श्रीअमृतचन्द्राचार्य विरचित पुरुषार्थ सिद्धयुपाय – गाथा 7 मङ्गला संस्कृल टीका एवं दोहानुवाद * मुनि श्री प्रणम्यसागर जी और ‘भावप्रकाशनी’ हिंदी टीका पं० मुन्नालाल रांधेलीय वर्णी
उत्थानिका – मात्र व्यवहार नय का अनुभव करने वाले पुरुष के लिए यह देशना क्यों नहीं है, इस बात को दृष्टांत पूर्वक समझाते हैं।
माणवक एव सिंहो यथा भवत्यनवगीत सिंहस्य ।
व्यवहार एव हि तथा निश्चयतां यात्यनिश्चयज्ञस्य ॥7॥
अन्वय :- यथा अनवगीतसिंहस्य माणवक एव सिंहः तथा अनिश्चयज्ञस्य व्यवहारः एव हि निश्चयतां याति ॥ अन्वयार्थ – (यथा) जैसे (अनवगीतसिंहस्य) सिंह को नहीं जानने वाले पुरुष के (माणवकः) बालक (एवं) ही (सिंहः) सिंह रूप (भवति) होता है (तथा) उसी प्रकार (अनिश्चयज्ञस्य) निश्चय नय के स्वरूप से अपरिचित पुरुष के लिए (व्यवहारः) व्यवहार (एव) ही (हि) अवश्य (निश्चयतां) निश्चय नय के स्वरूप को (याति) प्राप्त होता है।
जिसने सिंह देखा नहीं, बालक माने शेर ।
निश्चय को जाने बिना, जग में फिर-फिर फेर ॥७॥
टीकार्थ – जिस पुरुष ने सिंह का आकार और उसके शौर्य क्रूरतादि गुणों को नहीं जाना है क्योंकि पहले कभी सिंह को देखा नहीं है इसलिए वह पुरुष बालक को ही सिंह मानता है। अमरकोश में माणवक बालक को कहा है। दृष्टान्त इस प्रकार है किसी बालक की माता “मेरा बेटा सिंह है” इस प्रकार कहती है। उसे सुनकर कोई वास्तविक सिंह से अपरिचित दूसरा बालक उसी को सिंह मान लेता है। दाष्र्टान्त सुगम है। श्लोक में ‘एव’ पद निश्चय के अर्थ से आया है। अगर कोई पुरुष मुख, नेत्र, क्रूरता आदि सामान्य लक्षणों की समानता से बालक को सिंह मानता है तो भले ही कथञ्चित् स्वीकार किया जा सकता है किन्तु बालक को ही सर्वथा सिंह स्वीकार नहीं किया जा सकता है क्योंकि इन दोनों में बहुत अन्तर देखा जाता है। किन्तु वास्तविक सिंह से अपरिचय के कारण जो मनुष्य बालक को देखकर सिंह आया और उसके दौड़ने पर या कूदने पर समझता है कि यह सिंह दौड रहा है या सिंह ऐसा कूदता है ऐसा मानता है तो वह हँसी का पात्र होता है। उसी प्रकार जिसको निश्चय नय का ज्ञान नहीं वह अनिश्चयज्ञ पुरुष व्यवहार के क्रिया कलापों में मग्न होकर व्यवहार को ही निश्चय मानता है तथा उसे व्यवहार कथन ही निश्चय कथन समझ आता है। वह अनिश्चयज्ञ शरीर को ही आत्मा मानकर शरीर से उत्पन्न होने वाले सुख, दुःख, जवानी, बाल, वृद्ध आदि पर्यायों में संयोग के वश से एकता मानकर उन पर्यायों को आत्मा की ही पर्याय मानता है। वह अनिश्चयज्ञ (निश्चय को नहीं जानने वाला) तीर्थंकर प्रतिमा, आचार्य, उपाध्याय, साधुओं के शरीर की पूजा, स्तुति, भक्ति, वन्दना आदि करके उनको आत्मा की ही पूजादि मानता है और परमार्थ को नहीं जानने से व्रत, तप, दीक्षा देना या ग्रहण करने का उपदेश वाचना, प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान, ग्रन्थ के पठन-पाठन में, पूजाविधान, तीर्थयात्रा, सम्मेलन, वार्ता परिचय्, पूजा प्रतिष्ठा आदि व्यवहार की क्रियाओं में ही रमता (रुचि रखता) है। ऐसे जीव का पुरुषार्थ भी प्रयोजनवान नहीं है क्योंकि वह आत्मा के स्वरूप से अनभिज्ञ है। इसलिए उसको देशना निरर्थक हुई है।॥७॥
विशेषार्थ – वस्तु के निश्चय स्वरूप तक तो पहुँचे नहीं, केवल निश्चय नय का नाम सुनकर व्यवहार चारित्र को निश्चय चारित्र, व्यवहार सम्यक्त्व को निश्चय सम्यक्त्व, व्यवहार आत्म स्वरूप को निश्चय आत्म स्वरूप समझ कर उसी एकान्त पर आरूढ़ हो जाये तो वे पुरुष अज्ञानी हैं। ऐसी अज्ञान दशा में आचार्यों के उपदेश का प्रभाव नहीं पड़ता है इसलिए वह आत्मा उपदेश का पात्र नहीं होता है।
English Translation of Purushartha Siddhi Upay Tika Gatha 7
‘भावप्रकाशनी’ हिंदी टीका पं० मुन्नालाल रांधेलीय वर्णी
भावार्थ-अनादिकालसे व्यवहार को ही निश्चय माननेवाले जीव संसारमें बहुधा अधिक पाये जाते हैं, वे भूले-भटकके जीव अज्ञानी जोव है, कारण कि उनकी निश्चयका न ज्ञान है न महत्व है, व्यवहारदष्टि ( मान्यता ) ही उनको सदैव रहती है। उनके सामने निश्चय जैसी महत्वपूर्ण कोई वस्तु है ही नहीं। जिसप्रकार अज्ञानी या बालक के सामने सच्चा शेर न होने से बिल्लीके बच्चेको ही वह शेर समझता है । ऐसी स्थिति में कभी उद्धार या भला नहीं हो सकता। सच्चे शेरके जाने बिना नकली शेरको जान लेने मात्र से उसको शेरका सच्चा ज्ञाता नहीं कह सकते । नतीजा यह होता है कि उसकी नकली धारणा इतनी मजबूत हो जाती है कि कदाचित् सच्चे शेरका प्रत्यक्ष दर्शन होनेपर भी वह उसको सच्चा और नहीं मानता, झूठा मानता है। अतः जबतक निश्चय ( सत्य ) का दर्शन व ज्ञान न हो तबतक तो वह किसी तरह व्यवहार या असत्यको अपनाये, किन्तु जब सत्यका दर्शन व ज्ञान हो जाय तब वह व्यवहाररूप धारणा ( मान्यता) को छोड़ देवे या छोड़ देना चाहिये । यह आशय या रहस्य है। यही बात जीवकाण्ड गोम्मटसारमें श्रीनेमिचन्द्राचायने लिखी है |७|
तदनुसार मिथ्या या व्यवहार श्रद्धा तुरन्त छोड़ देना चाहिये, हम नहीं करना चाहिये, वही भद्र परिणामी समझा आयगा । जैसे कि जबतक असली शेरका दर्शन या प्रत्यक्ष न हो तबतक भले ही नकली शेर ( बिल्ली )को तसल्ली के लिए सच्चा शेर मानता रहे किन्तु जब सच्चे शेरका दर्शन व प्रत्यक्ष हो जाय तब तो भ्रम या अज्ञान ( व्यवहारपना ) छोड़ ही देना चाहिए, अन्यथा यह मूर्ख ही कहलायगा और धोखा खायमा, उससे लाभ या मनोरथ सिद्धि न होगी यह तथ्य है। कदाचित् परीक्षाके समय नकली शेर, दूसरे असली शेरका मुकाबला नहीं कर सकेगा। न अपनी व दूसरोंकी वह रक्षा भी कर सकेगा, दुसरे जबर्दस्त या बलवानके देखते ही भाग जायेगा इत्यादि । उसी तरह प्रकृतमें भी समझ लेना चाहिये । जैसेकि व्यवहाररूप ( सराग ) सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञानसम्यक्त्रारिसे भाव व द्रव्य शत्रु ( रागादिक विभाव भाव व द्रव्य कर्म ) नष्ट नहीं हो सकते न आत्मांकी उनसे रक्षा हो सकती है किन्तु निश्चय वीतरागतारूप सम्यग्दर्शनादिसे ही कर्मशत्रुओंका क्षय (विनाश:) होकर आस्माकी रक्षा होती है व मोक्ष जाता है इत्यादि, अतएवं निश्चय ही उपादेयः व हितकारी है ऐसा समझकर उसका ही आलम्बन या ग्रहण करना चाहिए, उससे कभी धोखा न होगा, हमेशा लय या साध्यकी सिद्धि होगी। किम्बहुना आचार्यका दिया हुआ शेर (सिंह) का दृष्टान्त बिलकुल फिट बैठता है । म्लेच्छ भाषाका दृष्टान्त भी जो श्रीकुन्दकुन्दाचार्य ने दिया है संगत वैठता है उनसे सब श्रम मिट जाता है, खुलासा समझमें आ जाता है इति ।
English Translation of Purushartha Siddhi Upay Tika Gatha 7
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