राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन करते हुए कल्कियों का वर्णन , कल्किके पुत्र अजितंजयका , प्रलय काल का वर्णन , आगामी तीर्थकर आदि शलाकापुरुषोंका वर्णन , महावीर भगवान् की शिष्य परम्परा पर्व 76 – श्लोक 43 से 64 | श्लोक 65 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 76- shlok 572 to 578
श्लोक ( Shlok ) 572
त्वत्पादपङ्कजषडङ्घ्रितयाप्तपुण्याद् गण्योऽभवत्सुरगणो गणनातिगश्रीः ।आनन्नमौलिरत एव नखोन्मुखांशु -भास्वन्मुखः शतमखः सुमुखस्तवान्योः ॥ ५७२ ॥
हे भगवन् ! आपके चरण-कमलोंका भ्रमर बननेसे जो पुण्य प्राप्त हुआ था उसीसे यह देवताओंका समूह गणनीय (माननीय) गिना गया है और उसी कारणसे उसकी लक्ष्मी संख्या के बाहर हो गई है। यही कारण है कि नखोंकी ऊपरकी ओर उठनेवाली किरणोंसे जिसका मुख देदीप्यमान हो रहा है ऐसा यह इन्द्र मुकुट झुका कर आपके चरणोंके सम्मुख हो रहा है- आपके चरणोंकी ओर निहार रहा है ॥५७२।।
O Lord! It is solely due to the spiritual merit acquired by becoming bees hovering around Your lotus feet that this host of celestial deities has come to be counted as honorable and esteemed; it is for this very reason that their opulence has grown beyond all measure. This is why Indra, his face glowing radiantly with the upward-rising luster of Your toenails, bows his crown and stands humbly before Your feet, gazing upon them with deepest reverence. || 572 ||
श्लोक ( Shlok ) 573
प्रशमपरमकाष्ठानिष्ठितोदात्तमूर्तेः क्रमकरणविहीनज्ञानधामैकधाम्नः ।द्वितयनयमयोद्यद्धीरदिव्यध्वनेस्ते ननु जिन परमात्मप्राभवं भाति भतुः ॥ ५७३ ॥
हे जिनेन्द्र ! आपका उत्कृष्ट शरीर प्रशम भावकी चरम सीमासे परिपूर्ण है, आप क्रम तथा इन्द्रियोंसे रहित केवलज्ञानरूपी तेजके एक मात्र स्थान हैं, आपकी गम्भीर दिव्यध्वनि निश्चय और व्यवहार-नयसे परिपूर्ण होकर प्रकट हुई है तथा आप सबके स्वामी हैं इसलिए हे नाथ ! आपके परमात्मपदका प्रभाव बहुत ही अधिक सुशोभित हो रहा है ॥ ५७३ ॥
O Jinendra! Your supreme physical form is filled to the absolute absolute limit with the profoundest state of tranquil calmness (prashama-bhava); You are the singular, ultimate repository of the light of absolute knowledge (kevala-jnana), which is entirely free from the limitations of sequence and sensory organs. Your deep, resonant divine voice (divyadhvani) has manifested fully imbued with the perspectives of both absolute truth (nischaya-naya) and conventional truth (vyavahara-naya); and You are the supreme Lord of all. Therefore, O Master, the majestic glory of Your ultimate state of pure godhood (paramatma-pada) shines forth with unparalleled and magnificent splendor! || 573 ||
श्लोक ( Shlok ) 574
ज्ञानं सर्वगतं स्वरूपनियतं ते स्यादहेतुः कृते-वींतेच्छायतनाः स्वकृत्यपटयो वाचो विवाचामपि ।प्रस्थानस्थित योऽप्यनात्मविहिता मात्मान्यबाधाप्रदाः स त्वं निर्मलबोधदर्पणतले ज्ञेयाकृतिं धत्स्व मे ॥ ५७४ ॥
हे भगवन् ! यद्यपि आपका ज्ञान सर्वत्र व्याप्त है तो भी स्वरूपमें नियत है और वह किसी कार्यका कारण नहीं है। आपकी वाणी इच्छाके बिना ही खिरती है तो भी वचनरहित (पशु आदि) जीवोंका भी आत्मकल्याण करनेमें समर्थ है। इसी प्रकार आपका जो विहार तथा ठहरना होता है वह भी अपनी इच्छासे किया हुआ नहीं होता है और वह भी निज तथा पर किसीको भी बाधा नहीं पहुँचाता है। ऐसे हे देव ! आप मेरे निर्मलज्ञानरूपी दर्पणके तलमें ज्ञेयकी आकृतिको धारण करो अर्थात् मेरे ज्ञानके विषय होओ ॥ ५७४ ।।
O Lord! Although Your supreme knowledge pervades the entire universe, it remains strictly established within the true nature of Your own self and is not the cause of any external action. Your divine voice (divyadhvani) flows effortlessly without any desire or intent, yet it is fully capable of bringing about the spiritual liberation of even those beings who lack the faculty of speech (such as animals).
Similarly, Your movement and Your staying are completely free from any personal desire, causing not the slightest hindrance or distress to Yourself or to any other living being. O Lord, who possesses such miraculous attributes! Pray, take form as the object of knowledge upon the mirror-like surface of my pure consciousness—that is, may You forever be the sacred object of my contemplation and knowledge. || 574 ||
श्लोक ( Shlok ) 575
विश्वस्यास्खलितं प्रशास्ति तव वाग्याथात्म्यमात्मेशिनो यस्माद्दष्टविरोधरोधरहिता रागाद्यविद्याच्छिदः ।तस्माद्धीर विकायसायकशिखामौखर्यवीर्यत्र हो मोहद्रोहजयस्तवैव न परेष्वन्यायविन्यासिषु ॥ ५७५ ॥
हे भगवन् ! आप आत्माके स्वामी हैं- अपनी इच्छाओंको अपने आधीन रखते हैं तथा आपने रागादि अविद्याओंका उच्छेद कर दिया है इसलिए आपके वचन प्रत्यक्षादि विरोधसेरहित होकर समस्त संसारके लिए बिना किसी बाधा के यथार्थ उपदेश देते हैं। इसी तरह हे वीर ! आपने कामदेवके वाणोंकी शिखाकी वाचालता और शक्ति दोनों ही नष्ट कर दी है इसलिए मोहकी शत्रुताको जीतना आपके ही सिद्ध है अन्याय करनेवाले अन्य लोगोंमें नहीं ॥ ५७५ ।।
O Lord! You are the absolute master of Your own soul—keeping all desires completely under Your control—and You have utterly uprooted the ignorance born of attachment and aversion (raga-dvesha). Consequently, Your words are completely free from any contradiction with direct perception or logical reasoning, offering the true, unobstructed spiritual discourse to the entire universe.
Similarly, O Brave Conqueror (Veera)! You have destroyed both the arrogance and the power of Kamadeva’s (the god of desire) sharp arrows. Therefore, achieving absolute victory over the enmity of delusion (moha) is a feat proven only in You, and certainly not in other, unjust teachers. || 575 ||
श्लोक ( Shlok ) 576
देवो वीरांजनोऽयमस्तु ‘जगतां वन्द्यः सदा मूध्नि मे देवस्त्वं हृदये गणेश वचसा स्पष्टेन येनाखिलम् ।कारुण्यात्प्रथमानुयोगमवदः श्रद्धाभिवृद्धयावहं मद्भाग्योदयतः सतां स सहजो भावो ह्ययं तादृशाम् ॥ ५७६॥
समस्त जगत के द्वारा वन्दना करने योग्य देवाधिदेव श्री वर्धमान स्वामी सदा मेरे मस्तक पर विराजमान रहें और हे गणधर देव ! आप भी सदा मेरे हृदयमें विद्यमान रहें क्योंकि आपने मेरे भाग्योदयसे करुणाकर स्पष्ट वाणीके द्वारा श्रद्धाकी वृद्धि करनेवाला यह प्रथमानुयोग कहा है सो ठीक ही है क्योंकि ऐसे पुरुषोंका ऐसा भाव होना स्वाभाविक ही है ॥ ५७६ ॥
May the Lord of all lords, Sri Vardhamana Swami, who is worthy of adoration by the entire universe, forever reside upon my head (as my supreme crown). And O Ganadhara Deva (chief disciple)! May you too forever dwell within my heart, for by the dawn of my great fortune, you have compassionately delivered this Prathamanuyoga (sacred scriptural narrative) through clear, divine speech that beautifully enhances our spiritual faith. This is indeed most fitting, as such a compassionate disposition is entirely natural to such exalted souls. || 576 ||
श्लोक ( Shlok ) 577
इति कतिपयवाग्भिर्वर्धमानं जिनेन्द्रं मगधपतिरुदीर्णश्रद्धया सिद्धकृत्यः ३ । गणधृतमपि नुत्वा गौतमं धर्मधुर्य : स्वपुरमविशदुद्यत्तुष्टिरागामिसिद्धिः ॥ ५७७ ॥
इस प्रकार जिसे आगामी कालमें मोक्ष होनेवाला है जिसने अपना कार्य सिद्ध कर लिया है, जो धर्मका भार धारण करनेवाला है और जिसे भारी हर्ष उत्पन्न हो रहा है ऐसा मगधपति राजा श्रेणिक, श्री वर्धमान जिनेन्द्र और गौतम गणधरकी स्तुति कर अपने नगर में प्रविष्ट हुआ ॥ ५७७ ।।
In this manner King Shrenika, the Lord of Magadha—who was destined to attain absolute liberation (moksha) in a future lifetime, who had successfully accomplished his immediate spiritual goal, who was the true bearer of the righteous path (dharma), and who was filled with immense, overflowing joy—entered his city after singing the glorious praises of Sri Vardhamana Jinendra and Gautama Ganadhara. || 577 ||
श्लोक ( Shlok ) 578
“अनुष्टुप्छन्दसा ज्ञेया ग्रन्थसङ्ख्या तु विंशतिः । सहस्त्राणां पुराणस्य व्याख्यातृश्रोतृलेखकैः ॥ ५७८ ॥
आचार्य गुणभद्र कहते हैं कि व्याख्यान करनेवाले, सुननेवाले और लिखनेवालोंको इस पुराणकी संख्या अनुष्टुप् छन्दसे बीस हजार समझनी चाहिये ।। ५.७८ ।।
Acharya Gunabhadra states that the commentators, the listeners, and the scribes should understand the total volume of this Purana (sacred epic) to be twenty thousand verses, measured in the Anushtup meter. || 578 ||
इत्यार्षे भगवद्गुणभद्राचार्यप्रणीते त्रिषष्टिलक्षणमहापुराणसंग्रहे श्रीवर्धमानस्वामिपुराणं नाम षट्सप्ततितमं पर्व ।
इस प्रकार भगवद्गुणभद्राचार्य प्रणीत, आर्ष नामसे प्रसिद्ध, त्रिषष्टिलक्षण महापुराणके संग्रहमें श्री वर्धमान स्वामीका पुराण वर्णन करनेवाला यह छिहत्तरवाँ पर्व समाप्त हुआ ।॥ ७६ ॥
Thus concludes the seventy-sixth chapter, which describes the sacred history (Purana) of Sri Vardhamana Swami, in this compilation of the Trishashti-Lakshana Mahapurana—renowned as the Aarsha—composed by the venerable Acharya Sri Gunabhadra. || 76 ||
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