आदिपुराण विंशं पर्व सारांश
Summary of Ādi purāṇa Parv 20 by Acharya Jinasena
पर्व 20 में भगवान का विहार, श्रेयान्स का दान, तप, और केवलज्ञान प्राप्ति का वर्णन है।
संक्षिप्त सारांश
भगवान वृषभदेव ने छह माह योग धारण कर मुनियों को आहार विधि सिखाने का विचार किया। उन्होंने शरीर को संतुलित रखने और निर्दोष आहार की बात कही। वे पृथ्वी को कंपाते हुए नगरों में विहार करने लगे। लोग रत्न, भोजन, कन्याएँ लाए, पर वे उदासीन रहे। एक वर्ष बाद वे हस्तिनापुर पहुँचे, जहाँ सोमप्रभ और श्रेयान्स थे। श्रेयान्स ने स्वप्न देखे और पुरोहित ने भगवान के आगमन की भविष्यवाणी की। लोग दर्शन को दौड़े। भगवान राजमंदिर पहुँचे। श्रेयान्स ने जातिस्मरण से ईख का रस दान दिया। देवों ने रत्न-पुष्प वर्षा की। भगवान वन को चले गए। श्रेयान्स का यश फैला और दान की प्रथा शुरू हुई। उसने भरत को पूर्वभव और दान की विशुद्धि बताई। भगवान ने तप शुरू किया। वे व्रत, गुप्ति, और बारह तप साधते थे। ध्यान से कर्म नष्ट किए। पुरिमताल के शकट उद्यान में वटवृक्ष पर ध्यान लगाया। सिद्धों के गुणों और अनुप्रेक्षाओं का चिंतवन कर धर्मध्यान साधा। सातवें से नौवें गुणस्थान तक पहुँचे। शुक्लध्यान से मोह और घातिया कर्म नष्ट किए। फाल्गुन एकादशी को केवलज्ञान प्राप्त कर सर्वज्ञ हुए। समवसरण में देवों ने जय-शब्द और पुष्पवर्षा की। भगवान तीन लोक में आनंद फैलाते सुशोभित हुए।
श्लोक 1 से 11 भगवान वृषभदेव का योग और विहार
भगवान वृषभदेव ने छह माह योग धारण किया। उन्होंने मुनियों को आहार विधि सिखाने का विचार किया। वे नवदीक्षित साधुओं के भ्रष्ट होने से चिंतित हुए। उन्होंने शरीर को न कृश और न पुष्ट करने का निर्णय लिया। इंद्रियों को वश में रखने के लिए मध्यम वृत्ति अपनाने का विचार किया। दोष दूर करने के लिए उपवास और प्राण धारण के लिए आहार की बात कही। कायक्लेश संक्लेश के बिना करना चाहिए, यह सोचा। संयम के लिए निर्दोष आहार लेने का निश्चय किया। योग समाप्त कर वे पृथ्वी को कंपाते हुए विहार करने लगे। उनकी चरणनिक्षेपों से पृथ्वी शोभायमान हुई।
श्लोक 12 से 21 भगवान का नगरों में विहार
ईर्यासमिति से गमन कर पृथ्वी को भार से बचाया। भगवान ने नगरों, ग्रामों में विहार किया। लोग प्रसन्न हो उन्हें प्रणाम करते थे। कुछ लोग पूछते थे कि क्या काम है। कुछ रत्न लाकर पूजा स्वीकारने को कहते थे। करोड़ों पदार्थ और सवारियाँ लाते थे, पर भगवान आगे बढ़ते थे। माला, वस्त्र, और कन्याएँ लाए गए, पर वे उदासीन रहे। लोग स्नान और भोजन के लिए प्रार्थना करते थे।
श्लोक 22 से 31 लोगों की मूर्खता और हस्तिनापुर आगमन
मूर्ख लोग अनुग्रह की प्रार्थना करते थे। कुछ चरण धूलि से पवित्र हो भोजन के लिए कहते थे। वे खाद्य-पेय पदार्थ लाते थे, पर भगवान चुपचाप आगे बढ़ते थे। लोग उनकी चर्या न समझ मूढ़ रहते थे। कुछ रोते हुए विघ्न डालते थे। छह माह और बीते। एक वर्ष पूर्ण होने पर वे हस्तिनापुर पहुँचे। वहाँ राजा सोमप्रभ और श्रेयान्सकुमार थे। श्रेयान्स गुणों और रूप से श्रेष्ठ था।
श्लोक 32 से 41 श्रेयान्स के स्वप्न और उनका फल
श्रेयान्स स्वर्ग से चय कर जन्मा था। भगवान के आगमन पर उसने सात स्वप्न देखे। उसने सुमेरु, कल्पवृक्ष, सिंह, बैल, सूर्य-चंद्र, समुद्र, और व्यंतर मूर्तियाँ देखीं। प्रातःकाल उसने सोमप्रभ को स्वप्न सुनाए। पुरोहित ने कहा कि कोई उदार देव आएगा। स्वप्न गुणों की उन्नति दिखाते थे। पुण्य उदय होगा, ऐसा कहा।
श्लोक 42 से 51 भगवान का हस्तिनापुर में प्रवेश
पुरोहित के वचनों से दोनों भाई प्रसन्न हुए। भगवान ने हस्तिनापुर में प्रवेश किया। लोग दर्शन के लिए कोलाहल करते थे। कुछ कहते थे कि भगवान पालन के लिए आए हैं। वे वन से लौटे हैं, ऐसा कहा। लोग दौड़ते थे। भगवान सुमेरु से ऊँचे और सुवर्ण से दैदीप्यमान थे। उनकी प्रशंसा करते थे। दर्शन से नेत्र सफल होते थे।
श्लोक 52 से 61 लोगों की भक्ति और उत्साह
भगवान तीन लोक के स्वामी होकर अकेले विहार करते थे। लोग उनकी वंदना करना चाहते थे। एक स्त्री दासी को बालक सौंप दर्शन को गई। दूसरी ने स्नान सामग्री छोड़ भगवान के दृष्टि जल से स्नान का विचार किया। तीसरी ने भोजन छोड़ अर्घ ले पूजा को गई। लोग स्नान-भोजन सामग्री हटाकर दर्शन को गए। भक्ति और कौतुक से लोग तत्पर हुए।
श्लोक 62 से 71 भगवान का राजमंदिर प्रवेश
लोग बातचीत कर नमस्कार करते थे। नगर राजमहल तक भर गया। भगवान वैराग्य के लिए भावना करते हुए विहार करते थे। वे चांद्रीचर्या से राजमंदिर पहुँचे। सिद्धार्थ ने सोमप्रभ को समाचार दिया। सोमप्रभ और श्रेयान्स अंतःपुर सहित बाहर आए। दोनों ने दूर से नमस्कार किया।
श्लोक 72 से 81 भगवान का स्वागत और श्रेयान्स का दान
दोनों ने अर्घ चढ़ाया और प्रदक्षिणा दी। वे हर्ष से रोमांचित हुए। भगवान के बीच वे सुमेरु से शोभायमान थे। श्रेयान्स को जातिस्मरण हुआ। उसने पूर्व भव और आहार दान स्मरण किया। उसने प्रातःकाल भगवान को आहार दान दिया। श्रद्धा सहित नवधा भक्ति से दान दिया।
श्लोक 82 से 101 दान के गुण और भगवान की महिमा
दान के सात गुण—श्रद्धा, शक्ति, भक्ति, विज्ञान, अक्षुब्धता, क्षमा, त्याग—कहे गए। नवधा भक्ति में पड़गाहन और शुद्धि शामिल थी। श्रेयान्स ने प्रासुक आहार दिया। भगवान पाणिपात्र से खड़े होकर आहार लेते थे। वे नग्न-दिगंबर, अस्नान, और केशलोंच करते थे। श्रेयान्स ने ईख का रस दान कर सुशोभित हुआ।
श्लोक 102 से 111 दान का उत्सव और भगवान का प्रस्थान
आकाश से देवों ने रत्नों की वर्षा की। फूलों की वर्षा भ्रमरों से व्याप्त थी। देवों के नगाड़े गंभीर शब्द करते थे। शीतल सुगंधित वायु चली। देवों ने ‘धन्य दान, पात्र, दाता’ का शब्द किया। सोमप्रभ और श्रेयान्स ने अपने को कृतकृत्य माना। अनुमोदना से लोग पुण्य प्राप्त करते थे। पुण्य शुभ परिणामों से मिलता है। भगवान ने आहार ग्रहण कर दोनों को हर्षित किया। वे वन को प्रस्थान कर गए।
श्लोक 112 से 121 भगवान के प्रस्थान और दोनों भाइयों की भक्ति
दोनों भाई भगवान को वन जाते हुए देखते रहे। वे उनकी दृष्टि और चित्त को रोक न सके। वे भगवान की कथा और गुणों की स्तुति करते थे। चरणों से पवित्र भूमि को नमस्कार करते थे। पुरवासी उनकी प्रशंसा करते थे। रत्नों से भरे राजांगण में लोग आनंदित थे। दोनों भाई नगर में प्रवेश कर सुशोभित हुए। भगवान पारणा कर वन को चले गए।
श्लोक 122 से 131 श्रेयान्स का यश और दान की शुरुआत
श्रेयान्स के यश से संसार भर गया। दान की प्रथा श्रेयान्स से शुरू हुई। भरत को आश्चर्य हुआ कि उसने भगवान का अभिप्राय कैसे जाना। देवों ने श्रेयान्स की पूजा की। भरत ने श्रेयान्स से अभिप्राय पूछा। श्रेयान्स ने कहा कि भगवान के रूप से उसे जातिस्मरण हुआ।
श्लोक 132 से 141 श्रेयान्स का पूर्वभव और दान की विशुद्धि
श्रेयान्स ने बताया कि वह वज्रजंघ के भव में श्रीमती थी। उसने चारणमुनियों को दान दिया था। दान और काव्य पुण्य से प्राप्त होते हैं। उसने भरत को दान की विशुद्धि बताई। दाता, देय, और पात्र की शुद्धि से दान फलदायी होता है। दाता श्रद्धा आदि गुणों से युक्त होता है।
श्लोक 142 से 151 पात्र और अपात्र का वर्णन
अपात्र को दान से कुभोगभूमि मिलती है। अपात्र दान को दूषित करता है। गुणों से युक्त ही पात्र होता है। दोषवान पात्र संसार से पार नहीं कर सकता। मुनिराज ही उत्तम पात्र हैं। श्रेयान्स ने दान से पंचाश्चर्य प्राप्त किए। उसने भरत को दान देने की प्रेरणा दी।
श्लोक 152 से 161 भरत का सम्मान और भगवान का तप
भरत ने श्रेयान्स के वचनों से प्रीति पाई। उन्होंने सोमप्रभ और श्रेयान्स का सम्मान किया। भगवान ने आहार से बल प्राप्त कर तप शुरू किया। उनके मन में ज्ञानदीप प्रकाशमान हुआ। वे गुण-दोष को जानते थे। उन्होंने पाप से विरक्ति धारण की। दया और व्रतों का पालन करते थे।
श्लोक 162 से 171 व्रतों की भावनाएँ
भगवान ने अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, और परिग्रह त्याग के लिए भावनाएँ धारण कीं। मनोगुप्ति आदि से अहिंसा की रक्षा की। क्रोध त्याग से सत्य पाला। संतोष से अचौर्य रखा। स्त्री कथा त्याग से ब्रह्मचर्य साधा। इंद्रिय विषयों से परिग्रह छोड़ा। मुनियों को भी व्रत पालन करना चाहिए।
श्लोक 172 से 183 भगवान का तपश्चरण
भगवान ने चारित्र के पाँच भेद साधे। उन्होंने बारह प्रकार का तप किया। अनशन और अवमौदर्य तप तपे। वृत्तिपरिसंख्यान और रसपरित्याग तप किए। कायक्लेश से इंद्रिय और मन को जिता। ज्ञान प्राप्त होने पर भी कायक्लेश तपा।
श्लोक 184 से 193 तप की महिमा और भगवान की स्थिति
भगवान कायक्लेश से कर्म जलाते थे। वे सूर्य से दैदीप्यमान थे। उनकी शय्या एकांत में होती थी। वे छह बाह्य और अंतरंग तप करते थे। प्रायश्चित्त उनके चारित्र में सिद्ध था। विनय भी उनमें अंतर्भूत था।
श्लोक 194 से 201 भगवान के अंतरंग तप
भगवान का वैयावृत्य तप रत्नत्रय में व्यापार था। उनकी शुभ कषाय मंद हो गई थी। वे प्रायश्चित्त, विनय, वैयावृत्य के स्वामी थे। धर्म-सृष्टि को उन्होंने उदाहरण स्वरूप धारण किया। वे स्वाध्याय करते थे। स्वाध्याय से मुनियों में यह परंपरा चली। स्वाध्याय से चित्त स्थिर होता है। उनका व्युत्सर्ग तप शरीर से ममत्व छोड़ने में था।
श्लोक 202 से 211 ध्यान तप की महिमा
भगवान का ध्यान तप व्युत्सर्ग से सिद्ध हुआ। ध्यान से वे कृतकृत्य हुए। ध्यान ही उत्तम तप है। मन, इंद्रिय, और काय के निग्रह से तप होता है। वे बारह तपों में प्रयत्नशील थे। संवर के लिए गुप्ति आदि धारण किए। वे एकांत, मनोहर स्थानों में ध्यान करते थे। गुफा, नदी किनारे आदि ध्यान के योग्य थे। वे पहाड़ों पर ध्यान लगाते थे।
श्लोक 212 से 221 ध्यान के स्थान
भगवान सुंदर शिखरों पर ध्यान करते थे। वे अगम्य वनों में विराजते थे। निर्झरों के पास ठंड में ध्यान करते थे। श्मशान में राक्षसों के बीच ध्यान लगाते थे। नदी, सरोवर, और वनों में विहार करते थे। वे पुरिमताल नगर के शकट उद्यान में ठहरे। वटवृक्ष की शिला पर पद्मासन से ध्यान लगाया।
श्लोक 222 से 231 धर्मध्यान की सिद्धि
भगवान ने सिद्धों के आठ गुणों का चिंतवन किया। अनंत सम्यक्त्व आदि गुणों का ध्यान किया। बारह अनुप्रेक्षाओं से धर्मध्यान साधा। आज्ञाविचय आदि चार धर्मध्यान धारण किए। वे प्रमादरहित सातवें गुणस्थान में थे। उनकी शुक्ल लेश्या दैदीप्यमान थी।
श्लोक 232 से 241 मोह पर विजय
भगवान ने विशुद्धि से कर्मों को नष्ट किया। संयम को टोप और कवच बनाया। ध्यान को अस्त्र और ज्ञान को मंत्री बनाया। गुणों से कर्मों को हराया। कर्मों की प्रकृति बदल गई। उन्होंने कर्मों को जड़ से उखाड़ फेंका।
श्लोक 242 से 253 क्षपक श्रेणी और गुणस्थान
भगवान क्षपक श्रेणी पर आरूढ़ हुए। सातवें से नौवें गुणस्थान तक पहुँचे। पृथक्त्ववितर्क शुक्लध्यान से मोह को नष्ट किया। कषाय और वेद को चूर्ण किया। अनिवृत्तिकरण में जयभूमि प्राप्त की। तीन करणों का स्वरूप बताया गया।
श्लोक 254 से 261 कर्मों का विनाश
अध:करण में स्थिति-बंध कम हुआ। अपूर्वकरण में निर्जरा हुई। अनिवृत्तिकरण में सोलह प्रकृतियाँ नष्ट कीं। आठ कषाय और सूक्ष्म लोभ को जीता। दसवें गुणस्थान में मोह पर विजय पाई। वे कुश्ती विजेता से सुशोभित थे।
श्लोक 262 से 273 केवलज्ञान की प्राप्ति
बारहवें गुणस्थान में मोह नष्ट किया। दूसरे शुक्लध्यान से घातिया कर्म जलाए। केवलज्ञान प्राप्त कर सर्वज्ञ हुए। अनंत लब्धियाँ प्राप्त कीं। फाल्गुन एकादशी को केवलज्ञान हुआ। देवों ने जय-शब्द किए। पुष्पवर्षा और वायु से समवसरण शुद्ध हुआ।
पर्व 21
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