Hindi Translation of Uttar puran Parv 75
चन्दना के जन्म और परिवार का परिचय — श्लोक 1 से 12
अथानन्तर- किसी दूसरे दिन समस्त भव्य जीवोंको प्रसन्न करनेवाले और प्रकट तेजके धारक गौतम गणधर विपुलाचंलपर विराजमान थे। उनके समीप जाकर राजा श्रेणिकने समस्त आयिकाओंकी स्वामिनी चन्दना नामकी आर्यिकाकी इस जन्मसम्बन्धी कथा पूछी सो अनेक बड़ी बड़ी ऋद्धियोंको धारण करने वाले गणधर देव इस प्रकार कहने लगे ॥ १-२ ।। सिन्धु नामक देशकी वैशाली नगरीमें चेटक नामका अतिशय प्रसिद्ध, विनीत और जिनेन्द्र देवका अतिशय भक्त राजा था। उसकी रानीका नाम सुभद्रा था। उन दोनोंके दश पुत्र हुए जो कि धनदत्त, धनभद्र, उपेन्द्र, सुदत्त, सिंहभद्र, सुकुम्भोज, अकम्पन, पतङ्गक, प्रभञ्जन और प्रभास नामसे प्रसिद्ध थे तथा उत्तम क्षमा आदि दश धर्मोंके समान जान पड़ते थे ।। ३-५ ।। इन पुत्रोंके सिवाय सात ऋद्धियोंके समान सात पुत्रियां भी थीं। जिनमें सबसे बड़ी प्रियकारिणी थी, उससे छोटी मृगावती, उससे छोटी, सुप्रभा, उसप्ते छोटी प्रभावती, उसले छोटी चेलिनी, उसप्ते छोटी ज्येष्ठा और सबसे छोटी चन्दना थी। विदेह देशके कुण्डनगर में नाथ वंशके शिरोमणि एवं तीनों सिद्धियोंसे सम्पन्न राजा सिद्धार्थ राज्य करते थे। पुण्यके प्रभावले प्रियकारिणी उन्हीं की स्त्री हुई थी ।। ६-८ ॥ वत्सदेशकी कौशा-म्बीजगरी में चन्द्रवंशी राजा शतानीक रहते थे। मृगावती नामकी दूसरी पुत्री उनकी स्त्री हुई थी। ॥ ९॥ दशार्ण देशके हेमकच्छ नामक नगरके स्वामी राजा दशरथ थे जो कि सूर्यवंश रूपी आकाशके चन्द्रमाके समान जान पड़ते थे। सूर्यकी निर्मलप्रभाके समान सुमना नामकी तीसरी पुत्री उनकी रानी हुई थी, कच्छदेशकी रोरुका नामक नगरीमें उदयन नामका एक बड़ा राजा था। प्रभावती नामकी चौथी पुत्री उसीकी हृदयवल्लभा हुई थी। अच्छी तरह शीलव्रत धारण करनेसे इसका दूसरा नाम शीलवती भी प्रसिद्ध हो गया था ।। १०-१२ ।।
ज्येष्ठा का प्रसंग और चेटक की पुत्रियों के चित्र — श्लोक 13 से 25
गान्धार देशके महीपुर नगर में राजा सत्यक रहता था। उसने राजा चेटकप्ते उसकी ज्येष्ठा नामकी पुत्रीकी याचना की परन्तु राजाने नहीं दी इससे उप्त दुर्बुद्धि मूर्खने कुपित होकर रणाङ्गणमें युद्ध किया परन्तु युद्धमें वह हार गया जिसप्ते मानभङ्ग होनेसे लज्जित होनेके कारण उसने शीघ्र ही दमवर नामक मुनिराजके समीप जाकर दीक्षा धारण कर ली ।। १३-१४ ॥ तदनन्तर महाराज चेटकने स्रहके कारण सदा देखनेके लिए पट्टकपर अपनी सातों पुत्रियोंके उत्तम चित्र बनवाये । चेलिनीके चित्रमें जाँघपर एक छोटा-सा बिन्दु पड़ा हुआ था उसे देखकर राजा चेटक बनानेवालेपर बहुत कुपित हुए । चित्रकारने नम्रतासे उत्तर दिया कि हे पूज्य ! चित्र बनाते समय यहाँ बिन्दु पड़ गया था मैंने उसे यद्यपि दो तीन बार साफ किया परन्तु वह फिर-फिरकर पड़ता जाता था इसलिए मैंने अनुमानसे विचार किया कि यहाँ ऐसा चिह्न होगा ही। यह मानकर ही मैंने फिर उसे साफ नहीं किया है। चित्रकारकी बात सुनकर महाराज प्रसन्न हुए ।। १५-१८ ॥ राजा चेटक देव-पूजाके समय जिन-प्रतिमाके समीप ही अपनी पुत्रियोंका चित्रपट फैलाकर सदा पूजा किया करते थे ॥ १९ ॥ किसी एक समय राजा चेटक अपनी सेनाके साथ मगधदेशके राजगृह नगर में गये वहाँ उन्होंने नगरके बाह्य उपवनमें डेरा दिया । नान करनेके बाद उन्होंने पहले जिन-प्रतिमाओंकी पूजा की और उसके बाद समीपमें रखे हुए चित्रपटकी पूजा की। यह देखकर तूने समीपवर्ती लोगोंसे पूछा कि यह क्या है? तब उन लोगोंने कहा कि हे राजन् ! ये राजाकी सातों पुत्रियों के चित्रपट हैं इनमें से चार पुत्रियाँ तो विवाहित हो चुकी हैं परन्तु तीन अविवाहित हैं उन्हें यह अभी दे नहीं रहा है। इन तीनमें दो तो यौवनवती हैं और छोटी अभी बालिका है ! लोगोंके उक्त बचन सुनकर तूने अपने मन्त्रियोंको बतलाया कि मेरा चित्त इन दोनों पुत्रियोंमें अनुरक्त हो रहा है। मन्त्री लोग भी इस कार्यको ले कर अभयकुमारके पास जाकर बोले कि तुम्हारे पिता चेटक राजाकी दो पुत्रियोंमें अनुरक्त हैं उन्होंने वे पुत्रियाँ माँगी भी हैं परन्तु अवस्था ढल जानेके कारण वह देता नहीं है ॥ २०-२५ ।।
अभयकुमार की योजना और ज्येष्ठा का वैराग्य — श्लोक 26 से 41
यह कार्य अवश्य करना है इसलिए कोई उपाय बतलाइये । मन्त्रियोंके वचन सुनकर उस कार्य के उपाय जाननेमें चतुर अभयकुमारने कहा कि आप लोग चुप बैठिये, मैं इस कार्यको सिद्ध करता हूँ। इस प्रकार संतुष्ट कर अभयकुमारने मन्त्रियोंको बिदा किया और स्वयं एक पटियेपर राजा श्रेणिकका विलास पूर्ण चित्र बनाया। उसे वस्त्रसे ढककर बड़े यत्नसे ले गया। राजाके समीपवर्ती लोगोंको घूस दे कर उसने अपने वश कर लिया और स्वयं बोद्रक नामका व्यापारी बनकर राजा चेटकके घर में प्रवेशकिया। वहाँ वे दोनों कन्याएं वोद्रकके हाथमें स्थित पटियेपर लिखा हुआ आपका रूप देखकर आपमें प्रेम करने लगीं। कुमारने एक सुरङ्गका मार्ग पहलेसे ही तैयार करवा लिया था अतः वे कन्याएं बड़े साहसके साथ उस मार्गसे चल पड़ीं। चेलिनी कुटिल थी इसलिए कुछ दूर जानेके बाद ज्येष्ठासे बोली कि मैं आभूषण भूल आई हूँ तू जाकर उन्हें ले आ। यह कहकर उसने ज्येष्ठाको तो वापिस भेज दिया और स्वयं अभयकुमारके साथ आ गई ॥ २६-३१ ॥ जब ज्येष्ठा आभूषण ले कर लौटी तो वहाँ चेलनी तथा अभयकुमारको न पाकर बहुत दुःखी हुई और कहने लगी कि चेलिनीने मुझे इस तरह ठगा है। अन्तमें उसने अपनी मामी यशस्वती नामकी आर्यिका के पास जाकर जैन धर्मका उपदेश सुना और संसारसे विरक्त हो कर पापोंका नाश करने वाली दीक्षा धारण कर ली ॥ ३२-३३ ॥ आपने भी बड़ी प्रीतिसे विधिपूर्वक चेलनाके साथ विवाह कर उसे महादेवीका पट्ट बाँधा जिससे वह बहुत ही सन्तुष्ट हुई ।॥ ३४ ॥
इधर उत्तम व्रत धारण करने वाली चन्दनाने स्वयं यशस्वती आर्यिकाके समीप जाकर सम्यग्दर्शन और श्रावकोंके व्रत ग्रहण कर लिये ॥ ३५ ॥ किसी एक समय वह चन्दना अपने परि-बारके लोगोंके साथ अशोक नामक वनमें क्रीड़ा कर रही थी। उसी समय दैवयोगप्ते विजयार्ध पर्वतकी दक्षिण श्रेणीके सुवर्णाभ नगरका राजा मनोवेग विद्याधर अपनी मनोवेगा रानीके साथ स्वच्छन्द क्रीडा करता हुआ वहाँ से निकला और क्रीड़ा करती हुई चन्दनाको देखकर कामके द्वारा छोड़ हुए बाणोंसे जर्जरशरीर हो गया। वह शीघ्र ही अपनी स्त्रीको घर भेजकर रूपिणी विद्यासे अपना दूसरा रूप बनाकर सिंहासनपर बैठा आया और अशोक वनमें आकर तथा चन्दनाको लेकर शीघ्र ही वापिस चला गया। उधर मनोवेगा उसकी मायाको जान गई जिससे क्रोधके कारण उसके नेत्र लाल हो कर भयंकर दिखने लगे। उसने उस विद्या देवताको बायें पैरकी ठोकर देकर मार दिया जिससे वह अट्टहास करती हुई सिंहासनसे उसी समय चली गई ।। ३६-४१ ॥
चन्दना का धर्मग्रहण और मनोवेग द्वारा हरण , चन्दना का भीलों के बीच जीवन और धर्मनिष्ठा— श्लोक 42 से 51
तदनन्तर वह मनोवेगा रानी आलोकिनी नामकी विद्यासे अपने पतिकी सब चेष्टा जानकर उसके पीछे दौड़ी और आधे मार्गमें चन्दना सहित लौटते हुए पतिको देखकर बोली कि यदि अपना जीवन चाहते हो तो इसे छोड़ दो। इस प्रकार क्रोधसे उसने उसे बहुत ही डाँटा । मनोवेग अपनी स्त्रीसे बहुतही डर गया। इसलिए उसने हृदय में बहुत ही शोककर सिद्ध की हुई पर्णलध्वी नामकी विद्यासे उस चन्दनाको भूतरमण नामक बनमें ऐरावती नदीके दाहिने किनारेपर छोड़ दिया ॥ ४२-४४ ॥ पञ्च-नमस्कार मन्त्रका जप करनेमें तत्पर रहने वाली चन्दनाने वह रात्रि बड़े कष्टसे बिताई। प्रातःकाल जब सूर्यका उदय हुआ तब भाग्यवश एक कालक नामका भील वहाँ स्वयं आ पहुँचा। चंन्दनाने उसे अपने बहुमूल्य देदीप्यमान आभूषण दिये और धर्मका उपदेश भी दिया जिससे वह भील बहुत ही सन्तुष्ट हुआ। वहीं कहीं भीमकूट नामक पर्वतके पास रहनेवाला एक सिंह नामका भीलोंका राजा था, जो कि भयंकर नामक पल्लीका स्वामी था। उस कालक नामक भीलने वह चन्दना उसी सिंह राजाको सौंप दी। सिंह पापी था अतः चन्दनाको देखकर उसका हृदय कामसे मोहित हो गया ।॥ ४५-४८ ॥ वह क्रूर ग्रहके समान निग्रह कर उसे अपने आधीन करनेके लिए उद्यत हुआ। यह देख उसकी माताने उप्से समझाया कि हे पुत्र ! तू ऐसा मत कर, यह प्रत्यक्ष देवता है, यदि कुपित हो गई तो कितने ही संताप, शाप और दुःख देने वाली होगी। इस प्रकार माताके कहनेसे डरकर उसने स्वयं दुष्ट होनेपर भी वह चन्दना छोड़ दी ॥ ४९-५० ॥ तदनन्तर चन्दनाने उस भीलकी माताके साथ निश्चिन्त होकर कुछ काल वहीं पर व्यतीत किया। वहाँ भीलकी माता उसका अच्छी तरह भरण-पोषण करती थी ।। ५१ ॥
सेठ के घर चन्दना की परीक्षा और सहनशीलता — श्लोक 52 से 63
अथानम्तर-वत्स देशके कौशाम्बी नामक श्रेष्ठ नगरमें एक वृषभसेन नामका सेठ रहता था। उसके मित्रवीर नामका एक कर्मचारी था जो कि उस भीलराज का मित्र था। भीलोंके राजाने वह चन्दना उस मित्रवीरके लिए दे दी और मित्रवीरने भी बहुत भारी धनके साथ भक्तिपूर्वक वह चन्दना अपने सेठके लिए सौंप दी। किसी एक दिन वह चन्दना उस सेठके लिए जल पिला रही थी उस समय उसके केशोंका कलाप छूट गया था और जलसे भीगा हुआ पृथिवीपर लटक रहा था उसे वह बड़े यत्नसे एक हाथसे संभाल रही थी ।। ५२-५५ ।। सेठकी स्त्री भद्रा नामक सेठानीने जब चन्दनाका वह रूप देखा तो वह शङ्कासे भर गई। उसने मनमें समझा कि हमारे पतिका इसके साथ सम्पर्क है। ऐसा मानकर वह बहुत ही कुपित हुई। क्रोधके कारण उसके भोंठ काँपने लगे । उस दुष्टाने चन्दनाको साँकलसे बाँध दिया तथा खराब भोजन और ताइन मारण आदिके द्वारा वह उसे निरन्तर कष्ट पहुँचाने लगी। परन्तु चन्दना यही विचार करती थी कि यह सब मेरे द्वारा किये हुए पाप-कर्मका फल है यह वेचारी सेठानी क्या कर सकती है? ऐसा विचारकर वह निरन्तरआत्मनिन्दा करती रहती थी। उसने यह सब समाचार अपनी बड़ी बहिन मृगावती के लिए भी कहलाकर नहीं भेजे थे ।। ५६-५९ ।।
तदनन्तर किसी दूसरे दिन भगवान् महावीर स्वामीने आहारके लिए उसी नगरी में प्रवेश किया। उन्हें देख चन्दना बड़ी भक्तिसे आगे बढ़ी। आते बढ़ते ही उसकी साँकल टूट गई और आभरणोंसे उसका सब शरीर सुन्दर दिखने लगा। उन्हीं के भारसे मानो उसने झुककर शिरसे पृथिवी तलका स्पर्श किया, उन्हें नमस्कार किया और विधिपूर्वक पुडगाह कर उन्हें भोजन कराया । इस आहार दानके प्रभावसे वह मानिनी बहुत ही सन्तुष्ट हुई, देवांने उसका सन्मान किया, रत्नधारा की वृष्टि की, सुगन्धित फूल बरसाये, देव-दुन्दुभियांका शब्द हुआ और दानकी स्तुतिकी घोषणा होने लगी सो ठीक ही है क्योंकि उत्कृष्ट पुण्य अपने बड़े भारी फल तत्काल ही फलते हैं ।। ६०-६३ ।।
भगवान महावीर को आहारदान और चन्दना की मुक्ति , चन्दना के पूर्वजन्म का प्रारंभिक प्रसंग — श्लोक 64 से 72
तदनन्तर चन्दनाकी बड़ी वहिन मृगावती यह समाचार जानकर उसी समय अपने पुत्र उद्यनके साथ उसके समीप आई और स्नेहसे उसका आलिङ्गन कर पिछला समाचार पूछने लगी तथा सब पिछला समाचार सुनकर बहुत ही व्याकुल हुई। तदनन्तर रानी मृगावती उसे अपने घर ले जाकर सुखी हुई। यह देख भद्रा सेठानी और वृपभप्लेन सेठ दोनों ही भयसे धबड़ाये और मृगावतीके चरणोंकी शरणमें आये। दयालु रानीने उन दोनोंसे चन्दना के चरण-कमलोंमें प्रणाम कराया ।। ६४-६६ ।। चन्दना के क्षमाकर देनेपर वे दोनों बहुत ही प्रसन्न हुए और कहने लगे कि यह मानो मूर्तिमती क्षमा ही है। इस समाचार के सुननेसे उत्पन्न हुए स्नेहकं कारण चन्दनाके भाई-बन्धु भी उसके पास आ गये। उसी नगर में सबलोग महावीर स्वामीकी वन्दना के लिए गये थे, चन्दना भी गई थी, वहाँ वैराग्य उत्पन्न होनेसे उसने अपने सत्र भाई-बन्धुओंको छोड़कर दीक्षा धारण कर ली और तपञ्चरण तथा सम्यग्ज्ञानके माहात्म्यसे उसने उसी समय गणिनीका पद प्राप्त कर लिया। इस प्रकार चन्दना वर्तमानके भवकी बात सुनकर राजा चेटकने फिर प्रभ किया कि चन्दना पूर्व जन्ममें ऐसा कौन-सा काये करके यहाँ आई है। इसके उत्तर में गणधर भगवान् कहने लगे-इसी मगध देशमें एक वत्सा नामकी विशाल नगरी है। राजा प्रसेनिक उसमें राज्य करता था। उसी नगरीमें एक अग्निमित्र नामका ब्राह्मण रहता था। उसकी दो स्त्रियाँ थीं एक ब्राह्मणी और दूसरी वैश्यकी पुत्री । ब्राह्मणी के शिवभूति नामका पुत्र हुआ और वैश्य पुत्रीके चित्रसेना नामकी लड़कीउत्पन्न हुई ।। ६७-७२ ॥
मिथ्या आरोप, वैर और कर्म का संबंध — श्लोक 73 से 81
शित्रभूनिकी स्त्रीका नाम सोमिला था जो कि सामशर्मा ब्राह्मणकी पुत्री थी और उसी नगरने एक देवशर्मा नामका ब्राह्मण-पुत्र था उसे चित्रसेना व्याही गई थी ॥ ७३ ॥ किनने ही दिन बाद जत्र अग्निभूति ब्राह्मण मर गया तब उसके स्थानपर उसका पुत्र शिवभूति ब्राह्मण अधिरूढ हुआ। इधर चित्रसेना विधवा हो गई इसलिए अपने पुत्रोंके साथ शिवभूतिके घर आकर रहने लगी सो ठीक ही है क्योंकि कर्मोंकी गति बड़ी टेढ़ी है। शिवभूति, अपनी बहिन चित्रसेना और उसके पुत्रोंका जो भरण-पोषण करता था वह पापिनी सांमिलाको सह्य नहीं हुआ। इसलिए शिवभूतिने उसे ताड़ना दी तब उसने क्रोधित होकर मिथ्या दोप लगाया कि यह मेरा भा चित्रमेनाके साथ जीवित रहता है अर्थात् इसका उसके साथ अनुराग है। यहाँ आचार्य कहते हैं कि स्त्रियोंको कोई भी कार्य अकार्य नहीं है अर्थान् वे बुरासे बुरा कार्य कर सकती हैं इसलिए इन स्त्रियोंको बार-बार धिक्कार हो । चित्रसेनाने भी क्रोधमें आकर निदान किया कि इसने मुझे मिध्या दोप लगाया है। इसलिए मैं मरनेके बाद इसका निग्रह करूंगी – बदला लूँगी। तदनन्तर किसी एक दिन सोमिलाने शिवगुप्त नामक मुनिराजको पड़गाकर आहार दिया जिससे शिवभूतिने सोमिलाके प्रति बहुत ही क्रोध प्रकट किया परन्तु उन मुनिराजका माहात्म्य कह कर सोमिलाने शिवभूतिको प्रसन्न कर लिया और उसने भी उस दानकी अच्छी तरह अनुमोदना की। समय पाकर वह शिवभूति मरा और अत्यन्त रमणीय वङ्ग देशके कान्तपुर नगर में वहाँ के राजा सुवर्णवर्मा तथा रानी विद्यल्लेखाके महाबल नामका पुत्र हुआ ।। ७४-८१ ॥
महाबल और कनकलता का अनुचित संबंध , महाबल और कनकलता की मृत्यु —श्लोक 82 से 94
इसी भरतक्षेत्रके अङ्ग देशकी चम्पा नगरी में राजा श्रीषेण राज्य करते थे। इनकी रानीका नाम धनश्री था, यह धनश्री कान्तपुर नगरके राजा सुवर्णवर्माकी बहिन थी। सोमिला उन दोनोंके कनकलता नामकी पुत्री हुई। जब यह उत्पन्न हुई थी तभी इसके माता-पिताने बड़े हर्षसे अपने आप यह निश्चय कर लिया था कि यह पुत्री महाबल कुमारके लिए देनी चाहिये और उसके माता-पिताने भी यह स्वीकृत कर लिया था। महायलका लालन-पालन भी इसी चम्पा नगरी में मामा के घर बालिका कनकलता के साथ होता था । जय वह क्रमसे वृद्धिको प्राप्त हुआ और यौवनका समय निकट आ गया तब मामाने कहा कि जचतक तुम्हारे विवाहका समय आता है तबतक तुम यहाँ से पृथक् रहो। मामाके यह कहने से महाबल यद्यपि बाहर रहने लगा तो भी वह कन्या में सदा आसक्त रहता था। वे दोनों ही कामकी अवस्था को सह नहीं सके इसलिए उन दोनोंका समागम हो गया ।। ८२-८६ ।। इस कार्यसे वे दोनों स्वयंही लज्जित हुए और कान्तपुर नगरको चले गये । उन्हें देख, महाबलके माता-पिताने बड़े शोकसे कहा कि चूंकि तुम दोनों विरुद्ध आचरण करने वाले हो अतः हम लोगों को अच्छे नहीं लगते। अब तुम किसी दूसरे देशमें चले जाओ यहाँ मत रहो । माता-पिताके ऐसा कहनेपर वे उसी समय वहाँ से चले गये और प्रत्यन्तनगर में जाकर रहने लगे। किसी एक दिन वे दोनों उद्यानमें विहार कर रहे थे कि उनकी दृष्टि मुनिगुप्त नामक मुनिराजपर पड़ी। वे मुनिराज भिक्षाकी तलाशमें थे । महाबल और कनकलताने भक्तिपूर्वक उनके दर्शन किये, उठकर प्रदक्षिणा दी, नमस्कार किया और विधिपूर्वक पूजा की। तदनन्तर उन दोनोंने अपने उपयोगके लिए तैयार किये हुए लड्डू आदि मिष्ट खाद्य पदार्थ, हर्ष पूर्वक उन मुनिराजके लिए दिये जिससे उन्होंने जिनेन्द्र भगवान्के द्वारा कहा हुआ इच्छित नव प्रकारका पुण्य संचित किया। किसी एक दिन महाबल कुमार मधुमास-चैत्रमासमें वनमें घूम रहा था वहाँ एक विषैले साँपने उसे काट खाया जिससे वह शीघ्र ही मर गया। पतिको शरीर मात्र (मृत) देखकर उसकी स्त्री कनकलताने उसीकी तलवारसे आत्मघात कर लिया मानो उसे खोजनेके लिए उसीकी पीछे ही चल पड़ी हो। आचार्य कहते हैं कि जो स्रह अन्तिम सीमाको प्राप्त हो जाता है उसकी ऐसी ही दशा होती है ।। ८७-९४ ॥
नागदत्त का जन्म और विद्या-अध्ययन — श्लोक 95 से 101
इसी भरत क्षेत्रके अवन्ति देशमें एक उज्जयिनी नामका नगर है। प्रजापति महाराज उसका अनायास ही पालन करते थे ॥ ९५ ॥ उसी नगर में धनदेव नामका एक सेठ रहता था। उसकी धन-मित्रा नामकी पतिव्रता सेठानी थी। महाबलका जीव उन दोनोंके नागदत्त नामका पुत्र हुआ ॥ ९६ ॥ इन्हीं दोनोंके अर्थस्वामिनी नामकी एक पुत्री थी जो कि नागदत्तकी छोटी बहिन थी। पलाश द्वीपके मध्यमें स्थित पलाश नगर में राजा महाबल राज्य करता था। कनकलता, इसी महाबल राजाकी काञ्चनलता नामकी रानीसे पद्मलता नामकी प्रसिद्ध पुत्री हुई ॥ ९७-९८ ॥ किसी एक समय उज्जयिनी नगरीके सेठ धनदेवने दूसरी स्त्रीके साथ विवाहकर पहिली स्त्री धनमित्राको छोड़ दिया इसलिए वह अपने पुत्रसहित देशान्तर चली गई। एक समय ज्ञान उत्पन्न होनेपर उसने शील-दत्त गुरुके पास श्रावकके व्रत प्रहण किये और शास्त्रोंका अभ्यास करनेके लिए अपना पुत्र उन्हीं मुनिराजको सौंप दिया ।। ९९-१००।। समय पाकर वह पुत्र भी अपनी बुद्धिरूपी नौकाके द्वारा शास्त्र रूपी समुद्रको पार कर गया। वह उत्तम कवि हुआ और शास्त्रोंकी व्याख्यासे सुयश प्राप्त करने लगा ।। १०१ ।।
नागदत्त की विद्वत्ता और यश — श्लोक 102 से 113
वह नाना अलंकारोंसे मनोहर वचनों तथा प्रसादगुण पूर्ण सुभाषितोंसे विशिष्टमनुष्योंके हृदयों में आह्लाद उत्पन्न कर देता था ।॥ १०२ ॥ वहाँ के कोटपालके पुत्र दृढरक्षके साथ मित्रताकर उसने उस नगरके शिष्ट मनुष्योंको शास्त्रोंकी व्याख्या सुनाई जिससे उपाध्याय पद प्राप्तकर बहुत-सा धन कमाया तथा अपनी माता, बहिन और अपने आपको पोषण किया ॥ १०३-१०४ ॥ नन्दी नामक गाँवमें रहने वाले कुलवाणिज नामके अपनी मामीके पुत्रके साथ उसने बड़े आदरसे अपनी छोटी बहिनका विवाह कर दिया ॥ १०५ ॥ किसी एक दिन उसने बहुतसे श्लोक सुनाकर राजाके दर्शन किये और राजाकी प्रसन्नतासे बहुत भारी सम्मान, धन तथा हर्ष प्राप्त किया ॥ १०६ ॥ किसी एक दिन मातासे पूछकर वह अपने पिताके पास आया और उनके चरण-कमलोंको प्रणामकर खड़ा हो गया। सेठ धनदेवने उसे देखकर ‘हे पुत्र चिरंजीव रहो, यहाँ बैठो’ इत्यादि प्रिय वचन कहकर उसे सन्तुष्ट किया। तदनन्तर नागदत्तने अपने भागकी रत्नादि वस्तुएं माँगी ॥ १०७-१०८।। इसके उत्तर में पिताने कहा कि ‘हे पुत्र मेरी सब वस्तुएं पलाशद्वीपके मध्यमें स्थित पलाश नामक नगर में रखी हैं सो तू लाकर ले ले’। पिताके ऐसा कहनेपर वह अपने हिस्सेदार नकुल और सहदेव नामक भाइयोंके साथ नावपर बैठकर समुद्रके भीतर चला। चलते समय उसने यह आकांक्षा प्रकट की कि यदि मेरी इष्टसिद्धि हो गई तो मैं लौटकर जिनेन्द्रदेवकी पूजा करूँगा। ऐसी इच्छाकर उसने बार-बार जिनेन्द्र भगवान्की स्तुति की और पिताको नमस्कारकर चला। वह चलकर शीघ्र ही पलाशपुर नगरमें जा पहुँचा। वहाँ उसने अपना जहाज खड़ाकर देखा कि यह नगर मनुष्यों के संचारसे रहित है। यह देख वह आश्चर्य करने लगा कि यह नगर ऐसा क्यों है ? तदनन्तर लम्बी रस्सी फेंककर उनके आशयसे वह उस नगरके भीतर पहुँचा ।। १०९-११३ ॥
पलाश नगर और पद्मलता का प्रसंग — श्लोक 114 से 122
नगरके भीतर प्रवेशकर उसने एक जगह अकेली बैठी हुई एक कन्याको देखा और उससे पूछा कि यह नगर ऐसा क्यों हो गया है ? तथा तू स्वयं कौन है ? सो कह। इसके उत्तर में वह कन्या आदरके साथ कहने लगी कि ‘पहले इस नगरके स्वामीका कोई भागीदार था जो अत्यन्त क्रोधी था और राक्षस विद्या सिद्ध होनेके कारण ‘राक्षस’ इस नामको ही प्राप्त हो गया था। उसीने क्रोधवश नगरको और नगरके राजाको समूल नष्ट कर दिया था। तदनन्तर उसके वंशमें होने वाले किसी पुरुषने मन्त्र-पूर्वक तलवार सिद्ध की थी और उसी तलवारके प्रभावसे उसने इस नगरको सुरक्षित कर फिरसेबसाया है ।। ११४-११७ ।। इस समय इस नगरका राजा महाबल है और उसकी रानीका नाम काश्चनलता है। मैं इन्हीं दोनोंकी पद्मलता नामकी पुत्री हुई थी ॥ ११८ ॥ मेरा पिता उस मंत्र-साधित तलवारको कभी भी अपने हाथसे अलग नहीं करता था परन्तु प्रमादसे एक बार उसे अलग रख दिया और छिद्र देखकर राक्षसने उसे मार डाला जिससे यह नगर फिरसे सूना हो गया है। उसने मुझे अपनी पुत्रीके समान माना अतः वह मुझे बिना मारे ही चला गया। अब वह मुझे लेनेके लिए फिर आवेगा’। कन्याकी बात सुनकर वह वैश्य उस तलवारको लेकर नगरके गोपुर (मुख्य द्वार) में जा छिपा और जच वह विद्याधर आया तब उसे मार दिया। वह विद्याधर भी उसी समय पञ्चनमस्कार मन्त्रका पाठ करता हुआ चित्त स्थिरकर पृथिवीपर गिर पड़ा ॥ ११९-१२२ ।।
क्रोध के दुष्परिणाम और विद्याधर का पश्चात्ताप — श्लोक 123 से 135
पञ्चनमस्कार पदको सुनकर नागदत्त विचार करने लगा कि हाय, मैंने यह सत्र पाप व्यर्थ ही किया है। उसने झट अपनी तलवार फेंक दी और उस घाव लगे विद्याधरसे पूछा कि तेरा धर्म क्या है ? इसके उत्तर में विद्याधरने कहा कि, मैं भी श्रावकका पुत्र हूँ, मैंने यह कार्य क्रोधसे ही किया है ।। १२३-१२४ ॥ देखो क्रोधसे मित्र शत्रु हो जाता है, क्रोधसे धर्म नष्ट हो जाना है, क्रोधसे राज्य भ्रष्ट हो जाता है और क्रोधसे प्राण तक छूट जाते हैं। क्रोधसे माता भी क्रोध करने लगती है और क्रोधसे अधोगति होती है इसलिए कल्याणकी इच्छा करनेवाले पुरुषोंको सदाके लिए क्रोध करना छोड़ देना चाहिये ऐसा जिनेन्द्र भगवान्ने कहा है। मैं जानता हुआ भी क्रोधके वशीभूत हो गया था सो उसका फल मैंने अभी प्राप्त कर लिया अब परलोककी बान क्या कहना है ? इस प्रकार अपनी निन्दा करता हुआ वह विद्याधर नागदत्तसे बोला कि आप यहाँ कहाँ से आये हैं। इसके उत्तरमें वैश्यने कहा कि मैं एक पाहुना है और इस कन्याको शोकसे विह्वल देखकर तेरे भयसे इसकी रक्षा करनेके लिए यह पराक्रम कर बैठा हूँ ।। १२५-१२९ ।। तू ‘धर्म भक्त है’ यह जाने बिना ही मैं यह ऐसा कार्य कर बैठा हूँ और मैंने जिनेन्द्रदेवके शासनमें कहे हुए सारभूत धर्म-वात्सल्यको छोड़ दिया है ।। १३० ।। हे भव्य ! जैन शासनकी मर्यादाका उल्लङ्घन करने वाले मेरे इस अपराधको तू क्षमा कर। नागदत्तकी कही हुई यह सब समझकर वह विद्याधर कहने लगाकि इसमें आपने क्या किया है यह मेरे ही पूर्वोपार्जित कर्मका विशिष्ट उदय है। इस प्रकार नागदत्तके द्वारा कहे हुए पश्चनमस्कार मन्त्रकी भावना करता हुआ विद्याधर स्वर्गको प्राप्त हुआ । तदनन्तर पद्मलता कन्या और पिता के कमाये हुए धनको खींचने की रस्सीसे उतारकर जहाजपर पहुँचाया तथा सहदेव और नकुल भाईको भी जहाजपर पहुँचाया। नकुल और सहदेवने जहाजपर पहुँचकर पाप बुद्धिसे खींचनेकी वह रस्सी नागदत्तको नहीं दी और दोनों भाई अकेले ही उस नगरसे चलकर शीघ्र ही अपने नगर जा पहुँचे सो ठीक ही है क्योंकि छिद्र पाकर ऐसा कौन-सा कार्य है जिसे दायाद-भागीदार न कर सकें ॥ १३१-१३५ ॥
नागदत्त का संकट और धर्मात्मा विद्याधर की सहायता —श्लोक 136 से 150
उन दोनों भाइयोंको देखकर वहाँ के राजा तथा अन्य लोगों को कुछ शङ्का हुई और इसीलिए उन सबने पूछा कि तुम दोनोंके साथ नागदत्त भी तो गया था वह क्यों नहीं आया ? इसके उत्तर में उन्होंने कहा कि यद्यपि नागदत्त हमलोगोंके साथ ही गया था परन्तु वह वहाँ जाकर कहीं अन्यत्र चला गया इसलिए हम उसका हाल नहीं जानते हैं। इस प्रकार उन दोनोंने भाई होकर भी नागदत्तके छोड़नेकी बात छिपा ली ॥१३६-१३७। पुत्रके न आनेकी बात सुनकर नागदत्तकी माता बहुत व्याकुल हुई और उसने श्री शीलदत्त गुरुके पास जाकर अपने पुत्रकी कथा पूछी ।। १३८ ।। उसकी व्याकुलता देख मुनिराजका हृदय द्यासे भर आया अतः उन्होंने सम्यग्ज्ञान रूपी नेत्रसे देखकर उसे आश्वासन दिया कि तू डर मत, तेरा पुत्र किसी विघ्नके विना शीघ्र ही आवेगा। इधर नागदत्तने एक जिन मन्दिर देखकर उसकी कुछ प्रद-क्षिणा दी और मैं यहाँ बैठूंगा इस विचारसे उसके भीतर प्रवेश किया। भीतर जाकर उसने भगवान्की स्तुति पढ़ी और फिर चिन्तातुर हो कर वह वहीं बैठ गया ॥ १३९-१४१ ॥ दैवयोगसे वहीं पर एक जैनी विद्याधर आ निकला। नागदत्तको देखकर उसने उसके सब समाचार मालूम किये और फिर उसे धन सहित इस द्वीपके मध्यसे निकालकर मनोहर नामके वनमें जा उतारा । तदनन्तर उसे वहाँ अच्छी तरह ठहराकर और बड़े आदरसे पूछकर वह विद्याधर अपने इच्छित स्थानपर चला गया सो ठीक ही है क्योंकि सत्पुरुषोंकी धर्म-वत्सलता यही कहलाती है ॥१४२-१४३।।
उस मनोहर वनके समीप ही नन्दीभाममें नागदत्तकी छोटी बहिन रहती थी इसलिए बह वहाँ पहुँचा और अपना सब धन उसके पास रखकर अच्छी तरह रहने लगा ।। १४४ ।। कुछ समय वाद उसकी बहिनके ससुर आदि बड़े स्नेहसे नागदत्तके पास आकर कहने लगे कि हे कुमार ! नई आई हुई कन्याको सेठ अपने नकुल पुत्रके लिए महण करना चाहता है इसलिए उसने हम सबको बुलाया है परन्तु निर्धन होनेसे हम सब खाली हाथ वहाँ कैसे जायेंगे ? यह विचारकर हम सभीलोग आज अत्यन्त व्याकुलचित्त हो रहे हैं। उनकी बात सुनकर नागदत्तने अपने रत्नों के समूहमेंसे निकालकर अच्छे-अच्छे अनेक रत्न प्रसन्नतासे उन्हें दिये और साथ ही यह कहकर एक रत्नमयी अंगूठी भी दी कि तुम मेरे आनेकी खबर देकर उस कन्याके लिए यह अंगूठी दे देना ! यही नहीं, नागदत्त, स्वयं भी उनके साथ गया। वहाँ जाकर उसने पहले शीलत मुनिराजकी वन्दना की । तदनन्तर अपने मित्र कोतवालके पुत्र दृढरक्षके पास पहुँचा। वहाँ उसने प्रारम्भसे लेकर सब कथा दृढरक्षको कह सुनाई। फिर उसीके साथ जाकर अच्छे-अच्छे रत्नोंकी भेंट देकर बड़ी प्रसन्नता से राजाके दर्शन किये ।। १४५-१५० ॥
नागदत्त की प्रतिष्ठा और पुण्य का प्रभाव — श्लोक 151 से 162
उसे देखकर महाराजने पूछा कि अहो नागदत्त ! तुम कहाँ से आ रहे हो और कहाँ चले गये थे ? राजाकी बात सुनकर नागदत्त बड़ा संतुष्ट हुआ। उसने अपना हिस्सा मांगने और उसके लिए यात्रा करने आदिके सब समचार आदिसे लेकर अन्ततक कह सुनाये। उन्हें सुनकर राजा बहुत ही कुपित हुआ और सेठका निग्रह करनेके लिए तैयार हो गया परन्तु ऐसा करना उचित नहीं है यह कह कर आग्रहपूर्वक नागदत्तने राजाको मना कर दिया । राजाने बहुत-सा अच्छा धन देकर नागदत्तको सेठका पद दिया और विधिपूर्वक विवाहकर वह पद्मलता कन्या भी उसे सौंप दी। तदनन्तर राजाने अपनी सभामें स्पष्ट रूपसे कहा कि देखो, पुण्यका कैसा माहात्म्य है ? यह नागदत्त राक्षस आदि अनेक विन्नोंसे बचकर और श्रेष्ठ रत्नोंको अपने आधीन कर सुखपूर्वक यहाँ आ गया है ।॥१५१-१५५ ।। इसलिए कहना पड़ता है कि पुण्यसे अग्नि जल हो जाती है, पुण्यसे विष भी अमृत हो जाता है, पुण्यसे शत्रु भी मित्र हो जाते हैं, पुण्यसे सब प्रकारके भय शान्त हो जाते हैं, पुण्यसे निर्धन मनुष्य भी धनवान् हो जाते हैं और पुण्यसे स्वर्ग भी प्राप्त होता है इसलिए आपत्तिरहित सम्पदाकी इच्छा करने वाले पुरुषोंको श्रीजिनेन्द्रदेवके कहे हुए धर्मशास्त्र के अनुसार सब क्रियाएं कर पुण्यका बन्ध करना चाहिये ! राजाका यह उपदेश सभाके सब लोगोंने अपने हृदय में धारण किया ॥ १५६-१५८ ॥ तदनन्तर सेठको भी बहुत पश्चात्ताप हुआ वह उसी समय ‘हे कुमार ! क्षमा करो’ यह कहकर अपने अन्य पुत्रों तथा श्री सहित प्रणाम करने लगा परन्तु नागदत्तने उसे ऐसा नहीं करने दिया और उठाकर प्रिय वचनोंसे उसे सन्तुष्ट कर दिया । तदनन्तर उस बुद्धिमान्ने यात्राके पहले कही हुई जिनेन्द्र भगवान्की पूजा की ॥ १५९-१६० ।। इस प्रकार सबने श्रावकका उत्तम धर्म स्वीकृत किया, सबके हृदयों में परस्पर मित्रता हो गई और दान पूजा आदि उत्तम कार्योंसे सबका समय व्यतीत होने लगा। आयुके अन्त में नागदत्तने संन्यास पूर्वक प्राण छोड़े जिससे वह सौधर्म स्वर्गमें बड़ा देव हुआ ॥ १६१-१६२ ॥
मनोवेग का जन्म और चन्दना के प्रति आसक्ति — श्लोक 163 से 171
स्वर्गके श्रेष्ठ भोगोंका उपभोगकर वह वहाँसे च्युत हुआ और इसी भरत क्षेत्रके विजयार्ध पर्वत पर शिवंकर नगर में विद्याधरोंके स्वामी राजा पवनवेगकी रानी सुवेगासे यह अत्यन्त सुखी मनोवेग नामका पुत्र हुआ है। दूसरे जन्मके बढ़ते हुए स्नेहसे विवश होकर ही इसने चन्दनाका हरण किया था सो ठीक ही है क्योंकि भारी स्नेह कुमागमें ले ही जाता है ॥ १६३-१६५ ॥ यह निकटभव्य है और इसी जन्ममें दिगम्बर मुद्रा धारणकर मोक्ष पद प्राप्त करेगा ॥ १६६ ॥ नागदत्तकी छोटी बहिन अर्थस्वामिनी स्वर्गलोकते आकर यहाँ महाकान्तिको धारण करने वाली मनोवेगा हुई है ॥ १६७ ॥ जो विद्याधर पलाशनगरमें नागदत्तके हाथसे मारा गया था वह स्वर्गसे आकर तू सोमवंशमें राजा चेटक हुआ है ॥ १६८ ॥ धनभित्रा नामकी जो नागदत्तकी माता थी वह स्वर्ग गई थी और वहाँ से च्युत होकर मनको प्रिय लगनेवाली वह तेरी सुभद्रा रानी हुई है ॥ १६९ ॥ जो नागदत्तकी स्त्री पद्मलता थी वह अनेक उपवासकर स्वर्ग गई थी और वहाँ से आकर यह चन्दना नामकी तेरी पुत्री हुई है ॥ १७० ॥ नकुल संसारमें भ्रमणकर सिंह नामका भील हुआ है उसने पूर्व जन्मके स्नेह और वैरके कारण ही चन्दनाको तंग किया था ।। १७१ ॥
पूर्वजन्म के वैर और वर्तमान जन्म के संबंध , संसार के दुःख और मोक्षमार्ग — श्लोक 172 से 181
सहदेव भी संसारमें चिरकाल तक भ्रमणकर कौशाम्बी नगरीमें मित्रवीर नामका बुद्धिमान् वैश्यपुत्र हुआ है जो कि वृषभसेनका सेवक है और उसीने यह चन्दना वृषभसेन सेठके लिए समर्पित की थी। नागदत्तका पिता सेठ धन-देव शान्तचित्तसे मरकर स्वर्ग गया था और वहाँ से आकर कौशाम्बी नगरीमें अनेक गुणोंसे युक्त श्रीमान् वृषभसेन नामका सेठ हुआ है ॥ १७२-१७४ ॥ चित्रसेनाने सोमिलासे द्वेष किया था इसलिए वह चिरकालतक संसारमें भ्रमण करती रही। तदनन्तर कुछ शान्त हुई तो कौशाम्बी नगरी में वैश्यपुत्री हुई और भद्रा नामसे प्रसिद्ध होकर वृषभसेनकी पत्नी हुई है। निदानके समय जो उसने वैर किया था उसीसे उसने चन्दनाका निग्रह किया था उसे कष्ट दिया था ।। १७५-१७६ ।। यह चन्दना अच्युत स्वर्ग जायगी और वहाँ से वापिस आकर शुभ कर्मके उदयसे पुंवेदको पाकरअवश्य ही परमात्मपद – मोक्षपद प्राप्त करेगी ॥ १७७ ॥ इस प्रकार बन्धके साधनोंमें जो मिध्यादर्शन आदि पाँच प्रकारके भाव कहे गये हैं उनके निमित्तसे संचित हुए कर्मों के द्वारा ये जीव द्रव्य क्षेत्र आदि परिवर्तनोंको प्राप्त होते रहते हैं। ये पाँच प्रकारके परिवर्तन ही संसारमें सबसे भयंकर दुःख हैं । खेदकी बात है. कि ये प्राणी निरन्तर इन्हीं पञ्च प्रकारके दुःखोंको पाते हुए यम-राजके मुंहमें जा पड़ते हैं ।॥ १७८-१७९ ॥ फिर ये ही जीव, काललब्धि आदिका निमित्त पाकर सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यक्चारित्र और सम्यक्तप रूप मोक्षके उत्कृष्ट साधन पाकर पुण्य कर्म करते हुए सात परमस्थानोंमें परम ऐश्वर्यको प्राप्त होते हैं और यथा क्रमसे अनन्त सुखके भाजन होते हैं ।। १८०-१८१ ।।
जीवन्धर मुनिराज का परिचय और विजया के स्वप्न — श्लोक 182 से 193
इस प्रकार वह सब सभा गौतम स्वामीकी पुण्य रूपी लक्ष्मीसे युक्त ध्वनि रूपी रसायनसे उसी समय अजर-अमरके समान हो गई ।। १८२ ।।
अथानन्तर-किसी दूसरे दिन महाराज श्रेणिक गन्धकुटी के बाहर देदीप्यभान चारों वनों में बड़े प्रेमसे घूम रहे थे। वहीं पर एक अशोक वृक्षके नीचे जीवन्धर मुनिराज ध्यानारूढ हो कर विराजमान थे। महाराज श्रेणिक उन्हें देखकर उनके रूप आदिमें आसक्तचित्त हो गये और कौतुकके साथ भीतर जाकर उन्होंने सुधर्म गणधरदेवकी बड़ी भक्तिप्ते पूजा वन्दना की तथा यथायोग्य स्थानपर बैठ हाथ जोड़कर बड़ी विनयसे उनसे पूछा कि हे भगवन् ! जो मानो आज ही समस्त कर्मोंसे मुक्त हो जायेंगे ऐसे ये मुनिराज कौन हैं १ ॥ १८३-१८६ ॥ इसके उत्तर में चार ज्ञानके धारक सुधर्माचार्य निम्न प्रकार कहने लगे सो ठीक ही है क्योंकि सज्जनोंके चरित्रको कहने वाले और सुनने वाले-दोनोंके ही चित्त में खेद नहीं होता है ।। १८७ ॥ वे कहने लगे कि हे श्रेणिक ! सुन, इसी जम्बू वृक्षप्ते सुशोभित होने वाली पृथिवीपर एक हेमाङ्गद नामका देश है और उसमें राजपुर नामका एक शोभायमान नगर है। उसमें चन्द्रमाके समान सबको आनन्दित्त करने वाला सत्यन्धर नामका राजा था और दूसरी विजयलक्ष्मीके समान विजया नामकी उसकी रानी थी ॥ १८८-१८९ ।। उसी राजाके सब कामोंमें निपुण काष्ठाङ्गारिक नामका मन्त्री था और दैवजन्य उपद्रवोंको नष्ट करने बाला रुद्रदत्त नामका पुरोहित था ॥ १९० ॥ किसी एक दिन विजया रानी घरके भीतर सुखसे सो रही थी वहाँ उसने बड़ी प्रसन्नतासे रात्रिके पिछले पहर में दो स्वप्न देखे । पहला स्वप्न देखा किराजाने सुवर्णके आठ घंटोंसे सुशोभित अपना मुकुट मेरे लिए दे दिया है और दूसरा स्वप्न देखा कि मैं अशोक वृक्षके नीचे बैठी हूँ परन्तु उस अशोक वृत्तकी जड़ किसीने कुल्हाड़ीसे काट डाली है और उसके स्थानपर एक लोटा अशोकका वृत्त उत्पन्न हो गया है। स्वप्न देखकर उनका फल जाननेके लिए वह राजाके पास गई ॥ १९१-१९३ ।।
गन्धोत्कट सेठ को दीर्घायु पुत्र की भविष्यवाणी —श्लोक 194 से 201
और बड़ी बिनयके साथ राजाके वर्शन कर स्नप्नोंका फल पूछने लगी। इसके उत्तर में राजाने कहा कि तू मेरे मरनेके बाद शीघ्र ही ऐसा पुत्र प्राप्त केरेगी जो आठ लाभोंको पाकर अन्त में पृथिवीका भोक्ता होगा। स्वप्नोंका प्रिय और अप्रिय फल सुनकर रानीका चित्र शोक तथा दुःखसे भर गया। उसकी व्यग्रता देख राजाने उसे अच्छे शब्दोसे संतुष्ट कर दिया। तदनन्तर दोनोंका काल सुखसे व्यतीत होने लगा। इसके बाद किसी पुण्यात्मा देवा जीव स्वर्गसे च्युत होकर रानीके गर्भरूपी गृहमें आया और इस प्रकार सुखसे रहने लगा जिस प्रकार कि शरदऋतुके कमलोंके सरोवरमें राजहंस रहता है ।। १९४-१९७ ।।
अथानन्तर किसी दूसरे दिन उसी नगर में रहनेवाले गन्धोत्कट नामके धनी सेठने मनोहर नामक उद्यानमें तीन ज्ञानके धारी शीलगुप्त नामक मुनिराजके दर्शनकर विनयसे उन्हें नमस्कार किया और पूछा कि हे भगवन् ! पाप कर्मके उदयसे मेरे बहुतसे अल्पायु पुत्र हुए हैं क्या कभी दीर्घायु पुत्र भी होंगे ? ॥ १९८-२०० ॥ इस प्रकार पूछनेपर दयालुतावश मुनिराजने कहा कि हाँ तुम भी चिरजीवी पुत्र प्राप्त करोगे ।। २०१ ॥
जीवन्धर के जन्म की भविष्यवाणी और यक्षी का संकल्प — श्लोक 202 से 212
हे वैश्य वर ! चिरजीव पुत्र प्राप्त होनेका चिह्न यह है, इसे तु अच्छी तरह सुः तथा जो पुत्र तुझे प्राप्त होगा वह भी सुन। तरे एक मृत पुत्र होगा उसे छोड़नेके लिए तू वनमें जायगा। वहाँ तू किसी पुण्यात्मा पुत्रको पावेगा। वह पुत्र समस्त पृथिबीका उपभोगकर विषय सम्बन्धी सुखोंसे संतुष्ट होगा और अन्तमें समस्त कर्मोंको नष्टकर मोक्ष लक्ष्मी प्राप्त करेगा। जिस समय उक्त मुनिराज गन्धोत्कट सेठसे ऊपर लिखे वचन कह रहे थे उस समय वहाँ एक पक्षी भी बैठी थी। सुनिराजके बचन सुनकर पक्षीके मनमें होन हार राजपुत्रकी माताका उपकार करनेकी इच्छा हुई। निदान, जब राजपुत्रकी उत्पत्तिका समय आया तब वह यक्षी उसके पुण्यसे प्रेरित होकर राजकुलमें गई और एक गरुड यन्त्रका रूप बनाकर पहुँची। सो ठीक ही है क्योंकि पूर्वकृत पुण्यके प्रभावसे प्रायः देवता भी समीप आ जाते हैं ।। २०२-२०६ ॥ तदनन्तरसब जीवोंको सुख देने वाला वसन्तका महीना आ गया। किसी एक दिन अहित करने वाला रुद्र-दत्त नामका पुरोहित प्रातःकालके समय राजाके घर गया। वहाँ रानीको आभूषणरहित बैठी देखकर उसने आदरके साथ पूछा कि राजा कहाँ हैं ? ।। २०७-२०८ ॥ रानीने भी उत्तर दिया कि राजा सोये हुए हैं इस समय उनके दर्शन नहीं हो सकते। रानीके इन वचनोंको ही अपशकुन समझता हुआ वह वहाँसे लौट आया और सूर्योदयके समय काष्टाङ्गारिक मन्त्रीके घर जाकर उससे मिला। उस पापबुद्धि पुरोहितने एकान्तमें काष्ठाङ्गारिकसे कहा कि यह राज्य तेरा हो जावेगा तू राजाको मार डाल । पुरोहितकी बात सुनकर काष्ठागारिकने कहा कि मैं तो राजाका नौकर हूं, राजाने ही मुझे मन्त्रीके पदपर नियुक्त किया है। यद्यपि यह राजा अकृतज्ञ है-मेरा किया हुआ उपकार नहीं मानता है तो भी मैं यह अपकार वैसे कर सकता हूँ ? ।। २०९-२१२ ।।
षड्यंत्र, राजा पर आक्रमण और काष्ठाङ्गारिक की विजय — श्लोक 213 से 222
हे रुद्रदत्त ! तू ने बुद्धिमान् हो कर भी यह अन्यायकी बात क्यों कही। यह कहकर उसने भयभीत हो अपने कान ढक लिये ।। २१३ ।। काष्ठाङ्गारिकके ऐसे बचन सुनकर पुरोहितने कहा कि इस राजाके जो पुत्र होने वाला है वह तेरा प्राणघातक होगा इसलिए इसका प्रतिकार कर ॥ २१४ ॥ इतना कह कर रुद्रदत्त शीघ्र ही अपने घर चला गया और इस पापके उदयसे रोगपीड़ित हो तीसरे दिन मर गया तथा चिरकाल तक दुःख देने वाली नरकगतिमें जा पहुँचा। इधर दुष्ट आशयवाले काष्ठागारिक मन्त्रीने सद्रदत्तके कहनेसे अपनी मृत्युकी आशंका कर राजाको मारनेकी इच्छा की। उसने धन देकर दो हजार शूरवीर राजाओंको अपने आधीन कर लिया था। वह उन्हें साथ लेकर युद्धके लिए तैयार किये हुए हाथियों और घोड़ोंके साथ राज-मन्दिरकी ओर चला। जब राजाको इस बातका पता-चला तो उसने शीघ्र ही रानीको गरुडयन्त्र पर बैठाकर प्रयत्न पूर्वक वहाँ से दूर कर दिया । काष्ठाङ्गा-रिक मन्त्रीने पहले जिन राजाओंको अपने वश कर लिया था उन राजाओंने जब राजा सत्यन्धरको देखा तब वे मन्त्रीको छोड़कर राजाके आधीन हो गये। राजाने उन सब राजाओंके साथ कुपित होकर मन्त्रीपर आक्रमण किया और उसे शीघ्र ही युद्धमें जीतकर भयके मार्गपर पहुँचा दिया-भयभीत बना दिया ।। २१५-२२० ॥ इधर काष्ठाङ्गारिकके पुत्र कालाङ्गारिकने जब युद्धमें अपने पिताकी हारका समाचार सुना तब वह बहुत ही कुपित हुआ और युद्धके लिए तैयार खड़ी बहुत सी सेना लेकर अकस्मात् आ पहुँचा। पापी काष्ठाङ्गाकि भी उसीके साथ जा मिला। अन्त में बहयुद्धमें राजाको मारकर उसके राज्य पर आरूढ हो गया ।। २२१-२२२ ।।
विजया का श्मशान में पहुँचना और पुत्र-जन्म — श्लोक 223 से 241
उसे नाच मिले हुए भोजनके समान, कृतघ्न्न मित्रके समान अथवा हिंसक धर्मके समान दुःख देने वाला वह २। ज्य प्राप्त किया था ॥ २२३॥ इधर विजया महादेवी गरुड़ यन्त्रपर बैठकर चली। शोक रूपी अग्निसे उसका सारा शरीर जल रहा था और वह रो रही थी परन्तु यक्षी उसकी रक्षा कर रही थी ॥२२४॥ इस प्रकार चलकर वह विजया रानी उस श्मशानभूमिमें जा पहुँची जहाँ घावोंके अग्रभागसे निकलती हुई खूनकी धाराओंसे शूल भींग रहे थे, शूल छिद जाने से उत्पन्न हुई वेदनासे जिनके प्राण निकल गये हैं तथा जिनके मुख नीचेकी ओर लटक गये हैं ऐसे चोर जहाँ नाना प्रकारके शब्द कर रहे थे। कहींपर डाकिनियाँ अधजले मुरदेको अग्निमेंसे खींचकर और तीक्ष्ण छुरियोंसे खण्ड-खण्ड कर खा रही थीं। ऐसी ढाकिनियोंसे वह श्मशान सब ओरसे व्याप्त था ।। २२५-२२७ ।। उस श्मशानमें यक्षी रातभर उसकी रक्षा करती रही जिससे उसे रखमात्र भी कोई बाधा नहीं हुई। जिस प्रकार आकाश चन्द्रमाको प्राप्त करता है उसी प्रकार उस रानीने उसी रात्रिमें एक सुन्दर पुत्र प्राप्त किया ॥ २२८ ॥ उस समय विजया महारानीको पुत्र उत्पन्न होनेका थोड़ा भी उत्सव नहीं हुआ था किन्तु भाग्यकी प्रतिकूलतासे बढ़ा हुआ शोक ही उत्पन्न हुआ था। यक्षीने सब ओर शीघ्र ही मणिमय दीपक रख दिये और दावानलसे झुलसी हुई लत्ताके समान महारानीको शोकाकुल देखकर निम्न प्रकार उपदेश दिया। वह कहने लगी कि इस संसारमें सभी स्थान दुःखसे भरे हैं, यौवनकी लक्ष्मी नश्वर है, भाई-बन्धुओंका समागम नष्ट हो जाने वाला है, जीवन दीपकके समान चञ्चल है, यह शरीर समस्त अपवित्र पदार्थोंसे भरा हुआ है अतः बुद्धिमान् पुरुषोंके द्वारा हेय है-छोड़ने योग्य है। जिसकी समस्त संसार पूजा करता है ऐसा यह राज्य बिजलीकी चमकके समान है। सब जीवोंकी समस्त वस्तुओंकी पर्यायोंमें ही प्रीति होती है परन्तु वे पर्याय अवश्य ही नष्ट हो जाती हैं इसलिए उनमें की हुई प्रीति अन्तमें सन्ताप करने वाली होती है। अनिष्ट पदार्थके रहते हुए भी उसमें प्रीति नहीं होती और इष्ट पदार्थके रहते हुए उस पर अपना अधिकार नहीं होता तथा अपने आपमें प्रीति होनेपर पदार्थ, इष्टपना एवं अधिकार इन तीनोंकी ही स्थितिका क्षय हो जाता है। जिनका ज्ञान बिना किसी क्रमके एक साथ समस्त पदार्थोंको देखता है उन्होंने भी नहीं देखा कि कहीं कोई पदार्थ स्थायी रहता है। यदि विद्यमान और होनहार वस्तुओंमें प्रेम होता है तो भले ही हो परन्तु जो नष्ट हुई वस्तुओंमें भी प्रेम करता है उसे बुद्धिमान् कैसे कहा जा सकता है ? इसलिए हे विजये ! संसारके स्वरूपका विचारकर शोक मत कर, और अतीत पदार्थोम व्यर्थ ही प्रीति मत कर । तेरा यह पुत्र बहुत ही श्रीमान् है और मोक्ष प्राप्ति पर्यन्त इसका अभ्युदय निरन्तर बढ़ता ही रहेगा। यह दुराचारी शत्रुको नष्टकर अवश्य ही तुझे आनन्द उत्पन्न करेगा। तू स्नान कर, चित्तको स्थिर कर और योग्य आहार प्रण कर। शरीरका क्षय करने वाला यह शोक करना वृथा है, इस शांकको धिक्कार है, शोक करनेसे इस पर्यायकी बात तो दूर रही, दूसरी पर्यायमें भी तेरा पति तुझे नहीं मिलेगा क्योंकि अपने-अपने कर्मोंमें भेद होनेसे जीवोंकी गतियाँ भिन्न-भिन्न हुआ करती हैं। इत्यादि युक्ति भरे वचनों से यक्षीने विजया रानीको शोक रहित कर दिया । इतना ही नहीं वह स्त्रयं रात्रिभर उसके पास ही रही सो ठीक ही है क्योंकि सज्जनोंकी मित्रता ऐसी ही होती है १॥ २२९ -२४१ ।।
जीवन्धर का गन्धोत्कट सेठ को सौंपा जाना — श्लोक 242 से 250
इतनेमें ही गन्धोत्कट सेठ, अपने मृत पुत्रका शव रखनेके लिए वहाँ स्वयँ पहुँचा। बह शवको रख कर जब जाने लगा तब उसने किसी वालकका गम्भीर शब्द सुना। शब्द सुनते ही उसने ” जीव जीव ” ऐसे आशीर्वादात्मक शब्द कहे मानो उसने आगे प्रचलित होने वाले उस पुत्रके ‘जीवन्धर’ इस नामका ही उच्चारण किया हो। मुनिराजने जो कहा था वह सच निकला यह जान कर गन्धोरकट बहुत ही सन्तुष्ट हुआ। उसने दोनों हाथ फैला कर बड़े स्नेहप्ते उस बालकको उठा लिया । विजया देवीने गन्धोत्कटकी आवाज सुनकर ही उने पहिचान लिया था । इसलिए उसने अपने आपका परिचय देकर उसने कहा कि हे भद्र, तू मेरे इस पुत्रका इस तरह पालन करना जिस तरह कि किसीको इसका पता न चल सके। यह कह कर उसने वह पुत्र गन्धोत्कट के लिए सौंप दिया ।। २४२-२४५ ।। सेठ गन्धोत्कटने भी ‘मैं ऐसा ही करूंगा’ यह कह कर वह पुत्र ले लिया और शीघ्रताके साथ घर आकर अपनी नन्दा नामकी स्त्रीके लिए दे दिया। देते समय उसने स्त्रीके लिए उक्त समाचार तो कुछ भी नहीं बतलाया परन्तु कुछ कुपित-सा होकर कहा कि हे मूर्खे ! वह बालक जीवित था, तू ने बिना परीक्षा किये ही श्मशानमें छोड़ आनेके लिए मेरे हाथमें विचार किये बिना ही रख दिया था। ले, यह बालक चिरजीवी है और पुण्यवान् है, यह कह कर उसने घह पुत्र अपनी स्त्रीके दिया था ।। २४६-२४८ ॥ सुनन्दा सेठानीने संतुष्ट हो कर वह बालक दोनों हाथोंसे ले लिया। वह बालक प्रातः कालके सूर्यको पराजित कर सुशोभित हो रहा था और सेठानी की आँखें उसे देख-देख कर सतृष्ण हो रही थीं ॥ २४९ ॥ किसी एक दिन उस सेठने अनेक माङ्गलिक क्रियाएं कर अन्नप्राशन संस्कारके बाद उस पुत्रका ‘जीवन्धर’ नाम रक्खा ॥ २५० ॥
विजया का आश्रमवास और जीवन्धर का बाल्यकाल — श्लोक 251 से 261
अथानन्तर – विजया रानी उसी गरुड़मन्त्र पर बैठकर दण्डकके मध्यमें स्थित तपस्वियों केकिसी बड़े आश्रममें पहुंची और वहाँ गुप्त रूपसे – अपना परिचय दिये बिना ही रहने लगी । जब वह विजया रानी शोकसे व्याकुल होती थी तब वह यक्षी आकर उसका शोक दूर करनेकी इच्छाते उसकी अवस्थाके योग्य श्रवणीय कथाओंसे उसे संभारकी स्थिति बतलाती थी, धमका मार्ग बतलाती थी और इस तरह प्रति दिन उसका चित्त बहलाती रहती थी ।। २५१-२५३ ।। इधर महाराज सत्यन्धरकी भांमारति और अनंगपताका नामकी दो छोटी स्त्रियाँ और थीं। उन दोनोंने मधुर और बकुल नामके दो पुत्र प्राप्त किये। इन दोनों ही रानियोंने धर्मका स्वरूप जानकर श्रावकके व्रत धारण कर लिये थे। इसलिए ये दोनों ही भाई गन्वोत्कटके यहाँ ही पालन-पोषण प्राप्तकर बढ़े हुए थे। उसी नगर में विजयर्मात, सागर, धनपाल और मतिसागर नामके चार श्रावक और थे जो कि अनुक्रमसे राजाके सेनापांत, पुरोहित, श्रेष्ठी और मन्त्री थे ।। २५४-२५७ ।। इन चारोंकी स्त्रियोंके नाम अनुक्रमसे जयावती, श्रीमती, श्रीदत्ता और अनुपमा थे। इनसे क्रमसे देवसेन, बुद्धिषेण, वरदत्त और मधुमुख नामके पुन्न उत्पन्न हुए थे। मधुरको आदि लेकर वे छहों पुत्र, जीवन्धर कुमारके साथ ही वृद्धिको प्राप्त हुए थे, निरन्तर कुमारके साथ ही बालक्रीड़ा करनेमें तत्पर रहते थे और जिस प्रकार जीवाजीवादि छह पदार्थ कभी भी लोकाकाशको छोड़कर अन्यन्त्र नहीं जाते हैं उसी प्रकार वे छहों पुत्र उत्कृष्ट अभिप्रायके धारक जीवन्धर कुमारको छोड़कर कहीं अन्यत्र नहीं जाते थे । रात-दिन उनके साथ ही रहते थे और उनके प्राणोंके समान थे। तदनन्तर गन्धोत्कटकी स्त्री सुनन्दाने भी अनुक्रमसे नन्दाढ्य नामका पुत्र प्राप्त किया ।। २५८-२६१ ॥
जीवन्धर की बुद्धिमत्ता और तपस्वी से भेंट — श्लोक 262 से 273
किसी एक दिन जीवन्धर कुमार नगरके बाह्य बगीचेमें अनेक बालकोंके साथ गोली बंटा आदि बालकोंके खेल खेलनेमें व्यस्त थे कि इतनेमें एक तपस्वी आकर उनसे पूछता है कि यहाँते नगर कितनी दूर है ? तपस्वीका प्रश्न सुनकर जीवन्धर कुमारने उत्तर दिया कि ‘आप वृद्ध तो हो गये परन्तु इतना भी नहीं जानते। अरे, इसमें तो बालक भी नहीं भूलते। नगरके बाह्य बगीचेमें बालकोंको खेलता देख भला कौन नहीं अनुमान लगा लेगा कि नगर पास ही है ? जिस प्रकार कि धूम देखनेसे अग्निका अनुमान हो जाता है उसी प्रकार नगरके बाह्य बगीचेमें बालकोंकी क्रीड़ा देख नगरकी समीपताका अनुमान हो जाता है’ इस प्रकार मुस्कुराते हुए जीवन्धर कुमारने कहा। कुमारकी चेष्टा कान्ति तथा स्वर आदिको देखकर तपस्त्रीने सोचा कि यह बालक सामान्य बालक नहीं है, इसके चिह्नोंसे पता चलता है कि इसकी उत्पत्ति राजवंशमें हुई है। ऐसा विचार कर उस तपस्वीने फिसी उपायसे उसके वंशकी परीक्षा करनी चाही। अपना मनोरथ सिद्ध करनेके लिए उसने जीबन्धरकुमारसे याचना की कि तुम मुझे भोजन दो ।।२६२-२६७॥ जीवन्धरकुमार उसे भांजन देना स्वीकृत करश्अपने साथ ले पिताके पास पहुँचे और कहने लगे कि मैंने इसे भोजन देना स्वीकृत किया है फिर, जैसी आप आज्ञा दें। कुमारकी बात सुनकर पिता बहुत ही प्रसन्न हुए और कहने लगे कि मेरा यह पुत्र बड़ा ही विनम्र और प्रशंसनीय है। यह कहकर उन्होंने उसका बार-बार आलिंगन किया और कहा कि हे पुत्र ! यह तपस्वी स्नान करनेके बाद मेरे साथ अच्छी तरह भोजन कर लेगा। तू निःशङ्क होकर भोजन कर ॥ २६८-२७० ॥ तदनन्तर जीवन्धरकुमार अपने मित्रोंके साथ बैठकर भोजन करनेके लिए तैयार हुए। भोजन गरम था इसलिए जीवन्धर कुमार रोकर कहने लगे कि यह सब भोजन गरम रखा है मैं कैसे खाऊँ ? इस प्रकार रोकर उन्होंने माताको तंग किया। उन्हें रोता देख तपस्वी कहने लगा कि भद्र ! तुझे रोना अच्छा नहीं लगता । यद्यपि तू अवस्थासे छोटा है तो भी बड़ा बुद्धिमान् है, तूने अपने वीर्य आदि गुणोंसे सबको नीचा कर दिया है। फिर तू क्यों रोता है ? ॥ २७१-२७३ ।।
जीवन्धर की शिक्षा और तपस्वी का परिचय — श्लोक 274 से 290
तपस्वीके ऐसा कह चुकने पर जीवन्धरकुमारने कहा कि हे पूज्य ! आप जानते नहीं हैं। सुनिये, रोनेमें ये गुण हैं- पहला गुण तो यह है कि बहुत समयका संचित हुआ कफ निकल जाता है, दूसरा गुण यह है कि नेत्रोंमें निर्मलता आ जाती है और तीसरा गुण यह है कि भोजन ठण्डा हो जाता है। इतने गुण होनेपर भी आप मुझे रोनेसे क्यों रोकते हैं ? ॥ २७४-२७५ ।। पुत्रकी बात सुनकर माता बहुत ही प्रसन्न हुई और उसने मित्रोंके साथ उसे विधिपूर्वक अच्छी तरह भोजन कराया ।। २७६ ।। तदनन्तर जब गन्धोत्कट भोजन कर सुखसे बैठा और तपस्वी भी उसीके साथ भोजन कर चुका तब तपस्वीने गन्धोत्कटसे कहा कि इस बालककी योग्यता देखकर इसपर मुझे स्नेह हो गया है अतः मैं इसकी बुद्धिको शास्त्र रूपी समुद्रमें अवगाहन कर निर्मल बनाऊँगा ॥२७७-२७८ ।। तपस्वीकी बात सुनकर गन्धोत्कटने कहा कि मैं श्राक्कोंमें श्रेष्ठ हूँ – श्रावकके श्रेष्ठ व्रत पालन करता हूँ इसलिए अन्य लिङ्गिन्योंको किसी भी कारणसे नमस्कार नहीं करता हूँ और नमस्कारके अभावमें अतिशय अभिमानी आपके लिए अवश्य ही बुरा लगेगा। सेठकी बात सुनकर वह तापस इस प्रकार अपना परिचय देने लगा ।। २७९-२८० ॥
मैं सिंहपुरका राजा था, आर्यवर्मा मेरा नाम था, वीरनन्दी मुनिसे धर्मका स्वरूप सुनकर मैंने निर्मल सम्यग्दर्शन धारण किया था। तदनन्तर धृतिषेण नामक पुत्रके लिए राज्य देकर मैंने संयम धारण कर लिया था- मुनिव्रत अंगीकृत कर लिया था परन्तु जठराग्निकी तीव्र बाधासे उत्पन्नहुई महादाहको सहन नहीं कर सका इसलिए मैने यह ऐसा वेष धारण कर लिया है, मैं सम्यग्दृष्टि हूं, तुम्हारा धर्मबन्धु हूं। इस प्रकार तपस्वीके वचन सुनकर और अच्छी तरह परीक्षा कर सेठने उसके लिए मित्रों सहित जीवन्धरकुमारको सौंप दिया सो ठीक ही है क्योंकि उत्तम खेतमें बीजकी तरह योग्य स्थानमें बुद्धिमान् मनुष्य क्या नहीं अर्पित कर देता है ? अर्थात् सभी कुछ अर्पित कर देन, है ।। २८१-२८४ ॥ उस सम्यग्दृष्टि तपस्वीने, स्वभावसे ही जिसकी बुद्धिका बहुत बड़ा विस्तार था ऐसे जीवन्धर कुमारको लेकर थोड़े ही समयमें समस्त विद्याओंका पारगामी बना दिया ।। २८५ ।। जिस प्रकार शरद् ऋतुमें सूर्य देदीप्यमान होता है और ऐश्वर्य पाकर हाथी सुशोभित होता है उसी प्रकार नव यौवनको पाकर जीवन्धरकुमार भी विद्याओंसे देदीप्यमान होने लगे ।। २८६ ।। वह उपाध्याय भी समयानुसार संयम धारण कर मोक्षको प्राप्त हुआ। अथानन्तर – उस समय कालकूट नामका एक भीलोंका राजा था जो ऐसा काला था मानो सूर्यकी किरणोंसे डरकर स्वयं । अन्धकारने ही मनुष्यका आकार धारण कर लिया था, वह पशुहिंसक था और साधुओंके विन्नके समान जान पड़ता था। जो धनुष-बाण हाथमें लिया है, जिसे कोई देख नहीं सकता, युद्धमें जिसे कोई सहन नहीं कर सकता, जो महौषधिके समान कटुक है, दयारहित है और सींगोंके शब्दोंसे भयंकर है ऐसी सेना लेकर वह कालकूट गोमण्डलके हरण करनेकी इच्छासे तमाखुओंके वनसे सुशोभित नगरके बाह्य मैदानमें आ डटा ॥ २८७-२९० ॥
जीवन्धर की वीरता और नन्दाढ्य को यश प्रदान करना — श्लोक 291 से 300
इस समाचारको सुनकर काष्ठाङ्गारिक राजाने घोषणा कराई कि मैं गायों छुड़ानेवालेके लिए गोपेन्द्रकी स्त्री गोपश्रीसे उत्पन्न गोदावरी नामकी उत्तम कन्या दूंगा। इस घोषणाको सुनकर जीवन्धर कुमार काष्ठाङ्गारिकके पुत्र कालाङ्गारिक तथा अपने अन्य मित्रोंसे युक्त होकर उस कालकूट भीलके पास पहुंचे। वहाँ जाकर उन्होंने अपना धनुप चढ़ाया, उसपर तीक्ष्ण बाण रक्खे, वे अपनी विशिष्ट शिक्षाके कारण जल्दी-जल्दी बाण रखते और छोड़ते थे, धनुर्वेदमें बतलाये हुए सभी पैंतरा बदलते थे, दूसरोंकी बाण-वर्षाको बचाते हुए जल्दी-जल्दी घूमते थे, शत्रुओंके बाणों के समूहको काटते थे और कायर लोगोंपर अस्त्र छोड़नेसे रोकते थे, अर्थान् कायर लोगोंपर अस्त्रोंका प्रहार नहीं करते थे। इस तरह जिस प्रकार नय मिथ्या नयोंको जीत लेता हैं उसी प्रकार उन्होंने बहुत देर तक युद्ध कर भीलोंको जीत लिय । जयलक्ष्मीने उनका आलिङ्गन किया और वे चन्द्रमा, हंस, तूल तथा कुन्दके फूलके समान सुशोभित यश के द्वारा समस्त दिशाओंको व्याप्त करते हुए फहराती हुई पताकाओंसे सुशोभित नगर में प्रविष्ट हुए ॥ २९१-२९७ ।। उस समय शूरवीरता आदि गुण रूपी फूलोंसे सुशोभित कुमार के शरीर-रूपी आम के वृक्षपर कीर्ति रूपी गन्धसे खिंचे हुए मनुष्यों के नेत्ररूपी भौंरे पड़ रहे थे ।। २९८ ।। तदनन्तर जीवन्धर कुमारने सब वैश्यपुत्रोंसे कहा कि तुम लोग एक स्वरसे अर्थात् किसी मतभेदके बिना ही राजाप्ते कहो कि इस नन्दाढ्यने ही युद्ध कर गायोंको छुड़ाया है। इस प्रकार राजाके पास संदेश भेजकर पहले कही हुई गोदावरी नामकी कन्या विवाहपूर्वक नन्दाढ्यके लिए दिलवाई। सो ठीक ही है क्योंकि कार्योंकी प्रवृत्ति अनेक प्रकारकी होती है। अर्थात् कोई कार्यको बिना किये ही यश लेना चाहते हैं और कोई कार्य करके भी यश नहीं लेना चाहते ।। २९९-३०० ॥
गरुड़वेग का रत्नद्वीप में निवास और गन्धर्वदत्ता के विवाह की भविष्यवाणी — श्लोक 301 से 313
अथानन्तर- इसी भरतक्षेत्र सम्बन्धी विजयार्ध पर्वतकी दक्षिण श्रेणी में एक गगनवल्लभ नामका नगर है जो आकाशसे पड़ती हुई श्रीके समान जान पड़ता है। उसमें विद्याधरोंका स्वामी गरुड़-वेग राज्य करता था। दैवयोगसे उसके भागीदारोंने उसका अभिमान नष्ट कर दिया इसलिए वह भागकर रत्नद्वीपमें चला गया और वहाँ मनुजोदय नामक पर्वत पर रमगीय नामका सुन्दर नगर बसा कर रहने लगा। उसकी रानीका नाम धारिणी था ।। ३०१-३०३ ॥ किसी दिन उसकी गन्धर्व-दत्ता पुत्रीने उपवास किया जिससे उसका शरीर मुरझा गया। वह जिनेन्द्र भगवान्की पूजा कर शेष बची हुई माला लेकर पिताको देनेके लिए गई। गन्धर्वदत्ता पूर्ण यौवनवती हो गई थी। उसे देख पिताने अपने मतिसागर नामक मन्त्रीसे पूछा कि यह कन्या किसके लिए देनी चाहिये । इसके उत्तर में अपार बुद्धिके धारक मन्त्रीने भविष्यके ज्ञाता मुनिराजसे पहले जो बात सुन रखी थी वह कह सुनाई ॥ ३०४-३०६ ॥ उसने कहा कि हे राजन् ! किसी एक दिन मैं जिनेन्द्र भगवान्की वन्दना करनेके लिए सुमेरु पर्वतपर गया था। वहाँ नन्दन वनकी पूर्वा दिशाके वनमें जो जिन-मन्दिर है उसकी भक्तिपूर्वक प्रदक्षिणा देकर तथा विधिपूर्वक जिनेन्द्र भगवान्की स्तुति कर मैं बैठा ही था कि मेरा दृष्टि वहाँ पर विराजमान विपुलमति नामक चारण ऋद्धिधारी मुनिराजपर पड़ी। मैंने उन्हें नमस्कार कर उनसे धर्मका उपदेश सुना । तदनन्तर मैंने पूछा कि हे जगत्पूज्य । हमारे स्वामीके एक गन्धर्वदत्ता नामकी पुत्री है वह किसके भोगने योग्य होगी ? मुनिराज अर्वाध-ज्ञानी थे अतः कहने लगे कि इसी भरत क्षेत्र के हेमाङ्गन्द देशमें एक अत्यन्त सुन्दर राजपुर नामका नगर है। उसमें सत्यरूपी आभूषणसे सुशोभित सत्यन्धर नामका राजा राज्य करता है। उसकी महारानीका नाम विजया है उन दोनों के एक बुद्धिमान् पुत्र उत्पन्न हुआ है। वीणाके स्वयंवर में बहगन्धर्वदत्ताको जीतेगा और इस तरह गन्धर्वदत्ता उसीकी भार्या होगी। मन्त्रीके इस प्रकारके बचन सुनकर राजा कुछ व्याकुल हुआ और उसी मतिसागर मन्त्रीसे पूछने लगा कि हम लोगोंका भूमि-गोचरियोंके साथ सम्बन्ध किस प्रकार हो सकता है ? ॥ ३०७-३१३ ॥
जिनदत्त और गरुड़वेग के पूर्वजन्म के संबंध — श्लोक 314 से 321
इसके उत्तरमें मन्त्रीने मुनिराजते जो कुछ अन्य बातें मालूम की थीं वे सब स्पष्ट कह सुनाई। उसने कहा कि उसी राजपुर नगर में एक वृषभदत्त नामका सेठ रहता था। उसकी स्त्रीका नाम पद्मावती था। उन दोनोंके एक जिन-दत्त नामका पुत्र हुआ था। किसी एक समय उसी राजपुर नगरके प्रीतिवर्धन नामक उद्यानमें सागरसेन नामक जिनराज पधारे थे उनके केवलज्ञानकी भक्तिसे पूजा-वन्दना करनेके लिए वह अपने पिताके साथ आया था। आप भी वहाँ पर गये थे इसलिए उप्ते देखकर आपका उसके साथ प्रेम हो गया था। इतना अधिक प्रेम हो गया था कि शरीरभेदको छोड़ कर और किसी बातकी अपेक्षा आप दोनोंमें भेद नहीं रह गया था ।। ३१४-३१७ ॥ इस प्रकार कितने ही दिन व्यतीत हो जाने पर एक दिन वृषभदत्त सेठ अपने स्थान पर जिनदत्तको बैठाकर आत्मज्ञान प्राप्त होनेसे गुणपाल नामक मुनिराजके निकट दीक्षित हो गया और उसकी स्त्री पद्मावतीने भी सुव्रता नामकी आयिकाके पास जाकर संयम धारण कर लिया तथा उत्तम व्रत धारण कर वह अपनी कुलीनता की रक्षा करने लगी । इधर जिनदत्त भी धनका मालिक होकर अपने पिताके पद पर आरूढ़ हुआ और मनोहरा आदि स्त्रियों के साथ इच्छानुसार भोग भोगने लगा। वह जिनदत्त धन कमानेके लिए स्वयं ही इस रत्नद्वीपमें आवेगा ।। ३१८-३२१ ।।
गन्धर्वदत्ता का स्वयंवर और जीवन्धर की विजय — श्लोक 322 से 330
उसीसे हमारे इष्ट कार्यकी सिद्धि होगी । इस तरह कितने ही दिन बीत जानेपर वह जिनदत्त गरुड़वेगके पास आया। इससे गरुड़वेग बहुत ही सन्तुष्ट हुआ । उसने जिनदत्तका अच्छा सत्कार किया। तदनन्तर विद्याधरोंके राजा गरुड़वेगने बड़े आदरके साथ जिनदत्तप्ते कहा कि हे मित्र ! आप अपनी नगरी में मेरी पुत्री गन्धर्वदत्ताका स्वयंवर करा दो । उसकी आज्ञानुसार जिनदत्त भी अनेक विद्याधरोंके साथ गन्धर्वदत्तको राजपुर नगर ले गया ।। ३२२-३२४ ॥ वहाँ जाकर उसने मनोहर नामके वनमें स्वयंवर होनेकी घोषणा कराई और एक बहुत सुन्दर बड़ा भारी स्वयंवर-गृह बनवाया ।। ३२५ ।। जब अनेक कलाओंमें चतुर विद्याधर तथा भूमिगोचरी राजकुमार आ गये तथ उसने जिनेन्द्र भगवान्की पूजा कराई ॥ ३२६ ।। उसी समय गन्धर्वदत्ताने भी सुघोषा नामकी उत्तम लक्षणों वाली वीणा लेकर स्वयंवरके सभागृहमें प्रवेश किया ॥ ३२७ ॥ वहाँ आकर उसने गीतोंसे मिले हुए शुद्ध तथा देशज स्वरोंके समूहसे वीणा बजाई और सब राजाओंको नीचा दिखा दिया । तदनन्तर उसका वीणासम्बन्धी मद दूर करनेकी इच्छासे जीवन्धर कुमार स्वयंवर-सभाभवनमें आये । आते ही उन्होंने उन लोगोंको गुण और दोषकी परीक्षा करनेमें नियुक्त किया कि जो किसीके पक्षपाती नहीं थे, बुद्धिमान् थे, वीणाकी विद्यामें निपुण थे और दोनों पक्षके लोगोंको इष्ट थे ।। ३२८-३३० ॥
जीवन्धर का संगीत-कौशल और गन्धर्वदत्ता से विवाह — श्लोक 331से 350
इसके बाद उन्होंने कार्य करनेके लिए नियुक्त पुरुषोंसे ‘निर्दोष वीणा दी जाय’ यह कहा। नियोगी पुरुषोंने तीन-चार वीणाएं लाकर उन्हें सौंप दीं परन्तु जीवन्धर कुमारने उन सबमें केश रोम लव आदि दोष दिखाकर उन्हें वापिस कर दिया और कन्या गन्धर्वदत्तासे कहा कि ‘यदि तू ईर्ष्या रहित है तो अपनी वीणा दे’ । गन्धर्वदत्ताने अपने हाथकी वीणा बड़े आदरसे उन्हें दे दी। कुमारने उसकी वीणा ले कर गाया, उनका वह गाना शास्त्रके मार्गका अनुसरण करने वाला था, गीत और बाजेकी आवाजसे मिला हुआ था, गंभीर ध्वनिसे सहित था, मनोहर था, मधुर था, हरिणोंके मनमें विभ्रम उत्पन्न करनेवाला था और उस विद्याके जानकार लोगोंके धन्यवाद रूपी श्रेष्ठ फूलोंकी पूजासे सुशोभित था ।। ३३१-३३५ ।। उनका ऐसा गाना सुनकर गन्धर्वदत्ता हृदयमें कामदेवके बाणोंसे प्रेरित हो उठी। इसलिए इसने उन्हें मालासे अलंकृत कर दिया सो ठीक ही है क्योंकि पुण्यके सम्मुख रहते हुए क्या नहीं होता है ? अर्थात् सब कुछ होता है ।। ३३६ ॥ उस समय कितने ही लोग दिनमें जलाये हुए दीपकके समान कान्तिहीन हो गये और कितने ही लोग रात्रिमें जलाये हुए दीपकोंके समान देदीप्यमान मुखके धारक हो गये। भावार्थ – जो ईर्ष्यालु थे वे जीवन्धर कुमारकी कुशलता देख कर मलिनमुख हो गये और जो गुणग्राही थे उनके मुख सुशोभित होने लगे ।।३३७।। गन्धर्मदत्ता सुघोषा नामक वीणाके द्वारा ही जीवन्धर कुमारको प्राप्त कर सकी थी इसलिए वह सन्तुष्ट हो कर अपने मनमें इस प्रकार कह रही थी कि हे सुघोषा ! तू मेरे कुलके योग्य है, मधुर है, और मनको हरण करने वाली है, कुमारका संग प्राप्त करानेमें तू ही चतुर दूतीके समान कारण हुई है ।। ३३८-३३९ ।। उस समय दुर्जनोंके द्वारा प्रेरित हुए काष्ठाङ्गारिकके पुत्र कालाङ्ग रिकने गन्धर्व-दत्ताको हरण करनेका उद्यम किया। जब जीवन्धर कुमारको इस बातका पता चला तब वे अधिकबलवान् विद्याधरोंके साथ जयगिरि नामक गन्धगज पर सवार होकर बड़े क्रोधसे शत्रु-सेनाके सम्मुख गये । उसी समय उपाय करनेमें निपुण गन्धर्वदत्ताके पिता गरुड़वेग नामक विद्याधरोंके राजाने उन दोनोंकी मध्यस्थता प्राप्त कर शत्रुकी सेनाको शान्त कर दिया ।। ३४०-३४३ ॥ तदनन्तर विवाहके द्वारा जीवन्धर कुमार और गन्धवदत्ताका समागम कराकर गरुड़वेग कृतकृत्य हो गया सो ठीक ही है क्योंकि पिताको कन्या समर्पण करनेके सिवाय और कुछ काम नहीं है ॥ ३४४ ।। परस्परके प्रेमसे जिनका सुख बढ़ रहा है ऐसे उन दोनोंकी सम संयोगसे उत्पन्न होने वाली तृप्ति परम सीमाको प्राप्त हो रही थी ।। ३४५ ।।
अथानन्तर – कामदेवको उत्तेजित करने वाला वसन्त ऋतु आया। उसमें सब नगर-निवासी लोग सुख पानेकी इच्छासे अपनी सब सम्पत्ति प्रकट कर बड़े उत्सवसे राजाके साथ सुरमलय उद्यानमें वन-क्रीड़ाके निमित्त गये ।। ३४६-३४७ ॥ उसी नगरमें वैश्रवणदत्त नामक एक सेठ रहता था। उसकी आम्रमञ्जरी नामकी स्त्रीसे सुरमञ्जरी नामकी कन्या हुई थी। उस सुरमञ्जरीकी एक श्यामलता नामकी दासी थी। वह भी सुरमञ्जरीके साथ उसी उद्यानमें आई थी। उसके पास एक चन्द्रोदय नामका चूर्ण था उसे लेकर वह यह घोषणा करती फिरती थी कि सुगन्धिकी अपेक्षा इस चूर्णसे बढ़कर दूसरा चूर्ण है ही नहीं। इस प्रकार वह अपनी स्वामिनीकी चतुराईको प्रकट करती हुई लोगोंके बीच घूम रही थी ।। ३४८-३५० ॥
चूर्ण-विवाद और जीवन्धर की निष्पक्ष बुद्धिमत्ता — श्लोक 351से 365
उसी नगर में एक कुमारदत्त नामका सेठ रहता था । उसकी विमला स्त्रीसे अत्यन्त निर्मल गुणमाला नामकी पुत्री हुई थी। गुणमालाकी विद्युल्लता नामकी दासी थी जो बात-चीत करनेमें बहुत ही चतुर थी। अच्छी भौंहों को धारण करने वाली तथा अभिमान रूपी पिशाचसे प्रती वह विद्युल्लता विद्वानोंकी सभा में बार-बार अपनी स्वामिनीके गुणोंको प्रकाशित करती और यह कहती हुई घूम रही थी कि यह सूर्योदय नामका श्रेष्ठ चूर्ण है और इतना सुगन्धित है कि इस पर भौंरे आकर पड़ रहे हैं ऐसा चूर्ण स्वर्गमें भी नहीं मिल सकता है ।। ३५१-३५३ ।। इस दोनों दासियोंमें जब परस्पर विवाद होने लगा और इस विद्याके जानकार लोग जब इसकी परीक्षा करनेमें समर्थ नहीं हो सके तब वहीं पर खड़े हुए जीवन्धर कुमारने स्वयं अच्छी तरह परीक्षा कर कह दिया कि इन दोनों चूर्णमेिं चन्द्रोदय नामका चूर्ण श्रेष्ठ है। ‘इसका क्या कारण है ? यदि आप यह जानना चाहते हैं तो मैं यह अभी स्पष्ट रूपसे दिखाता हूँ’ ऐसा कह कर जीवन्धर कुमारने उन दोनों चूोंको दोनों हाथों से लेकर ऊपरकी फेंक दिया। फेंकतेदेर नहीं लगी कि सुगन्धिकी अधिकताके कारण भौरोंके समूहने चन्द्रोदय चूर्णको घेर लिया । यह देख, वहाँ जो भी विद्वान् उपस्थित थे वे सब जीवन्धर कुमारकी स्तुति करने लगे ।।३५४-३५७॥ उस समयसे उन दोनों कन्याओंने विद्यासे उत्पन्न होनेवाली परस्परकी ईर्ष्या छोड़ दी और दोनों ही मात्सर्यरहित हो गई ॥ ३५८ ॥ तदनन्तर – उधर नगरवासी लोग वनमें अपनी इच्छानुसार क्रीड़ा करने लगे इधर कुछ दुष्ट बालकोंने एक कुत्ताको देखकर चपलता वश मारना शुरू किया । भयसे व्याकुल हो कर वह कुत्ता भागा और एक कुण्डमें गिरकर मरणोन्सुख हो गया। जब जीवन्धर कुमारने यह हाल देखा तो उन्होंने अपने नौकरोंसे उस कुत्तेको वहाँ से निकलवाया और उसके दोनों कान पञ्चनमस्कार मन्त्रसे भर दिये । नमस्कार मन्त्रको ग्रहण कर वह कुत्ता चद्रोदय पर्वत पर सुदर्शन नामका यक्ष हुआ। पूर्व भवका स्मरण होते ही वह जीवन्धर कुमारके पास वापिस आया और कहने लगा कि मैंने यह उत्कृष्ट विभूति आपके ही प्रसादसे पाई है। इस प्रकार दिव्य आभूषणोंके द्वारा उस कृतज्ञ यक्षने सबको आश्चर्यमें डालकर जीवन्धर कुमारकी पूजा की और कहा कि हे कुमार ! आजसे लेकर दुःख और सुखके समय आप मेरा स्मरण करना। इस प्रकार कुमारसे प्रार्थना कर वह अपने स्थान पर चला गया। आचार्य कहते हैं कि बिना कारण ही जो उपकार किये जाते हैं उनका फल अवश्य होता है ।। ३५९-३६५ ॥
मदोन्मत्त हाथी का वश में करना और सुरमञ्जरी से विवाह — श्लोक 366 से 383
इस प्रकार वनमें चिरकाल तक क्रीड़ा कर जब सब लोग लौट रहे थे तब राजाका अशनिघोष नामका मदोन्मत्त हाथी लोगोंका हल्ला सुन कर बिगड़ उठा। वह अहंकारसे भरा हुआ था और साधारण मनुष्य उसे वश नहीं कर सकते थे। वह हाथी सुरमञ्जरीके रथकी ओर दौड़ा चला आ रहा था। उसे देख कर जीवन्धर कुमारने हाथीकी बिनय और उन्नय क्रियाका शीघ्र ही निर्णय कर लिया, वे लीला पूर्वक उसके पास पहुँचे, बत्तीस तरहकी क्रीड़ाओंके द्वारा उसे खेद खिन्न कर दिया परन्तु स्वयंको कुछ भी खेद नहीं होने दिया। अन्तमें वह हाथी निश्चेष्ट खड़ा हो गया और उन्होंने उसे आलानसे बाँध दिया। यह सब देख नगरवासी लोग जीवन्धर कुमारके हस्ति-विज्ञानकी प्रशंसा करते हुए नगर में प्रविष्ट हुए ॥ ३६६-३६९ ।। जीवन्धर कुमारके देखनेसे जिसका हृदय व्या-कुलित हो रहा है ऐसी सुरमञ्जरी उसी समयसे कामसे मोहित हो गई ॥ ३७० ॥ सुरमञ्जरी के माता-पिताने, उसकी इंगितोंसे, चेष्टाओंसे तथा बात-चीतसे युक्ति पूर्वक यह जान लिया कि इसकीजीवन्धर कुमारमें लग रही है। तदनन्तर उन्होंने जीवन्धर कुमारके माता-पितासे निवेदन किया और उनकी आज्ञानुसार शुभ योगमें ऐश्वर्यको धारण करने वाले जीवन्धर कुमारके लिए वह कन्या समर्पण कर दी ।। ३७१-३७२ ।। इसके बाद जीवन्धर कुमार उचित प्रेम करते हुए सुरमञ्जरीके साथ इच्छानुसार सुखका उपभोग करने लगे । तदनन्तर नगरके लोग निरन्तर जीवन्धर कुमारकी शूर-वीरता और सौभाग्य-शीलता की कथा करने लगे परन्तु उसे दुष्ट काष्ठाङ्गारिक राजा सहन नहीं कर सका इसलिए उसने क्रोधमें आकर लोगोंसे कहा कि इस मूर्ख नीवन्धरने मेरे गन्धवारण हाथी को बाधा पहुँचा कर उसका तिरस्कार किया है। यह वैश्यका पुत्र है इसलिए हरड, आँवला, शोंठ आदि चीज्ज्रोंका क्रय-विक्रय करना इसका काम है परन्तु यह अपनी जातिके कार्योंसे तो विमुख रहता है और चाहंकारसे चूर हो कर राजपुत्रोंके करने योग्य कार्यमें आसक्त होता है। इसलिए खोटी चेष्टा करने वाले इस दुष्टको शीघ्र ही यमराजके मुखमें भेज दो। इस प्रकार उसने चण्ड दण्ड नामक, नगरके मुख्य रक्षकको आज्ञा दी ।। ३७३-३७७ ॥ चण्डदण्ड भी सेना तैयार कर क्रोधसे जीवन्धर कुमारके सम्मुख दौड़ा। इधर जीवन्धर कुमारको भी इसका पता लग गया इसलिए वे भी मित्रोंको साथ ले युद्ध करनेकी इच्छासे उसके सम्मुख गये और स्वयं सुरक्षित रह कर उसे उसी समय पराजित कर दिया ।। इससे काष्ठाङ्गारिक और भी कुपित हुआ। और उसने बहुत-सी सेना भेजी। उस सेनाको देख कर जीवन्धर कुमार दयार्द्धचित्त होकर विचार करने लगे कि इन क्षुद्र प्राणियोंको व्यर्थ मारनेसे क्या लाभ है? मैं किन्हीं उपायोंसे इस दुष्ट काष्ठाङ्गारिकको ही शान्त करता हूँ। ऐसा विचार कर उन्होंने अपने मित्र सुदर्शन यक्षका उपकार किया और उसने भी आकर तथा जीवन्धर कुमारका अभिप्राय जान कर सब उपद्रव शान्त कर दिया ।। तदनन्तर वह यक्ष, जीवन्धर कुमारकी सम्मतिसे उन्हें विजयगिरि नामक हाथी पर बैठा कर अपने घर ले गया सो ठीक ही है क्योंकि मित्रके लिए अपना घर दिखलाना मित्रोंका सद्भाव रहना ही है ।। ३७८-३८३ ।।
सुदर्शन यक्ष की सहायता और चन्द्राभ नगर की यात्रा —श्लोक 384 से 391
जीवन्धर कुमारकी प्रवृत्तिको नहीं जानने वाले उनके साथी और भाई-बन्धुलोग हवासे हिलते हुए चञ्चल छोटे पत्तोंके समान कँपने लगे और वे सब अपने आपको संभालनेमें समर्थ नहीं हो सके । परन्तु गन्धर्वदत्ता जीवन्धरके जानेका कारण जानती थी इसलिए वह निराकुल रही। ‘कुमारको कुछ भी भय नहीं है, इसलिए आप लोग डरिये नहीं, वे शीघ्र ही आजायेंगे, ऐसा कह कर उस बुद्धि-मतीने सबको शान्त कर दिया ।। ३८४-३८६ ।। उधर जीवन्धर कुमार भी यक्षके घरमें बहुत दिनतक सुखसे रहे । तदनन्तर चेष्टाओंसे उन्होंने यत्क्षसे अपने जानेकी इच्छा प्रकट की ।। ३८७॥ उनका अभिप्राय जानकर यक्षने उन्हें जिसकी कान्ति देदीप्यमान है, जो इच्छित कार्योंको सिद्ध करने वाली है, और इच्छानुसार रूप बना देने वाली है ऐसी एक अंगूठी देकर उस पर्वतसे नीचे उतार दिया और उन्हें किसीसे भी भयकी आशंका नहीं है यह विचार कर वह यक्ष कुछ दूर तो उनके पीछे आया और बादमें पूजा कर चला गया ॥ ३८८-३८९ ॥ कुमार भी वहाँ से कुछ दूर चल कर चन्द्राभ नामक नगरमें पहुँचे। वह नगर चूनासे पुते हुए महलोंसे ऐसा जान पड़ता था मानों चाँदनीसे सहित ही हो ॥ ३९० ॥ वहाँ के राजाका नाम धनपति था जो कि लोकपालके समान नगरकी रक्षा करता था। उसकी रानीका नाम तिलोत्तमा था और उन दोनोंके पद्मोत्तमा नामकी पुत्री थी ॥ ३९१ ॥
पद्मोत्तमा को विष से बचाना और क्षेम नगर की ओर प्रस्थान — श्लोक 392 से 403
वह कन्या विहार करनेके लिए वनमें गई थी, वहाँ दुष्ट साँपने उसे काट खाया, यह यह देख राजाने अपने नगर में घोषणा कराई कि जो कोई मणि मन्त्र औषधि आदिके द्वारा इस कन्याको निर्विष कर देगा मैं उसे यह कन्या और आधा राज्य दूंगा ॥ ३९२-३९३ ॥ आदित्य नामके मुनिराजने यह बात पहले ही कह रक्खी थी इसलिए राजाकी यह घोषणा सुनकर साँपके काटनेका दवा करने वाले बहुत से वैद्य, कन्याके लोभसे चिकित्सा करनेके लिए आये परन्तु उस विषको दूर करनेमें समर्थ नहीं हो सके । तदनन्तर राजाकी आज्ञासे सेवक लोग फिर भी किसी वैद्यको ढूँढ़नेके लिए निकले और इधर-उधर दौड़-धूप करनेवाले उन सेवकोंने भाग्यवश जीवन्धर कुमारको देखा । देखते ही उन्होंने बड़ी व्यग्रतासे पूछा कि क्या आप विष उतारना जानते हैं ? ३९४-३९६ ।। जीवन्धर कुमारने भी उत्तर दिया कि हाँ, कुछ जानता हूं। उनके वचन सुनकर सेवक लोग बहुत ही सन्तुष्ट हुए और उन्हें बड़े हर्षसे साथ ले गये ॥ ३९७ ॥ साँप काटनेका मन्त्र जाननेमें निपुण जीवन्धरने भी उस यक्षका स्मरण किया और मन्त्रसे अभिमन्त्रित कर राजपुत्रीको विष-वेगले रहित कर दिया ।। ३९८ ।। इससे राजाको बहुत सन्तोष हुआ उसने तेज तथा कान्ति आदि लक्षणोंसे निश्चय कर लिया कि यह अवश्य ही राजवंशमें उत्पन्न हुआ है इसलिए उसने अपनी पुत्री और पहले कहा हुआ आधा राज्य उन्हें समर्पण कर दिया। उस कन्याके लोकपाल आदि बत्तीस भाई थे उनके गुणोंसे अनुरञ्जित होकर जीवन्धर कुमार उन्हीं के साथ चिरकाल तक क्रीड़ा करते रहे । तदनन्तर वहाँ कुछ दिन रहकर भाग्यकी प्रेरणाले वे किसीसे कुछ कहे बिना ही रात्रिके समय चुपचाप वहाँ से
1चल पड़े और कितने ही कोश चलकर क्षेम देशके क्षेम नामक नगर में जा पहुँचे । वहाँ उन्होंने नगरके बाहर मनोहर वनमें हजार शिखरोंसे सुशोभित एक जिन मन्दिर देखा ॥ ३९९-४०३ ॥
जिनमंदिर में जीवन्धर कुमार की भक्ति — श्लोक 404 से 412
जिन-मन्दिरको देखते ही उन्होंने नमस्कार किया, हाथ जोड़े, तीन प्रदक्षिणाएँ दीं और उसी समय विधि-पूर्वक स्तुति करना शुरू कर दिया ।। ४०४ ॥ उसी समय अकस्मात् एक चम्पाका वृक्ष मानो अपना अनुराग बाहिर प्रकट करता हुआ अपने फूलोंसे युक्त हो गया ।। ४०५ ॥ जो कोकिलाएँ पहले गूँगीके समान हो रही थीं वे उन कुमारके शुभागमन रूप औषधिसे चिकित्सा की हुईके समान ठीक होकर सुननेके योग्य मधुर शब्द करने लगीं ॥ ४०६ ॥ उस जैन-मन्दिरके समीप ही एक सरोवर था जो स्वच्छ जलसे भरा हुआ था और ऐसा जान पड़ता था मानो स्फटिक मणिके द्रवसे ही भरा हो । उस सरोवर में जो कमल थे वे सबके सब एक साथ फूल गये और उनपर भ्रमर मॅडर। ते हुए गुंजार करने लगे । इसके सिवाय उस मन्दिरके द्वारके किवाड़ भी अपने आप खुल गये ॥ ४०७-४०८ ।। यह अतिशय देख, जीवन्धर कुमारकी भक्ति और भी बढ़ गई उन्होंने उसी सरोवर में स्नान कर विशुद्धता प्राप्त की और फिर उसी सरोवरमें उत्पन्न हुए बहुतसे फूल लेकर जिनेन्द्र भगवान्की पूजा की तथा अर्थोसे भरे हुए अनेक इष्ट स्तोत्रोंसे निराकुल होकर उनकी स्तुति की। उस नगर में सुभद्र सेठकी निवृति नामकी स्त्रीले उत्पन्न हुई एक क्षेमसुन्दरी नामकी कन्या थी जो कि साक्षात् लक्ष्मीके समान सुशोभित थी। पहले किसी समय विनयन्धर नामके मुनिराजने कहा था कि क्षेमसुन्दरी के पतिके समीप आनेपर चंपाका वृक्ष फूल जायगा, आदि चिह्न बतलाये थे। उसी समय सेठने उसकी परीक्षा करनेके लिए वहाँ कुछ पुरुष नियुक्त कर दिये थे ।। ४०९-४१२ ॥
क्षेमसुन्दरी से विवाह और धनुष-बाण की प्राप्ति — श्लोक 413 से 423
जीवन्धर कुमारके देखनेसे वे पुरुष बहुत ही हर्षित हुए और कहने लगे कि आज हमारा नियोग पूरा हुआ। उन लोगोंने उसी समय जाकर यह सब समाचार अपने स्वामीसे निवेदन किया। उसे सुनकर सेठ भी सन्तुष्ट होकर कहने लगा कि मुनियोंका वचन कभी असत्य नहीं होता ॥ ४१३-४१४ ॥ इस प्रकार प्रसन्न होकर उसने श्रीमान् जीवन्धर कुमारके लिए विधि-पूर्वक अपनी योग्य कन्या समर्पित कर दी। तदनन्तर वही सेठ जीवन्धर कुमारसे कहने लगा कि जब मैं पहले राजपुर नगर में रहता था तब राजा सत्यन्धरने मुझे यह धनुष और ये बाण दिये थे, ये आपके ही योग्य हैं इसलिए इन्हें आपही ग्रहण करें – इस प्रकार कहकर वह धनुष और बाण भी दे दिये ॥ ४१५-४१६ ।। जीवन्धर कुमार धनुष और बाण लेकर बहुत ही सन्तुष्ट हुए और उसी नगर में सुखते रहने लगे। इस तरह कुछ समय व्यतीत होनेपर किसी समभ गन्धर्वदत्ता अपनी विद्याके द्वारा जीवन्धर कुमारके पास गई और उन्हें सुखसे बैठा देख, किसीके जाने बिना ही फिरसे राजपुर वापिस आ गई सो ठीक ही है क्योंकि प्रियजनोंका उत्सव ही प्रेमी जनोंका प्रेम कहलाता है। तदनन्तर कितने ही दिन बाद पहलेके समान उस नगरसे भी वे पुण्यवान् जीवन्धर कुमार धनुष बाण लेकर चल पड़े और सुजन देशके हेमाभ नगरमें जा पहुँचे ।। ४१७-४२० ।। वहाँ के राजाका नाम दृढ़मित्र और रानीका नाम नलिना था। उन दोनोंके एक हेमाभा नामकी पुत्री थी। हेमाभाके जन्म समय ही किसी निमित्त-ज्ञानीने कहा था कि मनोहर नामके वनमें जो आयुधशाला है वहाँ धनुषधारियोंके व्यायामके समय जिसके द्वारा चलाया हुआ बाण लक्ष्य स्थानसे लौटकर पीछे वापिस आ जावेगा यह उत्तम लक्षणोंवाली कन्या उसीकी वल्लभा होगी ॥ ४२१-४२३ ॥
धनुर्विद्या की परीक्षा और हेमाभा से विवाह —श्लोक 424 से 440
उस आदेशको सुनकर उस समय जो धनुष-विद्याके जाननेवाले थे वे सभी उक्त कन्याकी आशासे उसी प्रकारका अभ्यास करनेमें लग रहे थे ।। ४२४ ॥ भाग्यवश जीवन्धर कुमार भी उस स्थान पर जा पहुँचे । धनुषधारी लोग उन्हें देखकर कहने लगे कि हे भाई ! राजाके आदेशा-नुसार क्या आपने भी धनुष चलानेमें कुछ परिश्रम किया है ।॥ ४२५ ।। इसके उत्तरमें जीवन्धर कुमारने कहा कि हाँ, कुछ है तो। तब उन धनुषधारियोंने कहा कि अच्छा तो यह लक्ष्य बेधो-यहाँ निशाना मारो । इसके उत्तर में जीवन्धर कुमारने तैयार किया हुआ धनुष-बाण लेकर उस लक्ष्यको बेध दिया और उनका वह बाण लक्ष्य प्राप्त करनेके पहले ही लौट आया। यह सब देख, वहाँ जो खड़े हुए थे उन्होंने राजाको खबर दी ।। ४२६-४२७ ॥ राजा सुनकर बहुत ही प्रसन्न हुआ और कहने लगा कि मैं जिस विशिष्ट लताको ढूँढ़ रहा था वह स्वयं आकर पैरोंमें लग गई। तदनन्तर उसने विवाद्दकी विधिके अनुसार बड़े वैभवसे वह कन्या जीवन्धर कुमारके लिए दे दी। आचार्य कहते हैं कि देखो, पुण्य यह कहलाता है। गुणमित्र, बहुमित्र, सुमित्र, धनमित्र तथा और भी कितने ही जीवन्धर कुमारके साले थे उन सबको वे समस्त विद्याओंमें निपुण बनाते तथा पूर्वकृत पुण्यका उपभोग करते हुए वहाँ चिरकाल तक रहे आये। इधर गन्धर्वदत्ता बार-बार छिपकर जीवन्धर कुमारके पास आती जाती थी उसे देख एक समय नन्दायने पूछा कि बता तू छिपकर कहाँ जाती है? मैं भी वहाँ जाना चाहता हूं । इसके उत्तर में गन्धर्वदत्ताने हँसकर कहा कि जहाँ मैं जाया करती हूँ उसस्थानपर यदि तू जाना चाहता है तो देवतासे अधिष्ठित स्मरतरङ्गिणी नामक शय्यापर अपने बड़े भाईका स्मरण कर विधि-पूर्वक सो जाना। इस प्रकार संतोषपूर्वक तू उनके पास पहुँच जायगः । गन्धर्वदत्ताकी बातका निश्चय कर नन्दाढ्य रात्रिके समय स्मरतरङ्गिणी शय्यापर सो गया और भोगिनी नामकी विद्याने उसे शय्या सहित बड़े भाईके पास भेज दिया। तदनन्तर जीवन्धर कुमार और नन्दाढ्य दोनों एक दूसरेको देखकर बड़ी प्रसन्नतासे मिले और सुख-समाचार पूछकर वहीं रहने लगे सो ठीक ही है क्योंकि इस संसारमें प्रसन्नतासे भरे हुए दो भाइयोंके समागमसे बढ़कर और कोई दूसरी वस्तु प्रीति उत्पन्न करनेवाली नहीं है ।। ४२८-४३७ ।।
अथानन्तर इसी प्रसिद्ध सुजन देशमें एक नगरशोभ नामका नगर था उसमें दृढमित्र राजा राज्य करता था। उसके भाईका नाम सुमित्र था। सुमित्रकी स्त्रीका नाम वसुन्धरा था और उन दोनोंके रूप तथा विज्ञानसे सम्पन्न श्रीचन्द्रा नामकी पुत्री थी ॥ ४३८-४३९ ॥ जिसके यौवनका आरम्भ पूर्ण हो रहा है ऐसी उस श्रीचन्द्राने किसी समय अपने भवनके आँगनमें इच्छानुसार क्रीड़ा करते हुए कबूतर और कबूतरीका जोड़ा देखा ॥ ४४० ॥
श्रीचन्द्रा का जातिस्मरण — श्लोक 441 से 454
देखते ही उसे जातिस्मरण हुआ और वह अकस्मात् ही मूच्छित हो गई। उसकी दशा देख, समीप रहनेवाली सखियाँ घबड़ा गईं, उनमें जो कुशल थीं उन्होंने चन्दन तथा खसके ठण्डे जलसे उसे सींचा, पङ्खासे उत्पन्न हुई आनन्ददायी हवासे उसके हृदयको सन्तोष पहुंचाया और मीठे वचनोंसे सम्बोधकर उसे सचेत किया सो ठीक ही है क्योंकि हितकारी मित्रगण कष्टके समय क्या नहीं करते हैं ? अर्थात् सब कुछ करते हैं ।॥४४१-४४३।। यह समाचार सुनकर उसके माता-पिताने तिलकचन्द्राकी पुत्री और श्रीचन्द्राकी सखी अलकसुन्दरीसे शोकवश कहा कि तू जाकर कन्याकी मूर्च्छाका कारण तलाश कर। माता-पिताकी बात सुनकर बात-चीत करनेमें निपुण अलकसुन्दरी भी श्रीचन्द्राके पास गई और एकान्तमें पूछने लगी कि हे भट्टारिकेः ! मुझे बतला कि तेरी मूर्च्छाका कारण क्या है ? इसके उत्तरमें श्रीचन्द्राने कहा कि हे प्राणोंसे अधिक प्यारी सखि ! यदि तू मेरी मूर्च्छाका कारण सुनना चाहती है तो चित्त लगाकर सुन, मेरी ऐसी कोई बात नहीं है जो तुझसे कहने योग्य न हो। इस प्रकार अच्छी तरह स्मरणकर उसने अपने पूर्वभवका समस्त सम्बन्ध अलकसुन्दरीको कह सुनाया। अलकसुन्दरी बड़ी बुद्धिमती थी वह शीघ्र ही सब बातको अच्छी तरह समझकर उसी समय श्रीचन्द्राके माता-पिताके पास गई और स्पष्ट तथा मधुर शब्दोंमें उसकी मूर्च्छाका कारण जैसा कि उसने पहले सुना था इस प्रकार कहने लगी ॥४४४-४४६।।इस जन्मसे पहले तीसरे जन्मकी बात है तब इसी हेमाङ्गद देशके राजपुर नगर में वैश्य-कुल शिरोमणि रत्नतेज नामका एक सेठ रहता था। उसकी स्त्रीका नाम रत्नमाला था। यह कन्या उन दोनोंकी अनुपमा नामकी अतिशय रूपवती पुत्री थी। अनुपमा केवल नामसे ही अनुपमा नहीं थी किन्तु गुणोंसे भी अनुपमा (उपमा रहित) थी। उसी नगर में वैश्यवंशमें उत्पन्न हुए कनक-तेजकी स्त्री चन्द्रमालासे उत्पन्न हुआ सुवर्णतेज नामका एक पुत्र था जो कि बहुत ही बुद्धिहीन और भाग्यहीन था। अनुपमाके माता पिताने पहले इसी सुवर्णतेजको देनी कही थी परन्तु पीछे उसे दरिद्र और मूर्खताके कारण अपमानितकर जवाहरातका काम जाननेवाले गुणमित्र नामक किसी दूसरे वैश्य-पुत्रके लिए दे दी। अनुपमा उसके पास कुछ समय तक सुखसे रही ॥ ४५०-४५४ ।।
कबूतर-कबूतरी का जन्म और पूर्व-स्नेह — श्लोक 455 से 472
किसी एक समय गुणमित्र जलयात्राके लिए गया था अर्थात् जहाजमें बैठकर कहीं गया था परन्तु समुद्रमें नदीके मुँहानेसे जब निकल रहा था तब किसी बड़ी भँवर में पड़कर मर गया। उसकी स्त्री अनुपमाने जब यह खबर सुनी तब यह भी स्वयं उस स्थानपर जाकर डूब मरी। तदनन्तर उसी राजपुर नगरके गन्धोत्कट सेठके घर गुणमित्रका जीव पवनवेग नामका कबूतर हुआ और अनुपमा रतिवेगा नामकी कबूतरी हुई। गन्धोत्कटके घर उसके बालक अत्तराभ्यास करते थे उन्हें देखकर उन दोनों कबूतर-कबूतरीने भी अक्षर लिखना सीख लिया था। गन्धोत्कट और उसकी स्त्री, दोनों ही श्रावकके व्रत पालन करते थे इसलिए उन्हें देखकर कबूतर कबूतरीका भी उपयोग अत्यन्त शान्त हो गया था। इस प्रकार जन्मान्तरसे आये हुए स्नेहसे वे दोनों परस्पर मिलकर वहाँ बहुत समय तक सुखसे रहे आये । सुवर्णतेजको अनुामा नहीं मिली थी इसलिए वह गुणमित्र और अनुपमासे बैर बाँधकर मरा तथा मरकर बिलाव हुआ। एक दिन वह कबूतरोंका जोड़ा कहीं इच्छानुसार क्रीड़ा कर रहा था उसे देखकर उस बिलावने रतिवेगा नामकी कबूतरीको इस प्रकार पकड़ लिया जिस प्रकार कि राहु चन्द्रमाके विम्बको ग्रस लेता है ।॥ ४५५-४६० ॥ यह देख कबूतरको बड़ा क्रोध आया, उसने नख और पोंकी ताड़नासे तथा चोंचके आघातसे बिलावको मारकर अपनी स्त्री छुड़ा ली ॥ ४६१ ॥ किसी एक समय उसी नगरके समीपवर्ती पहाड़की गुफाके समीप पापी लोगोंने एक जाल बनाया था, पवनवेग कबूतर उसमें फँसकर मर गया तब रतिवेगा कबूतरीने स्वयं घर आकर और चोंचसे लिखकर सब लोगोंको अपने पतिके मरनेकी खबर समझा दी ॥ ४६२-४६३ ॥ तदन-न्तर उसके वियोगरूपी भारी दुःखसे पीड़ित होकर वह कबूतरी भी मर गई और यह आप दोनोंकीप्यारी श्रीचन्द्रा नामकी पुत्री हुई ॥ ४६४ ॥ आज कबूतरोंका युगल देखकर पूर्वभवका स्मरण हो आनेसे ही यह मूच्छित हुई थी, यह सब बात इसने मुझे साफ-साफ बतलाई है ।।४६५।। इस प्रकार अलकसुन्दरीके वचन सुनकर माता-पिता अपनी पुत्रीके पतिकी तलाश करनेकी इच्छासे बहुत ही व्याकुल हुए ।। ४६६ ।। उन्होंने अपनी पुत्रीके पूर्वभवका वृत्तान्त एक पटियेपर साफ-साफ लिखवाया और नटोंमें अत्यन्त चतुर रङ्गतेज नामका नट तथा उसकी स्त्री मदनलताको बुलाया, दान देकर उनका योग्य सन्मान किया, करने योग्य कार्य समझाया और ‘यत्नसे यह कार्य करना’ ऐसा कहकर वह चित्रपट उनके हाथमें दे दिया ॥ ४६७-४६८ ॥ वे नट और नटी भी चित्रपट लेकर पुष्पक वनमें गये और उसे वहीं फैलाकर सब लोगोंके सामने नृत्य करने लगे ।। ४६९ ॥ इधर श्रीचन्द्राका पिता भी उसी वनमें क्रीड़ा करनेके लिए गया था वहाँ उसने समाधिगुप्त मुनिराजको देखकर प्रदक्षिणाएँ दीं, नमस्कार किया, धर्मका स्वरूप सुना और तदनन्तर पूछा कि हे पूज्य ! मेरी पुत्रीका पूर्वभवका पति कहाँ है ? सो कहिये । मुनिराज अवधिज्ञानरूपी दिव्य नेत्रके धारक थे इसलिए कहने लगे कि वह आज हेमाभनगर में है तथा पूर्ण यौवनको प्राप्त है ।। ४७०-४७२ ॥
नन्दाढ्य को पूर्वभव का स्मरण — श्लोक 473 से 492
इस प्रकार मुनिराजके वचन सुनकर वह राजा नट, मित्र तथा समस्त परिवारके लोगोंके साथ हेमाभनगर पहुँचा और वहाँ पहुँचकर उसने मनको हरण करनेवाले एक आश्चर्यकारी नृत्यका आयोजन किया । उस नृत्यको देखनेके लिए नगरके अन्य लोगोंके साथ नन्दाढ्य भी गया था ।। ४७३-४७४ ॥ परन्तु वह जन्मा-न्तरका स्मरण हो आनेसे सहसा मूच्छित होगया । तदनन्तर विशेष-विशेष शीतलोपचार करनेसे जब उसकी मूर्च्छा दूर हुई तब बड़े भाई जीवन्धर कुमारने उससे कहा कि मूर्च्छा आनेका कारण बतला । इसके उत्तर में नन्दाढ्यने चित्रका सब हाल कहकर जीवन्धरसे कहा कि वही गुणमित्रका जीव आज मैं तेरा छोटा भाई हुआ हूँ। यह सुनकर जीवन्धर कुमार बहुत ही सन्तुष्ट हुए और विवाहके लिए पहलेसे ही महामह पूजा प्रारम्भ करने लगे ।। ४७५-४७७ ॥ इसीसे सम्बन्ध रखनेवाली एक कथा और कहता हूँ उसे भी सुनो। हरिविक्रम नामसे प्रसिद्ध एक भीलोंका राजा था। उसने भाई, बन्धुओंसे ढरकर कपित्थ नामक वनमें दिशागिरि नामक पर्वतपर वनगिरि नामक नगर बसाया था । उस वनके स्वामी भीलके सुन्दरी नामकी स्त्री थी और वनराज नामका पुत्र था। वटवृक्ष, मृत्यु,’ चित्रसेन, सैन्धव, अरिञ्जय, शत्रुमर्दन और अतिबल ये उस भीलके सेवक थे। लोहजङ्घ और श्रीषेण ये दोनों उसके पुत्र वनराजके मित्र थे। किसी एक दिन लोहजङ्घ और श्रीषेण दोनों ही हेमाभनगरमें गये । वहाँ के वनमें चाँदनीके समान श्रीचन्द्रा खेल रही थी। उसे देखकर उन दोनोंने उसकी प्रशंसा की। वहींपर पानी पीनेके लिए एक घोड़ा आया था उसे देख इन दोनोंने उस घोड़ेके रक्षकका तिरस्कार कर वह घोड़ा छीन लिया और ले जाकर हरिविक्रम भीलको देकर उसे सन्तुष्ट किया। तदनन्तर हितकी इच्छा रखनेवाले वे दोनों मित्र हरिविक्रमके पाससे चलकर अन्याय मार्गका अनुसरण करने-बाले उसके पुत्र वनराजके समीप गये और श्रीचन्द्रा के रूप कान्ति आदि सम्पदाका अच्छी तरह वर्णन करने लगे। यह सुनकर वनराजकी उसमें अभिलाषा जागृत हो गई। वनराज पूर्वभवमें सुवर्ण-तेज था और श्रीचन्द्रा अनुपमा नामकी कन्या थी। उस समय सुवर्णतेज अनुपमाको चाहता था परन्तु उप्से प्राप्त नहीं हो सकी थी। उसी अनुरागसे उसने अपने दोनों मित्रोंसे कहा कि किसी भी उपायसे उसे मेरे पास लाओ ।। ४७८-४८६ ।। कहा ही नहीं, उसने बड़े-बड़े योद्धाओंके साथ उन दोनों मित्रोंको भेज भी दिया। दोनों मित्रोंने हेमाभ नगर में जाकर सबसे पहले कन्याके सोनेके घरका पता लगाया और फिर सुरङ्ग लगाकर कन्याके पास पहुँचे। वहाँ जाकर उन दोनोंने इस आशयका एक पत्र लिखकर सुरङ्गमें रख दिया कि पुरुषार्थी श्रीषेण तथा लोइजङ्घ कन्याको लेकर गये हैं और जिस प्रकार रात्रिके समय चन्द्रमाकी रेखाके साथ शनि और मङ्गल जाते हैं उसी प्रकार हम दोनों कन्याको लेकर वनराजके समीप जाते हैं। यह पत्र तो उन्होंने सुरङ्गमें रक्खा और श्रीचन्द्राको लेकर चल दिये। दूसरे दिन सूर्योदयके समय उक्त पत्र बाँचनेसे कन्याके हरे जानेका समाचार जानकर राजाने कन्याके दोनों भाइयोंको उसे वापिस लानेके लिए प्रेरित किया। दोनों भाई शीघ्र ही गये और उनके साथ युद्ध करने लगे। अपने भाई किन्नरमित्र और यक्षमित्रको युद्ध करते देख श्रीचन्द्रा को बहुत दुःख हुआ इसलिए उसने प्रतिज्ञा कर ली कि जब तक मैं अपने नगरके भीतर स्थित अपने जिनालयके दर्शन नहीं कर लूँगी तब तक कुछ भी नहीं खाऊँगी। ऐसी प्रतिज्ञा लेकर उसने मौन धारण कर लिया ।। ४८७-४९२ ।।
वनराज द्वारा श्रीचन्द्रा को प्राप्त करने का प्रयास —श्लोक 493 से 501
इधर वनराजके मित्र श्रीषेण और लोहजङ्घने युद्धमें राजाके पुत्रोंको हरा दिया और बहुत ही प्रसन्न होकर वह कन्या वनराजके लिए सौंप दी ।। ४९३ ॥ जब वनराजने देखा कि श्रीचन्द्रा मुझसे विरक्त है तब उसने उसके साथ मिलानेवाले उपाय करनेमें चतुर अपनी दूतियाँ बुलाकर उनसे कहा कि तुम लोग किसी भी उपायसे इसे मुझपर प्रसन्न करो । वनराजकी प्रेरणा पाकर वे दूतियाँ श्रीचन्द्राके पास गईं और साम-भेद आदि अनेक विधानोंको जाननेवाली वे दूतियाँ धीरे-धीरे उसके हृदय में प्रवेश करनेके लिए कहने लगीं कि ‘हे श्री चन्द्रे ! तू इस तरह क्यों बैठी है ? स्नान कर, कपड़े पहिन, आभूषणोंसे अलंकार कर, माला। धारण कर, मनोहर भोजन कर और हम लोगोंके साथ विश्वास पूर्वक सुखकी कथाएँ कह ।। ४९४-४९७॥ अनेक योनियोंमें परि-भ्रमण करते-करते यह दुर्लभ मनुष्य-जन्म पाया है इसलिए इसे भोगोपभोगकी विमुखतासे व्यर्थ ही नष्ट मत कर ।। ४९८ ॥ इस संसार में रूप आदि गुणोंकी अपेक्षा वनराजसे बढ़कर दूसरा वर नहीं है यह तू अपने नेत्र अच्छी तरह खोलकर क्यों नहीं देखती है ? ॥ ४९९॥ जिस प्रकार भरत चक्रवर्तीके साथ लक्ष्मी रहती थी, आभूषण जातिके वृक्षोंके समीप शोभा रहती है और पूर्ण चन्द्रमाके साथ चाँदनी रहती है उसी प्रकार तू वनराजके समीप रह। चूड़ामणि रत्नको पाकर ऐसा कौन मूर्ख होगा जो उसका तिरस्कार करता हो, इस प्रकारके तथा भय देनेवाले और भी वचनोंसे उन दूतियोंने श्रीचन्द्राको बहुत तङ्ग किया ॥ ५००-५०१ ॥
जीवन्धर कुमार द्वारा हिंसा और युद्ध का निवारण , चारण मुनिराज को आहारदान — श्लोक 502 से 512
वनराजके पिता हरिविक्रमने गुप्त रीतिसे कन्याका यह उपद्रव सुनकर विचार किया कि ये दूतियाँ इसे तंग करती हैं इसलिए संभव है कि कदाचित् यह कन्या आत्मघात कर ले इसलिए उसने वनराजको डाँटकर वह कन्या अपनी पुत्रियोंके साथ रख ली ।। ५०२-५०३ ।। इधर दृढ़मित्र आदि सब भाई-बन्धुओंने मिलकर सेना तैयार कर ली और उस सेनाके द्वारा वनराजका नगर घेरकर सब आ डटे ।। ५०४ ।। उधरसे विरोधी दलके लोग भी युद्ध करनेकी इच्छासे बाहर निकले। यह देख दयालु जीवन्धर कुमारने विचार किया कि युद्ध अनेक जीवोंका विघात करनेवाला है इसलिए इससे क्या लाभ होगा ? ऐसा विचार कर उन्होंने उसी समय अपने सुदर्शन यक्षका स्मरण किया । स्मरण करते ही यक्षने किसीको कुछ पीड़ा पहुँचाये बिना ही वह कन्या जीवन्धर कुमारके लिए सौंप दी सो ठीक ही है क्योंकि पापसे डरनेवाले पुरुष योग्य उपायसे ही कार्य सिद्ध करते हैं ।। ५०५-५०७ ॥ दृढ़मित्र आदि सभी लोग कार्य सिद्ध हो जानेसे युद्ध बन्द कर नगरकी ओर चले गये परन्तु वनराज युद्धकी इच्छासे वापिस नहीं गया। यह देख, यक्षने उसे दुष्ट अभिप्रायवाला समझकर जबर्दस्ती पकड़ लिया और जीवन्धर कुमारको सौंप दिया । श्रीमान् जीवन्धर कुमार भी बनराजको कैदकर सेनाके साथ सेनारम्य नामके सरोवरके किनारे ठहरगये ॥५०८-५१०।। वहीं उन्होंने तेजके निधि स्वरूप एक चारण मुनिराजके अकस्मात् दर्शन किये.। वे मुनिराज भिक्षाके लिए आ रहे थे इसलिए जीवन्धर कुमारने उठकर उन्हें योग्य रीतिसे नमस्कार किया और बड़ी भक्तिसे यथायोग्य उत्तम आहार दिया। इस दानके फलसे उन्हें भारी पुण्यबन्ध हुआ और उसीसे उन्होंने पञ्चाश्चर्य प्राप्त किये ।। ५११-५१२ ॥
वनराज का पूर्वभव-स्मरण और कर्म-संबंध — श्लोक 513 से 524
उस दानका फल देखकर वनराजको अपने पूर्व जन्मका सब वृत्तान्त ज्योंका त्यों याद आ गया ।। ५१३ ।। उधर हरिविक्रम अपने पुत्र वनराजको कैद हुआ सुनकर बड़ी भारी सेनाके साथ युद्ध करनेके लिए आ रहा था सो यक्षने उसे भी पकड़कर जीवन्धर कुमारके हाथमें दे दिया ।। ५१४ ।। तदनन्तर वनराजने सबके सामने अपना समस्त वृत्तान्त इस प्रकार निवेदन किया कि ‘मैं इस जन्मसे तीसरे जन्ममें सुवर्णतेज नामका वैश्य-पुत्र था। वहाँ से मरकर बिलाव हुआ। उस समय इस श्रीचन्द्राका जीव कबूतरी था इसलिए इसे मारनेका मैंने उद्यम किया था। किसी समय एक मुनिराज चारों गतियोंके भ्रमणका पाठ कर रहे थे उसे सुनकर मैंने सब वैर छोड़ दिया और मरकर यह वनराज हुआ हूं। पूर्व भवके स्नेहसे ही मैंने इस श्रीचन्द्राका हरण किया था’ ।। ५१५-५१७ ।। वनराजका कहा सुनकर सब लोगोंने निश्चय किया कि इसने अहंकारसे कन्याका अपहरण नहीं किया है किन्तु पूर्वभवके स्नेहसे किया है ऐसा सोचकर सब शान्त रह गये ।। ५१८ ॥ और वनराज तथा उसके पिताको बन्धनरहित कर छोड़ दिया सो ठीक ही है क्योंकि सज्जनोंका धार्मिकपना यही है ॥ ५१९ ॥ इसके बाद वे सब लोग राजाके नगर (हेमाभनगर) में गये वहाँ दो तीन दिन ठहरकर फिर नगरशोभा, नामक नगर में गये। वहाँ कल्याण-रूप भाग्यको धारण करनेवाली श्रीचन्द्रा बड़ी विभूतिके साथ धनके स्वामी युवक नन्दाढ्यको प्रदान की। इस प्रकार विवाहकी विधि समाप्त होनेपर भाई-बन्धुओंके साथ फिर सब लोग हेमा भनगरको लौटे। मार्गमें किसी सरोवरके किनारे ठहरे। वहाँपर परिवारके लोग जीवन्धर कुमारको बैठाकर उम्र सरोवरमें जल लेनेके लिए गये। वहाँ जाते ही मधु-मक्खियोंने उन लोगोंको काट खाया तब उन लोगोंने उनके भयसे लौटकर इसकी खबर जीवन्धर कुमारको दी। यह सुनकर तथा विचारकर जीवन्धर कुमार आश्चर्यमें पड़ गये और कहने लगे कि इसमें कुछ कारण अवश्य है ? कारणका पता चलानेके लिए उन्होंने उसी समय यक्षका स्मरण किया ।। ५२०-५२४ ।।
विद्याधर द्वारा पूर्वभव का रहस्योद्घाटन — श्लोक 525 से 542
यक्ष शीघ्र ही आ गया और उसने उसकी सब खेचरी विद्या नष्ट कर शीघ्र ही उस विद्याधरको जीवन्धर कुमारके आगेलाकर खड़ा कर दिया ।। ५२५ ।। तब जीवन्धर कुमारने उससे पूछा कि तू इस सरोवरकी रक्षा किस-लिए करता है ? इस प्रकार कुमारके पूछने पर वह विद्याधर अच्छी तरह कहने लगा कि हे भद्र ! मेरी कथाको चित्त लगाकर सुनिये, मैं कहता हूँ। पहले जन्ममें मैं राजपुर नगर में अत्यन्त धनी पुष्पदन्त मालाकारकी स्त्री कुसुमश्रीका जातिभट नामका पुत्र था। उसी नगर में धनदत्तकी स्त्री नन्दिनीसे उत्पन्न हुआ चन्द्राभ नामका पुत्र था। वह मेरा मित्र था, किसी एक समय आपने उस चन्द्राभके लिए धर्मका स्वरूप कहा था उसे सुनकर मेरे हृदयमें भी धर्मप्रेम उत्पन्न हो गया ।। ५२६-५२९ ।। और मैंने उसी समय मद्य-मांस आदिका त्याग कर दिया उसके फलसे मरकर मैं यह विद्या-धर हुआ । किसी समय मैंने सिद्धकूट जिनालयमें दो चारण मुनियोंके दर्शन किये । मैं बड़ी विनयसे उनके पास पहुँचा और उनके समीप अपने तथा आपके पूर्वभवका सम्बन्ध सुनकर आपके दर्शन करनेके लिए ही अन्य लोगोंके प्रवेशसे इस सरोवरकी रक्षा करता हुआ यहाँ रहता हूँ। उन मुनिराजने अपने दिव्य अवधिज्ञानसे देखकर जो आपके पूर्वभवका सम्बन्ध बतलाया था उसे अब मैं कहता हूँ ।। ५३०-५३२ ॥
धातकीखण्ड द्वीपके पूर्व मेरु सम्बन्धी पूर्व विदेह क्षेत्रमें पुष्कलावती नामका देश है। उसकी पुण्डरीकिणी नगरीमें राजा जयंधर राज्य करता था। उसकी जयवती रानीसे तू जयद्रथ नामका पुत्र हुआ था। किसी एक समय वह जयद्रथ क्रीड़ा करनेके लिए मनोहर नामके बनमें गया था वहाँ उसने सरोवरके किनारे एक हंसका बच्चा देखकर कौतुक वश चतुर सेवकोंके द्वारा उसे बुला लिया और उसके पालन करनेका उद्योग करने लगा। यह देख, उस बच्चेके माता-पिता शोक सहित होकर आकाशमें बार-बार करुण क्रन्दन करने लगे। उसका शब्द सुनकर तेरे एक सेवकने कान तक धनुष खींचा और एक बाणसे उस बच्चे के पिताको नीचे गिरा दिया सो ठीक ही है क्योंकि पापी मनुष्योंको नहीं करने योग्य कार्य क्या है ? अर्थात् कुछ भी नहीं ।॥ ५३३-५३७ ।। यह देख जयद्रथकी माताका हृदय दयासे आर्द्र हो गया और उसने पूछा कि यह क्या है ? सेवकसे सब हाल जानकर वह सती व्यर्थ ही पच्तीके पिताको मारनेवाले सेवक पर बहुत कुपित हुई तथा तुझे भी डाँटकर कहने लगी कि हे पुत्र ! तेरे लिए यह कार्य उचित नहीं है, तू शीघ्र ही इसे इ की मातासे मिला दे । इसके उत्तरमें तूने कहा कि यह कार्य मैंने अज्ञान वश किया है। इस प्रकार आर्द्र परिणाम होकर अपनेआपकी बहुत ही निन्दा की और जिस दिन उस बालकको पकड़वाया था उसके सोलहवें दिन, जिस प्रकार वर्षाकाल चातकको सजल मेघमालासे मिला देता है, वसन्त ऋतु फूलको आमकी लताके साथ मिला देता है और सूर्योदय भ्रमरको कमलिनीके साथ मिला देता है उसी प्रकार उसकी माताके साथ मिला दिया ।। ५३८-५४२ ॥
मित्रों का जीवन्धर कुमार की खोज में प्रस्थान — श्लोक 543 से 552
इस प्रकारके अन्य कितने ही विनोदोंसे जयद्रथका काल निरन्तर सुखसे बीत रहा था कि एक दिन उसे किसी कारणवश भोगोंसे वैराग्य हो गया फल-स्वरूप राज्यका भार छोड़कर उसने तपश्चरणका भार धारण कर लिया और जीवनके अन्त में शरीर छोड़कर सहस्त्रार स्वर्गमें देव पर्याय प्राप्त कर ली ।। ५४३-५४४ ।। वहाँ वह अठारह सागरकी आयु तक दिव्य भोगोंसे सन्तुष्ट रहा । तदनन्तर वहाँ से च्युत होकर पुण्य पापके उद्यसे यहाँ उत्पन्न हुआ है ।। ५४५ ।। जिस सेवकने हंसको मारा था वह काष्ठाङ्गारिक हुआ है और उसीने तुम्हारा जन्म होनेके पहले ही युद्धमें तुम्हारे पिताको मारा है। तुमने हंसके बच्चेको सोलह दिन तक उसके माता-पितासे जुदा रक्खा था उसी पापके फलसे तुम्हारा सोलह वर्ष तक भाई-बन्धुओंके साथ वियोग हुआ है। इस प्रकार विद्याधरकी कही कथा सुनकर जीवन्धरकुमार कहने लगे कि तू मेरा कल्याणकारी बन्धु है ऐसा कह कर उन्होंने उसका खूब सत्कार किया ।। ५४६-५४८ ।। तदनन्तर वे बड़ी प्रसन्नतासे सबके साथ हेमाभनगर आय और इष्ट जनोंके साथ इच्छानुसार कामभोगका सुख भोगते हुए रहने लगे ।। ५४९ ।।
सुधर्माचार्य राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे श्रेणिक ! यह तुझे प्रकृत बात बतलाई। अब इसीसे सम्बन्ध रखनेवाली कथा कही जाती है। जिस दिन नन्दाढ्य राजपुर नगरसे निकल गया उसके दूसरे ही दिन मधुर आदि मित्रोंने गन्धर्वदत्तासे पूछा कि दोनों कुमार कहाँ गये हैं ? तू सब जानती है, बतला । इसके उत्तरमें गन्धर्वेदत्ताने बड़े आदरसे कहा कि आप लोग उनकी चिन्ता क्यों करते हैं वे दोनों भाई सुजन देशके हेमाभ नगर में सुखसे रहते हैं ।॥ ५५०-५५२ ।।
दण्डक वन में विजया से भेंट — श्लोक 553 से 571
इस प्रकार गन्धर्वदत्ता से उनके रहनेका स्थान जानकर मधुर आदि सब मित्रोंको उनके देखनेकी इच्छा हुई और वे सब अपने आत्मीय जनोंसे पूछकर तथा उनसे बिदा लेकर सन्तोषके साथ चल पड़े ॥ ५५३ ।। चलते-चलते उन्होंने दण्डक वनमें पहुँचकर तपस्वियोंके आश्रममें विश्राम किया। कौतुकवश वहाँकी तापसी स्त्रियाँ आकर उन्हें देखने लगीं। उन स्त्रियोंमें महादेवी विजया भी थी, वह उन सबको देखकर कहने लगी कि आप लोग कौन हैं? कहाँ से आये हैं? और कहाँ जावेंगे ? विजयाने यह सब बड़े स्नेहके साथ पूछा ।। ५५४-५५५ ।। जब मधुर आदिने अपना सब वृत्तान्त कहा तब वह, यह स्पष्टजानकर बहुत ही सन्तुष्ट हुई कि यह युवाओंका सङ्घ मेरे ही पुत्रका परिवार है। उसने फिर कहा कि आज आप लोग यहाँ विश्राम कर जाइये और आते समय उसे यहाँ ही लाइये ।। ५५६-५५७ ।। इस प्रकार उसने उन लोगोंसे अच्छी तरह प्रार्थना की। वह देवी रूपकी अपेक्षा जीवन्धरके समान ही थी इसलिए सबको संशय हो गया कि शायद यह जीवन्धरकी माता ही हो। तदनन्तर उन लोगोंने प्रिय और अनुकूल वचनोंके द्वारा उस देवीको सन्तुष्ट किया और कहा कि हमलोग ऐसा ही करेंगे। इसके बाद वे आगे चले, कुछ ही दूर जाने पर उन्हें भीलोंने दुःखी किया परन्तु वे अपने पुरुषार्थसे युद्धमें भीलोंको हराकर इच्छानुसार आगे बढ़े। आगे चलकर मार्गमें ये सब लोग दूसरे भीलोंके साथ मिल गये और सबने हेमाभ नगरमें जाकर वहाँके सेठोंको लूटना शुरू किया। इससे क्षुभित हुए नगरवासी लोगोंने हाथ ऊपर कर तथा जोर-जोरसे चिल्लाकर जीवन्धर कुमारको इस कार्यकी सूचना दी। निदान, अचिन्त्य पराक्रमके धारक दयालु जीवन्धर कुमारने जाकर युद्धमें वह भीलोंकी सेना रोकी और उनके द्वारा हरण किया हुआ सब धन छीनकर वैश्योंके लिए वापिस दिया । इधर मधुर आदिने चिरकाल तक युद्ध कर अपने नामसे चिह्नित बाण चलाये थे उन्हें देखकर जीवन्धर कुमारने उन सबको पहिचान लिया। तदनन्तर उन सबका जीवन्धर कुमारसे मिलाप हो गया और सब लोग कुमारके लिए राजपुर नगरकी सब कथा सुनाकर वहाँ कुछ काल तक सुखसे रहे। इसके बाद वे कुमारको लेकर अपने नगरकी ओर चले। विश्राम करनेके लिए वे उसी दण्डक वनमें आये । वहाँ उन्हें महादेवी विजया मिली, स्नेहके कारण उसके स्तन दूधसे भर-कर ऊँचे उठ रहे थे, नेत्र आँसुओंसे व्याप्त होकर मलिन हो रहे थे, शरीर-यष्टि अत्यन्त कृश थी, वह हजारों चिन्ताओंसे सन्तप्त थी, उसके शिरके बाल जटा रूप हो गये थे, निरन्तर गरम श्वास निकलनेसे उसके ओठोंका रङ्ग बदल गया था और पान आदिके न खानेसे उसके दाँतों पर बहुत भारी मैल जमा हो गया था। जिस प्रकार रुक्मिणी प्रद्युम्नको देखकर दुखी हुई थी उसी प्रकार विजया महादेवी भी पुत्रको देखकर शोक करने लगी सो ठीक ही है क्योंकि इष्ट पदार्थका बहुत समय बाद देखना तत्कालमें दुःखका कारण होता ही है ।। ५५८-५६९ ॥ पुत्रके स्पर्शसे उत्पन्न हुए सुख रूपी अमृतका जिसने स्पर्श नहीं किया है ऐसी माताको उस सुखका अनुभव कराते हुए जीवन्धर कुमार हाथ जोड़कर उसके चरण-कमलोंमें गिर पड़े ॥ ५७० ॥ ‘हे कुमार ! उठ, सैकड़ोंकल्याणोंको प्राप्त हो’ इस प्रकार सैकड़ों आशीर्वादोंसे उन्हें प्रसन्न कर विजया महादेवी बड़े स्नेहसे इस प्रकार कहने लगी ।। ५७१ ।।
माता विजया द्वारा प्रतिशोध की प्रेरणा — श्लोक 572 से 583
कि ‘हे कुमार ! तुझे देखनेसे जो मुझे सुख उत्पन्न हुआ है उसके समागम रूपी शत्रुसे ही मानो डरकर मेरा दुःख अकस्मात् भाग गया है’ ॥ ५७२ ॥ इस प्रकार वह महादेवी पुत्रके साथ बातचीत कर रही थी कि इसी बीचमें कुमारके स्नेहसे वह चतुर यक्ष भी बड़ी शीघ्रतासे वहाँ आ पहुँचा ।। ५७३ ॥ उसने आकर उत्तम जैनधर्मके वात्सल्यसे स्नान, माला, लेपन, समस्त आभूषण, वस्त्र तथा भोजन आदिके द्वारा सबका अलग-अलग सत्कार किया । तदनन्तर उसने युक्तियोंसे पूर्ण और तत्त्वसे भरे हुए मधुर वचनोंसे तथा प्रद्युम्न आदिकी कथाओंसे माता और पुत्र दोनोंका शोक दूर कर दिया। इस प्रकार आदर-सत्कार कर वह यक्ष अपने स्थान-की ओर चला गया सो ठीक ही है क्योंकि मित्रता वही है जिसका कि मित्र लोग आपत्तिके समय अनुभव करते हैं ।। ५७४-५७६ ।। इसके बाद विजयादेवीने ‘यह महा पुण्यात्मा है’ ऐसा विचार कर बुद्धि और बलसे सुशोभित कुमारको अलग ले जाकर इस प्रकार कहा कि ‘राजपुर नगरके सत्यन्धर महाराज तेरे पिता थे उन्हें मार कर ही काष्ठाङ्गारिक राज्य पर बैठा था अतः वह तेरा शत्रु है। तू तेजस्वी है अतः तुझे पिताका स्थान छोड़ देना योग्य नहीं है’। इस प्रकार माताके कहे हुए वचन सुनकर और अच्छी तरह समझकर जीवन्धर कुमारने विचार किया कि ‘समय और साधनके बिना प्रकट हुई शूर-वीरता फल देनेके लिए समर्थ नहीं है अतः धान्यकी तरह उस कालकी प्रतीक्षा करनी चाहिये जो कि कार्यका साधक है’। जीवन्धर कुमारको यद्यपि क्रोध तो उत्पन्न हुआ था परन्तु उक्त विचार कर उन्होंने उसे हृदयमें ही छिपा लिया और मातासे कहा कि हे अम्ब ! यह कार्य पूरा होने पर मैं तुझे लेनेके लिए नन्दाढ्यको सेनापति बनाकर सेना भेजूंगा तब तक कुछ दिन तू शोक रहित हो यहीं पर रह । ऐसा कहकर तथा उसके योग्य समस्त पदार्थ और कुछ परिवारको उसके समीप रखकर महाबुद्धिमान् जीवन्धर कुमार स्वयं राजपुर चले गये ॥ ५७७-५८३ ॥
जीवन्धर कुमार का गुप्त रूप से राजपुर प्रवेश — श्लोक 584 से 602
राजपुर नगरके समीप जाकर उन्होंने अपने सेवक आदि सब लोगोंको अलग-अलग यह कहकर कि ‘किसीसे मेरे आनेकी खबर नहीं कहना’ पहले ही नगर में भेज दिया और स्वयं विद्यामयी अँगूठीके प्रभावसे वेश्यका वेष रखकर नगर में प्रविष्ट हो किसीकी दूकान पर जा बैठे ।। ५८४-५८५ ।। वहाँ उनके समीप बैठ जानेसे सागरदत्त सेठको अनेक रत्न आदिके पिटारे तथा और भी अपूर्व वस्तुओं का लाभ हुआ । यह देख उसने विचार किया कि ‘निमित्तज्ञानीने जिसके लिए कहा था यह वहीपुरुष है, ऐसा विचार कर उसने अपनी स्त्री कमलासे उत्पन्न हुई विमला नामकी पुत्री उन्हें समर्पित कर दी ॥ ५८६-५८७ ॥ विवाहके बाद जीवन्धर कुमार कुछ दिन तक सागरदत्त सेठके यहाँ सुखसे रहे। तदनुसार किसी अन्य समय परिव्राजकका वेष रखकर काष्ठाङ्गारिककी सभा में गये । वहाँ प्रवेश कर तथा काष्ठाङ्गारको देखकर उन्होंने आशीर्वाद देते हुए कहा कि ‘हे राजन् ! सुनो, मैं एक गुणवान् अतिथि हूँ, तुझसे भोजन चाहता हूँ, मुझे खिला दे’। यह सुकर काष्ठाङ्गारिकने उसे भोजन कराना स्वीकृत कर लिया। ‘यह निमित्त, मेरे उद्योग रूपी फलको उत्पन्न करनेके लिए मानो फूल ही है’ ऐसा विचार कर उन्होंने अगली आसन पर आरूढ़ होकर भोजन किया और भोजनोपरान्त वहाँसे चल दिया। तदनन्तर उन्होंने राजाओंके समूहमें जाकर अलग-अलग यह घोषणा कर दी कि ‘मेरे हाथमें प्रत्यक्ष फल देनेवाला वशीकरण चूर्ण आदि उत्तम ओषधि है जिसकी इच्छा हो वह ले ले’ । उनकी यह घोषणा सुनकर सब लोग हँसी करते हुए कहने लगे कि देखो इसकी निले-ज्जता । इसका ऐसा तो बुढ़ापा है फिर भी वशीकरण चूर्ण, अञ्जन तथा बन्धक आदिकी औषधियाँ रखे हुए है। इस प्रकार कहते हुए उन लोगोंने हँसी कर कहा कि ‘हे ब्राह्मण ! इस नगरमें एक गुण-माला नामकी प्रसिद्ध कन्या है। ‘जीवन्धरने मेरे चूर्णकी सुगन्धिकी प्रशंसा नहीं की है’ इसलिए वह पुरुष मात्रसे द्वेष रखने लगी है। तू अपने चूर्ण तथा अञ्जन आदिसे पहले उसे वशमें कर ले, बादमें यह देख हम सब लोग तेरे मन्त्र तथा औषधि आदिको बहुत भारी मूल्य देकर खरीद लेंगे’ ।। ५८८-५९६ ।। इस प्रकार लोगोंके कहने पर वह ब्राह्मण क्रोधित-सा होकर कहने लगा कि तुम्हारा जीबन्धर मूर्ख होगा, वह चूर्णोकी सुगन्धि आदिके भेदकी परीक्षा करना क्या जाने ।। ५९७ ॥ इसके उत्तरमें सब लोग क्रोधित होकर उस ब्राह्मणसे कहने लगे कि ‘जीवन्धर मनुष्योंमें श्रेष्ठ हैं’ इसका विचार किये बिना ही तू उनके प्रति इच्छानुसार यह क्या बक रहा है ॥ ५९८ ॥ हे मिध्याशास्त्रसे उद्दण्ड ! क्या तूने यह लोक-प्रसिद्ध कहावत नहीं सुनी है कि अपनी प्रशंसा और दूसरेकी निन्दामें मरणसे कुछ विशेषता (अंतर) नहीं हैं अर्थात् मरणके ही समान है ॥५९९॥ इस प्रकार उन लोगोंके द्वारा निन्दित हुआ ब्राह्मण कहने लगा कि तो क्या आप जैसे लोग मेरी भी प्रशंसा करनेवाले नहीं हैं ? ‘मैं भी कोई पुरुष हूँ’ इस तरह अपनी प्रशंसा कर उस उद्धत ब्राह्मणने प्रतिज्ञा की कि ‘मैं क्षणभर में गुणमालाको अपनी घटदासी बना लूँगा’। ऐसी प्रतिज्ञा कर वह गुणमालाके घरकी ओर चल पड़ा। वहाँ जाकर तथा एक दासीको बुलाकर उसने कहा कितुम अपनी मालकिनसे कहो कि द्वार पर कोई ब्राह्मण खड़ा है ।। ६००-६०२ ॥
गुणमाला के सामने वृद्ध ब्राह्मण का रहस्य — श्लोक 603 से 613
दासीने भी अपनी मालकिनको ब्राह्मणकी कही हुई बात समझा दी। गुणमालाने अपनी अनुमतिसे आये हुए उस वृद्ध ब्राह्मणका यथायोग्य सत्कार कर पूछा कि ‘आप कहाँ से आये हैं और यहाँ से कहाँ जावेंगे? गुणमाला के इस प्रश्नके उत्तरमें उसने कहा कि ‘यहाँ पीछेसे आया हूँ और आगे जाऊँगा’ । ब्राह्मणकी बात सुनकर कन्या गुणमालाके समीपवर्ती लोग हँसने लगे। यह देख, ब्राह्मणने भी उनसे कहा कि इस तरह आप लोग हँसी न करें बुढ़ापा विपरीतता उत्पन्न कर देता है, क्या आप लोगोंका भी बुढ़ापा नहीं आवेगा ? ॥ ६०३-६०६ ॥ तदनन्तर उन लोगोंने फिर पूछा कि आप आगे कहाँ जावेंगे ? ब्राह्मणने कहा कि जबतक कन्या तीर्थकी प्राप्ति नहीं हो जावेगी तबतक मेरा गमन होता रहेगा ।। ६०७ ॥ इस प्रकार ब्राह्मणका कहा उत्तर सुनकर सबने हँसते हुए कहा कि यह शरीर और अवस्थासे बूढ़ा है, मनसे बूढ़ा नहीं है। तदनन्तर गुणमालाने उसे अग्र आसन पर बैठाकर स्वयं भोजन कराया और फिर कहा कि अथ आपकी जहाँ इच्छा हो वहाँ शीघ्र ही जाइये ॥ ६०८-६०९ ॥ इसके उत्तर में ब्राह्मणने कहा कि ‘हे भद्र ! तूने ठीक कहा’ इस तरह उसकी प्रशंसा करता और डगमगाता हुआ वह ब्राह्मण लाठी टेक कर बड़ी कठिनाईसे उठा और उसकी शय्यापर इस प्रकार चढ़ गया मानो उसने इसे चढ़नेकी आज्ञा ही दे दी हो। यह देख, दासियाँ कहने लगीं कि इसकी निर्लज्जता देखो । वे हाथ पकड़ कर उसे शय्यासे दूर करनेके लिए उद्यत हो गईं। तव ब्राह्मणने कहा कि आप लोगोंने ठीक ही तो कहा है, यथार्थमें लज्जा स्त्रियोंमें ही होती है पुरुषोंमें नहीं, यदि उनमें भी स्त्रियोंके समान ही लज्जा होने लगे तो फिर स्त्रियोंके साथ कामसे संस्कृत किया हुआ उनका समागम कैसे हो सकता है ? ।। ६१०-६१३ ।।
जीवन्धर कुमार का संगीत और इन्द्रिय-विषयों का विवेचन —श्लोक 614 से 624
इस प्रकार वृद्ध ब्राह्मणकी बात सुनकर गुणमालाने विचार किया कि यह केवल ब्राह्मण ही नहीं है किन्तु रूपपरावर्तनी विद्याके द्वारा रूप बदल कर कोई अन्य पुरुष यहाँ आया है। ऐसा विचार कर उसने दासियोंको रोक दिया और उस ब्राह्मण से कहा कि क्या दोष है ? आप मेरे पाहुने हैं अतः इस शय्यापर बैठिये ।। ६१४-६१५ ।। रात्रि समाप्त होनेपर शुद्ध तथा देशज स्वरके भेदोंको जाननेवाले उन वृद्ध ब्राह्मणने चिरकाल तक श्रोत्र तथा मनको हरण करनेवाले मधुर गीत गाये । गन्धर्वदत्ताके विवाहके समय जीवन्धर कुमारने जो अलंकार सहित मनोहर गीत गाये थे उन्हें सुन-कर गुणमालाको जैसा सुख हुआ था वैसा ही सुख इस वृद्धके गीत सुनकर हुआ। सबेरा होनपर गुणमालाने बड़ी विनयके साथ उसके पास जाकर पूछा कि आपको किन-किन शास्त्रोंका अच्छा ज्ञान है ? ।। ६१६-६१८ ।। इसके उत्तर में ब्राह्मणने कहा कि मैंने बड़े यत्नसे धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र और कामशास्त्रका बार-बार अभ्यास किया है। उनमें धर्म और अर्थके फलका निश्चय कामशास्त्रसे ही होता है। वह किस प्रकार होता है ? यदि यह जानना चाहती हो तो मैं इसका कुछ निरूपण करता हूँ। इन्द्रियाँ पाँच हैं और उनके स्पर्श आदि विषय भी पाँच ही हैं। उनमेंसे स्पर्शके कर्कश आदि आठ भेद शास्त्रोंमें कहे गये हैं। विद्वानोंने मधुर आदिके भेदसे रस भी छह प्रकारका कहा है। सुगन्ध और दुर्गन्ध रूप चेतन अचेतन वस्तुओंमें पाया जानेवाला सब तरहका गन्ध भी कृतक और सहजके भेदसे दो प्रकारका माना गया है। श्वेत, कृष्ण आदिके भेदझे रूप पाँच तरहका कहा गया है और जीव तथा अजीवसे उत्पन्न हुए षड्र्ज आदि स्वर सात तरहके होते हैं। इस प्रकार सब मिलाकर पाँचों इन्द्रियोंके अट्ठाईस विषय होते हैं। इनमेंसे प्रत्येकके इष्ट, अनिष्टकी अपेक्षा दो-दो भेद हैं अतः सब मिलकर छप्पन हो जाते हैं ।। ६१९-६२४ ॥
श्लोक 625 से 631 : गुणमाला को उपदेश एवं वास्तविक रूप का प्रकटन
इनमें जो इष्ट विषय हैं वे पुण्य करने-बालोंको प्राप्त होते हैं, धर्मसे पुण्य होता है और निषिद्ध विषयोंका त्याग करना ही सज्जनोंने धर्म कहा है ।। ६२५ ।। इसलिए जो बुद्धिमान् मनुष्य निषिद्ध विषयोंको छोड़कर शेष विषयोंका अनुभव करते हैं वे ही इस लोकमें कामशास्त्रके जाननेवाले कहे जाते हैं ।। ६२६ ॥ यह कहनेके बाद उस ब्राह्मणने गुणमालासे कहा कि तू जिन विषयोंका अनुभव करती है उनमेंसे कितनेमें ही अनेक दोष हैं। इस तरह ब्राह्मणका कहा सुनकर गुणमालाने उससे कहा कि आप उन दोषोंको दूर करनेके लिए उपदेश कीजिये मैं आपकी शिष्या हो जाऊँगी। ऐसा कहनेपर उस ब्राह्मणने गुणमालाको कला आदिकी शिक्षा देकर निपुण बना दिया ।। ६२७-६२८ ।।
एक दिन वे सब लोग विहार करनेके लिए वनमें गये थे। वहाँ जब वह एकान्त स्थानमें गुणमालाके साथ बैठा था तब उसने अपना स्वाभाविक रूप दिखा दिया। उसे देखकर कन्याको संशय उत्पन्न हो गया और वह सती लज्जासहित चुप बैठ गई। यह देखकर ब्राह्मणने सुगन्धित चूर्णसे सम्बन्ध रखनेवाली प्राचीन कथाएँ कह कर बहुत ही शीघ्र उसे विश्वास दिला दिया ।। ६२९-६३१ ।।
श्लोक 632 से 643 : गुणमाला से विवाह एवं मन्त्रियों द्वारा काष्ठाङ्गारिक का निवारण
तदनन्तर वह उसी ब्राह्मणका रूप धारण कर पुष्पशय्यापर बैठ गया और गुणमाला भीम पड़ कर स्नेह वश उसके पर दाबन लगी। यह देख, व सब राजकुमार आदिकी स्तुति करने लगे ।। ६३२-६३३ ॥ इसके बाद ब्राह्मण-वेषधारी जीवन्धर कुमार वनसे अपने
घर आ गये और गुणमालाने भी अपने माता-पितासे जीवन्धर कुमारके आनेका समाचार कह दिया ॥ ६३४ ॥ निदान, उसके माता-पिताने विधि-पूर्वक विवाह कर उसे जीवन्धर कुमारकी प्रिया बना दी। इसके बाद वह जीवन्धर कुछ दिन तक वहीं पर गुणमालाके साथ रहा और सब भाई-बन्धुओंके साथ सुखका उपभोग करता रहा। तदनन्तर सब लोग जिनके बड़े भारी भाग्यकी प्रशंसा कर रहे थे ऐसे, उत्कृष्ट वैभवको धारण करनेवाले जीवन्धर कुमारने विजयगिरि नामक गन्धगज पर सवार होकर चतुरङ्ग सेनाके साथ गन्धोत्कटके घरमें प्रवेश किया ।। ६३५-६३६॥ इस उत्सवकी बात सुनकर काष्ठाङ्गारिक बहुत कुपित हुआ। वह कहने लगा कि देखो उन्मत्त हुआ यह वैश्यका लड़का मुझसे कुछ भी नहीं डरता है। इस प्रकार कहकर वह प्रकट रीतिसे क्रोध करने लगा। यह देख, श्रेष्ठ मंत्रियोंने उसे समझाया कि ये जीवन्धर कुमार हैं, पुण्यके उदयसे इन्हें अभ्युदयकी प्राप्ति हुई है, साक्षात् लक्ष्मीके समान गन्धर्वदत्तासे सहित हैं, यक्ष रूपी अखण्ड मित्रने इनकी वृद्धि की है, मधुर आदि अनेक मित्रोंसे सहित हैं अतः महान् हैं और अजेय पराक्रमके धारक हैं इसलिए इनके साथ द्वेष करना योग्य नहीं है। फिर बलवान्के साथ युद्ध करनेका कोई कारण भी नहीं है। इत्यादि युक्ति-पूर्ण वचनोंके द्वारा मन्त्रियोंने काष्ठाङ्गारिकको शीघ्र ही शान्त कर दिया ।। ६३७-६४३ ।।
श्लोक 644 से 651 : रत्नवती का स्वयंवर एवं चन्द्रक-यन्त्र वेध
सुधर्माचार्य राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि अब इससे भिन्न एक दूसरी प्रकृत कथा और कहता हूं। विदेह देशमें एक विदेह नामका प्रसिद्ध नगर है। राजा गोपेन्द्र उसकी रक्षा करते हैं, शत्रुओंको नष्ट करनेवाले राजा गोपेन्द्रकी रानीका नाम पृथिवी सुन्दरी है और उन दोनोके एक रत्नवती नामकी कन्या है। रत्नवतीने प्रतिज्ञा की थी कि जो चन्द्रक वेधमें चतुर होगा मैं उसे ही मालासे अलंकृत करूँगी – अन्य किसी पुरुषको अपना पति नहीं बनाऊँगी। कन्याकी ऐसी प्रतिज्ञा जानकर उसके पिताने विचार किया कि इस समय धनुर्वेदको जाननेवाले और अतिशय ऐश्वर्यशाली जीवन्धर कुमार ही हैं अतः उनके पास ही यह कन्या लिये जाता हूँ। ऐसा विचार कर वह राजा कन्याको साथ लेकर अपनी सब सेनाके साथ-साथ राजपुर नगर पहुँचा और वहाँ जाकर उसने स्वयंवर প্রিমিकी घोषण करा दी ।। ६४४-६४५ ॥ उस घोषणाको सनकर सभी भूमिगोचरी और विद्याधरराजा उस कन्याके साथ विवाह करनेके लिए राजपुर नगर में जा पहुँचे ।। ६४८ ॥ स्वयंबरके समय उस चन्द्रक यन्त्रके वेधनेमें अनेक राजा स्खलित हो गये चूक गये। उन्हें देख, जीवन्धर कुमार उठे । सबसे पहले उन्होंने सिद्ध परमेष्ठीको नमस्कार किया, फिर अपने गुरु आर्यवर्माकी विनय की और फिर जिस प्रकार बालसूर्य उद्याचलकी शिखरपर आरूढ़ होता है उसी प्रकार उस चक्र पर आरूढ़ हो गये । उस समय वे अतिशय देदीप्यमान हो रहे थे, उन्होंने बिना किसी भूलके चन्द्रक-यन्त्रका वेध कर दिया। और दिशाओंके तट तक गूँजनेवाला सिंहनाद किया ॥ ६४९-६५१ ।।
श्लोक 652 से 663 : स्वयंवर की सफलता एवं सामन्तों को सन्देश
उसी समय धनुष विद्याके जाननेवाले लोग उनकी प्रशंसा करने लगे कि इन्होंने अच्छा निशाना मारा और कन्या रत्नवतीने भी प्रसन्न होकर उनके गलेमें माला पहिनाई ।। ६५२ ।। उस सभामें जो सज्जन पुरुष विद्यमान थे वे यह कहते हुए बहुत ही प्रसन्न हो रहे थे कि जिस प्रकार शरद् ऋतु और हंसावलीका समागम योग्य होता है उसी प्रकार इन दोनोंका समागम भी योग्य हुआ है । ६५३ ।। जो बुद्धिमान् मध्यम पुरुष थे वे यह सोचकर उदासीन हो रहे थे कि सब जगह पुण्यात्माओंकी विजय होती ही है इसमें आश्वर्यकी क्या बात है ॥ ६५४ ॥ और जो काष्ठाङ्गारिक आदि नीच मनुष्य थे वे जीवन्धरसे पहले भी पराभव प्राप्त कर चुके थे अतः उस सब पराभवका स्मरण कर दुष्ट क्रोधसे प्रेरित हो रहे थे। वे पापी भयंकर युद्धके द्वारा कन्याको हरण करनेका उद्यम करने लगे । नीति-निपुण जीवन्धर कुमारने उनकी यह विषमता जान ली जिससे उन्होंने उसी समय भेंट लेकर तथा निम्नलिखित सन्देश देकर बहुतसे दूत सत्यन्धर महाराज के सामन्तोंके पास भेजे ।। ६५५-६५७ ॥ ‘मैं सत्यन्धर महाराजकी विजया रानीसे उत्पन्न हुआ पुत्र हूँ। अपने पूर्वकृत कर्मके उद्यसे में उत्पन्न होनेके बाद ही अपने माता-पितासे वियुक्त होकर गन्धोत्कट सेठके घरमें वृद्धिको प्राप्त हुआ हूँ। यह पापी काष्ठाङ्गारिक काष्ठाङ्गार (कोयला) बेचकर अपनी आजीविका करता था परन्तु आपके महाराजने इसे मन्त्री बना लिया था। यह राजसी प्रकृति अत्यन्त नीच पुरुष है। छिद्र पाकर इस दुराशयने साँपकी तरह उन्हें मार दिया और स्वयं उनके राज्य पर आरूढ़ हो गया। यह न केवल मेरे ही द्वारा नष्ट करनेके योग्य है परन्तु शत्रु होनेसे आप लोगोंके द्वारा भी नष्ट करनेके योग्य है। यदि आज यह रसातलमें भी चला जाय तो भी मेरे द्वारा अवश्य ही मारा जायगा । आप लोग सत्यन्धर महाराजके सामन्त हैं, उनके भक्त हैं, योद्धा हैं, उनके द्वारा पुष्ट हुए हैं, अतिशय उदार हैं और कृतज्ञ हैं इसलिए आप तथा अन्य अनुजीवी लोग इस कृतघ्न्नको अवश्य ही नष्ट करें’ ।। ६५८-६६३ ।।
श्लोक 664 से 671 : युद्ध में काष्ठाङ्गारिक का वध एवं राज्याभिषेक
सामन्त लोग जीवन्धर कुमारका सन्देश सुनकर कहने लगे कि यह सचमुच ही राजपुत्र है । इस तरह सन्मान कर बहुतसे सामन्त उनके साथ आ मिले ।। ६६४ ॥ तदनन्तर- अपनी सेना तैयार कर जीवन्धर कुमारने स्वयं ही उस पर चढ़ाई की और चिरकाज तक नाना प्रकारका युद्ध कर उसकी सेनाको हरा दिया ।। ६६५ ।। जीवन्धर कुमार, मदोन्मत्त तथा अतिशय बलवान् विजयगिरि नामक हाथी पर सवार थे और जिसकी आज्ञा बहुत समयसे जभी हुई थी ऐसा उद्धत काष्ठाङ्गारिक अशनिबेग नामक प्रसिद्ध हाथी पर आरूढ़ था। जीवन्धर कुमारने क्रोधमें आकर चक्रते शत्रु काष्ठाङ्गारिकको मार गिराया, यह देख उसकी सेना भयसे भागने लगी तब जीवन्धर कुमारने अभय घोषणा कर सबको आश्वासन दिया ॥ ६६६-६६८ ।। तदनन्तर कुमारने अपने सब भाई-बन्धुओंको बुलाया और सबको नम्र देखकर उस कालके योग्य सम्भाषण आदिके द्वारा सबको हर्ष प्राप्त कराया ॥ ६६९ ॥ इसके बाद जिनेन्द्र भगवान्की पूजा कर उत्तम माङ्गलिक क्रियाएँ की गई और फिर यक्ष तथा सब राजाओंने मिलकर जीवन्धर कुमारका राज्याभिषेक किया। तदनन्तर रत्नवतीके साथ विवाहका महोत्सव प्राप्त कर गन्धर्वदत्ताको महारानीका पट्टबन्ध बाँधा ।। ६७०-६७१ ।।
श्लोक 672 से 682 : माता विजया से मिलाप एवं सर्व-त्याग पूर्वक दीक्षा
नन्दाल्य आदि जाकर माता विजयाको तथा हेमाभा आदि अन्य स्त्रियों को ले आये। उन सबके साथ जीवन्धर कुमार परम ऐश्वर्यको प्राप्त हुए। उस समय वे अतिशय बलवान् थे और जिसके समस्त शत्रु नष्ट कर दिये गये हैं ऐसी समस्त प्रजाका नीतिपूर्वक पालन करते थे। अपने पुण्यके फल-स्वरूप अनायास ही प्राप्त हुए इष्ट भोगोंका लीलापूर्वक उपभोग करते हुए सुखते रहते थे ॥ ६७२-६७३ ।। किसी एक समय महाराज जीवन्धर सुरमलय नामक उद्यानमें विहार कर रहे थे वहाँ पर उन्होंने वरधर्म नामक मुनिराजके दर्शन किये, उनके समीप जाकर नमस्कार किया, उनसे तत्त्वोंका स्वरूप जाना और व्रत लेकर सम्यग्दर्शनको निर्मल किया। नन्दाय आदि भाइयोंने भी सम्यग्दर्शन व्रत और शील धारण किये। इस प्रकार जीवन्धर महाराज अपने इन आप्त जनोंके साथ सुखप्ते समय बिताने लगे। तदनन्तर वे किसी एक दिन अशोक वनमें गये वहाँ पर जिनकी क्रोधाग्नि प्रज्वलित हो रही थी ऐसे दो बन्दाके झुण्डोंको परस्पर लड़ते हुए देख संसारसे विरक्त हो गये । उसी वनके मध्यमें एक प्रशस्तवङ्क नामके चारण मुनि विराजमान थे इसलिए जीवन्धर महाराजने बड़े आदरसे उनके दर्शन किये और पहले सुने अनुसार अपने पूर्वभवोंकी परम्परा सुनी ।। ६७४-६७८।। तदनन्तर उन्होंने जिन-पूजाकर अपनी विशुद्धता बढ़ाई फिर उसी सुरमलय उद्यानमें श्री वीरनाथ जिनेन्द्रका आगमन सुना, सुनते ही बड़े वैभवके साथ वहाँ जाकर उन्होंने परमेश्वरकी पूजा की और गन्धर्वेदत्ता महादेवीले पुत्र वसुन्धर कुमारके लिये विधिपूर्वक राज्य दिया। जिनका मोह शान्त हो गया है और जिनका मन अतिशय विशाल है ऐसे उन जीवन्धर महाराजने अपने मामा आदि राजाओं और नन्दाढ्य मधुर आदि भाइयोंके साथ सर्व परिग्रहका त्याग कर संयम धारण कर लिया सो ठीक ही है क्योंकि जो राजा लोग भोग भोग चुकते हैं वे अन्तमें आकांक्षा रहित हो ही जाते हैं ।। ६७९-६८२ ।।
श्लोक 683 से 691: रानियों की दीक्षा, जीवन्धर स्वामी का मोक्ष-योग एवं कर्म-विपाक
सम्यग्दर्शनको धारण करनेवाली गन्धर्वदत्ता आदि आठों रानियोंने तथा उन रानियोंकी माताओंने सत्यन्धर महाराजकी महादेवी विजयाके साथ चन्दना आर्याके समीप उत्कृष्ट संयम धारण कर लिया सो ठीक ही है क्योंकि एक ही बड़ा पुरुष अनेक लोगोंकी अर्थ-सिद्धिका कारण हो जाता है ।। ६८३-६८४ ॥ सुधर्माचार्य राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे राजन् ! तूने जिनके विषयमें पूछा था वे यही जीवन्धर मुनिराज हैं, ये बड़े तपस्वी हैं और इस समय श्रुतकेवली हैं। घातिया कर्मोंको नष्ट कर ये अनगारकेवली होंगे और श्री महावीर भगवान्के साथ विहार कर उनके मोक्ष चले जानेके बाद विपुलाचल पर्वत पर समस्त कर्मोंको नष्ट कर मोक्षका उत्कृष्ट सुख प्राप्त करेंगे- वहाँ ये अष्टगुणों से सम्पूर्ण, कृतकृत्य और निरञ्जन – कर्म-कालिमासे रहित हो जावेंगे ।। ६८५-६८७ ।। इस प्रकार सुधर्माचार्य गणधर के वचनामृतका पानकर राजा श्रेणिक बहुत ही सन्तुष्ट हुआ सो ठीक ही है क्योंकि धर्म किसकी प्रीतिके लिए नहीं होता ? ॥ ६८८ ॥ जिन्होंने पूर्व पुण्य कर्मके उद्यसे अन्य लोगोंको दुर्लभ आठ कन्याएँ प्राप्त कीं, जिन्होंने पिताका घात करने वाले शत्रुको युद्धमें परलोक पहुँचाया, जिन्होंने दीक्षा लेकर कर्म रूपी अन्धकारको नष्ट किया और जो मुक्ति रूपी लक्ष्मीसे सुशोभित हुए ऐसे लक्ष्मीपति श्री जीवन्धर स्वामीको मैं हाथ जोड़करनमस्कार करता हूँ ।। ६८९ ॥ जीवन्धर कुमारने पूर्वभवमें मूर्खतासे दयाको दूर कर हंसके बच्चेको सोलह दिन तक उसके माता-पितासे अलग रक्खा था इसीलिए उन्हें अपने कुटुम्बसे अलग रहना पड़ा था अतः हे भव्य जनो ! पापको दूरसे ही छोड़ो ॥ ६९० ॥ देखो, कहाँ तो पिता राजा सत्यन्धरकी मृत्यु, कहाँ श्मशानमें जन्म लेना, कहाँ वैश्यके घर जाकर पलना, कहाँ अपने द्वारा यक्षका उपकार होन्स, कहाँ वह अभ्युदयकी प्राप्ति, और कहाँ शत्रुका घात करना। इन जीवन्धर महाराजमें ही यह विचित्र कर्मोंका विपाक है ।। ६९१ ।।
इस प्रकार आर्य नामसे प्रसिद्ध, भगवद्गुणभद्राचार्य प्रणीत त्रिषष्टिलक्षण महापुराण संग्रहमें चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन करनेवाला यह पचहत्तरवाँ पर्व पूर्ण हुआ ।
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आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
आदिपुराण भाग – 2 Adi purana Part-2 by Acharya Jinasena