Summary of Ādi purāṇa Parv 40 by Acharya Jinasena
संक्षिप्त सारांश: आदिपुराण पर्व 40 (श्लोक 1 से 223)
आदिपुराण पर्व 40 में मंत्रों, पूजा विधियों, और ब्राह्मण व्रतचर्या का वर्णन है। श्लोक 1-81 में मंत्रकल्प, पीठिका, काम्य, निस्तारक, ऋषि, सुरेंद्र, और परमेष्ठी मंत्रों का उल्लेख है, जो जिनेंद्रदेव की पूजा, विघ्न शांति, और छह परम स्थानों की प्राप्ति के लिए हैं। श्लोक 82-91 में गार्हपत्य, आहवनीय, और दक्षिणाग्नि की स्थापना और पूजा का वर्णन है, जो अरहंतदेव के संबंध से पवित्र होती हैं। श्लोक 92-151 में गर्भाधान, प्रीति, सुप्रीति, धृति, मोद, प्रियोद्भव, जन्म संस्कार, नामकर्म, बहिर्यान, निषद्या, अन्नप्राशन, व्युष्टि, और चौल मंत्र दिए गए हैं, जो उत्तम जन्म, कल्याण, विजय, और निर्वाण की प्रार्थना करते हैं। श्लोक 152-171 में लिपिसंख्यान और उपनीति मंत्रों के साथ यज्ञोपवीत, व्रत, और ब्रह्मचर्य का महत्व बताया गया है। श्लोक 172-211 में उपासकाध्ययन के दश अधिकार (अतिबाल विद्या, कुलावधि, वर्णोत्तमत्व, पात्रत्व, सृष्टयधिकारिता, व्यवहारेशिता, अवध्यत्व, अदण्डधता, मानार्हता, प्रजासम्बन्धान्तर) वर्णित हैं, जो द्विजों की शुद्धता, गुणवत्ता, और धर्म रक्षा को सुनिश्चित करते हैं। श्लोक 212-223 में मंत्रों की सिद्धि, व्रतचर्या, और महाराज भरत द्वारा ब्राह्मणवर्ण की स्थापना का वर्णन है, जिन्होंने वृषभदेव के मतानुसार ब्राह्मणों को सदाचार में स्थिर कर सन्मानित किया।
हिन्दी-भाषानुवाद पर्व 40
श्लोक 1 से 11 मंत्रकल्प और पूजा विधि
इस खंड में मंत्रों के उद्धार और पूजा विधि का वर्णन है। मुनियों की कार्य सिद्धि मंत्रों पर निर्भर होती है। आधानादि क्रियाओं में तीन छत्र, तीन चक्र, और तीन अग्नियों की स्थापना करनी चाहिए। वेदी के मध्य में जिनेंद्रदेव की प्रतिमा स्थापित कर उनकी पूजा मंत्रकल्प कहलाती है। भूमि शुद्धि के लिए ‘नीरजसे नमः’ मंत्र का उच्चारण करना चाहिए, जो विशुद्धि प्रदान करता है। इसके बाद डाभ का आसन ग्रहण कर ‘दर्पमथनाय नमः’ मंत्र से विघ्न शांति, और गंध, पुष्प, अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य अर्पण के लिए विशिष्ट मंत्रों (‘शीलगन्धाय नमः’, ‘विमलाय नमः’, ‘अक्षताय नमः’, ‘श्रुतधूपाय नमः’, ‘ज्ञानोद्योताय नमः’, ‘परमसिद्धाय नमः’) का प्रयोग करना चाहिए। अंत में, पीठिका मंत्र जैसे ‘सत्यजाताय नमः’ और ‘अर्हज्जाताय नमः’ पढ़े जाते हैं।
श्लोक 12 से 23 पीठिका मंत्रों का विस्तार
इस खंड में पीठिका मंत्रों का क्रमिक वर्णन है। ‘परमजाताय नमः’, ‘अनुपमजाताय नमः’, ‘स्वप्रधानाय नमः’, ‘अचलाय नमः’ आदि मंत्रों का उच्चारण किया जाता है, जो जिनेंद्रदेव के गुणों (अनंत ज्ञान, दर्शन, वीर्य, सुख) और उनकी निर्मलता, अक्षयता, अजर-अमरता को दर्शाते हैं। ‘परमकाष्ठयोगरूपाय नमः’, ‘लोकाग्रवासिने नमो नमः’, और ‘परमसिद्धेभ्यो नमो नमः’ जैसे मंत्र सिद्धों की स्तुति करते हैं। अंत में, सम्यग्दृष्टि, आसन्नभव्य, निर्वाणपूजार्ह की सम्बोधन में दो-दो बार उच्चारण कर ‘अग्नीन्द्र स्वाहा’ मंत्र पढ़ा जाता है।
श्लोक 24 से 31 काम्य मंत्र और जाति मंत्र
यह खंड काम्य मंत्रों और जाति मंत्रों पर केंद्रित है। ‘सेवाफलं षट्परमस्थानं भवतु’ आदि मंत्रों से छह परम स्थानों की प्राप्ति, अपमृत्यु नाश, और समाधिमरण की कामना की जाती है। जाति मंत्रों में ‘सत्यजन्मनः शरणं प्रपद्यामि’, ‘अर्हज्जन्मनः शरणं प्रपद्यामि’, और ‘रत्नत्रयस्य शरणं प्रपद्यामि’ जैसे मंत्र जिनेंद्रदेव, उनकी माता, पुत्र, और रत्नत्रय के शरणागत होने को दर्शाते हैं। सम्यग्दृष्टि, ज्ञानमूर्ति, सरस्वती की सम्बोधन में ‘स्वाहा’ के साथ मंत्र पढ़े जाते हैं।
श्लोक 32 से 42 निस्तारक और ऋषि मंत्र
निस्तारक मंत्रों में ‘सत्यजाताय स्वाहा’, ‘अर्हज्जाताय स्वाहा’, ‘षट्कर्मणे स्वाहा’, और ‘देवब्राह्मणाय स्वाहा’ आदि मंत्रों का प्रयोग छह कर्मों, श्रावकों, और ब्राह्मणों के लिए हवि अर्पण हेतु किया जाता है। ऋषि मंत्रों में ‘निर्ग्रन्थाय नमः’, ‘वीतरागाय नमः’, ‘महाव्रताय नमः’, और ‘गणधराय नमः’ जैसे मंत्र निर्ग्रन्थ, वीतराग, और गणधरों की स्तुति करते हैं। सम्यग्दृष्टि, भूपति, नगरपति, और कालश्रमण की सम्बोधन में ‘स्वाहा’ के साथ मंत्र पढ़े जाते हैं।
श्लोक 43 से 51 ऋषि मंत्रों का संग्रह और सुरेंद्र मंत्र
इस खंड में ऋषि मंत्रों का संग्रह और सुरेंद्र मंत्रों का प्रारंभ है। ऋषि मंत्रों में ‘विविधर्द्धये नमः’, ‘अङ्गधराय नमः’, और ‘परविभ्यो नमो नमः’ शामिल हैं। सुरेंद्र मंत्रों में ‘दिव्यजाताय स्वाहा’, ‘नेमिनाथाय स्वाहा’, ‘सौधर्माय स्वाहा’, और ‘अहमिन्द्राय स्वाहा’ जैसे मंत्र देवेंद्रों, सौधर्मेंद्र, और उनके अनुचरों को हवि अर्पण के लिए हैं। सम्यग्दृष्टि, कल्पपति, दिव्यमूर्ति, और वज्रनामन् की सम्बोधन में ‘स्वाहा’ मंत्र पढ़ा जाता है।
श्लोक 52 से 62 सुरेंद्र और परमराजादि मंत्र
सुरेंद्र मंत्रों का संग्रह पूरा होने के बाद परमराजादि मंत्रों का वर्णन है। ‘अनुपमेन्द्राय स्वाहा’, ‘विजयार्चजाताय स्वाहा’, और ‘नेमिनाथाय स्वाहा’ जैसे मंत्र चक्रवर्ती और उत्कृष्ट जन्म वालों के लिए हैं। सम्यग्दृष्टि, उग्रतेजः, दिशांजय, और नेमिविजय की सम्बोधन में ‘स्वाहा’ मंत्र के साथ काम्य मंत्र पढ़े जाते हैं, जो छह परम स्थानों की प्राप्ति और समाधिमरण की कामना करते हैं।
श्लोक 63 से 71 परमेष्ठी मंत्रों का प्रारंभ
परमेष्ठी मंत्रों में ‘सत्यजाताय नमः’, ‘परमजाताय नमः’, ‘परमार्हताय नमः’, और ‘परमरूपाय नमः’ जैसे मंत्र उत्कृष्ट जन्म, धर्म, और निर्ग्रन्थ रूप की स्तुति करते हैं। ‘परमगुणाय नमः’, ‘परमस्थानाय नमः’, ‘परमयोगिने नमः’, और ‘परमविज्ञानाय नमः’ मंत्र परम गुण, मोक्ष, योग, और ज्ञान की महिमा गाते हैं। ये मंत्र परमेष्ठियों के अनंत गुणों को दर्शाते हैं।
श्लोक 72 से 81 परमेष्ठी मंत्रों का संग्रह और समापन
इस खंड में परमेष्ठी मंत्रों का पूर्ण संग्रह है, जिसमें ‘परमवीर्याय नमः’, ‘सर्वज्ञाय नमः’, ‘परमेष्ठिने नमो नमः’, और ‘परमनेत्रे नमो नमः’ शामिल हैं। सम्यग्दृष्टि, त्रिलोकविजय, धर्ममूर्ति, और धर्मनेमि की सम्बोधन में ‘स्वाहा’ के साथ मंत्र पढ़े जाते हैं। ये सात पीठिका मंत्र ब्राह्मणों द्वारा गर्भाधानादि क्रियाओं में सिद्धपूजन के लिए हैं। ये मंत्र संध्याओं में आहुति मंत्र और साधन मंत्र के रूप में भी प्रयुक्त होते हैं। सिद्ध प्रतिमा के समक्ष 108 बार जप, गंध-पुष्प अर्पण, और शुद्ध वस्त्र धारण कर इन मंत्रों से क्रिया करनी चाहिए।
श्लोक 82 से 91 अग्नियों की स्थापना और पूजा
क्रियाओं के प्रारंभ में उत्तम द्विजों को रत्नत्रय का संकल्प कर अग्निकुमार देवों के इंद्र के मुकुट से उत्पन्न तीन प्रकार की अग्नियाँ (गार्हपत्य, आहवनीय, दक्षिणाग्नि) स्थापित करनी चाहिए। ये अग्नियाँ तीर्थंकर, गणधर, और सामान्य केवली के निर्वाण महोत्सव में पूजा का अंग होकर पवित्र मानी जाती हैं। इन्हें तीन कुंडों में स्थापित कर मंत्रों द्वारा पूजा करनी चाहिए। पूजा करने वाला द्विजोत्तम और नित्य पूजा करने वाला अग्निहोत्री कहलाता है। गार्हपत्य से नैवेद्य, आहवनीय से धूप, और दक्षिणाग्नि से दीप जलाया जाता है। इन अग्नियों की रक्षा करनी चाहिए और असंस्कृत व्यक्तियों को नहीं देनी चाहिए। अग्नि स्वयं पवित्र नहीं, परंतु अरहंतदेव की पूजा के संबंध से पवित्र हो जाती है। जैन ब्राह्मणों को व्यवहार नय से अग्नि पूजा करनी चाहिए, जो निर्वाण क्षेत्र की पूजा के समान दोषरहित है। सामान्य मंत्रों के बाद विशेष क्रियाओं के मंत्रों का वर्णन किया गया है।
श्लोक 92 से 101 गर्भाधान, प्रीति, सुप्रीति, और धृति मंत्र
गर्भाधान मंत्रों में ‘सज्जातिभागी भव’, ‘सद्गृहिभागी भव’, ‘मुनीन्द्रभागी भव’, ‘सुरेन्द्रभागी भव’, ‘परमराज्यभागी भव’, ‘आर्हन्त्यभागी भव’, और ‘परमनिर्वाणभागी भव’ मंत्रों का उच्चारण कर उत्तम जन्म, गृहस्थ, मुनि, इंद्र, चक्रवर्ती, अरहंत, और निर्वाण की प्राप्ति की कामना की जाती है। प्रीति मंत्रों में ‘त्रैलोक्यनाथो भव’, ‘त्रैकाल्यज्ञानी भव’, और ‘त्रिरत्नस्वामी भव’ मंत्र त्रिलोक के स्वामी, त्रिकालज्ञानी, और रत्नत्रय के स्वामी होने की प्रार्थना करते हैं। सुप्रीति मंत्रों में ‘अवतारकल्याणभागी भव’, ‘मन्दरेन्द्राभिषेककल्याणभागी भव’, ‘निष्क्रान्तिकल्याणभागी भव’, ‘आर्हन्त्यकल्याणभागी भव’, और ‘परमनिर्वाणकल्याणभागी भव’ मंत्र गर्भ, अभिषेक, निष्क्रमण, केवलज्ञान, और निर्वाण कल्याणों की प्राप्ति के लिए हैं। धृति मंत्र गर्भाधान मंत्रों में ‘दातृ’ शब्द जोड़कर बनते हैं, जैसे ‘सज्जातिदातृभागी भव’, जो इन पदों को देने वाले होने की प्रार्थना करते हैं।
श्लोक 102 से 112 मोद और प्रियोद्भव मंत्र
मोद क्रिया के मंत्रों में ‘सज्जातिकल्याणभागी भव’, ‘सद्गृहिकल्याणभागी भव’, ‘वैवाहकल्याणभागी भव’, ‘मुनीन्द्रकल्याणभागी भव’, ‘सुरेन्द्रकल्याणभागी भव’, ‘मन्दराभिषेककल्याणभागी भव’, ‘यौवराज्यकल्याणभागी भव’, ‘महाराज्यकल्याणभागी भव’, ‘परमराज्यकल्याणभागी भव’, और ‘आर्हन्त्यकल्याणभागी भव’ मंत्र उत्तम जन्म, गृहस्थ, विवाह, मुनि, इंद्र, अभिषेक, युवराज, महाराज, चक्रवर्ती, और अरहंत कल्याणों की प्राप्ति के लिए हैं। प्रियोद्भव मंत्रों में सिद्ध भगवान की पूजा के बाद ‘दिव्यनेमिविजयाय स्वाहा’, ‘परमनेमिविजयाय स्वाहा’, और ‘आर्हन्त्यनेमिविजयाय स्वाहा’ मंत्रों का उच्चारण कर कर्म शत्रुओं पर विजय की प्रार्थना की जाती है। जन्म संस्कार में गंधोदक से अभिषेक कर माता के गुणों (शीलवती, सन्तानवती, भाग्यवती, अवैधव्य, सम्यग्दृष्टि) का वर्णन कर ‘दिव्य चक्र’, ‘विजय चक्र’, और ‘परम चक्र’ प्राप्ति का आशीर्वाद दिया जाता है।
श्लोक 113 से 121 जन्म संस्कार की विधि
जन्म संस्कार में पिता पुत्र के अंगों का स्पर्श कर ‘हे पुत्र, तू मेरे अंग-अंग से उत्पन्न हुआ है, मेरा आत्मा है, सैकड़ों वर्ष जीवित रह’ कहता है। ‘घातिजयो भव’ मंत्र पढ़कर नाभि नाल काटी जाती है। ‘श्रीदेव्यः ते जातक्रियां कुर्वन्तु’ कहकर सुगंधित चूर्ण से उबटन, ‘त्वं मन्दराभिषेकार्हो भव’ मंत्र से स्नान, और ‘चिरं जीव्या:’ मंत्र से अक्षत डाले जाते हैं। ‘नश्यात् कर्ममलं कृत्स्नम्’ मंत्र से औषधीय घी मुख और नाक में डाला जाता है। ‘विश्वेश्वरीस्तन्यभागी भूयाः’ मंत्र से माता का स्तन मंत्रित कर बालक को पिलाया जाता है। जरायु पटल को मंत्र पढ़कर पवित्र भूमि में गाड़ा जाता है।
श्लोक 122 से 131 जन्मोत्सव और माता का स्नान
जरायु पटल को ‘सम्यग्दृष्टे सम्यग्दृष्टे सर्वमातः सर्वमातः वसुन्धरे वसुन्धरे स्वाहा’ मंत्र से मंत्रित कर जल, अक्षत, और पांच रत्नों के साथ गाड़ा जाता है। ‘त्वत्पुत्रा इव मत पुत्राः चिरंजीविनी भूयासुः’ मंत्र से पुत्र की चिरंजीविता की प्रार्थना की जाती है। माता को क्षीर वृक्ष की डालियों से सजाकर मंत्रित गर्म जल से स्नान कराया जाता है, जिसमें ‘सम्यग्दृष्टे सम्यग्दृष्टे आसन्नभव्ये आसन्नभव्ये विश्वेश्वरि विश्वेश्वरि ऊर्जितपुण्ये ऊर्जितपुण्ये जिनमातः जिनमातः स्वाहा’ मंत्र पढ़ा जाता है। तीसरे दिन ‘अनन्तज्ञानदर्शी भव’ मंत्र से पुत्र को तारों भरा आकाश दिखाया जाता है। पुण्याहवाचन, दान, और जीवों को अभय दान देकर जन्मोत्सव सम्पन्न होता है।
श्लोक 132 से 142 नामकर्म, बहिर्यान, निषद्या, और अन्नप्राशन मंत्र
नामकर्म में सात पीठिका मंत्रों के बाद ‘दिव्याष्टसहस्रनामभागी भव’, ‘विजयाष्टसहस्रनामभागी भव’, और ‘परमाष्टसहस्रनामभागी भव’ मंत्रों से दिव्य, विजय, और परम नामों की प्राप्ति की प्रार्थना की जाती है। बहिर्यान मंत्रों में ‘उपनयनिष्क्रान्तिभागी भव’, ‘वैवाहनिष्क्रान्तिभागी भव’, ‘मुनीन्द्रनिष्क्रान्तिभागी भव’, ‘सुरेन्द्रनिष्क्रान्तिभागी भव’, ‘मन्दरेन्द्राभिषेकनिष्क्रान्तिभागी भव’, ‘यौवराज्यनिष्क्रान्तिभागी भव’, ‘महाराज्यनिष्क्रान्तिभागी भव’, ‘परमराज्यनिष्क्रान्तिभागी भव’, और ‘आर्हन्त्यनिष्क्रान्तिभागी भव’ मंत्र यज्ञोपवीत, विवाह, मुनि, इंद्र, अभिषेक, युवराज, महाराज, चक्रवर्ती, और अरहंत पद के लिए निष्क्रमण की प्रार्थना करते हैं। निषद्या मंत्रों में ‘दिव्यसिंहासनभागी भव’, ‘विजयसिंहासनभागी भव’, और ‘परमसिंहासनभागी भव’ मंत्र इंद्र, चक्रवर्ती, और तीर्थंकर के सिंहासन की प्राप्ति के लिए हैं। अन्नप्राशन मंत्रों में ‘दिव्यामृतभागी भव’, ‘विजयामृतभागी भव’, और ‘अक्षीणामृतभागी भव’ मंत्र दिव्य, विजय, और अक्षीण अमृत के भोग की प्रार्थना करते हैं।
श्लोक 143 से 151 व्युष्टि और चौल मंत्र
व्युष्टि मंत्रों में ‘उपनयनजन्मवर्षवर्धनभागी भव’, ‘वैवाहनिष्ठवर्षवर्धनभागी भव’, ‘मुनीन्द्रजन्मवर्षवर्धनभागी भव’, ‘सुरेन्द्रजन्मवर्षवर्धनभागी भव’, ‘मन्दराभिषेकवर्षवर्धनभागी भव’, ‘यौवराज्यवर्षवर्धनभागी भव’, ‘महाराज्यवर्षवर्धनभागी भव’, ‘परमराज्यवर्षवर्धनभागी भव’, और ‘आर्हन्त्यराज्यवर्षवर्धनभागी भव’ मंत्र यज्ञोपवीत, विवाह, मुनि, इंद्र, अभिषेक, युवराज, महाराज, चक्रवर्ती, और अरहंत पद के वर्ष वृद्धि की प्रार्थना करते हैं। चौल मंत्रों में ‘उपनयनमुण्डभागी भव’, ‘निर्ग्रन्थमुण्डभागी भव’, ‘निष्क्रान्तिमुण्डभागी भव’, ‘परमनिस्तारककेशभागी भव’, ‘परमेन्द्रकेशभागी भव’, ‘परमराज्यकेशभागी भव’, और ‘आर्हन्त्यराज्यकेशभागी भव’ मंत्र उपनयन, निर्ग्रन्थ दीक्षा, केशलोच, आचार्य, इंद्र, चक्रवर्ती, और अरहंत के केशों की प्राप्ति के लिए हैं। इन मंत्रों से चोटी रखवानी चाहिए। इसके बाद लिपि-संख्यान मंत्रों का वर्णन किया जाएगा।
श्लोक 152 से 161 लिपिसंख्यान और उपनीति मंत्र
लिपिसंख्यान मंत्रों में ‘शब्दपारभागी भव’, ‘अर्थपारगामी भागी भव’, और ‘शब्दार्थसम्बन्धपारभागी भव’ मंत्रों का उच्चारण कर शब्द, अर्थ, और उनके संबंध की पारगमिता की प्रार्थना की जाती है। उपनीति मंत्रों में ‘परमनिस्तारकलिङगभागी भव’, ‘परमर्षिलिङगभागी भव’, ‘परमेन्द्रलिङगभागी भव’, ‘परमराज्यलिङगभागी भव’, ‘परमार्हन्त्यलिङगभागी भव’, और ‘परमनिर्वाणलिङगभागी भव’ मंत्र आचार्य, ऋषि, इंद्र, चक्रवर्ती, अरहंत, और निर्वाण के चिह्नों की प्राप्ति के लिए हैं। शिष्य का संस्कार कर उसे विकाररहित वस्त्र, लंगोटी, और मूंज की रस्सी पहनाई जाती है। गणधरों द्वारा मंत्रित यज्ञोपवीत धारण कराने से बालक द्विज कहलाता है। जन्म से ब्राह्मण होने के बाद व्रतों से संस्कृत होकर वह द्विजत्व प्राप्त करता है। गुरु की साक्षी में अणुव्रत, गुणव्रत, और शिक्षाव्रत दिए जाते हैं। गुरु उपासकाध्ययन पढ़ाकर चारित्र के योग्य नाम रखते हैं और विद्या का उपदेश देते हैं।
श्लोक 162 से 171 उपनीति क्रिया और व्रतचर्या
शिष्य सिद्ध भगवान और आचार्य की पूजा करता है। वह अपनी जाति या कुटुंब के घरों में भिक्षा मांगता है और प्राप्त लाभ को उपाध्याय को सौंपता है। विद्या अध्ययन तक ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करना चाहिए। यज्ञोपवीत धारण करने वाले बालक के लिए चार चिह्न हैं: मुंडन (शिर), यज्ञोपवीत (वक्ष), मूंज रस्सी (कमर), और सफेद धोती (जांघ)। सदृष्टि द्विज, जो शस्त्र, लेखन, खेती, या व्यापार से आजीविका कमाते हैं, यज्ञोपवीत धारण करें। दोषयुक्त कुल को राजा की अनुमति से शुद्ध कर पुत्र-पौत्रों को यज्ञोपवीत दिया जा सकता है। नाच-गायन आदि से आजीविका कमाने वालों को यज्ञोपवीत की अनुमति नहीं, पर वे व्रत धारण कर एक धोती पहन सकते हैं।
श्लोक 172 से 181 व्रतचर्या और दश अधिकार
यज्ञोपवीत धारण करने वाले द्विज मांसाहार त्यागें, विवाहिता स्त्री का सेवन करें, अनारंभी हिंसा और अभक्ष्य-अपेय का परित्याग करें। उपासकाध्ययन सूत्र में दश अधिकार हैं: अतिबाल विद्या, कुलावधि, वर्णोत्तमत्व, पात्रत्व, सृष्टयधिकारिता, व्यवहारेशिता, अवध्यत्व, अदण्डधता, मानार्हता, और प्रजासम्बन्धान्तर। अतिबाल विद्या बाल्यकाल से विद्या सिखलाती है, जो द्विजों के लिए आवश्यक है। इसके अभाव में द्विज मूर्ख रहता है और मिथ्या शास्त्रों में भटकता है। श्रावकाचार शास्त्रों का अभ्यास निज और पर का उद्धार करता है। कुलावधि कुलाचार की रक्षा करती है, अन्यथा व्यक्ति अन्य कुल में विलीन हो जाता है।
श्लोक 182 से 191 दश अधिकारों का विवरण
वर्णोत्तमत्व समस्त वर्णों में श्रेष्ठता है, जो प्रशंसा और उद्धार की क्षमता देता है। इसके अभाव में द्विज न स्वयं शुद्ध हो सकता है, न दूसरों को शुद्ध कर सकता। वह कुब्राह्मणों की सेवा में दोष ग्रहण करता है। पात्रत्व गुणों से दान की योग्यता देता है, जो पूजनीय बनाता है। इसके अभाव में मान्यता और धन हानि होती है। सृष्टयधिकारिता उत्तम सृष्टि की रक्षा करती है। मिथ्यादृष्टियों की सृष्टि को त्यागकर तीर्थंकरों की अनादि धर्मसृष्टि की प्रभावना करनी चाहिए। राजाओं को इस सृष्टि की रक्षा के लिए प्रेरित करना चाहिए, अन्यथा वे अन्य सृष्टियों को मानकर धर्म की प्रामाणिकता खो देंगे।
श्लोक 192 से 201 दश अधिकारों का continuation
व्यवहारेशिता प्रायश्चित्त आदि में स्वतंत्रता देती है। इसके अभाव में द्विज न स्वयं, न दूसरों को शुद्ध कर सकता। अवध्यत्व गुणों की अधिकता से द्विज को अवध्य बनाता है, क्योंकि ब्राह्मणों की हिंसा विशेष दोषकारी है। अवध्यता धर्म का माहात्म्य है, जो तिरस्कार से बचाती है। इसके अभाव में धर्म की प्रामाणिकता नष्ट होती है। सनातन धर्म की रक्षा से संसार में रक्षा मिलती है। अदण्डधता धर्म में स्थिर द्विज को दण्ड से मुक्ति देती है। धर्मदर्शी राजा धर्मानुसार अधर्मियों को दण्ड देता है। ब्राह्मण का धन त्याज्य नहीं, अतः वह दण्ड देने योग्य नहीं।
श्लोक 202 से 211 दश अधिकारों का समापन
अदण्डधता से द्विज दण्ड देने वालों के समक्ष अदण्ड्य रहता है। इसके अभाव में वह दण्डित होकर दरिद्र और दुखी होता है। मानार्हता गुणों से सन्मान की योग्यता देती है। इसके अभाव में स्थान, मान, और लाभ की हानि होती है। राजा ज्ञान-चारित्र से युक्त द्विज की पूजा करें। प्रजासम्बन्धान्तर अन्य धर्मावलंबियों से संबंध में भी उन्नति को बनाए रखता है। उत्तम द्विज अन्यों को अपने गुणों से प्रभावित करता है, जैसे रसायन लोहे को सुवर्ण बनाता है। यह गुण धर्म प्रभावना को बढ़ाता है। इसके अभाव में गुणवत्ता नष्ट होती है। दश अधिकारों को स्वीकार करने वाला द्विज मान्य होता है।
श्लोक 212 से 223 व्रतचर्या और ब्राह्मण सृष्टि
दश अधिकारों का विस्तार उपासकाध्ययन शास्त्र से समझना चाहिए। व्रतचर्या में सात पीठिका मंत्र सामान्य और सभी क्रियाओं में उपयोगी हैं। विशेष मंत्र विशिष्ट क्रियाओं के लिए हैं। मंत्रों का यथायोग्य प्रयोग करने वाला द्विज सन्मान प्राप्त करता है। मंत्ररहित क्रियाएँ सिद्धि नहीं देतीं। शास्त्राभ्यासी द्विज मंत्रोच्चारण सहित विधिपूर्वक क्रिया करें। महाराज भरत ने धर्म विजय और धार्मिक निपुणता से द्विजों को शिक्षा देकर ब्राह्मणवर्ण की सृष्टि की। वृषभदेव के मतानुसार दीक्षित ब्राह्मणों का सत्कार हुआ, जिनका चारित्र सुंदर और शास्त्रज्ञान प्रखर था। भरत ने इन ब्राह्मणों को सदाचार में स्थिर कर प्रतिदिन सन्मान किया, अपनी सृष्टि की उन्नति देख कृतकृत्य माना। इस प्रकार चालीसवाँ पर्व समाप्त हुआ।
उत्तरचूलिका का कथन
उत्तरचूलिका में तीनों क्रियाओं (मंत्रकल्प, पीठिका, और काम्य मंत्र) का विशेष निर्णय किया गया है। मंत्रों का उद्धार और उनकी सिद्धि मुनियों के कार्यों की पूर्णता के लिए आवश्यक है। ये मंत्र विधिपूर्वक उच्चारित होने पर छह परम स्थानों की प्राप्ति, अपमृत्यु नाश, और समाधिमरण जैसे फल प्रदान करते हैं।
हिन्दी-भाषानुवाद
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द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय – आदिपुराण
द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय – आदिपुराण भाग – 2
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