नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 70- shlok 62 to 71
श्लोक ( Shlok ) 62
एवं देवगतौ दिव्यसुखं सुखमहाम्बुधेः । सम्प्राप जातसन्तृप्तिः स्थितश्चिरसुखायुषा ॥ ६२ ॥
इस प्रकार वह देव-गतिमें दिव्य सुखका अनुभव करता था, सुख रूपी महासागरसे सदा सन्तुष्ट रहता था और सुख-दायी लम्बी आयु तक वहीं विद्यमान रहा था ।। ६२ ।।
“In this manner, he experienced divine happiness in the celestial realm (deva-gati), remained ever-content in that vast ocean of bliss, and continued to reside there for the entirety of his joy-yielding, long lifespan.” [62]
श्लोक ( Shlok ) 63 – 64
यतः परं तदुद्धृतेः क्रियते वंशवर्णनम् । द्वीपे जम्बूमति क्षेत्रे भरते वत्सदेशजे ॥ ६३ ॥कौशाम्ब्याख्ये सुविख्यातो नगरे मधवा नृपः । तद्देवी वीतशोकाऽभूत्सुतः ख्यातो रघुस्तयोः ॥ ६४ ॥
अब इसके आगे वह जिस वंशमें उत्पन्न होगा उस वंशका वर्णन किया जाता है । जम्बूद्वीपके भरत क्षेत्रमें एक वत्स नामका देश है। उसकी कौशाम्बी नगरीमें अतिशय प्रसिद्ध राजा मघवा राज्य करता था । उसकी महादेवीका नाम वीतशोका था। कालक्रम से उन दोनोंके रघु नामका पुत्र हुआ ॥ ६३-६४ ।।
“Now, following this, the lineage in which he will be born is described. In the Bharat-kshetra region of Jambudvipa, there is a country named Vatsa. In its city of Kaushambi, a highly renowned king named Maghava ruled. His chief queen (Mahadevi) was named Vitashoka. In the course of time, a son named Raghu was born to them.” [63-64]
श्लोक ( Shlok ) 65 – 69
सुमुखो नाम तन्नैव जातः श्रेष्ठी महद्धिकः । इतः कलिङ्गविषये पुराद्दन्तपुराह्वयात् ॥ ६५ ॥सार्थेन सममागच्छद्वीरदत्तो वणिक्सुतः । नान्ना व्याधभयादेत्य भार्यया वनमालया ॥ ६६ ॥कौशाम्बीनगरं तत्र सुमुखाख्यं समाश्रयत् । वनमालां समालोक्य स श्रेष्ठी विहरन् वने ॥ ६७ ॥’विकाय सायकैस्तीक्ष्णैः कदाचिच्छरधीकृतः । मायावी वीररुत्तं तं पापी वाणिज्यहेतुना ॥ ६८ ॥प्राहिणोद् द्वादशाब्दानां दत्त्वा पुष्कलजीविकाम् । स्वीचकार सहाकीर्त्या वनमालां विलोमिताम् ॥ ६९ ॥
उसी नगर में एक सुमुख नामका बहुत धनी सेठ रहता था। किसी एक समय कलिङ्ग देशके दन्तपुर नामक नगर में बीरदत्त नामका वैश्य पुत्र, व्याधोंके डरके कारण अपने साथियों तथा वनमाला नामकी स्त्रीके साथ कौशाम्बी नगरीमें आया और वहाँ सुमुख सेठके आश्रयसे रहने लगा । किसी दिन सुमुख सेठ वनमें घूम रहा था कि उसकी दृष्टि वनमाला पर पड़ी। उसे देखते ही काम-देवने उसे अपने वाणोंका मानो तरकश बना लिया – वह कामदेवके वाणोंसे घायल हो गया। तदनन्तर मायाचारी पापी सेठने वीरदत्तको तो बहुत भारी आजीविका देकर बारह वर्ष के लिए व्यापारके हेतु बाहर भेज दिया और स्वयं लुभाई हुई वनमालाको अपकीर्तिके साथ स्वीकृत कर लिया-अपनी स्त्री बना लिया ।। ६५-६९ ।।
“In that very city, there lived a highly wealthy merchant (seth) named Sumukha. At one time, in the city of Dantapur in the Kalinga country, a merchant’s son named Veeradatta, fleeing from the fear of hunters, came to the city of Kaushambi along with his companions and his wife named Vanamala, and began living there under the shelter of Merchant Sumukha.
One day, while Merchant Sumukha was wandering in the forest, his gaze fell upon Vanamala. The moment he saw her, the god of love (Kamadeva) made him, as it were, a quiver for his arrows—he was deeply wounded by the arrows of love. Thereafter, the deceitful and sinful merchant granted Veeradatta a vast livelihood and sent him abroad for twelve years for the purpose of trade, while he himself, amid ill repute, took the enticed Vanamala and made her his own wife.” [65-69]
श्लोक ( Shlok ) 70 – 71
अतिवाह्यागतो वीरत्तो द्वादश वत्सरान् । तद्विक्रियां समाकर्ण्य स्मरन् संसारदुःस्थितिम् ॥ ७० ॥’शोकाकुलः सुनिर्विण्णः क्षीणपुण्यो निराश्रयः । वणिग् समग्रहीद्दीक्षां प्रोष्टिलाख्यमुनिं श्रितः ॥ ७१ ॥
बारह वर्ष विता कर जब वीरदत्त वापिस आया तब वनमालाके विकारको सुन संसारकी दुःखमय स्थितिका विचार करने लगा। अन्त में शोकसे आकुल, पुण्यहीन, आश्रयरहित, वीरदत्तने विरक्त होकर प्रोष्ठिल मुनिके पास जिन-दीक्षा धारण कर ली ॥ ७०-७१ ॥
“When Veeradatta returned after spending twelve years away and heard about Vanamala’s unfaithfulness, he began to contemplate the sorrowful state of the world. Ultimately, distressed by grief, devoid of merit, and left without any refuge, the detached Veeradatta initiated into the Jain monastic life under Muni Proshthila.” [70-71]
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