अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 84- shlok 84 to 91
श्लोक ( Shlok ) 84
मतिः श्रुतं तपः शान्तिः समाधिस्तत्त्ववीक्षणम् । सर्वं सम्यक्त्वशून्यस्व मरीचेरिव निष्फलम् ॥ ८४ ॥
वह सम्यग्दर्शनसे शून्यथा अतः उसका मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, तप, शान्ति, समाधि और तत्त्वावलोकन – सभी कुछ मरीचिके समान निष्फल था ॥ ८४ ॥
“He was devoid of right belief (Samyag-darshana); therefore, his sensory knowledge (mati-jnana), scriptural knowledge (shruta-jnana), penance, tranquility, deep meditation (samadhi), and perception of truth were all completely fruitless, just like those of Marichi.” || 84 ||
श्लोक ( Shlok ) 85
परिब्राजकदीक्षायामासक्ति पुनरादधत् । सप्ताब्ध्युपमितायुष्को माहेन्द्रे समभून्मरुत् ॥ ८५ ॥
उसने फिर भी परिव्राजक मतकी दीक्षामें आसक्ति धारण की और मरकर माहेन्द्र स्वर्गमें सात सागरकी आयुवाला देव हुआ ।॥ ८५ ॥
“Nonetheless, he retained his attachment to the initiation of the wandering ascetic (Parivrajaka) sect, and upon passing away, he was reborn as a deity in the Mahendra heaven with a lifespan of seven sagaropamas.” || 85 ||
श्लोक ( Shlok ) 86 – 88
ततोऽवतीर्य देशेऽस्मिन् मगधाख्ये पुरोत्तमे । जातो राजगृहे विश्वभूतिनाममहीपतेः ॥ ८६ ॥जैन्याश्च तनयो विश्वनन्दी विख्यातपौरुषः । विश्वभूतिमहीभर्तुरनुजातो महोदयः ॥ ८७ ॥विशाखभूतिरेतस्य लक्ष्मणायामभूद्विधीः । पुत्रो विशाखनन्दाख्यस्ते सर्वे सुखमास्थिता ॥ ८८ ॥
वहांसे च्युत होकर वह इसी मगध देशके राजगृह नामक उत्तम नगर में विश्वभूति राजाकी जैनी नामकी स्त्रीसे प्रसिद्ध पराक्रमका धारी विश्वनन्दी नामका पुत्र हुआ। इसी राजा विश्वभूतिका विशाखभूति नामका एक छोटा भाई था जो कि बहुत ही वैभवशाली था। उसकी लक्ष्मणा नामकी स्त्रीसे विशाखनन्द नामका मूर्ख पुत्र उत्पन्न हुआ था। ये सब लोग सुखसे निवास करते थे ॥ ८६-८८ ॥
“Descending from that celestial realm, he was born in this very country of Magadha, in the prominent city of Rajagriha, as a son named Vishwanandi—possessing renowned prowess—to King Vishvabhuti and his queen, Jaini. This same King Vishvabhuti had a younger brother named Vishakhabhuti, who was extremely wealthy. To his wife, Lakshmana, a foolish son named Vishakhananda was born. All these people lived there in great comfort and happiness.” || 86-88 ||
श्लोक ( Shlok ) 89 – 91
अन्येद्युः शरदभ्रस्य विभ्रशं वीक्ष्य शुत्रधीः । निविण्णो विश्वभूत्याख्यः स्वराज्यमनुजन्मनि ॥ ८९ ॥विधाय यौवराज्यञ्च स्वसूनौ महदग्रणीः । सात्त्विकैस्त्रिशतैः सार्द्ध राजभिर्जातरूपताम् ॥ ९० ॥श्रीधराख्यगुरोः पार्श्वे समादाय समत्वभाक् । बाह्यमाभ्यन्तरञ्चोग्रमकरोत्स तपश्चिरम् ॥ ९१ ॥
किसी दूसरे दिन शुद्ध बुद्धिको धारण करनेवाला राजा विश्वभूति, शरऋतुके मेघका नाश देखकर विरक्त हो गया। महापुरुषोंमें आगे रहनेवाले उस राजाने अपना राज्य तो छोटे भाईके लिए दिया और युवराज पद अपने पुत्र के लिए प्रदान किया । तदनन्तर उसने सात्त्विक वृत्तिको धारण करनेवाले तीन सौ राजाओंके साथ श्रीधर नामक गुरुके समीप दिगम्बर दीक्षा धारण कर ली और समता भावसे युक्त हो चिरकाल तक बाह्य और आभ्यन्तर दोनों प्रकारके कठिन तप किये ।। ८९-९१ ॥
“On another day, King Vishvabhuti, possessing pure intellect, became detached from worldly life upon witnessing the dissolution of autumn clouds. Foremost among great men, the king bestowed his kingdom upon his younger brother and granted the position of crown prince (yuvaraja) to his own son. Thereafter, along with three hundred kings of pure and virtuous disposition, he accepted the Digambara initiation (monkhood) in the presence of the preceptor Shridhara. Adorned with the spirit of equanimity, he practiced rigorous external and internal penances for a long time.” || 89-91 ||
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अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22
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