अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 74- shlok 152 to 161
श्लोक ( Shlok ) 152
प्रजापतिमहाराजः श्रुत्वा तद्वन्धुभाषितम् । मया तेनेष्टमेवेष्टमित्यमात्यमतोषयत् ॥ १५२ ॥
प्रजापति महाराजने भाईका यह कथन सुन, मन्त्रीको यह कहकर सन्तुष्ट किया, कि जो बात ज्वलनजटीको इष्ट है वह मुझे भी इष्ट है ॥ १५२ ॥
“Upon hearing this statement from his brother-like ally, Maharaja Prajapati gratified the minister by declaring, ‘That which is desired by Jvalanajati is equally desired by me.’ || 152 ||”
श्लोक ( Shlok ) 153
सोऽपि सम्प्राप्तसम्मानदानस्तेन विसर्जितः । सद्यः सम्प्राप्य तत्सर्वं स्वमहीशं न्यवेदयत् ॥ १५३ ॥
प्रजापति महाराजने बड़े आदर-सत्कारके साथ मन्त्रीको विदा किया और उसने भी शीघ्र ही जाकर सब समाचार अपने स्वामीसे निवेदन कर दिये ।। १५३ ।।
“Maharaja Prajapati bid farewell to the minister with great honor and hospitality, and the minister, returning swiftly, related the entire account to his master. || 153 ||”
श्लोक ( Shlok ) 154
ज्वलनादिजटी चाशु सार्ककीर्तिः स्वयम्प्रभाम् । आनीय सर्वसम्पत्त्या त्रिपृष्ठाय समर्पयत् ॥ १५४ ॥
ज्वलनजटी अर्ककीर्तिके साथ शीघ्र ही आया और स्वयं-प्रभाको लाकर उसने बड़े वैभवके साथ उसे त्रिपृष्ठके लिए सौंप दी – विवाह दी ।। १५४ ।।
“Accompanied by Arkakirti, Jvalanajati arrived swiftly and, bringing Svayamprabha with him, gave her away in marriage to Triprishta with grand splendor. || 154 ||”
श्लोक ( Shlok ) 155
यथोक्तविधिना सिंहवाहिनीं गरुडादिकाम् । वाहिनीञ्च ददौ सिद्धविद्ये विदितशक्तिके ॥ १५५ ॥
इसके साथ-साथ ज्वलनजटीने त्रिपृष्ठके लिए यथोक्तविधिसे, जिनकी शक्ति प्रसिद्ध है तथा जो सिद्ध हैं ऐसी सिंहवाहिनी और गरुड़वाहिनी नामकी दो विद्याएँ भी दीं ।। १५५ ।।
“Simultaneously, Jvalanajati, in accordance with the prescribed rituals, also bestowed upon Triprishta two mystical sciences (Vidyas) named Simhavahini and Garudavahini, whose extraordinary powers were well-renowned and thoroughly perfected. || 155 ||”
श्लोक ( Shlok ) 156 – 157
चरोपनीततद्वार्ताज्वलनज्वलिताशयः । विद्यात्रितयसम्पन्नैविद्याधरधराधिपैः ॥ १५६ ॥अध्वन्यैरभ्यमित्रीणैरायुधीयैर्भटैर्वृतः । रथावर्ताचलं प्रापदश्वग्रीवो युयुत्सया ॥ १५७ ॥
इधर अश्वग्रीव ने अपने गुप्तचरोंके द्वारा जब यह बात सुनी तो उसका हृदय क्रोधाग्निसे जलने लगा । वह युद्ध करनेकी इच्छासे, तीन प्रकारकी विद्याओंसे सम्पन्न विद्याधर राजाओं, शत्रुके सन्मुख चढ़ाई करनेवाले मार्ग कुशल एवं अनेक अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित योद्धाओंसे आवृत होकर रथावर्त नामक पर्वतपर आ पहुँचा ।। १५६-१५७ ॥
“Meanwhile, when Ashvagriva heard of this development through his secret spies, his heart began to burn with the fire of wrath. Driven by a desire for battle, he advanced to Mount Rathavarta, surrounded by Vidyadhara kings who possessed the three types of mystical sciences, and by warriors well-versed in marching routes against the enemy and heavily equipped with numerous weapons. || 156-157 ||”
श्लोक ( Shlok ) 158
तदागमनमाकर्ण्य चतुरङ्गबलान्वितः । प्रागेवागत्य तत्रास्थात्त्रिष्पृष्ठो रिपुनिष्ठुरः ॥ १५८ ॥
अश्वग्रीवकी चढ़ाई सुनकर शत्रुओंके लिए अत्यन्त कठोर त्रिपृष्ठकुमार भी अपनी चतुरङ्ग सेनाके साथ पहलेसे ही आकर वहाँ आ डटा ।। १५८ ।।
“Upon hearing of Ashvagriva’s invasion, Prince Triprishta—who was exceedingly fierce toward his enemies—likewise arrived beforehand with his fourfold army (Chaturanga Sena) and firmly took his position there. || 158 ||”
श्लोक ( Shlok ) 159 – 160
क्रुध्वा तौ युद्धसन्नद्धावुद्धतौ रुद्धभास्करौ । स्वयं स्वधन्वभिः सार्धं शरसङ्घातवर्षणैः ॥ १५९ ॥ अश्वै रथैर्गजेन्द्रैश्च पदातिपरिवारितैः । यथोक्तविहितव्यू हैरयुध्येतां ” महाबलौ ॥ १६० ॥
जो युद्धके लिए तैयार हैं, अतिशय उद्धत हैं, स्वयं तथा अपने साथी अन्य धनुषधारियोंके साथ बाण-वर्षाकर जिन्होंने सूर्यको ढक लिया है और जो यथोक्त व्यूहकी रचना करनेवाले, पैदल सिपाहियों सेघिरे हुए घोड़ों, रथों तथा हाथियोंसे महाबलवान् हैं ऐसे वे दोनों योद्धा क्रुद्ध होकर परस्पर युद्ध करने लगे । १५९-१६० ॥
“Eager for combat and exceedingly arrogant, those two mighty warriors—having completely obscured the sun under a torrential shower of arrows loosed by themselves and their fellow archers—began to battle each other in deep fury, surrounded by infantrymen and wielding immense power through their perfectly deployed formations of horses, chariots, and elephants. || 159-160 ||”
श्लोक ( Shlok ) 161
गजः कण्ठीरवेणेव वज्रेणेव महाचलः । भास्करेणान्धकारो वा त्रिपृष्ठेन पराजितः ॥ १६१-॥
जिस प्रकार सिंह हाथीको भगा देता है, वज्र महापर्वतको गिरा देता है और सूर्य अन्धकारको नष्ट कर देता है उसी प्रकार त्रिपृष्ठने अश्वग्रीवको पराजित कर दिया ।। १६१ ।।
“Just as a lion puts an elephant to flight, just as a thunderbolt shatters a mighty mountain, and just as the sun obliterates the darkness, even so did Triprishta utterly vanquish Ashvagriva. || 161 ||”
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462 | नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 288 | पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 170
अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22
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