अध्यात्म योग
आचार्य पूज्यपादस्वामी द्वारा विरचित इष्टोपदेश पर मुनि श्री प्रणम्यसागरजी के प्रवचनों का संग्रह, अतिशयक्षेत्र बिजोलियाजी, 2016
यस्य स्वयं स्वभावाप्तिरभावे कृत्स्नकर्मणः। तस्मै सञ्ज्ञानरूपाय नमोऽस्तु परमात्मने ॥1॥
yasya svayaṃ svabhāvāptirabhāve kṛtsnakarmaṇaḥ |
tasmai sañjñānarūpāya namo’stu paramātmane || 1 ||
English Translation of Adhyatm Yog ( Ishtopdesh ) Chapter 1
यस्य यानि जिन को, जिन किसी को इस सर्वनाम के द्वारा आचार्य देव का अभिप्राय यह प्रकट होता है कि वह हर उस आत्मा को नमस्कार करते हैं, हर उस आत्मा तक अपनी बात व अपने नमस्कार की ध्वनि को पहुँचा देते हैं जिस आत्मा ने ऐसा कर लिया हो, जो इसमें लिखा है। ‘स्वयं स्वभावाप्ति’ यानि जिस आत्मा ने स्वयं ही स्वभाव की प्राप्ति कर ली हो। अपने स्वभाव की प्राप्ति कभी पर के द्वारा नहीं होती, स्वयं के द्वारा ही होती है। यह एक-एक शब्द बहुत गहराई तक हमको प्रेरित करता है। ‘स्वयं’ यानि स्वयं ही ‘स्वभावाप्ति’ यानि स्वभाव की प्राप्ति की है। इससे कोई मतलब नहीं कि वह आत्मा जैन है, ब्राह्मण है, अजैन है, क्षत्रिय है, उस आत्मा का नाम क्या है? इससे भी कोई मतलब नहीं कि वह महावीर भगवान की आत्मा है, आदिनाथ भगवान की आत्मा है, पारसनाथ भगवान की आत्मा है, जो कोई भी हो ‘यस्य’ बहुत बड़ा शब्द है चाहे उनको तुम ब्रह्मा कहो, चाहे शिव कहो, चाहे महेश्वर कहो, चाहे विष्णु कहो, चाहे जिन कहो, चाहे हरि-हर कहो सब मान्य है। इतनी व्यापकता इस जैन दर्शन की है कि अगर आप समझोगे तो आपका हृदय भी व्यापक हो जायेगा क्योंकि जब तक हमारी बुद्धि संकीर्ण रहती है तब तक हमारा हृदय भी संकीर्ण बना रहता है। बुद्धि के अन्दर व्यापकता आती है तो वह विचार के माध्यम से आती है, ज्ञान के माध्यम से आती है और वह ज्ञान हमें इन आचार्यों के द्वारा प्राप्त होता है जो कहते हैं कि हम हर किसी आत्मा को नमस्कार करने के लिए तैयार हैं।
आप इस ग्रंथ को पढ़ने बैठोगे तो कहोगे कि यह कैसे आचार्य हैं? जो हर किसी को नमस्कार करने के लिए तैयार है। शायद कहना चाहिए कि हम वर्द्धमान महावीर स्वामी को नमस्कार कर रहे हैं, हम पहले तीर्थंकर ऋषभदेव और पारसनाथ को नमस्कार कर रहे हैं लेकिन आचार्य भगवंत कह रहे हैं कि हम सभी को नमस्कार कर रहे हैं तो वो सब कैसे होने चाहिए? इसकी एक शर्त है, तुम उसका नाम कुछ भी दे दो चाहे पारसनाथ, हरि, हर, ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर हमें फर्क नहीं पड़ता है, हम तो ब्रह्मा, विष्णु को भी नमस्कार करेंगे लेकिन ‘स्वयं स्वभावाप्ति’ उन्हें अपने स्वभाव की प्राप्ति हो गई हो। बस इतनी सी शर्त है। आचार्य उस वीतरागता को नमस्कार करते हैं उस आत्मा को नमस्कार करते हैं जिसने स्वभाव की प्राप्ति कर ली हो, और जब स्वभाव की प्राप्ति की है तो इसी शब्द से स्पष्ट हो जाता है कि वह स्वभाव पहले से हमें प्राप्त नहीं है। हमें उसको प्राप्त करना है क्योंकि अगर वो पहले से प्राप्त होगा तो सबको ही प्राप्त होगा।
फिर तो हमको भी प्राप्त है, तुमको भी प्राप्त है, फिर हम किसको नमस्कार करेंगे? हमारे अन्दर भी वही है तुम्हारे अन्दर भी वही है, जब हममें और आपमें कुछ difference (अन्तर) होगा, तब ही हम आपको नमस्कार करेंगे। हम किस को नमस्कार करेंगे? तो आचार्य कहते हैं जिसने अपने स्वभाव की प्राप्ति कर ली हो। वह स्वभाव पहले से विद्यमान नहीं होता है, उसे प्राप्त किया जाता है। हमें कोई ऐसा अनावरण नहीं करना है कि जैसे आपने फोटो के सामने कपड़ा डाल रखा हो और उस कपड़े को हटा दिया, उस पर से आवरण हट गया और फोटो सामने आ गया। उसकी प्राप्ति का ढंग कुछ अलग है क्योंकि प्राप्त करने वाली चीज के लिए हमें कुछ मेहनत करनी पड़ती है। जो चीज ढकी हुई है उसको हटाने के लिए हमें कुछ मेहनत नहीं करनी पड़ती, उसके लिए तो हमें केवल रस्सी खिसकानी है या कपड़ा खिसका देना है। लेकिन स्वभाव इस तरह से प्राप्त नहीं होता है। आचार्य कहते हैं कि वह स्वभाव जिसके अन्दर पड़ा हुआ है और उस स्वभाव को जिसने अपने अन्दर ही प्राप्त किया है, उस स्वभाव की प्राप्ति उसने किसी दूसरे तरीके से नहीं की है, स्वयं से की है। स्वभाव की प्राप्ति करने के लिए ‘पर’ की भी कोई आवश्यकता नहीं है। उसके लिए पर का अवलम्बन लेने की भी कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि जो चीज स्वयं से प्राप्त होगी तो स्वयं में ही किसी कमी के कारण से हमको प्राप्त नहीं हुई, उस कमी को जब हम दूर कर देंगे तो वह स्वयं में से ही उभरेगी, स्वयं से ही प्राप्त होगी। अगर आप कहो कि किसी पत्थर/पाषाण के अन्दर से प्रतिमा को उकेरा जाता है तो वह उकेरने वाला क्या करता है? उसको कहीं बाहर से निकालता है या उसी पाषाण से निकालता है। कभी हम किसी पाषाण से प्रतिमा बनती हुई देखें तो हमें पता पड़ेगा कि उस पाषाण में से प्रतिमा स्वयं से बन रही हैं या कोई और चीज को लाकर उसमें रखी जाये तब बन रही है।
अगर हम उस पाषाण को प्रतिमा में ढलते हुए देखें तो पता चलेगा कि उस पाषाण में से प्रतिमा बनती चली जा रही है, पाषाण स्वयं ही प्रतिमा के रूप में बनता चला जा रहा है। इसके लिए उसमें किसी बाहरी चीज को मिलाने की आवश्यकता नहीं है, जो कुछ है वो सब उसी में है बस उसको उसमें से निकालने की आवश्यकता है। कुछ ऐसा जो उस प्रतिमा को घुमाये हुए है, पाषाण में प्रतिमा छिपी हुई है उस प्रतिमा को आप नहीं देख पाओगे उसे वो कारीगर देख लेगा। जिसे प्रतिमा बनाना आता है या जो प्रतिमा की जानकारी रखता है वह कारीगर उस पाषाण को देखते ही समझ लेता है कि कहाँ पर इसको कैसा अक्ष देना है, इसके लिए कहाँ पर नाक नक्श बनाना है और वह उस पाषाण को देखकर अपने अन्दर पहले ही प्रतिमा बना लेता है। पहले उसकी प्रतिमा कहाँ बन जाती है? अपने अन्दर बन जाती है। हम कहते हैं कि ऐसी पद्मासन या खड्गासन प्रतिमा बनाना है और वह कह देता है आप निश्चिंत रहें जैसा आप चाह रहे हैं वैसी प्रतिमा बनाकर दे देंगे क्योंकि उसकी छवि हमारे अन्दर उतर गयी है। सबसे पहले प्रतिमा अपने अन्दर बन गई, अभी बाहर वो पाषाण ज्यों का त्यों पड़ा है। आप देखोगे इस पाषाण में कहीं कुछ नहीं है और वो प्रतिमा बनाने वाला देखेगा तो वह देखता है कि इसमें प्रतिमा बनी हुई है। हमें कुछ नहीं करना है, इस प्रतिमा पर किसी ने कुछ ढँक रखा है, उसे हमें हटाना है। यह ढँकना वैसा नहीं जैसे कपड़े के द्वारा फोटो का ढँकना। वह भी ढंकना है और यह भी ढँकना लेकिन इन दोनों में बहुत अन्तर है, पाषाण के अन्दर जैसे प्रतिमा छिपी हुई है।
आचार्य कहते कि हैं ही ऐसे हमारे अन्दर हमारा परमात्मा छिपा हुआ है, हमारा स्वभाव हमारे अन्दर ऐसे ही ढका हुआ है। कहने में तो आयेगा ढँका हुआ है, छिपा हुआ है, गुप्त है, हमें वह पकड़ने में नहीं आ रहा है लेकिन हमें उसे पकड़ना है और पकड़ने के लिए थोड़ा सा कलाकार बनना पड़ेगा। उस प्रतिमा को बनाने वाले मूर्तिकार की तरह हमें भी थोड़ी सी कला सीखनी होगी और वो कला क्या है? जब उसके सामने एक दूसरा फोटो लाकर रख दिया जाता है और वह फोटो प्रतिमा में नहीं है, वह फोटो वह प्रतिमा नहीं है, वह प्रतिमा वह फोटो नहीं है फिर भी उस फोटो को देखकर वह मूर्तिकार उस पाषाण के अंदर उस फोटो को समाहित कर लेता है और कह देता है कि बिल्कुल ऐसी की ऐसी प्रतिमा इसके अंदर छिपी हुई है आपको प्रकट करके दे देंगे। 2-4 मास का समय लगेगा। फोटो कहीं और पाषाण कहीं और वह बनाने वाला तीसरा उसके दिमाग में दोनों की संयोजना हो गई है कि यह फोटो इस पाषाण में छिपा हुआ है। ऐसे ही आचार्य यहाँ कह रहे हैं एक फोटो तुम्हारी आत्मा में भी छिपा हुआ है। और वह फोटो क्या है? वह जिन्होंने अपने स्वभाव की प्राप्ति कर ली हो उसको अपना फोटो बनाकर सामने रख लो। जिन्होंने मतलब वह अन्य है वो आप नहीं हैं। जिन्होंने उस स्वभाव की प्राप्ति कर ली हो, उनको अपने सामने रख लो, उनको अपनी दृष्टि का विषय बना लो और उनको विषय बनाने के बाद क्या करना? वह सब हम आगे के विषय में बतायेंगे लेकिन पहले जिस रूप में हमको ढलना है उन्हें अपना विषय बना लो। हमें कैसा बनना है? तो आचार्य कहते हैं हमें ना महावीर भगवान बनना है, ना ऋषभदेव बनना है, ना पारसनाथ बनना है, क्या बनना है? यह सब तो बाहरी नाम है, यह सब तो शरीर से संबंध रखते हैं और इन नामों के पीछे जुड़ा वो आत्म तत्त्व है। वह जो बन गया है, उसकी तरफ अपनी दृष्टि डालो और जिन्होंने भी अपने आप को बनाया है, वैसे ही तुम्हें बनना है लेकिन पहले एक बात समझ लेना है कि हमें किस जैसा बनना है? मंगलाचरण इसलिए किया जाता है कि आपको वह ध्यान आ जाये जो आप होना चाहते हैं। मंगलाचरण कोई खानापूर्ति नहीं है, एक औपचारिकता नहीं है। ऐसे आध्यात्मिक संत, महान आचार्य इसलिए मंगलाचरण करते हैं कि मंगलाचरण के माध्यम से हमारे सामने एक फोटो खिच जाता है और हम उसी को चाहेंगे, उसी के गुणों की प्राप्ति के लिए हम अपने आप को तैयार करेंगे। अगर ऐसे परमात्मा को नमस्कार कर रहे हैं जिसने स्वयं स्वभाव की प्राप्ति कर ली हो तो इसका मतलब है कि हमें भी अपने स्वभाव की प्राप्ति करनी है।
स्वभाव की प्राप्ति कैसे?
उस स्वभाव की प्राप्ति कैसे करनी है तो आचार्य कहते हैं कि ‘अभावे कृत्स्नकर्मणः’ अभाव तो करना पड़ेगा किसी न किसी का जो द्रव्य उसमें ऐसा कुछ मिला हुआ है जिसके कारण वह प्रतिमा, प्रतिमा के रूप में दिखाई नहीं दे रही है, यह एक पाषाण बनी हुई है, उसमें कुछ अभाव करना है। अभाव मतलब उसमें से कुछ निकालना है, कुछ कमी करना है, जोड़ना नहीं है, अगर जोड़ना भी पड़े तो उसमें कुछ निकालने के लिए जोड़ना। जब कोई मूर्तिकार किसी पाषाण के अन्दर से वह प्रतिमा निकालता है तो वह कहता है कि मुझे छैनी, हथौड़ा दे दो। आप कहोगे इसमें से निकालते जाओ अपने आप प्रतिमा बन जायेगी, अलग से छैनी हथौड़े की क्या जरूरत है? तो वह छैनी हथौड़ा भी उसको निकालने के लिए ही चाहिए, जोड़ने के लिए नहीं चाहिए। वह उस छैनी को उस पाषाण के ऊपर रखेगा, हथौड़ा मारेगा, आपको लगेगा कि इसमें कुछ जुड़ रहा है लेकिन वह जोड़ नहीं रहा है, तोड़ रहा है। आपकी आत्मा के अन्दर भी वह स्वभाव पड़ा हुआ है जो स्वभाव परमात्मा ने प्राप्त कर लिया। लेकिन आपको भी अपने अन्दर किसी छैनी, हथौड़े के माध्यम से कुछ तोड़ना पड़ेगा और वह क्या तोड़ना पड़ेगा? ‘कृत्स्नकर्मणः’ यहाँ पर आचार्य कहते हैं- कृत्स्न मतलब सभी प्रकार के कर्मणः कर्मों को। जिन्होंने अपनी आत्मा में अभाव कर लिया है, उन्हें स्वभाव की प्राप्ति अपने आप हो गई है। स्वभाव की प्राप्ति कब होगी? कर्मों के अभाव हो जाने पर। जब तक कर्मों का अभाव नहीं होगा तब तक अपने को स्वभाव की प्राप्ति नहीं होगी। उस स्वभाव की प्राप्ति करने के लिए जो छैनी, हथौड़े की जरूरत है, वह भी आपको बाद में बतायेंगे कौन सी छैनी आत्मा में चलेगी। और कोई दूसरी छैनी, हथौड़ा लेकर मत जाना। महाराज ने कहा है कि कर्मों को काटना है, कर्मों को काटने के छैनी हथौड़े सबके अलग-अलग होते हैं, श्रावकों के छोटे-छोटे मोटे-मोटे छैनी हथौड़े होते हैं और वीतरागी आत्माओं के बड़े-बड़े, पैने-पैने छैनी हथौड़े होते हैं और वो पैने छैनी हथौड़े हैं मन की एकाग्रता, ध्यान की परिणति । जिसके पास ध्यान का जितना पैनापन होगा वह उतनी जल्दी कर्मों को काट लेगा और जिसके ध्यान के अन्दर जितना विचलन होगा, जितना मोथरापन होगा, उसके कर्मों को काटने में उतनी देर लगेगी। श्रावक के लिए ध्यान ऐसा है, जैसे आप सुन रहे थे, मैं धरती तू आसमान, मिलें तो मिलें कैसे? श्रावक के लिए ध्यान करना ऐसा है जैसे कि वह धरती पर बैठा है और आसमान को छूना चाह रहा है। उसके लिए ध्यान करना बहुत टेढ़ी खीर है और ध्यान करने में सबसे ज्यादा पसीना आता है। ध्यान के अलावा सब करा लो, सब कुछ करने को तैयार है। भगवान की पूजा करा लो, विधान करा लो, बड़े-बड़े एक साथ जाप करा लो, हवन करा लो, सबके लिए तैयार है। जैसे ही ध्यान की बात आती है, अरे महाराज ध्यान तो होता नहीं और ध्यान ही एक ऐसी चीज है जिसके माध्यम से कर्म कटते हैं। ध्यान उस श्रावक के लिए होता नहीं, और ध्यान के बिना कर्म कटते नहीं और जब तक ध्यान नहीं होता तब तक आचार्य कहते हैं कि तू ध्यान की परिणति आने तक कुछ तो कर, क्या कर? आचार्य कहते हैं ‘प्रात्रुत्थाय देवता गुरु दर्शनम्’ सबसे पहले प्रातःकाल उठकर क्या करना? देवता, गुरु का दर्शन करना यानि भगवान जिनेन्द्र देव का दर्शन करना। श्रावक के लिए सबसे पहले यह कहा गया है। मुनिराज के लिए सबसे पहले कहा गया है- स्वाध्याय करना, सामायिक करना, ध्यान करना। श्रावक के लिए कहा गया है कि तुम उठकर सबसे पहले देवता का दर्शन करना। मुनिराज के लिए कहा गया है तुम अपनी आत्मा का ध्यान करना। अपने ही अन्दर उस परमात्मा का ध्यान बैठे-बैठे करना तुम्हें दर्शन के लिए कहीं जाने की जरूरत नहीं है। देव दर्शन करना श्रावक का मूलगुण है, मुनि महाराज का नहीं, फिर भी मुनि महाराज करते हैं। वंदना एक आवश्यक कार्य है, वंदना को मूलगुण में रखा गया है लेकिन वह बाद में, पहले उन्हें प्रातः उठकर सामायिक करना, प्रतिक्रमण करना, स्वाध्याय करना यह सब पहले करना, फिर सब लोग उठ जाये तो देव दर्शन करने वंदना करने, के लिए जाना।
देवदर्शन का फल
श्रावक को सबसे पहले देवदर्शन, गुरुदर्शन की बात कही गई। आचार्यों ने उस दर्शन की कितनी महिमा लिखी है। तुम्हें ध्यान होना नहीं है सो सबसे पहले तुम भगवान का दर्शन करो, पूजा करो। आचार्य कहते हैं जब तुमने अपने घर पर बैठ कर यह विचार बना लिया कि मुझे भगवान के दर्शन करने के लिए जाना है तो तुम्हें एक उपवास का फल मिल जाता है। जो लिखा है वो बता रहा हूँ, तुम्हें मिलता है या नहीं वो भगवान जाने। लेकिन आपने घर बैठे मन बना लिया, ध्यान में आ गया तो एक उपवास का फल मिल जाता है। जब आपने भगवान के दर्शन के लिए थोड़ा सा उद्यम किया आपको दो उपवास का फल मिला। जब आपने थोड़ी सी और तैयारी की तो तीन उपवास का फल मिला। जैसे आपने चलना प्रारम्भ किया, आपको चार उपवास का फल मिला। इतना भगवान के दर्शन का फल, अभी तो आये नहीं पास में, जब आप थोड़ी दूर आ गये रास्ते में आपको पाँच उपवास का फल मिला। जब आपको जिन भवन दिखाई दिया तो छह उपवास का फल मिल गया, जैसे ही आप भगवान या जिनभवन के पास आने लग गये या आ गये तो आपको एक पक्ष यानि 15 दिन के उपवास के फल का जो पुण्य लगता है, वो आपको लगेगा और आपने दहलीज पर पैर रखा तो आपको एक महीने के उपवास का फल मिलेगा। आप भगवान की वेदी के पास गये, उनकी परिक्रमा लगाई आचार्य कहते हैं आपको एक वर्ष के उपवास का फल मिलेगा। जब आपने भगवान के नयनों से दर्शन किये तो आपको 100 वर्षों के उपवास का फल मिल गया और जब आपने भगवान की स्तुति की तो आपको अनन्त अनन्त पुण्य की प्राप्ति हो गई। ऐसे भगवान के दर्शन का फल श्रावकों के लिए लिखा गया है कि आप जब भगवान जिनदेव का दर्शन करते हैं तो आपको पुण्य फल मिलता है। आप को लग रहा होगा महाराज यह सब शास्त्रों की बातें है, Reality (वास्तविकता) तो कुछ है नहीं अगर इतना पुण्य फल मिलता है तो रोजाना भगवान के दर्शन करते हैं, और पूजन करते हैं खूब खूब देर तक करते हैं, हमें तो बहुत पुण्य की प्राप्ति हो रही होगी। अगर हो भी रही होगी तो आपके लिए कोई अतिशयोक्ति की बात नहीं है, आपके काम में आयेगी। लेकिन उस पुण्य की प्राप्ति के लिए जो प्रयास करने को कहा गया है उस प्रयास की जो विधि है वो विधि आपसे शायद ही पूरी हो पाती हो। पहली बात तो यह कि दर्शन करने वाले श्रावक के लिए कहा गया है कि भगवान के दर्शन करने के लिए पैदल जायें।
आपको पुण्य फल की प्राप्ति जल्दी चाहिए तो जितनी जल्दी करोगे पुण्य उतना ही छूटेगा। जो हमें जितने उपवास का फल मिलता है उतना मिलेगा लेकिन जल्दी करने से वो जल्दी नहीं मिलेगा परन्तु आपको जल्दी रहती है। जैसे आप घर से निकलते हो तब बाइक पर बैठकर सीधे आप मन्दिर आ जाते हो, आपको लगता है आप मन्दिर जल्दी आ गये और यहाँ वैसी आधुनिक मशीन तो है नहीं। पहले तो भैया बहुत देर में काम बनता था। कोई भी Product तैयार होता था तो समय लगता था। अब मशीनें ऐसी आ गई हैं, जो काम पहले 1 घंटे में होता था वो अब 10 मिनट में हो जाता है। दूसरे काम सब 10 मिनट में हो सकते है लेकिन भीतर भावों का काम 10 मिनट में नहीं हो सकता, उसके लिए आपको वह विधि अपनानी पड़ेगी जो विधि आचार्यों ने बताई है। अगर आचार्यों ने कहा कि कोई श्रावक, स्वच्छ वस्त्र पहन करके, पैरों में किसी प्रकार के जूते चप्पल नहीं पहन करके, भगवान के दर्शन करने की भावना से निकला हो, रास्ते में दया भाव धारण करके जीवों की रक्षा करते हुए मौन से चले और रास्ते में चलते हुए बिल्कुल मौन रहे तो उस श्रावक को ऐसे उपवास का फल, पुण्य फलों की प्राप्ति होगी जो हम आपको अभी यहाँ बता रहे थे। आप कहोगे महाराज ऐसा करना तो थोड़ा कठिन काम है। इससे क्या मतलब है भगवान का दर्शन करना है हम चाहे गाड़ी पर आयें या कैसे भी आकर करे भगवान का दर्शन तो कर रहे हैं। लेकिन वह जो दर्शन करने में आनंद आता है और दर्शन से पहले जो मन में भावना बनती चली जाती है, वह भावना आपकी गाड़ी पर बैठकर एकदम से 5 मिनट में आने पर नहीं बनती। जब आप इस ढंग से भगवान के दर्शन करने जाते हो, जितनी देर लगेगी उतनी ही आपकी विशुद्धि बढ़ेगी। आप विचार तो करो, अगर एक कि.मी. या आधा कि.मी. का रास्ता आप पैदल चल कर जा रहे हो, चुपचाप चले जा रहे हो, कुछ भी हो जयजिनेन्द्र के अलावा कोई दूसरी बात नहीं कर रहे हो और अन्य श्रावक देख ले कि भी यह मन्दिर जा रहा है तो वह भी अपने आप समझ जायेगा कि यह जैन श्रावक मंदिर जा रहे हैं, चुपचाप जा रहे हैं इससे अभी कोई फालतू बात नहीं करनी है, ना इससे कुछ पूछना है। आपकी भावना में जिनेन्द्र भगवान बिल्कुल तैर रहे हैं और आपके अन्दर एक आकर्षण रहेगा हमें भगवान के दर्शन हों-हों-हों यह भाव ही आपके अन्दर विशुद्धि का भाव पैदा करेगा।
इसलिए जितने भी तीर्थ क्षेत्र, सिद्ध क्षेत्र ऊँचाइयों पर बने होते हैं और उन ऊँचाईयों पर पहुँचते-पहुँचते हम थक जाते हैं। हम मन में यह सोचते हैं कि क्या इतनी ऊँचाई पर बैठने से मोक्ष होता है? लेकिन अगर आपको यह ध्यान रहे कि भगवान ने जहाँ से मोक्ष प्राप्त किया है, हम उस स्थान पर पहुँच रहे हैं और जाते हुए बस दर्शन करने की भावना है और पूरा का पूरा पुण्य आप संजोते जा रहे हैं। जिस क्षण आपको दर्शन हो जायेगा उस समय आपके मन में जो विशुद्धि का भाव आयेगा वो आपको हेलिकाप्टर से पहुँचने पर नहीं आयेगा। हर चीज को धीरे-धीरे समझना और धीरे-धीरे प्राप्त करना। मोक्षमार्ग जल्दी का मार्ग नहीं है, हड़बड़ी का मार्ग नहीं है। हड़बड़ी से बाहर कुछ कर सकते हो लेकिन हड़बड़ी में भीतर कुछ होता ही नहीं है। हड़बड़ी का मतलब घबराहट हो रही हो, कुछ करने की जल्दी पड़ी हो और आप बैठ जाओ, आँख बंद करके हड़बड़ी में आपकी आँखें भी बंद नहीं रहेंगी। आपको अंदर भीतर घबराहट होगी, कुछ करने की आकुलता होगी तो आँख बंद करके भी नहीं बैठ पाओगे क्योंकि भीतर शांति चाहिए, परमशांति चाहिए। शांति तभी प्राप्त होगी जब हमें बाहर कोई शांति की मूर्ति दिखाई जाये जैसे मूर्ति हमें अपने अन्दर प्रकट करनी है, बनानी है और उस मूर्ति को बनाने के लिए ही हम बाहर यह प्रयास करते हैं इन गुणों की प्रशंसा, इन गुणों की प्राप्ति करने के लिए हम प्रयास करते हैं कि जैसा बाहर हमें चेहरा दिखाई दे रहा है भगवन् मेरा स्वरूप वैसा ही है और मुझे अपने स्वरूप को ऐसा बनाना है। एक बहुत बड़े मूर्तिकार से भी ज्यादा मेहनत का काम है, जब आप अपनी आत्मा के अंदर भी परमात्मा को प्राप्त कर उसे प्रकट कर सकोगे। स्वभाव की प्राप्ति करना और वह स्वभाव की प्राप्ति खुद को करना, दूसरा नहीं करा सकेगा आपको बगल में बैठा व्यक्ति आपको ध्यान लगा नहीं सकता है, आप से कहेगा कि आप सीधे बैठ जाओ लेकिन आपसे सीधे बैठने के बाद ध्यान नहीं हुआ, ध्यान में जो करना है वो आपको स्वयं करना है। वो. आपके मन को मालूम है, आपका मन क्या कर रहा है, आपके मन को क्या करना है, आपका मन आपके द्वारा संचालित होना है सब कुछ स्वयं करना होगा, बाहर तो केवल कहने के लिए होता है, किसी ने किसी के लिए कुछ आलम्बन दे दिया बाकी स्वयं में स्वयं को स्वयं के द्वारा ही प्राप्त करना होता है।
इसलिए जितनी भी आत्माएँ सिद्ध आत्माएँ बनी हैं वो सभी इस process से बनी हैं, उन्होंने स्वयं ही स्वभाव की प्राप्ति की है। किसी के सहारे से स्वभाव की प्राप्ति नहीं होती है। यहाँ तक आचार्य आपको आगे बतायेंगे कि गुरु का सहारा भी बाद में छूट जाता है। वो भी धीरे-धीरे बात आयेगी, आपके सामने इसलिए यह ध्यान रखना जितने भी भगवान या सिद्ध बनते हैं, वह सब स्वयंभू कहलाते हैं। स्वयंभू का मतलब ही होता है, स्वयं भू। भू माने होना स्वयं हो जाओ अपने होने के लिए किसी पर की आवश्यकता नहीं होती। आप जैसे गर्भ में आये थे, गर्भ से निकले, बड़े हुए, बूढ़े हो रहे हो यह परिणमन भी आपका स्वयं चल रहा है आपको इससे ना कुछ हो रहा है, ना कुछ चल रहा है, बाहरी द्रव्य का परिणमन भी स्वयं चल रहा है। इसी तरह से भीतरी द्रव्य का परिणमन भी स्वयं होगा लेकिन जैसा हो रहा है उसको आपको रोकना पड़ेगा अभी जो हो रहा है वो विभाव रूप में हो रहा है। उस वैभाविक परिणमन को रोकना और स्वाभाविक परिणमन की प्राप्ति करना यह आपके पुरुषार्थ से होगा। तब आत्म-द्रव्य का परिणमन स्वभाव की प्राप्ति की ओर उन्मुख होगा और उस परिणमन की प्राप्ति के बाद ही हमें अपने ज्ञान के स्वरूप की प्राप्ति हो जायेगी।
‘तस्मै संज्ञानरूपाय’ आचार्य क्या कहते हैं कि अब उनके लिए नमस्कार हो जिन्होंने इन कर्मों का अभाव करके स्वभाव में स्वयं की प्राप्ति कर ली है और जो स्वयं ज्ञान स्वरूप हो गये आत्मा में ज्ञान के अलावा और कुछ भी नहीं हैं, ज्ञान स्वरूपी आत्मा जिन्होंने अपने ज्ञान स्वरूप को प्राप्त कर लिया। संज्ञान का मतलब होता है सम्पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति जिनको हो गई हो।
‘नमोस्तु परमात्मने’ उस परमात्मा के लिए मेरा नमस्कार है। वही परमात्मा बन गया, परमात्मा ऐसी कोई डरावनी चीज नहीं है, जैसा आप समझते हो, या समझ रखा हो परमात्मा कहते ही लोग डर जाते हैं जबकि आचार्य कहते हैं आपकी आत्मा के अंदर वह परमात्मा विद्यमान है जैसे पाषाण के अन्दर मूर्ति विद्यमान है। बस खोदो, उसे निकाल लो, आपने पहले से जमा रखी है उसे हटाते जाओ आपके अन्दर की मूर्ति प्रकट होगी तब आपके अन्दर वह आत्मवृत्ति उत्पन्न होती है। एक बहिरात्मा, एक अंतर्रात्मा, एक परमात्मा यह तीनों प्रकार की आत्मा आपके आत्मा में है जब तक आत्मा पर पदार्थ को अपना मानता है तब तक वह बहिरात्मा है, जब आत्मा यह समझ लेता है कि यह ‘पर’ पदार्थ मेरा नहीं है, मेरा तत्त्व तो केवल मेरी आत्मा है, तब वह अंतर्रात्मा हो जाता है और वही अंतर्रात्मा की वृत्ति उसे धीरे-धीरे परमात्मा बनाती चली जाती है। समझना केवल इतना है कि मेरी आत्मा अंतर्रात्मा होकर परमात्मा बन सकती है लेकिन पहले उसको बहिर्रात्मा से हटाना होगा। हर आत्मा ने अपने अंदर परमात्मा रूप को इसी तरह प्रकट किया है और बाहर से परमात्म तत्त्व को प्रकट करने का कोई उपाय नहीं है। स्वयं को स्वयं के द्वारा स्वयं में पाना ही अंतर्रात्मा से परमात्मा बनने का उपाय है।
छैनी-हथौड़ा भी चलाना है तो उसमें से जो extra material हटाने के लिए है। आप विचार करो जिन्होंने अपने अंदर से extra material हटा दिया हो और वो extra क्या-क्या है यहाँ तो बहुत सामान्य से कह दिया सभी कर्मों का अभाव कर दिया अब वो कर्म कितने है? आचार्य कहते हैं आठ है। ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय, मोहनीय, आयु, नाम, गोत्र, अंतराय। इन सब के सब कर्मों को जिन्होंने हटा दिया हो और इन कर्मों के अभाव होने पर ही उन्हें अपने स्वभाव की प्राप्ति हुई है और उन कर्मों में जो सबसे बड़ा कर्म है और सबसे पहले हटाने लायक है तो आचार्य कहते हैं कि वह मोहनीय कर्म है। मोहनीय कर्म को हटाये बिना आपकी परिणति में यह आयेगा ही नहीं कि भगवान या परमात्मा कैसा होता है? परमात्मा या भगवान का स्वभाव क्या है?
न पूजयार्थस्त्वयि वीतरागे न निन्दया नाथ विवान्तवैरे।
तथापि ते पुण्यगुणस्मृतिर्नः पुनातु चित्तं भगवान् जिनेन्द्रः ।॥ स्वयंभू स्तोत्र ।।
आचार्य समन्तभद्र स्वामी कहते हैं कि हमने यह तो जान लिया कि आप कैसे है? लेकिन यह दुनिया के लोग नहीं जान पा रहे हैं कि आप कैसे है? भगवान कैसे हैं? तो आप इस श्लोक में बताते हो भगवान परमात्मा जिन्हें अपने स्वरूप की प्राप्ति हो गई वे वीतरागी है। वीतराग का मतलब वह आपकी पूजा से प्रसन्न, होने वाले नहीं है। उन्हें आपकी पूजा से कोई प्रयोजन नहीं है, ‘न निन्दया’ अगर पूजा करने से प्रसन्न नहीं होते तो निन्दा करने से गुस्सा भी नहीं हो सकते हैं तो आचार्य कहते हैं कि उन्हें निन्दा से भी कोई प्रयोजन नहीं रहा क्योंकि ‘विवान्तवैरे’ उन्होंने वैर को उगल दिया है, वैर उनके अन्दर रहा ही नहीं, भगवान को संसार के किसी भी प्राणी से ना वैर रहा ना राग रहा। भगवान के अन्दर राग-द्वेष का अभाव है। ऐसे भगवान परमात्मा बनने के बाद में हम उस परमात्मा को नमस्कार करते हैं तो किसकी प्राप्ति के लिए करते हैं?
यहाँ पर यह नहीं लिखा कि हे भगवन् हम आपको किसकी प्राप्ति के लिए नमस्कार रहे हैं लेकिन एक भाव इसमें छिपा हुआ है “तस्मैसंज्ञानरूपाय” यह चतुर्थी विभक्ति आपने संस्कृत में पढ़ी हो तो यह दोनों अर्थों में आती है, जब किसी के लिए नमस्कार किया जाता है तब भी वह चतुर्थी विभक्ति आती है और जब हम किसी चीज की प्राप्ति के लिए प्रयास करते हैं तो उस में भी यह विभक्ति काम आती है। अर्थात् एक प्रकार से तो देखा जाये तो हे भगवन् हम आपके ज्ञान रूप की प्राप्ति करने के लिए आपको नमस्कार कर रहे हैं। किसकी प्राप्ति के लिए? आपके ही संज्ञानरूप या सम्पूर्ण ज्ञान रूप की प्राप्ति के लिए नमस्कार कर रहे हैं। यह आचार्य यहाँ कह रहे हैं। जैसे हम भगवान के सामने पहुँचते हैं नमस्कार करने के लिए, पूजन करने के लिए बुद्धि में क्या आता है? पहले यह देखना, बुद्धि की परीक्षा करना, आपकी बुद्धि में सबसे पहले यह भाव आयेगा जो हमें पता है, आपने नहीं बताया फिर भी पता है। आपके अन्दर क्या चलता है, हम भगवान के पास आये, भगवान की पूजन कर रहे हैं तो भगवान हमसे प्रसन्न होंगे, भगवान की दृष्टि हमारे ऊपर पड़ेगी, भगवान हमारे ऊपर प्रसन्न होकर हमारा काम बना देंगे। यह भावना सबसे पहले हमारे अन्दर आ जाती है, हम कहते जरूर हैं।
“हे वीतराग विज्ञान पूर, तुम मोहतिमिर को हरणसूर।” आप वीतराग है, पर हम नहीं, हम यह भी जान रहे हैं कि भगवान वीतराग है लेकिन हमारे अन्दर जो भाव आता है वो तो मोह का भाव आता है, राग का भाव आता है और उस मोह में उस मिध्यात्व का भाव भी आ जाता है, अगर आपके अन्दर control नहीं होती। आपको सम्यक श्रद्धा की परिणति नहीं आई होगी और आपके अन्दर वो मोह अर्थात् विपरीत श्रद्धा का भाव आ जायेगा कि भगवान की जितनी पूजा करेंगे उतने वे हमसे प्रसन होंगे। उधर आचार्य कहते हैं कि भगवान आपकी पूजा से प्रसन होने वाले नहीं है वो वीतराग है। आपको उनके स्वरूप पर श्रद्धान कितना है। यह पक्का मान लेना भगवान को हम प्रसन नहीं कर सकते। ‘पूज्यार्थस्य है भगवन्। हम आपको पूजा से प्रसन नहीं कर सकते। स्वयं आचार्य कहते भी जा रहे हैं और स्तुति भी कर रहे हैं।
हे भगवन्। फिर भी आपकी पूजा करने से आपके गुणों का स्मरण करने से मेरा चित्त दुरित रूपी पाप रूपी अंजन माने कलंक कालिमा सब धुल जाता है। हमें कहाँ पर focus डालना है। भगवन् को देखने के बाद भी हमारे विचारों का focus हमारे ऊपर ही रहे। यह ना रहे कि हम भगवान की प्रसन करने के लिए पूजा करने जा रहे हैं और आज नहीं पहुँचे तो भगवान नाराज हो जायेगे यह भाव तो कभी स्वप्न में भी नहीं आना चाहिए अगर आपको वीतराग भगवन् पर श्रद्धान हो गया हो तो, भगवान् की पूजा नहीं कर पायेंगे तो हमारा वित्त पवित्र नहीं हो पायेगा। हमें भावना करी कि हमें आपकी पूजा करने से हमारा चित्त पवित्र होता है। आपके पुण्य गुणों की स्मृति से हमारी कर्म कालिमा धुलती है। यह भावना अगर आपके अंदर रहेगी तो और कोई दूसरी इच्छा करने में आयेगी ही नहीं सम्यग्दृष्टि जीव का एक दूसरा बहुत बड़ा अंग होता है। पहला तो निःशकित होता है और दूसरा निःकाक्षित होता है। निःशकित होने का मतलब उसे कोई भी शंका नहीं है कि हमें उसकी पूजा से यह फल मिलेगा या नहीं मिलेगा। उन्हें पक्का मालूम है हमें जो कुछ मिलेगा वह भगवान के द्वारा, भगवान की पूजा से मिलेगा लेकिन भगवान कुछ देते नहीं यह भी वो जानता है। यह निःशकित अंग है। उससे भगवान् प्रसन्न नहीं होगे, रूठेंगे भी नहीं, भगवान कुछ छीनेगे भी नहीं, भगवान कुछ देंगे भी नहीं यह पक्का कर लेना। पहले जब यह निःशंकितपना आपके अन्दर आ जायेगा तब आपके अंदर निःकांक्षित अंग भी आ जायेगा।
निःकांक्षित अंग का मतलब जब भगवान को इन चीजों से कोई प्रयोजन ही नहीं है तो फिर भगवान से वो चीजें क्यों चाहें? अगर भगवान ने यह सब रखा होता तो वह हमको देते और आप धन, पैसा, पुत्र-पुत्री, व्यापार, शादी-विवाह यह सब चीजें ही मांगेंगे और इन सब चीजों को भगवान ने छोड़ दिया। लेकिन पूजा करते हुए हमारी दृष्टि में कहीं न कहीं यह भाव आ जाता है।
आप नहीं भी चाहोगे तो आप के अन्दर भाव आ जायेगा। आप अपने मन से पूछ लेना। पूछने की जरूरत ही क्या है, महाराज हमें सब पता है। जैसे भगवान के दर्शन करने कहीं पहुँचते हैं, आपके मन में यह भाव आ जायेगा और यह भाव आते ही समझ लेना हमारे अन्दर एक विपरीत श्रद्धान की परिणति चल रही है। अभी हमें भगवान की वीतरागता का श्रद्धान नहीं है, हम कहेंगे जरूर भगवान वीतराग हैं, सर्वज्ञ हैं लेकिन वो सभी हमारी श्रद्धा में नहीं उतरा। जब श्रद्धा में उतर जायेगा तब हमें भगवान की पूजा में यह प्रयोजन नहीं रहेंगे। जब यह प्रयोजन नहीं रहेंगे कि शनिवार आ गया है तो मुनिसुव्रतनाथ भगवान के पास चलें, यह भी तो एक प्रयोजन है। शनिवार को ही मुनिसुव्रतनाथ में कोई ऊर्जा प्रकट हो जाती है क्या? भगवान की प्रतिमा में शनिवार को कोई स्फूर्ति आ जाती है क्या? शनिवार को भगवान सुव्रतनाथ की पूजा करने से अधिक फल देते हैं क्या? यह सब विचार तुम्हारे दिमाग में भरे पड़े हैं और तुम वही विचार दूसरों को भी दे देते हो।
जब तुम चलोगे तो अपनी बाइक पर दूसरे दोस्त को भी बिठा लेते हो, चल वहाँ चल रहे हैं, मुनिसुव्रतनाथ बाबा के यहाँ। कहीं भी हो वहाँ चलेंगे, तुम उसको भी साथ बिठा लोगे, उसको भी ले चलोगे और उसके अन्दर भी धारणा बिठा दोगे। देख! आज अपन सुव्रतनाथ की पूजा करके आये ना इसलिए तो यह ग्राहक बरसों से पट नहीं रहा था। आज यह पट गया जैसे ही यह भाव आपके अंदर आया आपका मिथ्या श्रद्धान दृढ़ होता चला गया। समीचीन परिणति तो कहीं दूर है। वहीं पर आपको कर्म का बंध भी हो सकता है और मुक्ति भी मिल सकती है। वही भगवान वीतराग होकर के भी आपको श्रद्धान में वीतरागता नहीं लाने दे रहा है। वही भगवान अगर सामने वीतराग है तो आपकी श्रद्धा में भी वीतरागता आ सकती है अगर आप स्वयं परिणमन करायें अपने को तो यहीं से धर्म शुरू होता है।
स्वयं स्वभाव आप्ति, अपने स्वभाव की प्राप्ति के लिए स्वयं पुरुषार्थ करना और स्वयं अपने मन को मरोड़ो, धर्म यही से शुरू होगा। जो अभी तक सोचते आये हो, उसमें धर्म नहीं है और जो अभी तक नहीं सोचा हो और उसमें जो आपको दिक्कत हो रही है उसी की सोच में वही धर्म है। जो अभी तक करते आये हो, जो श्रद्धा बना रखी है, उसमें धर्म नहीं है और जो आपको बनाने में दिक्कत हो रही है और जैसे ही आप ऐसी श्रद्धा बनाओगे आपको लगेगा कि अरे! हमारे सामने तो कुछ है ही नहीं। भगवान वीतराग हैं उनसे तो कुछ माँगना ही नहीं, वो कुछ देते नहीं तो हमारा काम कैसे चलेगा, हमारी दुनियाँ कैसे बसेगी, हमारे सामने जो हमारी इच्छाएँ है, उनकी पूर्ति कैसे होगी। आपके सामने एकदम ऐसा वातावरण तैयार हो जायेगा। लेकिन उसमें भी आपके अन्दर से एक प्रकाश की किरण फूटेगी, यह सब तो अपने आप चल रहा है, चलेगा, तूने कब सोचा कि मैं गर्भ से निकलूँगा। अपनी सोच से निकला था। तूने कब सोचा था, मैं गर्भ से निकल कर इतना बड़ा हो जाऊँगा, बूढ़ा हो जाऊँगा, क्या तेरे सोचने से तू बूढ़ा होता चला जायेगा। तूने कब सोचा था कि मैं इसी परिवार में आके जन्म लूँगा, इसी बिजोलिया में आकर जन्म लूँगी, तेरी सोच से जन्म लिया तेरी सोच से होता क्या है? ये तो बता तू।
अपनी सोच से बहुत कुछ नहीं होता और जो कुछ भी हमारे सामने चल रहा है वो बिना सोचे समझे चल रहा है। लेकिन जब भी हमें अपनी श्रद्धा की परिणति को संभालनी होगी तो हमें अपनी सोच को भी इस तरह से बाँधना होगा। हमें अब कुछ सोचना नहीं हैं, भगवान वीतराग की आराधना करनी है और वीतराग की आराधना प्रार्थना वीतरागता की प्राप्ति के लिए करना है और उस प्राप्ति में जो व्यवधान बन रहा है ‘मोह’ तो हे भगवन्! हम आपसे यही प्रार्थना करते हैं, मेरे इस मोह का नाश भी आप ही कर दो। मेरे अन्दर श्रद्धा की समीचीन परिणति भी आप ही पैदा करा दो क्योंकि यह काम भी आपकी ही पूजा से होगा, आप के ही दर्शन से होगा, यह काम कोई और दूसरा कराने वाला नहीं है। यह परिणति आपके अंदर आ जायेगी समझ लेना यह जन्म आपके लिए सफल हो जायेगा। अगर यह परिणति आपको इस चातुर्मास में बन गई तो समझ लेना कि चातुर्मास भी सफल हो जायेगा, और कुछ नहीं है कराने को ना यहाँ पर। आपको ना कोई पैसा देना है और ना यहाँ कोई पैसा मिलने वाला है। धन, वैभव, इन सबसे दूर ज्ञान की सम्पत्ति की प्राप्ति करो, अपने स्वरूप की प्राप्ति करो और जो तुम्हें उस ज्ञान स्वरूप की प्राप्ति करने में आनन्द आयेगा, उससे जो तुम्हारी जन्म-जन्म की प्यास मिटेगी, वह प्यास किसी और पदार्थ से मिटने वाली नहीं है। इसलिए आचार्य कहते हैं-हे परमात्मा भगवन्! आपको नमस्कार तो कर रहा हूँ लेकिन आपका स्वरूप ज्ञान स्वरूप है और मैं उसी ज्ञान स्वरूप की प्राप्ति के लिए ही आपको नमस्कार कर रहा हूँ और कोई मेरी इच्छा नहीं है। जब हम जिनको नमस्कार कर रहे हैं तो हमें भी उनके गुणों की ही प्राप्ति करने की भावना होनी चाहिए। कोई आदमी ज्योतिष विद्या सीखता है कि उसे आगे ज्योतिषी बनना है। कोई आयुर्वेद सीखता है, उसकी इच्छा में होगा उसे दवाई बाँटना है। कोई मंत्र विद्या सीखता है क्योंकि उसे भी मंत्रों का प्रयोग करना अच्छा लगता है। कोई आदमी धनुर्विद्या सीखता है क्योंकि उसे धनुष-बाण चलाने में Interest (रुचि) है। कोई आदमी क्रिकेट खेलना सीखता है क्योंकि बाद में उसे धोनी बनना है, तेंडुलकर बनना है। इसलिए जो जिस प्रकार की इच्छा करता है वह उसी प्रकार की विद्या सीखता है और उसी प्रकार का अभ्यास करता है। आप बताओ आप कौन सा अभ्यास कर रहे हो? आपको भी कुछ सीखना है। आपको यहाँ पर वही वीतरागता की विद्या सिखाई जायेगी, जिसके माध्यम से आपके अन्दर यह ललक पैदा हो जाये कि मैं भी अपनी आत्मा को परमात्मा बना सकता हूँ। पाषाण के परमात्मा तो बहुत बनते देखे हैं अपनी आत्मा को परमात्मा बनाने की प्रक्रिया इस जन्म में शुरू कर दो किसी न किसी जन्म में पूरी हो जायेगी, शुरू तो कर दो, शुरुआत ही कठिन है। जैसे शुरुआत हो गई वैसे वो काम अधूरा छूटता नहीं है। पहले यह पहचान लेना कठिन है। हमारे ऊपर कर्म रूपी पत्थर पड़े हैं, हमारी आत्मा पर हमारी बुद्धि पर, ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय कर्मों के इन पत्थर को हमें हटाना है अपने पुरुषार्थ से तो हमें भगवान के सामने किसी भी प्रकार की कोई आकांक्षा नहीं करना। उन्हीं गुणों की प्राप्ति की भावना करना कि हे भगवन्! जैसे आप अनन्तज्ञान, सुख, दर्शन, वीर्य शक्तियों से सम्पन्न है, ऐसी शक्तियाँ हमारे अन्दर प्रकट होवें। ऐसी ज्ञान की शक्ति है भगवान के पास लेकिन वो शक्ति तुम्हें देंगे नहीं आप कहोगे कैसे भगवान हैं? उनके पास सब कुछ है वह उनको जो प्रकट हुआ है, जो प्राप्त हुआ है, वो अपनी उन शक्तियों को भी नहीं देंगे। वो शक्तियाँ भी खुद को प्राप्त करनी होगी अगर भगवान तुम्हें दे सकते होते तो भगवान कब के सब किसी को वे देकर के उद्धार कर करके निकालते रहते यह लिखने की जरूरत नहीं पड़ती, ‘स्वयंस्वभावाप्ति’। स्वयं ही अपने अन्दर उन शक्तियों को प्रकट करना है, जैसी भगवान ने स्वयं अपने अन्दर शक्तियाँ प्रकट की हैं। स्वयं प्रकट की हुई शक्तियों से ही स्वयं को आनन्द की अनुभूति होगी। दूसरे के द्वारा दिया गया कुछ होता है तो वह आनन्द बहुत देर तक टिकता नहीं है। वह जैसे आता है, वैसे छूट जाता है, इसलिए एक भावना पक्की कर लो कि हमें स्वयं में स्वयं की प्राप्ति करनी है और उस प्राप्ति के लिए ध्यान और कीर्तन करो। ललक पैदा करो, अनुभूति करो।
- आचार्य उस आत्मा को नमस्कार करते हैं जिसने स्वभाव की प्राप्ति कर ली हो।
- स्वभाव की प्राप्ति करने के लिए ‘पर’ की भी कोई आवश्यकता नहीं है।
- जैसे पाषाण के अन्दर प्रतिमा छिपी हुई है वैसे ही हमारे अन्दर परमात्मा छिपा है
- मन की एकाग्रता, ध्यान की परिणति कर्म काटने के औजार हैं।
- जिनेन्द्र देव के दर्शन करना श्रावक का प्रथम मूलगुण है।
- भगवान् के दर्शन में आह्लाद भाव ही आपके अन्दर विशुद्धि का भाव पैदा करेगा।
- मोक्षमार्ग हड़बड़ी का मार्ग नहीं है।
- बहिरात्मा, अंतरात्मा, परमात्मा यह तीनों प्रकार की आत्मा आपके आत्मा में है।
- जो पूजा करने से प्रसन्न नहीं होते ओर न निंदा करने से गुस्सा होते वही वीतरागी हैं।
- भगवान् के पुण्य गुणों की स्मृति से हमारी कर्म कालिमा धुलती है।
- भगवान् से कुछ पाने की आशा करना मिथ्या श्रद्धान है।
- वीतराग की आराधना-प्रार्थना वीतरागता की प्राप्ति के लिए करना है।
- ज्ञान की प्राप्ति एवं अपने स्वरूप की प्राप्ति को लक्ष्य बनायें।
English Translation of Adhyatm Yog ( Ishtopdesh ) Chapter 1
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अध्यात्म योग (इष्टोपदेश ) मुनि श्री प्रणम्यसागरजी
अध्यात्म योग (इष्टोपदेश ) स्वाध्याय
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