भरत के रत्न
भरत के चूड़ामणि चिन्तामणि और चिन्ताजननी काकिणी रत्न उनकी शोभा बढ़ाते हैं। अयोध्य सेनापति, बुद्धिसागर पुरोहित, कामवृष्टि गृहपति, और भद्रमुख शिलावट उनके सजीव रत्न हैं। विजयपर्वत हाथी, पवनंजय घोड़ा, और सुभद्रा स्त्री-रत्न उनके वैभव का हिस्सा हैं। ये दिव्य रत्न देवों द्वारा संरक्षित और शत्रुओं से अजेय हैं।
आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 37 – Shlok 172 to 181
श्लोक ( Shlok ) 172
मणिश्चूडामणिनमि चिन्तारत्नमनुत्तरम् । जगच्चूडामणेरस्य चित्तं येनानुरञ्जितम् ॥१७२॥
उनके चूड़ामणि नामका वह उत्तम चिन्तामणि रत्न था जिसने कि जगत्के चूड़ामणि-स्वरूप महाराज भरतका चित्त अनुरक्त कर लिया था ।।। १७२॥
He possessed the supreme wish-fulfilling gem named Cūḍāmaṇi,
so resplendent in its glory,that it captivated the very heart of King Bharata—the crown jewel of the world himself.172
श्लोक ( Shlok ) 173
सा चिन्ताजननीत्यस्य काकिणी भास्वराऽभवत् । या रूप्याद्रिगुहाध्वान्तविनिर्भेदैकदीपिका ॥१७३।।
चिन्ताजननी नामकी वह काकिणी थी जो कि अत्यन्त देदीप्यमान हो रही थी और जो विजयार्थ पर्वतकी गुफाओंका अन्धकार दूर करनेके लिये मुख्य दीपिकाके समान थी ।। १७३।।
There was the luminous Kākiṇī named Chintājananī,radiating brilliant light—like a principal lamp,dispersing the darkness within the caves of Mount Vijayārtha.173
श्लोक ( Shlok ) 174
चमूपतिरयोध्याख्यो नृरत्नमभवत् प्रभोः । समरेऽरिजयाद्यस्य रोदसी व्यानशे यशः ॥१७४।॥
उन प्रभुके अयोध्य नामका सेनापति था जो कि मनुष्यों में रत्न था और युद्धमें शत्रुओंको जीतनेसे जिसका यश आकाश और पृथिवी-के बीच व्याप्त हो गया था ।।१७४।।
The sovereign’s commander was Ayodhya by name,a gem among men—whose glory, earned through victories over foes in battle,spread across the vast expanse between earth and sky.174
श्लोक ( Shlok ) 175
बुद्धिसागरनामास्य पुरोधाः पुरुधीरभूत् । धर्म्या क्रिया यदायत्ता प्रतीकारोऽपि दैविके ॥१७५॥
समस्त धार्मिक क्रियाएं जिसके आधीन थीं और दैविक उपद्रव होनेपर उनका प्रतिकार करना भी जिसके आश्रित था ऐसा बुद्धिसागर नामका महा-बुद्धिमान् पुरोहित था ।।१७५।।
There was the illustrious priest named Buddhisāgara,a sage of profound wisdom—to whom all sacred rites were entrusted,
and upon whom rested the charge of dispelling celestial afflictions through divine counsel.175
श्लोक ( Shlok ) 176
सुधीर्गृहपतिर्नाम्ना कामवृष्टिरभीष्टदः । व्ययोपव्ययचिन्तायां नियुक्तो यो निधीशिनः ॥१७६॥
उनके कामवृष्टि नामका गृहपति रत्न था, जो कि अत्यन्त बुद्धिमान् था, इच्छानुसार सामग्री देनेवाला था तथा जो चक्रवर्तीके छोटे बड़े सभी खर्चोंकी चिन्तामें नियुक्त था । ।। १७६।।
He possessed the householder-jewel named Kāmavṛṣṭi,a man of exceptional wisdom,who provided all resources as desired,and was ever devoted to managing the Emperor’s every expense—great or small—with utmost care.176
श्लोक ( Shlok ) 177
रत्नं स्थपतिरप्यस्य वास्तु विद्यापदात्तधीः । नाम्ना भद्रमुखोऽनेकप्रासादघटने पटुः ॥१७७।।
मकान बनानेकी विद्यामें जिसकी बुद्धि प्रवेश पाये हुई है और जो अनेक राजभवनों के बनाने में चतुर है ऐसा भद्रमुख नामका उनका शिलावटरत्न (इंजीनियर) था ।।१७७।।
He was the master builder named Bhadramukha,whose intellect was well-versed in the art of construction,skilled in erecting numerous royal palaces with ingenious craft and design.177
श्लोक ( Shlok ) 178
शैलोदग्रो महानस्य या गहस्तीक्षरन्मदः। भद्रो गिरिचरः शुभ्रो नाम्ना विजयपर्वतः ॥१७८॥
जो पर्वतके समान ऊंचा था, बहुत बड़ा था, पूज्य था, जिससे मद झर रहा था, भद्र जातिका था और जिसका गर्जन उत्तम था ऐसा विजयपर्वत नामका सफेद हाथी था ।।१७८।।
There stood the mighty white elephant named Vijayaparvata,towering like a mountain, vast and venerable—exuding a regal majesty,of noble lineage,whose roar resounded with commanding grace. 178
श्लोक ( Shlok ) 179
पवनस्य जयन् वेगं हयोऽस्य पवनञ्जयः । विजयार्द्धगु होत्सङ्गं हेलया यो व्यलङ्घयत् ॥१७९॥
जिसने विजयार्थपर्वतकी गुफा के मध्यभागको लीलामात्रमें उल्लंघन कर दिया था ऐसा वायुके वेगको जीतनेवाला पवनंजय नामका घोड़ा था ।। १७९।।
He was the steed named Pavanañjaya,whose swift speed rivaled the winds themselves—so mighty that he cleaved through the heart of Vijayārthaparvata’s cavern in a single bound.179
श्लोक ( Shlok ) 180
प्रागुक्तवर्णनं चास्य स्त्रीरत्नं रूढनामकम् । स्वभावमधुरं हृद्यं रसायनमिवापरम् ॥१८०॥
और जिसका वर्णन पहले कर चुके हैं, जिसका नाम अत्यन्त प्रसिद्ध है, जो स्वभावसे ही मधुर है और जो किसी अन्य रसायनके समान हृदयको आनन्द देनेवाला है ऐसा सुभद्रा नामका स्त्रीरत्न था ।।१८०।।
As previously described, renowned far and wide,by nature gentle and sweet,and surpassing all other elixirs in delight—she was the precious gem among women named Subhadrā. 180
श्लोक ( Shlok ) 181
रत्नान्येतानि दिव्यानि बभूवुश्चक्रवर्तिनः । देवताकृतरक्षाणि यान्यलङ्घयानि विद्विषाम् ॥१८१॥
इस प्रकार चक्रवर्तीके ये दिव्य रत्न थे जिनकी देव लोग रक्षा किया करते थे, और जिन्हें शत्रु कभी उल्लंघन नहीं कर सकते थे ॥ १८१॥
Thus were the divine jewels of the Emperor,guarded by the celestial beings themselves,and never to be violated by any foe.181
श्लोक 182 से 190
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249
आदिपुराण पर्व 36 – बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 212
आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171
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