जैन धर्म में तीर्थंकरों को आध्यात्मिक मार्गदर्शक और धर्म के संस्थापक माना जाता है। प्रत्येक तीर्थंकर के जीवन में पांच प्रमुख घटनाएँ होती हैं, जिन्हें पंचकल्याणक कहा जाता है। ये घटनाएँ तीर्थंकर के जीवन के विभिन्न चरणों को दर्शाती हैं और जैन धर्म में अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। आइए इन पाँच कल्याणकों को विस्तार से समझें:
1. गर्भकल्याणक
गर्भ कल्याणक वह शुभ अवसर है जब तीर्थंकर प्रभु की आत्मा माता के गर्भ में प्रवेश करती है। यह घटना साधारण नहीं होती, बल्कि आत्मा के उच्चतम स्तर पर पहुँचने की शुरुआत का प्रतीक है। तीर्थंकर के गर्भ में आते ही माता के मन में असीम शांति और आनंद की अनुभूति होती है। जैन धर्म के अनुसार, माता के गर्भ में तीर्थंकर आत्मा का प्रवेश संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए शुभ संकेत होता है। यह घटना आत्मा की शुद्धता और पवित्रता का प्रतीक मानी जाती है।
प्रातः 7.30 – बजे जिनाज्ञा, देवाज्ञा, धर्माचार्य (आचार्यश्री) श्रीफल अर्पण, प्रतिष्ठाचार्य निमंत्रण
प्रातः 8.00 बजे – घटयात्रा जुलूस (जिसमें मंदिर से प्राचीन मूर्ति एवं प्रतिष्ठेय प्रतिमा रथयात्रा के साथ जायेगी साथ में सौभाग्यवती महिलायें, कुमारिकायें मंगल कलश लेकर चलेंगी यह जुलूस ध्वजाओं-गाजा बाजा सहित प्रस्थान होगा।
प्रातः 9.53 – बजे मंगल ध्वज स्थापन
प्रातः 10.00 बजे – मंडप उद्घाटन, प्रतिष्ठा मंडप, वेदी शुद्धि, मंडप में भगवान विराजमान, अंकुरारोपण, आचार्य संघ आहार चर्या, जाप्यानुष्ठान
दोपहर 12.30 बजे – अंकन्यास, सकलीकरण, इन्द्र प्रतिष्ठा, अभिषेक शांतिधारा, मंडप प्रतिष्ठा, कलश स्थापन, अखण्ड दीप प्रज्ज्वलन, महायागमंडल विधान
सायं 4.00 बजे – माता की गोद भराई
सायं 7.30 बजे – भेरी ताड़न
रात्रि 8.00 बजे – आरती, प्रवचन पश्चात् सौधर्म इन्द्र सभा, तत्व चर्चा, इन्द्रासन कम्पायमान, शचि-सौधर्म इन्द्रवार्ता, धनपति कुबेर को आज्ञा, नगरी रचना, रत्नवृष्टि, महाराज द्वारा याचकों की आशापूर्ति, अष्ट कुमारियों को माता की सेवा में नियुक्त, माता की सेवा, मंगल स्नान, वस्त्राभरण, जिनमाता को भेंट, 16 स्वप्न, स्वप्न फल माता द्वारा शंकाओं का समाधान आदि
रात्रि 10.00 बजे – गर्भ कल्याणक संस्कार (आंतरिक क्रिया)
2. जन्म कल्याणक
जन्म कल्याणक वह घटना है जब तीर्थंकर का जन्म होता है। यह घटना दिव्यता से ओतप्रोत होती है। जन्म के समय तीर्थंकर के माता-पिता और पूरे परिवार को अद्वितीय सुख और गौरव की अनुभूति होती है। जैन ग्रंथों के अनुसार, तीर्थंकर का जन्म ऐसे स्थान पर होता है, जो सांस्कृतिक और आध्यात्मिक रूप से समृद्ध हो। उनकी जन्मस्थली को तीर्थस्थल के रूप में पूजा जाता है। यह घटना एक नई शुरुआत और आध्यात्मिक मार्गदर्शन का प्रतीक है।
प्रातः 7.15 बजे – जाप, नित्याभिषेक, पूजन, शांति हवन
प्रातः 8.30 बजे – भगवान का जन्म, इन्द्रासन कम्पायमान, सौधर्मेन्द्र का ऐरावत हाथी पर बैठकर अन्य इंद्रों सहित जन्म नगरी की ओर प्रस्थान, नगरी की परिक्रमा, इन्द्राणी का प्रसूतिगृह में जिन बालक का प्रथम दर्शन, जिन बालक को इन्द्र को सौंपना, इन्द्र का 1000 नेत्रों से जिन बालक का दर्शन, धूलि कलशाभिषेक, स्वर्ण सौभाग्यवती महिलाओं द्वारा जिन मूर्तियों का प्रोक्षणविधि, दिव्य औषधियों से आकार शुद्धि।
प्रातः 9.30 बजे – आचार्य संघ के मंगल प्रवचन
प्रातः 10.30 बजे – जन्माभिषेक के लिए पाण्डुक शिला की ओर भव्य जुलूस 1008 कलशों से अभिषेक
दोपहर 2.30 बजे – मंदिर वेदी शुद्धि, दिव्य औषधियों से प्रोक्षण, वास्तु विधान, चतुर्दिक्षु होम
सायं 6.30 बजे – आरती-प्रवचन
रात्रि 7.00 बजे – जिन बालक का श्रृंगार, दिव्य वस्त्राभूषण, कर्णभेदन, नामकरण अंगुष्ठ में मधुत्रय की स्थापना, इन्द्र का आनंद नर्तन, पालना, बाल लीला, बाल क्रीड़ा पश्चात् सांस्कृतिक कार्यक्रम।
3. तप कल्याणक
तप कल्याणक वह क्षण है जब तीर्थंकर सांसारिक मोह-माया, धन-दौलत और वैभव को त्यागकर संन्यास ग्रहण करते हैं। यह घटना आत्मा को शुद्ध करने और मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर होने का प्रतीक है। दीक्षा के समय, तीर्थंकर सभी भौतिक बंधनों को त्यागकर केवल आत्मा और धर्म के चिंतन में लीन हो जाते हैं। दीक्षा ग्रहण करना जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ होता है, जो साधना और तपस्या के माध्यम से आत्मा की उन्नति की ओर बढ़ता है।
प्रातः 7.15 बजे – जाप, नित्याभिषेक, पूजन, जन्म कल्याणक पूजा, शान्ति हवन
प्रातः 8.45 बजे – आचार्य संघ के मंगल प्रवचन
प्रातः 9.30 बजे – अन्नप्रासन विधि, बाल क्रीड़ा
दोपहर 1.00 बजे – भगवान का बाल्यकाल का वर्णन, भगवान का विवाह, राजदरबार, 32 हजार मुकुटबद्ध राजाओं की भेंट, राज्याभिषेक, राजतिलक, राजनीति पर भगवान का उपदेश, राजनर्तिका द्वारा नृत्य, राज्य व्यवस्था, वैराग्य, लोकान्तिक देवागमन, वैराग्याभिषेक, स्वर्ण सौभाग्यवती महिलाओं द्वारा वर्ण पूरारात्रिकावर्तनम्, पालकी में बैठकर वन विहार,
सायं 4.00 बजे – दीक्षा विधि संस्कार पश्चात् आचार्य संघ के मंगल प्रवचन
सायं 6.30 बजे – आरती-प्रवचन
रात्रि 8.00 बजे – सांस्कृतिक कार्यक्रम
केवलज्ञान कल्याणक
केवल ज्ञान कल्याणक वह क्षण है जब तीर्थंकर को कैवल्य या केवलज्ञान की प्राप्ति होती है। यह ज्ञान सभी प्रकार के अज्ञान, मोह और भ्रम को समाप्त कर देता है और व्यक्ति को सच्चाई का साक्षात्कार कराता है। तीर्थंकर जब केवलज्ञान प्राप्त करते हैं, तो वे संसार के सभी जीवों के कल्याण के लिए धर्म का उपदेश देना प्रारंभ करते हैं। यह घटना आत्मा की परम अवस्था को दर्शाती है, जहाँ सभी कर्मों का क्षय हो जाता है।
प्रातः 7.30 बजे – जाप, नित्याभिषेक, पूजन, तप कल्याणक पूजा, शान्ति हवन
प्रातः 9.00 बजे – आचार्य संघ के मंगल प्रवचन
प्रातः 9.30 बजे – भगवान की आहारचर्या, पंचाश्चर्य
दोपहर 1.30 बजे – तप संस्कार, मंत्रन्यास, प्रतिष्ठा हवन, अधिवासना नेत्रोन्मीलन, नाभितिलक, गुणारोपण, सूरिमंत्र, प्राण प्रतिष्ठा, मुखोद्घाटन, केवल ज्ञान अभिषेक
सायं 4.00 बजे – समवशरण उद्घाटन, समवशरण में पूजा, दिव्य ध्वनि, शंका समाधान
सायं 6.30 बजे – आरती-प्रवचन
रात्रि 7.30 बजे – सांस्कृतिक कार्यक्रम
निर्वाण कल्याणक
निर्वाण कल्याणक तीर्थंकर के जीवन की अंतिम और सबसे शुभ घटना है। इस घटना में तीर्थंकर सभी कर्मों का नाश कर निर्वाण (मोक्ष) को प्राप्त करते हैं। यह आत्मा के परम शुद्ध और अनंत आनंद की अवस्था है। मोक्ष प्राप्ति के बाद आत्मा कभी भी संसार में जन्म नहीं लेती। तीर्थंकर की मोक्ष स्थली जैन धर्म में तीर्थ स्थान के रूप में पूजनीय होती है।
प्रातः 7.00 बजे – जाप, नित्याभिषेक, शांतिधारा, पूजन, केवलज्ञान कल्याणक पूजा
प्रातः 8.30 बजे – सम्मेदशिखर पर्वत से भगवान का मोक्षगमन, गुणारोपण, मोक्षकल्याणक पूजा, अग्निकुमार देवों द्वारा अग्नि संस्कार, निर्वाण लाडू, संघ पूजा
प्रातः 8.30 बजे – आचार्य संघ का मंगल आशीर्वचन, प्रवचन
प्रात: 9.00 बजे – विश्व शांति महायज्ञ, दशांश पूर्णाहुति, ध्वज अवरोहण, पुण्याहवाचन, शान्तिपाठ विसर्जन
प्रातः 10.00 बजे – मुख्य वेदी में भगवान विराजमान, अभिषेक
प्रातः 11.00 बजे – रथयात्रा पश्चात् सामूहिक भोजन