आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज द्वारा पद्यानुवाद एवं विवेचना
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उत्थानिका-फिर भी शिष्य का कहना है कि हे भगवन्! क्या कारण है कि लोगों को निकट आई हुई भी विपत्तियाँ दिखाई नहीं देतीं? आचार्य महाराज समाधान देते हैं- ‘लोभात्’ लोभ के कारण। हे वत्स । धनादिक की गृद्धता आसक्ति से धनी लोग सामने आई हुई भी विपत्ति को नहीं देखते हैं, कारण कि-
आयुवृद्धिक्षयोत्कर्ष हेतुं कालस्य निर्गमम् । वाञ्छतां धनिनामिष्टं जीवितात्सुतरां धनम् ॥15॥
अन्वयार्थ – (कालस्य निर्गमम्) समय का व्यतीत होना (आयुवृद्धिक्षयोत्कर्ष-हेतुं) आयु क्षय और धनवृद्धि का कारण है (वाञ्छतां धनिनां) धन चाहने वाले धनवान् पुरुषों को (जीवितात्) अपने जीवन से भी (सुतराम्) अधिक तरह (धनं इष्टम्) धन इष्ट होता है।
पद्यानुवाद
काल बीतता ज्यों-ज्यों त्यों-त्यों आयु कर्म वह घटे बढ़े,
धन का वर्धन धनी चाहते, प्रतिदिन हम तो बनें बढ़े।
कहें कहाँ तक धनी लोग तो, जीवन से भी जड़ धन को,
परम-इष्ट परमेश्वर कहते, धन्यवाद धन-जीवन को ॥15॥
English Translation of Ishtopadesh Gatha 15
विवेचना
अनादिकाल से इस आत्मा पर लोभ कषाय का तीव्र संस्कार जमा हुआ है, उसी के कारण यह आत्मा धन को अपने जीवन से भी अधिक प्रिय समझता है। यद्यपि काल का व्यतीत होना और आयु का क्षय होना ये दोनों ही धनवृद्धि में कारण हैं, तो भी धनवृद्धि की लिप्सा के कारण धनिक जन बीतते हुए समय की तथा क्षय होती हुई आयु की परवाह नहीं करते वरन् धनवृद्धि में काल के बीतने को श्रेयस्कर समझते हैं। यही कारण है कि धनी लोग धनादि से समुत्पन्न विपत्तियों का कोई विचार नहीं करते। यहाँ तक कि वे उन्हें विपत्तियाँ ही नहीं समझते। यह सब लोभ का ही प्रभाव है। यदि विचार करते भी हैं तो धन की अभिवृद्धि और उसके संरक्षण का ही विचार करते हैं और उन्हीं के कारणभूत साधनों को जुटाने का प्रयास करते हैं। आगत विपदाओं का कोई ख्याल नहीं करते। यह सब लोभकषाय कर्म के उदय जन्य अविवेक एवं धनलिप्सा का ही माहात्म्य है। आचार्य बार-बार सम्बोधन करते हैं कि एकमात्र धन प्राप्ति ही जीवन का लक्ष्य नहीं है। जीवन जीने की सुविधायें जिससे प्राप्त होती हैं, उस पुण्य एवं पवित्र विचारों को बनाए रखने हेतु धर्म- अपनाने का भी पुरुषार्थ करना चाहिए।
इष्टोपदेश गाथा 15 – द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय पाठ्यक्रम
अन्वयार्थ – (कालस्य निर्गमम् ) समय का व्यतीत होना आयुःक्षय-वृद्धि-उत्कर्ष हेतुं) आयु के क्षय और धन के उत्कर्ष का कारण है (वाञ्छतां धनिनां) धन चाहने वाले धनवान् पुरुषों को (जीवितात्) अपने जीवन से भी (सुतराम्) अधिक (धनं इष्टम्) धन इष्ट होता है।
भावार्थ – मनुष्य के जीवन का एक-एक क्षण अमूल्य है, अपने जीवन में मनुष्य मुनिदीक्षा लेकर यदि तपश्चरण करे तो शुक्लध्यान द्वारा अन्तर्मुहूर्त में केवलज्ञान प्राप्त कर अजर, अमर, अनन्तज्ञानी और अनन्तसुखी बन सकता है, ज्ञान वृद्धि के, चारित्र वृद्धि के, स्वपर उपकार के अनेक महत्त्वपूर्ण कार्य कर सकता है, अच्छा यश प्राप्त कर सकता है, इस कारण बुद्धिमान्, आत्मदर्शी, धर्मात्मा व्यक्ति अपनी आयु के एक-एक क्षण का सदुपयोग करते हैं, परन्तु अपनी आत्मा का महत्त्व न समझने वाले काल का निर्गमन (व्यतीत होना) आयु के क्षय का और धन की वृद्धि का कारण मानते हैं अर्थात् प्रतिक्षण आयु घट रही है और ब्याज में रखा हुआ धन बढ़ रहा है, परन्तु उस काल का ऐसा निगंधन को चाहने वाले धनिक लोगों के जीवन से अधिक धन प्यारा है। काल का व्यतीत होना आयु के क्षय का कारण है फिर भी यह मोही अपने प्राणों के क्षय का विचार न करके यह चाहते हैं कि शीघ्र दिन बीतें और मुझे धन की प्राप्ति हो। ऐसे व्यामोह के कारणभूत धन को धिक्कार है।
उत्थानिका यहाँ पर शिष्य का कहना है कि धन जिससे पुण्य का उपार्जन किया जाता है, वह निंदा के योग्य क्यों है? पात्रों को दान देना, देव पूजा करना आदि क्रियायें पुण्य की कारण हैं, वे सब धन के बिना हो नहीं सकती। इसलिए पुण्य का साधन रूप धन निंद्य क्यों? वह तो प्रशंसनीय ही है। इसलिए जैसे बने वैसे धन को कमाकर पात्रादिकों में देकर सुख के लिए पुण्य संचय करना चाहिए। इस विषय में आचार्य कहते हैं-
स्वाध्याय गाथा सं 13 to 17
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