श्रीअमृतचन्द्राचार्य विरचित पुरुषार्थ सिद्धयुपाय – गाथा 5 मङ्गला संस्कृल टीका एवं दोहानुवाद * मुनि श्री प्रणम्यसागर जी और हिंदी टीका पं० मुन्नालाल रांधेलीय वर्णी
उत्थानिका : अब दोनों नयों के विषय का यहाँ प्रतिपादन किया जाता है –
निश्चयमिह भूतार्थं व्यवहारं वर्णयन्त्यभूतार्थम् ।
भूतार्थबोधविमुख: प्राय: सर्वोऽपि संसार: ॥5॥
अन्वय – इह निश्चयं भूतार्थं व्यवहारं अभूतार्थं वर्णयन्ति। प्रायः भूतार्थबोधविमुखः सर्वोऽपि संसारः ।
अन्वयार्थ – (इह) इस जगत में (निश्वयं) निश्चय नय को (भूतार्थ) भूतार्थ और (व्यवहार) व्यवहार नय को (अभूतार्थ) अभूतार्थ (वर्णयन्ति) वर्णन करते हैं। (प्रायः) बहुलता से (भूतार्थ बोध विमुखः) भूतार्थ के ज्ञान से विमुख (सर्वोऽपि) समस्त ही (संसारः) संसार है।
निश्चय तो भूतार्थ है, अभूतार्थ व्यवहार । लक्ष्य ज्ञान बिन जी रहा, यह सारा संसार ॥५॥
टीकार्थ – व्यवहार और निश्चय को जानने वाले इस संसार में निश्चय नय को भूतार्थ कहते हैं। व्यवहारनिश्चयज्ञाः इस पद की अनुवृत्ति पूर्व सूत्र से लानी चाहिए। भूतार्थ अर्थात् विद्यमान अर्थ, इसका अभिप्राय यह है कि पर उपाधि से रहित वस्तु के यथार्थ स्वरूप को जानना निश्चय नय कहलाता है। अथवा भूतार्थ पदार्थ है प्रयोजन जिसका उसे भूतार्थ नय कहते हैं।
व्यवहार नय को अभूतार्थ कहते हैं। अभूतार्थ अर्थात् अविद्यमान पदार्थ। पर उपाधि की अपेक्षा से जिसमें वस्तु का यथार्थ स्वरूप विद्यमान हो उसे अभूतार्थ कहते हैं। पदार्थ की अशुद्ध अवस्था को विषय करने वाला व्यवहार नय भी कथञ्चित् यथार्थ स्वरूप को प्रकाशित करता है, क्योंकि उस समय वस्तु उसी रूप में अवस्थित है। जैसे मनुष्य पर्याय में रहने वाला आत्मा मनुष्य कहा जाता है। इस प्रकार वस्तु स्वरूप का कथन समझना चाहिए। स्याद्वाद है अमोघ चिह्न जिसका ऐसे जैनागम में किसी भी नय को मिथ्या नहीं कहा है, क्योंकि ये नय परस्पर सापेक्ष होते हैं।
निर्विकल्प समाधि के काल में स्वात्मानुभव करने वालों की अपेक्षा व्यवहार नय अभूतार्थ है, क्योंकि वहाँ निश्चय नय की मुख्यता है। इसी प्रकार व्यहार नय की मुख्यता से स्वाध्याय, वन्दना आदि के काल में निश्चयनय भी अभूतार्थ हो जाता है। वास्तव में दोनों नय दृष्टिभेद की अपेक्षा वस्तु स्वरूप को प्रकाशित करते हैं। जो निश्चय से साक्षात् आत्मा का अनुभव करता है वह सम्पूर्ण नयों के विकल्पों से मुक्त होता है। परमागम में कहा है – व्यवहार नय चपल नहीं है क्योंकि व्यवहार नय से व्यवहारानुसारि शिष्यों की प्रवृत्ति देखी जाती है। इस प्रकार साध्य साधक भाव की अपेक्षा दोनों नय जानने योग्य हैं।
आचार्य अमृतचन्द्र स्वामी ने तत्त्वार्थसार में कहा है “निश्चय और व्यहवार नय की अपेक्षा मोक्ष-मार्ग दो प्रकार का है। उनमें निश्चय मोक्षमार्ग साध्य रूप है और दूसरा व्यवहार मोक्षमार्ग साधन रूप है।” तो भी भूतार्थ बोध से विमुख अर्थात् निश्चय नय के ज्ञान से जो विमुख हैं अर्थात् दूर हैं प्रायः ऐसे जीव संसारी ही हैं। “भूतार्थ बोधविमुखः प्रायः सर्वोऽपि संसारः ।” इस पद से सभी संसारी दुःखी जीवों के प्रति आचार्य महाराज का कारुण्य अमृत उनके चन्द्रमा के समान शीतल वचनों से निर्झरित होता है। इस कथन का तात्पर्य यह है कि नित्य दुःखी संसारी जीवों को कारुण्यामृत और चन्द्रमा के समान शीतल वचनों द्वारा भूतार्थ का ज्ञान दुर्लभ है। दूसरी बात यह है कि व्यवहार नय में लीन रहने वाले पुरुषों को साक्षात्फल संसार ही है किन्तु परम्परा से मुक्तिलाभ भी होता है, ऐसा अवधारित करके कथन किया गया है।
भावार्थ :– “भूतार्थबोधविमुखः प्रायः सर्वोऽपि संसारः” इस वाक्य का विशेषार्थ यह है कि आत्मा का परिणाम निश्चय नय के श्रद्धान से विमुख होकर शरीरादि पर द्रव्यों से एकत्व रूप प्रवर्तन करता है, इसे ही संसार कहते हैं। संसार कोई पृथक् पदार्थ नहीं है। इसलिए जो जीव संसार से मुक्त होना चाहते हैं उनको निश्चय नय का भी यथार्थ स्वरूप समझ कर उसका अवलम्बन करना चाहिए।
जो पदार्थ जिस विवक्षा से विवक्षित किया जाय उसे उसी विवक्षा से घटित करना चाहिए। व्यवहार को छोड़कर कभी भी कोई निश्चय तक नहीं जा सकता। इसलिए व्यवहार नय भी उपादेय है। जिस प्रकार निश्चय को सिद्ध करने वाला व्यवहार का आलम्बन लेता है, उसी प्रकार व्यवहार पर चलने वालों को निश्चय का लक्ष्य रखना भी परम आवश्यक है ॥५॥
हिंदी टीका पं० मुन्नालाल रांधेलीय वर्णी
भावार्थ–-यथार्थ तत्त्वज्ञानके बिना जीवन निष्फल है चाहे वह देवेन्द्र, नरेन्द्र, नागेन्द्र कोई भी हो, क्योंकि वह कभी संसारसे पार नहीं हो सकता, न उनकी अभिलाषा पूरी हो सकती सभी जीव सुख-शान्ति चाहते हैं, दुःख व अशान्ति नहीं चाहते, परन्तु इष्टसिद्धि चाहने मात्रसे नहीं होती। जब तक कि सच्चा उपाय न किया जाय । ऐसी स्थिति में सच्चा उपाय या मार्ग बताने वाले सद्गुरु ही होते हैं, जो ज्ञान-वैराग्य सम्पन्न हैं एवं कुशल वक्ता हैं सथा जिनके स्वपर कल्याणको भी भावना है। इसीलिये उनका कहना है कि सबसे पहले कल्याणार्थी जीवोंको निश्चय और व्यवहार का भेदरूप सम्यग्ज्ञान प्राप्त करना चाहिये और उसके लिये सभी अनुयोगोंके शास्त्रोंका अध्ययन, मनन, धारण करना चाहिये तथा सबका निष्कर्ष निकालकर अन्तर निकालना चाहिये। उसमें जो उपादेय हो उसको ग्रहण करना चाहिये और जो हेय हो उसको छोड़ देना चाहिये। परन्तु निर्णय या परीक्षा बिना यह कार्य नहीं हो सकता है। उसके लिये बाह्य निमित्त मिलानेका एमया करना चाहिये । शास्त्र पढ़ना, प्रमाण-नय-निक्षेप आदिके स्वरूपको जानना, स्मरण रखना, हेय, उपादेय व उपेक्षणीय इन तीन तरहके सेयोंका आनना अनिवार्य है । पश्चात् तदानुकूल क्रिया करना आवश्यक है, ऐसी स्थिति में नयोंका यथार्थ स्वरूप समझना मुख्य कर्तव्य है।
यहाँ पर प्रश्न हो सकता है कि जब लोकव्यवहार था लोकयात्राको चलाने के लिये प्रमाण, मथ और निक्षेप ने तीन साधन माने जाते हैं तब उनमें से पहिले नय-साधनपर जोर क्यों दिया जाता है ? इस समाधान यह है कि जब सारा संसार अज्ञान अंधकारसे व्याप्त हो तथा पूर्ण प्रकाशका मिलना असंभव हो तबएस गाढांधकारके समय कार्य चलानेको तारागणों ( तरइयों) का या छोटे-छोटे दीपकोंका उजेला ( प्रकाश ) ही सहायक या समर्थ होता है किन्तु वह प्रकाश स्पष्ट या निर्मल होना चाहिये, धूमिल या कुहरा जैसा मलीन नहीं होना चाहिए, जिसमें स्पष्ट न दिख पढ़े एवं टकराने की या भूल-भटक हो जानेको संभावना न हो । ठीक उसी तरह अनादिकालसे अज्ञान-अंधकार द्वारा व्याप्त लोकके प्राणियोंको आंशिक कामचलाऊ या लोकव्यवहारचलाक ज्ञान (नयरूप आंशिकज्ञान ) होना अनिवार्य है और वही शक्य व संभव है। परन्तु वह नयरूप आंशिकज्ञान भी स्पष्ट व निर्मल होना चाहिये, धूमिल ( मलीन ) या धोखा देने वाला कुहाकी तरह नहीं होना चाहिए, तभी प्रयोजन या लोकयात्रा या इष्टसिद्धि हो सकती है अन्यथा नहीं । फलतः लोकयात्राके मुख्य साधन नयोंका ठीक-ठीक ज्ञान होना अनिवार्य है क्योंकि वे ही प्रगाढ़ अज्ञानांधकार में हर प्राणियोंको निकालने में समर्थ हैं। इसीसे सदगुरु आचार्य अधिक जोर देते हैं कि निश्चय और व्यवहार दोनों नयों का ज्ञाता होना चाहिए । यद्यपि आरम्भमें व्यवहार अपेक्षणीय है, परन्तु समर्थ अवस्थामें उससे लक्ष्यकी सिद्धि नहीं हो सकती। अर्थात् उस व्यवहाररूप अशुद्ध मान्यतासे शुद्ध स्वरूप वस्तुकी प्राप्ति कदापि नहीं हो सकती, जो अभीष्ट है, क्योंकि शुद्धसे ही शुद्धकी प्राप्ति होती है। इस यथार्थ निर्णय या सिद्धान्तके बल पर ही वस्तुको या लोककी व्यवस्था निराबाध चलती आई है व आगे भी चलेगी । सत्य हमेशा सत्य रहता है और असत्य असत्य ही रहता है। तदनुसार जब जीब ( आत्मा ) के सत्यनय ( निश्चयनय ) का उदय’ या प्रकाश होता है, तभी उसे अपना या दूसरेका यथार्थ रूप अथवा शुद्ध स्वरूप दिखने लगता है और उसीका श्रद्धान या विश्वास होने लगता है एवं वही उसे सुहाता है दूसरा कुछ नहीं सुहासा अर्थात् यही पुरुषार्थसिन्धुपाय उसे प्रिय लगता है, उसीमें उसका उपयोग या चित्त लगता है, यह स्वाभाविक है। हो, जब तक उस शुद्ध स्वरूपका दर्शन या उसको प्राप्ति एवं उसका अनुभव या स्वाद नहीं आता तब तक जोत्र बराबर भूला रहता है और नकलीको असली मानता है व उसीमें संतुष्ट रहता है, जो कूपमंडूक जैसा है अथवा तिलीके तेलको हो सर्वोत्कृष्ट मानता है, या मुड़को ही उत्तम मानता है किन्तु जिसने घीका स्वाद या मिश्रीका स्वाद ले लिया हो वह कभी गलत या नकली धारणा या सत्यता नहीं कर सकता, न करेगा, यह पक्का है, अटल है। फलत: स्वाभावभाव या सहज स्वभावकी अपेक्षासे नय व प्रमाण दोनी साधनोंक द्वारा यथार्थ ज्ञान होता है किन्तु तीसरे साधन (निक्षेप ) द्वारा, व्यवहारका चलाना मात्र माना जाता है, यह सारांश है।।
अनादिसे संयोगीपर्यायमें रहने वाले तमाम जीवोंको पेश्तर पर्यायको अपेक्षा शुद्ध व अशुद्ध का ठीक-ठीक ज्ञान करानेके लिए ही निश्चयचय और व्यवहारनयका उपदेश दिया है कि संशी पंचेन्द्रिय पर्याप्तक जीवोंको निश्चयनय और व्यवहारमय ( साधनरूप ) का स्वरूप जानना अनिवार्य है। क्योंकि वह एक निर्णय करनेकी या सत्य असत्यको पहचाननेकी कसौटी है। उसके साथ-साथ दोनोंकी यथावसर आवश्यकता भी है और उनकी परस्पर संधि या सापेक्षता भी है। कारण कि वस्तु एक स्वभाववाली नहीं है, अनेकस्वभाव ( धर्म ) वाली है तब उसका कथन पूरा तो एक साथ नहीं होता। किन्तु काम-क्रम से होता है लेकिन वे अनेक धर्म उस समय भी वस्तुके साथ-साथ गौणरूपसे ( अविवक्षित ) बराबर मौजूद रहते हैं, नष्ट नहीं हो जाते अथवा दृष्टिके बाहर नहीं हो जाते किन्तु दृष्टि के भीतर ही रहते हैं, जब अमुक धर्मको विवक्षा होती है। ऐसो
१. तिलतलमेव मिष्टं येत न दृष्टं घृत क्यापि ।
अविदितपरवान्दो पदति जनो विषय एवं रमणीयः ।।
अर्थ-—जिस पुरुषने जन्मसे तिलीका तेल ही खाया है, कभी भी नहीं खाया, यह तिलीफे तेलकी ही प्रशंसा (तारीफ) करेगा, क्योंकि उसको दृष्टि में दूसरी कोई श्रेष्ठ वस्तु है ही नहीं उसीका संस्कार है। इसी तरह जिसको विषयिक सुखका ही अनादि से स्वाद आया है अर्थात् जो परारित व्यवहार में ही लीन हो रहा है या पग रहा है किन्तु कभी स्वामित निश्चयरूप आत्मिक सुखका स्वाद नहीं मिला है यह कभी उसकी चाह, मचि या प्रशंसा नहीं करेगा, यह स्वाभाविक संस्कार है । पीलिया रोगीकी तरह (अशुद्ध दृधि वाले को तरह ) यथार्थ वस्तु को देख नहीं सकता इत्यादि समझना ।
*बस, उन्न प्रकारके कथनका नाम हो ‘स्यावाद है । अर्थात् वस्तुमें परस्पर सापेक्ष ( संधिपूर्वक ) रहने वाले अनेक धर्मोंका शब्दशक्तिके अनुसार क्रमशः कथन करना ‘स्याद्वाद’ कहलाता है। इसीका दूसरा माम कथंचितवाद या अपेक्षावाद है । और अनेकान्तवाद उसका विषय है।
१. इसीका नाम ‘स्यात्नय’ है । अर्थात् क्रम-कापसे अनेक धर्मोको जानना, कारण कि भायोपशमिक शानके अंशोंका यही स्वभावहै ( शक्ति है कि थोड़ा-थोड़ा परस्पर सापेक्ष जानना । इस प्रकार ‘स्यावाद या स्यात् नय, वस्तु ( पदार्थ ) को जानने व कहने वाला है इति ।
सापेक्षता परस्पर संब धर्मोकी रहती है। इसीका माम विरोध रहित संधि है, जो कभी पृथक् या विनष्ट नहीं होती। तदनुसार ही वस्तुको जानना व कथन करना। बस. यही अनेकान्तको शैली है या पद्धति है । फलतः निश्चय और व्यवहारसे बस्तुको जाननेके लिए ही आचायंने इस नन्थको रचना की है।
नयोंके भेद व स्वरूप इस इलोकमें नयके निश्चय व व्यवहार ये दो भेद बतलाये हैं और उनका समान्य लक्षण भी बतलाया है जो सर्वत्र व्याप्त (घटित) हो सकता है। भूतार्थ—-निश्चय और अभूतार्थ-व्यवहार यह स्वरूप, आत्मभूत व अनात्मभूत–इन नामोंमें भी व्यवहृत किया जा सकता है अथवा अभिन्न प्रदेश और भिन्न प्रदेश इन दो नामोंमें भी कहा जा सकता है। इसी तथ्यको द्रव्यार्थिक व पर्यायाथिक नामसे भी कहा जाता है । अस्तु ।
आचार्यो ने नयोंके लक्षण, कारण और कार्यको अपेक्षासे किये हैं । यथा—प्रवचनसार गाथा १८९ में शुद्धद्रव्यनिरूपणात्मको निश्चमः’ और ‘अशुद्धद्रव्यनिरूपणात्मको व्यवहारः’ जो मय शुद्ध { परसे भिन्न स्वाश्रित) द्रव्यका या वस्तुका कथन करे, उसको निश्चयन समझना और जो नय, असद्ध या संयोगी द्रक्ष्यका निरूपण करे, उसको व्यवहारनय जाम्वना. ऐसा कहा है। यह तो शब्दनयको अपेक्षा कार्यका प्रदर्शन है, उससे निश्चय और व्यवहारका लक्षण गठित किया गया है और वैसा ही लोकमें कथन किया जाता है। तथा कहीं कहीं कारणको अपेक्षासे भी लक्षण बताया जाता है, जैसे कि दिव्यध्वनि निश्चय और व्यवहार रूप है अर्थात् दिव्यध्वनि पुगलकी { भाषावर्गणाकी ) पर्याय है, ऐसा कहना निश्चयकी कथनी है, इसमें रंचमात्र अभूतार्थता नहीं है। कारण कि पर्याएं सब द्रव्यमे ही हुआ करती हैं जो सत्यरूप हैं, स्वाश्रित है। और दिव्यध्वनि नैमित्तिक है अर्थात् केवल ज्ञानके निमित्तसे प्रकट या उत्पन्न होती है ( पराश्रित है)। अतएव वह व्यवहाररूप है, ऐसा कहना व्यवहारकथन है। यहां पर कारण की अपेक्षा कथन है और उपादानकारण ( भाषावर्गणाएँ पौद्गलिक ) और निमित्तकारण { केवलज्ञानादिक ) हैं। इस प्रकार दो तरहका कथन शब्दों द्वारा होता है अतएव वैसा ही शब्दात्मक लक्षण बनाया गया है। लेकिन अब नयात्मकज्ञान विषय ( ज्ञेय) होने की अपेक्षासे विचार या चिन्तवन या अनुभव किया जाता है तब पदार्थके आंशिक शुद्ध ज्ञान होने या करनेको निश्चयनय कहते हैं और पदार्थ के आंशिक अशुद्ध ज्ञान होनेको व्यवहारनय कहते हैं, यह सिद्धान्त है। परन्तु इसके सम्बन्ध में यह विशेषता है कि केवलीसर्वज्ञका ज्ञान नयात्मक ( खंडरूप) नहीं होता वह सर्वांशरूप युगपत् होता है किन्तु क्षायोपशमिकज्ञानियोंका श्रुत ज्ञान हो नयात्मक होता है और प्रामाणिक होता है। कारण कि वह सापेक्ष होता है, निरपेक्ष नहीं । अर्थात् पदार्थके सर्वांशोसे वह सम्बद्ध या अनुस्यूत रहता है असंबद्ध या अन्ननुस्थत नहीं रहता या उन सबमें प्रदेशभिन्नता नहीं रहता इत्यादि विशेषता समझना । इसीका माम ‘स्यात् ( कथंचित् ) नयज्ञान हैं’, किम्बहुना।
एसो बंधसमासो जोबाणं णिच्छएण णिट्ठिो । अरहंतहिं जदीणं यवहारो अण्णाहा भणिदो ।
निश्वयनय के भेद च लक्षण
निश्वयनय दो भेद होते हैं ( १ ) शुद्धनिश्वयनय ( २ ) अशद्धनिश्चयनय । (१) जो तय, द्रव्य (पदार्थ) के परसे भिन्न शुद्ध स्वरूपका निश्चय करावे या ज्ञान करावे उसको शुध freeurs कहते हैं यह ज्ञानात्मक है तथा जो द्रव्यके शुद्ध स्वरूपका कथन या निरूपण करे उसको उपचारसे निश्चयनय कहते हैं कारण कि शुद्धद्रव्यके निरूपकः शब्दोको यहां पर न ( जानका भेद ) मान लिया जाता है, यही उपचार है। ज्ञान और शब्द जुदे जुड़े है। जैसे कि आत्मा परसे भिन्न ज्ञानदर्शनरूप चेतनाका frue है’ ऐar are atध करानेवाला नय ही शुद्ध निश्चयनका लक्षण व स्वरूप है । ( २ ) तथा रामादिक विकारीभाव आत्मा हैं ऐसा अशुद्ध बोध करानेवाला नय अशुe fraurant लक्षण है। इसका खुलासा इस प्रकार है कि ‘रामादिक विकार या दोष. आत्मा सहज स्वभाव नहीं हैं क्योंकि वह सो गुणी या निर्दोष है– ज्ञानदर्शनसुखबलवाला अनादिसे हो है ( जन्मजात विरासतरूप है ) किन्तु संयोगी पर्याय, जो अनादिसे हो रही है, उसके हैं ( शुद्ध या पृथक आत्मा नहीं हैं ) अथवा औपाधिक एवं विनश्वर हैं सदा (कालिक ) स्थायी नहीं हैं अतएव यह अशुद्धता है। फिर भी ( तथापि ) वे रागादिक विकार आत्माके हो प्रदेशों में होते हैं यह निश्चय या यथार्थ बात है, अतएव उक्त मान्यता या कथममें कुछ सत्यता भो है । फलतः ज्ञानदर्शनादिक ( गुणों ) और रागादिक ( विकारों-दोषों ) दोनोंके एक आत्माके प्रदेशों में ही उत्पन्न होनेसे अशुद्धपना व निश्चयपना दोनों सिद्ध होते हैं। इसप्रकार अशुद्ध निश्चयनया स्वरूप समझना चाहिए ( बृहत् द्रव्य-संग्रह गाथा नं० दार में भी देख लेना ) ।
व्यवहार नय का लक्षण और भेद
१) जो नय, अशुद्धता ( परके संयोग सहितरूप ) का परिचय या बोध करावे उसको व्यवहारनय कहते हैं अर्थात् यह अन्यको अन्यमें मिलाकर बतलाता व कहता है, शुद्ध नहीं बताता. व कहता, यह मेद है | जैसे आत्माको द्रव्यकर्मादि व शरीरादिसे बद्ध या संयुक्त बतलाना व कहना जो अशुद्ध व गलत है क्योंकि आत्मा (जीव ) व द्रव्यकर्मा ( जडपुदगल ) दोनों पृथक-पृथक है, कोई किसी नहीं हैं. सबका गुण-स्वभाव आदि जुदा-जुदा है- तादात्म्यरूप अभेद नहीं है ।
३ तीन भेद हैं ( १ ) भेदाश्रित ( २ ) पराश्रित (३) पर्यायाश्रित | अखंडद्रव्य ( वस्तु ) में खंड कल्पना करना मदाश्रित व्यवहार कहलाता है अर्थात् प्रदेशोंका मेद न होनेपर भी. संख्या स्थापना करना । जैसे कि आत्माको असंख्यात प्रदेशी मानना या कहना इत्यादि । इसी तरह आत्मा या प्रत्येक द्रव्य, स्वाश्रित या स्वाधीन है अथवा स्वसहाय है, परन्तु उसको पराश्रित या परसहाय मानना, कहना भी व्यवहार है। जैसेकि द्रव्योंका सभी कार्य परया निमित्तादिकी सहायता से होता है, इत्यादि व्यवहार ( अभूतार्थं ) है, कारण कि कार्यपर्यायें सब उसी द्रव्यमें उपादानसे ही प्रकट या उत्पन्न होती हैं ऐसी वस्तुस्थिति है । तथा पर्यायोंके द्वारा द्रव्यमें भेद हो जाता है ऐसा मानना व कहना, यह भी व्यवहार है। कारण कि द्रव्य कभी नहीं बदलता, न भेदरूप होता है । जैसे नर नरकादि पर्यायोसे जीव द्रव्य नहीं बदलता, किन्तु वैसा मानना व्यवहार या उपचार हो है । इसप्रकार व्यवहारयके ३ तीन भेद माने गये हैं ।
द्रव्यार्थिक पर्यायार्थिक नय का स्वरूप व भेद
( १ ) जिस नयका उद्देश्य या मुख्य प्रयोजन द्रव्यकी शुद्धताको बताना या ज्ञान कराना हो अर्थात् जो न सिर्फ द्रव्यके शुद्ध स्वरूपको बतलावे उसको द्रव्याथिक कहते हैं । जैसेकि संयोग पर्याय रहित सर्वथा शुद्ध सिद्ध परमात्मा के स्वरूपका ज्ञान कराना, क्योंकि वे सर्वथा शुद्ध अर्थात् कार्यकारणभावसे रहित पूर्ण शुद्ध जीव द्रव्यरूप हैं । संसारदशामें जीवद्रव्य कार्यकारणरूप होता है तथापि आत्मद्रव्य के साथ उनका तादात्म्य सम्बन्ध नहीं होता वह आत्मद्रव्य परसे भिन्नतारूप शुद्ध रहता ही है, अस्तु । द्रव्यार्थिकमय ३ तीन भेद ( उपनयरूप ) माने गये हैं । यथा १) गम ( २ ) संग्रह ( व्यवहार । तोनोंके लक्षण निम्नप्रकार हैं।
(१) जो नय दो पदार्थोंमेंसे एकको मुख्य और दूसरेको गौण करके भेदरूप या अमेदरूप बतलावे ( जनावे ) उसको गमनय कहते हैं। अथवा कार्यके संकल्पमात्रको बतानेवाला नय ( ज्ञान ) नैगमन कहलाता है । जैसे कि रसोई बनाने के संकल्पमात्र करते समय किसीके पूछनेपर fear कर रहे हो ? जवाब देना कि रसोई बना रहे हैं इत्यादि यहाँ कार्य पर्याय द्रव्यका आरोप है।
(२) जो नय, जातिभेद ( विरोध न करके समुदायरूपसे द्रव्य ( पदार्थ ) को ग्रहण करे या बताने उसको संग्रहनय क है। जैसे वृक्षोंके समूहको वन कहना या जानना, का भेद न कर जीवमात्र सबको बराबर मानना ‘यह जोवराशि है इत्यादि ।
(३) जो नय, अभेदसे मेद करे अथवा संग्रहनय द्वारा ग्रहण किये गये पदार्थ से पृथक.पृथक् बतावे या करें, उसको व्यवहारना कहते हैं । जैसे वनमेंसे, यह नीम है, यह सागोन है, यह आम है इत्यादि । या जीवराशिमेंसे, यह त्रस है, यह स्थावर है, यह एकेन्द्री है, यह दो इन्द्रिय है, यह देव है, यह मनुष्य है इत्यादि ।
पर्यायार्थिकनय का स्वरूप व भेद
(२) जिस नयका उद्देश्य द्रव्यको पर्यायमात्रको ( संयोगोपयको ) ग्रहण करने या बतानेका हो अथवा जो नय, मुख्यतासे पर्यायको हो बतावे या कहे, उसको पर्यायार्थिक नय कहते हैं। उसके चार भेद हैं यथा ( १ ) ऋजुसूत्र ( २ ) शब्द ( ३ ) समभिरूढ़ ( ४ ) एवंभूत ।
(१) जो नय भूतभविष्यत् पर्यायको ग्रहण न कर सिर्फ वर्तमान पर्यायको ग्रहण करे या ज्ञात करावे, उसको ऋजुसूत्रनय कहते हैं। जैसे यह पुरुष जवान है इत्यादि ।
(२) जो नय लिंग, वचन, कारक, काल, उपसर्ग आदिके भेदसे पर्याय में भेद करे या जताये, उसको शब्दनय कहते हैं। जैसे-दाराः, भार्या, कलत्र इत्यादि भेद समझना, सभापति उपसभापति इत्यादि।
(३) जो नम लिंगादिकका भेद न कर रूढिरूप अर्थ ( पर्याय ) को ग्रहण करे उसको समभिरूढ़ नय कहते हैं। जैसे-गाय, बैल, घोड़ी, घोड़ा यहाँ लिंग भेद होनेपर भी सबको पशु या तिर्यञ्च बताना। अथवा लिंगादिकका भेद न होनेपर भी जो नय, पर्याय शब्दके भेदसे अर्थात् वर्तमान समयको क्रिया देखकर भेद करता है उसको समभिरूढ़ नय कहते हैं। जैसे देकराज { इन्द्र ) को अन्तःपुर में शचीपति, राज्यसभा ( दरवार ) में इन्द्र, लड़ाई के समय पुरन्दर आदि कहना या जानना।
(५) जो नय शब्दका जैसा अर्थ हो वैसा परिणमते समय ( क्रिया करते समय ) हो वैसा माने या कहे, जिसको एवंभूत नय कहते हैं। जैसे पूजा करते समय ही पुजारी कहना, अन्य समय नहीं इत्यादि ।
व्यवहारनय या उपनयके भेद
(१) सद्भुत व्यवहारनय (२) असद्भुत व्यवहारनय : ३ ) उपचरित व्यवहारनय ( ४ ) अनुपचारित व्यवहारनय ये चार भेद हैं । अर्थात् मूल में व्यवहार के एक सद्भुत व्यवहार, दूसरा असद्भुत व्यवहार दो भेद हैं पश्चात् सद्भूत व्यवहार के उपचरित व अनुपचारित ऐसे दो भेद होते हैं कुल ४ चार भेद समझना चाहिये । अथवा सामान्य संग्रह भेदक व्यवहार व विशेष संग्रह भेदक व्यवहार, कारण कि संग्रहनय द्वारा ग्रहण किये हुए पदार्थों में भेद करना, यही एक मुख्य प्रयोजन व्यवहारनयका है। जैसेकि द्रव्ये ( संग्रहरूप ) जीव व अजीव दो भेद रूप हैं सथा जीव संसारी व मुक्त दो तरहके होते होते हैं इत्यादि भेद करना ।
(२) ऋजुसूत्र के दो भेद-एक सूक्ष्म ऋजुसूत्र, अर्थात् जो एक समय ही स्थित रहे। प्रतिक्षण विनश्वर पर्याय या अर्थपर्यायरूप। दूसरा स्थूल ऋजुसूसूत्र अर्थात् जो अनेक समयतक स्थित रहे । मनुष्य तिर्यञ्चादि व्यंजनपर्यायरूप।
{ ३-४-५ ) शब्द-समभिरूढ़-एवंभूत थे तीनों एक एक भेदरूप ही हैं । इनमें भेद नहीं है । इत्यादि।
१. पदार्थ के एकनय या अंशको ग्रहण करके उसको अनेक या अनेक तरहसे भेष या विकल्पों द्वारा जापित करना या कहना उपनय कहलाता है । यह मूलनयोंका सहायक या धापेक्ष रहता था होता है ।
विशेष-द्रव्यार्थिक नय के १० भेद । पर्यायार्थिक नयके ६ भेद । नैगमनयके ३ भेद । संग्रहनयके २ भेद । व्यवहारनयके २ भेद । ऋजुसूत्रनयके २ भेद । शब्द-ससमभिरूढ़-एवंभूत-नयका १, १ भेद तथा उपनय, सद्भूत व्यवहारके शुद्ध व अशुद्ध दो भेद । उपनय, असद्भुत व्यवहारनयके ३ भेद । उपनय, उपचरित असद्भुत व्यवहारनयके ३ तीन भेद इत्यादि सब विस्ताररूप कथन आलापपद्धति ग्रन्थसे समझ लेना चाहिये।
उपसंहार __ इस श्लोक द्वारा आचार्यने यह बताया है कि अनादिकालमे संयोगी पर्याय में रहते हुए जीव मात्र व्यवहारनय ( अभूतार्थ नयका) आश्रय लेनेके कारण वस्तु (द्रव्य ) के असली स्वरूप या स्वभावको भूल गये हैं अर्थात् नकली या मिथ्या या विपरीत ज्ञानश्रद्धानवाले हो रहे हैं। फलतः उनका आत्मकल्याण होना या मोक्षमार्गको प्राप्त करना दुःशक्य है । अतएव निश्चयनय { भूतार्थ) द्वारा सबका या खासकर मोक्षमार्गापयोगी जीवादि सात तत्त्वोंका असली स्वरूप व स्वभाव जानकार भूल या अज्ञान मिटाना अनिवार्य है क्योंकि उसके बिना जोवो का कल्याण नहीं हो सकता । सारांश यह कि जो जीव सदैव चाहते हैं कि ‘सुखशान्ति प्राप्त हो व दुःख अशान्ति दूर हो उन्हें अभीष्टसिद्धि कदापि नहीं हो सकती जबतक अनादिको भूल न मिटे । वह अनादिकी भूल संक्षेप में अपने या वस्तुके स्वभावको नहीं समझकर उससे विचलित हो जाना एवं परवस्तुको अपना मान लेना है ( कलश २०२ व १७६-१७७ के अनुसार ) अथवा परके साथ अभेद या एकत्त्व करने लगता है, जो भ्रम है–कभी परके साथ एकत्व होता नहीं है अर्थात् तादात्म्य नहीं होता, कारण कि वस्तुका एकत्व विभक्त स्वभाव नियत है । इसप्रकार तथ्यको जानकर रत्नत्रयधर्मको धारणपालन करना चाहिये, यही सार है या मनुष्य जीवनका मुख्य कर्तव्य है।
व्यवहारनय व निश्चयनयके आलम्बनका अर्थ
(१) व्यवहारमय अथवा अभूतार्थ नयके द्वारा बताए गये या जाने गये पदार्थ के अशुद्ध या असत्य स्वरूपको वैसा जानना एवं वैसी श्रद्धा (मान्यता) करना, व्यवहारनयका आलम्बन करना कहलाता है, जो हेय है । (२) निश्चयनय अथवा भूतार्थ नयके द्वारा बताए गये या जाने गये पदार्थके शुद्ध या सत्य स्वरूपको वैसा जानना एवं वैसी श्रद्धा करना निश्चयनयका आलम्बन करना कहलाता है जो उपादेय है ।।५।।
English Translation of Purushartha Siddhi Upay Tika Gatha 5
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