Hindi Translation of Uttar puran Parv 76
उत्तरपुराण पर्व 76 में वैराग्य, व्रत, संयम, धर्म, कर्म और मोक्ष की महिमा का वर्णन किया गया है। जम्बूकुमार और प्रीतिङ्कर की कथाओं के माध्यम से बताया गया है कि सांसारिक विषय-सुख क्षणिक और अतृप्तिकारक हैं, जबकि व्रत, तप और संयम आत्मकल्याण के साधन हैं।
इस पर्व में जिनशासन की प्रभावना, धर्म की रक्षा तथा धर्म-विहीन समाज में होने वाले पतन का भी वर्णन है। कालचक्र के अन्तर्गत धर्म और अधर्म की वृद्धि-ह्रास तथा विभिन्न कालों की परिस्थितियों को बताया गया है।
भगवान् महावीर के जीवन, पूर्वभवों, केवलज्ञान और निर्वाण का वर्णन करते हुए यह प्रतिपादित किया गया है कि सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र के द्वारा जीव कर्मों का क्षय करके परमात्मपद प्राप्त कर सकता है। अंत में भगवान् महावीर की स्तुति और उनके मोक्षमार्ग की महिमा के साथ पर्व का समापन होता है।
गणधर भगवान् बताते हैं कि जम्बूकुमार भरतक्षेत्र के अन्तिम केवलज्ञानी होंगे। उनका जन्म अत्यन्त शुभ परिस्थितियों में होगा और वे बाल्यकाल से ही वैराग्ययुक्त तथा विकारों से दूर रहेंगे। भगवान् महावीर के निर्वाण के समय उन्हें केवलज्ञान प्राप्त होगा और वे आगे धर्म का प्रचार करेंगे। जम्बूकुमार के गृहस्थ जीवन को बनाए रखने के लिए उनके संबंधी उनका विवाह चार कन्याओं से कराते हैं, परन्तु उनका मन संसार और भोगों में नहीं लगता।
उसी समय प्रसिद्ध चोर विद्युत्प्रभ, जिसे विद्युच्चोर कहा गया है, धन चुराने के उद्देश्य से उनके घर पहुँचता है। जम्बूकुमार की विरक्ति देखकर वह उन्हें संसार में रोकने के लिए अनेक दृष्टान्त देता है, परन्तु जम्बूकुमार प्रत्येक दृष्टान्त का उत्तर देकर यह सिद्ध करते हैं कि क्षणिक विषय-सुख के पीछे भागना मूर्खता है। वे बताते हैं कि संसार के सुख तृप्ति नहीं देते और राग-द्वेष ज्ञान, दर्शन तथा चारित्र के अमूल्य रत्नों को नष्ट कर देते हैं। अन्ततः जम्बूकुमार का वैराग्य इतना प्रभावशाली होता है कि उनकी माता, पत्नियाँ और विद्युत्चोर भी संसार से विरक्त हो जाते हैं।
इसके बाद जम्बूकुमार की दीक्षा, संघ में प्रवेश और आगे उनके केवलज्ञान की भविष्यवाणी की जाती है। उनके माध्यम से जिनशासन की निरन्तरता और धर्मपरम्परा को विशेष महत्त्व दिया गया है।
इसके बाद अनावृत देव और विद्युन्माली देव के पूर्वभवों का वर्णन आता है। लोभ, व्यसन और अनुचित प्रवृत्तियों के कारण जीव किस प्रकार पतित होता है तथा पश्चात्ताप, पुण्य और सम्यग्दर्शन से उसकी दिशा कैसे बदलती है, यह बताया गया है। सागरदत्त की कथा के माध्यम से अनित्य संसार को देखकर उत्पन्न होने वाले वैराग्य और संयम की महिमा स्पष्ट की गई है।
भवदेव और भगदत्त की कथा में भाई द्वारा भाई को संयम की ओर प्रेरित करने का प्रसंग आता है। भवदेव बाह्य रूप से मुनि बन जाने के बाद भी पुराने मोह में फँसता है, परन्तु उपदेश, आत्मनिन्दा और संसार की वास्तविकता का स्मरण होने पर पुनः संयम में स्थिर होता है। गुरु की भूमिका को संसाररूपी कुएँ से जीव को निकालने वाले वैद्य के समान बताया गया है। मिथ्यात्व, कषाय और विषयासक्ति के कारण जीव बार-बार संसार में गिरता है, जबकि जिनधर्म सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र के द्वारा उसे मुक्ति-पथ की ओर ले जाता है।
विद्युन्माली के पूर्वभव का वर्णन करते हुए यह भी कहा गया है कि तप, संयम और निर्मल परिणामों का फल उच्च देवगति के रूप में प्राप्त होता है तथा उसी पुण्य के कारण भविष्य में जम्बूकुमार के साथ उसका सम्बन्ध बनेगा।
प्रीतिङ्कर के पूर्वभवों का वर्णन करते हुए बताया गया है कि उसके परिवार में धर्मभावना, दान और जिनपूजा की प्रवृत्ति थी। उसके पिता ने संन्यास धारण किया और दोनों भाइयों ने धर्म तथा दान में प्रगति की। मुनि के आशीर्वाद से प्रीतिङ्कर का जन्म हुआ और उसे अल्पायु से ही शास्त्रज्ञान तथा धार्मिक संस्कार प्राप्त हुए।
प्रीतिङ्कर समुद्रयात्रा पर जाता है और भूमितिलक नगर पहुँचता है। वहाँ उसे एक विचित्र परिस्थिति का सामना करना पड़ता है, जिसमें साहस, धर्मबुद्धि और संयम के कारण वह संकट से निकलता है। भीमक के साथ संघर्ष में वह विजय प्राप्त करता है और नगर की कन्या तथा सम्पत्ति उसके जीवन में आती है। बाद में उसके साथ अन्याय करने वाले नागदत्त का प्रसंग आता है, परन्तु प्रीतिङ्कर प्रतिशोध के स्थान पर उदारता और सज्जनता का परिचय देता है।
जिनमन्दिर में प्रीतिङ्कर द्वारा की गई स्तुति में जिनेन्द्र के सर्वज्ञत्व, निर्मल ज्ञान और संसार के अज्ञान-अन्धकार को दूर करने वाली जिनवाणी की महिमा व्यक्त होती है। नन्द और महानन्द यक्ष उसे उसके पूर्वभव और गुरु-सम्बन्ध की जानकारी देकर सुरक्षित रूप से उसके नगर तक पहुँचाते हैं। आगे सत्य प्रकट होने पर प्रीतिङ्कर को सम्मान, सम्पत्ति और विवाह-संबंध प्राप्त होते हैं।
इसके बाद मुनि सागरसेन से धर्म का स्वरूप सुनकर प्रीतिङ्कर व्रत की महिमा समझता है। शृगाल की कथा द्वारा बताया जाता है कि छोटा-सा व्रत भी अत्यन्त महान फल दे सकता है। शृगाल रात्रिभोजन त्याग का व्रत लेकर तप करता है और अगले जन्म में प्रीतिङ्कर के रूप में समृद्धि प्राप्त करता है। इस प्रकार धर्म और व्रत के कारण-कार्य सम्बन्ध को स्पष्ट किया गया है।
प्रीतिङ्कर समझता है कि व्रत मनुष्य के लिए सुरक्षा, सम्मान और उत्तम गति का कारण है। व्रतशील व्यक्ति विश्वसनीय माना जाता है, जबकि व्रतहीन व्यक्ति अविश्वास का पात्र बनता है। धर्म सुख का और पाप दुःख का कारण है; इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति केवल वर्तमान जन्म के हित-अहित को ही नहीं, बल्कि आगामी जन्म को भी ध्यान में रखकर व्रत धारण करता है।
अन्ततः प्रीतिङ्कर अपनी सम्पत्ति पुत्र को सौंपकर भगवान् महावीर के पास संयम ग्रहण करता है। सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र की साधना द्वारा उसके घातिया कर्मों का क्षय और आगे परमात्मपद की प्राप्ति का वर्णन किया गया है।
राजा श्रेणिक के प्रश्न पर गणधर भगवान् अपसर्पिणी और उत्सर्पिणी काल का विस्तृत वर्णन करते हैं। भगवान् महावीर के निर्वाण के पश्चात् दुःषमा काल में मनुष्यों की आयु, शरीर, सदाचार और धार्मिक प्रवृत्तियों में निरन्तर ह्रास बताया गया है। धर्म की क्षीणता के साथ पाखण्ड और अधर्म बढ़ते हैं और कल्कि जैसे अत्याचारी शासक का वर्णन आता है। उसके द्वारा दिगम्बर मुनियों पर अत्याचार का प्रयास तथा सम्यग्दृष्टि देव द्वारा उसके विनाश का प्रसंग धर्म-संरक्षण की महत्ता को स्पष्ट करता है।
इसके आगे अतिदुःषमा काल का वर्णन है, जिसमें मनुष्य, पृथिवी, जल, वनस्पति और प्राकृतिक संसाधनों का अत्यन्त ह्रास होता है। फिर उत्सर्पिणी के आरम्भ में वर्षा, वनस्पति और जीवन के पुनरुत्थान से क्रमशः संसार की स्थिति सुधरती है। आगे चलकर मनुष्यों में सदाचार, मैत्री, दया, सत्य, संतोष और विनय का विकास होता है तथा तीसरे काल में कुलकर, तीर्थंकर, चक्रवर्ती, बलभद्र और नारायण आदि शलाकापुरुषों की उत्पत्ति होती है।
विदेहक्षेत्रों, कर्मभूमियों और भोगभूमियों की व्यवस्था तथा विभिन्न प्रकार के मनुष्यों का भी वर्णन किया गया है। इस प्रकार यह भाग जैन कालचक्र और लोकव्यवस्था का एक व्यापक चित्र प्रस्तुत करता है।
भगवान् महावीर पावापुर पहुँचकर अन्तिम साधना में स्थित होते हैं। शुक्लध्यान की उच्च अवस्थाओं को प्राप्त कर वे समस्त अघातिया कर्मों का क्षय करते हैं और एक हजार मुनियों के साथ मोक्ष प्राप्त करते हैं। उनके निर्वाण के साथ गौतम गणधर के केवलज्ञान और आगे जम्बूस्वामी के केवलज्ञान की परम्परा का वर्णन किया गया है।
इसके बाद भगवान् महावीर के जीव के अनेक पूर्वभवों का क्रम बताया जाता है। विभिन्न मनुष्य, देव, नरक और तिर्यञ्च पर्यायों में भ्रमण करते हुए जीव अन्ततः शुद्ध धर्म, तप और पुण्य के प्रभाव से क्रमशः उच्च अवस्थाओं को प्राप्त करता है और अन्त में वर्धमान तीर्थंकर बनता है। इस कथा का मुख्य संदेश कर्म, पुनर्जन्म और आत्मशुद्धि की निरन्तर प्रक्रिया को स्पष्ट करना है।
अन्तिम भाग में गौतम गणधर की वाणी से राजा श्रेणिक और सभा को अत्यन्त आध्यात्मिक संतोष प्राप्त होता है। भगवान् महावीर की स्तुति करते हुए उनके सर्वज्ञत्व, वीतरागता, अनन्तवीर्य, निःस्वार्थ उपदेश, जीवन्मुक्त अवस्था और मोक्षमार्ग की महिमा का प्रतिपादन किया गया है। जिनेन्द्र को ऐसा दाता बताया गया है जो सांसारिक सम्पत्ति नहीं, बल्कि मोक्ष का मार्ग प्रदान करते हैं।
विभिन्न नयों की अपेक्षा अरहन्त की अवस्था का विश्लेषण करते हुए बताया गया है कि कर्मों की अवशिष्ट सत्ता के बावजूद मोह का अभाव होने से उनका आत्मस्वरूप शुद्ध और मुक्तभाव की ओर परिणत है। सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र की पूर्णता ही उनकी वन्दनीयता का आधार है। अन्ततः राजा श्रेणिक भगवान् महावीर और गौतम गणधर की स्तुति करके नगर लौटते हैं। गुणभद्राचार्य इस पर्व की समाप्ति की घोषणा करते हैं।
उत्तरपुराण पर्व 76 सारांश
श्लोक 1 से 11 — धर्मरुचि मुनिराज का ध्यान और परिचय
अथानन्तर – सुर-असुरोंसे घिरे हुए भगवान् महावीर अनेक देशोंमें विहार कर किसी दिन फिर उसी राजगृह नगरमें आ पहुँचे ॥ १ ॥ बारह सभाओंसे पूज्य वे भगवान् विपुलाचल पर्वत पर विराजमान हुए। राजा श्रेणिक उनकी स्तुतिके लिए गया, जाते समय उसने एक वृक्षके नीचे शिलातल पर विराजमान धर्मरुचि नामके मुनिराजको देखा। वे मुनिराज निस्तरङ्ग समुद्रके समान निश्चल थे, दीपकके समान निष्कम्प थे और जल सहित मेघके समान उन्नत थे, उन्होंने इन्द्रियोंके व्यापारको जीत लिया था, वे पर्यङ्कासनसे विराजमान थे, श्वासोच्छ्वासको उन्होंने थोड़ा रोक रक्खा था, और नेत्र कुछ बन्द कर लिये थे ॥ २-४ ॥ इस प्रकार ध्यान करते हुए मुनिराजको देखकर श्रेणिकने उनकी बन्दना की परन्तु मुनिराजका मुख कुछ विकृत हो रहा था इसलिए उसे देखकर श्रेणिकको कुछ शङ्का उत्पन्न हो गई। वहाँ से चलकर वह भगवान् महावीर जिनेन्द्रके समीप पहुँचा । वहाँ उसने हाथ जोड़कर उनकी स्तुति की फिर गौतमगणधरकी स्तुति कर उनसे पूछा कि हे प्रभो ! मैंने मार्गमें एक तपस्वी मुनिराज देखे हैं वे ऐसा ध्यान कर रहे हैं मानो उनका रूप धारण कर साक्षात् ध्यान ही विराजमान हो । हे नाथ! वे कौन हैं? यह जाननेका मुझे बड़ा कौतुक हो रहा है सो कृपा कर कहिये । इस प्रकार राजा श्रेणिकके द्वारा पूछे जाने पर वचनोंके स्वामी श्रीगणधर भगवान् इस प्रकार कहने लगे ॥ ५-७ ॥
इसी भरत क्षेत्रके अङ्ग देशमें सर्व वस्तुओंसे सहित एक चम्पा नामकी नगरी है। उसमें राजा श्वेतवाहन राज्य करता था। इन्हीं भगवान् महावीर स्वामीप्ते धर्मका स्वरूप सुनकर उसका चित्त तीनों प्रकारके वैराग्यसे भर गया जिससे इसने विमलवाहन नामक अपने पुत्रके लिए राज्य-का भार सौंपकर बहुत लोगोंके साथ संयम धारण कर लिया। बहुत दिन तक मुनियोंके समूहके साथ विहारकर अखण्ड संयमको धारण करते हुए वे मुनिराज यहाँ आ विराजमान हुए हैं। ये दश धर्मोमें सदा प्रेम रखते थे इसीलिए लोगोंके द्वारा धर्मरुचिके नाम से प्रसिद्ध हुए हैं सो ठीक ही है क्योंकि मित्रता वही है जो सर्वं जीवोंमें होती है ॥ ८-११॥
श्लोक 12 से 20— मुनिराज के मन में स्नेह और मान का उदय
आज ये मुनि एक महीनेके उपवासके बाद नगरमें भिक्षाके लिए गये थे वहाँ तीन मनुष्य मिलकर इनके पास आये। उनमें एक मनुष्य मनुष्योंके लक्षण शास्त्रका जानकार था, उसने इन मुनिराजको देखकर कहा कि इनके लक्षण तो साम्राज्य पदवीके कारण हैं परन्तु ये भिक्षाके लिए भटकते फिरते हैं इसलिए शास्त्र में जो कहा है।झूठ मालूम होता है। इसके उत्तर में दूसरे मनुष्यने कहा कि शास्त्रमें जो कहा गया है वह झूठ नहीं है। ये साम्राज्य तन्त्रका त्यागकर ऋषि हो गये हैं। किसी कारणसे विरक्त होकर इन्होंने अपना राज्यका भार बालक-छोटे ही वयको धारण करनेवाले अपने पुत्रके लिए दे दिया है और स्वयं विरक्त होकर इस प्रकार तपश्चरण कर रहे हैं। इसके वचन सुनकर तीसरा मनुष्य बोला कि ‘इसका तप पापका कारण है अतः इससे क्या लाभ है ? यह बड़ा दुरात्मा है इसलिए दया छोड़कर लोक-व्यवहारसे अनभिज्ञ असमर्थ बालकको राज्यभार सौंपकर केवल अपना स्वार्थ सिद्ध करनेके लिए यहाँ तप करनेके लिए आया है। मन्त्री आदि सब लोगोंने उस बालकको सांकलसे बाँध रक्खा है और राज्यका विभागकर पापी लोग इच्छानुसार स्वयं उसका उपभोग करने लगे हैं’। तीसरे मनुष्य के उक्त वचन सुनकर इन मुनिका हृदय स्नेह और मानसे प्रेरित हो उठा जिससे वे भोजन किये बिना ही नगरसे लौटकर वनके मध्यमें वृक्षके नीचे आ बैठे हैं ।। १२-२० ॥
श्लोक 21 से 30 — रौद्रध्यान से केवलज्ञान तक
बाह्य कारणोंके मिलने-से उनके अन्तःकरणमें तीब्र अनुभागवाले क्रोध कषायके स्पर्धकोंका उदय हो रहा है। संक्लेशरूप परिणामोंसे उनके तीन अशुभलेश्याओंकी वृद्धि हो रही है। जो मन्त्री आदि प्रतिकूल हो गये हैं उनमें हिंसा आदि सर्व प्रकारके निग्रहोंका चिन्तवन करते हुए वे संरक्षणानन्द नामक रौद्र ध्यानमें प्रविष्ट हो रहे हैं। यदि अब आगे अन्तर्मुहूर्त तक उनकी ऐसी ही स्थिति रही तो वे नरक आयुका बन्ध करनेके योग्य हो जावेंगे ॥ २१-२३ ॥ इसलिए हे श्रेणिक ! तू शीघ्र ही जाकर उसे समझा दे और कह दे कि हे साधो ! शीघ्र ही यह अशुभ ध्यान छोड़ो, क्रोधरूपी अग्निको शान्त करो, मोहके जालको दूर करो, मोक्षका कारणभूत जो संयम तुमने छोड़ रक्खा है उसे फिरसे ग्रहण करो, यह स्त्री-पुत्र तथा भाई आदिका सम्बन्ध अमनोज्ञ है तथा संसारका बढ़ानेवाला है । इत्यादि युक्ति पूर्ण वचनोंसे तू उनका स्थितीकरण कर। तेरे उपदेशसे वे पुनः स्वरूपमें स्थित होकर शुक्त ध्यानरूपी अग्निके द्वारा घातिया कर्मरूपी सघन अटर्कीको भस्म कर देंगे और नव केवललब्धियों से देदीप्यमान शुद्ध स्वभावके धारक हो जावेंगे ।। २४-२७ ।। गणधर महाराजके उक्त वचन सुनकर राजा श्रेणिक रिघ्र ही उन मुनिके पास गया और उनके बताये हुए मार्गसे उन्हें प्रसन्न कर आया ।। २८ ।। उक्त मुनिराजने भी कषायके भयसे उत्पन्न होनेवाली शान्तिसे उत्पन्न होनेवाली सामग्री प्राप्तकर द्वितीय शुक्तध्यानके द्वारा केवलज्ञान उत्पन्न कर लिया ॥ २९ ॥ उसी समय इन्द्र आदि देव उन धर्मरुचि केवलीकी पूजा करनेके लिए आये सो राजा श्रेणिकने भी उन सबके साथ उनकी पूजा की और फिर वह भगवान् वीरनाथके पास आया ॥ ३० ॥
श्लोक 31 से 42 — जम्बूकुमार के जन्म एवं केवलज्ञान परंपरा का भविष्य
आते ही उसने गणधर स्वामीसे पूछा कि हे प्रभो ! इस भरतक्षेत्रमें सबसे पीछे स्तुति करने योग्य केवलज्ञानी कौन होगा ? इसके उत्तर में गणधर कुछ कहना ही चाहते थे कि उसी समय वहाँ देदीप्यमान मुकुटका धारक विद्युन्मालो नामका ब्रह्मस्वर्गका इन्द्र आ पहुँचा, वह इन्द्र ब्राहृदय नामक विमानमें उत्पन्न हुआ था, प्रियदर्शना, सुदर्शना, विद्युद्वेगा और प्रभावेगा ये चार उसकी देवियाँ थीं, उन सभीके साथ वह वहाँ आया था। आकर उसने जिनेन्द्र भगवान्की बन्दना की। तदनन्तर यथास्थान बैठ गया । उसकी ओर दृष्टिपातकर गणधर स्वामी राजा श्रेणिकसे कहने लगे कि इसके द्वारा ही केवल-ज्ञानका विच्छेद हो जायगा अर्थात् इसके बाद फिर कोई केवलज्ञानी नहीं होगा। वह किस प्रकार होगा यदि यह जानना चाहते हो तो मैं इसे भी कहता हूँ, सुन। आजसे सातवें दिन यह ब्रह्मेन्द्र, स्वर्गसे च्युत होकर इसी नगरके सेठ अर्हद्दासकी स्त्री जिनदासीके गर्भमें आवेगा । गर्भमें आनेके पहले जिनदासी पाँच स्वप्न देखेगी- हाथी, सरोवर, चावलोंका खेत, जिसकी शिखा ऊपस्को जा रही है ऐसी धूम रहित अग्नि और देव-कुमारोंके द्वारा लाये हुए जामुनके फल। यह पुत्र बड़ा ही भाग्यशाली और कान्तिमान् होगा, जम्बूकुमार इसका नाम होगा, अनावृत देव उसकी पूजा करेगा, वह अत्यन्त प्रसिद्ध तथा विनीत होगा, और यौवनके प्रारम्भसे ही वह विकारसे रहित होगा। जिस समय भगवान् महावीर स्वामी मोक्ष प्राप्त करेंगे उसी समय मुझे भी केवलज्ञान प्राप्त होगा । तदनन्तर सुधर्माचार्य गणधरके साथ संसार रूपी अग्निसे संतप्त हुए पुरुषोंको धर्मामृत रूपी जलसे आनन्दित करता हुआ मैं फिर भी इसी नगरमें आकर विपुलाचल पर्वत पर स्थित होऊँगा। मेरे आनेका समाचार सुनकर इस नगरका राजा चेलिनीका पुत्र कुणिक सब परिवारके साथ आवेगा और पूजा वन्दना कर तथा धर्मका स्वरूप सुनकर स्वर्ग और मोक्षका साधनभूत दान, शीलोपवास आदि धारण करेगा ।। ३१-४२ ॥
श्लोक 43 से 64 — जम्बूकुमार की वैराग्य भावना एवं ऊँट की कथा
उसी समय जम्बूकुमार भी विरक्त होकर दीक्षा ग्रहण करनेके लिए उत्सुक होगा परन्तु भाई-बन्धु लोग उसे समझावेंगे कि थोड़े ही वर्षोंके व्यतीत होने-पर हम लोग भी तुम्हारे ही साथ दीक्षा धारण करेंगे। भाई-बन्धुओंके इस कथनको वह टाल नहीं सकेगा और उस समय पुनः नगर में वापिस आ जावेगा। तदनन्तर भाई-बन्धु लोग उसे मोहमेंफँसानेके लिए सुखदायी बन्धन स्वरूप उसका विवाह करना प्रारम्भ करेंगे सो ठीक ही है क्योंकि भाई-बन्धु लोग कल्याणमें विघ्न्न करते ही हैं ।॥ ४३-४५ ।। इसी नगरमें सागरदत्त सेठकी पद्मावती श्रीसे उत्पन्न हुई उत्तम लक्षणोंवाली पद्मश्री नामकी कन्या है जोकि दूसरी लक्ष्मीके समान जान पड़ती है। इसी प्रकार कुवेरदत्त सेठकी कनकमाला स्त्रीसे उत्पन्न हुई शुभ नेत्रोंवाली कनकश्री नामकी कन्या है। इसके अतिरिक्त वैश्रवणदत्त सेठकी विनयवती स्त्रीसे उत्पन्न हुई देखनेके योग्य विनयश्री नामकी पुत्री है और इसके सिवाय धनद्रत सेठकी धनश्री स्त्रीसे उत्पन्न हुई रूपश्री नामकी कन्या है। इन चारों पुत्रियोंके साथ उसका विधि पूर्वक विवाह होगा । तदनन्तर पाणिग्रहण पूर्वक जिसका विवाह हुआ है ऐसा जम्बूकुमार, उत्तम मणिमय दीपकोंके द्वारा जिसका अन्धकार नष्ट हो गया है, जो नाना प्रकारके रत्नोंके चूर्णसे निर्मित रङ्गावलीसे सुशोभित है और अनेक प्रकारके सुग-न्धित फूलोंके उपहारसे सहित है ऐसे महलके भीतर पृथिवी तलपर बैठेगा। ‘मेरा यह पुत्र रागसे प्रेरित होकर विकार भावको प्राप्त होता हुआ मन्द मुसकान तथा कटाक्षावलोकन आदिसे युक्त होता है या नहीं’ यह देखनेके लिए उसकी माता स्ने६ वश अपने आपको छिपाकर वहीं कहीं खड़ी होगी। उसी समय सुरम्य देशके प्रसिद्ध पोदनपुर नगरके स्वामी विद्युद्राजकी रानी विमलमता से उत्पन्न हुआ विद्युत्प्रभ नामका चोर आवेगा। वह विद्युत्प्रभ महापापी तथा नम्बर एकका चोर होगा, शूरवीरोंमें अग्रेसर तथा तीक्ष्ण प्रकृतिका होगा। वह किसी कारण वश अपने बड़े भाईसे कुपित होकर पाँच-सौ योद्धाओंके साथ नगरसे निकलेगा और विद्युच्चोर नाम रखकर इस नगरी-में आवेगा। वह चोर शास्त्रके अनुसार तन्त्र-मन्त्र के विधानसे अदृश्य होकर किवाड़ खोलना आदि सब कार्योंका जानकार होगा और सेठ अर्हद्दासके घरके भीतर रखे हुए धनको चुरानेके लिए इसीके घर आवेगा। वहाँ जम्बूकुमारकी माताको निद्रारहित देखकर वह अपना परिचय देगा और कहेगा कि तू इतनी रात तक क्यों जाग रही है ? ।। ४६-५७ ॥ इसके उत्तर में जिनदासी कहेगी कि ‘मेरे यही एक पुत्र है और यह भी संकल्प कर बैठा है कि मैं सबेरे ही दीक्षा लेनेके लिए तपोवनको चला जाऊँगा’ इसीलिए मुझे शोक हो रहा है। यदि तू बुद्धिमान् है और किन्हीं उपायोंसे इसे इस आग्रहसे बुढ़ाता है-इसका दीक्षा लेनेका आग्रह दूर करता है तो आज मैं तुझे तेरा मनचाहा सब धन दे दूँगी। जिनदासीकी बात सुनकर विद्युच्चोरने यह कार्य करना स्वीकृत किया । तदनन्तरवह विचार करने लगा कि देखा यह जम्बूकुमार सब प्रकारकी भोग-सामश्रा रहते हुए भी विरक्त होना चाहते हैं और मैं यहाँ धन चुरानेके लिए प्रविष्ट हुआ हूँ मुझे धिक्कार हो। इस प्रकार अपनी निन्दा करता हुआ वह विद्युच्चोर निःशङ्क होकर, कन्याओंके बीच में बैठे हुए विन्धर कुमारके समीप पहुँचेगा। उस समय जिसे सद्बुद्धि उत्पन्न हुई है ऐसा जम्बूकुमार, उन कन्याओंके बीचमें बैठा हुआ ऐसा जान पड़ता था मानो पिंजरेके भीतर बैठा हुआ पक्षी ही हो अथथा जालमें फँसा हुआ हरिणका बच्चा ही हो अथवा बहुत भारी कीचड़में फँसा हुआ उत्तम जातिवाला गजराज ही हो, अथवा लोहेके पिंजरे में रुका हुआ सिह ही हो। वह अत्यन्त विरक्त था और उसके संसार भ्रमणका क्षय अत्यन्त निकट था। ऐसे उस जम्बूकुमारको देखकर बुद्धिमान् विद्युच्चोर ऊँटकी कथा कहेगा ।। ५८-६४॥
श्लोक 65 से 72 — भोगों की अतृप्ति और चंचल सुखों का स्वरूप
वह कहेगा कि हे कुमार ! सुनिये, किसी समय कोई एक ऊँट स्वेच्छासे मीठे तृण चरता हुआ पहाड़के निकट जा पहुँचा। जहाँ वह चर रहा था वहाँकी घास ऊँचे स्थानसे पड़ते हुए मधुके रससे मिल जानेके कारण मीठी हो रहा थी। उस ऊँटने एक बार वह मीठी घास खाई तो यही संकल्प कर लिया कि मैं ऐसी ही घास खाऊँगा। इस संकल्पसे वह मधुके पड़नेकी इच्छा करने लगा तथा दूसरी घासके उपभोग आदिसे विरक्त होकर वहीं बैठा रहा तदनन्तर भूखसे पीड़ित हो मर गया। इसी प्रकार हे कुमार ! तू भी इन उपस्थित भोगोंकी उपेक्षा कर स्वर्गके भोगोंकी इच्छा करता है सो तू भी उसी ऊँटके समान बुद्धिसे रहित है। इस प्रकार विद्युच्चोरके द्वारा कही हुई ऊँटकी कथा सुनकर वैश्यशिरोमणि जम्बूकुमार एक स्पष्ट दृष्टान्त देता हुआ उस चोरको उत्तर देगा कि एक मनुष्य महादाह करनेवाले ज्वरसे पीड़ित था, उसने नदी, सरोवर तथा ताल आदिका जल बार-बार पिया था तो भी उसकी प्यास शान्त नहीं हुई थी सो क्या तृणके अग्रभाग पर स्थित जलकी बूँदसे उसकी तृप्ति हो जावेगी ? इसी प्रकार इस जीवने चिरकाल तक स्वर्गके सुख भोगे हैं फिर भी यह तृप्त नहीं हुआ सो क्या हाथी के कानके समान चञ्चल इस वर्तमान सुखसे यह तृप्त हो जायगा ? इस प्रकार जम्बूकुमारके बचन सुनकर विद्युच्चोर फिर कहेगा ।। ६५-७२ ।।
श्लोक 73 से 81— लोभ का त्याग एवं दुर्लभ धर्मरत्नों की प्राप्ति
कि किसी वनमें एक चण्ड नामका भील रहता था। उसने एक बड़े वृक्षको आधार बनाकर अर्थात् उस पर बैठकर गाल तक धनुष खींचा और एक हाथीको मार गिराया। इतनेमें ही उस वृक्षकी कोटरसे निकल कर एक साँपने उसे काट स्वाया। काटते ही उस अज्ञानी भीलने उस साँपको भी मार डाला। इस तरह इ। थी और साँप दोनोंको मारकर वह स्वयं मर गया। तदनन्तर उनसबको मरा देखकर एक अत्यन्त लोभी गीदड़ आया। वह सोचने लगा कि मैं पहले इन सबको नहीं खाकर धनुषकी डोरीके दोनों छोड़ पर लगी हुई ताँतको खाता हूँ। ऐसा विचार कर उस मूर्खने ताँतको काटा ही था कि उसी समय धनुषके अग्रभागसे उसका गला फट गया और वह व्यर्थ ही मर गया। इसलिए अधिक लोभ करना छोड़ देना चाहिये । इस प्रकार कहकर जब चोर चुप हो रहेगा तब बुद्धिमान् जम्बूकुमार विचार कर एक उत्तम बात कहेगा ।। ७३-७७ ॥ कि कोई मूर्ख पथिक कहीं जा रहा था उसे चौराहे पर महा देदीप्यमान रत्नोंकी राशि मिली, उस समय वह उसे चाहता तो अनायास ही ले सकता था परन्तु किसी कारणवश उसे बना लिये ही चला गया। फिर कुछ समय बाद उसे लेनेकी इच्छा करता हुआ उस चौराहे पर आया सो क्या वह उस रत्नराशिको पा सकेगा ? अर्थात् नहीं पा सकेगा। इसी प्रकार जो मनुष्य संसार रूपी समुद्र में दुर्लभ गुण रूपी मणियोंके समूहको पाकर भी उसे स्वीकृत नहीं करता है सो क्या वह उसे पीछे भी कभी पा सकेगा ? अर्थात् नहीं पा सकेगा ।। ७८-८० ॥ जम्बूकुमारके द्वारा कही हुई बातको हृदयमें रखकर विद्यच्चोर अन्यायको सूचित करनेवाली एक दूसरी कथा कहेगा ॥ ८१ ॥
श्लोक 82 से 93 — विषयासक्ति एवं प्रमाद से आत्मरत्नों की हानि
वह कहेगा कि एक शृगाल मुखमें मांसका टुकड़ा दाबकर पानीमें जा रहा था वहाँ क्रीड़ा करती हुई मछलीको पकड़नेकी इच्छासे उसने बह मांसका टुकड़ा छोड़ दिया और पानी में कूद पड़ा। पानीके प्रवाहका वेग अधिक था अतः वह उसीमें बह कर मर गया उसके मरनेके बाद दीर्घायु मछली पानीमें सुखसे रहने लगी। इसी प्रकार जो मूर्ख, शृगालके समान लोभी होता है वह अवश्य ही नष्ट होता है। इस तरह विद्युच्चोर की बात सुनकर निकट भव्य होनेके कारण जिसे कुछ भी आकुलता नहीं हुई है ऐसा जम्बूकुमार कहेगा कि निद्रालु प्रकृतिका एक वैश्य नींदके सुखसे विमोहित होकर सो गया और चोरोंने उसके घरमें घुसकर सब बहुमूल्य रत्न चुरा लिये। इसी दुःखसे वह मर गया। इसी प्रकार। यह जीव विषयजन्य थोड़ेसे सुखोंमें आसक्त हो रहा है और राग रूपी चोर इसके ज्ञान-दर्शन तथा चारित्र रूपी रत्न चुरा रहे हैं। इन रत्नोंकी चोरी होने पर यह जीव निर्मूल नष्ट हो जाता है। इसके उत्तरमें वह चोर कहेगा कि कोई स्त्री सासुके दुर्वचन सुनकर क्रोधित हुई और मरनेकी इच्छासे किसी वृक्षके नीचे जा बैठी। वह सब आभूषणोंसे सुशोभित थी परन्तु फाँसी लगाना नहीं जानती थी इसलिए उसका चित्त बड़ा ही व्याकुल हो रहा था ॥ ८२-८९ ॥ उसी समय सुवर्णदारक नामका मृदङ्गा बजानेवालापापी मृत्युसे प्रेरित हो वहाँ से आ निकला। वह उस स्त्रीके आभूषण लेना चाहता था इसलिए वृत्तके नीचे अपना मृदङ्ग रखकर तथा उसपर चढ़कर अपने गलेमें फाँसीकी रस्सी बाँध उसे मरनेकी रीति दिखलाने लगा। उसने अपने गलेमें रस्सी बाँधी ही थी कि किसी कारणसे नीचेका मृदङ्ग जमीन पर लुढ़क गया। फ्राँसी लग जानेसे उसका गला फँस गया और आँखें निकल आई। इस प्रकार वह मरकर यमराजके घर गया। उसका मरण देख वह स्त्री उस दुःखदायी मरणसे डर गई और अपने घर वापिस आ गई। कहनेका अभिप्राय यह है कि आपको उस मृदङ्ग बजानेवालेके समान बहुत भारी लोभ नहीं करना चाहिये ॥ ९०-९३ ॥
श्लोक 94 से 101 — क्षणिक विषयसुखों के परिणाम एवं संसार से विरक्ति
इस प्रकार उस चोरका वाग्जाल जम्बू-कुमार सहन नहीं कर सकेगा अतः उत्तर में दूसरी कथा कहेगा। वह कहेगा कि ललिताङ्ग नामके किसी धूर्त व्यभिचारी मनुष्यको देखकर किसी राजाकी रानी कामसे विह्वल हो गई। उसने किसी भी उपायसे उस पथिकका लानेके लिए एक धाय नियुक्त की और धाय भी उसे गुप्त रूपसे महलके भीतर ले गई। महारानी उसके साथ इच्छानुसार रमण करने लगी। बहुत समय बाद अन्तःपुरकी रक्षा करनेवाले शुद्ध खोजा लोगोंने रानीकी यह बात जान ली और उनके कहनेसे राजाको भी रानीके इस दुराचारका पता लग गया ।। ९४-९७ ॥ राजाने इस दुराचारकी बात जानकर किसी भी उपायसे उस जारको पकड़नेके लिए सेवकोंको आज्ञा दी। यह जानकर रानीने उसे टट्टीमें ले जाकर छिपा दिया । वहाँकी दुर्गन्ध और कीड़ोंसे वह वहाँ बहुत दुःखी हुआ तथा पाप कर्मके उदयसे इसी जन्ममें नरक वासके दुःख भोगने लगा ॥ ९८-९९ ॥ इसी प्रकार थोड़े सुखकी इच्छा करनेवाले पुरुष नरकमें पड़ते हैं और वहाँ के दुस्तर, अपार तथा भयंकर दुःख उठाते हैं ।॥ १०० ॥ इसके बाद भी वह एक ऐसी कथा और कहेगा जिसके कि द्वारा सत्पुरुषोंको संसारसे शीघ्र ही निर्वेग हो जाता है ॥ १०१ ॥
श्लोक 102 से 111 — संसाररूपी वन का दृष्टांत एवं वैराग्य की प्रेरणा
वह कहेगा कि एक जीव संसार रूपी वनमें घूम रहा था। एक मदोन्मत्त हाथी क्रोधवश उसे मारनेकी इच्छासे उसके पीछे-पीछे दौड़ा। वह जीव भयसे भागता-भागता मनुष्य रूपी वृक्षकी आड़में छिप गया । उस वृक्षके नीचे कुल, गोत्र आदि नाना प्रकारकी लताओंसे भरा हुआ एक जन्म रूपी कुआँ था। वह जीव उस जन्मरूपी कुऍमें गिर पड़ा परन्तु आयुरूपी लतामें उसका शरीर उलझ गया जिससे नीचे नहीं जा सका। वह आयुरूपी लताको शुक्लपक्ष और कृष्णपक्षके दिनरूपी अनेक चहे कतर रहे थे। सातों नरकरूपी सर्प ऊपरकी ओर मुँह खोले उसके गिरनेकी प्रतीक्षाकर रहे थे। उसी वृक्षपर पुत्रादिक इष्ट पदार्थोंसे उत्पन्न हुआ सुखरूपी मधुका रस टपक रहा था जिप्ते खानेके लिए वह बड़ा उत्सुक हो रहा था। उस मधु रसके चाटनेसे उड़ी हुईं भयङ्कर आपत्ति- रूपी मधुकी मक्खियाँ उसे काट रही थीं परन्तु वह जीव मधु-बिन्दुओंके उस सेवनको सुख मान
रहा था। इसी प्रकार संसारके समस्त प्राणी बड़े कष्टप्ले जीवन बिता रहे हैं। जो मूर्ख हैं वे भले ही विषयोंमें आसक्त हो जायं परन्तु जो बुद्धिमान् हैं वे क्यों ऐसी प्रवृत्ति करते हैं? उन्हें तो सब
परिग्रहका त्याग कर कठिन तपश्चरण करना चाहिये ।। १०२-१०७ ॥ जम्बूकुमारकी यह बात सुनकर
उसकी माता, वे कन्याएं, और वह चोर सब, संसार शरीर और भोगोंसे विरक्त होंगे ॥ १०८ ॥
तदनन्तर चकवा को चकवीके समान कुमारको दीक्षाके साथ मिलाता हुआ अपनी किरणोंसे कुमारके
मनको स्पर्शकर प्रसन्न करता हुआ, तपश्चरणके लिए श्रेष्ठ उद्यमके समान सब अन्धकारको नष्ठकर
उद्याचलकी शिखरपर सूर्य उदित होगा ।। १०९-११० ।। उस समय वह सूर्य किसी अन्यायी
राजाकी उपमा धारण करेगा क्योंकि जिस प्रकार अन्यायी राजा सर्व सन्तापकृत् होता है उसी
प्रकार वह सूर्य भी सबको संताप करने वाला था, जिस प्रकार अन्यायी राजा तीक्ष्णकर होता है
अर्थात् कठोर टैक्स लगाता है उसी प्रकार वह सूर्य भी तीक्ष्णकर था अर्थात् उष्ण किरणोंका धारक
था, जिस प्रकार अन्यायी राजा क्रूर अर्थात् निर्दय होता है उसी प्रकार वह सूर्य भी क्रूर अर्थात्
अत्यन्त उष्ण था, जिस प्रकार अन्यायी राजा अनवस्थित रहता है- एक समान नहीं रहता है-कभी
संतुष्ट रहता है और कभी असंतुष्ट रहता है उसी प्रकार वह सूर्य भी अनवस्थित था-एक जगह
स्थिर नहीं रहता था और जिस प्रकार अन्यायी राजा कुवलयध्वंसी होता है अर्थात् पृथ्वी
मण्डलको नष्ट कर देता है उसी प्रकार वह सूर्य भी कुवलयध्वंसी थ। अर्थात् नीलकमलोंको नष्ट
करनेवाला था ।। १११ ।।
श्लोक 112 से 122 — जम्बूकुमार का दीक्षा कल्याणक एवं भावी आध्यात्मिक पद
अथवा वह सूर्य किसी उत्तम राजाको जीतनेवाला होगा क्योंकि जिस
प्रकार उत्तम राजाका नित्योदय होता है अर्थात् उसका अभ्युदय निन्तर बढ़ता रहता है उसी प्रकार
वह सूर्य भी नित्योद्य होता है अर्थात् प्रतिदिन उसका उदय होता रहता है, जिस प्रकार उत्तम राजा
बुधाधीश होता है अर्थात् विद्वानोंका स्वामी होता है उसी प्रकार वह सूर्य भी बुधाधीश था अर्थात्
बुधग्रहका स्वामी था, जिस प्रकार उत्तम राजाका मण्डल अर्थात् देश विशुद्ध-शत्रुरहित और अखण्ड
होता है उसी प्रकार सूर्यका मण्डल भी अर्थात् बिम्ब भी विशुद्ध और अखण्ड था, जिस प्रकार उत्तम
राजा पद्माह्लादी होता है अर्थात् लक्ष्मीसे प्रसन्न रहता है उसी प्रकार सूर्य भी पद्माह्लादी था अर्थात्
कमलोंको विकसित करनेवाला था और जिस प्रकार उत्तम राजा प्रवृद्धोष्मा होता है अर्थात् बढ़ते
हुए अहंकारको धारण करता है उसी प्रकार वह सूर्य भी प्रवृद्धोष्मा था अर्थात् उसकी गर्मी निरन्तर
बढ़ती जाती थी ।। ११२ ॥ जम्बूकुमार संसारसे विमुख – विरक्त हुआ है यह जान कर उसके
सब भाई-बन्धु, कुणिक राजा, उसकी अठारह प्रकारकी सेनाएं और अनावृत देव आयेंगे तथा सब
लोग माङ्गलिक जलसे उसका दीक्षा-कल्याणकका अभिषेक करेंगे ।।११३-११४॥ उस समय के योग्य
वेषभूषा धारण कर वह कुमार देव निर्मित पालकी पर सवार होकर बड़े वैभवके साथ विपुलाचल
की शिखर पर पहुँचेगा । वहाँ विराजमान देखकर वह मेरे ही पास आवेगा । उस समय बड़े-बड़े मुनि हमारी सेवा कर रहे होंगे। वह आकर बड़ी भक्तिसे प्रदक्षिणा देगा और विधिपूर्वक नमस्कार करेगा ।। ११५-११६ ।। तदनन्तर शान्त चित्तको धारण करनेवाला वह जम्बूकुमार ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य इन तीन वर्षोंमें उत्पन्न हुए अनेक लोगोंके साथ तथा विद्युच्चर चोर और उसके पाँच सौ भृत्योंके साथ सुधर्माचार्य गणधरके समीप संयम धारण करेगा। जब केवलज्ञानके बारह वर्ष बाद मुझे निर्वाण प्राप्त होगा तब सुधर्माचार्य केवली और जम्बूकुमार श्रुतकेवली होंगे। उसके बारह वर्ष बाद जब सुधर्माचार्य मोक्ष चले जावेंगे तब जम्बूकुमारको केवलज्ञान होगा । जम्बू. स्वामीका भव नामका एक शिष्य होगा, उसके साथ चालीसवर्ष तक धर्मोपदेश देते हुए जम्बू-स्वामी पृथिवीपर विहार करेंगे। इस प्रकार गौतम स्वामीने जम्बू स्वामीकी कथा कही। उसे सुनकर वर्दी पर बैठा हुआ अनावृत नामका यक्ष कहने लगा कि मेरे वंशका यह ऐसा अद्भुत माहात्म्य है कि कहीं दूसरी जगह देखनेमें भी नहीं आता। ऐसा कहकर उसने आनन्द नामका उत्कृष्ट नाटक किया ।। ११७-१२२ ।।
श्लोक 123 से 133 — अनावृत देव का पूर्वभव एवं विद्युन्माली के पुण्य का वर्णन
यह देख, राजा श्रेणिकने बड़ी विनयके साथ गौतम गणधरसे पूछा कि इस अनावृत देवका जम्बू स्वामीके साथ भाईपना कैसे है? इसके उत्तरमें गणधर भगवान् स्पष्ट रूपसे कहने लगे ॥१२३।। कि जम्बूकुमारके वंशमें पहले धर्मप्रिय नामका एक सेठ था। उसकी गुणदेवी नामकी स्त्रीसे एक अर्हद्दास नामका पुत्र हुआ था ।॥ १२४ ॥ धन और यौवनके अभिमानसे वह पिताकी शिक्षाको कुछ नहीं गिनता हुआ कर्मोदयसे सातों व्यसनोंमें स्वच्छन्द हो गया था। इन खोटी चेष्टाओंके कारण जब उसकी दुर्गति होने लगी तब उसे पश्चात्ताप हुआ और ‘मैंने पिताकी शिक्षा नहीं सुनी’ यह विचार करते हुए उसकी भावना कुछ शान्त हो गई ॥ १२५-१२६ ।। तदनन्तर कुछ पुण्यका संचय कर वह अनावृत नामका व्यन्तर देव हुआ है। इसी पर्याय में इसने सम्यग्दर्शन धारण किया है ॥ १२७ ।। इस प्रकार जब गौतम स्वामी कह चुके तब राजा श्रेणिकने पुनः उनसे दूसरा प्रश्न किया। उसने पूछा कि हे भगवन् ! यह विद्युन्माली कहाँ से आया है? और इसने पूर्वभवमें कौनसा पुण्य किया है क्योंकि अन्तिम दिनमें भी इसकी प्रभा कम नहीं हुई है। इसके उत्तर में गणधर भगवान् अनुमद्दकी बुद्धिसे इस प्रकार कहने लगे ।। १२८-१२९ ।। इसी जम्बूद्वीपके पूर्व विदेह क्षेत्रमें पुष्कलाषती देशके अन्तर्गत एक वीतशोक नामका नगर है। वहाँ महापद्म नामका राजा राज्य करता था। उसकी रानीकानाम वनमाला था। उन दोनोंके शिवकुमार नामका पुत्र हुआ था। नवयौवनसे सम्पन्न होनेपर किसी दिन वह अपने साथियोंके साथ क्रीड़ा करनेके लिए वनमें गया था। वहाँ क्रीड़ा कर जब वह वापिस का रहा था तब उसने सब ओर बड़े संभ्रमके साथ सुगन्धित पुष्प आदि मङ्गलमय पूजाकी सामग्री लेकर आते हुए बहुत-से आदमी देखे। उन्हें देखकर उसने बड़े आश्चर्य के साथ बुद्धिसागर नामक मन्त्रीके पुत्रसे पूछा कि ‘यह क्या है?’ ।। १३०-१३३ ॥
श्लोक 134 से 151— सागरदत्त मुनि का वैराग्य एवं तपश्चरण
इसके उत्तर में मन्त्रीका पुत्र कहने लगा कि ‘हे कुमार ! सुनिये, मैं कहता हूँ, दीप्त नामक तपञ्चरणसे प्रसिद्ध सागरदत्त नामक एक श्रुतकेवली मुनिराज हैं। उन्होंने एक मासका उपवास किया था, उसके बाद पारणाके लिए आज उन्होंने नगर में प्रवेश किया था। वहाँ सामसमृद्ध नामक सेठने उन्हें विधिपूर्वक भक्तिसे आहार दान देकर पश्चाश्चर्य प्राप्त किये हैं। वे ही मुनिराज इस समय मनोहर नामक उद्यानमें ठहरे हुए हैं, कौतुकसे भरे हुए नगरवासी लोग बड़ी भक्तिसे उन्हींकी पूजा-वन्दना करनेके लिए जा रहे हैं’। इस प्रकार मन्त्रीके पुत्रने कहा। यह सुनकर राजकुमारने फिर पूछा कि इन मुनिराजने सागरदत्त नाम, अनेक ऋद्धियाँ, तपञ्चरण और शास्त्रज्ञान किस कारण प्राप्त किया है? इसके उत्तर में मन्त्री-पुत्रने भी जैसा सुन रक्खा था वैसा कहना शुरू किया। वह कहने लगा कि पुष्कलावती देशमें पुण्डरीकिणी नामकी नगरी है। उसके स्वामीका नाम वज्रदत्त था। वह वज्रदन्त चक्रवर्ती था इसलिए उसने चक्ररत्न से समस्त पृथिवी अपने आधीन कर ली थी ॥ १३४-१३६ ॥ जब उसकी यशोधरा रानी गर्भिणी हुई तब उसे दोहला उत्पन्न हुआ और उसी दोहलेके अनुसार वह कमलमुखी बड़े वैभवके साथ जहाँ सीतानदी समुद्रमें मिलती है उसी महाद्वारसे जलक्रीड़ा करनेके लिए समुद्रमें गई। वहीं उसने निकट कालमें मोक्ष प्राप्त करनेवाला पुत्र प्राप्त किया। चूँकि उस पुत्रका जन्म सागर-समुद्रमें हुआ था इसलिए परिवारके लोगोंने उसका सागरदत्त नाम रख लिया। तदनन्तर यौवन अवस्था प्राप्त होनेपर किसी दिन वह सागरदत्त महलकी छतपर बैठा हुआ अपने परिवारके लोगोंके साथ नाटक देख रहा था, उसी समय अनुकूल नामक एक सेवकने कहा कि हे कुमार ! यह आश्चर्य देखो, यह बादल मन्दर-ििरके आकारसे कैसा सुन्दर बना हुआ है ? यह सुनकर प्रीतिसे भरा राजकुमार ज्योंही ऊपरकी ओर मुँह कर उस नयनाभिराम दृश्यको देखनेके लिए उद्यत हुआ त्योंही वह बादल नष्ट हो गया। उसे नष्ट हुआ देखकर कुमार विचार करने लगा कि जिस प्रकार यह बादल नष्ट हो गया है उसी प्रकारयह यौवन, धन-सम्पदा, शरीर, आयु और अन्य सभी कुछ नष्ट हो जानेवाले हैं, ऐसा विचारकर वह संसारसे विरक्त हो गया । १४०-१४६ ॥ दूसरे दिन ही वह मनोहर नामके उद्यानमें स्थित अमृतसागर नामक तीर्थङ्करके समीप पहुँचा, वहाँ उसने धर्मका स्वरूप सुना । समस्त पदार्थोकी स्थितिका निर्णय किया और भाई-बन्धुओंको विदाकर अनेक लोगोंके साथ संयम धारण कर लिया । तदनन्तर मनःपर्यय आदि अनेक ऋद्धियों रूप सम्पदा पाकर धर्मोपदेश देते हुए सब देशोंमें विहार कर वे ही सागरदत्त मुनिराज यहाँ पधारे हैं ।। १४७-१४९ ।। इस प्रकार मन्त्री-पुत्रके वचन सुनकर वह राजकुमार-शिवकुमार बहुत ही प्रसन्न हुआ, उसने शीघ्र ही स्वयं मुनिराजके पास जाकर उनकी स्तुति की, धर्मरूपी अमृतका पान किया और तदनन्तर बड़ी विनयसे पूछा कि हे स्वामिन् ! आपको देखकर मुझे बड़ा भारी स्नेह उत्पन्न हुआ है इसका क्या कारण है? आप कहिये। इसके उत्तर में मुनिराज कहने लगे कि- ।। १५०-१५१ ।।
श्लोक 152 से 161 — भगदत्त मुनि का उपदेश एवं भवदेव को संयम की प्रेरणा
इसी जम्बूद्वीपके भरतक्षेत्र सम्बन्धी मगधदेशमें एक वृद्ध नामका ग्राम था । उसमें राष्ट्रकूट नामका वैश्य रहता था। उसकी रेवती नामक स्त्रीसे दो पुत्र हुए थे। एक भगदत्त और दूसरा भवदेव । उनमें बड़े पुत्र भगदत्तने सुस्थित नामक मुनिराजके पास जाकर दीक्षा धारण कर ली। तदनन्तर उन्हीं गुरुके साथ बड़ी विनयसे अनेक देशों में विहार कर वह अपनी जन्मभूमिमें आया ।। १५२-१५४ ।। उस समय उनके सब भाई-बन्धु बड़े हर्षसे उनके पास आये और उन मुनिकी प्रदक्षिणा तथा पूजाकर उन्हें नमस्कार करनेके लिए उद्यत हुए ॥ १५५ ॥ उसी नगर में एक दुर्मर्पण नामका गृहस्थ रहता था । उसकी स्त्रीका नाम नागवसु था। उन दोनोंके नागश्री नामकी पुत्री उत्पन्न हुई थी। उन दोनोंने अपनी पुत्री, भगदत्त मुनिराजके छोटे भाई भवदेवके लिए विधिपूर्वक प्रदान की थी। बड़े भाईका आगमन सुनकर भवदेव बहुत ही हर्षित हुआ। वह भी उनके समीप गया और विनयके साथ बार-बार प्रणाम कर वहीं बैठ गया। उस समय मुनिराजके उपदेशसे उसके परिणाम बहुत ही आर्द्र हो रहे थे ।।१५६-१५८ ।। धर्मका यथार्थ स्वरूप और संसारकी विरूपता बतलाकर मुनिराज भगदत्तने अपने छोटे भाई भत्रदेवका हाथ पकड़कर एकान्तमें कहा कि तू संयम ग्रहण कर ले ।। १५९ ॥ इसके उत्तर में भवदेवने कहा कि मैं नागश्रीसे छुट्टी लेकर आपका कहा करूँगा ।। १६० ।। यह सुनकर मुनिराजने कहा कि इस संसारमें स्त्री आदिकी पाश में फँसा हुआ यह प्राणी आत्माका हित कैसे कर सकताहै ? ।। १६१ ।।
श्लोक 162 से 171 — भवदेव का दीक्षा-मोह एवं दारुक की कथा
इसलिए तू स्त्रीका मोह छोड़ दे। बड़े भाईके अनुरोधसे भवदेव चुप रह गया और उसने दीक्षा धारण करनेका विचार कर लिया ।। १६२ ॥ अन्तमें भगदत्तने अपने गुरुके पास ले जाकर उसे संसारका छेद करनेके लिए मोक्ष प्राप्त करानेवाली दीक्षा ग्रहण करवा दी सो ठीक ही है क्योंकि सज्जनोंका भाईपना ऐसा ही होता है ।॥ १६३ ॥ उस मूर्खने द्रव्यसंयमी होकर बारह वर्ष तक गुरुओंके साथ विहार किया। एक दिन वह अकेला ही अपनी जन्मभूमि वृद्ध प्राममें आया और सुत्रता नामकी गणिनीके पास जाकर पूछने लगा कि हे माता ! इस नगर में क्या कोई नागश्री नामकी स्त्री रहती है ? ॥ १६४-१६५ ।। गणिनीने उसका अभिप्राय समझकर उत्तर दिया कि हे मुने ! मैं उसका वृत्तान्त अच्छी तरह नहीं जानती हूँ। इस प्रकार उदासीनता दिखाकर गणिनीने उस द्रव्य-लिङ्गी मुनिको संयममें स्थिर करनेके लिए गुणवती नामकी दूसरी आर्यिकासे निम्नलिखित कथा कहनी शुरू कर दी ।। १६६-१६७ ।। वह कहने लगी कि एक सर्वसमृद्ध नामका वैश्य था। उसके शुद्ध हृदयवाला दारुक नामका दासी-पुत्र था। किसी एक दिन उसकी माताने उससे कहा कि तू हमारे सेठका जूठा भोजन खाया कर। इस तरह कहकर उसने जबर्दस्ती उसे जूँठा भोजन खिला दिया । वह खा तो गया परन्तु ग्लानि आनेसे उसने वह सब भोजन वमन कर दिया। उसकी माताने वह सब वमन काँसेकी थालीमें ले लिया और जब उस दारुकको भूख लगी और उसने मातासे भोजन माँगा तब उसने काँसेके पात्रमें रक्खा हुआ वही वमन उसके सामने रख दिया। दारुक यद्यपि भूखसे पीड़ित था तो भी उसने वह अपना वमन नहीं खाया। जब दासी-पुत्रने भी अपना वमन किया हुआ भोजन नहीं खाया तब मुनि छोड़े हुए पदार्थको किस तरह चाहते हैं ? ॥ १६८-१७१ ॥
श्लोक 172 से 183 — कुत्ते का दृष्टांत एवं विषयासक्ति की निंदनीयता
‘अब मैं एक कथा और कहती हूँ तू चित्त स्थिर कर सुन’ यह कहकर गणिनी दूसरी कथा कहने लगी। उसने कहा कि एक नरपाल नामका राजा था। कौतुकवश उसने एक कुत्ता पाल रक्खा था। वह मीठे मीठे भोजनके द्वारा सदा उसका पालन करता था और सुवर्णके आभूषण पहिनाता था। जब वह वनविहार आदि कार्योंके लिए जाता था, तब वह मन्दबुद्धि उसे सोनेकी पालकी में बैठाकर ले जाता था। एक दिन वह नीच कुत्ता, पालकीमें बैठा हुआ जा रहा था कि अकस्मान् उसकी दृष्टि किसी बालककी विष्ठापर पड़ी। दृष्टि पड़ते ही वह, उस विष्ठाको प्राप्त करनेकी इच्छासे उसपर कूद पड़ा। यह देख राजाने उसे डण्डेसे पीटकर भगा दिया ।।१७२-१७५।। इसी प्रकार जो मुनि पहलेसबके पूजनीय होते हैं वही छोड़ी हुई वस्तुकी इच्छाकर फिर अनादरको प्राप्त होने लगते हैं। इस कथाके बाद एक कथा और कहती हूँ -किसी उत्तम वनमें कोई पथिक सुगन्धित फल-पुष्प आदि लानेके लिए सुखसे जा रहा था
परन्तु वह अच्छा मार्ग छोड़कर महासंकीर्ण वनमें जा पहुँचा। वहाँ उसने भूखा, अतिशय दुष्ट और मारनेकी इच्छासे सामने आता हुआ एक व्याघ्र देखा । उसके भयसे वह दुर्बुद्धि पथिक भागा और भागता-भागता एक भयंकर कुऍमें जा पड़ा। वहाँ पाप-कर्म के उदयसे उसे शीत आदिके कारण बात-पित्त-कफ-तीनों दोष उत्पन्न हो गये । बोलना, देखना-सुनना तथा चलने आदिमें बाधा होने लगी । इनके सिवाय उसे सर्प आदिकी भी बाधा थी। वह पथिक उस कुएँ से निकलनेका उपाय भी नहीं जानता था। दैववश कोई एक उत्तम वैद्य वहाँ से आ निकला। उस पथिकको देखकर उसका हृदय दद्यासे आर्द्र हो गया। उसने बड़े आदरसे किसी उपायके द्वारा उसे कुएँसे बाहर निकलवाया और मन्त्र तथा औषधिके प्रयोगसे उसे ठीककर दिया। उसके पाँव पसरने लगे, सूक्ष्मसे सूक्ष्म रूप देखनेके योग्य उसके नेत्र खुल गये, उसके दोनों कान सब बातें साफ-साफ सुनने लगे तथा उसकी जिह्वासे भी वचन स्पष्ट निकलने लगे ।। १७६-१८३ ॥
श्लोक 184 से 192 — संसाररूपी कुएँ से मुक्ति एवं गुरु की करुणा
यह सब कर चुकनेके बाद उत्तम वैद्यने उसे मार्ग दिखाकर सर्वरमणीय नामक नगरकी ओर रवाना कर दिया सो ठीक ही है क्यों कि जिनका अभिप्राय निर्मल है ऐसे पुरुष किसका उपकार नहीं करते ? ।। १८४ ॥ इसके बाद वह दुर्बुद्धि पथिक फिरसे विषयोंमें आसक्त हो गया, फिरसे दिशा भ्रान्त हो गया और फिरसे उसी पुराने कुएँके पास जाकर उसमें गिर पड़ा। इसी प्रकार ये जीव भी संसार रूपी कुएँ में पड़कर मिध्यात्व आदि पाँच कारणोंसे वाधिर्य-बहिरापन आदि रोगोंको प्राप्त हो रहे हैं, तथा क्षुधा, दाह आदिसे पीडित हो रहे हैं। उन्हें देखकर उत्तम ज्ञानके धारक तथा धर्मका व्याख्यान करनेमें निपुण गुरु रूपी वैद्य दयालुताके कारण इन्हें इस संसार-रूपी कुएँसे बाहर निकालते हैं। तदनन्तर जैनधर्मरूपी औषधिके सेवनसे इनके सम्यग्दर्शन रूपी नेत्र खोलते हैं, सम्यग्ज्ञान रूपी दोनों कान ठीक करते हैं, सम्यक् चारित्ररूपी पैरोंको फैलाते हैं, दद्यारूपी जिह्वाको विधिपूर्वक प्रकट करते हैं, और पाँच प्रकारके स्वाध्याय रूपी वचन कहलाकर उन्हें स्वर्ग तथा मोक्षके मार्ग में भेजते हैं। वे गुरूरूपी वैद्य अत्यन्त बुद्धिमान और उत्तम प्रकृतिके होते हैं ॥ १८५-१९० ॥ उनमेंसे बहुतसे लोग पाप-कर्मके उदयसे दीर्घसंसारी होते हैं। जिस प्रकार सुगम्धिसे भरे विकसित चम्पाके समीप रहतेहुए भी भ्रमर उसकी सुगन्धिसे घसे दूर रहते हैं हैं उसी प्रकार जो सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान तथा सम्यक्चा-रित्रके समीपवर्ती होकर भी उनके रसास्वादनसे दूर रहते हैं वे पाश्र्वस्थ कहलाते हैं ॥ १९१-१९२।।
श्लोक 193 से 200 — कुशील आदि की प्रवृत्ति एवं भवदेव का पुनः संयम
जो कषाय, विषय, आरम्भ तथा लौकिक ज्ञानके वशीभूत होकर जिह्वा, इन्द्रिय सम्बन्धी छह रसोंमें आसक्त रहते हैं वे दुष्ट अभिप्राय वाले कुशील कहलाते हैं ।॥ १९३॥ जो निषिद्ध द्रव्य और भावोंमें लोभी रहते हैं वे संसक्त कहलाते हैं। जिनके ज्ञान, चारित्र आदि घटते रहते हैं वे अवसन्न कह-लाते हैं और जो सदाचारसे दूर रहते हैं वे मृगचारी कहलाते हैं। ये सब लोग महामोहका त्याग नहीं होनेसे संसाररूपी अगाध कुएँमें बार-बार पड़ते हैं। गणिनीकी ये सब बातें सुनकर भवदेव मुनिको भी शान्त भावकी प्राप्ति हुई। यह जानकर गणिनीने, दुर्गतिके कारण जिसकी खराब स्थिति हो रही थी ऐसी नागश्रीको बुलवाकर उसे दिखाया। भवदेवने उसे देखकर संसारकी स्थितिका स्मरण किया, अपने आपको धिकार दिया, अपनी निन्दाकर फिरसे संयम धारण किया और बड़े भाई भगदत्त मुनिराजके साथ आयुके अन्त में अनुक्रमसे चारों आराधनाओंका आश्रय लिया । मरकर अपने भाईके ही साथ माहेन्द्रस्वर्गके बयभद्र नामक विमानमें सात सागरकी आयु वाला सामानिक देव हुआ ।। १९४-१९९ ॥ वहाँ से चयकर बड़े भाई भगदत्तका जीव मैं हुआ हूँ और छोटे भाई भवदेवका जीव तू हुआ है। इस प्रकार मुनिराजका कहा सुनकर शिवकुमार विरक्त हुआ ।। २०० ।।
श्लोक 201 से 213 — शिवकुमार का कठिन तप एवं विद्युन्माली देव के रूप में जन्म
वह दीक्षा लेनेके लिए तैयार हुआ परन्तु माता-पिताने उसे रोक दिया। जिसे आत्म-ज्ञान प्रकट हुआ है ऐसा वह कुमार यद्यपि नगरमें गया तो भी उसने निश्चय कर लिया कि मैं अप्रा-सुक आहार नहीं ग्रहण करूँगा। यह बात सुनकर राजाने सभामें घोषणा कर दी कि जो कोई कुमारको भोजन करा देगा मैं उसे इच्छानुसार धन दूँगा। राजाकी यह घोषणा जानकर सात धर्मक्षेत्रोंका आश्रयभूत दृढवर्मा नामक श्रावक कुमारके पास आकर कहने लगा कि है कुमार ! अपने और दूसरेके आत्माको नष्ट करनेमें पण्डित तथा पापके कारण ये कुटुम्बी लोग तेरे शत्रु हैं इसलिए हे भद्र ! भाव-संयमका नाश नहीं कर प्रासुक भोजनके द्वारा मैं तेरी सेवा करूँगा। जो परिवारके लोगोंसे विमुक्त नहीं हुआ है अर्थात् उनके अनुरागमें फँसा हुआ है उसकी संयममें प्रवृत्ति होना दुर्लभ है, इस प्रकार हितकारी वचन कहे। कुमारने भी उसकी बात मानकर निर्विकार आचाम्ल रसका आहार किया ।। २०१-२०६ ।। वह यद्यपि सुन्दर स्त्रियोंके समीप रहता था तो भी उसकाचित्त कभी विकृत नहीं होता था वह उन्हें तृणके समान तुच्छ मानता था। इस तरह उसने बारह वर्ष तक तीक्ष्ण तलवारकी धारापर चलते हुएके समान कठिन तप धारणकर आयुके अन्त समयमें संन्यास धारंण किया जिसके प्रभावले ब्रह्मस्वर्गमें यह अपने शरीरकी कान्तिसे दिशाओंको व्याप्त करता हुआ विद्युन्माली देव हुआ है। यह कथा कहनेके बाद राजा श्रेणिकके पूछनेपर गौतम गण-धर फिर कहने लगे कि इस विद्यन्माली देवकी जो स्त्रियाँ हैं वे सेठोंकी पुत्रियाँ होकर जम्बू-कुमारकी चार स्त्रियाँ होंगी और उसीके साथ संयम धारण कर अन्तिम स्वर्गमें उत्पन्न होंगी तथा वहाँ से आकर मोक्ष प्राप्त करेंगी। सागरदत्तका जीव स्वर्ग जावेगा, फिर वहाँ से आकर जम्बूकुमार-की दीक्षा लेनेके समय मुक्त होगा। इस प्रकार गणधरोंमें प्रधान गौतम स्वामीके द्वारा कही हुई यह सब कथा सुनकर मगधदेशका स्वामी राजा श्रेणिक बहुत ही प्रसन्न हुआ। अन्तमें उसने वर्ध-मान स्वामी और गौतम गणधर दोनोंको नमस्कार किया सो ठीक ही है क्योंकि ऐसे कौन सज्जन हैं जो कि कल्याण मार्गका उपदेश देने वालेको नहीं मानते हों-उसकी विनय नहीं करते हों।। २०७-२१३।।
श्लोक 214 से 221— प्रीतिंकर मुनि के पूर्वभव की कथा का आरंभ
अथानन्तर- दूसरे दिन राजा श्रेणिक फिर संसारके पारगामी भगवान् महावीर स्वामीके समीप पहुँचा और पूजा तथा प्रणाम कर वहीं बैठ गया। वहाँ उसने ताराओंमें चन्द्रमाके समान प्रकाशमान तेज के धारक, तथा प्रीतिकी पताका-स्वरूप प्रीतिङ्कर मुनिको देखकर गणधर देवसे पूछा कि पूर्व जन्ममें इन्होंने ऐसा कौन-सा कार्य किया था जिससे कि ऐसा रूप प्राप्त किया है? इसके उत्तर में गणधर इस प्रकार कहने लगे कि इसी मगध देशमें एक सुप्रतिष्ठ नामका नगर है। राजा जयसेन उसका लीलापूर्वक पालन करता था। उसी नगरमें एक सागरदत्त नामका सेठ रहता था । उसकी स्त्रीका नाम प्रभाकरी था। उन दोनोंके दो पुत्र हुए- उनमें नागदत्त बड़ा था और छोटा कुबेरकी समता रखने वाला कुबेरदत्त था। नागदत्तको छोड़कर उसके घरके सब लोग श्रावक हो गये थे सो ठीक ही है क्योंकि पुण्यहीन मनुष्य समुद्रमें भी उत्तम रत्नको नहीं प्राप्त करता है ॥ २१४-२१६ ॥ इस तरह उन सबका समय सुखसे व्यतीत हो रहा था। किसी समय धरणिभूषण नामक पर्वतले प्रियङ्कर नामक उद्यानमें सागरसेन नामक मुनिराज आकर विराजमान हुए। यह सुन राजा जयसेन आदिने जाकर उनकी पूजा-वन्दना की तथा धर्मका यथार्थ स्वरूप पूछा ।। २२०-२२१ ।।
श्लोक 222 से 231 — सम्यग्दर्शन, पुण्य-पाप एवं सागरदत्त सेठ का संन्यास
उत्तरमें मुनिराज इस प्रकार कहने लगे कि जिन्होंने सम्यग्दर्शन-रूपी नेत्र प्राप्त कर लिये हैंऐसे पुरुष दान, पूजा, व्रत, उपवास आदिके द्वारा पुण्यबन्ध कर स्वर्गके सुख पाते हैं और संयम धारण कर मोक्षके सुख पाते हैं। यदि मिथ्या-दृष्टि जीव दानादि पुण्य करते हैं तो स्वर्ग-सम्बन्धी सुख प्राप्त करते हैं। वहाँ कितने ही मिथ्यादृष्टि जीत्र अपने शान्त परिणामोंके प्रभावसे कालादि लब्धियाँ पाकर स्वयमेव अथवा दूसरेके निमित्तसे समीचीन धर्मको प्राप्त होनेके योग्य हो जाते हैं। यह बात निकट कालमें मोक्ष प्राप्त करनेवाले मिध्यादृष्टि जीवोंकी है परन्तु जो तीव्र मिध्यादृष्टि निरन्तर भोगोंमें आसक्त रहकर हिंसा, झूठ, पर-धनहरण, पर-नारी-रमण, आरम्भ और परिग्रहके द्वारा पापका संचय करते हैं वे संसार-रूपी दुःखदायी कुएँ में गिरते हैं ।। २२२-२२६ ॥ इस प्रकार मुनिराजके बचन सुनकर बहुत लोगोंने धर्म धारण कर लिया। इसके पश्चात् सेठ सागरदशने अपनी, आयुकी अवधि पूछी सो मुनिराजने उसकी आयु तीस दिनकी बतलाई। यह सुनकर सेठने नगरमें प्रवेश किया और बड़े हर्षसे आष्टाह्निक पूजाकर अपना पद अपने बड़े पुत्रके लिए सौंप दिया । तदनन्तर समस्त भाई-बन्धुओंसे पूछकर उसने विधिपूर्वक बाईस दिनका संन्यास धारण किया और अन्त समयमें देव पद प्राप्त किया। किसी दूसरे दिन अनन्तानुबन्धी लोभसे प्रेरित हुए नागदत्तने कुबेरदत्तको बुलाकर दुर्भावनासे पूछा कि क्या पिताजी तुम्हें सारभूत-श्रेष्ठ धन दिखला गये हैं ? ।। २२७-२३१ ।।
श्लोक 232 से 241 — प्रीतिंकर के जन्म का वरदान एवं पुण्यशाली नामकरण
‘यह तीव्र लोभसे आसक्त हो रहा है’ ऐसा समझकर कुबेरदत्तने उत्तर दिया कि क्या पिताजीके पास अलगसे ऐसा कोई धन था जिसे हम दोनों नहीं जानते हों। वे विधिपूर्वक संन्यास धारण कर स्वर्ग गये हैं अतः उनपर दूषण लगाना बड़ा पाप है। भाई ! यह बात न तो तुझे कहनेके योग्य है और न मुझे सुननेके योग्य है। इस तरह कुबेरदत्तने नागदत्तकी सब दुर्बुद्धि दूर कर दी। सब धनका बाँट किया, अनेक चैत्य और चैत्यालय बनवाये, अनेक तरहकी जिन-पूजाएँ कीं, तीनों प्रकारके पात्रोंके लिए भक्तिपूर्वक चार प्रकारका दान दिया। इस प्रकार जिनकी परस्परमें प्रीति बढ़ रही है ऐसे दोनों भाई सुखसे समय बिताने लगे। किसी एक दिन कुबेरदत्तने अपनी स्त्री, धन, मित्रोंके साथ सागरसेन मुनिराजके लिए शक्तिपूर्वक आहार दिया। आहार देनेके बाद नमस्कार कर उसने मुनिराजते पूछा कि क्या कभी हम दोनों पुत्र लाभ करेंगे अथवा नहीं ? ॥ २३२-२३७ ।। यदि नहीं करेंगे तो फिर हम दोनों जिन-दीक्षा धारण कर लें। इसके उत्तर मेंमुनिराजने कहा कि आप दोनों, महापुण्यशाली तथा चरमशरीरी पुत्र अवश्य ही प्राप्त करेंगे । इस प्रकार मुनिराजके वचन सुनकर उन दोनोंका हृदय आनन्दसे भर गया। वे प्रसन्नचित्त होकर बोले कि यदि ऐसा है तो वह बालक आप पूज्यपादके चरणों में क्षुल्लक होवे । उसके उत्पन्न होते ही हम दोनों उसे आपके लिए समर्पित कर देंगे। इस तरह सुखका उपभोग करते हुए उन दोनोंने कुछ मास सुखसे बिताये । कुछ मास बीत जानेपर उन्होंने उत्तम पुत्र प्राप्त किया । ‘यह पुत्र अपने गुणोंसे समस्त संसारको सन्तुष्ट करेगा’ ऐसा विचार कर उन्होंने उसका बड़े हर्षसे प्रीतिङ्कर नाम रक्खा ॥ २३८-२४१ ।।
श्लोक 242 से 252 — प्रीतिंकर की शास्त्र-शिक्षा एवं समुद्रयात्रा
पुत्र-जन्मके बाद पाँच वर्ष बीत जानेपर उक्त मुनिराज धान्यपुर नगरसे फिर इस नगर में आये । कुबेरदत्त और धनमित्राने जाकर उनकी वन्दना की तथा कहा कि ‘हे मुनिराज ! यह आपका क्षुल्लक है, इसे ग्रहण कीजिए इस प्रकार कहकर वह बालक उन्हें सौंप दिया। मुनिराज भी उस बालकको लेकर फिरसे धान्यपुर नगरमें चले गये ।। २४२-२४३ ।। वहाँ उन्होंने उसे लगातार दस वर्ष तक समस्त शास्त्रोंकी शिक्षा दी। वह बालक निकटभव्य था अतः संयम धारण करनेके लिए उत्सुक हो गया परन्तु गुरुओंने उसे यह कह कर रोक दिया कि हे आर्य ! यह तेरा दीक्षा ग्रहण करनेका समय नहीं है। प्रीतिङ्करने भी गुरुओंकी बात स्वीकृत कर ली। तदनन्तर वह भक्ति-पूर्वक उन्हें नमस्कार कर अपने माता-पिताके पास चला गया। वह अपने द्वारा पढ़े हुए शास्त्रोंका मार्गमें शिष्ट पुरुषोंको उपदेश देता जाता था। इस प्रकार वह छात्रका वेष रखकर अपने समस्त बन्धुओंके पास पहुँचा । जब राजाको उसके आनेका पता चला तब उसने उसका बहुत सत्कार किया। अपने-आपको कुल आदिके द्वारा असाधारण मानते हुए प्रीतिङ्करने विचार किया कि जब तक मैं बहुत-सा श्रेष्ठ धन नहीं कमा लेता हूँ तब तक मैं पत्नीको ग्रहण नहीं करूँगा ।। २४४-२४८ ॥
किसी दिन कितने ही नगरवासी लोग जलयात्रा-समुद्रयात्रा करनेके लिए तैयार हुए। उनके साथ प्रीतिङ्कर भी जानेके लिए उद्यत हुआ। उसने इस कार्यके लिए अपने सब भाई-बन्धुओंसे पूछा। सम्मति मिल जानेपर उत्कृष्ट बुद्धिका धारक प्रीतिङ्कर नमस्कार करनेके लिए अपने गुरुके पास गया। गुरुने अपने अभिप्रेत अर्थको सूचित करनेवाले अक्षरोंसे परिपूर्ण एक पत्र लिखकर उसे दिया। उसने वह पत्र बड़े आदरके साथ लेकर कानमें बाँध लिया तथा शकुन आदिकी अनुकूलता देख मित्रोंके साथ जहाज पर बैठकर समुद्रमें प्रवेश किया । तदनन्तर कुछ दिनोंके बाद वह पुण्यात्मा वलयकेआकारवाले पर्वतसे घिरे हुए भूमितिलक नामके नगर में पहुँचा ।। २४९-२५२ ।।
उस समय शङ्ख, तुरही आदि बाजे बजाते हुए लोग सामने ही नगरके बाहर निकल रहे थे उन्हें देखकर श्रेष्ठ वैश्योंने भयभीत हो यह घोषणा की कि नगर में जाकर तथा इस बातका पता चलाकर वापिस आनेके लिए कौन समर्थ है ? यह घोषणा सुनकर प्रीतिङ्कर कुमारने कहा कि मैं यह कार्य करनेके लिए समर्थ हूँ। वैश्योंने उसी समय उसे दालचीनीकी छालसे बने हुए रस्सेसे नीचे उतार दिया ।। २५३-२५५ ।। आश्चर्यसे चारों ओर देखते हुए कुमारने नगर में प्रवेश किया तो सबसे पहले उसे जिन-मन्दिर-दिखाई दिया । उसने मन्दिरकी प्रदक्षिणा देकर स्तुति की। उसके बाद आगे गया तो क्या देखता है कि जगह-जगह शस्त्रोंके आघातसे बहुत लोग मरे पड़े हैं। उसी समय उसे सरोवरसे निकलकर घरकी ओर जाती हुई एक कन्या दिखी। यह कौन है ? इस बातका पता चलानेके लिए वह कन्याके पीछे चला गया । घरके आँगनमें पहुँचनेपर कन्याने प्रीतिङ्करको देखा तो उसने कहा, हे भद्र ! यहाँ कहाँ से आये हो ? यह कह कर उसके बैठनेके लिए एक आसन दिया ।। २५६-२५८ ।। कुमारने उस आसन पर बैठ कर कन्यासे पूछा कि कहो, यह नगर ऐसा क्यों हो गया है ? इसके उत्तर में कन्याने कहा कि यह कहने के लिए समय नहीं है। हे भद्र ! तुम यहाँ से शीघ्र ही चले जाओ क्योंकि यहाँ तुम्हें बहुत भारी भय उपस्थित है। कन्याकी बात सुनकर निर्भय रहनेवाले कुमारने कहा कि यहाँ जो मेरे लिए भय उत्पन्न करेगा उसके क्या हजार भुजाएँ हैं? कुमारका ऐसा भयरहित गम्भीर उत्तर सुनकर जिसका भय कुछ दूर हो गया है ऐसी कन्या विस्तारसे उसका कारण कहने लगी। उसने कहा कि इस विजयार्ध पर्वतकी उत्तर दिशामें जो अलका नामकी नगरी है उसके स्वामी तीन भाई थे । हरिबल उनमें बड़ा था, महासेन उससे छोटा था और भूतिलक सबसे छोटा था। हरिबलकी रानी धारिणीसे भीमक नामका पुत्र हुआ था और उसीकी दूसरी रानी श्रीमतीसे हिरण्यवर्मा नामका दूसरा पुत्र हुआ था । महासेनकी सुन्दरी नामक स्त्रीसे उग्रसेन और वरसेन नामके दो पुत्र हुए और मैं वसुन्धरा नामकी कन्या हुई ।। २५९-२६५ ॥ किसी एक समय मेरे पिता पृथिवी पर विहार करनेके लिए निकले थे उस समय इस मनोहरी विशाल नगरको देख कर उनकी इच्छा इसे स्वीकृत करनेकी हुई । पहले यहाँ कुछ व्यन्तर देवता रहते थे, उन्हें युद्धमें जीतकर हमारे पिता यहाँ भूतिलक नामक भाईकेसाथ सुखसे रहने लगे। यहाँ रहनेवाले राजा लोग उनकी सेवा करते थे। इस प्रकार पुण्यका संचय करते हुए उन्होंने यहाँ कुछ काल व्यतीत किया ।। २६६-२६८ ।। उधर इन्द्रियोंको जीतनेवाले विद्वान् राजा हरिबलको वैराग्य उत्पन्न हुआ। उसने अपने छोटे पुत्र हिरण्यवर्माके लिए विद्या दी और बड़े पुत्र भीमकको अलकापुरीका राज्य दिया । संसारसे भयभीत होनेके कारण विरक्त होकर उसने समस्त कर्मोंका क्षय करनेके लिए विपुलमति नामक चारण मुनिराजके पास जाकर उसने दीक्षा ले ली और शुक्लध्यान रूपी अग्निके द्वारा आठों दुष्ट कर्मोंको जलाकर आठ गुणोंसे सहित हो इष्ट आठवीं पृथिवी प्राप्त कर ली (मोक्ष प्राप्त कर लिया ॥ २६९-२७१ ॥ इधर भीमक राज्य करने लगा उसने किसी छलसे हिरण्यवर्माकी विद्याएँ हर लीं। यही नहीं, वह उसे मारनेके लिए भी तैयार हो गया ।। २७२ ॥ हिरण्यवर्मा यह जानकर सम्मेदशिखर पर्वतपर भाग गया। क्रोधवश भीमकने वहाँ भी उसका पीछा किया परन्तु तीर्थंकर भगवान्के सन्निधान और स्वयं तीर्थ होनेके कारण वह वहाँ जा नहीं सका इसलिए नगर में लौट आया। तदनन्तर हिरण्यवर्मा अपने काका महासेनके पास चला गया ।। २७३-२७४ ॥ जब भीमकने यह समाचार सुना तो उसने महाराज महासेनके लिए इस आशयका एक पत्र भेजा कि आप पूज्यपाद हैं- हमारे पूजनीय हैं इसलिए हमारे शत्रु हिरण्यवर्माको वहाँ से निकाल दीजिए। महाराज महासेनने भी इसका उत्तर भेज दिया कि मैं उसे नहीं निकाल सकता। यह जानकर भीमक युद्धकी इच्छासे यहाँ आया। ‘यह दुरात्मा बहुत ही क्रूर है’ यह समझ कर हमारे पिताने युद्धमें भीमकको जीत लिया तथा उसके दोनों पैर सांकलसे बाँध लिये । तदनन्तर अनुक्रमसे शान्त होनेपर हमारे पिताने विचार किया कि मुझे ऐसा करना उचित नहीं है ऐसा विचार कर उन्होंने उसे छोड़ दिया और हितसे भरे शब्दोंसे उसे शान्त कर हिरण्यवर्माके साथ उसकी सन्धि करा दी तथा पहलेके समान ही राज्य देकर उसे भेज दिया । भीमक उस समय तो चला गया परन्तु इस अपमानके कारण उसने हिरण्यवर्माके साथ वैर नहीं छोड़ा। फलस्वरूप उस पापी भीमकने राक्षसी विद्या सिद्ध कर हिरण्यवर्माको, मेरे पिताको तथा मेरे भाइयोंको मार डाला है, इस नगरको उजाड़ दिया है और अब मुझे लेनेके उद्देश्यसे आनेवाला है ।। २७५-२८० ॥ यह सब कथा सुनकर आश्चर्यको धारण करते हुए कुमार प्रीतिङ्करने शय्यातलपर पड़ी हुई एक तलवारको देखकर कहा कि इस तलवारके बहुत ही अच्छे लक्षण हैं। यह तलवार जिसके हाथमें होगी उसे इन्द्र भी जीतनेके लिए समर्थ नहीं हो सकता है। क्या तुम्हारे पिताने इसतलवारके द्वारा किसीके साथ युद्ध किया है ? इस प्रकार उस कन्या से पूछा। कन्याने उत्तर दिया कि इस तलवारसे पिताने स्वप्नमें भी युद्ध नहीं किया है। तदनन्तर प्रीतिङ्कर कुमारने वह तलवार अपने हाथमें ले ली ।। २८१-२८३ ॥ जो निर्भय है, जिसने अपना शरीर छिपा रक्खा है और जो देदीप्य-मान दिव्य तलवारको धारण कर रहा है ऐसा प्रीतिङ्कर भीमकको मारनेके लिए गोपुरके भीतर छिप गया । उसी समय भीमक भी आ गया, उसने सब ओर देखकर तथा यह कहकर अपनी विद्याको भेजा कि गोपुरके भीतर छिपे हुए उस दुष्ट पुरुषको देखकर मार डालो ।। २८४-२८५ ।। विद्या प्रीतिङ्करके पास जाते ही डर गई, वह कहने लगी कि यह सम्यग्दृष्टि है, सात भयोंसे सदा दूर रहता है, चरमशरीरी है और महाशूरवीर है; मैं इसे मारनेके लिए समर्थ नहीं हूं। इस प्रकार भयभीत होकर वह उसके पास ही इधर-उधर फिरने लगी। यह देख, भीमक समझ गया कि यह विद्या शक्तिहीन है तब उसने ‘तू सारहीन है अतः चली जा’ यह कह कर उसे छोड़ दिया और वह भी अदृश्यताको प्राप्त हो गई। विद्याके चले जानेपर प्रीतिङ्करको मारनेकी इच्छासे भीमक स्वयं तलवार उठाकर उस पर झपटा। इधर प्रीतिङ्करने भी उसे बहुत भयंकर डॉट दिखाकर तथा उसके वारको बचाकर ऐसा प्रहार किया कि उसके प्राण छूट गये ॥ २८६-२८९ ॥ तदनन्तर दुष्ट शत्रुको मारकर आते हुए कुमारको देखकर कन्या सामने आई और कहने लगी कि हे भद्र ! आपने बहुत बड़ा साहस किया है ॥ २९० ॥ इतना कहकर उसने राजभवनके आँगनमें सुवर्ण सिंहासनपर उसे बैठाया और जलसे भरे हुए सुवर्णमय कलशोंसे उसका राज्याभिषेक किया ॥ २९१ ॥ मणियोंकी कान्तिसे देदीप्यमान मुकुट उसके सुन्दर मस्तक पर बाँधा; यथास्थान समस्त अच्छे-अच्छे आभूषण पहिनाये और विलासिनी स्त्रियोंके हाथोंसे ढोरे हुए चमरोंसे उसे सुशोभित किया। यह सब देख प्रीतिङ्कर कुमारने कहा कि यह क्या है? इसके उत्तरमें कन्याने कहा कि ‘मैं इस नगरकी स्वामिनी हूँ, अपना राज्यपट्ट बाँध कर अपने लिए देती हूँ और यह रत्नमाला आपके गलेमें डालकर प्रेमपूर्वक आपकी सहधामणी हो रही हूँ। यह सुनकर कुमारने उत्तर दिया कि मैं माता-पिताकी आज्ञाके बिना तुम्हें स्वीकृत नहीं कर सकता क्योंकि मैंने पहलेसे ऐसा ही संकल्प कर रक्खा है। यदि तुम्हारा ऐसा आग्रह ही है तो माता-पितासे मिलनेके समय तेरा अभीष्ट सिद्ध हो जावेगा। कन्याने प्रीतिङ्करकी यह बात मान ली और बहुत-सा धन बाँधकर उस लम्बी रस्सीके द्वारा जहाजपर उतारनेके लिएकुमारके साथ किनारे पर आ गई। कुमारने भी बड़े हर्षसे बह रस्सी हिलाई । रस्सीका हिलना देखकर नागदत्त बाहर आया और उस कन्याको तथा उसके धनको जहाजमें खींचकर बहुत संतुष्ट हुआ । जब जहाज चलनेका समय आया तब कुमार उस कन्याके भूले हुए सारपूर्ण आभरणोंको लानेके लिए फिरसे नगर में गया ।। २९२-३०० ॥ इधर उसके चले जानेपर नागदत्तने वह रस्सी खींच ली और ‘इस कन्याके साथ मुझे बहुत-सा अच्छा धन मिल गया है, वह मेरे मरने तक भोगनेके काम आवेगा, मैं तो कृतार्थ हो चुका, प्रीतिङ्करकुमार जैसा-तैसा रहे’ ऐसा विचार कर और छिद्र पाकर नागदत्त अन्य वैश्योंके साथ चला गया ।। ३०१-३०२ ॥ कन्याने नागदत्तका अभिप्राय जानकर मौन धारण कर लिया और ऐसी प्रतिज्ञा कर ली कि मैं इस जहाजपर प्रीतिङ्करके सिवाय अन्य किसीसे बातचीत नहीं करूँगी ॥ ३०३॥ नागदत्तने भी लोगों पर ऐसा प्रकट कर दिया कि यह कन्या गूँग। है और उसे अपनी अंगुलीके इशारेसे बड़े प्रेमके साथ द्रव्यकी रक्षा करनेमें नियुक्त किया ॥ ३०४॥ अनुक्रमसे नागदत्त अपने नगर में पहुँच गया। पहुँचनेपर सेठने उससे पूछा कि उस समय प्रीतिङ्कर भी तो तुम्हारे साथ भूतिलक नगरको गया था वह क्यों नहीं आया ? इसके उत्तरमें नागदत्तने कहा कि मैं कुछ नहीं जानता हूँ। आभूषण लेकर प्रीतिङ्कर कुमार समुद्रके तटपर आया परन्तु पापी नागदत्त उसे धोखा देकर पहले ही चला गया था। जहाजको न देखकर वह उद्विग्न होता हुआ नगरकी ओर लौट गया ।॥ ३०५-३०७॥ चिन्तासे भरा प्रीतिङ्कर वहीं एक जिनालय देखकर उसमें चला गया। पुष्पादिकसे उसने वहाँ विधिपूर्वक भगवान्की पूजा-वन्दना की। तदनन्तर निम्न प्रकार स्तुति करने लगा ।। ३०८ ॥
“हे जिनेन्द्र ! जिस प्रकार रात्रिमें खुले नेत्रवाले मनुष्यका सब अन्धकार दीपकके द्वारा नष्ट हो जाता है उसी प्रकार आपके दर्शन मात्रसे मेरे सब पाप नष्ट हो गये हैं ।॥ ३०९ ॥ हे जिनेन्द्र ! आप, शुद्ध जीव, कर्मोंसे प्रसित संसारी जीव और जीवोंसे भिन्न अचेतन द्रव्य, इन सबको जानते हैं तथा कर्मोंसे रहित हैं अतः आपकी उपमा किसके साथ दी जा सकती है ? ॥ ३१० ।। हे भगवन् ! यद्यपि आप इन्द्रिय-ज्ञानसे रहित हैं तो भी इन्द्रिय-ज्ञानसे सहित सांख्य आदि लोक प्रसिद्ध दर्शनकारोंको आपने अकेले ही जीत लिया है यह आश्वर्यकी बात है ।। ३११ ।। हे देव ! आदि और अन्तसे रहित यह तीनों लोक अज्ञान रूपी अन्धकारसे व्याप्त होकर सो रह।है उसमें केवल आप ही जग रहे हैं और समस्त संसारको देख रहे हैं ।॥ ३१२ ।। हे जिनेन्द्र ! जिस प्रकार चक्षुसहित मनुष्यको पदार्थका ज्ञान होनेमें प्रकाश कारण है उसी प्रकार शिष्यजनोंको वस्तु-तत्त्वका ज्ञान हानेमें आपका निर्मल तथा सुखदायी आगम ही कारण है ॥ ३१३ ॥ इस प्रकार शुद्ध ज्ञानको धारण करनेवाले प्रीतिङ्कर कुमारने अपने द्वारा बनाया हुआ स्तोत्र पढ़ा तथा कर्मके द्वारा निर्मित संसारकी दशाका अच्छी तरह विचार किया ॥ ३१४ ॥ तदनन्तर कुछ व्याकुल होता हुआ वह अभिषेकशाला (स्नानगृह) में सो गया। उसी समय नन्द और महानन्द नामके दो यक्ष देव, जिन-मन्दिरकी वन्दना करनेके लिए आये ।। ३१५ ।। उन्होंने जिन मन्दिर के दर्शनकर प्रीतिङ्करके कानमें बँधा हुआ पत्र देखा और देखते ही उसे ले लिया। पत्रमें लिखा था कि ‘यह प्रीतिङ्करकुमार तुम्हारा सधर्मा भाई है, इसलिए सदा प्रसन्न रहनेवाले इस कुमारको तुम बहुत भारी द्रव्यके साथ सुप्रतिष्ठ नगर में पहुँचा दो। तुम दोनोंके लिए मेरा यही कार्य है’ इस प्रकार उन दोनों देवोंने उस पत्रसे अपने गुरुका संदेश तथा अपने पूर्वभवका सब समाचार जान लिया ॥ ३१६-३१८ ।। पहले बनारस नगर में धनदेव नामका एक वैश्य रहता था। हम दोनों उसकी जिनदत्ता नामकी बीसे शान्तव और रमण नामके दो पुत्र हुए थे ॥ ३१९ ॥ वहाँ हमने ग्रन्थ और अर्थसे सब शास्त्रोंका ज्ञान प्राप्त किया परन्तु चोर शास्त्रका अधिक अभ्यास होनेसे हम दोनों दूसरेका धन-हरण करनेमें तत्पर हो गये ।। ३२० ।। हमारे पिता भी हम लोगोंको इस चोरीके कार्यसे रोकनेमें समर्थ नहीं हो सके इसलिए उन्होंने अत्यन्त कठिन समस्त परिग्रहका त्याग कर दिया अर्थात् मुनिदीक्षा धारण कर ली ।। ३२१ ।। इधर धान्यपुर नगरके समीप शिखिभूधर नामक पर्वत पर मुनिराजके माहात्म्यसे वहाँपर रहनेवाले सिंह, व्याघ्र आदि दुष्ट जीव भी किसीको बाधा नहीं पहुँचाते हैं इस प्रकार लोगोंका कहना सुनकर हम दोनोंने उस पर्वतको सागरसेन नामके अतिशय तपस्वी मुनिराज रहते थे हम लोगोंने भी जाकर उनके दर्शन किये, उनके समीप जैनधर्मका उपदेश सुना और मधु, मांस आदिका त्याग कर दिया ।। ३२२-३२४ ॥ तदनन्तर वे मुनिराज सुप्रतिष्ठ नगर में चले जानेपर सिंहके उपद्रवसे मरकर हम दोनों इस देव-पर्यायको प्राप्त हुए हैं ।। ३२५ ।। ‘यह सब गुरु महाराजसे लिये हुए व्रतके प्रभावसे ही हुआ है’ ऐसा जानकर हम दोनों उनके समीप गये, उनकी पूजा की औरतदनन्तर दोनोंने पूछा कि हमारे लिए क्या आज्ञा है? इसके उत्तरमें मुनिराजने कहा था कि कुछ दिनोंके बाद मेरा कार्य होगा और आप दोनों उसे अच्छी तरह जानकर आदरसे करना । सो मुनि-राजका वह संदेश यही है यह कहकर वह पत्र खोलकर दिखाया ॥ ३२६-३२८ । इसके पश्चान् उन देवोंने बहुतसे धनके साथ उस प्रीतिङ्करको विमानमें बैठाया और सुप्रतिष्ठित नगरके समीपवर्ती धरणिभूषण नामके पर्वतपर उसे शीघ्र ही पहुँचा दिया सो ठीक ही है क्योंकि पुण्यका उदय क्या नहीं करता है ? प्रीतिङ्करका आना सुनकर राजा, उसके भाई-बन्धु और नगरके लोग बड़े हर्षसे अपनी-अपनी विभूतिके साथ उसके समीप आये। उन देवोंने वह प्रीतिङ्कर कुमार उन सबके लिए सौंपा और उसके बाद वे अपने निवास-स्थानपर चले गये ।। ३२९-३३१ ।। प्रीतिङ्करने नगरमें प्रवेश कर समीचीन रत्नोंकी भेंट देकर राजाकी पूजा की और राजाने भी योग्य स्थान तथा मान आदि देकर उसे संतुष्ट किया ॥ ३३२ ॥
अथानन्तर किसी दूसरे दिन प्रीतिङ्कर कुमारकी बड़ी माँ प्रियमित्रा अपने पुत्रके विवाहोत्सवमें अपनी पुत्रवधूको अलंकृत करनेके लिए रत्नमय आभूषणोंका समूह लेकर तथा ‘रथपर सवार होकर सबको दिखलानेके लिए जा रही थी। उसे देखनेके लिए वह गूँगी कन्या स्वयं मार्गमें आई और अपने आभूषणोंका समूह देखकर उसने अँगुलीके इशारेसे सबको बतला दिया कि यह आभूषणोंका समूह मेरा है। तदनन्तर वह कन्या रथमें बैठी हुई प्रियमित्राको रोककर खड़ी हो गई। इसके उत्तर में रथपर बैठी हुई प्रियमित्राने सबको समझा दिया कि यह कन्या पगली है ॥ ३३३-३३६ ।। तब मन्त्र-तन्त्रादिके जाननेवाले लोगोंने विधिपूर्वक मन्त्र-तन्त्रादिका प्रयोग किया और परीक्षा कर स्पष्ट बतला दिया कि न यह पागल है और न इसे भूत लगा है ॥ ३३७ ॥ यह सुनकर प्रीतिङ्कर कुमारने उस कन्याके पास गुप्त रूपसे इस आशयका एक पत्र भेजा कि हे कुमारि ! तू बिलकुल भय मत कर, राजाके पास आ, मैं भी वहाँ उपस्थित रहूंगा। पत्र देखकर तथा विश्वास कर वह कन्या बड़े हर्षसे राजाके समीप गई। राजाने भी उसके आभूषणोंका वृत्तान्त जाननेके लिए धर्माधिकारियोंको बुलाकर नियुक्त किया ।। ३३८-३४०।। राजाने वसुन्धरा कन्याको समीप ही आड़में बिठलाकर कुमार प्रीतिङ्करसे पूछा कि क्या आप इसका कुछ हाल जानते हैं ? ।। ३४१ ।। इसके उत्तरमें कुमारने अपना जाना हुआ हाल कह दिया और फिर राजासे समझाकर कह दिया कि बाकीका हाल मैं नहीं जानतायह देवी ही जानती है ॥ ३४२ ॥ राजाने कपड़ेकी आड़में बैठी हुई उस देवीकी गन्ध आदिसे पूजा कर पूछा कि हे देवि ! तूने जो देखा हो वह ज्योंका त्यों कह ॥ ३४३ ॥ इसके उत्तरमें उस देवीने राजाको नागदत्तकी सब दुष्ट चेष्टाएँ बतला दीं। उन्हें सुनकर तथा उनपर अच्छी तरह विचार कर राजा नागदत्तसे बहुत ही कुपित हुआ। उसने कहा कि इस पापीने पुत्रवध किया है और स्वामि-द्रोह भी किया है। यह कहकर उसने उसका सब धन लुटवा लिया और उसका निग्रह करनेका भी उद्यम किया परन्तु कुमार प्रीतिङ्करने यह कहकर मना कर दिया कि आपके लिए यह कार्य करना योग्य नहीं है। उस समय कुमारकी सुजनतासे राजा बहुत ही संतुष्ट हुआ और उसने अपनी पृथिवीसुन्द्री नामकी कन्या, वह वसुन्धरा नामकी कन्या तथा वैश्योंकी अन्य बत्तीस कन्याएँ विधिपूर्वक उसके लिए ब्याह दीं ।। ३४४-३४७ ॥ इसके सिवाय पहलेका धन, स्थान तथा अपना आधा राज्य भी दे दिया सो ठीक ही है क्योंकि जिन्होंने पूर्वभवमें पुण्य किया है ऐसे मनुष्योंको सम्पदाएँ स्वयं प्राप्त हो जाती हैं ॥ ३४८ ॥ इस प्रकार जो अतिशय प्रसन्न है तथा जिसकी इच्छाएँ निरन्तर बढ़ रही हैं ऐसे प्रीतिङ्कर कुमारने वहाँ अपनी इच्छानुसार चिरकाल तक मनचाहे काम-भोगोंका उपभोग किया ।। ३४९ ॥
तदनन्तर किसी एक दिन मुनिराज सागरसेन, आयुके अन्तमें संन्यास धारण कर स्वर्ग चले गये । उसी समय वहाँ बुद्धि-रूपी आभूषणों से सहित ऋजुमति और विपुलमति नामके दो चारण ऋद्धिधारी मुनिराज मनोहर नामक उद्यानमें आये। प्रीतिङ्कर सेठने जाकर उनकी स्तुति की और धर्मका स्वरूप पूछा। उन दोनों मुनियोंमें जो ऋजुमति नामके मुनिराज थे वे कहने लगे कि गृहस्थ और मुनिके भेदसे धर्म दो प्रकारका जानना चाहिए। गृहस्थोंका धर्म दर्शन-प्रतिमा, व्रत-प्रतिमा आदिके भेदसे ग्यारह प्रकारका है और कर्मोंका क्षय करनेवाला मुनियोंका धर्म क्षमा आदिके भेदसे दश प्रकारका है। धर्मका स्वरूप सुननेके बाद प्रीतिङ्करने मुनिराजसे अपने पूर्वभवोंका सम्बन्ध पूछा। इसके उत्तरमें मुनिराज इस प्रकार कहने लगे कि सुनो, मैं कहता हूं- किसी समय इसी नगरके बाहर सागरसेन मुनिराजने आतापन योग धारण किया था इसलिए उनकी वन्दनाके लिए राजा आदि बहुतसे लोग गये थे, वे नाना प्रकारकी पूजाकी सामग्रीसे उनकी पूजा कर शङ्ख तुरही आदि बाजोंके साथ नगरमें आये थे। उन बाजोंका शब्द सुनकर एक शृगालने विचार कियाकि ‘आज कोई नगर में मर गया है इसलिए लोग उसे बाहर छोड़कर आये हैं, मैं जाकर उसे खाऊँगा’ ऐसा विचार कर वह शृगाल मुनिराजके समीप आया। उसे देखकर मुनिराज समझ गये कि यह भव्य है और व्रत लेकर शीघ्र ही मोक्ष प्राप्त करेगा। ऐसा विचार कर मुनिराज उस निकटभव्यसे इस प्रकार कहने लगे कि पूर्व जन्ममें जो तूने पाप किये थे उनके फलसे अब शृगाल हुआ है और अब फिर दुर्बुद्धि होकर मुनियोंका समागम मिलने पर भी उसी दुष्कर्मका विचार कर रहा है। हे भव्य ! तू दुःखदायी पापको देनेवाले इस कुकर्म से विरत होव्रत ग्रहण कर और शुभ परिणाम धारण कर ॥ ३५०-३६० ॥
श्लोक 361 से 371 — शृगाल का व्रत और प्रीतिंकर के रूप में जन्म
मुनिराजके यह वचन सुनकर शृगालको इस बातका बहुत हर्ष हुआ कि यह मुनिराज मेरे मनमें स्थित बातको जानते हैं। शृगालकी चेष्टाको जाननेवाले मुनिराजने उस शृगालसे फिर कहा कि तू मांसका लोभी होनेसे अन्य व्रत ग्रहण करनेमें समर्थ नहीं है अतः रात्रिभोजन त्याग नामका श्रेष्ठ व्रत धारण कर ले। मुनिराजके वचन क्या थे मानो परलोकके लिए सम्बल (पाथेय ) ही थे। मुनिराजके धर्मपूर्ण वचन सुनकर वह शृगाल बहुत ही प्रसन्न हुआ उसने भक्तिपूर्वक उनकी प्रदक्षिणा दी, उन्हें नमस्कार किया और रात्रिभोजन त्यागका व्रत लेकर मद्य-मांस आदिका भी त्याग कर दिया ।। ३६१-३६४ ॥ उस समयसे वह शृगाल चावल आदिका विशुद्ध आहार लेने लगा। इस तरह कठिन तपञ्चरण करते हुए उसने कितना ही काल व्यतीत किया ।॥ ३६५ ॥ किसी एक दिन उस शृगालने सूखा आहार किया जिससे प्याससे पीड़ित होकर वह सूर्यास्तके समय पानी पीनेकी इच्छासे सीढ़ियोंके मार्ग-द्वारा किसी कुएँ के भीतर गया। कुएँके भीतर प्रकाश न देखकर उसने समझा कि सूर्य अस्त हो गया है इसलिए पानी बिना पिये ही बाहर निकल आया। बाहर आनेपर प्रकाश दिखा इसलिए पानी पीनेके लिए फिरसे कुएँके भीतर गया। इस तरह वह शृगाल दो तीन बार कुऍके भीतर गया और बाहर आया। इतनेमें सचमुच ही सूर्य अस्त हो गया। निदान, उस शृगालने अपने व्रतमें दृढ़ रहकर तृषा-परिषद् सहन किया और विशुद्ध परिणामोंसे मरकर कुबेरत सेठकी धनमित्रा स्त्रीसे प्रीतिंकर नामका पुत्र हुआ। व्रतके प्रभावसे ही उसने ऐसा ऐश्वर्य प्राप्त किया है। इस प्रकार मुनिराज बचन सुनकर प्रीतिकर संसारत्ते भयभीत हो उठा, उसने व्रतके माहात्म्यकी बहुत भारी प्रशंसा की तथा मुनिराजको नमस्कार कर वह अपने घर लौट आया ॥ ३६६-३७१ ॥ आचार्य कहते हैं कि जिस प्रकार दुभिक्ष पड़ने पर दरिद्र मनुष्य बहुत ही दुःखी होता है उसी प्रकार
इस संसारमें बतरहित मनुष्य दीर्घकाल तक दःख भोगता हुआ निरन्तर अपार खेदको प्राप्त होतारहता है ।।
श्लोक 372 से 381 — व्रत का महत्त्व और धर्म-पुण्य का फल
३७२ ।। व्रतके कारण इस जीवका सब विश्वास करते हैं और व्रतरहित मनुष्यसे सब लोग सदा शङ्कित रहते हैं। व्रती फलसहित वृक्षके समान हैं और अव्रती फलरहित वन्ध्य वृत्तके समान है ॥ ३७३ ॥ व्रती मनुष्य पर-जन्ममें इष्ट फलको प्राप्त होता है इसलिए कहना पड़ता है कि इस जीवका व्रतसे बढ़कर कोई भाई नहीं है और अन्नतसे बढ़कर कोई शत्रु नहीं है ॥ ३७४ ॥ व्रती मनुष्यके वचन सभी स्वीकृन करते हैं परन्तु व्रतहीन मनुष्यकी बात कोई नहीं मानता । बड़े-बड़े देवता भी व्रती मनुष्यका तिरस्कार नहीं कर पाते हैं ।॥ ३७५ ॥ व्रती मनुष्य अवस्थाका नया हो तो भी वृद्ध जन उसे नमस्कार करते हैं और वृद्धजन व्रतरहित हो तो उसे लोग तृणके समान तुच्छ समझते हैं ।॥ ३७६ ॥ प्रवृत्तिसे पापका ग्रहण होता है और निवृत्तिप्ते उसका क्षय होता है। यथार्थमें निवृत्तिको ही व्रत कहते हैं इसलिए उत्तम मनुष्य व्रतको अवश्य ही ग्रहण करते हैं ।॥ ३७७ ।। व्रतप्ते सम्पत्तिकी प्राप्ति होती है और अव्रतसे कभी संपत्ति नहीं मिलती इसलिए सम्पत्तिकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको निष्काम होकर उत्तम व्रती होना चाहिये ॥ ३७८ ।। इस जीवके लिए छोटा-सा व्रत भी स्वर्ग और मोक्षका कारण होता है इस विषयमें जो दृष्टान्त चाहते हैं उन्हें प्रीतिंकरका दृष्टान्त अच्छी तरह दिया जा सकता है ॥ ३७९ ॥ जिन्होंने पूर्वभवमें अच्छी तरह व्रतका पालन किया है वे इस भवमें इच्छानुसार फल भोगते हैं सो ठीक ही है क्योंकि बिना कारण के क्या कभी कोई कार्य होता हैं? ॥ ३८० ॥ जो कारणसे कार्यकी उत्पत्ति मानता है उप्ते सुख-दुःख रूपी कार्यका कारण धर्म और पाप ही मानना चाहिये अर्थात् धर्मते सुख और पापसे दुःख होता है ऐसा मानना चाहिये। जो इसप्ते विपरीत मानते हैं उन्हें विपरीत फलकी ही प्राप्ति होती देखी जाती है ।। ३८१ ।।
श्लोक 382 से 391— प्रीतिंकर का संयम और श्रेणिक का प्रश्न
यदि यह मूर्ख, व्यसनी, निर्दय, अथवा नास्तिक नहीं है तो धर्म और पापको छोड़कर सुख और दुःखका कारण कुछ दूसरा ही है ऐसा कौन कहेगा ? ॥ ३८२ ॥ जो केवल इसी जन्मके हित अहितको देखता है वह भी बुद्धिमान् कहलाता है फिर जो आगामी जन्मके भी हित-अहितका विचार रखते हैं वे अत्यन्त बुद्धिमान् क्यों नहीं कहलावें? अर्थात् अवश्य ही कहलावें ।। ३८३।। ऐसा मानकर शुद्ध बुद्धिके धारक पुरुषको चाहिये कि वह जिनेन्द्रदेवके द्वारा कहा हुआ व्रत लेकर उद्यम प्रकट करता हुआ स्वर्ग और मोत्तके सुख प्राप्त करनेके लिए प्रयत्न करे ।। ३८४।॥ तदनन्तर विरक्त बुद्धिको धारण करनेवाले प्रीतिंकरने अपनी स्त्री वसुन्धराके पुत्र प्रिपङ्करके लिए अभिषेकपूर्वक अपनी सच सम्पदाएँ समर्पित कर दीं और अनेक सेवक तथा भाई-बन्धुओंके साथ राजगृह नगरमें भगवान्महावीर स्वामीके पास आकर संयम धारण किया है ॥ ३८५-३८६॥ निश्चय और व्यवहार रूप मोक्षका साधन, सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र रूप मोक्षमार्गकी भावना ही है। सो इसके बलसे ये प्रीतिंकर मुनिराज घातिया कर्मोंको नष्ट कर अनन्तचतुष्टय प्राप्त करेंगे और फिर अघातिया कर्मों को नष्ट कर परमात्म-पद प्राप्त करेंगे ॥ ३८७-३८८ ॥ इस प्रकार श्रीमान् गणधरदेवकी कही कथासे राजा श्रेणिक बहुत ही प्रसन्न हुआ तथा उन्हें नमस्कार कर अपने आपको कृतार्थ मानता हुआ नगर में चला गया ।॥३८९।। अथानन्तर किसी दूसरे दिन क्षायिक सम्यग्दर्शनको धारण करनेवाले राजा श्रेणिकने हाथ
जोड़कर गणधरदेवको नमस्कार किया तथा उनसे बाकी बची हुई अपसर्पिणी कालकी स्थिति और आनेवाले उत्सर्पिणी कालकी समस्त स्थिति पूछी ॥ ३९०-३९१ ॥
श्लोक 392 से 401 — पंचम काल और कल्कि राजा का वर्णन
तब गणधर भगवान् अपने दाँतों की किरणोंके प्रसारसे सभाको संतुष्ट करते हुए गम्भीर-वाणी द्वारा इस प्रकार अनुक्रमसे स्पष्ट कहने लगे ।। ३९२ ।। उन्होंने कहा कि जब चतुर्थ कालके अन्तके तीन वर्ष साढ़े आठ माह बाकी रह जावेंगे तब भगवान् महावीर स्वामी सिद्ध होंगे ॥ ३९३ ॥ दुःषमा नामक पश्चम कालकी स्थिति इक्कीस हजार सागर वर्षकी है। उस कालमें मनुष्य उत्कृष्ट रूपसे सौ वर्षकी आयुके धारक होंगे ॥ ३९४ ॥ उनका शरीर अधिकसे अधिक सात हाथ ऊँचा होगा, उनकी कान्ति रूक्ष हो जायगी, रूप भद्दा होगा, वे तीनों समय भोजनमें लीन रहेंगे और उनके मन काम-सेवनमें आसक्त रहेंगे ॥ ३९५ ॥ कालदोषके अनुसार उनमें प्रायः और भी अनेक दोष उत्पन्न होंगे क्योंकि पाप करनेवाले हजारों मनुष्य ही उस समय उत्पन्न होंगे ॥ ३९६ ॥ शास्त्रोक्त लक्षणवाले राजाओंका अभाव होनेसे लोग वर्णसंकर हो जायेंगे । उस दुःषमा कालके एक हजार वर्ष बीत जानेपर धर्मकी हानि होनेसे पाटलिपुत्र नामक नगर में राजा शिशुपालकी रानी पृथिवीसुन्दरीके चतुर्मुख नामका एक ऐसा पापी पुत्र होगा जो कि दुर्जनोंमें प्रथम संख्याका होगा, पृथिवीको कम्पायमान करेगा और कल्कि राजाके नामसे प्रसिद्ध होगा। यह कल्कि मघा नामके संवत्सर में होगा ॥ ३९७-३९९ ॥ आक्रमण करनेवाले डेस कल्किकी उत्कृष्ट आयु सत्तर वर्षकी होगी और उसका राज्यकाल चालीस वर्ष तक रहेगा ॥ ४०० ॥ पाषण्डी साधुओंके जो छियानवे वर्ग हैं उन सबको वह आज्ञाकारी बनाकर अपना सेवक बना लेगा और इस तर समस्त पृथिवीका उपभोग करेगा ॥ ४०१ ।।
श्लोक 402 से 412 — दिगम्बर मुनियों के प्रति कल्कि का अत्याचार
तदनन्तर मिध्यात्वके उद्यसे जिसका चित्त भर रहा है ऐसा पापी कल्कि अपने मन्त्रियोंसे पूछेगा कि कहो इन पाषण्डी साधुओंमें अब भी क्या कोई ऐसे हैं जो हमारीआज्ञासे पराङ्मुख रहते हों ? इसके उत्तर में मन्त्री कहेंगे कि हे देव ! निर्मन्थ साधु अब भी आपकी आज्ञासे बहिर्भूत हैं. ॥ ४०२-४०३ ॥ यह सुनकर राजा फिर पूछेगा कि उनका आचार कैसा है ? इसके उत्तरमें मन्त्री लोग कहेंगे कि अपना हस्तपुट ही उनका बर्तन है अर्थात् वे हाथमें ही भोजन करते हैं, धनरहित होते हैं, इच्छारहित होते हैं, अहिंसा व्रतकी रक्षाके लिए वस्त्रादिका आवरण छोड़कर दिगम्बर रहते हैं, तपका साधन मानकर शरीरकी स्थितिके लिए एक दो उपवासके बाद भिक्षाके समय केवल शरीर दिखला कर याचनाके बिना ही अपने शास्त्रोंमें कही हुई विधिके अनुसार आहार ग्रहण करनेकी इच्छा करते हैं, वे लोग अपना घात करनेवाले अथवा रक्षा करनेवाले पर समान दृष्टि रखते हैं, क्षुधा तृषा आदिकी वाधाको सहन करते हैं, कारण रहते हुए भी वे अन्य साधुओंके समान दूसरेके द्वारा नहीं दी हुई वस्तुकी कभी अभिलाषा नहीं रखते हैं, वे सर्पके समान कभी अपने रहनेका स्थान बनाकर नहीं रखते हैं, ज्ञान-ध्यानमें तत्पर रहते हैं और जहाँ मनुष्योंका संचार नहीं ऐसे स्थानोंमें हरिणोंके साथ रहते हैं। इस प्रकार उस राजाके विशिष्ट मन्त्री अपने द्वारा देखा हुआ हाल करेंगे ॥ ४०४-४०९ ॥ यह सुनकर राजा कहेगा कि मैं इनकी अक्रम प्रवृत्तिको सहन करनेके लिए समर्थ नहीं हूं, इसलिए इनके हाथमें जो पहला भोजनका ग्रास दिया जाय वही कर रूपमें इनसे वसूल किया जावे ॥ ४१० ।। इस तरह राजाके कहनेसे अधिकारी लोग मुनियोंसे प्रथम ग्रास माँगेंगे और मुनि भोजन किये बिना ही चुप चाप खड़े रहेंगे। यह देख अहंकारसे भरे हुए कर्मचारी राजासे जाकर कहेंगे कि मालूम नहीं क्या हो गया है ? दिगम्बर साधु राजाकी आज्ञा माननेको तैयार नहीं हैं ।॥ ४११-४१२ ॥
श्लोक 413 से 421 — धर्म की रक्षा और जिनशासन की प्रभावना
कर्मचारियोंकी बात सुनकर क्रोधसे राजाके नेत्र लाल हो जावेंगे और ओंठ फड़कने लगेगा। तदनन्तर वह स्वयं ही ग्रास छीननेका उद्यम करेगा ॥ ४१३ ॥ उस समय शुद्ध सम्यग्दर्शनका धारक कोई असुर यह सहन नहीं कर सकेगा इसलिए राजाको मार देगा सो ठीक ही है क्योंकि शक्तिशाली पुरुष अन्यायको सहन नहीं करता है ॥ ४१४ ।। यह चतुर्मुख राजा मरकर रत्नप्रभा नामक पहली पृथिवीमें जावेगा, वहाँ एक सागर प्रमाण उसकी आयु होगी और लोभ-कषायके कारण चिरकाल तक दुःख भोगेगा ॥ ४१५ ॥ प्रभावशाली मनुष्य धर्मका निर्मूल नाश कभी नहीं सहन कर सकते और कुछ सावद्य (हिंसापूर्ण) कार्यके बिना धर्म-प्रभावना हो नहीं सकती इसलिए सम्यग्दृष्टि असुर अन्यायीचतुर्मुख राजाको मारकर धर्मकी प्रभावना करेगा ॥ ४१६ ॥ इस संसारमें धर्म ही प्राणियोकी माता है, धर्म ही पिता है, धर्म ही रक्षक है, धर्म ही बढ़ानेवाला है, और धर्म ही उन्हें निर्मल तथा निश्चल मोक्ष पदमें धारण करनेवाला है ।। ४१७ ॥ धर्मका नाश होनेसे सज्जनोंका नाश होता है इसलिए जो सज्जन पुरुष हैं वे धर्मका द्रोह करनेवाले नीच पुरुषोंका निवारण करते ही हैं और ऐसे ही सत्पुरुषोंसे सज्जन-जगत्की रक्षा होती है ॥ ४१८ ॥ आठ प्रकारके निमित्तज्ञान, तपञ्चरण करना, मनुष्योंके मनको प्रसन्न करनेवाले धर्मोपदेश देना, अन्यवादियोंके अभिमानको चूर करना, राजाओंके चित्त-को हरण करनेवाले मनोहर तथा शब्द और अर्थसे सुन्दर काव्य बनाना, तथा शूरवीरता दिखाना-इन सब कार्योंके द्वारा सज्जन पुरुषोंको जिन-शासनकी प्रभावना करनी चाहिये ।। ४१९-४२० ।। चिन्तामणि रत्नके समान अभिलषित पदार्थोंको देकर धर्मकी प्रभावना करनेवाले, बुद्धिमानों के द्वारा पूज्य धन्य पुरुष इस संसारमें दुर्लभ हैं ।॥ ४२१ ॥
श्लोक 422 से 430 — जिनशासन की महिमा और अजितंजय
जैन-शासनकी प्रभावना करनेमें जिसकी रुचि प्रवर्तमान है मानो मुक्ति उसके हाथमें ही स्थित है ऐसा जिनागममें कहा जाता है ॥ ४२२ ।। जो जिन-शासनकी प्रभावना करनेवाला है वही वैयाकारण है, वही नैयायिक है, वही सिद्धान्तका ज्ञाता है और वही उत्तम तपस्वी है। यदि वह जिन-शासनकी प्रभावना नहीं करता है तो इन व्यर्थकी उपाधियोंसे क्या लाभ है ? ॥ ४२३ ॥ जिस प्रकार सूर्यके द्वारा जगत् प्रकाशमान हो उठता है उसी प्रकार जिसके द्वारा जैन शासन प्रकाशमान हो उठता है उसके दोनों चरणकमलोंको धर्मात्मा अपने मस्तक पर धारण करते हैं ।॥ ४२४ ॥ जिस प्रकार समुद्र रत्नोंकी उत्पत्तिका कारण है और मलय-गिरि चन्दनकी उत्पत्तिका स्थान है उसी प्रकार जिन-शासनकी प्रभावना करनेवाला श्रीमान् पुरुष धर्मकी उत्पत्तिका कारण है ॥ ४२५ ॥ जिस प्रकार राजा राज्यके कंटकोंको उखाड़ फेंकता है उसी प्रकार जो सदा धर्मके कंटकोंको उखाड़ फेंकता है और सदा ऐसा ही उद्योग करता है वह लक्ष्मीका धारक होता है ॥ ४२६ ॥ आचार्य गुणभद्र कहते हैं कि हर्ष-रूपी फूलोंसे व्याप्त मेरे मन-रूपी रङ्गभूभिमें जिनेन्द्र प्रणीत समीचीन धर्मकी प्रभावनाका अभिनय रूपी महानट सदा नृत्य करता रहे ॥ ४२७ ।।
तदनन्तर उस कल्किका अजितंजय नामका बुद्धिमान् पुत्र, अपनी बालना नामकी पन्नीके साथ उस देवकी शरण लेगा तथा महामूल्य सम्यग्दर्शन रूपीरत्न स्त्रीकृत करेगा । देवके द्वारा किया हुआ जिनधर्मका माहात्म्य देखकर पापी पाखण्डी लोग उस समयसे मिध्या अभिमान छोड़ देंगे और जिनेन्द्रदेवके द्वारा कहा हुआ धर्म कुछ काल तक अच्छी तरह फिरसे प्रवर्तमान होगा ॥४२८-४३० ।।
श्लोक 431 से 441 — अवसर्पिणी के अंतिम धर्मात्मा और अतिदुःषमा काल
इस प्रकार दुष्षमा नामक पञ्चम काल में एक एक हजार वर्षके बाद जब क्रमशः बीस कल्कि हो चुकेंगे तब अत्यन्त पापी जलमन्थन नामका पिछला कल्कि होगा। वह राजाओंमें अन्तिम राजा होगा अर्थात् उसके बाद कोई राजा नहीं होगा। उस समय चन्द्राचार्यके शिष्य वीराङ्गज नामके मुनि सबसे पिछले मुनि होंगे, सर्वश्री सबसे पिछली आर्यिका होंगी, अग्निल सबसे पिछला श्रावक होगा और उत्तम व्रत धारण करनेवाली फल्गुसेना नामकी सबसे पिछली श्राविका होगी ।। ४३१-४३३॥ वे सब अयोध्याके रहनेवाले होंगे, दुःषमा कालके अन्तिम धर्मात्मा होंगे और पञ्चम कालके जब साढ़ेआठ माह बाकी रह जावेंगे तब कार्तिक मासके कृष्णपक्षके अन्तिम दिन प्रातःकालके समय स्वातिनक्षत्रका उदय रहते हुए वीराङ्गज मुनि, अग्निल श्रावक, सर्वश्री आर्यिका और फल्गुसेना श्राविका ये चारों ही जीव, शरीर तथा आयु छोड़कर सद्धर्म के प्रभावसे प्रथम स्वर्गमें जावेंगे । मध्याह्नके समय राजाका नाश होगा, और सायंकालके समय अग्निका नाश होगा। उसी समय षट्कर्म, कुल, देश और अर्थ के कारणभूत धर्मका समूल नाश हो जावेगा। ये सब अपने-अपने कारण मिलने पर एक साथ विनाशको प्राप्त होंगे। तदनन्तर अतिदुःषमा काल आवेगा। उसके प्रारम्भमें मनुष्य बीस वर्षकी आयुवाले, साढ़ेतीन हाथ ऊँचे शरीरके धारक, निरन्तर आहार करने-वाले पापी, नरक अथवा तिर्यश्च इन दो गतियोंसे आनेवाले और इन्हीं दोनों गतियोंमें जानेवाले होंगे। कपास और वस्त्रोंके अभावसे कुछ वर्षों तक तो वे पत्ते आदिके वस्त्र पहिनेंगे परन्तु छठवें कालके अन्त समय में वे सब नग्न रहने लगेंगे और बन्दरोंके समान दीन होकर फलादिका भक्षण करने लगेंगे ॥ ४३४-४४१ ।।
श्लोक 442 से 453 — अतिदुःषमा काल का अंत और अवसर्पिणी की समाप्ति
कालदोषके कारण मेघोंने इक्कीस हजार वर्ष तक थोड़ी थोड़ी वर्षा की सो ठीक ही है क्योंकि कालका कोई उल्लंघन नहीं कर सकता ॥ ४४२ ॥ मनुष्योंकी बुद्धि बल काय और आयु आदिका अनुक्रमसे ह्रास होता जावेगा। इस कालके अन्तिम समयमें मनुष्योंकी आयु सोलह वर्षकी और शरीरकी ऊँचाई एक हाथकी रह जावेगी ॥ ४४३ ॥ उस समय नामकर्मकी प्रकृतियोंमें से अस्थिर आदि अशुभ प्रकृतियाँ ही फल देंगी। उस समयके मनुष्य काले रङ्गके होंगे, उनके शरीरकी कान्ति रूखी होगी, वे दुर्भग, दुःस्वर, खल, दुःखसे देखनेके याग्य, विकट आकार-वाले, दुर्बल तथा विरल दाँतोंवाले होंगे। उनके वक्षःस्थल, गाल और नेत्रोंके स्थान, भीतरको धँसे होंगे, उनकी नाक चपटी होगी, वे सब प्रकारका सदाचार छोड़ देंगे, भूख प्यास आदिसे पीड़ितरहेंगे, निरन्तर रोगी होंगे, रोगका कुछ प्रतिकार भी नहीं कर सकेंगे और केवल दुःखके स्वादका ही अनुभव करनेवाले होंगे ॥ ४४४-४४६ ॥ इस प्रकार समय बीतने पर जब अतिदुःषमा कालका अन्तिम समय आवेगा तब समस्त पानी सूख जावेगा, और शरीरके समान ही नष्ट हो जावेगा ॥ ४४७ ॥ पृथिवी अत्यन्त रूखी-रूखी होकर जगह-जगह फट जावेगी, इन सब चीजोंके नाश हो जानेकी चिन्तासे ही मानो सब वृक्ष सूखकर मलिनकाय हो जायेंगे ॥ ४४८ ॥ प्रायः इस तरह समस्त प्राणियोंका प्रलय हो जावेगा। गङ्गा सिन्धु नदी और विजयार्ध पर्वतकी वेदिकापर कुछ थोड़ेसे मनुष्य विश्राम लेंगे और वहाँ नदीके मुखमें उत्पन्न हुए मछली, मेंढक, कछुए और केंकड़ा आदिको खाकर जीवित रहेंगे। उनमेंसे बहत्तर कुलों में उत्पन्न हुए कुछ दुराचारी दीन-हीन जीव छोटे-छोटे बिलोंमें घुसकर ठहर जावेंगे ।। ४४९-४५० ॥ तदनन्तर मेघ सात-सात दिन तक क्रमसे सरस, विरस, तीक्ष्ण, रूक्ष, उष्ण, विष-रूप और खारे पानीकी वर्षा करेंगे। इसके बाद पृथिवीकी विषमता (ऊँच-नीचपना) नष्ट हो जायगी, सब ओर भूमि चित्रा पृथिवीके समान हो जावेगी और यहीं पर अपसर्पिणी कालकी सीमा समाप्त हो जायगी ।। ४५१-४५३ ।।
श्लोक 454 से 470 — उत्सर्पिणी काल में सृष्टि का पुनर्विकास
इसके आगे उत्सर्पिणी कालका अतिदुःषमा काल चलेगा, वह भी इक्कीस हजार वर्षका होगा। इसमें प्रजाकी वृद्धिहोगी। पहले ही तीर जातिके मेघ सात-सात दिन बिना विश्राम लिये जल और दूधकी वर्षा करेंगे जिससे पृथिवी रूक्षता छोड़ देगी और उसीसे पृथिवी अनुक्रमसे वर्णादि गुणोंको प्राप्त होगी। इसके बाद अमृत जातिके मेघ सात दिन तक अमृतकी वर्षा करेंगे जिससे औषधियाँ, वृक्ष, पौधे और घास पहलेके समान निरन्तर होंगे ।। ४५४-४५७ ॥ तदनन्तर रसाधिक जातिके मेघ रसकी वर्षा करेंगे जिससे छह रसोंकी उत्पत्ति होगी। जो मनुष्य पहले बिलोंमें घुस गये थे वे अब उनसे बाहर निकलेंगे और उन रसोंका उपयोग कर हर्षसे जीवित रहेंगे। ज्यों-ज्यों कालमें वृद्धि होती जावेगी त्यों-त्यों प्राणियोंके शरीर आदिका ह्रास दूर होता जावेगा – उनमें वृद्धि होने लगेगी ।। ४५८-४५९ ।। तदनन्तर दुःषमा नामक कालका प्रवेश होगा उस समय मनुष्योंकी उत्कृष्ट आयु बीस वर्षकी और शरीरकी ऊँचाई साढ़ेतीन हाथकी होगी। इस कालका प्रमाण भी इक्कीस हजार वर्षका ही होगा। इसमें अनुक्रमसे निर्मल बुद्धिके धारक सोलह कुलकर उत्पन्न होंगे। उनमेंसे प्रथम कुलकरका शरीर चार हाथमें कुछ कम होगा और अन्तिम कुलकरका शरीर सात हाथ प्रमाण होगा । कुलकरोंमें सबसे पहला कुलकर कनक नामका होगा, दूसरा कनकप्रभ, तीसरा कनकराज, चौथा कनकध्वज, पाँचवाँ कनकपुंगव, छठा नलिन, सातवाँ नलिनप्रभ, आठवाँ नलिनराज, नौवाँ नलिनध्वज, दशवाँ नलिनपुंगव, ग्यारहवाँ पद्म, बारहवाँ पद्मप्रभ, तेरहवाँ पद्मराज, चौदहवाँ पद्मध्वज, पन्द्रहवाँ पद्मपुंगव और सोलहवाँ महापद्म नामका कुलकर होगा। ये सभी बुद्धि और बलसे सुशोभित होंगे ॥ ४६०-४६६ ॥ इनके समय में क्रमसे शुभ भावोंकी वृद्धि होनेसे भूमि, जल तथा धान्य आदिकी वृद्धि होगी ॥ ४६७।। मनुष्य अनाचारका त्याग करेंगे, परिमित समयपर योग्य भोजन करेंगे। मैत्री, लज्जा, सत्य, दया, दमन, संतोष, विनय, क्षमा, रागद्वेष आदिकी मन्दताः आदि सज्जनोचित चारित्र प्रकट होंगे और लोग अग्निमें पकाकर भोजन करेंगे ॥ ४६८-४६९ ॥ यह सब कार्य दूसरे कालमें होंगे। इसके बाद तीसरा काल लगेगा। उसमें लोगोंका शरीर सात हाथ ऊँचा होगा और आयु एक सौ बीस वर्षकी होगी ॥ ४७० ।।
श्लोक 471 से 481 — उत्सर्पिणी के तीर्थंकर और महापुरुष
तदनन्तर इसी कालमें तीर्थंकरोंकी उत्पत्ति होगी। जो जीव तीथकर होंगे उनके नाम इस प्रकार हैं- श्रेणिक १, सुपार्श्व २, उदङ्क ३, प्रोष्ठिल ४, कटप्रू ५, क्षत्रिय ६, श्रेष्ठी ७, शङ्ख ८, नन्दन ६, सुनन्द १०, शशाङ्क ११, सेवक १२, प्रेमक १३, अतोरण १४, रैवत १५, वासुदेव १६, भगाल १७, वागलि १८. द्वैपायन १९, कनकपाद २०, नारद २१, चारुपाद २२, और सत्यकिपुत्र २३, ये तेईस जीव आगे तीथकर होंगे। सात हाथको आदि लेकर इनके शरीरकी ऊँचाई होगी। इस प्रकार तेईस ये तथा एक अन्य मिलाकर चौबीस तीर्थंकर होंगे ॥ ४७१-४७५ ॥ उनमेंसे पहले तीर्थकर सोलहवें कुलकर होंगे । सौ वर्ष उनकी आयु होगी और सात अरत्नि ऊँचा शरीर होगा। अन्तिम तीर्थकरकी आयु एक करोड़ वर्ष पूर्वकी होगी और शरीर पाँचसौ धनुष ऊँचा होगा। उन तीर्थंकरोंमें पहले तीर्थंकर महापद्म होंगे। उनके बाद निम्नलिखित २३ तीर्थंकर और होंगे-सुरदेव १, सुपार्श्व २, स्वयं-प्रभ ३, सर्वात्मभूत ४, देवपुत्र ५, कुलपुत्र ६, उदक्क ७, प्रोष्ठिल ८, जयकीर्ति ६, मुनिसुव्रत १०, अरनाथ ११, अपाप १२, निष्कषाय १३, विपुल १४, निर्मल १५, चित्रगुप्त १६, समाधिगुप्त १७, स्वयंभू १८, अनिवर्ती १६, विजय २०, विमल २१, देवपाल २२ और अनन्तवीर्य २३ । इन समस्त तीर्थंकरों के चरण-कमलोंकी समस्त इन्द्र लोग सदा पूजा करेंगे। इसी तीसरे कालमें उत्कृष्ट लक्ष्मीके धारक १२ बारह चक्रवर्ती भी होंगे ॥ ४७६-४८१ ।।
श्लोक 482 से 491 — चक्रवर्ती, बलभद्र, नारायण और काल-परिवर्तन
उनके नाम इस प्रकार होंगे-पहला भरत, दूसरा दीर्घदन्त, तीसरा मुक्तदन्त, चौथा गूददन्त, पाँचवाँ श्रीषेण, छठवाँ श्रीभूति, सातवाँ श्रीकान्त, आठवाँ पद्म, नौवाँ महापद्म, दशवाँ विचित्र-वाहन, ग्यारहवाँ विमलवाहन और बारहवाँ सब सम्पदाओंसे सम्पन्न अरिष्टसेन ॥ ४८२-४८४ ॥ नौ बलभद्र भी इसी कालमें होंगे। उनके नाम क्रमानुसार इस प्रकार हैं १ चन्द्र, २ महाचन्द्र, ३ चक्रधर, ४ हरिचन्द्र, ५ सिंहचन्द्र, ६ वरचन्द्र, ७पूर्णचन्द्र, ८ सुचन्द्र और नौवाँ नारायणके द्वारा पूजित श्रीचन्द्र ॥४८५-४८६॥ नौ नारायण भी इसी कालमें होंगे उनके नाम इस प्रकार होंगे। पहला नन्दी, दूसरा नन्दिमित्र, तीसरा नन्दिषेण, चौथा नन्दिभूति, पाँचवाँ सुप्रसिद्धबल, छठवाँ महाबल, सातवाँ अतिबल, आठवाँ त्रिपृष्ठ और नौवाँ द्विपृष्ठ नामक विभु होगा। इन नारायणोंके शत्रु नौ प्रतिनारायण भी होंगे। उनके नाम अन्य ग्रन्थोंसे जान लेना चाहिए ।। ४८७-४८९ ॥ तदनन्तर इस कालके बाद सुषम-दुष्षम काल आवेगा उसकेप्रारम्भमें मनुष्योंकी ऊँचाई पाँचसौ धनुष होगी और कुछ अधिक एक करोड़ वर्षकी आयु होगी । इसके बाद कुछ वर्ष व्यतीत हो जानेपर यहाँपर जघन्यभोगभूमिके आर्य जनोंके समान सब स्थिति आदि हो जावेंगी ।। ४९०-४९१ ।।
श्लोक 492 से 508 — कल्पकाल, कर्मभूमि और भोगभूमि का विवरण
फिर पञ्चम काल आवेगा । उसमें मध्यम भोगभूमिकी स्थिति होगी और उसके अनन्तर छठवाँ काल आवेगा उसमें उत्तम भोगभूमिकी स्थिति रहेगी ॥ ४९२ ॥ जम्बूद्वीपके भरतक्षेत्रके सिवाय और जो बाकी नौ कर्मभूमियाँ हैं उनमें भी इसी प्रकारकी प्रवृत्ति होती है। इस प्रकार जो काल हो चुके हैं और जो आगे होंगे उन सबमें कल्पकालकी स्थिति बतलाई गई है अर्थात् उत्सर्पिणीके दश कोड़ा-कोड़ी सागर और अवसर्पिणीके १० कोड़ा-कोड़ी सागर दोनों मिलाकर बीस कोड़ा-कोड़ी सागरका एक कल्पकाल होता है और यह सभी उत्सर्पि-णियों तथा अवसर्पिणियों में होता है। सभी विदेहक्षेत्रों में मनुष्योंकी ऊंचाई पाँचसौ धनुष प्रमाण होती है और आयु एक करोड़ वर्ष पूर्व प्रमाण रहती है। वहाँ तीर्थङ्कर, चक्रवर्ती, बलभद्र और नारायण अधिकसे अधिक हों तो प्रत्येक एक सौ साठ, एक सौ साठ होते हैं और कमसे कम हों तो प्रत्येक बीस-बीस होते हैं। भावार्थ – अढ़ाई द्वीपमें पाँच विदेह क्षेत्र हैं और एक-एक विदेह-क्षेत्रके बत्तीस-बत्तीस भेद हैं इसलिए सबके मिलाकर एक सौ साठ भेद हो जाते हैं, यदि तीर्थङ्कर आदि शलाकापुरुष प्रत्येक विदेह क्षेत्र में एक-एक होवें तो एक सौ साठ हो जाते हैं और कमसे कम हों तो एक-एक महाविदेह सम्बधी चार-चार नगरियोंमें अवश्यमेव होनेके कारण बीस ही होते हैं ॥ ४९३-४९६ ॥ इस प्रकार सब कर्मभूमियोंमें उत्पन्न हुए तीर्थक्कर आदि महापुरुष अधिकसे अधिक हों तो एक सौ सत्तर हो सकते हैं। इन भूमियोंमें चारों गतियोंसे आये हुए जीव उत्पन्न होते हैं और अपने-अपने आचारके वशीभूत होकर मोक्षसहित पाँचो गतियोंमें जाते हैं। सभी भोग-भूमियोंमें, कर्मभूमिज मनुष्य और संज्ञी तिर्यञ्च ही उत्पन्न होते हैं। भोगभूमिमें उत्पन्न हुए जीव मरकर पहले और दूसरे स्वर्गमें अथवा भवनवासी आदि तीन निकायोंमें उत्पन्न होते हैं। यह नियम है कि भोगभूमिके सभी मनुष्य और तिर्यश्च नियमसे देव ही होते हैं। भोगभूमिमें उत्पन्न होनेवाले मनुष्य उत्तम ही होते हैं और कर्मभूमिमें उत्पन्न होनेवाले मनुष्य अपनी-अपनी वृत्तिकी विशेषतासे तीन प्रकारके कहे गये हैं-उत्तम, मध्यम और जघन्य। शलाकापुरुष, कामदेव तथा विद्याधर आदि, जो देवपूजित सत्पुरुष हैं वे दिव्य मनुष्य कहलाते हैं तथा छठवें कालके मनुष्य कहलाते हैं। इनके सिवाय एक पैरवाले, भाषा रहित, शङ्कुके समान कानवाले, कानको ही ओढ़ने-बिछानेवाले अर्थात्लम्बे कानवाले, खरगोशके समान कानवाले, घोड़े आदिके समान कानवाले, अश्वमुख, सिंहमुख, देखनेके अयोग्य महिषमुख, कोलमुख (शूकरमुख), व्याघ्रमुख, उलूकमुख, वानरमुख, मत्स्यमुख, कालमुख, गोमुख, मेषमुख, मेघमुख, विद्युन्मुख, आदर्शमुख, हस्तिमुख, पूँछवाले, और सींगवाले ये कुभोगभूमिके मनुष्य भी नीच मनुष्य कहलाते हैं। ये सब अन्तद्वीपोंमें रहते हैं। सब म्लेच्छखण्डों और विजयार्ध पर्वतों की स्थिति तीर्थकरोंके समयके समान होती है और वृद्धि ह्वास सदा कर्मभूमियोंमें ही रहता है। इस प्रकार श्रेणिक राजाके प्रश्नके अनुसार इन्द्रभूति गणधरने वचन रूपी किरणोंके द्वारा अन्तःकरणके अन्धकारसमूहको नष्ट करते हुए यह हाल कहा। उन्होंने यह भी कहा कि भगवान् महावीर भी बहुतसे देशोंमें बिहार करेंगे ॥ ४९७-५०८ ॥
श्लोक 509 से 522 — भगवान महावीर का निर्वाण और गणधर-परम्परा
अन्तमें वे पावापुर नगरमें पहुँचेंगे वहाँ के मनोहर नामके वनके भीतर अनेक सरोवरोंके बीचमें मणिमयी शिलापर विराजमान होंगे। विहार छोड़कर निर्जराको बढ़ाते हुए वे दो दिन तक वहाँ विराजमान रहेंगे और फिर कार्तिककृष्ण चतुर्दशीके दिन रात्रिके अन्तिम समय स्वातिनक्षत्रमें अतिशय देदीप्य-मान तीसरे शुक्लध्यानमें तत्पर होंगे । तदनन्तर तीनों योगोंका निरोधकर समुच्छिन्नक्रियाप्रति-पाती नामक चतुर्थ शुक्तध्यानको धारण कर चारों अघातिया कर्मोंका क्षय कर देंगे और शरीररहित केवलगुण रूप होकर एक हजार मुनियोंके साथ सबके द्वारा वान्छनीय मोक्षपद प्राप्त करेंगे ।। ५०९-५१२ ॥ वही उनका, अनन्त सुखको करनेवाला सबसे बड़ा पुरुषार्थ होगा – उनके पुरुषार्थकी वही अन्तिम सीमा होगी । तदनन्तर इन्द्रादि सब देव आवेंगे और अग्नीन्द्रकुमारके मुकुटसे प्रज्वलित होनेवाली अग्निकी शिखा पर भगवान् महावीर स्वामीका शरीर रक्खेंगे। स्वर्गसे लाये हुए गन्ध, माला आदि उत्तमोत्तम पदार्थोंके द्वारा मोहके शत्रुभूत उन तीर्थंकर भगवान्की विधिपूर्वक पूजा करेंगे और फिर अनेक अर्थोंसे भरी हुई स्तुतियोंके द्वारा संसार-भ्रमणसे पार होनेवाले उन भगवान्की स्तुति करेंगे। जिस दिन भगवान् महावीर स्वामीको निर्वाण प्राप्त होगा उसी दिन मैं भी घातिया कर्मोंको नष्ट कर केवलज्ञान रूपी नेत्रको प्रकट करनेवाला होऊँगा और भव्य जीवोंको धर्मोपदेश देता हुआ अनेक देशोंमें विहार करूँगा । तदनन्तर विपुलाचल पर्वतपर जाकर निर्वाण प्राप्त करूँगा। मेरे निर्वाण जानेके दिन ही समस्त-श्रुतज्ञानके पारगामी सुधर्म गणधर भी लोक और अलोकको प्रकाशित करनेवाले केवलज्ञान रूपी अन्तिम लोचनको प्राप्त करेंगे और उनके मोक्ष जानेके समय ही जम्बू स्वामी केवलज्ञान प्राप्त करेंगे। वह जम्बू स्वामी भरत क्षेत्रमें अन्तिम केवली कहलायेंगे ।इनके बाद नन्दी मुनि, श्रेष्ठ नन्दीमित्र, अपराजित, गोवर्द्धन और महातपस्वी भद्रबाहु मुनि होंगे । ये पाँचो ही मुनि अतिशय विशुद्धिके धारक होकर अनुक्रमसे अनेक नयोंसे विचित्र अर्थोंका निरूपण करनेवाले पूर्ण श्रुतज्ञानको प्राप्त होंगे अर्थात् श्रुतकेवली होंगे। इनके बाद विशाखार्य, प्रोष्ठिल, क्षत्रिय, जय, नागसेन, सिद्धार्थ, धृतिषेण, विजय, बुद्धिल, गङ्गदेव और बुद्धिमान् धर्मसेन ये ग्यारह अनु-क्रमसे होंगे तथा द्वादशाङ्गका अर्थ कहने में कुशल और दश पूर्वके धारक होंगे ।। ५१३-५२२ ।।
श्लोक 523 से 533 — श्रुतज्ञान की परम्परा और धर्मनिष्ठ महापुरुष
ये ग्यारह मुनि भव्यों के लिए कल्पवृक्षके समान तथा जैनधर्मका प्रकाश करनेवाले होंगे। उनके बाद नक्षत्र, जयपाल, पाण्डु, ध्रुवसेन और कंसार्य ये ग्यारह अङ्गोंके जानकार होंगे। इनके बाद सुभद्र, यशोभद्र, प्रकृष्ट बुद्धिमान्, यशोबाहु और चौथे लोहाचार्य ये चार आचाराङ्गके जानकार होंगे। इन सब तपस्त्रियोंकी यह परम्परा जिनेन्द्रदेवके मुखकमलप्से निकले हुए, पवित्र तथा पापोंका लोप करनेवाले शास्त्रोंका प्ररूपण करेंगे। इनके बाद बड़ी-बड़ी ऋद्धियोंको धारण करनेवाले जिनसेन, वीरसेन आदि अन्य तपस्वी भी श्रुतज्ञानके एकदेशका प्ररूपण करेंगे। प्रायः कर श्रुतज्ञानका यह एकदेश दुध्षमा नामक पञ्चम कालके अन्त तक चलता रहेगा ।। ५२३-५२८ ॥ भरत, सागर, मनुष्यों के द्वारा प्रशंसनीय सत्यवीर्य, राजा मित्रभाव, सूर्यके समान कांतिवाला मित्रवीर्य, धर्मवीर्य, दानवीर्य, मघवा, बुद्धवीर्य, सीमन्धर, त्रिपृष्ठ, स्वयम्भू, पुरुषोत्तम, पुरुषपुण्डरीक, प्रशंसनीय सत्य-दत्त, पृथिवीका पालक कुनाल, मनुष्योंका स्वामी नारायण, सुभौम, सार्वभौम, अजितञ्जय, विजय, उप्रसेन, महासेन और आगे चलकर जिनेन्द्रका पद प्राप्त करनेवाला तू, गौतम स्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे श्रेणिक ! ये सभी पुरुष श्रीमान् हैं, धर्म सम्बन्धी प्रश्न करनेवालों में श्रेष्ठ हैं, और निरन्तर चौबीस तीर्थंकरोंके चरण कमलोंकी सेवा करनेवाले हैं ।। ५२९-५३३ ।।
श्लोक 534 से 543 — भगवान महावीर के पूर्वभव
भगवान् महावीर स्वामीका जीव पहले पुरूरवा नामका भील था, फिर पहले स्वर्गमें देव हुआ, फिर भरतका पुत्र मरीचि हुआ, फिर ब्रह्मस्वर्ग में देव हुआ, फिर जटिल नामका ब्राह्मण हुआ ॥ ५३४ ॥ फिर सौधर्म स्वर्गमें देव हुआ, फिर पुष्यमित्र नामका ब्राह्मण हुआ, फिर अग्निसम नामका ब्राह्मण हुआ ।। ५३५ ।। फिर सनत्कुमार स्वर्गमें देव हुआ, फिर अग्निमित्र नामका ब्राह्मण हुआ, फिर माहेन्द्रस्वर्गमें देव हुआ, फिर भारद्वाज नामका ब्राह्मण हुआ, फिर माहेन्द्र स्वर्गमें देव हुआ, फिर वहाँ से
च्युत होकर मनुष्य हुआ, फिर असंख्यात वर्षों तक नरकों और त्रस स्थावर योनियोंमें भ्रमण करता
रहा ॥ ५३६-५३७ ।। वहाँ से निकलकर स्थावर नामका ब्राह्मण हुआ, फिर चतुर्थ स्वर्गमें देव हुआ,
वहाँ से च्युत होकर विश्वनन्दी हुआ, फिर त्रिष्पृष्ठ नामका तीन खण्डका स्वामी-नारायण हुआ,
फिर सप्तम नरकमें उत्पन्न हुआ वहाँ से निकल कर सिंह हुआ ॥ ५३८-५३९ ।। फिर पहले नरकमें
गया, वहां से निकल कर फिर सिंह हुआ, उसी सिंहकी पर्यायमें उसने समीचीन धर्म धारण कर
निर्मलता प्राप्त की, फिर सौधर्म स्वर्ग में सिंहकेतु नामका उत्तम देव हुआ, फिर कनकोज्वल नामका
विद्याधरोंका राजा हुआ, फिर सप्तम स्वर्गमें देव हुआ, फिर हरिषेण राजा हुआ, फिर महाशुक्र
स्वर्गमें देव हुआ, फिर प्रियमित्र नामका चक्रवर्ती हुआ, फिर सहस्त्रार स्वर्गमें सूर्यप्रभ नामका देव
हुआ, वहाँ से आकर नन्द नामका राजा हुआ, फिर अच्युत स्वर्गके पुष्पोत्तर विमानमें उत्पन्न
हुआ और फिर वहाँसे च्युत होकर वर्धमान तीर्थकर हुआ है ।। ५४०-५४३ ।।
श्लोक 544 से 551 — वर्धमान जिनेन्द्र की स्तुति और सच्चे दान का स्वरूप
जो पश्वकल्याण रूप महाऋद्धिको प्राप्त हुए हैं तथा जिन्हें मोक्ष लक्ष्मी प्राप्त हुई है ऐसे वे वर्धमान स्वामी गुणभद्रके लिए अथवा गुणोंसे श्रेष्ठ समस्त पुरुषोंके लिए सर्व प्रकारके मङ्गल प्रदान करें ।। ५४४ ।। इस प्रकार अच्छी कथाके रससे मधुर तथा भक्तिप्से आस्वादित, गौतम स्वामीके मुख-कमलमें सुशोभित सरस्वती देवीके वचन रूपी अमृतसे, वह सभा तथा मगधेश्वर राजा श्रेणिक दोनों ही, समस्त अर्थ रूप सम्पदाओंको देनेवाले एवं ज्ञान और दर्शनको पुष्ट करनेवाले बड़े भारी सन्तोषको प्राप्त हुए ।। ५४५ ॥ जो निर्मल मोक्षमार्गमें रात-दिन लक्ष्मीसे बढ़ते ही जाते हैं, जिन्होंने इस कलिकालमें भी धर्म तीर्थका भारी विस्तार किया है, और जिन्होंने अन्तिम तीर्थंकरको भी जीत लिया है ऐसे श्रीवर्धमान जिनेन्द्रको मैं स्तुतिके मार्गमें लिये जाता हूँ – अर्थात् उनकी स्तुतिकरता हूँ ।। ५४६ ।। हे ईश ! अर्थी लोग – कुछ पानेकी इच्छा करने वाले लोग, किसी स्तुत्य अर्थात् स्तुति करनेके योग्य पुरुषकी जो स्तुति करते हैं सो उसे प्रसन्न करनेके लिए ही करते हैं परन्तु यह बात आपमें नहीं है क्योंकि आप मोहको जीत चुके हैं इसलिए मैं किसी वस्तुकी आकांक्षा रखकर स्तुति नहीं कर रहा हूँ, मुझे तो सिर्फ स्तुति करने योग्य जिनेन्द्रकी स्तुति करनेका ही अनुराग है, मैं सब प्रयोजनोंसे विमुख हूँ ।। ५.४७ ॥ हे सुमुख ! जिनका प्रमाण अर्थात् ज्ञान, प्रमेय अर्थात् पदार्थसे रहित है-जो समस्त पदार्थोंको नहीं जानते हैं वे हिताभिलाषी लोगोंकी स्तुतिके विषय नहीं हो सकते । हे अर्हन् ! आप समस्त पदार्थोंको जानते हैं- समस्त पदार्थोंका जानना ही आपका स्वरूप है और आप ही उन समस्त पदार्थोंके वक्ता हैं- उपदेश देनेवाले हैं इसलिए हिताभिलाषी लोगोंके द्वारा आप ही स्तुति किये जानेके योग्य हैं ।॥ ५४८ ॥ हे जिनेन्द्र ! यद्यपि आप स्तुतिका फल नहीं देते हैं तो भी स्तुति करनेवाला मनुष्य विना किसी याचनाके शीघ्र ही स्तुतिका बहुत भारी श्रेष्ठ फल अवश्य पा लेता है इसलिए दीनतासे बहुत डरनेवाला और श्रेष्ठ फलकी इच्छा करने बाला मैं आपका स्तवन क्यों न करूँ ? ।। ५४९ ॥ हे जिनेन्द्र ! यदि इस संसारमें कोई किसीके लिए बिना कारण तृणका एक टुकड़ा भी देता है तो वह मूर्ख कहलाता है परन्तु आप विना किसी कारण मोक्ष लक्ष्मी तक प्रदान करते हैं (इसलिए आपको सबसे अधिक मूर्ख कहा जाना चाहिये) परन्तु आप बुद्धिमानोंमें प्रथम ही गिने जाते हैं यह महान् आश्चर्यकी बात है ।। ५५० ।। इस संसारमें कितने ही अन्य लोगोंने अपना सर्वस्त्र-धन देकर याचक जनोंके लिए छलरहित स्थायी धनसे श्रष्ठ बनाया है और हे जिनेन्द्र ! आप केवल वचनोंके द्वारा ही दान करते हैं फिर भी आश्वर्यकी बात है कि चतुर मनुष्य उन सबका उल्लङ्घन कर एक आपको ही उत्कृष्ट दाता कहते हैं। भाषार्थ -धन सम्पत्तिका दान करनेवाले पुरुष संसारमें फँसानेवाले हैं परन्तु आप वैराग्यसे ओत-प्रोत उपदेश देकर जीवोंको संसार-समुद्रसे बाहर निकालते हैं अतः सच्च और उत्कृष्ट दानी आप ही हैं ।। ५५१ ।।
श्लोक 552 से 561 — जिनधर्म, पुण्य और वीतरागता की महिमा
हे जिन ! विषयोंका अर्जन करना ही जिनकी बुद्धि अथवा पुरुषार्थ रह गया है तथा समस्त विषयों का निरन्तर उपभोग करना ही जिन्होंने सुख मान रखा है उन दोनोंसे विरुद्ध रहनेवाला आपका शासन, उन लोगोंके कानको फोड़नेवाला क्यों नहीं होगा ? अवश्य होगा ॥ ५५२ ॥ हे जिनेन्द्र ! आपने जिस पुण्यका उपदेश दिया है वही ज्ञान आदिके द्वारा परम निर्वाणका साधन होनेसे इष्ट है तथा भव्य जीवोंके द्वारा करनेके योग्य है। देवोंके समस्त सुख प्रदान करनेवाला जो पुण्य है वह पुण्य नहीं है क्योंकि वह बन्धका देनेवाला है, विषयोंमें फँसानेवाला है और अभीष्ट (मोक्ष) का घात करनेवाला है ।। ५५३ ।। हे भगवन् ! समवसरणमें आपके जो शरीरादिक विद्यमान हैं वे निष्फल नहीं हैं क्योंकि उत्तम शिष्य आपके वचन सुनकर तथा साक्षात् आपके दर्शन कर इसी लोकमें परम आनन्दको प्राप्त होते हैं सो ठीक ही है क्योंकि जितने फल हैं उन सबमें परोपकार करना ही मुख्य फल है ।। ५५४ ॥ हे भगवन् ! ज्ञान दर्शनादिरूप लक्षणोंका घात करनेवाला जो नामादि कर्म आपकी आत्मामें विद्यमान है वह क्या आपके उपयोगको नष्ट कर सकता है ? अर्थात् नहीं कर सकता । हे जिनेन्द्र ! आत्मामें कर्मोंकी सत्ता होनेसे जो आपको असिद्ध-अमुक्त मानता है वह यह क्यों नहीं मानने लगता है कि निरन्तर ऊर्ध्वगमन न होनेसे शरीररहित सिद्ध भगवान् भी अभी सिद्धिको प्राप्त नहीं हुए हैं। भावार्थ – यद्यपि अरहन्त अवस्थामें नामादि कर्म विद्यमान रहते हैं परन्तु मोहनीयका योग न होनेसे वे कुछ कर सकनेमें समर्थ नहीं है अतः उनकी जीवन्मुक्त अवस्था ही मानने योग्य है ।। ५५५ ।। हे प्रभो ! गणधरादिक देव, आपको आदिसहित, अन्त रहित, आदिरहित, अन्तसहित, अनादि-अनन्त, पापसहित, पापरहित, दुःखी, सुखी और दुःख-सुख दोनोंसे रहित कहते हैं इसलिए जो मनुष्य नयोंसे अनभिज्ञ हैं वे आपको नहीं जान सकते हैं- उनके द्वारा आप अज्ञेय हैं। भावार्थ – आत्माकी जो सिद्ध पर्याय प्रकट होती है वह पहले से विद्यमान नहीं रहती इसलिए सिद्ध पर्यायकी अपेक्षा आप सादि हैं तथा सिद्ध पर्याय एक बार प्रकट होकर फिर कभी नष्ट नहीं होती इसलिए आप अन्तरहित हैं। आपकी संसारी पर्याय आदि-रहित है अतः उसकी अपेक्षा अनादि हैं और कर्म क्षय हो जाने पर संसारी पर्यायका अन्त हो जाताहै उसकी अपेक्षा अन्तसहित हैं। द्रव्यार्थिक नयकी अपेक्षा सामान्य जीवत्वभावसे आप न आदि हैं और न अन्त हैं अतः आप आदि और अन्त दोनोंसे रहित हैं। हिंसादि पापोंका आप-त्याग कर चुके हैं अतः अनवद्य हैं- निष्पाप हैं और असातावेदनीय आदि कितनी ही पाप प्रकृतियोंका उदय अरहन्त अवस्थामें भी विद्यमान है अतः सावद्य हैं- पाप प्रकृतियोंसे सहित हैं। अरहन्त अवस्थामें असातावेदनीयका उद्य विद्यमान रहनेसे कारणकी अपेक्षा आप दुखी हैं, मोह कर्मका अभाव हो जानेसे आकुलताजन्य दुःख नष्ट हो चुका है इसलिए सुखी हैं, और आप अव्यावाधगुणसे सहित हैं अतः सुखी और दुखी इन दोनों व्यवहारोंसे रहित हैं। इस प्रकार भिन्न-भिन्न नयोंकी अपेक्षा आप अनेक रूप हैं। जो इस नयवादको नहीं समझता है वह आपके इन विविध रूपोंको कैसे समझ सकता है ? ॥ ५५६ ॥ हे देव ! जीवोंके भाव दो प्रकार के हैं एक संयोग से उत्पन्न होनेवाले और दूसरे स्वाभाविक । जो संयोगसे उत्पन्न होनेवाले भाव हैं वे संयोगके नष्ट हो जानेपर नष्ट हो जाते हैं, उनके नष्ट होनेसे ज्ञानादिक स्वाभाविक भावोंमें आत्माकी जो स्थिति है वही परमनिवृति या परम मुक्ति कहलाती है परन्तु यह मार्ग आपके वचनों से दूर रहनेवाले अन्य दर्शनकारोंको कठिन है ।। ५५७ ।। हे भगवन् ! आप अनादि कर्मबन्धनको बेदकर जो अन्तरहित मुक्ति प्रदान करते हैं वह बात तो दूर ही रही किन्तु स्नेह आदि कारणोंसे रहित होकर भी समस्त प्राणियोंकी रक्षा करनेमें जो आपकी दक्षता है वही आपकी आप्तता सिद्ध करनेके लिए बहुत है ।। ५५८ ॥ हे भगवन् ! क्या आपका ज्ञान समस्त पदार्थोके देखनेके कौतूहलसे सहित नहीं है ? क्या अपरिमित पदार्थों के निरूपण करनेमें आपकी वचन-कुशलता नहीं है? क्या परपदार्थोंसे पराङ्मुख रहनेवाले आप स्वार्थरूप सम्पदाके सिद्ध करनेमें समर्थ नहीं हैं और क्या सज्जनोंके बीच एक आप ही पूज्य नहीं हैं ? ।। ५५९ ।। हे नाथ! समस्त संसारको देखनेके लिए फैलनेवाले आपके अनन्तवीर्यके व्यापारका पार कभी नहीं प्राप्त किया जा सकता है तो भी आश्चर्य है कि सज्जन लोग आपको ही सुखियोंमें सबसे अधिक सुखी बतलाते हैं परन्तु उनकी यह भक्ति है अथवा यथार्थज्ञानहै सो जान नहीं पड़ता है ॥ ५६० ॥ हे जिनेन्द्र ! आपकी जितनी चेष्टाएँ है वे सभी भक्त जीवोंके मोक्ष सिद्ध करनेके लिए हैं परन्तु आपको उसके किसी फलकी इच्छा नहीं है इसलिए कहना पड़ता है कि वचनामृतरूपी जलकी वृष्टिसे संसारको तृप्त करते हुए एक आप ही अकारण बन्धु हैं ।॥ ५६१।।
श्लोक 562 से 571 — केवलज्ञान, रत्नत्रय और परमात्मस्वरूप
यह जीव प्रकट हुए उपयोगरूपी गुणोंके द्वारा जाना जाता है और उस उपयोगको नष्ट करनेवाले चार घातिया कर्म हैं। उन घातिया कर्मोंको नष्ट करनेसे आपका उपयोगरूपी पूर्ण लक्षण प्रकट हो चुका है इसलिए हे जिनेन्द्र ! आप ही कहिए कि ऐसे आत्मलक्षणवाले आपको सिद्ध कैसे न कहें ? ॥ ५६२ ॥ हे भगवन् ! आपके गुण साधारण नहीं हैं यह मैं मानता हूँ परन्तु उन असाधारण गुणोंके रहते हुए भी आप साक्षात् दिखते नहीं हैं यह आश्चर्य है, यदि आपके साक्षात् दर्शन हो जावें तो वह भक्ति उत्पन्न होती है जिसके कि द्वारा बहुत भारी पुण्यका संचय होता है और बहुत भारी पाप नष्ट हो जाते हैं ।। ५६३ ॥ हे देव ! मोहनीय कर्मका घात होनेसे आपके अवगाढ सम्यग्दर्शन हुआ था और अब ज्ञानावरण तथा दर्शनावरणका क्षय हो जानेसे परमावगाढ़ सम्यग्दर्शन प्रकट हुआ है। अवगाढ़ सम्यग्दर्शनमें चारित्रकी पूर्णता होती है और परमावगाढ़ सम्यग्दर्शनमें समस्त पदार्थोंके जाननेकी सामध्ये होती है इस तरह दर्शन, ज्ञान और चारित्र गुणकी पूर्णताके कारण आप वन्दनीय हैं- वन्दना करनेके योग्य हैं ।॥ ५६४ ॥ हे भगवन् ! आपने प्रबल घातिया कर्मोंकी सेनाको तो पहले ही नष्ट कर दिया था अब अघातिया कर्म भी, जिसका बाँध टूट गया है ऐसे सरोवरके जलके समान निरन्तर बहते रहते हैं- खिरते जाते हैं। हे नाथ! इस तरह व्यवहार-रत्नत्रयके द्वारा आपको निश्चय-रत्नत्रयकी सिद्धि प्राप्त हुई है और समीचीन धर्मचक्र के द्वारा आप तीनों लोकोंके एक स्वामी हुए हैं ।॥ ५६५ ॥ हे कामदेवके मानको मर्दन करनेवाले प्रभो ! आपका शरीर विकारसे रहित हैऔर आपके वचन पदार्थके यथार्थ स्वरूपको देखनेवाले हैं यदि कदाचित् ये दोनों ही नेत्र और कर्ण इन्द्रियके विषय हो जावें तो वे दोनों ही, रागद्वेषसे रहित तथा समस्त पदार्थोंको जाननेवाले आपको किसके मनमें शीघ्र ही स्थापित नहीं कर देंगे अर्थात् सभीके मनमें स्थापित कर देंगे। भावार्थ- आपका निर्विकार शरीर देखकर तथा पदार्थके यथार्थ स्वरूपका निरूपण करनेवाली आपकी वाणी सुनकर सभी लोग अपने हृदयमें आपका ध्यान करने लगते हैं। आपका शरीर निर्विकार इसलिए है कि आप वीतराग हैं तथा आपकी वाणी पदार्थका यथार्थ स्वरूप इसलिए कहती है कि आप सब पदार्थोंको जाननेवाले हैं- सर्वज्ञ हैं ।॥ ५६६ ॥ हे विद्वानोंके पालक ! क्या इस संसारमें वस्तुका स्वरूप अन्वय रूपसे नित्य है अथवा निरन्वय रूपसे क्षणिक है। कैसा है सो कहिए, इसका स्वरूप कहनेमें बुद्धादिक गर्भमें बैठे हुए बच्चे के समान हैं, वास्तविक बात यह है कि इन सबका ज्ञान पदार्थज्ञानसे विमुख है ।। ५६७ ॥ हे देव ! आपका अनन्तचतुष्टय कपिलादिके विषयभूत नहीं है यह बात तो दूर रही परन्तु निःस्वेदत्व आदि जो आपके स्वाभाविक अतिशय हैं उनमेंसे क्या कोई भी कपिलादिसे किसी एकके भी संभव है ? अर्थात् नहीं है; फिर भला ये बेचारे कपिलादि आप्तकी पंक्तिमें कैसे बैठ सकते हैं? आप्त कैसे कहला सकते हैं ? ॥ ५६८ ॥ हे भगवन् ! यद्यपि आपने तीनों वेदोंको नष्ट कर दिया है फिर भी मुनिगण आपको परमपुरुष कहते हैं सो क्या परमौदारिक शरीरकी संगतिसे कहते हैं? या मोह रूपी लताके भस्म करनेसे कहते हैं ? या सिद्धता गुणरूप परिणमन करनेसे कहते हैं या गुणोंके गौरवसे कहते हैं ? ॥ ५६९ ॥ हे भगवन् ! यद्यपि अभी आपने औदारिक, तैजस और कार्मण इन तीन शरीरोंको नष्ट नहीं किया है तो भी शुद्धि, शक्ति और अनुपम धैर्यके सातिशय प्रकट होनेसे आप सिद्ध हो चुके हैं। हे स्वामिन् ! आप अपने द्वारा कहे हुए विशाल एवं समीचीन मार्गमें चलनेवाले लोगोंको परमात्म-अवस्था प्राप्तकरा देते हैं यही आपकी सबसे अधिक विशेषता है ॥ ५७० ॥ हे देव ! यद्यपि आपके औयिक भाव है परन्तु चूँकि आप मोहसे रहित हैं अतः वह बन्धका कारण नहीं है मात्र योगोंके अनुरोधसे आपके सातावेदनीय नामक पुण्य प्रकृतिका थोड़ा-सा बन्ध होता है पर वह आपका कुछ भी विघात नहीं कर सकता इसलिए आपको यथार्थमें बन्धरहित ही कहत हैं ।। ५७१ ॥
श्लोक 572 से 578 — जिनेन्द्र स्तुति और पर्व का समापन
हे भगवन् ! आपके चरण-कमलोंका भ्रमर बननेसे जो पुण्य प्राप्त हुआ था उसीसे यह देवताओंका समूह गणनीय (माननीय) गिना गया है और उसी कारणसे उसकी लक्ष्मी संख्या के बाहर हो गई है। यही कारण है कि नखोंकी ऊपरकी ओर उठनेवाली किरणोंसे जिसका मुख देदीप्यमान हो रहा है ऐसा यह इन्द्र मुकुट झुका कर आपके चरणोंके सम्मुख हो रहा है- आपके चरणोंकी ओर निहार रहा है ॥५७२।। हे जिनेन्द्र ! आपका उत्कृष्ट शरीर प्रशम भावकी चरम सीमासे परिपूर्ण है, आप क्रम तथा इन्द्रियोंसे रहित केवलज्ञानरूपी तेजके एक मात्र स्थान हैं, आपकी गम्भीर दिव्यध्वनि निश्चय और व्यवहार-नयसे परिपूर्ण होकर प्रकट हुई है तथा आप सबके स्वामी हैं इसलिए हे नाथ ! आपके परमात्मपदका प्रभाव बहुत ही अधिक सुशोभित हो रहा है ॥ ५७३ ॥ हे भगवन् ! यद्यपि आपका ज्ञान सर्वत्र व्याप्त है तो भी स्वरूपमें नियत है और वह किसी कार्यका कारण नहीं है। आपकी वाणी इच्छाके बिना ही खिरती है तो भी वचनरहित (पशु आदि) जीवोंका भी आत्मकल्याण करनेमें समर्थ है। इसी प्रकार आपका जो विहार तथा ठहरना होता है वह भी अपनी इच्छासे किया हुआ। नहीं होता है और वह भी निज तथा पर किसीको भी बाधा नहीं पहुँचाता है। ऐसे हे देव ! आप मेरे निर्मलज्ञानरूपी दर्पणके तलमें ज्ञेयकी आकृतिको धारण करो अर्थात् मेरे ज्ञानके विषय होओ ॥ ५७४ ।। हे भगवन् ! आप आत्माके स्वामी हैं- अपनी इच्छाओंको अपने आधीन रखते हैं तथा आपने रागादि अविद्याओंका उच्छेद कर दिया है इसलिए आपके बचन प्रत्यक्षादि विरोधसेरहित होकर समस्त संसारके लिए विना किसी बाधा के यथार्थ उपदेश देते हैं। इसी तरह हे वीर ! आपने कामदेवके वाणोंकी शिखाकी वाचालता और शक्ति दोनों ही नष्ट कर दी है इसलिए मोहकी शत्रुताको जीतना आपके ही सिद्ध है अन्याय करनेवाले अन्य लोगोंमें नहीं ॥ ५७५ ।। समस्त जगत्के द्वारा वन्दना करने योग्य देवाधिदेव श्री वर्धमान स्वामी सदा मेरे मस्तक पर विराजमान रहें और हे गणधर देव ! आप भी सदा मेरे हृदयमें विद्यमान रहें क्योंकि आपने मेरे भाग्योदयसे करुणाकर स्पष्ट वाणीके द्वारा श्रद्धाकी वृद्धि करनेवाला यह प्रथमानुयोग कहा है सो ठीक ही है क्योंकि ऐसे पुरुषोंका ऐसा भाव होना स्वाभाविक ही है ॥ ५७६ ॥ इस प्रकार जिसे आगामी कालमें मोक्ष होनेवाला है जिसने अपना कार्य सिद्ध कर लिया है, जो धर्मका भार धारण करनेवाला है और जिसे भारी हर्ष उत्पन्न हो रहा है ऐसा मगधपति राजा श्रेणिक, श्री वर्धमान जिनेन्द्र और गौतम गणधरकी स्तुति कर अपने नगर में प्रविष्ट हुआ ॥ ५७७ ।।
आचार्य गुणभद्र कहते हैं कि व्याख्यान करनेवाले, सुननेवाले और लिखनेवालोंको इस पुराणकी संख्या अनुष्टुप् छन्दसे बीस हजार समझनी चाहिये ।। ५.७८ ।।
इस प्रकार भगवद्गुणभद्राचार्य प्रणीत, आर्ष नामसे प्रसिद्ध, त्रिषष्टिलक्षण महापुराणके संग्रहमें श्री वर्धमान स्वामीका पुराण वर्णन करनेवाला यह छिहत्तरवाँ पर्व समाप्त हुआ ।॥ ७६ ॥
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आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
आदिपुराण भाग – 2 Adi purana Part-2 by Acharya Jinasena