आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज द्वारा पद्यानुवाद एवं विवेचना
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उत्थानिका-अब वह शिष्य, जिसे समझाये जाने से श्रद्धान उत्पन्न हो रहा है, पूछता है कि जिसे आपने ध्यान करने योग्य रूप से बतलाया है, वह कैसा है? उस आत्मा का क्या स्वरूप है? आचार्य कहते हैं-
स्वसंवेदन सुव्यक्तस्तनुमात्रो निरत्यय: अत्यन्तसौख्यवानात्मा, लोकालोकविलोकन: ॥21॥
अन्वयार्थ – (आत्मा) यह आत्मा (स्वसंवेदन-सुव्यक्तः) आत्म-अनुभव द्वारा स्पष्ट प्रकट होता है/जाना जाता है (तनुमात्रः) शरीर के बराबर है (निरत्ययः) अविनाशी है (अत्यन्तसौख्यवान्) अनन्त सुख वाला है तथा (लोकालोक विलोकनः) लोक और अलोक को जानने देखने वाला है।
पद्यानुवाद
अपने-अपने संवेदन में, अमूर्त हो आतम भाता,
रहा रहेगा त्रिकाल में है, अतः अनश्वर है भ्राता !
तात्कालिक तन प्रमाण होता, अनन्त सुख का निलय रहा,
लोकालोकालोकित करता, सदा लोक का उदय रहा ॥२१॥
English Translation of Ishtopadesh Gatha 21
विवेचना
आचार्य महाराज आत्मा की जब-जब चर्चा करते हैं तब-तब सहज ही प्रश्न होता है कि आत्मा कहाँ पर है? देखने में कैसे आयेगी? क्या आँखों के द्वारा आत्मा देखने में आयेगी? नहीं, छूने पर भी आत्मा अनुभव में नहीं आती। चखने में भी नहीं आती, क्योंकि रसना इन्द्रिय का वह विषय नहीं है। सुनने में भी आत्मा नहीं आता, क्योंकि सुनने में तो शब्द आते हैं। शब्द आत्मा नहीं और आत्मा शब्दमय नहीं अतः आत्मा सुनने में भी नहीं आता। फिर किसके द्वारा ग्रहण में आता है आत्मा ? हमारी समझ में नहीं आता ?
आचार्य महाराज कहते हैं कि आत्मा, इन्द्रिय और मन दोनों से ही समझ में नहीं आता। फिर भी आत्मा है या नहीं ? यह बताओ मुझे। आत्मा तो है, यह अनुभव होता ही है लेकिन कैसे बतायें? शब्दों से कह तो सकते हैं, लेकिन दिखा नहीं सकते। उस सत्य को आँखों से दिखा नहीं सकते। मात्र आस्था की आँखों से उसे देखा जा सकता है। वह आँखों से दिखने की वस्तु ही नहीं है।
अतः आचार्य कहते हैं कि “स्वसंवेदनसुव्यक्तः” अर्थात् आत्मा स्व (अपने) संवेदन में ही आ सकता है। संवेदन का अर्थ-वेदन करना अर्थात् अनुभव करना। सुख का भी वेदन होता है, दुःख का भी होता है और अपने आपका भी वेदन होता है। सुख-दुःख का वेदन करते समय आप यह अनुभव करते हैं कि मैं दुःखी हो गया, मैं सुखी हो गया, इस प्रकार ‘मैं-मैं या हूँ-हूँ’ के साथ वाक्य को पूरा करते हैं। ‘मैं’ और ‘हूँ’ यह स्वसंवेदन का प्रतीक है। उसके माध्यम से हम समझ सकते हैं कि शरीर में ‘आत्म तत्त्व’ अवश्य है। जिसके अभाव में यह शरीर क्या कहलाता है? शव या मुर्दा कहलाता है। जिस प्रकार जब तक तिल में तेल है तब तक उसे तिल कहते हैं, तेल निकलने के बाद उसे खली कहते हैं। खल तो निःसार हो गया, उसमें कुछ सार तत्त्व नहीं रहा। उसी प्रकार इस तन से चेतन निकल जाता है तो आप इस तन को शव या मुर्दा’ कहते हैं अर्थात् स्पष्ट है कि चेतन ‘शिव’ के समान है और तन ‘शव’ है। शव का स्पर्श होने से स्नान की आवश्यकता होती है। स्नान के बिना घर में प्रवेश नहीं कर सकते। जो श्मशान जाते हैं उनसे घर के लोग कहते हैं जाओ- पहले स्नान करो और हाथ से सूखे कपड़ों को छूना नहीं। तात्पर्य यह है कि शव की राख को छूकर आया है इसलिए स्नान करना आवश्यक हो गया। अब उसे राख कह रहे हो, वह तो हमारा भैया था। वे तो हमारे पिता जी थे। नहीं, नहीं अब तो पिता जी नहीं हैं, वह तो अब शव के रूप में है। कहने का मतलब यह है कि आत्मा निकल जाने के बाद वही शरीर अपूज्यनीय, अस्पर्शी बन जाता है। जब तक इसमें चेतनराम रहता है तब तक इसकी कीमत होती है।
हाँ तो विषय यह चल रहा था कि, शरीर अब शव बन गया। इसका अर्थ यह है कि इसमें पहले जब आया था तो यह आत्मा संवेदन में आ रहा था, जिसे नकारा नहीं जा सकता। भले ही उसे दिखाया न जा सके। देखा न जा सके। फिर भी सभी को अनुभव में तो आता ही है अतः यह आत्मा अनुभूत वस्तु है। उसके अभाव में किसी को सुख-शान्ति का अनुभव नहीं हो सकता। संवेदन करने वाला कौन है? इसका बोध भी नहीं हो सकता। सुख-दुःख का संवेदन प्रत्येक प्राणी को होता है, लेकिन इसका संवेदन करने वाला कौन है? इसको कोई नहीं जानता। इसलिए आचार्य, कहते हैं कि स्वसंवेदन योग्य आत्म तत्त्व है, जिसकी ओर हमारा ध्यान ही नहीं जाता इसलिए इसे पढ़ना चाहिए। आचार्य महाराज हमेशा कहते थे “बहुत नहीं बहुत बार पढ़ो।”
पढ़ने वाला कौन? सुनने वाला कौन? सुनकर चिन्तन करने वाला कौन? आदि-आदि प्रश्नों के समाधान में वह आत्म-तत्त्व ही प्रमुख होता है। उसके अभाव में शरीर में कोई क्रिया नहीं होती। न सुनने की, न बोलने की, न खाने-पीने की, न पढ़ने-पढ़ाने की। वह आँखों से देखने में नहीं आता। जो आँखों से देखने में आता है वह जड़ तत्त्व है। देखने वाला आँखों से देखता है, लेकिन आँखों से कभी दिखता नहीं। पाँचों इन्द्रियों से जो वस्तुओं को जानता है, देखता है, सूँघता है, चखता है, सुनता है, स्पर्श करता है, लेकिन स्वयं पाँचों इन्द्रियों का विषय नहीं बनता। आत्मा के पास जानने के बहुत सारे आयाम हैं, उन आयामों का करने वाला जो आत्म-तत्त्व है उसे पहचानो। जिसका अस्तित्व चिरकाल से था, है और आगे अनन्तकाल तक रहेगा। उसको जानना ही सही स्वाध्याय का फल माना जायेगा। इसी को पढ़ो “एक बार नहीं, कई बार पढ़ो।” कितना पढ़ा इसका परीक्षण करो, फिर प्रतिफल निकालो। वह मुझे भी बता देना कि प्रतिफल कितना आया।
जैसे क्लास में मास्टर विद्यार्थियों से पूछते हैं कि होमवर्क करके लाये हो या नहीं ? किया है तो ठीक, अन्यथा क्लास में प्रवेश नहीं करने देते। उस समय विद्यार्थी कहता है-आज क्लास में आने दीजिये। मुझे माफ कीजिये। कल से जरूर होमवर्क करके लायेंगे। उसी प्रकार यहाँ पर भी है एक वर्ष में तीन सौ पैंसठ दिन होते हैं। ऐसे कितने वर्ष हो गये साधना करते-करते फिर भी आत्मा देखने में नहीं आया। पाँचों इन्द्रियों से देखने जानने का प्रयास आज तक विफल रहा। मन भी मोह से प्रभावित रहा, इसलिए मोही मन ने भी आज तक पंचेन्द्रिय के विषयों का ही सेवन किया। उन्हीं का स्मरण किया। उन्हीं की चिन्ता की। इसलिए मन भी आत्म-तत्त्व को जानने में सफल नहीं रहा। इन छहों के अतिरिक्त अन्य कोई ऐसा साधन है ही नहीं जिससे आत्मतत्त्व को जाना जा सके।
अनन्तकाल से भौतिकवाद की चकाचौंध में फँसा हुआ संसारी प्राणी आत्म-तत्त्व से वंचित है अतः वह कहता है कि दुनिया में आत्मतत्त्व नाम की कोई वस्तु है ही नहीं, यदि होती तो आज तक उसकी जानकारी हो जाती। लेकिन ऐसा सोचना उचित नहीं है। उसे जानने का, उसके परिचय लेने का, उसे अनुभूत करने का आज तक प्रयास किया ही नहीं तो कैसे जानने-देखने में आता ? अतः हमने आज तक उसे नहीं जाना और देखा। इसलिए उसका अस्तित्व ही नहीं है ऐसा नहीं कहना चाहिए।
आज सूक्ष्म तत्त्व का शोध हो रहा है। आज ऐसी-ऐसी सूक्ष्म चीजों की गवेषणा हो रही है, जो इन्द्रियों के द्वारा पकड़ में नहीं आती है। गणित, कम्प्यूटर, मशीन आदि से या अन्य मशीनों से खोज की जाती है। पश्चात् उनके प्रतिफल सामने आ जाते हैं। यदि आत्म-तत्त्व मशीनों से गवेषणा योग्य होता, तो निश्चित रूप से वह पकड़ में आ जाता। यहाँ तक कि मरणासन्न व्यक्ति के मरण को देखने का प्रयास किया गया। मरणासन्न व्यक्ति को काँच की पेटी के अन्दर रखा गया कि जब प्राण निकलेंगे या जब शरीर से आत्मा निकलकर जायेगी तो काँच में कहीं न कहीं तो दरार आयेगी! लेकिन आज वैज्ञानिक वस्तुतः जीवात्मक तत्त्व को नहीं पकड़ पाये हैं। काँच में थोड़ी कुछ दरार आई भी तो उसका कारण उन्होंने सूक्ष्म भौतिक तत्त्व को बताया अर्थात् उनके विज्ञान ने भौतिक तत्त्व को ही स्वीकारा लेकिन चेतनात्मक जीव तत्त्व पकड में नहीं आया। अतः विज्ञान ने जीवतत्त्व को नकारने का प्रयास किया। जो दिखता नहीं तो उसे स्वीकार क्यों करें, ऐसी धारणा बनाना उचित नहीं है। इसलिए आचार्यों ने यहाँ हेतु दिया है कि आत्मा स्व-संवेदन द्वारा ही अच्छी तरह व्यक्त होता है। यदि आत्मा होश में आ जाये, ज्ञान में आ जाये तो आत्मा का संवेदन स्वयं आत्मा के द्वारा कर सकता है।
“मैं हूँ, मैं हूँ” इन संवेदनों के माध्यम से हम आत्मतत्त्व को जान सकते हैं और उसके ऊपर विश्वास भी कर सकते हैं, क्योंकि आत्मतत्त्व दिखता नहीं है, अतः उस पर विश्वास करना भी कठिन है। और यह बात भी निश्चित है कि विश्वास उसी पर किया जाता है जो वस्तु देखने में नहीं आती है।
वस्तु यदि देखने में आ रही हो और पकड़ने में नहीं आ रही हो तो भी उसमें विश्वास करने की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि वह साक्षात् दिख रही है। परन्तु जो अनुभव में आ रही हो लेकिन देखने में नहीं आ रही है, तब विश्वास के बल पर अथवा बार-बार संवेदनाओं या अनुभवों के बल पर उसके अस्तित्व को स्वीकार किया जाता है।
आचार्य कहते हैं कि यह आत्मा “तनुमात्रः निरत्ययः” अर्थात् शरीर प्रमाण है। जिसका जितना छोटा-बड़ा शरीर है आत्मा उतने ही बराबर फैलकर शरीर में रहता है। आत्मा के प्रदेशों का प्रभाव शरीर प्रमाण फैला रहता है। एक और विशेषता है इस आत्मा की, कि आज तक इसका जन्म नहीं हुआ इसलिए मर भी नहीं सकता क्योंकि जिसका जन्म होता है वही मरता है। जिसका आदि यानि प्रारम्भ हो या जन्म हो उसी का अन्त होता है। इस प्रकार की अनुभूतियाँ आप सभी को यहीं पर साक्षात् देखने को मिलती हैं। अतः जिसका जन्म नहीं, उसका मरण भी नहीं। तब उसकी सुरक्षा की या उसे सुरक्षित करने के प्रबन्ध की भी आवश्यकता नहीं है। लेकिन शरीर को आत्मा मानकर शरीर की सुरक्षा या प्रबन्ध को यह संसारी प्राणी हमेशा से करता आया है। इसके प्रबन्धन से ही अभिशाप सिद्ध हो रहा है। आत्मा जब मिटता भी नहीं, नया बनता भी नहीं, ज्यों का त्यों बना रहता है, फिर उसका प्रबन्ध किस काम का ? जो कि निरंतर किया जा रहा है।
अस्तित्ववादी को ही यह विश्वास हो सकता है कि जब मिटना ही नहीं है तो संरक्षण किसका ? आगे कहेंगे कि जब मेरा मरण ही नहीं है तो भीति किस बात की ? मरण की हमेशा भीति बनी रहती है। क्यों बनी रहती है? क्योंकि संसारी प्राणी शरीर के मरण को अपना मरण मानता है। उसे यह समझना आवश्यक है कि मर कौन रहा है? जन्म कौन ले रहा है? यह तो केवल शरीर का परिवर्तन होता है। इसमें एक तन का छूटना और दूसरे तन का प्राप्त करना होता है। इस तन का छूटना मरण है और दूसरे नवीन तन का प्राप्त करना जन्म है और कोई विशेष बात नहीं है। अतः आत्मा को निरत्ययः कहा है अर्थात् यह आत्मा हमेशा अजर-अमर अविनाशी है।
वह आत्मा जब तक शरीर में रहता है तब तक शरीर प्रमाण बराबर फैलकर रहता है। जब शरीर से पूर्णरूपेण छूट जाता है अर्थात् निर्वाण को प्राप्त हो जाता है तो जिस शरीर से मुक्ति की प्राप्ति होती है उस अंतिम शरीर से कुछ कम प्रमाण होकर सिद्धालय में हमेशा हमेशा के लिए विराजमान हो जाता है। यही इस जीव तत्त्व का स्वरूप है। “पहले भी आत्मा शरीर में रहा, अभी भी रह रहा है इसलिए आगे भी हमेशा शरीर में ही रहेगा” ऐसा कोई एकान्त नियम नहीं है। यदि पुरुषार्थ किया जाता है तो वह जैसे दूध में से नवनीत पृथक् हो जाता है। उसी प्रकार आत्म पुरुषार्थ से शरीर से पृथक् हो सकता है। इस क्षेत्र में, जिसका विश्वास जिसकी आस्था मजबूत होती है वही सफल हो सकता है। वही इस क्षेत्र में अपने प्रयास को प्रारम्भ कर सकता है।
सच पूछा जाये तो यह बात निश्चित है कि जो व्यक्ति शरीर और आत्मा के पृथक्करण पर अकाट्य श्रद्धान रखता है, अन्य किसी सांसारिक प्रलोभनों से प्रभावित नहीं होता है, तो अल्प समय में ही उसका प्रयास सफल हो सकता है। और यदि समुचित साधन मिल जाते हैं तो अभी न सही, लेकिन आगामी सुयोग्य काल में वह पूर्ण रूप से सफलता प्राप्त कर सकता है। आज पूर्ण रूप से उचित साधन उपलब्ध नहीं हैं अतः आज पूर्ण सफलता भी प्राप्त नहीं हो सकती।
सुनते हैं, कि कुछ ऐसे साधन आज उपलब्ध हैं जिनसे बहुत अल्पसमय में दूध से घी पृथक् हो जाता है। पहले मुझे विश्वास नहीं होता था कि इतने अल्प समय में घी कैसे बन सकता है लेकिन अब विश्वास होने लगा। कच्चे दूध से डॉयरेक्ट घी निकालते हैं यह अल्प समय वाली विधि है। दूसरी दूध को तपाकर मलाई को निकालकर फिर गरम मलाई से घी निकालना और तीसरी विधि है दूध को तपाकर दही जमाकर नवनीत निकालकर, फिर तपाकर नवनीत से घी निकालना। इनमें क्रमशः समय भी अधिक अधिक लगता है और इनके स्वाद एवं गन्ध में भी अन्तर होता है। दूध से डॉयरेक्ट जो घी निकलता है उसमें घृत जैसी गन्ध ही नहीं आती। तपाये हुए दूध से या तपे हुए दूध को जमाकर दही से जो नवनीत और उससे घृत निकलता है, उसकी सुगन्ध दूर-दूर तक फैलती है। अल्प समय वाली विधि से निकला घी टिकाऊ नहीं होता। उसके रूप, र, गन्ध में शीघ्रता से परिवर्तन आ जाता है अर्थात् घी की गन्ध आदि बिगड़ जाती है। लेकिन जो दूध को तपाकर घी निकलता है वह टिकाऊ होता है बहुत दिनों तक उसके रूप, रस, गन्ध आदि में परिवर्तन नहीं आता, सुगंधित बना रहता है, स्वादिष्ट भी रहता है।
जैसे दूध में घृत था। घी का अस्तित्व था। उसे पृथक् किया। उसी प्रकार जो आत्मा शरीर में रह रहा है उसमें भी परमात्मा बनने की शक्ति विद्यमान है। पुरुषार्थ पूर्वक उस शक्ति को प्रकट किया जा सकता है। शरीर में रहते हुए भी आत्मतत्त्व शरीर से स्वतंत्र है। हमेशा अस्तित्वमय है, क्योंकि वह कभी भी मरता मिटता नहीं और नया बनता भी नहीं। अत्यन्त सौख्यवान है। चूँकि सुख उसका स्वभाव है अतः शरीर में रहते हुए भी वह सुख छिपा हुआ है। अर्थात् शरीर में रहते हुए भी वह सुखस्वरूप है।
आत्मा में संवेदन-शक्ति भी विद्यमान है, वह शक्ति भी व्यक्त होती है। जब आत्मा उपयोग में उपयोग को लगाता है, तो राख में छिपी हुई अग्नि जैसे राख हटाने पर व्यक्त हो जाती है वैसे ही कर्मों के आवरण हटने पर उपयोग की पूर्ण शक्ति अर्थात् केवलज्ञान के रूप में व्यक्त हो जाती है। शरीर में रहता हुआ यह आत्म-तत्त्व पूर्ण पुरुषार्थ नहीं कर पा रहा है अतः सुख प्राप्त करने की क्षमता होने पर भी तथा अत्यन्त सौख्यवान होने पर भी सुख की अनुभूति से वंचित है।
यह आत्मा “लोकालोकविलोकनः” लोक अलोक को जानने-देखने की क्षमता वाला है अतः ज्ञाता-दृष्टा स्वभाव वाला माना जाता है। संसारी प्राणी भी देख-जान रहा है लेकिन सबको जानने-देखने की आकुलता करता है। दुनिया को जानने-देखने का प्रयास करता है। “मैं सबको जानें” इसी आकुलता के कारण संक्लेश परिणाम भी करता है। फलतः कषाय करता है, कषाय से बन्ध करता है। कर्म बन्ध होकर उदय आने पर पुनः वही ज्यों का त्यों पूरा का पूरा संसार बना रहता है। यदि आकुलता नहीं करे, समता भाव से अपने आपको जानने का प्रयास करे तो अन्तर्मुहूर्त मात्र में लोक-अलोक को जानने की क्षमता को व्यक्त कर सकता है। ऐसा पुरुषार्थमात्र मानवजीवन में ही किया जा सकता है।
वे सभी जीव महान् हैं, धन्य हैं, जो सारी की सारी झंझटों से दूर रहकर अपने शरीर से अपने को पृथक् करते हुए आत्म-तत्त्व में लीन रहने का पुरुषार्थ करते हैं, ऐसे जीव आसन्न भव्य माने जाते हैं। वे संसार से पार हो जाते हैं।
स्वामी गुणभद्र महाराज ने कहा है कि जिसकी विषयों की ओर से रुचि समाप्त हो गई है किन्तु कषाय का अभाव नहीं हुआ है फिर भी उपशम भाव बना रहता है, संसार के प्रति भीरुता का भाव बना रहता है, प्राणी मात्र के प्रति करुणा-भाव रहता है तो समझ लो उसका संसार का तट निकट आ गया है। निकट भव्य के ये कुछ चिह्न हैं-विषयों में रुचि न होना, तत्त्व-चिन्ता की प्यास बनी रहना और आत्म तत्त्व को देखने का उत्साह बना रहना। इन लक्षणों से हम अपना भविष्य जान सकते हैं। जैसे-ज्योतिषी के माध्यम से भविष्य जानकर विश्वास कर लेते हैं, उसी प्रकार जिनवाणी के वचनों पर इस बात का विश्वास कर लेना चाहिए कि यदि मेरे भीतर उक्त लक्षण आ गये तो समझो संसार तट निकट आ गया क्योंकि संसार तट तो दिखने वाला नहीं है किन्तु उक्त लक्षणावली तो देखने में आ सकती है। इसी से अनुमान लगा लेना चाहिए। जैसे-जहाँ पर पक्षी मंडराते हैं तो अनुमान लगाया जाता है कि आस-पास कहीं सरोवर होना चाहिए। उसी प्रकार यह भी जानने का प्रयास कर लेना चाहिए कि विषय कषाय, भोग इत्यादि के प्रति उदासीनता अथवा उपशम के भाव आ रहे हैं, संसार के प्रति भीरुता आ रही है, कषायों को छोड़ने का आत्म-पुरुषार्थ किया जा रहा है और आत्म-तत्त्व को जानने के प्रति उत्साह जागृत हो रहा है तो समझ लेना चाहिए कि उसका संसार तट निकट आ रहा है।
ऐसे जीवात्मा को जो लोक-अलोक को जानने की क्षमता वाला है” लोकालोकविलोकनः” इस सूत्र के माध्यम से सिद्ध किया है। जो आत्मा को तृणमात्र भी नहीं मानते अर्थात् उसका अस्तित्व स्वीकार नहीं करते, अजर-अमर नहीं मानते, स्वसंवेदन युक्त है ऐसा नहीं मानते हैं, बल्कि वह मात्र भौतिक तत्त्व है, ऐसा मानते हैं, सुख का बल आत्मा में नहीं है, ऐसा भी मानते हैं। अतः आत्मा का स्वभाव लोक-अलोक को जानने का है, ऐसा विश्वास कर लेना चाहिए। यदि इस प्रकार का विश्वास हो जाता है तो फिर क्या-क्या साधना करना चाहिए? आगे उसे बतलाते हैं।
English Translation of Ishtopadesh Gatha 21
इष्टोपदेश गाथा 21 – द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय पाठ्यक्रम
अन्वयार्थ – (आत्मा) यह आत्मा (स्वसंवेदनसुव्यक्तः) आत्म-अनुभव द्वारा स्पष्ट प्रकट होता है [जाना जाता है] (तनुमात्रः) [यह शरीर के बराबर है (निरत्ययः) अविनाशी है (अत्यन्तसौख्यवान्) अनन्त सुख वाला है तथा (लोकालोकविलोकनः) लोक और अलोक को जानने देखने वाला है।
भावार्थ – यह आत्मा स्वसंवेदन आत्मानुभव के द्वारा स्पष्ट होता है, प्रकट होता है, शरीर प्रमाण है, अविनाशी है, अत्यन्त (अनंत) सुखवाला है और लोकालोक को जानने वाला है।
इस श्लोक में आचार्य ने मिध्यादृष्टियों की मान्यता का खण्डन करके वास्तविक आत्मा के स्वरूप का कथन किया है।
जिन दर्शनों का कथन है कि आत्मा स्व को नहीं जानती है, उनके मत का निराकरण करने के लिए ‘स्वसंवेदनसुव्यक्त’ इस शब्द का प्रयोग किया है कि आत्मा स्वज्ञान के द्वारा अनुभव में आता है।
जो आत्मा को वट बीज प्रमाण लघु या सारे आकाश में व्यापक मानते हैं, उनके मत का खण्डन करने के लिए आत्मा शरीर प्रमाण है। न शरीर से छोटा है और न शरीर के बाहर रहता है।
गर्भ से लेकर मरण पर्यन्त ही आत्मा रहती है, यह आत्मा दूसरे भव में नहीं जाती। क्योंकि भूत चतुष्टय से निर्मित है, ऐसा कथन करने वाली चार्वाक के और आत्मा को प्रतिक्षण नाश युक्त मानने वाले बौद्ध मत के दर्शन का निराकरण करने के लिए आत्मा को ‘निरत्यय’ द्रव्य रूप से नित्य कहा है। अर्थात् पर्यायार्थिक नय की अपेक्षा प्रतिक्षण उत्पाद, व्यय होते हुए भी द्रव्यार्थिक नय की अपेक्षा आत्मा नित्य है।
सांख्य और योग तंत्र आत्मा को सुख से रहित मानते हैं उनके दर्शन का निराकरण करने के लिए ‘अत्यन्तसौख्यवान्’ यह विशेषण दिया गया है।
नैरात्मयवादी बौद्धमत का खण्डन करने के लिए आत्मा शब्द का प्रयोग किया है।
‘ज्ञानशून्यचेतन्यमात्रात्मा’ सांख्यमत और ‘बुद्धयादि गुणोज्झितः पुमान्’ योग मत का खण्डन करने के लिए ‘लोकालोकविलोकनः ‘यह विशेषण दिया गया है। अर्थात् आत्मा शक्तिरूप से संसारावस्था में और व्यक्ति रूप से अरिहंत सिद्ध अवस्था में लोक और अलोक को जानने वाला है।
प्रत्येक प्राणी को स्वकीय आत्मा का संवेदन हो रहा है परन्तु मोह के कारण बहिरात्मा को आत्मा का भान नहीं होता है। इसलिए कहा गया है कि आत्मा स्वसंवेदन से व्यक्त है-आत्मानुभव से ही आत्मा का वास्तविक ज्ञान होता है-केवल कथन मात्र और श्रवण मात्र से नहीं। जैसे मिश्री के मधुर रस का ज्ञान स्वयं चखने से होता है, सुनने और कथन करने से नहीं।
उत्थानिका-यहाँ पर शिष्य कहता है कि यदि इस तरह की आत्मा है तो उसकी उपासना कैसे की जानी चाहिए ? इसमें आत्मध्यान या आत्म-भावना करने के उपायों को पूछा गया है। आचार्य कहते हैं – गाथा 22
स्वाध्याय गाथा सं 21
स्वाध्याय गाथा सं 21 & 22
इष्टोपदेश स्वाध्याय Youtube Playlist
गाथा 1 (Gatha 1) | गाथा 2 ( Gatha 2 )| गाथा 3 ( Gatha 3)| गाथा 4 ( Gatha 4) | गाथा 5 ( Gatha 5) | गाथा 6 ( Gatha 6 )| गाथा 7 ( Gatha 7 )| गाथा 8 ( Gatha 8 ) | गाथा 9 ( Gatha 9 ) | गाथा 10 ( Gatha 10)| गाथा 11 ( Gatha 11 )| गाथा 12 ( Gatha 12) | गाथा 13 ( Gatha 13 )| गाथा 14 ( Gatha 14 )| गाथा 15 ( Gatha 15 ) | गाथा 16 ( Gatha 16 )| गाथा 17 ( Gatha 17 )| गाथा 18 ( Gatha 18 )| गाथा 19 ( Gatha 19 )| गाथा 20 ( Gatha 20 )| गाथा 21 | गाथा 22 | गाथा 23 | गाथा 24
English Translation of Ishtopadesh Gatha 21
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इष्टोपदेश – द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय पाठ्यक्रम
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