आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 212 से 223 | श्लोक 224 से 231 | श्लोक 232 से 240 | श्लोक 241 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271
श्लोक 272 से 281 निष्क्रान्ति क्रिया (जारी)
निष्क्रान्ति क्रिया में भगवान पुत्र को बुद्धि, कुलमर्यादा, और आत्मरक्षा की शिक्षा देते हैं। राजा को पक्षपातरहित होकर प्रजा को समान दृष्टि से देखना चाहिए। क्रूरता, कठोर वचन, और दंड की कठिनता से बचना चाहिए। काम, क्रोध आदि छह शत्रुओं को जीतकर राजा दोनों लोकों में समृद्धि पाता है। यह क्षात्रधर्म यश, धर्म, और विजय देता है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 38- Shlok 272 to 281
श्लोक ( Shlok ) 272
ततः कृतेन्द्रियजयो वृद्धसंयोगसम्पदा । धर्मार्थ शास्त्रविज्ञानात् प्रज्ञां सँस्कर्तुमर्हसि ॥ २७२।।
इसलिये वृद्ध मनुष्योंकी संगति रूपी सम्पदासे इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त कर तुम धर्मशास्त्र और अर्थशास्त्र के ज्ञानसे अपनी बुद्धिको सुसंस्कृत बनाने के योग्य हो अर्थात् बुद्धिके अच्छे संस्कार बनाओ ।।२७२।।
Therefore, by the noble wealth of companionship with the wise and the aged, conquer the restless senses, and through the knowledge of Dharma and Artha, refine and ennoble your intellect—cultivate within it the highest impressions of virtue and wisdom.272
श्लोक ( Shlok ) 273
अन्यथा विमतिर्भूपो युक्तायुक्तानभिज्ञकः । अन्यथाऽन्यै प्रणेयः स्यान्मिथ्याज्ञानलवोद्धतैः ॥२७३॥
यदि राजा इससे विपरीत प्रवृत्ति करेगा तो वह हित तथा अहितका जानकार न होने से बुद्धिभ्रष्ट हो जावेगा और ऐसी दशामें वह मिथ्याज्ञानके अंश मात्रसे उद्धत हुए अन्य कुमार्गगामियोंके वश हो जावेगा ।। २७३।।
If the king should act contrary to this, then, lacking discernment between right and wrong, he shall fall into delusion and lose the clarity of his intellect. In such a state, swayed by but a fragment of false knowledge, he will come under the sway of others who tread the path of error and unrighteousness. 273
श्लोक ( Shlok ) 274
कुलानुपालने चायं महान्तं यत्नमाचरेत् । अज्ञातकुलधर्मो हि दुर्वृ त्तैर्दूषयेत् कुलम् ॥ २७४।।
राजाओंको अपने कुलकी मर्यादा पालन करने के लिये बहुत भारी प्रयत्न करना चाहिये क्योंकि जिसे अपनी कुलमर्यादाका ज्ञान नहीं है वह अपने दुराचारोंसे कुलको दूषित कर सकता है ।। २७४।।
Kings must exert utmost effort to uphold the honor and dignity of their lineage; for one who is ignorant of the noble traditions of his house may, through his unrighteous conduct, bring disgrace upon his entire lineage.274
श्लोक ( Shlok ) 275
तथायमात्मरक्षायां सदा यत्नपरो भवेत् । रक्षितं हि भवेत् सर्व नवेणात्मनि रक्षिते ॥ २७५॥
इसके सिवाय राजाको अपनी रक्षा करने में भी सदा यत्न करते रहना चाहिये क्योंकि अपने आपके सुरक्षित रहनेपर ही अन्य सब कुछ सुरक्षित रह सकता है ॥ २७५॥
Moreover, the king must ever remain vigilant in safeguarding his own person; for only when he himself is secure can all else—his realm, his duties, and his people—remain protected and preserved.275
श्लोक ( Shlok ) 276
अपायो हि सपत्नेभ्यो नृपस्यारक्षितात्मनः । आत्मानुजीविवर्गाच्च क्रुद्धलुब्धविमानितात् ॥२७६॥
जिसने अपने आपकी रक्षा नहीं की है ऐसे राजाका शत्रुओंसे तथा क्रोधी, लोभी और अपमानित हुए अपने ही सेवकोंसे विनाश हो जाता है ॥२७६॥
A king who fails to safeguard his own person meets his downfall—whether at the hands of enemies, or through his own servants who, being wrathful, greedy, or disgraced, turn against him in treachery.276
श्लोक ( Shlok ) 277
“तस्माद् रसदतीक्ष्णादीनपायानरियोजितान् । परिहृत्य निजैरिष्टै स्वं प्रयत्नेन पालयेत् ॥ २७७॥
इसलिये शत्रुओंके ‘द्वारा किये हुए प्रारम्भमें सरल किन्तु फलकालमें कठिन अपायोंका परिहार कर अपने इष्ट वर्गों के द्वारा प्रयत्नपूर्वक अपनी रक्षा करनी चाहिये ।। २७७।।
Therefore, the king must diligently guard himself through the loyal efforts of his trusted allies, wisely avoiding those subtle schemes of enemies which appear harmless at first, yet yield grievous consequences in the end.277
श्लोक ( Shlok ) 278
स्यात् समञ्जसवृत्तित्वमप्यस्यात्माभिरक्षणे। असमञ्जसवृत्तौ हि निजैरप्यभिभूयते ॥ २७८।।
इसके सिवाय राजाको अपनी तथा प्रजाकी रक्षा करनेमें समंजसवृत्ति अर्थात् पक्षपातरहित होना चाहिये क्योंकि जो राजा असमंजसवृत्ति होता है, वह अपने ही लोगोंके द्वारा अपमानित होने लगता है ।।२७८।।
Moreover, in safeguarding both himself and his subjects, the king must act with impartiality and balanced judgment; for a ruler swayed by favoritism invites contempt and dishonor even from his own people.278
श्लोक ( Shlok ) 279
समञ्जसत्वमस्येष्टं प्रजास्वविषमेक्षिता’ । आनृशंस्यमवाग्दण्डपारुष्यादिविशेषितम् ॥२७९।।
समस्त प्रजाको समान रूपसे देखना अर्थात किसीके साथ पक्षपात नहीं करना ही राजाका समंजसत्व गुण कहलाता है। उस समंजसत्व गुणमें क्रूरता या घातकपना नहीं होना चाहिये और न कठोर वचन तथा दण्डकी कठिनता ही होनी चाहिये ।। २७९।।
To regard all subjects with equal vision, showing favor to none—this is the true virtue of impartiality in a king. In the exercise of this noble trait, there must be no cruelty, no malice, nor harshness of speech, nor severity in punishment.279
श्लोक ( Shlok ) 280
ततो जितारिषड्वर्गः स्वां वृत्ति पालयन्निमाम् । स्वराज्ये सुस्थितो राजा प्रेत्य चेह च नन्दति ॥ २८०॥
इस प्रकार जो राजा काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य इन छह अन्तरङ्ग शत्रुओंको जीतकर अपनी इस वृत्तिका पालन करता हुआ स्वकीय राज्यमें स्थिर रहता है वह इस लोक तथा परलोक दोनों ही लोकोंमें समृद्धिवान् होता है ।। २८०।।
Thus, the king who, having conquered the six inner foes—desire, anger, greed, delusion, pride, and envy—steadfastly upholds this righteous conduct and remains firmly established in his realm, attains prosperity in both this world and the world beyond. 280
श्लोक ( Shlok ) 281
समं समञ्जसत्वेन कुलमत्यात्मपालनम् । प्रजानुपालनं चेति प्रोक्ता वृत्तिर्महीक्षिताम् ॥२८१॥
पक्षपातरहित होकर सबको एक समान देखना, कुलकी मर्यादाकी रक्षा करना, बुद्धिकी रक्षा करना, अपनी रक्षा करना और प्रजाका पालन करना यह सब राजाओंकी वृत्ति कहलाती है ॥ २८१।।
To behold all with an equal eye, free from partiality; to uphold the honor of one’s lineage; to safeguard the integrity of the intellect; to protect oneself; and to nurture and preserve the people—these, indeed, are the noble duties that constitute the true conduct of kings.281
श्लोक 282 से 293
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212
आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 201 | श्लोक 202 से 205
आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223 | श्लोक 224 से 231 | श्लोक 232 से 240 | श्लोक 241 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271
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