मों के उपद्रवों के विनाश हेतु आठ अर्घ्य अर्पित किए गए।
यह वलय आत्मशुद्धि और कर्मनिर्जरा की भावना का प्रतीक था।
- पंच परमेष्ठी और रत्नत्रय के 8 अर्घ्य
- अष्टकर्मों के उपद्रवों के विनाश हेतु 8 अर्घ्य
3️⃣ तृतीय वलय – 32 अर्घ्य
चारों निकायों —
- भवनवासी देव (10),
- व्यंतर देव (8),
- ज्योतिषी देव (2), तथा
- वैमानिक देव (12) —
सहित उनके परिवारों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए कुल 32 अर्घ्य अर्पित किए गए।
यह वलय ब्रह्मांड के समस्त देवों के मंगल सहयोग का प्रतीक था।
4️⃣ चतुर्थ वलय – 64 अर्घ्य
अंतिम वलय में 64 अर्घ्य भगवान श्री शांतिनाथ के चरणों में समर्पित किए गए।
- प्रारंभिक 32 अर्घ्य : देहिक, दैविक, भौतिक संकटों, रोगों और विपदाओं के नाश की भावना से अर्पित किए गए।
- अंतिम 32 अर्घ्य : भगवान के गुण, करुणा, क्षमा, और शांति के स्वरूप का स्तवन करते हुए चढ़ाए गए, जिनसे समस्त जीवों के कल्याण की भावना प्रकट हुई।
पूरे विधान के दौरान वातावरण में वेदियों पर सुगंधित धूप, दीप और पुष्पों की वर्षा से अद्भुत आभा छाई रही। मंत्रोच्चारण और शांति की ध्वनियों के मध्य श्रद्धालु भावविभोर होकर भगवान के दिव्य स्वरूप का ध्यान करते रहे।
इस विधान का सार भाव यह रहा कि —
“भगवान श्री शांतिनाथ की अनंत शांति हमारे अंतःकरण में बसे,
जीवों के दुख-द्वेष मिटें और सम्यक मार्ग की ज्योति प्रकट हो।”