पद्मनन्दि–पञ्चविंशति : धर्म के गूढ़ रहस्यों का प्रकाश
जैन आगम परंपरा में पद्मनन्दि–पञ्चविंशति एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण एवं गूढ़ ग्रन्थ है। जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट होता है, यह ग्रन्थ आचार्य श्री पद्मनन्दि मुनि द्वारा रचित है तथा इसमें कुल पच्चीस विषयों (अधिकारों) का गहन विवेचन किया गया है। इन विषयों के माध्यम से आत्मकल्याण, धर्म का स्वरूप, जीवदया, चारित्र और मोक्षमार्ग को अत्यंत सूक्ष्मता से प्रस्तुत किया गया है।
1. धर्मोपदेशामृत – धर्म का मूल स्वरूप
श्लोक 1 -7 | श्लोक 8 -13 | श्लोक 14 | श्लोक 15-16 | श्लोक 17-18 | श्लोक 19-20 | श्लोक 21-22 | श्लोक 23-24 | श्लोक 25-26 | श्लोक 27 | श्लोक 28 | श्लोक 29 | श्लोक 30 | श्लोक 31 | श्लोक 32-33 | श्लोक 34-35 | श्लोक 36 | श्लोक 37 | श्लोक 38 | श्लोक 39
इस ग्रन्थ का प्रथम अधिकार ‘धर्मोपदेशामृत’ है, जिसमें कुल 198 श्लोक हैं। इस अधिकार में सबसे पहले यह स्पष्ट किया गया है कि धर्म का उपदेश देने का अधिकारी कौन है।
श्लोक 6 में कहा गया है कि —
जो सर्वज्ञ हो, अर्थात जिसे पूर्ण ज्ञान प्राप्त हो चुका हो, और जो क्रोध, मान, माया एवं लोभ जैसी कषायों से पूर्णतः मुक्त हो, वही सच्चे अर्थों में धर्म का उपदेशक हो सकता है। ऐसा ज्ञानी ही प्रमाण माना गया है, क्योंकि असत्य कथन के केवल दो ही कारण होते हैं—
- अज्ञान
- कषाय (विकार)
जो व्यक्ति विषय का पूर्ण ज्ञान नहीं रखता अथवा राग-द्वेष से ग्रसित है, वह यथार्थ सत्य नहीं कह सकता। अतः केवल वीतराग सर्वज्ञ ही सच्चे धर्मवक्ता हैं।
धर्म – आत्मा की यात्रा का पाथेय
जैसे कोई यात्री एक देश से दूसरे देश की यात्रा करते समय पाथेय (भोजन-सामग्री) साथ रखता है ताकि मार्ग सुखद हो, वैसे ही जब जीव इस लोक से परलोक की यात्रा करता है, तब उसके लिए धर्म ही पाथेय है। यह धर्म आत्मा की उस यात्रा को सरल, सुरक्षित और सुखमय बनाता है।
व्यवहार और निश्चय धर्म
इस ग्रन्थ में धर्म को दो दृष्टियों से समझाया गया है—
🔹 1. व्यवहार धर्म
जिसमें जीवदया, करुणा, अहिंसा, और दूसरों के दुःख को अपना समझना प्रमुख है।
यह धर्म—
- गृहस्थ धर्म
- मुनि धर्म
- रत्नत्रय (सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र)
- उत्तम क्षमा आदि दस धर्मों के रूप में प्रकट होता है।
यह धर्म जीव को नरक व तिर्यंच गति से बचाकर मनुष्य एवं देवगति प्रदान करता है। इसलिए यह उपादेय है, किंतु अंतिम लक्ष्य नहीं।
🔹 2. निश्चय धर्म (शुद्धोपयोग)
निश्चय धर्म वह है जिसमें आत्मा सभी संकल्प-विकल्पों से रहित होकर अपने शुद्ध आनंदस्वरूप में स्थित होती है।
यह धर्म न वाणी से जुड़ा है, न शरीर से — यह आत्मा का सहज स्वरूप है।
यही वह धर्म है जो जीव को चारों गतियों के दुःख से मुक्त कराकर शाश्वत, अजर-अमर पद प्रदान करता है।
जीवदया – धर्मवृक्ष की जड़
ग्रन्थ में जीवदया को धर्मवृक्ष की मूल जड़ बताया गया है। यही जीवदया चारित्र की जननी है और मोक्षरूपी महल पर चढ़ने की सीढ़ी है। यहाँ तक कहा गया है कि— यदि किसी रोगी प्राणी को सम्पत्ति का प्रलोभन देकर भी मारने को कहा जाए, तो वह अपने जीवन को ही सर्वोपरि मानेगा। इसलिए जीवनदान सभी दानों में श्रेष्ठ कहा गया है।
जीवदया के बिना तप, त्याग और व्रत सभी निष्फल हो जाते हैं।
गृहस्थ और मुनि धर्म का संतुलन
यद्यपि मुनिधर्म सर्वोच्च है, फिर भी गृहस्थ धर्म को भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण बताया गया है। क्योंकि—
- मुनियों का जीवन गृहस्थों द्वारा दिए गए आहार पर आधारित होता है।
- जो गृहस्थ छह आवश्यक कर्तव्यों का पालन करते हुए साधुओं की सेवा करता है, वही सच्चा धर्मात्मा है।
इसके विपरीत, जो गृहस्थ केवल धन-संग्रह और भोगों में लिप्त रहते हैं, जिनपूजन व पात्रदान से विमुख रहते हैं, उनका जीवन बंधनस्वरूप ही माना गया है।
श्रावक धर्म और ग्यारह प्रतिमाएँ
गृहस्थ जीवन में श्रावक के लिए ग्यारह प्रतिमाओं का विधान किया गया है। ये प्रतिमाएँ आत्मशुद्धि की क्रमिक सीढ़ियाँ हैं, जिनके द्वारा साधक धीरे-धीरे संयम की ओर बढ़ता है।
किन्तु इन प्रतिमाओं में प्रवेश से पूर्व सात व्यसनों का त्याग अनिवार्य बताया गया है, क्योंकि जब तक मनुष्य व्यसनों में फँसा रहता है, तब तक व्रतों की प्रतिष्ठा संभव नहीं।
ये व्यसन वे हैं जो मनुष्य को कल्याणमार्ग से हटाकर अधोगति की ओर ले जाते हैं। ग्रन्थ में (श्लोक १६–३१) जुआ, मद्य, मांस, वेश्या-गमन आदि व्यसनों का स्वरूप बताते हुए यह भी बताया गया है कि इनके कारण युधिष्ठिर जैसे धर्मात्मा को भी अपार दुःख भोगना पड़ा।
श्रावक और मुनि के व्रतों का अंतर
जहाँ श्रावक हिंसा, असत्य, चोरी, मैथुन और परिग्रह का एकदेशीय त्याग करता है, वहीं मुनि इन पाँचों महाव्रतों का पूर्णतः परित्याग करता है। इसी कारण श्रावक का धर्म देशचारित्र और मुनि का धर्म सकलचारित्र कहलाता है।
मुनि अपने जीवन में—
- सम्यग्दर्शन
- सम्यग्ज्ञान
- सम्यक्चारित्र
रूप रत्नत्रय को धारण करते हुए, मूलगुण, उत्तरगुण, पाँच आचार और दस धर्मों का पालन करते हैं तथा जीवन के अंतिम क्षणों में समाधिमरण (सल्लेखना) की ओर अग्रसर होते हैं।
मूलगुणों की महत्ता
ग्रन्थ में यह अत्यंत प्रभावशाली उपमा दी गई है कि— जो साधु मूलगुणों का पालन किए बिना केवल उत्तरगुणों का अभ्यास करता है, वह उस मूर्ख के समान है जो अपने सिर को काटने वाले शत्रु से रक्षा न करके केवल उँगली बचाने का प्रयास करता है।
मुनियों के २८ मूलगुण बताए गए हैं, जिनमें प्रमुख हैं—
- पाँच महाव्रत
- पाँच समितियाँ
- पाँच इन्द्रियों का संयम
- छह आवश्यक
- लोच
- वस्त्रत्याग
- स्नान त्याग
- भूमिशयन
- दन्तधावन त्याग
- स्थितिभोजन
- एकभक्त (दिन में एक बार भोजन)
दिगम्बरत्व की महिमा
आचार्य पद्मनन्दि ने विशेष रूप से दिगम्बरता (वस्त्रत्याग) का समर्थन किया है। वे कहते हैं—
- वस्त्र मलिन होने पर उसे धोने के लिए हिंसात्मक क्रियाएँ करनी पड़ती हैं।
- फटने पर मन में व्याकुलता और पराश्रय उत्पन्न होता है।
- चोरी होने पर क्रोध उत्पन्न होता है।
इस प्रकार वस्त्र मुनि-मार्ग में बाधक बनते हैं। अतः निर्ग्रन्थता (दिगम्बरता) ही संयम की सच्ची साधना है। यहाँ तक कहा गया है कि यदि कोई साधु भोगाकांक्षा से युक्त होकर गृहस्थों के धन या साधनों में आसक्ति रखे, तो वह मुनिधर्म से गिर चुका माना जाता है। इसे कलियुग का प्रभाव कहा गया है (श्लोक ५३)।
साधु, आचार्य और उपाध्याय का स्वरूप
ग्रन्थ में साधु, आचार्य और उपाध्याय – तीनों के स्वरूप का पृथक्-पृथक् विवेचन किया गया है (श्लोक ५९–६१)। तत्पश्चात् सच्चे साधुओं की महिमा का वर्णन करते हुए उनसे आत्मकल्याण की प्रार्थना की गई है। यद्यपि वर्तमान भरतक्षेत्र में केवलज्ञानी नहीं हैं, फिर भी उनके द्वारा प्रवाहित जिनवाणी (आगम) उपलब्ध है और उसके संवाहक ये साधुजन हैं। इसलिए उनकी उपासना ही जिनेन्द्र देव की उपासना के समान है।
जहाँ उनके चरण पड़ते हैं, वह भूमि तीर्थ बन जाती है। उनके नामस्मरण मात्र से भी पाप नष्ट हो जाते हैं।
रत्नत्रय का रहस्य
ग्रन्थ में रत्नत्रय का गूढ़ विवेचन इस प्रकार किया गया है—
🔹 व्यवहार रत्नत्रय
- देव, गुरु और धर्म में श्रद्धा — सम्यग्दर्शन
- तत्त्वों का यथार्थ ज्ञान — सम्यग्ज्ञान
- पापों से विरति — सम्यक्चारित्र
यह रत्नत्रय संसार का कारण है, क्योंकि यह शुभ-अशुभ कर्मों से जुड़ा है।
🔹 निश्चय रत्नत्रय
- आत्मा के शुद्ध स्वरूप में श्रद्धा — सम्यग्दर्शन
- उसी का बोध — सम्यग्ज्ञान
- उसी में स्थित होना — सम्यक्चारित्र
यह निश्चय रत्नत्रय ही कर्मबंधन का मूलोच्छेदक और मोक्ष का कारण है।
उत्तम क्षमा – साधना की आधारशिला
मुमुक्षु तपस्वी का लक्षण यह बताया गया है कि वह अज्ञानवश किए गए अपकारों को भी शांत भाव से सहन करता है। जो साधक दूसरों द्वारा दी गई पीड़ा में भी क्रोध नहीं करता, वही वास्तव में उत्तम क्षमा का धारक है।
यही उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जव आदि दस धर्म, संवर के कारण बनते हैं — अर्थात् कर्मों के आगमन को रोकते हैं। ग्रंथ में इन दस धर्मों का पृथक्-पृथक् विवेचन (श्लोक ८२–१०६) किया गया है, जिससे साधक अपने जीवन में उनका अभ्यास कर सके।
सुख की भ्रांति और वास्तविक सुख का स्वरूप
सभी प्राणी दुःख से डरते हैं और सुख की चाह रखते हैं, परन्तु विडम्बना यह है कि अधिकांश लोग सुख को पहचान ही नहीं पाते। वे इन्द्रियजन्य सुख को ही वास्तविक सुख मान लेते हैं।
ग्रंथ स्पष्ट करता है कि—
जो सुख सातावेदनीय कर्म के उदय से क्षणिक रूप में अनुभव होता है, वह यथार्थ सुख नहीं है।
जिस वस्तु के संयोग से सुख प्रतीत होता है, उसके वियोग से पुनः दुःख उत्पन्न होता है। अतः वह सुख वास्तव में दुःख का ही कारण है।
सच्चा सुख तो आकुलता के अभाव में है, जो केवल मोक्ष अवस्था में प्राप्त होता है। वहाँ आत्मा शुद्ध, निराकुल और अनन्त आनन्दमयी होती है — यही शाश्वत सुख है (१०९)।
आत्मा का सत्य स्वरूप
आत्मा के स्वरूप को जानने में केवल उसी वाणी को प्रमाण माना गया है जो—
- सर्वज्ञ द्वारा कही गई हो
- राग-द्वेष से रहित हो
ऐसी वाणी में आत्मा को ही उपादेय और शेष सबको हेय बताया गया है।
वर्तमान काल में मनुष्य की आयु और बुद्धि सीमित होने से सम्पूर्ण श्रुत का अध्ययन संभव नहीं है। इसलिए मोक्षमार्ग के साधक को चाहिए कि वह संक्षिप्त किन्तु सारभूत श्रुत का अभ्यास करे (१२४–१२७)।
विभिन्न दर्शनों की आत्म-कल्पनाएँ
ग्रंथ में विभिन्न दर्शनों की आत्मा संबंधी मान्यताओं का भी विवेचन है—
- माध्यमिक आत्मा को शून्य मानते हैं
- चार्वाक उसे पंचभूतों से उत्पन्न जड़ तत्व मानते हैं
- सांख्य आत्मा को अकर्ता कहते हैं
- सौत्रान्तिक उसे क्षणिक मानते हैं
- वैशेषिक उसे नित्य और व्यापक मानते हैं
इन सभी मतों की समीक्षा कर यह सिद्ध किया गया है कि आत्मा चेतन, स्वतंत्र और कर्मों से बंधन-मुक्त होने की क्षमता रखने वाली सत्ता है (१३४–१३९)।
दुर्लभ मनुष्य-पर्याय और उसका महत्व
यह मनुष्य-पर्याय अत्यन्त दुर्लभ है। अनन्त काल में कठिनाई से प्राप्त होती है। यदि इसे पाकर भी मनुष्य मिथ्या उपदेशों में फँस जाए, विषयों में लिप्त रहे या धर्म से विमुख रहे — तो यह जीवन व्यर्थ चला जाता है।
यहाँ तक कहा गया है कि—
जो मनुष्य हाथ में आए हुए अमूल्य रत्न को फेंक देता है, वही स्थिति उस व्यक्ति की है जो धर्म का आचरण नहीं करता।
कई लोग यह सोचकर धर्म टालते हैं कि अभी आयु शेष है, शरीर समर्थ है, सुख-साधन उपलब्ध हैं — परंतु मृत्यु का कोई निश्चित समय नहीं। इसलिए यह सोच अज्ञानपूर्ण है (१६७–१७०)।
विवेकवान वही है…
जो व्यक्ति इस दुर्लभ मानव जीवन को पाकर—
- विषय तृष्णा से मुक्त होता है
- आत्मकल्याण का मार्ग अपनाता है
- और धर्म का आश्रय लेता है
वही वास्तव में बुद्धिमान है (१७१–१७८)।
द्वादश वर्षीय स्वाध्याय पाठ्यक्रम पद्मनन्दि पंचविंशतिका सारांश
पद्मनन्दि पंचविंशतिका स्वाध्याय
जैन धर्मं और दर्शन Jain Dharm Aur Darshan
- भक्तामर स्तोत्र 48 दीपकों के साथ रिद्धि-सिद्धि मंत्रों से
- Shri Jin-Sahasranam Stotra
- तत्वार्थ सूत्र (Tattvartha sutra) अध्याय 1 | अध्याय 2 | अध्याय 3 | अध्याय 4 | अध्याय 5 | अध्याय 6 | अध्याय 7 | अध्याय 8 | अध्याय 9 | अध्याय 10
- श्री शांतिनाथ मण्डल विधान पूजन
- सुगन्ध दशमी मण्डल विधान
- रत्नत्रय विधान
- Shri Mahaveer Vidhan
- Deepawali Puja
- Vardhman Stotra
- Ishtopadesh इष्टोपदेश | गाथा 1 | गाथा 2 | गाथा 3 | गाथा 4 | गाथा 5


