आदिपुराण पर्व 8 सारांश
Summary of Ādi purāṇa Parv 8 by Acharya Jinasena
पर्व 8 में वज्रजंघ और श्रीमती का वैवाहिक जीवन, वैराग्य, दीक्षा और अंतिम गंतव्य का वर्णन हैं।
संक्षिप्त सारांश (श्लोक 1 से 257)
विवाह के पश्चात् वज्रजंघ ने चक्रवर्ती के भवन में, जहाँ नित्य उत्सव होते थे, श्रीमती के साथ उत्तम भोगों का अनुभव करते हुए दीर्घकाल तक निवास किया। श्रीमती के सौंदर्य, स्पर्श और मधुर व्यवहार से वह संतुष्ट रहता था, किंतु कामसेवन से उसकी तृप्ति नहीं होती थी। दोनों ने एक-दूसरे के साथ विभिन्न क्रीडाओं में समय व्यतीत किया—कभी उद्यानों में, कभी नदीतट पर, तो कभी जलक्रीडा में। श्रीमती की शारीरिक शोभा और प्रेम ने वज्रजंघ का मन मोह लिया। दोनों ने जिनेंद्र पूजा, दान और उत्सवों के माध्यम से भी समय बिताया।
वज्रजंघ की बहन अनुंधरी का विवाह चक्रवर्ती के पुत्र अमिततेज से हुआ। चक्रवर्ती वज्रदंत ने दोनों दंपतियों को दहेज सहित विदा किया। वज्रजंघ और श्रीमती उत्पलखेटक नगर पहुँचे, जहाँ उनका भव्य स्वागत हुआ। वहाँ उन्होंने 98 पुत्र उत्पन्न किए। एक दिन वज्रबाहु ने बादलों के क्षणभंगुर स्वरूप को देख वैराग्य लिया और दीक्षा ग्रहण कर मोक्ष प्राप्त किया। उनके पुत्र भी दीक्षित हुए।
वज्रदंत ने भी कमल में मरे भ्रमर को देखकर वैराग्य लिया। उन्होंने राज्य अपने पौत्र पुंडरीक को सौंपकर दीक्षा ली। लक्ष्मीमती ने वज्रजंघ को सहायता के लिए बुलाया। वज्रजंघ ने मुनियों से अपने और श्रीमती के पूर्वभव सुने, जिसमें वह ललितांगदेव और श्रीमती स्वयंप्रभा थीं। मुनियों ने भविष्यवाणी की कि वज्रजंघ भविष्य में वृषभनाथ तीर्थंकर होंगे। इसके बाद वज्रजंघ पुंडरीकिणी नगरी पहुँचे, पुंडरीक के राज्य को स्थिर किया और वापस उत्पलखेटक लौट आए। वहाँ वे श्रीमती के साथ सुखपूर्वक भोग भोगते रहे, जैन धर्म का पालन करते हुए अपनी कीर्ति फैलाते रहे।
हिन्दी-भाषानुवाद पर्व 8
श्लोक 1 से 12 वज्रजंघ और श्रीमती का भोग जीवन
विवाह के बाद वज्रजंघ ने चक्रवर्ती भवन में श्रीमती के साथ भोगोपभोगों का आनंद लिया। श्रीमती के स्पर्श और सौंदर्य से उसे प्रसन्नता मिलती थी। वह उसके मुख-कमल से कभी तृप्त न होता था। उसके कटाक्ष और मधुर भाषण ने उसका चित्त वश में किया। वह उसके पतली कमर, त्रिवलि-युक्त उदर, और नितंब पर रमण करता था। श्रीमती की भुजाओं और शरीर ने उसकी पांचों इंद्रियों को संतुष्ट किया।
श्लोक 13 से 21 प्रणय और क्रीड़ा
श्रीमती का कटिभाग अन्य पुरुषों को अप्राप्य था। प्रणय-कोप में वह वज्रजंघ के केश खींचती और कर्णोत्पल से ताड़न करती थी, जिससे उसे सुख मिलता था। रति-श्रम को झरोखे की वायु शांत करती थी। श्रीमती का मुख, नेत्र, और स्तन उसे आनंद देते थे। वह उद्यानों और लतागृहों में क्रीड़ा करता था।
श्लोक 22 से 31 जलक्रीड़ा और भोग
वज्रजंघ और श्रीमती नदीतट और बावड़ी में जलक्रीड़ा करते थे। वह पिचकारी से श्रीमती के मुख पर जल डालता था, और उसके स्तन भीगकर शोभायमान होते थे। धारागृह और रत्नमयी छतों पर चाँदनी में क्रीड़ा करते थे। दोनों स्वर्ग से बढ़कर भोगों में समय व्यतीत करते थे।
श्लोक 32 से 41 अनुंधरी अमिततेज का विवाह और विदाई
वज्रजंघ की बहन अनुंधरी का विवाह अमिततेज से हुआ। वज्रदंत ने वधू-वर को धन देकर विदा किया। पुरवासियों ने उनके प्रस्थान पर शोक किया। वज्रजंघ श्रीमती के साथ उत्पलखेटक नगर पहुँचा।
श्लोक 42 से 51 वज्रजंघ और श्रीमती का उत्पलखेटक में प्रवेश
नगर में उत्सव हुए। पुरसुंदरियों ने फूल बरसाए, प्रजाजन आशीर्वाद देते थे। वज्रजंघ राजभवन में श्रीमती के साथ सुख से रहा। पंडिता सखी उसे विनोद से प्रसन्न रखती थी। उनके 98 पुत्र हुए।
श्लोक 52 से 61 वज्रबाहु का वैराग्य
वज्रबाहु ने बादल के विलीन होने से वैराग्य पाया। उन्होंने राज्य वज्रजंघ को सौंपकर यमधरमुनि से दीक्षा ली। श्रीमती के 98 पुत्रों ने भी दीक्षा ली। वज्रबाहु ने केवलज्ञान प्राप्त कर मोक्ष पाया। वज्रजंघ भोग भोगता रहा।
श्लोक 62 से 71 वज्रदंत का वैराग्य
वज्रदंत ने कमल में मरे भ्रमर को देखकर वैराग्य पाया। उन्होंने विषयों को विषम, शरीर को क्षणभंगुर, और लक्ष्मी को चंचल माना। भोग संताप देते हैं, आयु नष्ट होती है।
श्लोक 72 से 82 संसार की अनित्यता
वज्रदंत ने यमराज को शत्रु, वृद्धावस्था को सेना, और विषयों को दुःखदायक कहा। संसार में सुख अल्प, दुःख अधिक है। विषय अर्जन, भोग, और वियोग में दुःख देते हैं। उन्होंने राज्य अमिततेज को देना चाहा, पर वह तैयार न हुआ।
श्लोक 83 से 91 वज्रदंत की दीक्षा
वज्रदंत ने राज्य पुंडरीक को सौंपा और गुणधर मुनि से 60,000 रानियों, 20,000 राजाओं, 1,000 पुत्रों, और पंडिता के साथ दीक्षा ली। लक्ष्मीमती और अनुंधरी शोकग्रस्त हुईं। प्रजा पुंडरीक को लेकर नगर लौटी।
श्लोक 92 से 104 लक्ष्मीमती का संदेश
लक्ष्मीमती ने राज्य की रक्षा के लिए वज्रजंघ को संदेश भेजा। उन्होंने चिंतागति और मनोगति को बुलाकर कहा कि वज्रदंत दीक्षित हो गए, पुंडरीक बालक है, राज्य संकट में है। दोनों विद्याधर आकाशमार्ग से उत्पलखेटक पहुँचे।
श्लोक 105 से 118 संदेश प्राप्ति और प्रस्थान का निर्णय
चिंतागति और मनोगति राजमंदिर पहुँचे, वज्रजंघ को प्रणाम कर भेंट और पत्र सौंपा। वज्रजंघ ने पत्र पढ़कर वज्रदंत और उनके पुत्रों की दीक्षा पर विस्मय किया। उन्होंने पुंडरीक के राज्यभार और लक्ष्मीमती की सहायता की माँग को समझा। श्रीमती को दुःख हुआ, पर वज्रजंघ ने उसे समझाया और पुंडरीकिणी पुरी जाने का निश्चय किया। विद्याधरों को सम्मानित कर आगे भेजा और प्रस्थान की तैयारी शुरू की।
श्लोक 119 से 135 प्रस्थान की तैयारियाँ
मंत्री, सेनापति आदि ने वज्रजंघ को घेरा। उसने उसी दिन प्रस्थान किया। कर्मचारियों में कोलाहल हुआ। वज्रजंघ ने सेवकों को हथिनियाँ, घोड़े, पालकियाँ, दासियाँ, सेना के लिए डेरे, भोजनशाला, और सुरक्षा की व्यवस्था करने के निर्देश दिए। ज्योतिषियों से शुभ मुहूर्त पूछा।
श्लोक 136 से 151 सेना का प्रस्थान और मार्ग
चौक सैनिकों से भर गया। छत्रों और पताकाओं से आकाश ढक गया। धूल और मद से पृथ्वी शांत हुई। सेना नदी समान शोभायमान हुई। भ्रमर हाथियों के मद में लीन हुए। मार्ग में वृक्ष सत्कार करते दिखे। सेना शष्प सरोवर पर पहुँची।
श्लोक 152 से 161 शष्प सरोवर पर विश्राम
सरोवर पीला और शीतल था, हरे वनों से घिरा। लहरें और पक्षी सेना को बुलाते थे। सेना तट पर ठहरी। निर्बल प्राणी डरकर भागे। सैनिकों ने वृक्षों को कल्पवृक्ष-सा सजाया। स्त्रियाँ स्नान करती शोभायमान हुईं। तंबू वनलक्ष्मी के भवन समान लगे।
श्लोक 162 से 171 सेना का ठहराव और मुनियों का आगमन
घोड़े और हाथी शोभायमान हुए। वज्रजंघ डेरे में पहुँचे। दमधर और सागरसेन मुनि वहाँ आए। वज्रजंघ ने उनकी कांति देखकर पादप्रणाम किया और श्रीमती के साथ भोजनशाला में उनकी सेवा की।
श्लोक 172 से 184 मुनियों की पूजा और पूर्वभव
वज्रजंघ ने मुनियों को आहार दिया, जिससे पंचाश्चर्य (रत्न-पुष्पवर्षा आदि) हुए। कंचुकी ने बताया कि मुनि उनके पुत्र हैं। वज्रजंघ ने धर्म सुना और पूर्वभव पूछा। दमधर मुनि ने बताया कि वज्रजंघ चौथे भव में श्रीषेण का पुत्र था, दीक्षा ली पर भोगों में मृत्यु पाई, फिर महाबल और ललितांगदेव हुआ, अब वज्रजंघ है।
श्लोक 185 से 201 श्रीमती और मंत्रियों का पूर्वभव
श्रीमती धातकीखंड में गृहस्थ पुत्री थी, फिर निर्नामिका हुई, उपवास किए, स्वयंप्रभा बनी, अब श्रीमती है। वज्रजंघ ने मंत्रियों का पूर्वभव पूछा। दमधर ने बताया कि मतिवर प्रभाकरी नगरी में अतिग्रंथ राजा था, नरक गया, व्याघ्र हुआ। प्रीतिवर्धन ने मुनिदान के लिए नगर सजाया, जिससे मुनि वहाँ आए।
श्लोक 202 से 211 मतिवर के पूर्वभव और सिंह की समाधि
पिहितास्रव मुनि ने प्रीतिवर्धन के घर आहार लिया। राजा ने दान दिया, जिससे रत्नवर्षा हुई। सिंह (अतिगृंध्र का जीव) ने यह देखकर जाति-स्मरण पाया, शांत हुआ, और समाधि में बैठ गया। मुनि ने प्रीतिवर्धन को बताया कि यह सिंह भविष्य में चक्रवर्ती और मोक्ष पाएगा। राजा ने सेवा की, मुनि ने नमस्कार मंत्र सुनाया। सिंह ने 18 दिन उपवास कर दिवाकरप्रभ देव बना। प्रीतिवर्धन के सहयोगी भी शांत हुए।
श्लोक 212 से 221 मंत्रियों के पूर्वभव
सेनापति, मंत्री, पुरोहित ने दान की अनुमोदना की, उत्तरकुरु में आर्य हुए, फिर स्वर्ग में देव बने—कनकाभ, प्रभंजन, प्रभाकर। ये ललितांगदेव के परिवार में थे। सिंह का जीव मतिवर, प्रभाकर का अकंपन, कनकप्रभ का आनंद, और प्रभंजन का धनमित्र बना। वज्रजंघ और श्रीमती धर्म से प्रभावित हुए। वज्रजंघ ने चार जानवरों के निर्भय होने का कारण पूछा।
श्लोक 222 से 231 सिंह और सूकर के पूर्वभव
मुनि ने बताया कि सिंह हस्तिनापुर में उग्रसेन था, क्रोधी, राजा के भंडार लूटा, मार खाकर व्याघ्र हुआ। सूकर विजय नगर में हरिवाहन था, मान से माता-पिता का अनादर किया, खंभे से टकराकर सूकर बना।
श्लोक 232 से 241 वानर और नकुल के पूर्वभव
वानर धन्यपुर में नागदत्त था, माया से बहन के विवाह में ठगी चाही, आर्तध्यान से मरकर वानर हुआ। नकुल सुप्रतिष्ठित नगर में लोलुप हलवाई था, लोभ से ईंटें चुराईं, पुत्र को मारा, राजा ने मार डाला, नकुल बना।
श्लोक 242 से 252 भविष्य और पुंडरीकिणी यात्रा
चारों जानवरों ने दान देखकर जाति-स्मरण पाया, भोगभूमि की आयु बाँधी। वज्रजंघ आठवें भव में वृषभनाथ, श्रीमती श्रेयान्स राजा बन मोक्ष पाएँगे। वज्रजंघ हर्षित हुआ, मुनियों को नमस्कार कर डेरे लौटा। मुनि आकाशमार्ग से गए। वज्रजंघ ने शष्प सरोवर पर समय बिताया, फिर पुंडरीकिणी पहुँच लक्ष्मीमती और अनुंधरी को सांत्वना दी, राज्य निष्कंटक किया।
श्लोक 253 से 257 उत्पलखेटक में वापसी
वज्रजंघ ने प्रजा को अनुरक्त कर पुंडरीक को सिंहासन पर बैठाया, व्यवस्था मंत्रियों को सौंपी, और उत्पलखेटक लौटा। नगरवासियों ने उसकी प्रशंसा की। वह श्रीमती के साथ भोग भोगता, जैन धर्म का पालन करता रहा।
पर्व 9
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