आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज द्वारा पद्यानुवाद एवं विवेचना
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उत्थानिका-
यहाँ पर शिष्य प्रश्न करता है कि स्त्री आदि में राग और शत्रुओं में द्वेष करने वाला पुरुष अपना क्या अहित (बिगाड़) करता है? जिससे उनको (रागद्वेषों को) अकरणीय अर्थात् न करने लायक बतलाया जाता है? आचार्य समाधान करते हैं-
रागद्वेषद्वयीदीर्घ नेत्राकर्षण कर्मणा। अज्ञानात्सुचिरं जीवः संसाराब्धौ भ्रमत्यसौ ॥११॥
अन्वयार्थ (असौ) यह (जीवः) संसारी प्राणी (संसाराब्धौ) इस संसार-समुद्र में (अज्ञानात्सुचिरं) अज्ञान के कारण अनादिकाल से (रागद्वेषद्वयी-दीर्घ नेत्राकर्षण-कर्मणा) राग- द्वेष रूपी दो लम्बी डोरियों के खींचने रूप कार्य से अर्थात् घुमायी जाती हुई मथानी की तरह (भ्रमति) घूम रहा है।
दधिमन्थन के काल मथानी, मन्थन-भाजन में भ्रमती,
कभी इधर तो कभी उधर ज्यों, क्षण भर भी ना है थमती।
राग-द्वेष की लम्बी-लम्बी, डोरी से यह बँधा हुआ,
ज्ञान बिना त्यों भव में भ्रमता, रुदन करे गल सँधा हुआ ॥११॥
English Translation of Ishtopadesh Gatha 11
विवेचना-संसारी प्राणी अज्ञान के कारण संसार रूपी महान् समुद्र में चिरकाल तक भटकता रहता है अर्थात् गोता खाता रहता है। रागद्वेष रूपी दीर्घ ‘नेत्राकर्षण’ अर्थात् डोर या रस्सी के माध्यम से जीव घूमता रहता है। जैसे-समुद्र मन्थन के लिए मेरु को दण्ड बनाकर रस्सी को इधर एक तरफ दानव और एक तरफ मानव और देव मन्थन करने लगे। अर्थात् लोक में यह बात प्रसिद्ध है कि नेतरी की खींचा तानी से जैसे मंथराचल पर्वत को समुद्र में बहुत काल तक भ्रण करना पड़ा उसी तरह राग-द्वेष रूपी डोर के माध्यम से अज्ञानी जीव/संसारी जीव को अनादिकाल से संसार में घूमना पड़ रहा है। “राग का अर्थ है आकर्षण और द्वेष का अर्थ है अपकर्षण” इन आकर्षण व अपकर्षण के साथ मथानी घूमती रहती है। फलतः संसारी प्राणी चौरासी लाख यौनियों में घूमता रहता है।
मधानी यदि धीरे-धीरे घूमती है तो खींचने का कार्य धीरे-धीरे होता है और यदि जोर से घूमती है तो घूमने की गति भी बढ़ जाती है। इस प्रकार अपने संसाररूपी समुद्र मन्थन (भ्रमण) का कार्य राग- द्वेष रूपी नेत्राकर्षण अर्थात् डोरी के द्वारा हो रहा है। वैसे देव और दानव समुद्र का मन्थन क्यों करते हैं? उन्हें ज्ञात था कि मन्थन करने से अमृत निकलेगा। उस अमृत का चस्का अर्थात् अमृत मिलने की आशा में मन्थन चलता रहा। मन्थन के द्वारा लक्ष्मी, सरस्वती, हीरे, मोती, माणिक आदि रत्न भी मिलते हैं तो विष भी मिलता है। उसी प्रकार यहाँ पर आप भी संसार रूपी समुद्र का मन्थन कर रहे हैं। जिसमें राग-द्वेष रूपी इसकी डोरी है, आप स्वयं मथानी के रूप में हैं। आपकी क्या इच्छा है? सुख मिल जायेगा, परन्तु अभी तक सुख मिला नहीं। संसार परिभ्रमण रुका नहीं। अज्ञानता मिटी नहीं। मान लो किसी ने कुछ कह दिया कि संसार में सुख है। उस पर आप लोग रात-दिन विश्वास करके प्रयास करते जा रहे हैं। एक भव नहीं, दो नहीं, लाखों, अरबों भव हो गये लेकिन सुख की उपलब्धि नहीं हुई, क्यों नहीं हुई? इस बात पर विचार किया कभी आपने ? आचार्य कहते हैं कि जब तक राग-द्वेष रूपी आकर्षण (डोरी) नहीं छूटेगी तब तक संसारी प्राणी की भटकन कैसे रुक सकती है? मथानी की गति जब तक पूर्णतः नहीं रुकेगी, तब तक दही या मट्ठा का हलन चलन कैसे रुक सकता है? सोचो/विचार करो। जब तक रस्सी बन्धी है, उसे एक ओर से खींच लिया जाता है तो दूसरी ओर से छोड़ा जाता है। पहले प्रतिकार हो गया, फिर स्वीकार हो गया। स्वीकार होना राग का कार्य है, प्रतिकार करना द्वेष का कार्य है। जब तक स्वीकार और प्रतिकार चलता रहता है तब तक भ्रमण भी चलता रहता है।
संसारी प्राणी से पर वस्तु का संग्रह एकदम नहीं छोड़ा जाता, छोड़ दे तो बहुत अच्छा होगा “ऐसा द्वेष करो कि दुनिया की कोई भी वस्तु को मत चाहो और ऐसा राग करो कि अपने को पाकर के सबको छोड़ो।” लेकिन ऐसा द्वेष तो चाहते नहीं आप और ऐसा राग भी नहीं चाहते कि अपने को पा जायें। दुनिया का राग छोड़ोगे तो अपने को पा जाओगे, दुनिया को पाने की बात सोचोगे तो अपने को नहीं पा पाओगे। आप लोग तो कुछ को चाहते हो और कुछ को नहीं चाहते, यह भी तो अज्ञान है।” चाहो तो पूरा चाहो, छोड़ो तो पूरा छोड़ो, अपने पास कुछ भी नहीं रखो। यदि राग ही करना चाहते हो तो ऐसा करो कि दुनिया के सभी पदार्थों से बिना पक्षपात के राग करो। अभी आप लोगों को सही-सही राग करना भी नहीं आता, तो छोड़ना कैसे आएगा? देखकर लगता है क्या स्थिति हो गई आप लोगों की ? राग करना है तो प्रत्येक पदार्थ से राग करो, एक से नहीं और द्वेष ही करना है तो फिर किसी की ओर देखो ही नहीं। परन्तु हम तो ऐसे हैं कि बाहर से तो हम किसी की ओर नहीं देखते, लेकिन भीतर से उसी के बारे में चर्चा करते रहते हैं। विचार चलता रहता है, उसी के बारे में सोचते रहते हैं कि उसने ऐसा किया, उसने वैसा किया। क्या करें? उसके साथ बात नहीं करना है ऐसी मजबूरी समझकर भीतर भीतर राग-द्वेष चलता रहता है। भले ही ऊपर ऊपर
से शान्त दिखे। यह भी तो अज्ञान है, कषाय है। राग-द्वेष का जोड़ा है-जैसे मुद्रा होती है उसमें एक तरफ अंक लिखा रहता है दूसरी तरफ मुद्रा के चिह्न अंकित रहते हैं, उसी प्रकार संसारी जीव रूपी मुद्रा के एक तरफ राग है तो दूसरी तरफ द्वेष है। राग है तो वीतराग अवस्था भी हो सकती है, द्वेष है तो वीतद्वेष अवस्था भी हो सकती है। सिद्ध जीव में यही दोनों अवस्थायें अभिव्यक्त हो जाती हैं।
अज्ञान के कारण संसार का मन्थन करने से कुछ मिलने वाला नहीं है क्योंकि उसमें यदि सुख मिलता होता तो आज तक मिल गया होता। लेकिन राग-द्वेष के साथ संसार को पूरा का पूरा छान लिया फिर भी सुख का अंश भी नहीं मिला। भूधरदास कृत बारह भावना में आप लोग पढ़ते हैं-
दाम बिना निर्धन दुःखी, तृष्णावश धनवान ।
कबहूँ न सुख संसार में, सब जग देखो छान ॥३॥
धनिक अवस्था में भी देख लिया, निर्धन अवस्था में भी देख लिया। धन मिलने के उपरान्त भी देख लिया, धन नहीं मिला तो भी देख लिया। संसार की पूर्णरूपेण सभी अवस्थाओं में रहकर छान-बीन कर ली लेकिन सुख नहीं मिला। क्यों नहीं मिला? सुख होता तो मिलता, सुख है ही नहीं तो कहाँ से मिलेगा ? यहाँ तो सुखाभास है। उसी को सुख मानकर सभी लोग अधिक-अधिक सुख पाने का प्रयास करते हैं। संसार को छान लिया लेकिन सुख क्यों नहीं मिला? हमें बताओ। जैसे चक्रवर्ती सोचता है कि हमने छहखण्डों पर विजय प्राप्त कर ली। हम षट्खण्डाधिपति बन गये, अब ऐसा कोई शेष नहीं रहा कि जिसको मैंने जीता न हो। फिर भी अपने ही वंश का व्यक्ति शेष है जिसको जब तक नहीं जीतूंगा तब तक विजेता नहीं कहलाऊँगा। उसी प्रकार पूरा का पूरा तीन लोक छान लिया लेकिन अपनी आत्मा को नहीं छाना तो हमने क्या किया ? बताओ, इसको भी छानो पहले अर्थात् देखो, तभी तो ‘सब जग देखो छान’ यह कह पाओगे। राग-द्वेष को छोड़ना संसारी प्राणी को बहुत कठिन हो रहा है, इसी के कारण दुःख हो रहा है। आप लोग सुख चाहते हैं? हाँ महाराज! हम सभी लोग सुख चाहते हैं। इसीलिए तो आपकी शरण में उपदेश सुनने आए हैं। ठीक है, शरण में आए अच्छा किया, लेकिन यदि दुःख के कारणभूत राग-द्वेष आपके पास हैं तो सुख आयेगा ही कैसे ? रात्रि-दिन के समान दोनों में विरोध है, रात है तो दिन नहीं, दिन है तो रात नहीं, वैसे ही सुख है तो दुःख नहीं और दुःख है तो सुख नहीं रह सकता।
दूध या दही का विधिवत् मन्थन होता है अर्थात् दूध या दही के साथ विधिवत् प्रक्रिया प्रयुक्त होती है तो ही नवनीत प्राप्त होता है अन्यथा नवनीत पाना संभव नहीं है। आज तक नीर के मन्थन से नवनीत की प्राप्ति संभव नहीं हुई न कभी होगी। शास्त्र ज्ञान को प्राप्त करके यदि आप उस ज्ञान से दुनिया को छानोगे तो सुख की प्राप्ति नहीं होगी, किन्तु उसी ज्ञान से यदि आपको छानोगे अर्थात् अपने में खोज करोगे, आत्मिकसुख प्राप्ति के साधन जुटाओगे तो सुख की उपलब्धि संभव है। ज्ञान के द्वारा दूसरे का नहीं अपना मन्थन करो। जो करने योग्य है वह करोगे तो निश्चित रूप से कार्य हो सकेगा। जिस साधन के द्वारा जिस क्षेत्र में कार्य करोगे तो उस क्षेत्र में वैसा ही कार्य सिद्ध होगा अर्थात् वैसा ही फल प्राप्त होगा। विपरीत क्षेत्र में विपरीत साधनों से विपरीत फल प्राप्त होगा। ज्ञान या सुख की उपलब्धि, उसके योग्य साधनों के जुटाने से होगी। राग-द्वेष, कषाय के साथ ज्ञान या सुख की उपलब्धि तीन काल में संभव नहीं है।
‘समयसारकलश’ ग्रन्थ में भी कहा गया है कि “राग-द्वेष से युक्त ज्ञान वस्तुतः अज्ञान ही है और राग-द्वेष से मुक्त ज्ञान समीचीन ज्ञान है” इसी समीचीन वीतराग ज्ञान से ही मुक्ति हो सकती है। राग-द्वेष रहित ज्ञान ही चारित्र का प्रतीक है। अतः उस ज्ञान को प्राप्त करो जिसमें राग द्वेष न हो, यही ज्ञान चारित्र कहलाता है। इसके अतिरिक्त चारित्र और कोई वस्तु नहीं है। वीतरागी बनकर आप कहीं भी घूम सकते हैं, आपका कुछ भी नहीं बिगड़ेगा। दुनिया के जितने भी कार्य हैं वे कर लीजिये, लेकिन तीन कार्य नहीं करना-राग, द्वेष, मोह।
परीक्षा में पास होने के लिए नकल करने की खुली छूट भी दे दी जाये, दूसरे की कॉपी से नहीं, किताब से ही, तो भी वह परीक्षार्थी परीक्षा में उत्तीर्ण होने योग्य प्रश्नों को हल नहीं कर सकेगा, क्योंकि पाँच सौ पृष्ठों की किताब है, पाँच प्रश्नों के उत्तर निकालना हैं और ३६५ दिन तक इधर-उधर की बातों में समय निकाला हो, तो आप किताब देखकर भी प्रश्न हल नहीं कर सकते, क्योंकि उस किताब में कौन से पृष्ठ पर कौन से प्रश्न का हल हो सकता है यह भी ज्ञात होना आवश्यक है। जब यह ज्ञात होगा तभी तो किताब खोलकर नकलकर पाओगे और पास हो पाओगे, अन्यथा कैसे ? इसी प्रकार पूरे जीवन भर तक तो शास्त्र पढ़े, इधर-उधर के पृष्ठ पलटे, लेकिन “क्या करना है क्या नहीं” यह ध्यान ही नहीं रखा। राग, द्वेष, मोह ये तीन काम नहीं करना। इतनी बात का ध्यान नहीं रखा तो शास्त्र पढ़कर भी हम सफल नहीं हो पायेंगे। अतः राग मत करो, द्वेष मत करो, मोह मत करो यही मुख्य उपदेश है।
“छोड़ो तो सब कुछ छोड़ो, पकड़ो तो सबको पकड़ो” अर्थात् किसी से राग-द्वेष मत करो। राग-द्वेष को छोड़े बिना आप कितना भी जप, तप, त्याग आदि करो, उसका कोई मायना नहीं होता। संसारी प्राणी अज्ञान के कारण संसार रूपी सागर में भ्रमण कर रहा है। राग-द्वेष के कारण सांसारिक वस्तुओं की ही याचना की है इसलिए वही मिलती आयी है। आज तक सुख प्राप्ति का कोई साधन ही नहीं जुटाया इसलिए वह कैसे प्राप्त हो ? मोक्ष की कामना की होती तो मोक्ष मिलता, लेकिन आज तक उसे पाने की कल्पना भी नहीं की तो कैसे मिलता ?
मोक्ष प्राप्त करने के लिए कोई कार्य नहीं करना पड़ता, किन्तु जो करते हो उसे करना बन्द करना है, शांति के साथ हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाओ, यह भी नहीं होता है। क्यों नहीं होता, क्योंकि उछल-कूद मचाने में माहिर हैं। बन्दर तो बन्दर है-उछल-कूद मचाता ही है, लेकिन मानव
मन इससे भी ज्यादा उछल-कूद करता है, मानव मन बन्दर से भी अधिक चंचल है। कितना चंचल है तो आचार्य महाराज बताते है- “वैसे वानर…. बन्दर वैसे ही चंचल होता है और यदि उसकी पूछ में बिच्छू काट दे और जहर की दाह को मिटाने पानी की तलाश में जाये और मानलो पानी के स्थान पर उसे शराब मिल जाये वह उसे पी ले तो क्या होगा ? उसका नशा और बढ़ जायेगा। फिर यदि पागल हो जाये तो और क्या होगा ? अब तो चंचलता की कोई सीमा नहीं। अब बैठने की बात ही नहीं। बैठता तो पहले भी नहीं था, लेकिन चंचलता बढ़ जाने के कारण स्थिरता का अभाव सा हो जाता है। आचार्य कहते हैं कि मानव का मन तो इससे भी अधिक चंचल होता है। बन्दर यदि पाप करता है तो वह कौन से नरक तक जा सकता है यह स्पष्ट उल्लेख या उदाहरण नहीं मिला फिर भी बहुत कम पृथ्वियों को पार कर पायेगा। शेर एक से पंचम पृथ्वी तक जा सकता है। शेर का पञ्चम पृथ्वी तक जाना अलग वस्तु है क्योंकि वह क्रूर प्राणी है बन्दर में इस प्रकार की क्रूरता नहीं पायी जाती।
मानव का मन बहुत चंचल होता है। उलझा हुआ होता है। वह शान्त बैठा सा प्राणी लगता है लेकिन कभी-कभी इतना अशान्त हो जाता है, इतनी अधिक क्रूरता और चंचलता बढ़ जाती है कि सभी नरकों को पार कर अंतिम पृथ्वी में पहुँच जाता है। वैसे तो मानव अत्यन्त सभ्य प्राणी माना जाता है। कोई भी काम करता है तो सोच-विचार कर करता है, उसका मस्तिष्क कभी खाली नहीं रहता। भीतर ही भीतर कोई न कोई गणित चलता रहता है। मन का पूरा-पूरा उपयोग करता है। लेकिन जब विवेक के स्तर से नीचे उतर जाता है तो सबसे ज्यादा पतन का मार्ग यही चुनता है। सुख-दुःख के जितने भी अंतिम छोर हैं, उन सबका सम्पादन मनुष्य के द्वारा ही होता है।
अन्त में यही कहना चाहूँगा कि रागद्वेष से आकृष्ट होकर यह संसारी प्राणी भ्रमण करता आया है। संसाररूपी समुद्र का बहुत मन्थन किया, लेकिन इसके फल-स्वरूप हाथ में नवनीत प्राप्त नहीं हो पाया, किन्तु हमेशा निराशा का ही फल मिला है, उसकी आशा पूर्ण नहीं हुई। बार-बार यही सोचता आया है कि-
आज नहीं तो कल, कल नहीं तो परसों।
जल्दी-जल्दी क्या पड़ी है, अभी तो जीना बरसों ॥
एक न एक दिन फल मिल ही जायेगा। आशा के ऊपर आसमान टिका है। महाराज! हम तो आशावादी हैं। आज फल मिले या न मिले पर हम तो एक न एक दिन प्राप्त करके ही रहेंगे। क्या प्राप्त करके रहेंगे भैया ? पानी के मन्थन से नवनीत मिलने वाला है क्या? नहीं। संसार के किसी भी पदार्थ का मन्थन कर लीजिए सुख शान्ति मिलने वाली नहीं है। यदि सुख-शान्ति मिलने वाली होती तो आज तक मिल जाती।
धन्य हैं, बड़े भाग्यवान् हैं वे, जिन्होंने इस रहस्य को जाना और संसार समुद्र के मन्थन को छोड़कर अपने आपका मन्थन कर लिया। समयसार, गोम्मटसार का आलोकन, चिन्तन, मनन अलग है, लेकिन सारभूत समय अर्थात् आत्म-तत्त्व का मन्थन करना अलग है। आज तो समयसार के ऊपर शोध छात्र डॉक्टरेट और डी० लिट् की उपाधियाँ प्राप्त कर रहे हैं, उन्हें तो कम से कम सारभूत तत्त्व मिलना चाहिए। जो कम्पोजिंग करते हैं, उनके लिए तो और भी जल्दी उपलब्धि होना चाहिए। ‘समयसार’ ग्रन्थ के पढ़ने से, पढ़ाने से रागद्वेष छोड़ने की बात समझ में तो आ सकती है, लेकिन उपाधियों के पीछे दौडने वाला व्यक्ति समयसार का चिन्तन, मनन करके भी रागद्वेष नहीं छोड़ सकता। आत्मतत्त्व का चिन्तन अलग वस्तु है और उसकी अनुभूति अलग है।
राग-द्वेष को छोड़ दो, इसका अर्थ है राग-द्वेष के लिए जो कारणभूत पदार्थ हैं, उन पदार्थों को भी छोड़ दो। छोड़ने के बाद उसकी याद भी मत करो, तब कहीं जाकर अपने को जीवित समयसार उपलब्ध हो सकेगा। वीतराग भाव से वीतरागी के जो भी शब्द निकलते हैं वे सभी समयसार मय होते चले जाते हैं। आत्मानुभूति करने में ही जिसको शान्ति अथवा हित का अनुभव होता है वह व्यक्ति बाह्य पर पदार्थों में निमग्न नहीं हो सकता, क्योंकि उसे भीतर से बाहर आना रुचता ही नहीं है। जिसको जिसमें रस आता है वह उसी का मन्थन करता चला जाता है। संसारी प्राणी ने आज तक आत्मा से भिन्न पर पदार्थों का मन्थन किया है और आगे भी उसे उसी का रस प्राप्त हुआ है उसी को पुनः प्राप्त करने का पुरुषार्थ करता है, किन्तु सही वीतरागी, विज्ञानी अपने को ही जानता देखता रहता है, वह सोचता है कि आत्म-मन्थन करने में यदि कोई बाधा आ रही है तो उसे टालना चाहिए। फलतः निश्चित रूप से एक न एक दिन वह आत्मसम्पदा मिल ही जायेगी। इस भावना से वह क्या करता है? उसे आगे की कारिका द्वारा बताया जा रहा है-
English Translation of Ishtopadesh Gatha 11
इष्टोपदेश गाथा 11 – द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय पाठ्यक्रम
अन्वयार्थ – (असौ) यह (जीवः) संसारी प्राणी (संसाराब्धौ) इस संसार-समुद्र में (अज्ञानात्) अजानता से (सुचिरं ) अनादिकाल से (रागद्वेषद्वयी-दीर्घ-नेत्राकर्षण-कर्मणा) राग-द्वेष रूपी दो लम्बी डोरियों के खीचनें से घुमायी जाती हुई मथानी की तरह (भ्रमति) घूम रहा है।
भावार्थ – जैसे जमे हुए दही के मटके में रई (मथानी) को डालकर रस्सी से उस मथानी को बांधा जाता है, फिर उस रस्सी को कभी दांये हाथ से खींचकर और फिर कभी बांये हाथ से खींचकर उस मथानी को घुमाया जाता है, इसी तरह राग-द्वेष रूपी दो रस्सियों से बंधा हुआ संसारी जीव भी मथानी की तरह संसार में घुमाया जाता है, यानी यह जीव राग और द्वेष करके अपने लिए कर्म बन्धन तैयार करता है और उस कर्म बन्ध के उदय होने पर यह जीव अनादिकाल से द्रव्य, क्षेत्र, काल, भव और भावरूप संसार की चारों गतियों में भ्रमण कर रहा है।
क्रोध, मान, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा ये छह प्रकार के भाव द्वेष रूप माने गये हैं और माया, लोभ, हास्य, रति, स्त्रीवेद, पुरुषवेद, नपुंसकवेद, इन सात प्रकार के भावों को राग रूप माना गया है। राग और द्वेष में समस्त विकार भावों का समावेश किया जाता है। इनसे कर्म बंध होकर संसार में भ्रमण होता है। संसार के भ्रमण का मूल कारण रागद्वेष हैं, इसलिए रागद्वेष का परिहार करना परम आवश्यक है।
उत्थानिका – यहाँ पर शिष्य पूछता है स्वामिन् ! माना कि मोक्ष में जीव सुखी रहता है किन्तु संसार में भी जीव सुखी रहे तो क्या हानि है ? कारण कि संसार के सभी प्राणी सुख को ही प्राप्त करना चाहते हैं। जब जीव संसार में ही सुखी हो जाये तो फिर संसार में ऐसी क्या खराबी है जिससे कि संत पुरुष उसके नाश करने के लिए प्रयत्न किया करते हैं? इस विषय में आचार्य कहते हैं | गाथा 12
स्वाध्याय गाथा सं 10 & 11
इष्टोपदेश स्वाध्याय
गाथा 1 (Gatha 1) | गाथा 2 ( Gatha 2 )| गाथा 3 ( Gatha 3)| गाथा 4 ( Gatha 4) | गाथा 5 ( Gatha 5) | गाथा 6 ( Gatha 6 )| गाथा 7 ( Gatha 7 )| गाथा 8 ( Gatha 8 ) | गाथा 9 ( Gatha 9 ) | गाथा 10 ( Gatha 10)| गाथा 11 | गाथा 12 | गाथा 13 | गाथा 14 | गाथा 15 | गाथा 16 | गाथा 17 | गाथा 18 | गाथा 19 | गाथा 20 | गाथा 21
English Translation of Ishtopadesh Gatha 11
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इष्टोपदेश – द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय पाठ्यक्रम
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