मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 72- shlok 35 to 46
श्लोक ( Shlok ) 35 – 37
सम्पूर्णयौवना यान्ती सा स्वयंवरमण्डपम् । यक्षेण बोधिता दीक्षामित्वाप्य प्रियदर्शनाम् ॥ ३५ ॥जीवितान्तेऽभवद्देवी मणिचूलेति रूपिणी । सौधर्माधिपतेः पूर्णभद्रस्तदनुजोऽपि च ॥ ३६ ॥सप्तस्थानगतौ ख्यातश्रावकौ तौ दृढव्रतो । प्रान्ते सामानिकौ देवौ जातौ सौधर्मनामनि ॥ ३७ ॥
जब वह पूर्ण यौवनवती होकर स्वयंवर-मण्डपकी ओर जा रही थी तब उसके पूर्वजन्मके पति कुवेर नामक यक्षने उसे समझाया जिससे उसने प्रियदर्शना नामकी आर्यिकाके पास जाकर दीक्षा धारण कर ली और आयुके अन्तमें वह सौधर्म इन्द्रकी मणिचूला नामकी रूपवती देवी हुई । इधर पूर्णभद्र और उसके छोटे भाई मणिभद्रने बड़ी दृढ़तासे श्रावकके व्रत पालन किये, सात क्षेत्रोमें धन खर्च किया और आयुके अन्त में दोनों ही सौधर्म नामक स्वर्गमें सामानिक जातिके देव हुए ॥ ३५-३७ ॥
When she reached full youth and was proceeding towards the Swayamvara pavilion, her husband from a previous birth—a Yaksha named Kubera—admonished and guided her. As a result, she approached an Aryika (Jain nun) named Priyadarshana and took initiation (Diksha) into ascetic life. At the end of her life, she was reborn in the Saudharma heaven as a beautiful goddess named Manichula, the consort of Indra.
Meanwhile, Purnabhadra and his younger brother, Manibhadra, strictly and firmly observed the vows of a Shravaka (householder), channeled their wealth into the Sat Kshetra (the seven holy fields of charity), and at the end of their lives, both were reborn as Samanika (equal-status) deities in the heaven known as Saudharma. ॥ 35-37 ॥
श्लोक ( Shlok ) 38 – 46
द्विसागरोपमातीतौ द्वीपेऽत्र कुरुजाङ्गले । हास्तिनाख्यपुराधीशस्याईद्दासमहीपतेः ॥ ३८ ॥काश्यपायाश्च पुत्रौ नौ मधुक्रीडवनामकौ । समभूतां तयो राजा राजत्वयुवराजते ॥ ३९ ॥विधाय विमलां प्रापद्विमलप्रभशिष्यताम् । कण्ठान्तामलकाख्यस्य पुरस्येशः कदाचन ॥ ४० ॥रथान्तकनकस्य स्वं समायातस्य सेवितम् । कान्तां कनकमालाख्यां समीक्ष्य मदनातुरः ॥ ४१ ॥स्वीचकारमधुः शोकाद्रथान्तकनकाह्वयः । पार्श्वे ‘द्विजटिसञ्ज्ञस्य तापसव्रतमाददे ॥ ४२ ॥मधुक्रीडवयोरेवं काले गच्छत्यथान्यदा । सम्यगाकर्ण्य सद्धर्म मधुर्विमलवाहनात् ॥ ४३ ॥गर्हणं स्वदुराचारे कृत्वा क्रीडवसंयुतः । संयमं समवाप्यान्ते संश्रित्याराधनाविधिम् ॥ ४४ ॥अन्वभूत्स महाशुक्रस्याधिपत्यं सहानुजः । स्वायुरन्ते ततश्च्युत्वा स्वावशेषशुभोदयात् ॥ ४५ ॥सुस्वप्नपूर्वकं ज्येष्ठो रुक्मिण्यामभवत्सुतः । दुराचारार्जितं पापं सच्चरित्रेण नश्यति ॥ ४६ ॥
वहाँ उनकी दो सागरकी आयु थी, उसके पूर्ण होने पर वे इसी जम्बूद्वीपके कुरुजांगल देश सम्बन्धी हस्तिनापुर नगरके राजा अर्हद्दा सकी काश्यपा नामकी रानीसे मधु और क्रीडवनामके पुत्र हुए। किसी एकदिन राजा अईद्दासने मधुको राज्य और क्रीडवको युवराज पद देकर विमलप्रभ मुनिकी निर्दोष शिष्यता प्राप्त कर ली अर्थात् उनके पास दीक्षा धारण कर ली। किसी समय अमलकण्ठ नगरका राजा कनकरथ (हेमरथ) राजा मधुकी सेवा करनेके लिए उसके नगर आया था वहाँ उसकी कनकमाला नामकी स्त्रीको देखकर राजा मधु कामसे पीड़ित हो गया। निदान उसने कनक्रमालाको स्वीकृत कर लिया – अपनी स्त्री बना लिया । इस घटनासे राजा कनकरथको बहुत निर्वेद हुआ जिससे उसने द्विजटि नामक तापसके पास व्रत ले लिये । इधर मधु और क्रीडव का काल सुखने व्यतीत हो रहा था। किसी एक दिन मधुने विमल-वाहन नामक मुनिराजसे अच्छी तरह धर्मका स्वरूप सुना, अपने दुराचारकी निन्दा की और क्रीडवके साथ-साथ संयम धारण कर लिया। आयुके अन्त में विधिपूर्वक आराधना कर मधु और क्रीडव दोनों ही महाशुक्र स्वर्गमें इन्द्र हुए। आयुके अन्त में वहाँसे च्युत होकर बड़ा भाई मधुकाजीव अपने अवशिष्ट पुण्य कर्मके उदय से शुभ स्वप्न पूर्वक रुक्मिणीके पुत्र उत्पन्न हुआ है सो ठीक ही है क्योंकि दुराचार के द्वारा कमाया हुआ पाप सम्यक् चारित्रके द्वारा नष्ट हो ही जाता है ॥ ३८-४६।।
There, their lifespan was two Sagaras (cosmic time periods). Upon its completion, they were reborn in this Jambudvipa, in the city of Hastinapur belonging to the Kurujangala country, as sons named Madhu and Kridava, born to Queen Kashyapa, the consort of King Arhaddasa. One day, King Arhaddasa handed over the kingdom to Madhu, bestowed the position of crown prince upon Kridava, and attained the faultless discipleship of Sage Vimalaprabha—meaning he accepted initiation (Diksha) under him.
At one time, Kanakaratha (Hemaratha), the king of Amalakantha city, came to Madhu’s city to pay his respects and serve him. There, upon seeing Kanakaratha’s wife named Kanakamala, King Madhu became afflicted with lust. Consequently, he accepted Kanakamala and made her his own wife. King Kanakaratha was filled with deep detachment (Nirveda) because of this incident, due to which he took vows under an ascetic named Dvijati.
Meanwhile, Madhu and Kridava spent their time in happiness. One day, Madhu listened intently to the true nature of Dharma from a great sage named Vimalavahana, condemned his own past misconduct, and along with Kridava, embraced self-restraint (Sanyama). At the end of their lives, after performing proper and ritualistic adoration (Aradhana), both Madhu and Kridava were reborn as Indras in the Mahashukra heaven. At the end of that lifespan, falling from heaven, the soul of the elder brother Madhu, due to the rise of his remaining meritorious karma (Punya), was conceived and born as the son of Rukmini following auspicious dreams. This is truly fitting, because the sins accumulated through misconduct are indeed destroyed by right conduct (Samyak Charitra). ॥ 38-46 ॥
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462
नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त नामक सकल चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 22 | श्लोक 23 से 34
Download PDF
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 |पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 | उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 | पर्व 54 |पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58 | पर्व 59 | पर्व 60 | पर्व 61 | पर्व 62 | पर्व 63 | पर्व 64 | पर्व 65 |
पर्व 1पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 |पर्व 11 |पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 |पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 |पर्व 54 | पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58 | पर्व 59 | पर्व 60 | पर्व 61 | पर्व 62 | पर्व 63 | पर्व 64 | पर्व 65 |