श्रीअमृतचन्द्राचार्य विरचित पुरुषार्थ सिद्धयुपाय – गाथा 3 मङ्गला संस्कृल टीका एवं दोहानुवाद * मुनि श्री प्रणम्यसागर जी
लोकत्रयैकनेत्रं निरूप्य परमागमं प्रयत्नेन ।
अस्माभिरुपोद्ध्रियते विदुषां पुरुषार्थसिद्ध्युपायोऽयम् ॥3॥
उत्थानिका – अब अमृतचन्द्राचार्य परमागम के स्वरूप का प्ररूपण करके अपने अभिप्राय को प्रकट करते हैं
अन्वय – लोकत्रयैकनेत्रं परमागमं प्रयत्नेन निरूप्य अस्माभिः विदुषां अयं पुरुषार्थसिद्धयुपायः उपोद्भियते । अन्वयार्थ – (लोकत्रयैकनेत्रं) तीन लोक सम्बन्धी पदार्थों को प्रकाशित करने के लिए अद्वितीय नेत्र स्वरूप (परमागमं) उत्कृष्ट जैनागम का (प्रयलेन) प्रयत्नपूर्वक (निरूप्य) निर्णय करके (अस्माभिः) हमारे द्वारा अमृतचन्द्राचार्य के द्वारा (विदुषा) विद्वानों के लिए (अयं) यह (पुरुषार्थसिद्धयुपायः) पुरुषार्थसिद्धयुपाय ग्रन्थ (उपोद्भियते) प्रकट किया जाता है अर्थात् उपस्थित किया जाता है।
तीन लोक दिखता जहाँ, परमागम वह ज्ञान। पुरुष अर्थ की सिद्धि का, करता सुनो बखान ॥३॥
टीकार्थ – परमागम का स्वरूप कहा जा चुका है। तीनों लोकों के यथार्थ स्वरूप को देखने- जानने के लिए परमागम को एक अद्वितीय नेत्र कहा है, इसलिए उस परमागम का विवेकपूर्वक निर्णय करके मैं इस ग्रन्थ की रचना करूँगा। इस कथन से अमृतचन्द्राचार्य की प्रामाणिकता सिद्ध होती है। पुरुष कौन है ? उसका प्रयोजन क्या है ? और उस प्रयोजन की सिद्धि का उपाय क्या है ? आचार्य महाराज स्वयं इन सबका आगे विस्तार से वर्णन करेंगे।
यह ग्रन्थ विद्वानों के लिए है, व्यवहार और निश्चय से अनभिज्ञ लोगों के लिए नहीं है।
शंका – यह ग्रन्थ विद्वानों के लिए है तो जो पहले से ही विद्वान् हैं उनके लिए उपदेश की क्या आवश्यकता है, यदि अज्ञानी पुरुष ज्ञानी होते तो यह उपदेश कार्यकारी है अन्यथा व्यर्थ है ?
समाधान – उपदेश तो सब जीवों का उपकार करने के लिए होता है तो भी हिताहित का विचार करने में कुशल विद्वानों को ही इसका लाभ होता है। क्योंकि उपदेशक तो निमित्त मात्र होते हैं। दूसरी बात यह भी है कि इस ग्रन्थ में प्रत्येक व्रत का स्वरूप और नयों का परिज्ञान आदि युक्ति के द्वारा कहा गया है और युक्ति बुद्धिमानों के लिए उपयोगी हुआ करती है। इसलिए कहा भी है कि “गुरु आदि के उपदेश से अज्ञानी ज्ञान दशा को प्राप्त नहीं होता और ज्ञानी अज्ञानता को प्राप्त नहीं होता। अन्य (अध्यापक, गुरु आदि) तो ज्ञानप्राप्ति में निमित्त मात्र हैं, जैसे जीव और पुद्गलों को चलने में धर्मास्तिकाय उदासीन निमित्त है।” इस प्रकार प्रतिज्ञा रूप आर्याछन्द पूर्ण हुआ॥३॥
English Translation of Purushartha Siddhi Upay Tika Gatha 3
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