द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय – आदिपुराण भाग – 2
पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 |पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47
पर्व 26 – भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन
श्लोक 1 से 11
चक्रवर्ती भरत का उत्सव और शरद् ऋतु की शोभा
महाराज भरत ने विधिपूर्वक चक्ररत्न की पूजा की और पुत्र जन्म का आनंद मनाया। उनके उत्सव में कोई दरिद्र नहीं रहा, क्योंकि दान से याचक संतुष्ट होकर याचना छोड़ चुके थे। नगर में रत्नों के ढेर लगाए गए, जो याचकों को दे दिए गए। चक्ररत्न की पूजा शत्रुओं के लिए हिंसक और पुत्र जन्म उत्सव संसार के लिए शांति कर्म समान था। शरद् ऋतु की निर्मल शोभा, सप्तपर्ण फूलों की पराग, स्वच्छ जल, हंसों की पंक्तियां, और कमलों से सुशोभित सरोवर प्रकृति की सुंदरता को दर्शाते थे।
श्लोक 12 से 21
चक्रवर्ती भरत का उत्सव और शरद् ऋतु की शोभा
महाराज भरत ने विधिपूर्वक चक्ररत्न की पूजा की और पुत्र जन्म का आनंद मनाया। उनके उत्सव में कोई दरिद्र नहीं रहा, क्योंकि दान से याचक संतुष्ट होकर याचना छोड़ चुके थे। नगर में रत्नों के ढेर लगाए गए, जो याचकों को दे दिए गए। चक्ररत्न की पूजा शत्रुओं के लिए हिंसक और पुत्र जन्म उत्सव संसार के लिए शांति कर्म समान था। शरद् ऋतु की निर्मल शोभा, सप्तपर्ण फूलों की पराग, स्वच्छ जल, हंसों की पंक्तियां, और कमलों से सुशोभित सरोवर प्रकृति की सुंदरता को दर्शाते थे।
श्लोक 22 से 31
शरद् ऋतु की प्राकृतिक सौंदर्यता
शरद् ऋतु में नदियों के किनारे स्वच्छ हो गए, सरोवर कमलों से और खेत नीलोत्पलों से सुशोभित थे। हंस और सारस पक्षियों के मधुर शब्द तालाबों को और आकर्षक बनाते थे। शरद् ऋतु लक्ष्मी रूपी स्त्री के समान थी, जिसके नेत्र नीलोत्पल और मुख कमल थे। पके चावल के खेत हल्दी से स्नान किए हुए से प्रतीत होते थे। हंसों को शरद् की शोभा से हर्ष और मयूरों को दुख हुआ, जो शुद्ध और अशुद्ध स्वभाव को दर्शाता है। बंधूक पुष्पों ने वनों की शोभा बढ़ाई।
श्लोक 32 से 41
प्रकृति और भरत की शोभा
मेघों के नष्ट होने से दिशाएं प्रसन्न थीं और हंसों से अलंकृत थीं। मयूरों ने कलहंसों के मधुर शब्दों से पराजित होकर अपनी वाणी छोड़ दी। शरद् ऋतु चांदनी और नक्षत्रों से सुशोभित थी। चंद्रमा कीर्ति फैलाता हुआ राजा के समान था। शरद् ऋतु नवोढ़ा स्त्री की तरह बंधूक फूलों से लालिमा धारण किए थी। आकाश, नदियां और दिशाएं स्वच्छ और निर्मल थीं। वन-पंक्तियां सुगंधित फूलों और भौंरों से आकर्षक थीं।
श्लोक 42 से 51
ग्रामीण जीवन और प्रकृति
मदोन्मत्त बैल स्थलकमलों को खोद रहे थे और गायें दूध से भूमि को तर कर रही थीं। गायें और उनके बछड़े शरद् ऋतु की शोभा के समान थे। मेघों के नष्ट होने से मयूरों को दुख हुआ। फूले हुए वृक्ष और झरने पर्वतों को हंसते और फाग खेलते हुए दर्शाते थे। कलमी धान और सहजना वृक्ष प्रकृति की समृद्धि को दर्शाते थे।
श्लोक 52 से 61
प्रकृति और भरत का दिग्विजय उद्योग
सहजना वृक्ष और मेघ-मुक्त दिशाएं नेत्रों को आनंद देती थीं। पर्वत सफेद बादलों से नवीन वस्त्र धारण किए थे। मेघरूपी हाथी और तोताओं की पंक्तियां प्रकृति की शोभा बढ़ाती थीं। सूर्य भरत के समान प्रतापी और तेजस्वी था। शरद् ऋतु की निर्मलता में भरत ने चक्ररत्न के साथ दिग्विजय का उद्योग किया।
श्लोक 62 से 71
भरत का राजसी वैभव
भरत ने चांदनी जैसे वस्त्र, ब्रह्मसूत्र, और मुकुट धारण किए। उनके कुण्डल सूर्य-चंद्र के समान थे। कौस्तुभ मणि और छत्र विजयलक्ष्मी के प्रतीक थे। स्थपति रत्न ने सुवर्ण और मणियों से युक्त रथ तैयार किया, जिसमें वेगशाली घोड़े जोते गए।
श्लोक 72 से 81
भरत की सेना का प्रस्थान
भरत ने दिग्विजय के लिए प्रस्थान किया। जय-जयकार से आकाश गूंज उठा। राजा और सेनापति उन्हें घेरे थे। सेना पैदल, घुड़सवार, रथ, और हाथियों के क्रम में थी। सुवर्णमय धूलि से आकाश सुशोभित था। नगर की गलियां खाली हो गईं, और स्त्रियां पुष्पांजलि अर्पित कर रही थीं।
श्लोक 82 से 91
नगर से प्रस्थान और सेना की शोभा
नगरवासी आशीर्वाद दे रहे थे। भरत रत्नों से देदीप्यमान गोपुरद्वार से निकले। सेना असंख्य और विशाल थी, मानो नवीन सृष्टि हो। देवता आश्चर्य से इसे देख रहे थे। चक्ररत्न और दण्डरत्न के नेतृत्व में सेना पूर्व दिशा की ओर बढ़ी।
श्लोक 92 से 101
मार्ग की प्राकृतिक शोभा
भरत ने शरद् ऋतु की शोभा देखी। सरोवर, हंस, चकवा-चकवी, और नदियों के किनारे मनोहर थे। हंस और चकवी की गतिविधियां भरत के मन को प्रसन्न करती थीं। नदियों और लतागृहों की शोभा ने उनके हृदय में प्रीति जागृत की।
श्लोक 102 से 111
मार्ग के दृश्य
भरत ने लतागृहों में किन्नरों, भौंरों, और फूलों से सजे वृक्षों को देखा। सरोवरों की भूमि सुवर्ण धूलि सी प्रतीत होती थी। सेना की धूलि से चकवी को रात्रि का भ्रम हुआ। गायें, बैल, और बछड़े ग्रामीण जीवन की शोभा बढ़ाते थे।
श्लोक 112 से 121
खेतों और ग्रामीण जीवन की शोभा
पके धान के खेत और कमल सूंघते पौधे भरत को आनंदित करते थे। धान की समृद्धि गायों के समान थी। धान की रखवाली करने वाली स्त्रियां गीत गाती थीं। किसान खेतों की रक्षा करते थे। गांव के मार्ग और बगीचे मनोहर थे।
श्लोक 122 से 128
ग्रामों और गंगा की ओर प्रस्थान
भरत ने गांवों के मुखिया, बगीचे, और लताओं से सजे ग्राम देखे। गांववासी घी, दही, और फल भेंट करते थे। सेना के साथ भरत गंगा नदी के समीप पहुंचे।
श्लोक 129 से 147
गंगा नदी का वर्णन
गंगा नदी भरत की कीर्ति, जिनवाणी, विजयलक्ष्मी, और राज्यलक्ष्मी के समान थी। इसके किनारे वन, लहरें, हंस, और भंवर इसे स्त्री, गाय, और सेना के समान शोभायमान करते थे। किन्नरों के गीत और हरिणों की उपस्थिति इसकी शोभा बढ़ाते थे।
श्लोक 148 से 150
गंगा की शोभा और भरत का आनंद
शरद् ऋतु में गंगा की कान्ति, वन, बालू के टीले, और भंवर इसे तरुण स्त्री समान बनाते थे। कमलों की सुगंध और वायु रानियों के परिश्रम को हरते थे। गंगा जिनेन्द्र की कीर्ति के समान पवित्र और आनंददायी थी, जिसे देखकर भरत परम प्रीति को प्राप्त हुए।
पर्व 27 – भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन
श्लोक 1 से 11
गंगा नदी की महिमा और भरत की दृष्टि
महाराज भरत ने गंगा नदी पर दृष्टि डाली, जो स्वच्छ जल से उनके लिए पादोदक प्रदान करती सी प्रतीत हुई। सारथि ने गंगा की तुलना ऋषभदेव की वाणी से की, जो संसार को आनंदित और पापों को नष्ट करती है। गंगा हिमवान् पर्वत और समुद्र को पवित्र करती है। यह जंगली हाथियों को शांत करती है, जैसे सम्यग्ज्ञान मुनियों को अहंकार से मुक्त करता है। गंगा का प्रवाह समुद्र द्वारा धारण किया जाता है, जो इसकी पवित्रता और निर्मलता को दर्शाता है। यह हिमवान् की कीर्ति के समान है और आकाशगंगा कहलाती है।
श्लोक 12 से 21
गंगा की शोभा और शरद् ऋतु
गंगा नदी तटवर्ती वनों से नीले वस्त्र धारण किए सी सुशोभित है। हंसों की पंक्तियां इसकी सुवर्णमय करधनी और सहायक नदियां इसकी सखियां प्रतीत होती हैं। यह राजलक्ष्मी के समान पूज्य और प्रेम उत्पन्न करने वाली है। गंगा वनवेदिका को धारण करती है। शरद् ऋतु में सप्तपर्ण वृक्ष सुगंध बिखेरते हैं, बाण वृक्ष कामी चित्त को आकर्षित करते हैं, और तालाबों में नील कमल शरद् लक्ष्मी के मुख समान खिलते हैं। भौंरे कमलों में आसक्त हैं।
श्लोक 22 से 31
प्रकृति और गंगा की शोभा
भौंरे कमल के पराग से पीले होकर कामरूपी अग्नि के स्फुलिंग समान हैं। स्थल कमल शरद् लक्ष्मी के तंबू प्रतीत होते हैं। हंस कमल को स्थल समझकर पानी में डूब जाता है, मृणाल को मक्खन समझकर बच्चों को देता है, और चकवी को न देखकर करुण स्वर में रोता है। गंगा के किनारे सप्तपर्ण वृक्ष चंदोवा की शोभा धारण करते हैं। गंगा की लहरों से उठा पवन थकान हरता है और वनों को हिलाता है।
श्लोक 32 से 41
वन और देव क्रीड़ा
गंगा का पवन जल की बूंदों से अतिथि सत्कार करता प्रतीत होता है। वन दुर्गम और देवों द्वारा अधिष्ठित है, जहां लतागृह फूलों की शय्याओं से सुशोभित हैं। देव और देवांगनाएं मंदार वृक्षों की छाया में चंद्रकांत शिलाओं पर क्रीड़ा करते हैं। किन्नर, सिद्ध, और विद्याधरियां संगीत, नृत्य, और विलास से वन की शोभा बढ़ाते हैं। ऋतुओं का समूह वन में एकत्र होकर उत्सव जैसा प्रतीत होता है।
श्लोक 42 से 51
वन में ऋतुओं की शोभा
अशोक और आम्र वृक्ष फूलों से विद्याधरियों और कोकिलों की शोभा बढ़ाते हैं। चंपक वृक्ष वसंत में कामदेव के दीपक समान खिलते हैं। भौंरे और कोयल कामदेव की सेना के बाजे और नगाड़े प्रतीत होते हैं। माधवी और मालती लताएं वसंत और ग्रीष्म की सुगंध से भौंरों को चंचल करती हैं। वर्षा ऋतु में कदंब और केतकी की सुगंध वायु में फैलती है। मयूर, कोयल, और हंस विभिन्न शब्दों से वन को जीवंत बनाते हैं।
श्लोक 52 से 61
वन का संगीतमय वातावरण
भौंरे किन्नरियों के गीतों, कोयल सिद्धों की वीणा, और हंस विद्याधरियों के नूपुरों का अनुकरण करते हैं। मयूर नृत्य करते हैं, और हंसों के शब्द सुबह सोए हुए पक्षियों को जगाते हैं। लतागृह चंद्रकांत शिलाओं और फूलों की शय्याओं से देवों के नंदन वन समान प्रीतिकर हैं। वन के बाहर दुर्गम जंगल है, जहां सेना के क्षोभ से मृग भयभीत होकर भागते हैं।
श्लोक 62 से 71
वन्य जीवों का क्षोभ
सेना के क्षोभ से हाथी, सर्प, और अजगर भयभीत हैं। शुकर और गैंडा सेना को व्याकुल करते हैं। सिंह, भैंसा, और अन्य क्रूर जीव वन से निकलकर सेना का भय बढ़ाते हैं। अष्टापद नामक जीव छलांग मारकर भी दुखी नहीं होता। मृग और खरगोश भय से इधर-उधर दौड़ते हैं, जिससे सेना का क्षोभ बढ़ता है।
श्लोक 72 से 81
वन्य जीव और वन की शोभा
कृष्णसार मृग और हरिण सेना के बीच छिपते हैं। घायल हरिण समूह भरत से जीव पालन का आग्रह करता प्रतीत होता है। मयूर अपनी पूंछ से वन की शोभा बढ़ाते हैं। हरिण रथ के शब्द सुनकर भी मार्ग से नहीं हटते। स्त्रियां हरिणियों के नेत्रों और पूंछों में अपनी शोभा देखती हैं। वन जीवों के सह-अस्तित्व से शांत रहता है। घने वृक्षों की छाया सैनिकों को सूर्य की तीव्रता से बचाती है, मानो वनलक्ष्मी ने मंडप सजाए हों।
श्लोक 82 से 91
वन की शोभा और सेना की तुलना
गंगा के किनारे स्वच्छ तालाब वन-लक्ष्मी की प्याऊ जैसे प्रतीत होते हैं, जो गर्मी और क्लेश दूर करते हैं। सारथि ने वन की तुलना भरत की सेना से की, जिसमें बाण-असन वृक्ष धनुषों, गैंडा-हाथी तलवारधारी सैनिकों, और विशालता सेना की अनंतता को दर्शाते हैं। भरत ने वन को पार किया, बिना इसकी लंबाई का आभास हुए। घोड़ों की धूलि दिशाओं को परदे सी ढक रही थी। सैनिकों के कवच और स्त्रियों के वस्त्र धूल से रंगे थे। मध्याह्न में सूर्य विजिगीषु राजा सा प्रतापी और निर्मल था। पक्षी और हंस गर्मी से वृक्षों की छाया में शरण लेते थे।
श्लोक 92 से 101
मध्याह्न की गर्मी और प्रकृति
जंगली हाथी और शूकर गर्मी से सरोवरों में शरण लेते थे। हंस मृणाल से ढके और चकवा शेवाल से नीले कुरते सा प्रतीत होता था। राजहंस कमल के छत्र तले गोते लगाते थे। सूर्य की तीव्रता नदियों के किनारों पर हंसों को असंतोष देती थी। सूर्य, मध्यस्थ होकर भी संतापकारी था। रानियों के मुख पर पसीने की बूंदें कमल पर ओस सी शोभा बढ़ाती थीं, मानो मोती पिघलकर तरल हो गए हों।
श्लोक 102 से 111
रानियों और सेना की स्थिति
रानियों के मुख पर पसीने की बूंदें सौंदर्य रस को पुष्ट करती थीं। घोड़ों के मुख पर फेन और खुर स्खलित हो रहे थे। उत्तम घोड़े तीव्र वेग, सुंदर गमन, और बुद्धि-बल से युक्त थे, जो धूलि से रजस्वला पृथ्वी को घृणा करते हुए दौड़ते थे। पैदल सैनिक जूतों से कांटे-पत्थर लांघते, रथ-घोड़ों से तेज चलते थे। शक्ति, लट्ठ, भाला, और तलवारधारी योद्धा स्पर्धा में जल्दी दौड़ते थे।
श्लोक 112 से 121
सेना का उत्साह और मार्ग की अव्यवस्था
योद्धा जोर-जोर से चिल्लाकर मार्ग खाली कराते थे, घोड़ों, हाथियों, और रथों से बचने को कहते थे। एक दुष्ट हाथी और उलटा रथ मार्ग रोक रहे थे। घबड़ाया ऊंट और खच्चर से गिरी स्त्री अव्यवस्था दर्शाते थे। एक तरुण पुरुष वेश्या के मुख से चकित होकर गिरा, और बूढ़ा कुट्टिनी के पीछे तरुण सा व्यवहार करता था। सैनिक बातचीत में मग्न होकर शिबिर पहुंचे, बिना परिश्रम का आभास।
श्लोक 122 से 131
शिबिर की ओर प्रस्थान
मध्याह्न में सूर्य रानियों के मुख की कान्ति मलिन करता था, पर छत्ररत्न और रथ के कारण भरत को गर्मी का कष्ट नहीं हुआ। रथ का वेग और वृद्धों की कथाओं ने मार्ग को सरल बनाया। ध्वजा मार्ग सूचित करती थी। अन्य राजा कठिनाई से भरत के रथ के समीप पहुंचे। शिबिर के रावडी तंबू, चांदी के खंभे, और स्थलकमल जैसे अग्रभाग मनोहर थे।
श्लोक 132 से 141
शिबिर और बाजार की शोभा
शिबिर की कटीली बाड़ियां भरत के निष्कंटक राज्य का प्रतीक थीं। वृक्षों पर टंगे पलान और डेरे शोभा बढ़ाते थे। बाजार में तोरण, ध्वजाएं, और रत्नों की राशि थी। भरत ने रत्नों को देखकर निधियों की संख्या को प्रसिद्धि मात्र माना। बाजार समुद्र सा था, जिसमें घोड़े लहरें, तलवारें मछलियां, और हाथी मगर थे। राजमार्ग राजकुमारों से भरा था।
श्लोक 142 से 152
शिबिर का वैभव और भरत की आराधना
शिबिर का आंगन रत्नों, रथों, घोड़ों, और हाथियों से सुशोभित था, जो बगीचे और सभामंडप सा प्रतीत होता था। द्वारपाल भीड़ को हटाते थे, और मंगलमय शब्द सरस्वती की उपस्थिति दर्शाते थे। शिबिर की अनोखी शोभा भरत को आश्चर्यचकित करती थी। लक्ष्मीपति भरत ने पताकाओं और मंगल-द्रव्यों से युक्त तंबू में प्रवेश किया। सेना शांत होकर शिबिर में बसी। पूर्व दिशा के राजाओं ने धन, कन्याएं, और वस्तुएं भेंटकर भरत की सेवा की, जबकि अन्य राजा दूर से प्रणाम करते थे।
आदिपुराण पर्व 28 – पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन
श्लोक 1 से 11
चक्रवर्ती भरत का प्रस्थान और सेना की शोभा
चक्रवर्ती भरत ने प्रातःकाल की क्रियाएँ पूर्ण कर चक्ररत्न के पीछे प्रस्थान किया। चक्ररत्न और दण्डरत्न, दोनों देवों द्वारा रक्षित, सेना के अग्रभाग में थे और विजय के प्रमुख कारण थे। भरत विजयपर्वत नामक विशाल हाथी पर सवार हुए, जो विजयार्ध पर्वत से स्पर्धा करता था। उनकी शोभा इन्द्र के समान थी, सफेद छत्र यश का प्रतीक था, और चमरों की पंक्ति लक्ष्मी के हास्य-सी शोभित थी। सेनापति सैनिकों को समुद्र तक शीघ्र प्रस्थान के लिए प्रेरित कर रहे थे।
श्लोक 12 से 21
सेना का समुद्र की ओर प्रयाण और गंगा के साथ समानता
सेनापतियों के आह्वान पर सैनिकों ने समुद्र की ओर प्रस्थान किया, जहाँ मागधदेव को वश करना था। नगाड़ों के शब्द से आकाश गूंज उठा। सेना गंगा के किनारे चलती हुई गंगा नदी की तरह प्रतीत होती थी, जिसमें चमर, ध्वजाएँ, और घोड़े गंगा के हंस, बगुले, और तरंगों जैसे थे। सेना की गति अविचल थी और वह गंगा को भी परास्त करती प्रतीत होती थी, क्योंकि यह चक्रवर्ती की आज्ञा का पालन करती थी। ध्वजाएँ आकाश को स्वच्छ करती सी प्रतीत होती थीं।
श्लोक 22 से 31
मार्ग में देशों और शत्रुओं पर विजय
भरत ने मार्ग में अनेक देश, नदियाँ, पर्वत, और किले पार किए। शत्रु बिना युद्ध के समर्पण कर रहे थे, और मण्डलेश्वर राजा उन्हें प्रणाम करते थे। भरत ने अपनी प्रभुता से शत्रुओं की भूमि छीन ली और उनकी धूल में मिला दिया। सन्धि आदि गुणों में वे अद्वितीय थे, जिससे शत्रुओं को परास्त करना उनके लिए सहज था। बिना तलवार या धनुष का उपयोग किए उन्होंने पूर्व दिशा जीत ली।
श्लोक 32 से 41
ग्वालाओं और भीलों का दर्शन
भरत ने मार्ग में गोकुलों में दही मथती ग्वालाओं को देखा, जो श्रम और शोभा से युक्त थीं। उनकी गतिविधियाँ और सौन्दर्य मनमोहक थे। वनों में भील लोग जंगली हाथियों के दाँत और मोती भेंट करते दिखे। भील कन्याएँ सौन्दर्य और सादगी से युक्त थीं, जो सेना को देखकर विस्मित थीं।
श्लोक 42 से 51
समुद्र के समीप शिविर और उप-समुद्र का दर्शन
म्लेच्छ राजाओं ने भेंट देकर भरत की आज्ञा स्वीकारी। सेनापति ने अन्तपालों के किलों को वश में किया। सेना गंगाद्वार और समुद्र तक पहुँची, जहाँ उप-समुद्र का जल गहरा और स्थायी था। भरत ने गंगा के उपवन में सेना को ठहराया, जहाँ शिविर की रचना नन्दन वन-सी थी। सेना गंगा की शीतल वायु में सुखपूर्वक रही।
श्लोक 52 से 61
लवण समुद्र विजय की तैयारी
भरत ने मागधदेव को वश करने के लिए अरहन्त देव की आराधना का विचार किया। उन्होंने पंच परमेष्ठी की पूजा की, सेना की रक्षा हेतु सेनापति नियुक्त किया, और अजितंजय रथ पर सवार होकर समुद्र विजय के लिए प्रस्थान किया। पुरोहित ने मंगल आशीर्वाद और ऋचा पढ़कर उनकी विजय की कामना की।
श्लोक 62 से 102
समुद्र का वर्णन और भरत की वेदी पर आरूढ़ता
भरत गंगाद्वार की वेदी पर चढ़े, जिसे वे समुद्र में प्रवेश और कार्य-सिद्धि का द्वार मानते थे। समुद्र का वर्णन अनेक रूपकों से किया गया: वह लहरों से उछलता, शंखों और रत्नों से युक्त, और चक्रवर्ती की सेना-सा अलंघनीय था। यह अपस्मार रोगी, सर्प, पेटू, राक्षस, बालक, और सिद्धालय-सा प्रतीत होता था। इसकी गहराई, चंचलता, और रत्नों की शोभा विस्मयकारी थी। भरत ने इसे अपूर्व महानिधि के रूप में देखा, जो उनकी विजय की वेदी पर उनकी शोभा को बढ़ा रहा था।
श्लोक 103 से 111
समुद्र में रथ का वेग और चक्रवर्ती का प्रभाव
चक्रवर्ती भरत ने गंभीर समुद्र को तुच्छ समझकर सिद्ध परमेष्ठी को नमस्कार किया और रथ को शीघ्र बढ़ाने की आज्ञा दी। उनका रथ मन-सा वेगवान घोड़ों द्वारा समुद्र में जहाज की भाँति तेजी से चला। जल में भी रथ और घोड़े स्थल की तरह दौड़ रहे थे, जो चक्रवर्ती के पुण्य का आश्चर्य था। लहरें घोड़ों का परिश्रम दूर करती थीं, और रथ के पहियों से उछलता जल ध्वजा को भारी करता था। घोड़ों का अंगराग केवल जल के छींटों से धुल गया।
श्लोक 112 से 121
रथ का समुद्र में रुकना और बाण प्रक्षेपण
रथ के पहियों से जल दो भागों में बँटकर मार्ग बनाता प्रतीत हुआ। रथ समुद्र में बारह योजन चलकर रुक गया, तब क्रुद्ध भरत ने धनुष उठाया। धनुष की प्रत्यंचा के शब्द से समुद्र और मछलियाँ क्षुब्ध हो उठीं। विद्याधरों को संसार के संहार की आशंका हुई। भरत ने अमोघ बाण पर अपनी पहचान अंकित कर मागधदेव को अधीन करने का संदेश देते हुए उसे पूर्व दिशा में छोड़ा।
श्लोक 122 से 131
मागधदेव का क्रोध और प्रतिक्रिया
बाण का भारी शब्द मागधदेव की सेना में क्षोभ उत्पन्न करता हुआ उनके निवास में जा गिरा। व्यन्तरदेवों ने इसे कल्पान्त या भूकंप समझकर मागधदेव को घेर लिया। मागधदेव ने क्रोधित होकर बाण को चूर करने और शत्रु को नष्ट करने की बात कही। उन्होंने कहा कि पराभव सहन करना पुरुष के लिए कलंक है और सच्चा पुरुष पराक्रम से कुल को पवित्र करता है।
श्लोक 132 से 141
मागधदेव का क्रोध और देवों की सलाह
मागधदेव ने शत्रु को युद्ध और मृत्यु देने की घोषणा की, पर समीपवर्ती देवों ने उनके क्रोध को शांत किया। उन्होंने कहा कि बलवानों से विरोध पराभव लाता है और यश की रक्षा समर्थ पुरुष के आश्रय से ही संभव है। बुद्धिमान को बिना विचार किए कार्य नहीं करना चाहिए। देवों ने सुझाव दिया कि बाण की उत्पत्ति की जाँच हो, क्योंकि यह चक्रवर्ती का ही हो सकता है।
श्लोक 142 से 151
मागधदेव का प्रबोधन और चक्रवर्ती की पहचान
देवों ने कहा कि चक्रवर्ती के बाण पर अंकित नाम उनकी पहचान प्रकट करता है। उन्होंने मागधदेव को क्रोध त्यागकर चक्रवर्ती की आज्ञा मानने और बाण की पूजा कर उन्हें अर्पित करने की सलाह दी। उन्होंने बताया कि चक्रवर्ती के साथ वैर से शांति नहीं मिलेगी और पूज्य पुरुषों की पूजा से दोनों लोकों में उन्नति होती है।
श्लोक 152 से 161
मागधदेव का समर्पण और भरत के प्रति नम्रता
मागधदेव ने देवों के वचनों से प्रबोध प्राप्त कर चक्रवर्ती भरत की महिमा स्वीकारी। उनके मन में भय, आशंका, और प्रबोध उत्पन्न हुआ। क्रोध शांत होने पर उन्होंने भरत को प्रथम चक्रवर्ती, वृषभदेव के पुत्र, और पूज्य माना। वे आकाश-मार्ग से भरत के पास पहुँचे, बाण अर्पित कर नमस्कार किया, और स्वयं को उनका सेवक स्वीकार करने की प्रार्थना की। उन्होंने अपने अपराध की क्षमा माँगी और भरत के चरणों की सेवा से पवित्र होने की बात कही।
श्लोक 162 से 171
मागधदेव की भेंट और समुद्र का वर्णन
मागधदेव ने भरत को अमूल्य रत्न, दिव्य मोतियों का हार, और कुण्डल भेंट किए, जो उनके वक्ष और कानों को शोभित करने योग्य थे। प्रसन्न मागधदेव ने रत्नों से भरत की पूजा की और उनकी अनुमति से अपने स्थान को लौट गए। भरत ने समुद्र और उसके अन्तर्वीपों को देखकर आश्चर्य अनुभव किया। सारथि ने समुद्र की शोभा का वर्णन किया, जिसमें लहरें मणियों से पूजा करती प्रतीत होती थीं, शंखों का शब्द गूंजता था, और जल दिशाओं में यश बांटता प्रतीत होता था। समुद्र का जल आकाश और राजकुलों से तुलनीय था।
श्लोक 172 से 181
समुद्र की तुलना और आश्चर्य
सारथि ने कहा कि गंगा और सिन्धु का जल समुद्र में मिलता है, पर यह तृप्त नहीं होता, जैसे मूर्ख मूर्खों के संग्रह से संतुष्ट नहीं होता। समुद्र के जलचर जीव इसके पुत्र, नदियाँ स्त्रियाँ, और बालू रत्न हैं, फिर भी यह महोदधि कहलाता है, जो आश्चर्यजनक है। सर्प अलातचक्र-से शोभित हैं, और समुद्र चन्द्र-स्पर्श से क्रोधित-सा उछलता है। इसके भीतर देवों के क्रीड़ास्थल और द्वीप किलों-से हैं। समुद्र किनारे के वनों को ताड़न करता प्रतीत होता है और कुलपर्वतों को चुनौती देता है। सर्प और मछलियाँ इसमें भोजन के लिए संघर्ष करती हैं।
श्लोक 182 से 191
समुद्र के जीव और किनारे की शोभा
सारथि ने समुद्र के जीवों का वर्णन किया: एक मछली रथ को मूर्खतावश बड़ा मच्छ समझती है, सर्प तरंगों-से दीपक प्रज्वलित करते प्रतीत होते हैं। समुद्र का जल रत्नों से दीप्तिमान और दीपकों-युक्त घर-सा है। ज्वार-भाटे और मयूरों के नृत्य से यह जीवंत है। किनारे के वन सूर्य के ताप से मुक्त, फूलों और लहरों से शोभित हैं। हरिण तालाबों के पास विचरण करते हैं और दावानल की शंका से लौटते हैं। समुद्र नदियों को आलिंगन करता है, पर तृप्त नहीं होता।
श्लोक 192 से 201
समुद्र की गतिविधियाँ और रत्नों की महिमा
समुद्र के किनारे मन्दार वृक्षों में विद्याधरियाँ टहलती हैं। मछलियाँ और अजगर परस्पर युद्धरत हैं, पर समान बल के कारण विजय नहीं होती। जंगली हाथी समुद्र को ताड़न करते हैं, जो मृदंग-सा बजता है। जल मछलियों, सीपों, और सर्पों की कांचलियों से भयानक है। वायु किनारे की सुगंध और लहरों को हिलाता है। समुद्र की भूमियाँ मोतियों और देवों की सेवा से शोभित हैं। जलचर जीव समुद्र को पिता मानकर इसके धन के लिए लड़ते हैं। समुद्र के रत्न और जल बड़वानल के बावजूद अक्षय हैं।
श्लोक 202 से 211
समुद्र और भरत की समानता, छावनी में वापसी
सारथि ने समुद्र और भरत की समानता बताई: दोनों आश्चर्यों, रत्नों, गंभीरता, और शक्ति से युक्त हैं, पर भरत मूर्खों से मुक्त हैं। भरत आनंदित होकर छावनी की ओर प्रस्थान करते हैं। सारथि ने कठिनाई से रथ लौटाया, और समुद्र की लहरें रथ का पीछा करती प्रतीत हुईं। रथ किनारे पहुँचा, और लोग भरत के पुण्य और सकुशल वापसी की प्रशंसा करते हैं। राजा और सैनिक जयघोष के साथ उनका स्वागत करते हैं। भरत छावनी में प्रवेश कर राजभवन पहुँचते हैं, जहाँ मंगलाक्षत और आशीर्वाद प्राप्त होते हैं।
श्लोक 212 से 221
भरत की विजय और पुण्य की महिमा
लोगों ने भरत को शत्रु-विजय और चिरायु होने के आशीर्वाद दिए, जो पुनरुक्त थे, क्योंकि वे पहले ही ये प्राप्त कर चुके थे। पुण्य के प्रभाव से भरत ने अगाध समुद्र को पार कर मागधदेव को वश किया। पुण्य ही जल-स्थल में शरण और सुख देता है। जिनेन्द्र द्वारा बताए गए पुण्यकर्मों—जिनपूजा, दान, व्रत, उपवास—का संचय करने की सलाह दी गई। भरत सभाभवन में सिंहासन पर विराजते हैं और गंगा के किनारे सेना के साथ सुखपूर्वक निवास करते हैं, जिनेन्द्र का स्मरण करते हुए।
पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला
श्लोक 1 से 11
चक्रवर्ती भरत का प्रस्थान और सेना की भव्यता
चक्रवर्ती भरत जिनेन्द्रदेव की पूजा कर दक्षिण दिशा जीतने के लिए समुद्र तट के किनारे प्रस्थान करते हैं। उनकी सेना की भव्यता नगाड़ों, तुरहियों और विजय-पताकाओं से प्रकट होती है, जो समुद्र की गर्जना और शत्रुओं के हृदयों को कंपित करती है। सेना का समूह समुद्र और उपसागर के बीच तीसरे समुद्र की तरह शोभित होता है। चक्ररत्न और दण्डरत्न के नेतृत्व में यह सेना शत्रुओं को नष्ट करती है। भरत की आज्ञा राजाओं के मस्तक पर चढ़ती है, और शत्रु उनके प्रस्थान की सूचना सुनकर भागने या शरण लेने को तत्पर हो जाते हैं।
श्लोक 12 से 21
शत्रुओं का भय और पराजय
भरत के आगमन से शत्रु राजा भयभीत और व्याकुल हो जाते हैं। जो उनके विरुद्ध खड़ा होता है, वह वंश सहित नष्ट हो जाता है। विरोधी राजा उनकी सेना का शब्द सुनकर भागते हैं या राज्य-चिह्न त्याग देते हैं। कुछ दुष्ट राजाओं को मंत्रबल से कैद कर उनके स्थान पर कुलीन राजा नियुक्त किए जाते हैं। कई राजा भरत के चरणों की शरण लेते हैं, जबकि उनके समीप आने से शत्रुओं के वाहन और तेज नष्ट हो जाते हैं, और वे मृत्यु के निकट पहुंच जाते हैं।
श्लोक 22 से 31
शत्रुओं का धन-हरण और प्रजा का कल्याण
भरत शत्रुओं के रत्न और धन छीनकर उन्हें निर्धन करते हैं, परंतु आत्मसमर्पण करने वाले राजाओं को उच्च पद प्रदान करते हैं। पृथिवी उनके धन से संतुष्ट हो निर्भय हो जाती है। वे अहंकारी राजाओं को दण्डित और सत्कर्मी राजाओं को सम्मानित करते हैं। प्रजा और राजाओं के कल्याण के लिए योग और क्षेम की चिंता करते हैं। उनका पुण्य और चक्ररत्न विजय के मुख्य साधन हैं, जबकि सेना केवल वैभव के लिए है।
श्लोक 32 से 41
राजाओं का सम्मान और क्षेत्रों की विजय
भरत प्रणाम करने वाले राजाओं को फल देकर अनुग्रह करते हैं और विभिन्न भाव-भंगिमाओं से उन्हें प्रसन्न करते हैं। वे नम्रीभूत राजाओं को संतुष्ट और विरोधियों को संतप्त करते हैं। अंग, वंग, कलिंग, मगध आदि देशों के राजा रत्न और हाथी भेंटकर उनकी कृपा पाते हैं। सेनापति बिना परिश्रम के कुरु, अवंती, काशी आदि देशों को वश में करता है और अन्य क्षेत्रों में भरत की आज्ञा स्थापित करता है।
श्लोक 42 से 51
रत्नों की प्राप्ति और नदियों का भ्रमण
भरत को विभिन्न क्षेत्रों से रत्न भेंट मिलते हैं, मानो पृथिवी उनकी सेना के बोझ से रत्न उत्पन्न करती हो। उनके हाथी हिमवत् से गोरथ पर्वत तक विचरण करते हैं। सेनापति बंग, मगध, काशी आदि देशों में विजय प्राप्त करता है। सेना गंगा, यमुना, गोदावरी जैसी नदियों को पार करती है और लौहित्य समुद्र तक पहुंचती है।
श्लोक 52 से 66
नदियों और पर्वतों पर विजय
भरत की सेना शोण, नर्मदा, यमुना आदि नदियों और ऋष्यमूक, माल्य जैसे पर्वतों को पार करती है। सैनिक जंगली हाथियों को वश में करते हैं और नदियों को चौड़ा करते हैं। उनकी सेना विशाला, सिन्धु, शिप्रा आदि अनेक नदियों को घेरकर विजय पताका फहराती है।
श्लोक 67 से 81
पर्वतों और दुर्गम क्षेत्रों की विजय
सेना तैरश्चिक, वैडूर्य, पुष्पगिरि जैसे पर्वतों को लांघती है और ऋक्षवान्, कम्बल आदि की गुफाओं में विश्राम करती है। सैनिक दुस्तर नदियों और दुरारोह पर्वतों को सुगम बनाते हैं। भरत उपसमुद्र और द्वीपों के राजाओं को वश में करते हैं, उनके किलों को जीतते हैं, और रत्न लेकर उन्हें पुनः स्थापित करते हैं। वे दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थान कर त्रिकलिंग, केरल, पाण्ड्य आदि देशों को जीतते हैं।
श्लोक 82 से 90
दक्षिण दिशा की पूर्ण विजय
सेनापति कालिंगक वन, तैला, गोदावरी, वैतरणी जैसी नदियों और महेन्द्र, विन्ध्य, मलय जैसे पर्वतों को जीतता है। वह दक्षिण के त्रिकलिंग, पाण्ड्य, कवाटक आदि देशों के राजाओं को भरत की आज्ञा का पालन करने को बाध्य करता है। सेना श्रीपर्वत, किष्किन्ध आदि पर्वतों तक पहुंचकर यथायोग्य लाभ प्राप्त करती है, और चक्रवर्ती भरत की विजय पूर्ण होती है।
श्लोक 91 से 101
दक्षिण देशों के राजाओं की विजय
चक्रवर्ती भरत के सेनापति ने कर्णाटक, आंध्र, कलिंग, ओण्ड्र, चोल, केरल, पाण्ड्य और अन्य देशों के राजाओं को अपनी विजयी सेना द्वारा वश में किया। ये राजा अपनी विशेषताओं जैसे यश, कठोरता, कला-कौशल, मूर्खता, कुटिलता, सरलता और पराक्रम के लिए प्रसिद्ध थे। उन्होंने भयपूर्वक भेंट देकर और दूर से प्रणाम कर चक्रवर्ती की कृपा प्राप्त की। भरत ने कर वसूली द्वारा दक्षिण दिशा को वशीभूत किया और समुद्र तट के सुगंधित वनों को देखकर संतोष प्राप्त किया, जहाँ वायु और वन उनकी सेवा करते प्रतीत हुए।
श्लोक 102 से 111
वन में सेना का पड़ाव
भरत ने वैजयन्त नामक समुद्र द्वार के समीप वन में अपनी सेना ठहराई। वन और सेना में समानता थी, क्योंकि दोनों ही हाथियों, उत्तम पुरुषों, फूलों और सवारियों से युक्त थे। वन के वृक्ष राजाओं की तरह छाया, फल और वैभव से सुशोभित थे। सैनिक फलयुक्त वृक्षों का आश्रय लेते थे, तालाबों के किनारे स्त्रियों सहित विश्राम करते थे, और घोड़े घास चरते थे। वानरों द्वारा करेंच फलों के कारण सैनिक व्याकुल हो रहे थे।
श्लोक 112 से 121
घोड़ों और हाथियों की क्रीड़ा
सेना के घोड़े तालाबों में स्नान कर कमल पराग से शोभित हो रहे थे, मानो मंडप में खड़े हों। वे धूलि झाड़कर जल में प्रवेश करते और विश्राम करते थे। हाथी नारियल वनों में ठहरे, जहाँ महावत उन्हें तालाबों में नहलाने और पानी पिलाने ले जाते थे। कुछ हाथी कमलिनी युक्त जल में प्रवेश करने से डरते, जबकि अन्य विश्राम करते थे।
श्लोक 122 से 131
हाथियों का व्यवहार
कुछ नवीन और पुराने हाथी तालाबों में प्रवेश नहीं करते थे, या तो कमलिनी के भय से या वन के सुखों के स्मरण में। वे सूंड़ से पानी उछालते और मदोन्मत्त होकर क्रीड़ा करते थे। कुछ हाथी जंगली हाथियों की गंध से कुपित हो जल में प्रवेश नहीं करते थे, और अपने मद से तालाब का जल बढ़ा देते थे, मानो उदारता दिखाते हों।
श्लोक 132 से 141
हाथियों की क्रीड़ा और शोभा
हाथी सूंड़ से पानी उछालते, मृणाल खाते और कमल धारण कर शोभित होते थे। कुछ डरपोक हाथी मृणाल को साँकल समझकर किनारे पर रुक जाते थे। स्नान के बाद वे पराग से शृंगारित होकर तालाबों से बाहर निकलते, पर धूल डालकर फिर मैले हो जाते। उनकी यह प्रवृत्ति उनकी स्वाभाविक प्रकृति को दर्शाती थी। पक्षी उनके भय से किनारे चले जाते थे।
श्लोक 142 से 151
हाथियों का विश्राम और बंधन
सरोवरों में क्रीड़ा के बाद हाथी वृक्षों के पास विश्राम करते, पर बंधन स्थान का ज्ञान नहीं रखते। महावत उन्हें जल पिलाने का प्रयास करते, पर मदोन्मत्त हाथी न तो जल पीते, न भोजन करते। कुछ हिंसक हाथियों को बंधन में रखा जाता, जबकि अहिंसक मुक्त रहते। ऊँचे वृक्षों में बंधे हाथी सुखपूर्वक विश्राम करते, और हथिनियाँ बच्चों के साथ क्रीड़ा करती थीं।
श्लोक 152 से 161
हथिनियों और बच्चों की क्रीड़ा
हथिनियाँ और उनके बच्चे तालाबों में जल पीकर वन में भोजन के लिए जाते, लताएँ और पत्ते खाते। बच्चे लतागृहों में क्रीड़ा करते। कुछ बच्चे ऊँटों के दूषित जल को नहीं पीते, पर हाथियों के मद युक्त जल को प्रेम से पीते। डरे हुए घोड़े और खच्चरों से सेना में क्षोभ उत्पन्न होता, और सैनिकों के शब्दों से हलचल मचती।
श्लोक 162 से 169
चक्रवर्ती का वैभव और समुद्र विजय
चक्रवर्ती भरत राजाओं के साथ उच्च शिविर में प्रवेश करते, जहाँ वायु उनकी सेवा करती। उनकी सेना समुद्र की तरह रत्नों, राजाओं और वैभव से युक्त थी। भरत ने समुद्र में जाकर वरतनु देव को जीता, कवच, हार, चूड़ारत्न आदि प्राप्त किए, और वैजयन्त द्वार से लौटकर शिविर में प्रवेश किया। लवण समुद्र उनकी सेवा करता, मानो मंत्री या इन्द्र की तरह, और उनकी विजय का मंगल-पाठ करता। इस प्रकार भरत ने दक्षिण समुद्र को जीता।
आदिपुराण पर्व 30 – पश्चिम समुद्र के द्वारका विजय वर्णन
श्लोक 1 से 11 : चक्रवर्ती भरत की सेना का नैर्ऋत्य दिशा पर अभियान
चक्रवर्ती भरत अपनी विशाल सेना के साथ नैर्ऋत्य दिशा (दक्षिण-पश्चिम) को जीतने के लिए निकले। उनकी सेना में घोड़े आगे, रथ पीछे, हाथी बीच में और प्यादे सर्वत्र थे। देवों और विद्याधरों की सेना के साथ यह चार अंगों वाली सेना छह अंगों से विस्तारित थी। सेना के आंदोलन से समुद्र लहराने लगा, मानो वह महापुरुषों के अनुकरण का संदेश दे रहा हो। विरोधी राजा परास्त हो गए, नदियाँ कीचड़मय और पहाड़ समतल हो गए। भरत की सिद्धियाँ उनके उद्योगों से फलित हुईं। उनकी अजेय शक्ति और सेना ने शत्रुओं पर प्रभाव डाला। योद्धा और बाण समान गुणों वाले थे, दोनों विजय के अंग बने। शत्रुओं के छत्र-चमर छीन लिए गए, जिससे वे सहायता-रहित हो गए। श्लेष अलंकार से युक्त एक श्लोक में विरोधी राजाओं के कुपतित्व (दरिद्रता) का वर्णन है, जो उनकी पराजय के बाद जंगलों में फल खाकर जीवनयापन करते थे। भरत को सन्धि-विग्रह की चिन्ता केवल व्याकरण तक सीमित थी, क्योंकि उन्होंने सभी शत्रुओं को नष्ट कर दिया था।
श्लोक 12 से 21 : समुद्र तट पर सेना का अभियान
भरत की सेना ने सुपारी और नारियल के वनों से घिरे समुद्र तट पर आक्रमण किया। सैनिकों ने सरोवरों की छाया में विश्राम किया और नारियल का रस पिया। ताड़ के वनों में सूखे पत्तों की मर्मर ध्वनि सुनी। भरत ने सुपारी के वृक्षों को पान की लताओं से लिपटे देखकर प्रसन्नता अनुभव की, जो स्त्री-पुरुष के समान प्रतीत होते थे। सूर्यास्त के समय पक्षियों के शब्द मुनियों के स्वाध्याय जैसे लगे। सैनिकों ने कटहल के फल खाए और नारियल का रस, मिरच आदि से भोजन व्यवस्था सुखद रही। मिरच खाकर आंसू बहाते पक्षी और वानरों का दृश्य भी भरत ने देखा।
श्लोक 22 से 34 : वनों और पर्वतों का सौन्दर्य
वनों में फलों से लदे वृक्ष कल्पवृक्ष जैसे लगे। लताओं से लिपटे फलदार वृक्ष सैनिकों को संतुष्ट करते थे। सिंहल द्वीप की स्त्रियाँ नारियल की मदिरा पीकर भरत का यश गाती थीं। त्रिकूट, मलय और पाण्डयकबाटक पर्वतों पर किन्नर देवियाँ और मलय-सह्य के वनों में भील स्त्रियाँ भरत का यश गा रही थीं। मलय गिरि के लतागृहों में चन्दन को हिलाता वायु अतिथि सत्कार करता प्रतीत हुआ। केरल की युवतियाँ सुगन्धित निःश्वास, चन्दन-लेपित शरीर, नृत्य और गीतों से भरत का मन मोह रही थीं।
श्लोक 35 से 50 : दक्षिण और पश्चिम की विजय
भरत ने चोल, केरल और पाण्ड्य राजाओं को परास्त कर उनसे प्रणाम करवाया। कलिंग के विशाल हाथियों ने मलय के छोटे पर्वतों को व्याप्त किया। भरत के हाथियों ने दिग्गजों को अधीन कर लिया। पश्चिम समुद्र तट के राजाओं को जीतकर उनकी सेना समुद्र के दोनों किनारों तक फैली। समुद्र की लहरें सेना के भय से आकुल प्रतीत हुईं। सह्य पर्वत की गोद में लहराता समुद्र दुखी और पराजित जान पड़ा। सेना के आघात से सह्य पर्वत के वृक्ष टूटे, शिखर क्षतिग्रस्त हुए और वह नाममात्र का अचल रहा। भरत के हाथी सह्य से तुंगवरक तक घूमे, पर्वतों को पार किया।
श्लोक 51 से 63 : पश्चिम के हाथी और नदियाँ
भरत ने पश्चिम दिशा के उत्कृष्ट गुणों वाले हाथियों को प्राप्त किया, जो शूरवीर, सुगंधित मद वाले और मजबूत थे। सह्य पर्वत की नदियाँ, जैसे भीमरथी, दारुवेणा, नीरा, मूला, बाणा, गोदावरी आदि, सेना ने पार कीं। इन नदियों में मगरमच्छ, पक्षी और वृक्षों की छाया थी। सेनापति ने जंगली हाथियों को भी पकड़ा।
श्लोक 64 से 71 : विन्ध्याचल की समानता और सौन्दर्य
भरत ने विन्ध्याचल को अपने समान देखा, दोनों भूभृत्, उत्तुंग, पृथुवंश धारक और अलंघ्य थे। विन्ध्य के झरने पताकाओं जैसे शोभित थे। पर्वत समुद्र में प्रवेश करता प्रतीत हुआ, मानो दावानल से भयभीत होकर मित्रता चाहता हो। झरने वृक्षों का पोषण करते थे, और शब्दकारी नदियाँ हँसी करती प्रतीत हुईं। दावानल से जलते शिखर सुवर्ण जैसे लगे।
श्लोक 72 से 81 : विन्ध्याचल का सौन्दर्य और विविधता
विन्ध्याचल का वन हाथियों, सर्पों, काँटों और उपद्रवी लोगों से युक्त था, जो इसे दुखदायी बनाता था। वन में विरोधाभास था—मदोन्मत्त हाथियों से युक्त होने पर भी यह समुद्री नमक और शोभंजन लताओं से समृद्ध था। फटे बाँसों से मोतियाँ बिखरती थीं, मानो वनलक्ष्मी हँस रही हो। गुफाओं से झरनों की गंभीर ध्वनि पर्वत की महिमा को कुलाचलों से स्पर्धा करती प्रतीत हुई। पर्वत का विविध रंग, धातुएँ और हरिणों के वर्ण विचित्र आकार बनाते थे। रात में औषधियाँ दीपकों की तरह चमकती थीं। सिंहों द्वारा मारे गए हाथियों के मोतियों से प्रदेश फ बिखरे फूलों जैसा लगता था। चक्रवर्ती भरत ने विन्ध्याचल पर भील और हाथियों को देखा, जो मेघ जैसे काले थे। नदियों को उन्होंने स्त्रियों के समान उत्कंठा से देखा।
श्लोक 82 से 91 : नर्मदा नदी और विन्ध्याचल की विजय
भरत ने विन्ध्याचल के मध्य में समुद्र तक फैली नर्मदा नदी देखी, जो पृथ्वी की चोटी या विन्ध्य की विजय-पताका सी लगती थी। सेना के क्षोभ से पक्षियों की पंक्तियाँ उड़ती थीं, मानो तोरण बाँधे गए हों। नर्मदा ने रानियों को क्रीड़ा प्रदान की। सेना ने नर्मदा पार कर विन्ध्याचल के उत्तर में आक्रमण किया। पर्वत दोनों दिशाओं में फैला, मानो स्वयं को अर्पित कर रहा हो। सेना का पड़ाव नर्मदा के किनारों पर विन्ध्याचल सा शोभित था। सेना और पर्वत में समानता थी—हाथियों और गंडोपलों, घोड़ों और किन्नरों के कारण। सेना ने विन्ध्याचल के फल-पत्तों का उपभोग कर इसे वन्ध्याचल बना दिया। सैनिकों ने मोतियों और वाँसी चावलों से जिनेन्द्र की पूजा की।
श्लोक 92 से 101 : विन्ध्याचल से पश्चिम की ओर प्रस्थान
विन्ध्याचल के वनराजाओं ने औषधियाँ और भील राजाओं ने हाथियों के दाँत व मोती भेंट किए। सेना ने नर्मदा पार कर पश्चिम दिशा की ओर प्रस्थान किया। भरत का प्रताप आगे बढ़ा, धूल ने सूर्य का तेज रोक दिया। लाट देश के राजा उनकी आज्ञा में आए। सोरठ और पंजाब के राजाओं ने हाथी भेंट किए। चक्ररत्न से भयभीत राजा ग्रहों की तरह वश में आए। भरत ने दिग्गज जैसे अभिमानी राजाओं को जीता। सोरठ के राजाओं ने ऊँट और घोड़ियाँ भेंट कीं, और भरत गिरनार पर्वत पर पहुँचे।
श्लोक 102 से 111 : गिरनार और पश्चिम के राजाओं की भेंट
भरत ने नेमिनाथ का स्मरण कर गिरनार की प्रदक्षिणा की। राजाओं ने रेशमी वस्त्र और सिल्क भेंट किए। भरत ने कुछ को सन्मान, कुछ को स्नेह और कुछ को प्रसन्न दृष्टि से अनुरक्त किया। राजाओं ने हाथी, घोड़े और रत्नों से उनकी पूजा की। तुरुष्क आदि देशों के वेगवान घोड़े और काम्बोज, सैन्धव जैसे कुलीन घोड़े भेंट किए गए। भरत को रत्नों के साथ यश की प्राप्ति हुई। सेनापति ने जल-स्थल मार्ग रोककर पहाड़ी राजाओं को जीता और देश, जंगल, नदियाँ, पर्वत पार कर भरत की आज्ञा स्थापित की।
श्लोक 112 से 121 : पश्चिम समुद्र की ओर विजय
भरत पश्चिम समुद्र की ओर बढ़े, राजाओं का अभिमान और धन हरते हुए। समुद्र नदियों रूपी हाथों से रत्नों का अर्घ देता प्रतीत हुआ। समुद्र को रत्नाकर माना गया, न कि केवल लवण समुद्र। सूर्य का तेज मंद पड़ता था, पर भरत का तेज देदीप्यमान था। चक्ररत्न धारी भरत सूर्य समान चमके। उन्होंने सिन्धु नदी के द्वार पर पड़ाव डाला। सैनिकों ने सिन्धु के वन में निवास किया। पुरोहित ने चक्ररत्न और जिनेन्द्र की पूजा की, और गंधोदक व आशीर्वादों से भरत को आनंदित किया।
श्लोक 122 से 129 : समुद्र में प्रवेश और अंतिम विजय
भरत ने रथ पर चढ़कर लवण समुद्र में प्रवेश किया। उन्होंने प्रभासदेव को जीता और उससे मोतियों, कल्पवृक्ष के फूलों और सुवर्ण का जाल प्राप्त किया। पुण्यकर्म से देवों को जीतकर उन्होंने सिन्धुद्वार पर सारभूत धन प्राप्त किया। लक्ष्मी से अलंकृत भरत समुद्र से निकले, नवीन वर सा शोभित। पूर्व, दक्षिण और पश्चिम दिशाओं को जीतकर, दिक्प slide जैन धर्म के सिद्धांतों के आधार पर, चक्रवर्ती भरत ने समस्त दिशाओं को शत्रुरहित किया। पुण्य से चक्रवर्ती, इंद्र, तीर्थंकर और मोक्ष की लक्ष्मी प्राप्त होती है। अतः जिनेन्द्र के आगम अनुसार पुण्य उपार्जन की सलाह दी गई।
आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन
श्लोक 1 से 11 : चक्रवर्ती भरत का उत्तर दिशा विजय अभियान
चक्रवर्ती भरत उत्तर दिशा को जीतने के लिए विशाल घुड़सवार सेना के साथ निकले। उनकी सेना के घोड़ों की गति, पराक्रम, शिक्षा और जाति को विशेषज्ञों ने पहचाना। घोड़े तेजी से मार्ग तय करते हुए धूल उड़ाते और छाया को तोड़ते प्रतीत होते थे। उनकी चंचलता केवल गति में थी, स्वभाव में स्थिरता थी। अठारह करोड़ उत्तम घोड़ों की सेना सिन्धु नदी को हानि पहुँचाती हुई आगे बढ़ी, जो मानो भरत के आगमन से संतुष्ट होकर उनकी सेवा कर रही थी।
श्लोक 12 से 21 : सिन्धु नदी और विजयार्थ पर्वत की ओर प्रस्थान
भरत ने सिन्धु नदी के किनारे-किनारे उत्तर दिशा के राजाओं को वश में करते हुए विजयार्थ पर्वत की ओर प्रस्थान किया। यह पर्वत मणियों के नौ शिखरों, हिलते वृक्षों, झरनों और वनों से सुशोभित था, मानो भरत का स्वागत करने को आतुर हो। पर्वत के वन फूलों की पराग और कोकिलों के शब्द से सजा था, जो भरत के सम्मान में प्रस्तुत प्रतीत होता था। सेना के आगमन से वन की भूमि दब गई, और पशु भयभीत हो गए।
श्लोक 22 से 31: सेना के प्रभाव से वन का क्षोभ
सेना के शोर से वन के पशु, जैसे श्वेत हाथी, सिंह, भैंसा, और छोटे जीव, भयभीत होकर गुफाओं में छिप गए। हरिण, सूअर और अन्य प्राणी अपने स्थान छोड़कर भागे। सेना के शांत होने पर ही पशु धीरे-धीरे अपने स्थानों पर लौटे। इस प्रकार, भरत की सेना का प्रभाव वन के प्राणियों पर गहरा पड़ा, और प्रकृति भी उनके आगमन से प्रभावित हुई।
श्लोक 32 से 41 : विजयार्थ पर्वत पर सेना का पड़ाव
सेना विजयार्थ पर्वत के पाँचवें कूट पर रुकी, जहाँ सेनापतियों ने वन में डेरे लगवाए। वन के सघन वृक्षों और लतागृहों ने सैनिकों को आश्रय दिया। वन में प्रवेश से सैनिकों का राग बढ़ा, जिससे वैराग्य की धारणा मूर्खतापूर्ण प्रतीत हुई। विजयार्थ पर्वत का स्वामी विजयार्थ देव भरत के दर्शन हेतु आया, जो शिखरों, हारों और कड़ों से सुशोभित था।
श्लोक 42 से 51: विजयार्थ देव द्वारा भरत का अभिषेक
विजयार्थ देव ने स्वयं को पर्वत का रक्षक और भरत का अनुयायी बताते हुए उनकी आज्ञा स्वीकार की। उन्होंने तीर्थजल से भरत का अभिषेक किया, जिसमें देवांगनाओं का नृत्य और किन्नरों के मंगलगीत शामिल थे। देव ने भरत को रत्न, छत्र, चमर और सिंहासन भेंट किए। प्रसन्न भरत ने देव को सम्मानित कर विदा किया।
श्लोक 52 से 61: विजयार्थ पर्वत की विजय और उत्तरार्ध की आकांक्षा
विजयार्थ पर्वत की विजय को दक्षिण भारत की विजय मानकर भरत ने चक्ररत्न की पूजा की। फिर भी, उत्तरार्ध जीतने की उनकी आकांक्षा बनी रही। सेना पर्वत की पश्चिम गुहा के समीप ठहरी, जहाँ भरत ने कई दिन बिताए। गंगा और सिन्धु के बीच के राजा उनके दर्शन को आए और भेंट स्वरूप रत्न आदि अर्पित किए।
श्लोक 62 से 71 : राजाओं का समर्थन और युद्ध की तैयारी
समीपवर्ती राजाओं ने भरत की सेना को भूसा और ईंधन प्रदान किया। कुरु देश के जयकुमार सहित अनेक राजा और योद्धा भरत के समर्थन में आए। म्लेच्छ राजाओं को जीतने के लिए धनुष-बाण और तलवारों से सुसज्जित सेना तैयार हुई। योद्धा शत्रुओं को हराने के लिए उत्साहित थे, और उनके कवच और शस्त्र युद्ध की तैयारी को दर्शाते थे।
श्लोक 72 से 81 : सेना की रचना और योद्धाओं का उत्साह
सेना के रथ शस्त्रों से भरे थे, और रथी योद्धा पैदल सैनिकों से श्रेष्ठ प्रतीत होते थे। राजाओं ने हाथियों और घुड़सवारों की रक्षा के लिए शूरवीर नियुक्त किए। विभिन्न व्यूह रचनाओं (दण्ड, मण्डल, भोग, असंहृत) के साथ सेना तैयार हुई। योद्धा परस्पर प्रेरणादायक बातें करते हुए भरत के कार्यों की महिमा और विजय की आकांक्षा व्यक्त करते थे। कुछ सैनिक पर्वत और नदियों की बाधाओं से चिंतित थे, पर उत्साह के साथ शिविर में पहुँचे।
श्लोक 82 से 91: विजयार्थ पर्वत पर सेना का एकत्रीकरण
चक्रवर्ती भरत के हिमवान् पर्वत तक विजय के उद्देश्य को पूर्ण करने के लिए राजा लोग सामग्री से भरे कोठों के साथ निकले। अनेक सामंत अपनी सेनाओं के साथ भरत के समीप आए और उनकी जय-जयकार की। सामंतों के समूह से भरत की सेना समुद्र की तरह भर गई। विजयार्थ पर्वत सेनाओं से आच्छादित हो स्वर्ग सा सुशोभित हुआ। सेना के शब्दों से पर्वत शब्दमय हो गया, मानो गुफाओं से प्रतिध्वनि के साथ रो रहा हो।
श्लोक 92 से 101 : कृतमाल देव का आगमन और भरत का सत्कार
भरत ने आकाश में देदीप्यमान मुकुट और आभूषणों से सुशोभित कृतमाल देव को देखा, जो चम्पा की माला पहने कल्पवृक्ष सा प्रतीत होता था। भरत ने देव का सत्कार कर आसन प्रदान किया। कृतमाल देव ने विनयपूर्वक भरत की प्रशंसा की, उन्हें जगत का कल्याणकारी और देवों के प्रिय बताया। उन्होंने भरत के शासन, चक्ररत्न, और दंड नीति की महिमा का वर्णन किया, स्वयं को उनके समक्ष तुच्छ बताया।
श्लोक 102 से 111 : कृतमाल देव की भक्ति और सेवा
कृतमाल देव ने भरत को छह खंडों का शासक और ऐश्वर्यशाली बताया, उनकी कीर्ति और सरस्वती की स्वच्छंदता की प्रशंसा की। उन्होंने सेना के शब्दों से भयभीत होकर भरत की सेवा में आने की बात कही। देव ने स्वयं को विजयार्थ पर्वत का निवासी और मर्मज्ञ बताते हुए भरत के अधीन होने की घोषणा की, कहा कि उनकी जानकारी समस्त द्वीप और समुद्र तक फैली है।
श्लोक 112 से 121 : कृतमाल देव की सहायता और गुफा द्वार का उद्घाटन
कृतमाल देव ने भरत को सर्वत्र भ्रमण करने वाला और पर्वत का मर्मज्ञ बताया, फिर चौदह आभूषण भेंट किए। भरत ने हर्षित होकर सत्कार किया और देव को गुफा द्वार खोलने का उपाय बताने हेतु विदा किया। सेनापति को गुफा शांत होने तक पश्चिम खंड जीतने की आज्ञा दी गई। सेनापति दंडरत्न और अश्वरत्न के साथ गुफा की ओर बढ़ा, सिन्धु नदी की वेदी को पार कर विजयार्थ पर्वत की वेदिका पर पहुँचा।
श्लोक 122 से 131: गुफा द्वार का खुलना और म्लेच्छ खंड में प्रवेश
सेनापति ने दंडरत्न से गुफा द्वार पर प्रहार किया, जिससे द्वार खुला और गर्मी निकली। द्वार के किवाड़ चिल्लाते और पसीने से तर प्रतीत हुए। गुफा से निकला शब्द पर्वत के रोने सा लगा। सेनापति को गर्मी ने स्पर्श नहीं किया, और आकाश से फूल बरसे। वह सिन्धु नदी के पश्चिम तट की वेदिका को पार कर म्लेच्छ खंड में प्रवेश किया, जहाँ प्रजा घबरा गई और कुछ लोग भागने लगे।
श्लोक 132 से 141 : म्लेच्छ राजाओं का वशीकरण
सेनापति ने प्रजा को आश्वस्त किया और म्लेच्छ राजाओं को चक्रवर्ती की आज्ञा स्वीकार करने का आदेश दिया। बुद्धिमान लोगोंने आशीर्वाद के साथ आज्ञा स्वीकारी। सेनापति ने संधि-विग्रह जैसे उपायों से राजाओं को वश किया, कुछ को आवागमन रोककर और कुछ को दुख देकर अधीन किया। म्लेच्छों से कन्या और रत्न भेंट में लिए, जिन्हें धर्मक्रियाओं के अभाव में म्लेच्छ माना गया।
श्लोक 142 से 151 : सेनापति की वापसी और सत्कार
सेनापति म्लेच्छ खंड को वश कर म्लेच्छ राजाओं की सेना के साथ लौटा, मानो मूर्तिमान प्रताप हो। उसने सिन्धु नदी और विजयार्थ पर्वत की वेदिका को पार किया, गुफा की गर्मी शांत कर उसकी रक्षा का उपाय किया। वापसी पर राजाओं ने नगाड़ों के साथ उसका स्वागत किया। वह राजमार्ग से भरत के डेरे में पहुँचा, सभामंडप में नमस्कार कर सत्कार प्राप्त किया।
श्लोक 152 से 159 : म्लेच्छ राजाओं का समर्पण और भरत की महिमा
म्लेच्छ राजाओं ने भय सहित भरत को नमस्कार किया और रत्न भेंट किए। भरत ने उनका सत्कार कर विदा किया। दंडरत्न के बल पर विजयार्थ पर्वत के समीपवर्ती राजाओं को जीता गया। सेनापति को पुनः प्रधान सेनापति नियुक्त किया गया। भरत ने विजयार्थ पर्वत से छत्र, चमर, सिंहासन और अनुपम आभूषण प्राप्त किए, जो मेरु पर्वत के कल्पवृक्ष सा शोभित करते थे।
आदिपुराण पर्व 32 -उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन
श्लोक 1 से 12 : चक्रवर्ती भरत का गुफा की ओर प्रस्थान
दूसरे दिन, तैयार सेनापति चक्रवर्ती भरत के प्रस्थान की प्रतीक्षा करने लगे। हाथी, घोड़े और पैदल सैनिकों से विजयार्थ पर्वत के वन भर गए। भरत, विजयी हाथी पर सवार, इंद्र सा शोभित होकर निकले। सेना संकुचित मार्ग से गुफा की ओर बढ़ी, जो तमिस्त्रा नामक थी। यह गुफा आठ योजन ऊँची, बारह योजन चौड़ी, वज्र किवाड़ों और रत्न चौखट से सुशोभित थी। सिन्धु नदी का प्रवाह इसे और शोभित करता था। सेनापति द्वारा पहले शांत की गई यह गुफा अनादि, गंभीर और प्रसूति गृह सा प्रतीत होती थी।
श्लोक 13 से 21 : गुफा में प्रवेश और मार्ग संशय
गुफा के गाढ़ अंधकार से सेना भयभीत हुई। सेनापति ने पुरोहित के साथ अंधकार दूर करने के लिए दीवारों पर काकिणी और चूड़ामणि रत्नों से सूर्य-चंद्र मंडल बनवाए। इनके प्रकाश से सेना गुफा के मध्य में प्रवेश कर गई। चक्ररत्न दीपक सा मार्ग प्रशस्त करता था। सेना दो भागों में सिन्धु नदी के जल का उपयोग कर चलती थी, पर दिशा संशय के कारण भ्रमित थी। कई पड़ाव पार कर भरत ने गुफा की आधी भूमि तय की और उन्मग्नजला-निमग्नजला नदियों के संगम पर पहुँचे।
श्लोक 22 से 31 : नदियों का पार करना
भरत ने निमग्नजला (नीचे ले जाने वाली) और उन्मग्नजला (ऊपर उछालने वाली) नदियों की विषमता देखी। स्थपति (सिलावट) रत्न ने इनके प्रवाह को वायु प्रभाव से समझा और पुल बाँधने का निर्णय लिया। उसने वनों से बड़े वृक्ष मँगवाए और मजबूत खंभों पर क्षणभर में पुल तैयार किया। सेना ने आनंद के साथ कोलाहल किया और नदियों को पार कर दूसरी ओर पहुँची।
श्लोक 32 से 41 : गुफा से बाहर निकलना
भरत ने हाथियों के साथ जलमय मार्ग से कठिन रास्ता तय किया और गुफा के उत्तर द्वार पर पहुँचे। हाथी सेना ने द्वार खोला, और भरत विजयार्थ पर्वत के वन में प्रवेश किए। गुफा से बाहर निकलते सैनिकों को दूसरा जन्म सा अनुभव हुआ। गुफा मानो सेना को उगल रही थी। वन की शाखाएँ और वायु सेना को आश्वासन दे रहे थे। सेनापति ने पश्चिम म्लेच्छ खंड जीता, और भरत मध्यम म्लेच्छ खंड की ओर बढ़े।
श्लोक 42 से 51 : म्लेच्छ खंड पर विजय का उद्यम
भरत की सेनाएँ व्यूह रचना के साथ शत्रु देशों को घेरती थीं, पर सूर्य की तरह लोगों को पीड़ित नहीं करती थीं। उन्होंने किलों और राजाओं को वश किया। चिलात और आवर्त नामक म्लेच्छ राजाओं ने अपनी सेना का पराभव सुना और युद्ध की तैयारी की। उनके मंत्रियों ने युद्ध से रोका, सुझाव दिया कि विजयार्थ पर्वत को पार करने वाला कोई साधारण मनुष्य नहीं, बल्कि देव या दिव्य प्रभाव वाला है।
श्लोक 52 से 61 : म्लेच्छ राजाओं की रणनीति
मंत्रियों ने किले का आश्रय लेने और नागमुख-मेघमुख देवों की सहायता लेने की सलाह दी। चिलात और आवर्त ने देवों का स्मरण किया। नागमुख देव ने बादल बनकर जलवृष्टि की, जो भरत की सेना को डुबाने लगी। पर छत्ररत्न और चर्मरत्न ने सेना को सुरक्षित रखा। चक्ररत्न के प्रकाश से तंबू में ठहरी सेना सात दिन तक पीड़ा रहित रही।
श्लोक 62 से 71 : जयकुमार का पराक्रम
सेना के तंबू में चार दरवाजे और रक्षा व्यवस्था थी। सिलावट रत्न ने तंबू, झोपड़ियाँ और रथ बनाए। कोलाहल सुन राजा क्रुद्ध हुए, पर चक्रवर्ती के आदेश पर गणबद्ध देवों और जयकुमार ने नागमुख-मेघमुख देवों को परास्त किया। जयकुमार बाण वर्षा करता बादल सा शोभित हुआ और मेधेश्वर नाम पाया।
श्लोक 72 से 81 : म्लेच्छ राजाओं का समर्पण
जयकुमार की गर्जना से मेघमुख देव परास्त हुए, और देवों ने उसका जयजयकार किया। भरत ने जयकुमार को मुख्य शूरवीर नियुक्त किया। नागमुख देवों के भागने से चिलात और आवर्त भयभीत होकर भरत के चरणों में प्रणाम कर दासता स्वीकार की। भरत ने सिन्धुप्रपात पर सिन्धु देवी से अभिषेक प्राप्त किया, जो सुवर्ण कलशों से जल अर्पित कर उनकी सेवा की।
श्लोक 82 से 91 : हिमवान् पर्वत की ओर प्रस्थान
सिन्धु देवी ने भरत को भद्रासन भेंट किया और विदा ली। भरत हिमवान् पर्वत के किनारों को जीतते हुए हिमवत् कूट पर पहुँचे। वहाँ उपवास, अस्त्र पूजा और डाभ शय्या पर शयन किया। भरत ने वजूकाण्ड धनुष पर वैशाख आसन लगाकर अमोघ बाण छोड़ा, जो हिमवत् कूट पर देव भवन को हिलाता हुआ पहुँचा। वहाँ का देव मस्तक झुकाकर भरत के समक्ष आया।
श्लोक 92 से 101 : हिमवान् देव का सत्कार
हिमवान् का देव भरत से बोला कि यह पर्वत साधारण पुरुषों से अजेय है, और उनका बाण ने देवों को कम्पित किया। उसने भरत के दिग्विजय की प्रशंसा की, उनका अभिषेक किया, गोशीर्ष चंदन भेंट किया, और अन्य देवों की ओर से नमस्कार अर्पित किया। देव ने भरत की प्रसन्नता और आज्ञा की याचना की, क्योंकि स्वामी की प्रसन्नता सेवकों की आजीविका है।
श्लोक 102 से 111 : हिमवान् देव का सत्कार और पर्वत की प्रशंसा
चक्रवर्ती भरत ने हिमवान् देव के वचनों की प्रशंसा कर सभी देवों का सत्कार किया और उन्हें विदा किया। किन्नर देव हिमवान् की विजय के मंगलगीत गा रहे थे। हिमवान् के वनों का शीतल वायु और स्थल कमलिनियों का रज भरत की सेवा कर रहा था। उनकी कीर्ति हिमवान् के लतागृहों में फैली। भरत ने पर्वत की ऊँचाई, विस्तार, और रत्नों की समानता को स्वयं से तुलनीय माना। पुरोहित ने हिमवान् की शोभा और भरत की उदारता की तुलना की, जिससे भरत संतुष्ट हुए।
श्लोक 112 से 121 : हिमवान् पर्वत की शोभा
हिमवान् की सुवर्णमयी श्रेणी रत्नों से सुशोभित थी, जो सौ योजन ऊँची थी। यह पर्वत लवण समुद्र में प्रवेश करता हुआ पृथिवी का दंड सा प्रतीत होता था। सिद्ध, विद्याधर, और नागकुमार इसके शिखरों पर निवास करते थे। लतागृहों में विद्याधर अपनी स्त्रियों के साथ टहलते थे। मणियों और देवांगनाओं के प्रतिबिंबों से किनारे चित्रमय थे। फूलों से हँसते वन देवों के बगीचों सा शोभित थे।
श्लोक 122 से 130 : हिमवान् की नदियाँ और दोष
हिमवान् पर्वत पद्म सरोवर से निकलने वाली गंगा, सिन्धु, और रोहितास्या नदियों को धारण करता था, जो उत्साह, मंत्र, और प्रभुत्व का प्रतीक थीं। इसके शिखर आकाश को कीलों से रोकते प्रतीत होते थे। देवों के आवास स्वर्ग सा शोभित थे। पर्वत का दोष यह था कि यह छोटे अगुरु वृक्षों को धारण करता था। यह भगवान् वृषभदेव की महिमा और विश्व-विस्तार से तुलनीय था। भरत ने इसकी प्रशंसा की और वृषभाचल देखने लौटे।
श्लोक 131 से 141 : वृषभाचल का दर्शन
वृषभाचल सौ योजन ऊँचा, स्फटिक मणियों से सुशोभित, और देवों-विद्याधरों का निवास था। भरत ने इसे अपने यश का प्रतिबिंब माना। वन का वायु उनका स्वागत करता था। उन्होंने विद्याधरों और किन्नरों के यश-गीत सुने। वृषभाचल की स्फटिक दीवारें विजयलक्ष्मी का दर्पण सी थीं। भरत ने वहाँ असंख्य चक्रवर्तियों के नाम देखे, जिससे उनका अभिमान नष्ट हुआ और संसार को स्वार्थपरायण समझा।
श्लोक 142 से 154 : भरत की प्रशस्ति
भरत ने एक चक्रवर्ती की प्रशस्ति मिटाकर वृषभाचल पर अपनी प्रशस्ति लिखी, जिसमें वे स्वयं को इक्ष्वाकु वंश का चंद्रमा, वृषभदेव का पुत्र, छह खंडों का शासक, और अठारह करोड़ घोड़ों व चौरासी लाख हाथियों का स्वामी बताया। उन्होंने अपनी कीर्ति को पर्वत पर स्थापित किया। देवों ने फूलों की वर्षा की, और नगाड़ों के शब्द गूँजे। उनकी प्रशस्ति में लेख, साक्षी (देव), और उपभोग क्षेत्र शामिल थे।
श्लोक 155 से 171 : गंगापात पर अभिषेक
भरत की प्रशस्ति चंद्रमा के चिह्नों सा मानी गई। देव और विद्याधर उनकी स्तुति और आशीर्वाद दे रहे थे। भरत गंगापात पहुँचे, जहाँ गंगा का जल हाथियों के मद से मिलकर फाग सा प्रतीत हुआ। गंगा देवी ने अर्घ देकर उनका सत्कार किया, सिंहासन पर बिठाकर गंगा जल से अभिषेक किया, और वस्त्राभूषण भेंट किए। उन्होंने रत्नमय सिंहासन देकर आशीर्वाद दिया और तिरोहित हो गई। भरत ने गंगा किनारे सेवा प्राप्त की।
श्लोक 172 से 181 : विजयार्थ पर्वत की ओर वापसी
गंगा किनारे के वनों का वायु, भीलों की स्त्रियों के केश, और मयूरों की पूँछ हिलाता हुआ भरत को सुख दे रहा था। पराजित देशों के राजा उनकी आराधना करते थे। भरत उत्तर भरत क्षेत्र को वश कर विजयार्थ पर्वत की तराई लौटे। उन्होंने सेनापति को पूर्व खंड जीतने की आज्ञा दी। छह माह तक वे वहाँ रहे। विद्याधर राजा नमि और विनमि धन-सामग्री लेकर दर्शन हेतु आए।
श्लोक 182 से 191 : सुभद्रा से विवाह और म्लेच्छ खंड की विजय
नमि और विनमि की भेंट से भरत की इच्छाएँ पूर्ण हुईं। उन्होंने नमि की बहन सुभद्रा से मंगलाचारपूर्वक विवाह किया, जिससे उनका जन्म सफल हुआ। सेनापति ने म्लेच्छ राजाओं को जीतकर जयलक्ष्मी के साथ दर्शन किए। भरत ने उनका सत्कार किया, म्लेच्छ राजाओं को विदा किया, और दक्षिण पृथिवी की ओर प्रस्थान किया। सेना ने काण्डकप्रपात गुफा पार की, और नाट्यमाल देव ने मंगलद्रव्यों से उनकी अगवानी की।
श्लोक 192 से 199 : दिग्विजय की पूर्णता
भरत ने नाट्यमाल देव का सत्कार कर विदा किया। विद्याधर आकाशमार्ग से उनकी परिचर्या करते थे। विजयार्थ पर्वत की गुफा से निकलकर भरत सूर्य सा उदित हुए। वायु उनकी सेवा करता था। सेनापति ने म्लेच्छ खंड जीता। भरत ने चिलात, आवर्त, हिमवान् देव, और गंगा-सिन्धु देवियों को जीता, दो भद्रासन प्राप्त किए, और छह खंडों की पृथिवी को पुण्य से वश किया।
आदिपुराण पर्व 33 – भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन
श्लोक 1 से 11 अयोध्या की ओर प्रस्थान
चक्रवर्ती भरत, जिन्होंने समस्त राजाओं, विद्याधरों, और देवों को वश में किया, नौ निधियों और चौदह रत्नों के साथ अयोध्या की ओर लौटे। उनकी सेना, गंगा के समान विजयार्थ पर्वत से निकली, जिसमें हाथी, घोड़े, और पैदल सैनिक लहरों और बुलबुलों से प्रतीत होते थे। रथों, घोड़ों, और हाथियों के शब्दों से कोलाहल हुआ। भरत ने विजय पर्वत नामक हाथी पर सवार होकर गंगा किनारे देशों और पर्वतों को पार करते हुए कैलास पर्वत के समीप पहुँचे।
श्लोक 12 से 27 कैलास पर्वत का दर्शन
भरत ने कैलास पर्वत पर सेना ठहराकर जिनेन्द्र भगवान की पूजा के लिए प्रस्थान किया। राजाओं के साथ वे इंद्र की तरह शोभित थे। कैलास की शोभा, झरनों, फूलों, और वनों से सुसज्जित थी, जो भगवान वृषभदेव की सेवा का प्रतीक थी। स्फटिक मणियों, नीले और हरे मणियों, और रत्नों से पर्वत इंद्रधनुष सा प्रतीत होता था। किनारों पर सिंह, किन्नर, और विद्याधर क्रीड़ा करते थे, जिससे भरत को आनंद हुआ।
श्लोक 28 से 41 पर्वत पर चढ़ाई और शोभा
भरत पैदल कैलास पर चढ़े, बिना खेद के, क्योंकि धर्म कार्यों में कष्ट नहीं होता। मणिमयी सीढ़ियों से वे शिखर पर पहुँचे, जहाँ वन की शीतल वायु ने उनका स्वागत किया। उन्होंने मंदार वनों में देवियों, हरिणियों, अजगरों, और सिंहों को देखा। पुरोहित ने पर्वत की शोभा की प्रशंसा की, जिसमें नदियाँ, वन, और मुनियों जैसे प्रदेश थे, जो द्वंद्व सहते और कल्याण करते थे।
श्लोक 42 से 51 पर्वत की महिमा
पर्वत के झरने सिंहों को तर्जना करते प्रतीत होते थे। पुरोहित ने भरत की तुलना पर्वत से की, जो सेवकों और भद्र हाथियों को धारण करता था। वन में सिहों, हरिणों, और मुनियों की उपस्थिति थी, जो शांति और भय का मिश्रण दर्शाती थी। सिंह और हरिण शांतिपूर्वक विचरण करते थे, जो जिनेन्द्र की उपस्थिति से संभव था।
श्लोक 52 से 61 पर्वत की शांति और रत्न
पर्वत जिनेन्द्र की उपस्थिति से शांत था। सिंह और हरिण सहवास में थे, और मुनियों के पीछे पशु निर्भय विचरते थे। पर्वत अष्टापद नाम से जाना गया। रात्रि में औषधियाँ और मणियाँ प्रकाशमान थीं, पर किन्नर अंधेरे से डरते थे। हरिण मणियों को घास समझकर लज्जित होते थे। सूर्यकांत और चंद्रकांत मणियाँ सूर्य और चंद्र की किरणों से जल और शोभा उत्पन्न करती थीं।
श्लोक 62 से 71 जिनेन्द्र के समान पर्वत
पर्वत जिनेन्द्र के समान था, क्योंकि दोनों देवों से सेवित, स्थिर, और महान थे। पुरोहित ने इसकी शोभा की प्रशंसा की, जिससे भरत आनंदित हुए। समवसरण के दर्शन के लिए आगे बढ़ते हुए, उन्होंने पुष्पवृष्टि, दुंदुभि शब्द, और मंदार वनों की सुगंधित वायु का अनुभव किया। फूलों से भरे मार्ग से वे बिना परिश्रम शिखर पर चढ़े।
श्लोक 72 से 81 समवसरण का दर्शन
भरत ने जिनेन्द्र के समवसरण को देखा, जहाँ सुर और असुर बैठते थे। धूलिसाल, मानस्तंभ, और स्वच्छ परिखा को पार कर वे लतावनों और गोपुरों तक पहुँचे। रत्नों से सुशोभित कोट और मंगलद्रव्यों ने उनकी इंद्रियों को संतुष्ट किया। नाट्यशालाएँ और धूपघटों ने समवसरण की शोभा बढ़ाई।
श्लोक 82 से 91 समवसरण की शोभा
भरत ने अशोक, चंपक, और सप्तपर्ण वनों में चैत्यवृक्षों की पूजा की। किन्नर देवियाँ जिनेन्द्र का उत्सव गा रही थीं। वनों की सुगंध और कोयलों के शब्दों ने आनंद बढ़ाया। ध्वजाभूमि यज्ञभूमि सी शोभित थी, जिसमें चक्र और हाथी के चिह्न थे। भरत ने इनका पूजन किया और आगे बढ़े।
श्लोक 92 से 101 समवसरण की संरचना
ध्वजाभूमि में दस प्रकार की ध्वजाएँ थीं। भरत ने चांदी के कोट, नाट्यशालाएँ, और कल्पवृक्षों के वन देखे। सिद्धार्थ वृक्षों की पूजा की और रत्नमयी स्तूपों का दर्शन किया। ये सब तीनों लोकों की शोभा का प्रतीक थे।
श्लोक 102 से 111 समवसरण की संरचना और पूजा
चक्रवर्ती भरत ने रत्नमयी स्तूपों का दर्शन किया, जो जिनेन्द्र प्रतिमाओं और तोरणों से सुशोभित थे। आश्चर्यचकित होकर उन्होंने इनकी पूजा की और कक्ष को पार किया। आकाशस्फटिक से निर्मित तीसरा कोट देखा, जो जिनेन्द्र की समीपता से शुद्ध प्रतीत होता था। कल्पवासी देवों से आज्ञा लेकर वे सभा में प्रवेशे। वहाँ एक योजन विस्तृत श्रीमण्डप में बारह संघों—मुनि, देवियाँ, राजा, और पशु—का दर्शन किया। उन्होंने तीन कटनीदार पीठ की प्रदक्षिणा की, धर्मचक्रों और चक्र, हाथी आदि चिह्नों वाली आठ महाध्वजाओं की पूजा की।
श्लोक 112 से 123 जिनेन्द्र का दर्शन
भरत ने गंधकुटी में भगवान वृषभदेव को मेरु शिखर जैसे सिंहासन पर देखा। वे छायारहित, तीन छत्रों से सुशोभित, और प्रभामण्डल से युक्त थे। अशोक वृक्ष चिह्न उनके शोक-निवारक स्वरूप को दर्शाता था। चामर, आकाशदुंदुभियाँ, और फूलों की वर्षा उनकी शोभा बढ़ाते थे। उनकी दिव्य ध्वनि अनेक भाषाओं में हृदय का अंधकार दूर करती थी। अनन्त वीर्य, सुगंध, और शुभ लक्षणों से युक्त भगवान को देखकर भरत आनंदित हुए और घुटनों पर नमस्कार किया।
श्लोक 124 से 131 पूजा और स्तुति का प्रारंभ
भरत ने भक्तिपूर्वक नमस्कार किया, उनका मुकुट और कुण्डल चञ्चल हो उठे। मोक्ष की इच्छा से उन्होंने जल, चंदन, पुष्पमाला, और अन्य सामग्री से भगवान की पूजा की। पूजा के बाद प्रणाम कर स्तोत्रों से स्तुति शुरू की। उन्होंने भगवान को अपार गुणों वाला, अविनश्वर, और परमात्मा कहा। स्वीकार किया कि उनकी शक्ति सीमित है, पर भक्ति से प्रेरित होकर स्तुति कर रहे हैं। उनकी भक्ति का फल महान है, जैसे स्वामी की सम्पत्ति सेवकों को समृद्ध करती है।
श्लोक 132 से 141 सर्वज्ञता और सप्तभंगी
भरत ने कहा कि घातिया कर्मों के नष्ट होने से भगवान के दर्शन, ज्ञान, और सुख प्रकट हुए। उनके केवलज्ञान ने लोक-अलोक को जाना। उनकी सप्तभंगी वाणी, जो पदार्थों के अस्तित्व, नास्तित्व, और अवक्तव्य स्वरूप को दर्शाती है, उनकी सर्वज्ञता को प्रमाणित करती है। यह वाणी विरोधरहित और सभी पदार्थों को समेटने वाली है, जो उनकी आप्तता को स्थापित करती है। अन्य देवों के वचनों में विरोध होता है, पर भगवान के उपदेश निर्भ्रान्त हैं।
श्लोक 142 से 151 भगवान की महिमा
भरत ने भगवान के सिंहासन को मेरु शिखर सा और छत्रत्रय को तीनों लोकों की प्रभुता का प्रतीक बताया। चामर, फूलों की वर्षा, और दुंदुभि शब्द उनकी महिमा दर्शाते थे। अशोक वृक्ष और उनकी प्रभा सभा को शोभित करते थे। उनकी दिव्य ध्वनि पशुओं तक के अंधकार को दूर करती थी। गंधकुटी मेरु की चूलिका सी थी, जो मुनियों की स्तुति से भक्तिमय प्रतीत होती थी।
श्लोक 152 से 164 समवसरण की विभूति
स्वर्ग के देव गंधकुटी में भगवान की सेवा करते थे। उनके मुकुटों पर भगवान के नखों की किरणें प्रसन्नता का प्रतीक थीं। देवांगनाओं के मुख नखों में कमल से प्रतीत होते थे। तीन कटनीदार पीठ धर्मचक्रों और ध्वजाओं से सुशोभित थी। समवसरण की संरचना—धूलिसाल, मानस्तंभ, परिखा, और वन—तीनों लोकों की शोभा का समावेश थी। यह विभूति भगवान की आंतरिक लक्ष्मी को दर्शाती थी।
श्लोक 165 से 181 जय-स्तुति
भरत ने भगवान की जय-स्तुति की, उन्हें कर्म-विजेता, सर्वज्ञ, और मोक्षदाता कहा। उनकी बाह्य विभूति वैराग्य को प्रभावित नहीं करती। उन्होंने भगवान को तीनों लोकों का स्वामी, अनन्त गुणों से युक्त, और अरिहंत कहा। गर्भ, दीक्षा, और मोक्ष कल्याणकों की प्रशंसा की। भगवान को वीतराग, स्वयंभू, और संसार-पारक कहकर नमस्कार किया। उनकी स्तुति से सभा पवित्र हुई।
श्लोक 182 से 191 स्तुति का फल
भरत ने केवलज्ञान और मोक्ष कल्याणकों की पूजा करने वाले देवों का स्मरण किया। भगवान की स्तुति से उनके वचन, मन, और शरीर पवित्र हुए। उनके दर्शन से वे धन्य हुए, जन्म सार्थक हुआ, और नेत्र संतुष्ट हुए। भगवान के तीर्थ में स्नान कर वे सुखी हुए। उनके नखों की किरणों से अभिषेक सा अनुभव हुआ, और दिग्विजय के पाप नष्ट हुए।
श्लोक 192 से 202 अयोध्या की वापसी
भरत ने चक्रवर्ती विभूति और भगवान की सेवा दोनों प्राप्त की। उनकी स्तुति से अर्जित पुण्य से वे चरणों में भक्ति की कामना करते हैं। आनंद के आँसुओं के साथ उन्होंने भगवान को नमस्कार किया। वृषभदेव से धर्म स्वरूप सुनकर वे प्रसन्न हुए। मुनियों को नमस्कार कर, समवसरण की विभूति से नेत्रों को तृप्त कर, वे अयोध्या लौटे। साठ हजार वर्षों के दिग्विजय और पुण्य से प्रेरित होकर उन्होंने जिनेन्द्र की भक्ति में आनंद प्राप्त किया।
आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन
हिन्दी-भाषानुवाद पर्व 34
श्लोक 1 से 11 चक्रवर्ती भरत का अयोध्या की ओर प्रस्थान
चक्रवर्ती भरत, कैलास पर्वत से उतरकर अपनी सेना के साथ अयोध्या की ओर प्रस्थान करते हैं, जो नदियों के साथ समुद्र की ओर बहती गंगा के समान शोभायमान है। अयोध्या नगरी साफ-सुथरी और चंदन से सुगंधित होकर स्वागत के लिए तैयार है। नगरी के समीप पहुंचने पर भरत का चक्ररत्न गोपुर द्वार पर रुक जाता है, जिससे नगरी कुंकुम जैसी लालिमा और चमक से युक्त प्रतीत होती है। लोग चक्र के रुकने को सूर्य के समान या किसी क्रूर ग्रह के प्रभाव से जोड़कर आश्चर्य और भय मिश्रित विचार करते हैं, यह मानते हुए कि कोई शत्रु अभी भी जीतने योग्य हो सकता है।
श्लोक 12 से 21 चक्ररत्न के रुकने पर विचार-विमर्श
सेनापतियों द्वारा चक्ररत्न के रुकने की सूचना मिलने पर भरत आश्चर्यचकित होकर विचार करते हैं कि उनकी अजेय गति वाला चक्र आज क्यों रुका। वे पुरोहित को बुलाकर गंभीर वचनों में कारण जानने का आदेश देते हैं। भरत की वाणी विजयलक्ष्मी की दूती-सी प्रतीत होती है। वे प्रश्न करते हैं कि सभी दिशाओं को जीतने वाला चक्र उनके अपने नगर के द्वार पर क्यों रुका, और क्या कोई शत्रु या द्वेषी उनके घर में ही मौजूद है। वे यह भी विचार करते हैं कि दुष्ट हृदय वाले लोग प्रायः महान पुरुषों की उन्नति से ईर्ष्या करते हैं।
श्लोक 22 से 31 शत्रु और चक्ररत्न के महत्व पर विचार
भरत कहते हैं कि महापुरुष दूसरों की उन्नति पर ईर्ष्या नहीं करते, परंतु क्षुद्र लोग ऐसा करते हैं। वे संदेह करते हैं कि कोई अहंकारी उनके घर में ही उनकी आज्ञा का पालन नहीं कर रहा, जिसके कारण चक्र रुक गया। वे कहते हैं कि छोटे शत्रु को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, जैसे आंख में पड़ी धूल या पैर में चुभा कांटा दुख देता है। चक्ररत्न के रुकने का कारण गंभीर है, क्योंकि यह राज्य का प्रमुख अंग है। भरत पुरोहित से इसका कारण जानने को कहते हैं, क्योंकि वे ही इस रहस्य को समझ सकते हैं। पुरोहित को संबोधित कर भरत संक्षिप्त वचनों में अपनी बात रखते हैं।
श्लोक 32 से 41 पुरोहित का परामर्श
पुरोहित भरत की प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि उनकी वाणी में माधुर्य और सरलता अद्वितीय है। वे स्वीकार करते हैं कि वे केवल शास्त्रज्ञ हैं, परंतु भरत जैसे राजा को राजनीति की समझ में कोई समकक्ष नहीं। पुरोहित बताते हैं कि चक्ररत्न तब तक नहीं रुकता जब तक दिग्विजय पूर्ण न हो। वे संकेत देते हैं कि भरत ने बाहरी शत्रुओं को जीत लिया, परंतु घर के भीतर (अंतर्मंडल) अभी शुद्धता की आवश्यकता है। विशेष रूप से, उनके भाई उनकी आज्ञा का पालन नहीं कर रहे, जो चक्र के रुकने का कारण हो सकता है।
श्लोक 42 से 51 सजातीय विरोध और बाहुबली की भूमिका
पुरोहित कहते हैं कि सजातीय लोग भी बलवान की राह में बाधा बन सकते हैं, जैसे सूर्यकांत मणि सूर्य के सामने चमकती है। भरत के निन्यानबे भाई, विशेषकर बाहुबली, अहंकारवश केवल आदिनाथ को प्रणाम करने का निश्चय करते हैं। पुरोहित सुझाते हैं कि शीघ्र प्रतिकार आवश्यक है, क्योंकि शत्रु, ऋण, या अग्नि का छोटा अंश भी उपेक्षित नहीं करना चाहिए। वे कहते हैं कि पृथिवी का शासन केवल भरत को करना चाहिए, न कि अनेक राजाओं को। यदि भाई आज्ञाकारी न हों, तो दूतों के माध्यम से या युद्ध द्वारा उन्हें वश में करना होगा।
श्लोक 52 से 61 एकमात्र शासक का महत्व और क्रोध
पुरोहित कहते हैं कि राज्य और कुलवती स्त्रियां एक ही पुरुष के अधीन होनी चाहिए। भाइयों को या तो भरत को प्रणाम करना होगा या जैन धर्म की शरण लेनी होगी। सजातीय लोग परस्पर विरोध से जलते हैं, परंतु अनुकूल रहकर आनंद देते हैं। पुरोहित सुझाते हैं कि भाई शांति से भरत की आज्ञा मानें। इसके जवाब में, भरत क्रोधित होकर कहते हैं कि उनके भाई बिना कारण वैर कर रहे हैं। वे उन्हें दंड देने की बात कहते हैं, यह मानते हुए कि उनके अहंकार को चक्र के संताप से ठीक करना होगा।
श्लोक 62 से 71 बाहुबली के अहंकार पर क्रोध और समाधान की शुरुआत
भरत कहते हैं कि उनके भाई, विशेषकर बाहुबली, यौवन के उन्माद में योद्धा होने का दंभ पाले हैं। वे घोषणा करते हैं कि पृथिवी का उपभोग केवल वही करेंगे, और भाइयों को उनकी आज्ञा माननी होगी, अन्यथा युद्ध अपरिहार्य है। वे बाहुबली के अहंकार को विशेष रूप से निंदनीय मानते हैं, क्योंकि वह बुद्धिमान और प्रेमी होने के बावजूद विरोध कर रहा है। क्रोध में बढ़-चढ़कर बोलने पर पुरोहित उन्हें शांत करते हैं और उपायपूर्वक कार्य शुरू करने का सुझाव देते हैं, जिसे भरत स्वीकार करते हैं।
श्लोक 72 से 81 क्रोध पर नियंत्रण और दूतों के माध्यम से समाधान
पुरोहित चक्रवर्ती भरत को समझाते हैं कि क्रोध जितेंद्रिय पुरुषों के लिए अनुचित है, क्योंकि उन्होंने छह अंतःशत्रुओं (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य) को जीत लिया है। वे कहते हैं कि क्रोध कार्य की सिद्धि में संदेह पैदा करता है और जो राजा अपने अंतःशत्रुओं को नहीं जीत सकता, वह कार्य-अकार्य का ज्ञान नहीं कर सकता। पुरोहित सुझाते हैं कि क्षमा ही पृथिवी को जीतने का श्रेष्ठ साधन है और भरत को शांत रहकर दूतों के माध्यम से भाइयों को वश में करना चाहिए। वे सलाह देते हैं कि दूत पत्र और भेंट के साथ भाइयों को भरत की सेवा करने का संदेश दें, क्योंकि उनकी सेवा पितृ-समान और लाभकारी है।
श्लोक 82 से 91 दूतों का संदेश और भाइयों की प्रतिक्रिया
पुरोहित कहते हैं कि भाइयों के बिना भरत का राज्य संतोषजनक नहीं, क्योंकि साम्राज्य भाइयों के साथ ही आनंददायक होता है। दूतों को भाइयों को विश्वास दिलाने और पत्र के माध्यम से संदेश देने को कहा जाता है। यदि शांतिपूर्ण प्रयास विफल हों, तो आगे की कार्रवाई पर विचार करना चाहिए। पुरोहित लोकापवाद से बचने और यश की रक्षा की सलाह देते हैं। भरत उनकी बात मानकर क्रोध छोड़ देते हैं और दूतों को भाइयों के पास भेजते हैं। दूत संदेश सुनाते हैं, जिसे सुनकर भाई कहते हैं कि बड़ा भाई पूज्य है, परंतु वे केवल अपने पिता आदिनाथ की आज्ञा मानते हैं।
श्लोक 92 से 101 भाइयों का पिता के प्रति समर्पण
भाई स्वीकार करते हैं कि भरत का संदेश उचित है, परंतु वे अपने पिता वृषभदेव को ही प्रमाण मानते हैं, जिन्होंने उन्हें ऐश्वर्य प्रदान किया। वे कहते हैं कि वे स्वतंत्र नहीं, बल्कि पिता की आज्ञा के अधीन हैं और भरत से कुछ लेना-देना नहीं चाहते। भाइयों ने दूतों का सत्कार किया, उपहार और पत्र के साथ उन्हें विदा किया, और फिर अपने पिता वृषभदेव के पास पहुंचे। वहां उन्होंने विधिपूर्वक प्रणाम और पूजा की, यह कहते हुए कि वे केवल उनकी ही उपासना करेंगे, क्योंकि उनकी कृपा से ही उन्हें समृद्धि मिली है।
श्लोक 102 से 111 भाइयों की वृषभदेव के प्रति भक्ति
भाई कहते हैं कि वे केवल वृषभदेव को प्रणाम करेंगे, क्योंकि उनका मन अन्य को नमन करने में संतुष्ट नहीं। वे उपमाएं देते हैं, जैसे राजहंस का मानसरोवर छोड़कर अन्य तालाब न जाना, या चातक का मेघ जल के अतिरिक्त अन्य जल न पीना। वे वृषभदेव की शरण में दीक्षा लेकर भय और मानभंग से मुक्त होना चाहते हैं। वे उनसे हितकारी और सुखदायी मार्ग बताने की प्रार्थना करते हैं, ताकि उनकी भक्ति दृढ़ हो और वे दोनों लोकों में उनकी सेवा में रहें।
श्लोक 112 से 121 वृषभदेव का उपदेश
वृषभदेव राजकुमारों को समझाते हैं कि अभिमानी और बलवान होने के बावजूद उन्हें दूसरों के सेवक नहीं बनना चाहिए। वे कहते हैं कि विनाशी राज्य, चंचल जीवन, और यौवन का उन्माद व्यर्थ है। सेनाएं, धन, और विषय भोग तृष्णा को बढ़ाते हैं और तृप्ति नहीं देते। वे कहते हैं कि भाइयों ने सभी विषयों का आस्वादन किया, फिर भी संतोष नहीं मिला। वृषभदेव सलाह देते हैं कि जब तक पुण्य का उदय है, भरत को राज्य करने देना चाहिए और इस अस्थिर राज्य के लिए व्यर्थ विवाद नहीं करना चाहिए।
श्लोक 122 से 131 दीक्षा और तप का मार्ग
वृषभदेव कहते हैं कि धर्मरूपी वृक्ष का दयारूपी फूल धारण करने से मुक्तिरूपी फल प्राप्त होता है। तप ही अभिमान की रक्षा करता है और दीक्षा, गुण, और दया से युक्त तपस्वी जीवन ही श्रेष्ठ राज्य है। उनके उपदेश से राजकुमारों में वैराग्य जागता है और वे दीक्षा ग्रहण कर वन की ओर प्रस्थान करते हैं। दीक्षा को राजकन्या की तरह ग्रहण कर वे सुखी होते हैं। तीव्र तप से उनका शरीर कृश, परंतु तप की लक्ष्मी से देदीप्यमान होता है। वे जिनकल्प चारित्र में स्थित होकर तप करते हैं।
श्लोक 132 से 141 तप और ज्ञान का अध्ययन
राजकुमार तपरूपी लक्ष्मी के प्रति समर्पित होकर राज्यलक्ष्मी को भूल जाते हैं। उन्होंने द्वादशांग श्रुतस्कंध का अध्ययन कर आत्मा को तप से अलंकृत किया। स्वाध्याय से मन और इंद्रियों का निरोध कर वे आचारांग से मुनि आचरण, सूत्रकृतांग से धर्मक्रियाएं, स्थानाध्ययन से तत्त्वरत्न, समवाय से द्रव्य ज्ञान, व्याख्याप्रज्ञप्ति से प्रश्न-उत्तर, धर्मकथानास से कथाएं, और उपासकाध्ययन से श्रावकाचार का ज्ञान प्राप्त किया। इस प्रकार, वे विशुद्ध चारित्र और ज्ञान से युक्त होकर धर्म का प्रचार करते हैं।
श्लोक 142 से 151 श्रुतज्ञान और तप की साधना
राजकुमारों ने द्वादशांग श्रुतस्कंध के अध्ययन से गहन ज्ञान प्राप्त किया। उन्होंने अन्तःकृत और अनुत्तर विमानौपपादिक अंगों से तीर्थंकरों के उपसर्गों और अनुत्तर विमानों में उत्पन्न मुनियों का वृत्तांत जाना। प्रश्नव्याकरण से जीवों के सुख-दुख का वर्णन, विपाकसूत्र से कर्मों की प्रकृतियों का ज्ञान, और दृष्टिवाद से दृष्टि के भेद समझकर वे जैन शास्त्रों में भक्ति और तीव्र तप में लीन हो गए। चौदह पूर्वों का अध्ययन कर वे श्रुतज्ञान से विशुद्ध तप करने लगे। ग्रीष्म में सूर्य की तपन सहते हुए वे आतापन योग में तप करते थे।
श्लोक 152 से 161 कठिन तप और धैर्य
मुनिराज ग्रीष्म में तपी हुई शिलाओं पर खड़े होकर, वर्षा में वृक्षों के नीचे रात बिताकर, और शीत में बर्फ सहते हुए कठिन तप करते थे। वे मौन और धैर्य के साथ प्रकृति के संताप को सहन करते थे। ग्रीष्म के दावानल, वर्षा के मूसलधार जल, और शीत की बर्फ में भी वे अडिग रहकर आतापन, ध्यान, और निश्चल योग धारण करते थे। उनका धैर्य और तप उनकी आत्मा को समुद्र की तरंगों-सा देदीप्यमान करता था, और वे तीनों कालों में कठिन योग को धारण करते थे।
श्लोक 162 से 171 वैराग्य और मोक्षमार्ग की दृढ़ता
मुनियों ने भोगों को माला के समान तुच्छ मानकर त्याग दिया और जीवन को चंचल समझकर मोक्षमार्ग में दृढ़ता अपनाई। वे जिनेन्द्रदेव के मार्ग में संतोष के साथ संलग्न थे। जैन धर्म के प्रति उनकी श्रद्धा अटल थी, और वे छह महाव्रतों (अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, परिग्रहत्याग, रात्रिभोजनत्याग) का पालन करते थे। परिग्रह और ममता से मुक्त होकर वे जिनेन्द्रदेव के मोक्षमार्ग की आराधना में तत्पर थे, और उनकी आत्मा विशुद्धता की ओर अग्रसर थी।
श्लोक 172 से 182 एकांतवास और निर्भयता
मुनिराज परिग्रह त्यागकर एकांत और पवित्र स्थानों में निवास करते थे। वे गाँवों में एक दिन और नगरों में पाँच दिन से अधिक नहीं ठहरते थे। सिंह, व्याघ्र, और अन्य हिंसक जीवों से भरे जंगलों और गुफाओं में वे निर्भय होकर रहते थे। श्मशानभूमियों में डाकिनियों, उल्लुओं, और शृगालों के बीच भी वे ध्यानमग्न रहते थे। उनकी निर्भयता और धैर्य उन्हें जिनेन्द्रदेव के उपदेशों के अनुसार शांत और स्थिर रखते थे।
श्लोक 183 से 191 ध्यान और दयालुता
मुनिराज अंधेरी रातों में भयंकर वनों और जंगली हाथियों के बीच ध्यानमग्न रहते थे। वे स्वाध्याय और ध्यान में लीन होकर रात नहीं सोते थे, बल्कि सूत्रों के चिंतन में जागते रहते थे। पर्यंकासन या वीरासन में रात बिताते थे। परिग्रह और ममता से मुक्त होकर वे आकाश-से निर्लेप थे। वे सभी प्राणियों को पुत्र-सा मानकर मातृवत व्यवहार करते थे, और जीव-अजीव के भेद को जानकर प्रासुक स्थानों में निवास करते थे।
श्लोक 192 से 201 रत्नत्रय और शुद्ध आहार
मुनियों ने रत्नत्रय (समीचीन दर्शन, ज्ञान, चारित्र) के लिए सावद्य कार्यों का त्याग किया। वे छह काय जीवों की रक्षा करते थे और दीनता से मुक्त होकर मोक्ष को लक्ष्य बनाए रखते थे। तीन गुप्तियों (मन, वचन, काय की संयम) के धारक थे और कामभोगों से उदासीन रहते थे। वे शुद्ध अन्न ही ग्रहण करते थे, और शंकित, अभिहृत, उद्दिष्ट, या क्रयक्रीत आहार से बचते थे। मौन और ईर्यासमिति के साथ भिक्षा लेते थे, और सुख-दुख, मान-अपमान को समान मानते थे।
श्लोक 202 से 211 तप की विशुद्धता और संतोष
मुनिराज शरीर की स्थिति के लिए न्यूनतम आहार लेते थे, जैसे गाड़ी के लिए चिकनाई। वे आहार मिलने पर संतुष्ट नहीं होते थे और न मिलने पर विषाद करते थे। गोचरीवृत्ति के साथ शुद्ध भोजन ग्रहण कर तपोवन की ओर प्रस्थान करते थे। तप से उनका शरीर कृश हो गया, पर उनकी प्रतिज्ञा अडिग रही। परीषहों (कष्टों) को जीतकर उनकी आत्मा तपे हुए स्वर्ण-सी चमकने लगी। तप की अग्नि से उनकी आत्मा विशुद्ध होकर मोक्ष की ओर अग्रसर थी।
श्लोक 212 से 223 तप यज्ञ और मोक्ष की प्राप्ति
तप से मुनियों के शरीर चमड़ा और हड्डी मात्र रह गए, पर वे ध्यान की विशुद्धता में लीन थे। तप से अणिमा-महिमा जैसी ऋद्धियां प्रकट हुईं। उन्होंने तप को यज्ञ मानकर भगवान वृषभदेव के वचनों को मंत्र, दया को दक्षिणा, और मोक्ष को फल बनाया। वे मुनि भावनाओं का पालन करते हुए सभी विकारों को त्यागकर मोक्षमार्ग पर अग्रसर थे। भगवान वृषभदेव के पुत्रों ने दीक्षा लेकर तीर्थरूपी मानसरोवर के राजहंस बनकर मोक्ष की कामना की। भरत उन्हें वश में न कर सका, पर वे अपने पिता के मार्ग पर चलकर पापों का नाश करने वाले बने।
आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन
श्लोक 1 से 11 बाहुबली के प्रति भरत का चिंतन
चक्रवर्ती भरत बाहुबली को वश करने के लिए चिंतित होकर विचार करते हैं कि उनके भाई, एक ही कुल में उत्पन्न होने के कारण स्वयं को अवध्य मानते हैं और उनकी उन्नति से ईर्ष्या करते हैं। वे कहते हैं कि बाहुबली, जो बुद्धिमान, विनयी और बलवान है, फिर भी उनके प्रति विकार क्यों रखता है। भरत मानते हैं कि बाहुबली का अहंकार सामान्य संदेशों से नियंत्रित नहीं हो सकता, क्योंकि वह नीति में चतुर और युद्ध में अजेय है, जैसे सिंह को हरिण की तरह नहीं पकड़ा जा सकता।
श्लोक 12 से 21 बाहुबली के अहंकार का विश्लेषण और दूत प्रेषण
भरत विचार करते हैं कि बाहुबली को शांतिपूर्ण साधनों से भी वश करना कठिन है, क्योंकि वह प्रेम से और अधिक क्रोधित होता है। अन्य राजकुमारों ने वन में जाने की इच्छा जताई, पर बाहुबली का अहंकार कुल को भस्म करने वाली अग्नि-सा है। भरत करते हैं कि पहले कोमल वचनों से उसकी परीक्षा लेंगे, और यदि वह न माने तो आगे की कार्रवाई पर विचार करेंगे। इसके लिए वे एक कुशल दूत को बाहुबली के पास भेजते हैं, जो निःसृष्टार्थ और मंत्र में निपुण है।
श्लोक 22 से 31 दूत का प्रस्थान और मार्ग
दूत अपने सेवक और सामग्री के साथ बाहुबली के पोदनपुर नगर की ओर प्रस्थान करता है। वह मार्ग में यह विचार करता है कि यदि बाहुबली शांतिपूर्ण बात करेगा तो वह भी अनुकूल रहेगा, और यदि युद्ध की बात करेगा तो वह शांति का प्रयास करेगा। दूत पोदनपुर के समीप पहुंचकर वहां के धान के खेतों, किसानों, और मनोहर दृश्यों को देखकर आनंदित होता है। वह खेतों की रक्षा करती स्त्रियों और तोतों को भगाने की उनकी क्रिया को देखता है।
श्लोक 32 से 44 पोदनपुर का सौंदर्य और दूत का प्रवेश
दूत पोदनपुर के बाहरी क्षेत्रों में धान, ईख, और जलाशयों से युक्त मनोहर दृश्य देखता है। वह नगर के गोपुर द्वार को पार कर बाजार और राजा के आंगन में प्रवेश करता है, जहां घोड़े और हाथियों से कीचड़युक्त दृश्य उसे प्रभावित करता है। वहां की समृद्धि और रत्नों की राशि को देखकर वह कृतार्थ अनुभव करता है। दूत द्वारपालों के माध्यम से अपना परिचय देकर बाहुबली के समीप पहुंचता है।
श्लोक 45 से 61 बाहुबली का दर्शन और स्वागत
दूत बाहुबली को एक विशाल पर्वत-से तेजस्वी और विजयलक्ष्मी से युक्त देखता है। बाहुबली का वक्ष चौड़ा, मुकुट उन्नत, और भुजाएं तराजू के दंड-सी हैं। उनकी कान्ति हरित मणि-सी और तेज परमाणुओं से निर्मित-सी प्रतीत होती है। दूत उनकी शोभा से प्रभावित होकर प्रणाम करता है। बाहुबली उसे सत्कार के साथ बिठाते हैं और मंद हास्य के साथ पूछते हैं कि भरत की कुशलता और उनके दिग्विजय के कार्य की स्थिति क्या है।
श्लोक 62 से 71 दूत का संदेश
दूत बाहुबली से कहता है कि उनके वचनों में भरत का उद्देश्य स्पष्ट है। वह स्वयं को केवल संदेशवाहक बताते हुए कहता है कि भरत की आज्ञा, चाहे अच्छी हो या बुरी, स्वीकार करनी चाहिए। वह भरत के इक्ष्वाकु वंश, दिग्विजय, और गंगा-समुद्र तक की विजय का वर्णन करता है। दूत बताता है कि भरत ने देवों, म्लेच्छों, और विद्याधरों को वश में किया, और उनकी सेना ने समस्त दिशाओं पर अधिकार किया।
श्लोक 72 से 81 भरत की महिमा और आह्वान
दूत कहता है कि भरत ने विजयार्ध पर्वत और समुद्रों तक विजय प्राप्त की, और उनका यश पर्वतों पर कमल-सा सुशोभित है। गंगा-सिंधु के देवताओं ने उनकी पूजा की, और लक्ष्मी उनकी दासी-सी है। भरत का राज्य बाहुबली के बिना अधूरा है, और वे चाहते हैं कि बाहुबली उनके साथ साम्राज्य का उपभोग करें। दूत जोर देता है कि बाहुबली का प्रणाम न करना भरत के चक्रवर्तीपन को फीका करता है।
श्लोक 82 से 91 बाहुबली से प्रणाम की अपील
दूत कहता है कि शत्रु का प्रणाम न करना उतना दुख नहीं देता, जितना भाई का अहंकार। वह बाहुबली से अनुरोध करता है कि वे भरत को प्रणाम कर उनकी आज्ञा स्वीकार करें, क्योंकि यह समृद्धि और यश देगा। दूत चेतावनी देता है कि भरत की आज्ञा का उल्लंघन करने वाले शत्रुओं को चक्ररत्न नष्ट करता है। बाहुबली, दूत के वचनों को सुनकर, मंद हास्य के साथ गंभीर वचन कहते हैं, यह स्वीकार करते हुए कि दूत ने भरत की साधु वृत्ति और नीति का उचित प्रदर्शन किया।
श्लोक 92 से 101 बाहुबली का दूत को उत्तर और दुष्टता का खंडन
बाहुबली दूत को स्वतंत्र और भरत का अंतरंग कहकर उसकी चतुरता की प्रशंसा करते हैं, परंतु उसका दूसरों के मर्म को भेदना अनुचित मानते हैं। वे कहते हैं कि अपनी प्रशंसा और दूसरों में दोष निकालना दुष्टों का कार्य है। दुष्टता को वे आकाश की बेल-सी नीरस और फलहीन बताते हैं, जो केवल मूर्खों का आश्रय है। बाहुबली साम, दाम, दंड, और भेद के अनुचित प्रयोग को असफलता का कारण मानते हैं, क्योंकि तेजस्वी पुरुष पर ये उपाय निष्फल हैं, जैसे गर्म घी में पानी डालना या सिंह पर दंड चलाना।
श्लोक 102 से 111 बाहुबली का अभिमान और स्वतंत्रता
बाहुबली कहते हैं कि वे शांति या अहंकार से वश नहीं हो सकते। वे भरत को केवल बड़ा भाई होने के कारण प्रशंसनीय नहीं मानते, जैसे बूढ़ा हाथी सिंह के समान नहीं। प्रेम और विनय कुटुंब में ही संभव हैं, पर विरोध होने पर नष्ट हो जाते हैं। वे कहते हैं कि तलवार की धमकी के साथ प्रणाम करना अनुचित है। वृषभदेव ने दोनों को “राजा” कहा, पर भरत का “राजराज” होना व्यर्थ है। बाहुबली स्वधर्म में राजा बने रहना चाहते हैं और भरत का दिया राज्य तुच्छ मानते हैं।
श्लोक 112 से 121 स्वाभिमान और यश की रक्षा
बाहुबली कहते हैं कि स्वयं की भुजाओं से अर्जित फल ही प्रशंसनीय है, न कि दूसरों की कृपा से प्राप्त ऐश्वर्य। जो राजा दूसरों की आज्ञा से लक्ष्मी धारण करता है, वह “राजा” शब्द को व्यर्थ करता है। अपमानित विभूति धारण करना पशु के समान है। अभिमान की रक्षा यश को सुशोभित करती है। बाहुबली दूत की स्तुति को निंदा का रूप मानते हैं, जो पंडितों द्वारा नीरस वस्तु को भी पुष्ट करने जैसा है। वे भरत की दिग्विजय को वचनाडंबर और कुम्हार की चाल बताते हैं।
श्लोक 122 से 131 भरत की निंदा और यश की महत्ता
बाहुबली कहते हैं कि भरत की चक्रवर्ती वृत्ति भिक्षुक की भांति दीनता को दर्शाती है। वे उसके दिग्विजय को विश्वासयोग्य मात्र बताते हैं, क्योंकि वह उपवास और तप के बिना कैसे संभव था। वे भरत को पाप की धूल से कलंकित और कुल को अपमानित करने वाला मानते हैं। उसका पराक्रम म्लेच्छों के सामने कमजोर था। बाहुबली यश को अमर धन मानते हैं, जो रक्षा योग्य है, जबकि रत्न मृत्यु के साथ नष्ट हो जाते हैं। वे कहते हैं कि भरत कुल की पृथ्वी छीनना चाहता है, जो अनुचित है।
श्लोक 132 से 141 युद्ध की चुनौती
बाहुबली भरत को तुलापुरुष कहकर उसकी लोभपूर्ण इच्छा का तिरस्कार करते हैं। वे कहते हैं कि स्वतंत्र पुरुष कुल की स्त्रियों और भुजाओं से अर्जित पृथ्वी को छोड़कर कुछ भी दे सकते हैं। वे भरत को चुनौती देते हैं कि वह बिना पराजित किए पृथ्वी का उपभोग नहीं कर सकता। युद्ध को कसौटी मानकर वे दूत को संदेश देते हैं कि दोनों का भविष्य युद्ध में तय होगा। बाहुबली दूत को युद्ध की तैयारी का संदेश देकर विदा करते हैं। उनकी सेना में योद्धा उत्साहित होकर युद्ध की चर्चा करते हैं।
श्लोक 142 से 151 युद्ध की तैयारी
बाहुबली की सेना में योद्धा युद्ध को स्वामी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर मानते हैं। वे कहते हैं कि सेवकों का पालन समय पर कार्य सिद्ध करने के लिए होता है। वे यश और विजय की कामना करते हैं, युद्ध को उत्सव मानते हैं। योद्धा बाणों की छाया में विश्राम, शत्रु के व्यूह भेदन, और मृत्यु के बाद भी विजय की आकांक्षा व्यक्त करते हैं। वे शस्त्र और टोपियां संभालते हैं। दिन समाप्त हो जाता है, मानो योद्धाओं के तिरस्कार से भयभीत होकर भाग गया हो।
श्लोक 152 से 161 सूर्यास्त का प्रतीकात्मक वर्णन
सूर्यास्त के समय सूर्य की किरणें लाल होकर अस्ताचल की शिखर पर वृक्षों की कोपलों-सी दिखती हैं, मानो वह गिरने से बचने के लिए सहारा ले रहा हो। सूर्य पश्चिम दिशा में डूबता है, जैसे पाप के भय से उसे सहारा न मिला हो। वह पाताल में छिप जाता है, मानो बीते दिन को खोजने गया हो। दिशाएं अंधकार से शोकाकुल हो जाती हैं, और कमलिनियां सूर्य के वियोग में मुरझा जाती हैं। सायंकाल का लाल प्रकाश दावानल-सा प्रतीत होता है, जो युद्ध की आगामी उग्रता का प्रतीक है।
श्लोक 162 से 171 संध्या का सौंदर्य और रात्रि का आगमन
संध्या, सूर्य द्वारा छोड़े जाने पर लालिमा से युक्त होकर अग्नि में प्रवेश करती-सी प्रतीत होती है। यह सिन्दूर और जवाकुसुम-सी लालिमा पश्चिम दिशा में मूंगों के बगीचे-सी शोभती है। संध्या की लाली चकवियों के मन को संताप देती है, मानो प्रेमी स्त्रियों का अनुराग एकत्रित हो। सूर्य के पीछे चलती संध्या सती-सी लगती है। चकवा-चकवियां नियति के कारण बिछड़ते हैं, और गाढ़ अंधकार फैलने से संसार में तेजस्वी के अभाव में अंधेरा छा जाता है। रात्रि तारों से युक्त नीलवस्त्रधारी अभिसारिणी-सी सुशोभित होती है।
श्लोक 172 से 181 चंद्रोदय और उसका प्रभाव
लोग अंधकार में व्याकुल होकर सोना बेहतर समझते हैं। घरों में दीपक अंधकार को भेदने वाली सुइयों-से प्रतीत होते हैं। चंद्रमा किरणों से अंधकार नष्ट कर, दूध-सा संसार को नहलाता है। वह राजा-सा अनुराग और किरणों से युक्त मंडल धारण करता है। चंद्रमा हरिण चिह्न के साथ अंधकार को भगाता है, जैसे सिंह के सामने हाथी भागते हैं। उसकी चांदनी आकाशरूपी समुद्र के प्रवाह-सी और हंसों से युक्त सरोवर-सी लगती है। चंद्रमा अमृतमय किरणों से विश्व को प्रकाशित करता है, पर स्वाभाविक कलंक से मुक्त नहीं होता।
श्लोक 182 से 191 रात्रि में कामदेव का प्रभुत्व
रात्रि में स्त्रियां चंदन, मालाएं, और आभूषणों से सजी कल्पलताओं-सी महलों की छतों पर जाती हैं। चंद्रमा की किरणें कामदेव को प्रेरित करती हैं, जो विजयी शस्त्रों-सा स्त्रियों के मन में प्रवेश करता है। तरुणियां बिना मदिरा के काम से विह्वल हो जाती हैं। कुछ स्त्रियां पति की गोद में, कुछ सखी के वचनों से दुखी, और कुछ चकवी-सी तड़पती हैं। गीत और भ्रमरों की गुंजन कामदेव के पूर्वरंग-सी प्रतीत होती है।
श्लोक 192 से 201 प्रेम और विरह का चित्रण
कामदेव नवविवाहिताओं को भी पति के समीप ले जाता है। कुछ स्त्रियां पति के अन्यत्र जाने से संतापग्रस्त होकर चंदन या पंखे से संतुष्ट नहीं होतीं। धैर्यशील स्त्रियां कामदेव के बाण सहन करती हैं। कुछ स्त्रियां सखियों से पति के व्यवहार पर चर्चा करती हैं, कुछ ताना देती हैं कि पति की प्रीति अयोग्य स्थान पर संताप देगी। सखियां संदेश ले जाती हैं, और स्त्रियां चंद्रमा, चंदन, और पंखे से संतापग्रस्त होकर पति के पास जाने की इच्छा व्यक्त करती हैं।
श्लोक 202 से 211 प्रेम और युद्ध की समानता
स्त्रियां आलिंगन में पति के साथ संभोग का आनंद लेती हैं, उनकी करधनियां कामदेव के राज्य में क्रीड़ा की घोषणा करती हैं। भ्रमरों की गुंजन गुप्त बातों-सी लगती है। संभोग में स्तनों का मर्दन और केशों की पकड़ बढ़ती है। संभोग के बाद नेत्र लाल और मुख गुलाबी हो जाता है। योद्धा युद्ध की तैयारी के बीच स्त्रियों के आग्रह पर संभोग करते हैं, पर कुछ यश और विजय की कामना में इसे त्याग देते हैं। वे बाणों की शय्या पर सुख की आकांक्षा रखते हैं।
श्लोक 212 से 221 रात्रि का अंत और प्रभात
योद्धा युद्ध कथाओं में रत होकर रात्रि बीतने का भान नहीं करते। संभोग और युद्ध का रस समान माना जाता है, दोनों में प्रहार और निर्दयता समान होती है। रात्रि समाप्त होकर प्रभात में बदल जाती है। पश्चिम दिशा स्त्री-सी क्रीड़ा को रोकने की चेतावनी देती है। सूर्योदय के साथ अंधकार विलीन हो जाता है, और सूर्य पूर्व दिशा का आलिंगन करता है। वह चकवियों और कमलों की शोभा बढ़ाता है, चांदनी को नष्ट करता है।
श्लोक 222 से 231 सूर्योदय और प्रकृति का जागरण
सूर्य किरणों से अंधकाररूपी किवाड़ खोलकर दिशाओं को प्रकाशित करता है। वह राजा-सा कमल विकसित करता है। बाहुबली जागते हैं, और बंदीजन मंगलपाठ पढ़कर उन्हें प्रेरित करते हैं। वे सूर्योदय को विजयलक्ष्मी की प्राप्ति से जोड़ते हैं। चकवा-चकवियां मिलते हैं, चंद्रमा कुमुदिनियों के साथ आलिंगन करता है। प्रकृति पक्षियों की बोली और कमलों की शोभा से जीवंत हो उठती है। प्रभात की लालिमा सिन्दूर और महावर-सी दिशाओं को अलंकृत करती है।
श्लोक 232 से 241 चंद्रमा का अस्त और जिनेन्द्र की स्तुति
चंद्रमा अंधकाररूपी हाथियों को भेदकर अस्ताचल में छिपता है, मानो सिंह-सा गुहा में प्रवेश करता हो। सूर्योदय के साथ हंस, सारस, और चकवियां सरोवरों में लौटते हैं। प्रभात की हवा वृक्षों को हिलाती और कमलों के पराग को फैलाती है। बंदीजन बाहुबली को जिनेन्द्र की स्तुति से प्रेरित करते हैं। वे वृषभदेव की जय-जयकार करते हैं, जिन्होंने कामदेव को जीता, पाप धोया, और जिनके चरण इंद्रों द्वारा पूजित हैं। उनकी आत्मा मुक्तिरूपी सुख देती है।
श्लोक 242 से 249 बाहुबली का युद्ध के लिए प्रस्थान
जिनेन्द्र वृषभदेव, जिन्होंने बिना युद्ध के कामदेव को जीता, सदा जयवंत रहते हैं। उनके आठ प्रातिहार्य तीनों लोकों की विजय के चिह्न हैं। बाहुबली को बंदीजन युद्ध में विजय की प्रेरणा देते हैं, कहते हैं कि उनकी भुजाएं भरत से श्रेष्ठ हैं। वे समय नष्ट न करने और जिनेन्द्र को नमस्कार करने का आह्वान करते हैं। बाहुबली शय्या छोड़कर, विशाल पराक्रमी सेना के साथ युद्धभूमि की ओर प्रस्थान करते हैं, जैसे ऐरावत गंगा तट छोड़ता है।
आदिपुराण पर्व 36 – बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन
श्लोक 1 से 11 भरत की सेना का प्रस्थान
दूत के वचनों से प्रेरित होकर चक्रवर्ती भरत की सेना, आकाश और पृथ्वी को व्याप्त करती हुई चल पड़ती है। नगाड़ों के गंभीर शब्दों से विद्याधर भयभीत होते हैं। सेना पैदल सैनिकों, घुड़सवारों, हाथियों, रथों, और विद्याधरों-देवों के साथ छह विभागों में विभक्त होकर आगे बढ़ती है। भरत बाहुबली को जीतने की इच्छा से राजाओं के साथ प्रस्थान करते हैं। विजय पताकाओं से सुशोभित मदोन्मत्त हाथी पर्वतों-से प्रतीत होते हैं, जिनके मदजल से भूमि सींची जाती है। महावत और घुड़सवार पराक्रमी योद्धाओं-से लगते हैं।
श्लोक 12 से 21 सेना की शोभा और योद्धाओं का उत्साह
धनुर्धारी योद्धा बाणों से भरे तरकसों के साथ वृक्षों-से सुशोभित होते हैं। रथी योद्धा युद्धरूपी समुद्र पार करने वाले खेवटियों-से प्रतीत होते हैं। कवच और तलवारों से सजे योद्धा उल्काओं-से चमकते हैं, जो शत्रुओं के सामने पराक्रम प्रदर्शित करते हैं। कुछ योद्धा तलवार में अपना प्रतिबिंब देखकर या उसे तोलकर स्वामी के सम्मान का गौरव अनुभव करते हैं। मुकुटबद्ध राजाओं की सेनाएं रत्नों की किरणों से दीप्तिमान होकर लोकपालों-सी शोभती हैं। योद्धा व्याकुल स्त्रियों को आश्वासन देते हैं।
श्लोक 22 से 31 युद्ध की तैयारी और चिंतन
घोड़ों के खुरों से उठी धूल आकाश को ढक लेती है, जिसमें चक्ररत्न का प्रकाश ही मार्गदर्शन करता है। राजा योद्धाओं के वार्तालाप से उत्साहित होते हैं। बाहुबली रणभूमि को तैयार कर प्रतीक्षा करते हैं, जबकि भरत उच्छृंखल होकर उनके समक्ष जाते हैं। लोग चिंतित होकर कहते हैं कि यह युद्ध सेवकों के लिए हानिकारक है। वे भरत के युद्ध को ऐश्वर्य के मद में अयोग्य मानते हैं और दोनों भाइयों को रोकने की कामना करते हैं। बाहुबली को सिंह-सा शूरवीर और भरत को चक्रधारी असाधारण पुरुष मानते हैं।
श्लोक 32 से 41 युद्ध की शांति की कामना
लोग मध्यस्थ भाव से युद्ध की शांति की कामना करते हैं, क्योंकि यह अनेक लोगों के विनाश का कारण बन सकता है। कुछ पक्षपात से अपने पक्ष की प्रशंसा करते हैं। राजा बाहुबली के समीप पहुंचते हैं, जहां उनकी भुजाओं का दर्प देखकर भरत के योद्धा भयभीत होते हैं। बाहुबली की सेना समुद्र-सी क्षुब्ध हो उठती है। दोनों सेनाएं युद्ध की तैयारी करती हैं, पर मंत्रियों को यह क्रूर युद्ध अशांतिपूर्ण लगता है। वे कहते हैं कि दोनों भाइयों को क्षति नहीं होगी, पर सेवकों का नाश होगा।
श्लोक 42 से 51 धर्मयुद्ध की घोषणा
मंत्री धर्मयुद्ध की घोषणा करते हैं, जिसमें मनुष्य संहार से बचने के लिए तीन प्रकार के युद्ध—दृष्टियुद्ध, जलयुद्ध, और बाहुयुद्ध—निर्धारित होते हैं। वे कहते हैं कि विजय और पराजय को अहंकार या क्रोध के बिना स्वीकार करना भाइयों का धर्म है। दोनों भाई आग्रह के बाद इसे स्वीकार करते हैं। राजाओं को दोनों पक्षों में बांटा जाता है। भरत और बाहुबली नील और सुमेरु पर्वत-से शोभते हैं। बाहुबली शांत दृष्टि से दृष्टियुद्ध में विजय प्राप्त करते हैं।
श्लोक 52 से 61 जलयुद्ध और बाहुयुद्ध
दृष्टियुद्ध में बाहुबली की विजय के बाद दोनों भाई जलयुद्ध के लिए सरोवर में प्रवेश करते हैं। बाहुबली का जल प्रवाह भरत के वक्ष पर पड़ता है, पर भरत का जल बाहुबली के मुख तक नहीं पहुंचता, क्योंकि बाहुबली का कद अधिक है। बाहुबली जलयुद्ध में भी विजयी होते हैं। फिर बाहुयुद्ध में दोनों भाई पराक्रमी सिंहों-से युद्ध करते हैं। बाहुबली भरत को लीला में घुमा देते हैं और उन्हें कंधे पर उठाकर विजय प्राप्त करते हैं, पर बड़े भाई के सम्मान में उन्हें भूमि पर नहीं पटकते।
श्लोक 62 से 71 भरत का अपमान और वैराग्य
बाहुबली की विजय पर उनके पक्ष के राजा हर्षोल्लास करते हैं, जबकि भरत के पक्षवाले लज्जित होकर सिर झुकाते हैं। क्रोधित भरत चक्ररत्न का स्मरण करते हैं, पर वह बाहुबली के अवध्य होने से उनकी प्रदक्षिणा कर रुक जाता है। राजा भरत को धिक्कारते हैं, जिससे वे संतापग्रस्त होते हैं। बाहुबली भरत को कंधे से उतारकर सम्मानपूर्वक रखते हैं। वे उनकी प्रशंसा करते हैं, पर साम्राज्य को नश्वर और व्यभिचारिणी स्त्री-सा मानकर वैराग्य भाव से इसे तुच्छ समझते हैं।
श्लोक 72 से 81 विषयों की नश्वरता और हानि
बाहुबली विषयों की क्षणभंगुरता और निंदनीयता पर विचार करते हैं। वे कहते हैं कि विषय प्राणियों को अनंत दुख देते हैं, जैसे विष बार-बार मारता है। विषय प्रारंभ में सुखद, पर अंत में दुखदायी होते हैं, जैसे विषम फल। ये शत्रु-से उद्वेग उत्पन्न करते हैं, जो शस्त्र या सर्प भी नहीं कर सकते। मूर्ख पुरुष भोगों की लालसा में समुद्र, युद्ध, वन, नदी, और पर्वतों में प्रवेश करते हैं, बिना यह जाने कि ये भयंकर और हानिकारक हैं।
श्लोक 82 से 91 बुढ़ापे और शरीर की नश्वरता
बाहुबली बुढ़ापे को अनिष्ट स्त्री-सी बताते हैं, जो जबरन आलिंगन करती है। भोगों में लिप्त व्यक्ति हित-अहित नहीं समझता, और वृद्धावस्था मृत्यु-सी है। बुढ़ापा शीतज्वर-सा शरीर को कंपित और पतनशील बनाता है। जरा और मदिरा शरीर, बुद्धि, और वचनों को शिथिल करते हैं। आयु काल-रूपी हाथी द्वारा उखाड़ दी जाती है, और शरीर रोगों से नष्ट हो जाता है। बाहुबली भरत के मोह को दुखद मानते हैं, जो नश्वर राज्य को स्थायी समझते हैं।
श्लोक 92 से 101 बाहुबली का भरत को संबोधन
बाहुबली भरत को संबोधित कर कहते हैं कि उन्होंने मोहवश अनुचित साहस किया। उनका चक्र बाहुबली के शरीर पर निष्फल रहा, जैसे वज्र पर वज्र। भरत ने भाइयों की सामग्री नष्ट कर अधर्म और यश-हानि की। वे व्यंग्य करते हैं कि भरत ने कुल का उद्धार किया। बाहुबली राज्यलक्ष्मी को पापमय और नश्वर मानकर त्यागते हैं, क्योंकि यह बंधन सज्जनों के लिए नहीं। वे तपरूपी लक्ष्मी को अपनाने की इच्छा रखते हैं और अपनी चंचलता के लिए क्षमा मांगते हैं। उनकी वाणी भरत के संतप्त मन को शांत करती है।
श्लोक 102 से 111 बाहुबली की दीक्षा और तप
भरत अपनी दुष्टता पर संतप्त होकर पश्चाताप करते हैं। बाहुबली उन्हें प्रसन्न कर पुत्र महावली को राज्य सौंपकर जैनी दीक्षा ग्रहण करते हैं। परिग्रह त्यागकर वे कुश-लता से आलिंगित वृक्ष-से प्रतीत होते हैं। गुरु की आज्ञा से शास्त्राध्ययन और एकवर्षीय कायोत्सर्ग योग अपनाते हैं। लताओं और सर्पों से घिरे, वे हरिचंदन वृक्ष-से शोभते हैं। वासंती लता उनका आलिंगन करती है, मानो सखी हो। बाहुबली कठिन तप से देदीप्यमान होते हैं।
श्लोक 112 से 121 बाहुबली की तपस्या और परिषह-जय
बाहुबली का शरीर तप से कृश हो जाता है, और उनके कर्म नष्ट होते हैं। उनका धैर्य अचिंत्य है, जो उन्हें विकारों से मुक्त रखता है। वे भूख, प्यास, शीत, गर्मी, और डांस-मच्छर जैसे परिषह सहन करते हैं। नाग्न्य व्रत और ब्रह्मचर्य की रक्षा करते हैं। रति-अरति, स्त्री-परिषह, और चर्या-शय्या जैसे परिषहों को वे आसानी से जीत लेते हैं। बाहुबली बंध और आक्रोश परिषह भी सहन करते हैं, शरीर को नश्वर मानकर निःस्पृह रहते हैं।
श्लोक 122 से 131 बाहुबली का परिषह-जय और कषाय-विजय
बाहुबली याचना परिषह सहन कर मौन रहते हैं। वे क्षमा से क्रोध, सरलता से माया, और संतोष से लोभ जीतते हैं। स्वेद, मल, तृण-स्पर्श, और रोग-परिषह को धैर्यपूर्वक सहन करते हैं। ज्ञान के अहंकार का त्याग कर प्रज्ञा-परिषह जीतते हैं। सत्कार-पुरस्कार और अलाभ-परिषह में संतुष्ट रहते हैं। कामदेव को जीतकर इंद्रियों पर नियंत्रण पाते हैं। वे आहार, भय, मैथुन, और परिग्रह जैसी संज्ञाओं को नष्ट करते हैं। परिषह-जय से उनकी कर्म-निर्जरा होती है।
श्लोक 132 से 141 बाहुबली के गुण और रत्नत्रय की रक्षा
बाहुबली 28 मूलगुणों और 84 लाख उत्तरगुणों का पालन करते हैं, जिसमें महाव्रत, समितियां, इंद्रिय-दमन, और एक बार आहार शामिल हैं। वे तप की किरणों से देदीप्यमान होते हैं। रस, शब्द, और ऋद्धि-गौरव से मुक्त, दशधर्मों से मोक्षमार्ग में दृढ़ रहते हैं। तीन गुप्तियों और पांच समितियों से कर्म-शत्रुओं को जीतते हैं। कषाय-चोरों से रत्नत्रय की रक्षा करते हैं। मौन रहकर विकथाओं से दूर रहते हैं। उनका मन ज्ञान-दीपक से प्रकाशित रहता है, जिससे सभी पदार्थ उनके ध्यान के योग्य होते हैं।
श्लोक 142 से 151 बाहुबली का ज्ञान और तप
बाहुबली मति और श्रुत ज्ञान से संसार के पदार्थों का चिंतन करते हैं, जिससे जगत् उन्हें स्पष्ट प्रतीत होता है। परिषह और इंद्रिय-जय से वे तपरूपी राज्य का अनुभव करते हैं। तप के बल से उनकी ऋद्धियां प्रकट होती हैं, जो तीनों लोकों में क्षोभ उत्पन्न करती हैं। मतिज्ञान और श्रुतज्ञान की वृद्धि से कोष्ठबुद्धि और अंग-ज्ञान की शक्ति बढ़ती है। वे सर्वावधि और विपुलमति मनःपर्यय ज्ञान प्राप्त करते हैं। ज्ञान की शुद्धि से तप शुद्ध होता है। उग्र, महाउग्र, दीप्त, तप्तघोर, और महाघोर तपों से वे सूर्य-से देदीप्यमान होते हैं।
श्लोक 152 से 161 बाहुबली की ऋद्धियां और ध्यान
बाहुबली के तप से अणिमा, महिमा आदि आठ विक्रिया-ऋद्धियां प्रकट होती हैं। औषधि-ऋद्धि से वे प्राणियों का उपकार करते हैं। भोजन न लेने पर भी उनकी रस और बल-ऋद्धियां प्रकट होती हैं। वे अक्षीणसंवास और अक्षीणमहानस ऋद्धियां धारण करते हैं। अध्यात्म में निपुण, वे मन को ध्यान में लगाते हैं। दश धर्मध्यान-भावनाएं और बारह अणुप्रेक्षाओं का चिंतन करते हैं। आज्ञा, अपाय, विपाक, और कर्मों का चिंतन कर धर्मध्यान में लीन रहते हैं।
श्लोक 162 से 171 बाहुबली के तप का प्रभाव
बाहुबली के ध्यान से कर्म नष्ट होते हैं, जैसे दीपक की कज्जल। उनकी दीप्ति वन को नीलमणि-सी कान्ति से भर देती है। उनके चरणों के समीप मृग निर्भय रहते हैं, और सिंह जैसे दुष्ट जीव शांत हो जाते हैं। विरोधी जीव वैर छोड़कर एकत्र होते हैं। सर्प उनके चरणों पर नीलकमल-से शोभते हैं, जो उनके माहात्म्य को दर्शाते हैं।
श्लोक 172 से 181 प्रकृति की शांति
वन की लताएं फूलों से नमस्कार-सी करती हैं, और वृक्ष नृत्य-से प्रतीत होते हैं। सर्प रत्न-किरणों से नृत्य करते हैं, और मोर कोकिलों के स्वरों पर नाचते हैं। बाहुबली के माहात्म्य से वन शांत हो जाता है, जहां कोई जीव एक-दूसरे को बाधा नहीं पहुंचाता। उनका तेज तीर्थंकरों का अंधकार दूर करता है। विद्याधर उनकी पूजा करते हैं, और देवों के आसन उनके माहात्म्य से कंपित होते हैं।
श्लोक 182 से 191 बाहुबली का केवलज्ञान
विद्याधरियां बाहुबली के शरीर की लताएं हटाती हैं। शुक्लध्यान से उनकी तप-शक्ति बढ़ती है। एक वर्ष के उपवास के अंत में भरत उनकी पूजा करते हैं, जिससे बाहुबली को केवलज्ञान प्राप्त होता है। भरत का हृदय शल्य-मुक्त होता है। भरत केवलज्ञान से पहले अपराध-क्षमा और बाद में ज्ञान-उत्सव के लिए पूजा करते हैं। दोनों भाइयों का प्रेम और धर्म-निष्ठा उनकी पूजा को उत्कृष्ट बनाती है।
श्लोक 192 से 201 भरत और देवों की पूजा
भरत मंत्रियों, राजाओं, और स्त्रियों के साथ बाहुबली की पूजा करते हैं। वे रत्नों का अर्घ, गंगा-जल, मोतियों से अक्षत, और पारिजात-पुष्पों से पूजा करते हैं। इंद्र आदि देव रत्न-छत्र, सिंहासन, और गंधकुटी से उनकी पूजा करते हैं। स्वर्ग के वृक्षों से फूल बरसते हैं, और नगाड़े बजते हैं। केवलज्ञान से युक्त बाहुबली मुनियों के मध्य चंद्रमा-से शोभते हैं।
श्लोक 202 से 212 बाहुबली की महिमा
बाहुबली अर्हंत अवस्था प्राप्त कर संसार में विहार करते हैं। वे वृषभदेव के समीप कैलास पर्वत पहुंचते हैं। उन्होंने युद्धों में भरत को पराजित कर, राज्य को तुच्छ मानकर दीक्षा ली। उनकी कीर्ति विश्व में फैलती है। सर्पों का विष उनके चरणों से शांत होता है। भरत के मुकुट-रत्नों से उनके चरण चमकते हैं। सभी ऋतुओं में तप करने वाले बाहुबली की स्मृति प्राणियों को मोक्षलक्ष्मी प्रदान करती है।
आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन
श्लोक 1 से 11 भरत का अयोध्या में अभिषेक
चक्रवर्ती भरत, दिग्विजय पूर्ण कर अयोध्या में ध्वजाओं से सुशोभित वैभवपूर्ण प्रवेश करते हैं। राजाओं, अन्तःपुर, और नगरवासियों द्वारा उनका भव्य अभिषेक किया जाता है, जिसमें वृषभदेव के अभिषेक जैसी विधियां अपनाई जाती हैं। देव और राजा उन्हें आभूषण पहनाते हैं और जयघोष करते हैं। गंगा-सिन्धु देवियां तीर्थजल से अभिषेक करती हैं। अभिषिक्त भरत सिंहासन पर विराजते हैं, और गणबद्ध देव उनके मुकुट नवा-नवाकर सेवा करते हैं।
श्लोक 12 से 21 भरत की विनम्रता और वैभव
हिमवान, विजयार्ध, मागध, और विद्याधर भरत को नमस्कार करते हैं। अभिषेक के बावजूद भरत को अहंकार नहीं होता, क्योंकि वे भाइयों को विभूति न बांट पाने का पश्चाताप करते हैं। बाहुबली के संघर्ष से उनका तेज और बढ़ता है। निष्कंटक राज्य प्राप्त कर वे सूर्य-से देदीप्यमान होते हैं। उनकी प्रजा योग और क्षेम से सनाथ रहती है। भरत निधियों और रत्नों का यथायोग्य उपयोग करते हैं, जिससे उनका यश प्रथम चक्रवर्ती के रूप में फैलता है।
श्लोक 22 से 31 भरत की सेना और शारीरिक बल
गौतमस्वामी राजा श्रेणिक के प्रश्न पर भरत की विभूति का वर्णन करते हैं। उनके पास 84 लाख ऐरावत हाथी, 84 लाख रथ, 18 करोड़ घोड़े, और 84 करोड़ पैदल सिपाही हैं। भरत का शरीर वज्रवृषभनाराच संहनन से अभेद्य और समचतुरस्र संहनन से सुंदर है। उनकी कान्ति सुवर्ण-सी और शरीर 64 लक्षणों से युक्त है। उनका शारीरिक बल छह खंडों के राजाओं से अधिक है, और उनका चक्र-शासन सभी राजा स्वीकार करते हैं।
श्लोक 32 से 41 भरत का साम्राज्य और रानियां
भरत के 32 हजार मुकुटबद्ध राजा, 32 हजार देश, और 32 हजार उच्च कुल की देवियां हैं। इसके अतिरिक्त 32 हजार प्रियरानियां और 32 हजार कामोत्तेजक रानियां उनके अन्तःपुर में हैं। ये 96 हजार रानियां कल्पलता और कमलिनी-सी शोभती हैं। उनके शरीर कामदेव की शक्ति को बढ़ाते हैं। उनकी जंघाएं, कमर, और नाभि कामदेव के तरकस, कुटी, और कूपिका-सी प्रतीत होती हैं।
श्लोक 42 से 51 रानियों की शारीरिक शोभा
रानियों की रोमराजि, स्तन, और भुजाएं कामदेव की लकड़ी, पिटारा, और पाश-सी हैं। उनका कण्ठ, मुख, और नेत्र कामदेव के उच्छ्वास, सुख-भवन, और बाणों-से युक्त हैं। उनके ललाट, बाल, और केश-लताएं कामदेव के खेल-मैदान और जाल-सी प्रतीत होती हैं। ये रानियां अपनी शारीरिक चेष्टाओं से भरत का मन हरण करती हैं। उनके स्पर्श, अवलोकन, और मधुर शब्दों से भरत को संतोष मिलता है।
श्लोक 52 से 61 रानियों का कामदेव और साम्राज्य
रानियों की हंसी और आलिंगन से सुरत-वृक्ष फलता है। उनकी चेष्टाएं कामदेव को विभिन्न रसों से युक्त करती हैं, जो प्रेम, क्रोध, और संभोग में बदलता रहता है। भरत इन रानियों के साथ कामदेव-से क्रीड़ा करते हैं। उनके साम्राज्य में 32 हजार नाटक, 72 हजार नगर, और 96 करोड़ गांव हैं, जो स्वर्ग-से सुशोभित हैं।
श्लोक 62 से 71 साम्राज्य की समृद्धि
भरत के साम्राज्य में 99 हजार द्रोणामुख (बंदरगाह), 48 हजार पत्तन, 16 हजार खेट, 56 अन्तरद्वीप, और 14 हजार संवाह हैं। उनके पास 1 करोड़ हंडे, 1 लाख करोड़ हल, 3 करोड़ गौशालाएं, 700 कुक्षिवास, और 28 हजार सघन वन हैं। ये समृद्धियां उनके साम्राज्य को धन-धान्य और व्यवस्था से परिपूर्ण बनाती हैं।
श्लोक 72 से 81 भरत के म्लेच्छ राजा और नौ निधियां
महाराज भरत के अधीन 18,000 म्लेच्छ राजा हैं, जिनके क्षेत्रों में रत्न-खानें हैं। उनके पास काल, महाकाल, नैसर्ण्य, पाण्डुक, पद्म, माणव, पिङ्गल, शंख, और सर्वरत्न नामक नौ निधियां हैं, जो उनकी आजीविका को निश्चिंत रखती हैं। काल निधि से शास्त्र और संगीत उत्पन्न होते हैं। महाकाल निधि से छह कर्मों के साधन, नैसर्ण्य से शय्या-आसन, पाण्डुक से धान्य और रस, पद्म से वस्त्र, पिङ्गल से आभूषण, माणव से नीति-शस्त्र, शंख से सुवर्ण, और सर्वरत्न से विविध रत्न उत्पन्न होते हैं।
श्लोक 82 से 92 चौदह रत्न और सुभद्रा का परिचय
भरत के पास जीव और अजीव भेद से चौदह रत्न हैं। चक्र, छत्र, दण्ड, असि, मणि, चर्म, और काकिणी अजीव रत्न हैं, जबकि सेनापति, गृहपति, हाथी, घोड़ा, स्त्री, सिलावट, और पुरोहित सजीव रत्न हैं। ये रत्न अयोध्या और विजयार्ध शैल पर उत्पन्न हुए। ये निधियां और रत्न भरत के हृदय को बलिष्ठ बनाते हैं। सुभद्रा नामक उनकी स्त्री-रत्न, विद्याधर वंश की, शिरीष-फूल-सी कोमल, चम्पा-कली-सी कान्तिमान, और कामोत्तेजक है।
श्लोक 93 से 101 सुभद्रा की शारीरिक शोभा
सुभद्रा के चरण नूपुरों की ध्वनि से कामदेव के नगाड़ों-से बजते हैं। उनकी जंघाएं और नितम्ब कामदेव की नसैनी और गृह-से हैं। रोमावली से कामदेव-रूपी सर्प उनकी नाभि से स्तनों तक पहुंचता है। वह हार और चोली से सर्पिणी-सी शोभती है। उसकी भुजाएं कल्पवृक्ष के अंकुर, करतल विजय-रेखाओं से युक्त, और मुख कामदेव की आयुधशाला-सा है।
श्लोक 102 से 111 सुभद्रा की रूप-महिमा
सुभद्रा का मुख चन्द्र-कान्ति को जीतता है, और कान सोने के पत्रों से देवांगनाओं को पराजित करते हैं। उसके कपोल कामदेव के दर्पण, नाक सुगन्ध-सूंघने वाली, और नेत्र परस्पर स्पर्धा करते हैं। ललाट नीलकमल-माला-सा और केश कामदेव का पाश-से शोभते हैं। उसका रूप तीनों लोकों को जीतता है। भरत उसके रूप, स्पर्श, और संगीतमय शब्दों से सन्तुष्ट होकर क्रीड़ा करते हैं।
श्लोक 112 से 121 सुभद्रा और कामदेव की रूपकात्मकता
कवि सुभद्रा के रूप, स्पर्श, सुगन्ध, रस, और शब्द को कामदेव के पांच बाण मानते हैं। उसका कोमल शरीर कामदेव का धनुष है। उसकी हंसी, चितवन, और कपट कामदेव के अंग हैं। सुभद्रा के स्तन हेमन्त में भरत के रोमांच को शान्त करते हैं। वसन्त में वह चम्पा-चोटी और मधु-लाल नेत्रों से शोभती है। कोयल और भृंगों की ध्वनि कामदेव के आक्रमण-सी लगती है।
श्लोक 122 से 131 ऋतुओं में सुभद्रा के साथ क्रीड़ा
वसन्त का चैत्र मास सुगन्ध से भरा है, और मलय-वायु कामदेव की घोषणा-सी करता है। ग्रीष्म में सुभद्रा जल-स्नान और चन्दन-लेप से भरत को शान्त करती है। मालती-मालाएं पहनकर वह रातें प्रेममयी बनाती है। वर्षा में वह मेघ-गर्जना से भयभीत होकर भरत से आलिंगन करती है। नदियों, मयूरों, और बक-फूलों की सुगन्ध कामी लोगों को सन्तुष्ट करती है।
श्लोक 132 से 141 वर्षा और शरद में सुभद्रा का सौन्दर्य
वर्षा में मेघमाला और जल-धाराएं पथिकों को बांधती हैं, और सुभद्रा सुगन्धित मुख से भरत के साथ रात्रि व्यतीत करती है। शरद में भरत सप्तच्छद वनों में सुभद्रा के साथ विहार करते हैं। चांदनी रातों में वे उसकी हार-युक्त स्तनों को प्रेम करते हैं। सुभद्रा की माला और कमल भरत के वक्ष पर लटकते हैं, जिन्हें वह प्रेम से सूंघती है, और दोनों मिलकर ऋतुओं का सुख भोगते हैं।
श्लोक 142 से 151 भरत के भोग और वैभव
चक्रवर्ती भरत सुभद्रा के साथ प्रेम और रति-सुख में लीन होकर दस भोग-साधनों—निधियां, रानियां, नगर, शय्या, आसन, सेना, नाट्यशाला, वर्तन, भोजन, और सवारी—का उपभोग करते हैं। वे इन साधनों से संतृप्त होकर एकछत्र पृथ्वी का पालन करते हैं। उनके 16,000 गणबद्ध देव निधियों, रत्नों, और उनकी रक्षा में तत्पर रहते हैं। क्षितिसार कोट, सर्वतोभद्र गोपुर, नन्द्यावर्त छावनी, वैजयन्त महल, और दिकस्वस्तिका सभाभूमि उनके वैभव को दर्शाते हैं।
श्लोक 152 से 161 भरत के महल और आयुध
भरत के पास सुविधि लकड़ी, गिरिकूटक राजमहल, वर्धमानक नृत्यशाला, धारागृह, गृहकूटक, पुष्करावर्त महल, और कुबेरकान्त भण्डारगृह हैं। वसुधारक कोठार और जीमूत स्नानगृह उनकी समृद्धि को बढ़ाते हैं। अवतंसिका रत्नमाला, देवरम्या चांदनी, सिंहवाहिनी शय्या, और अनुत्तर सिंहासन उनकी शोभा हैं। सूर्यप्रभ छत्र, विद्युत्प्रभ कुण्डल, विषमोचिका खड़ाऊं, अभेद्य कवच, और अजितंजय रथ उनके युद्ध-सामर्थ्य को दर्शाते हैं।
श्लोक 162 से 171 भरत के शस्त्र
भरत के पास वज्रकाण्ड धनुष, अमोघ बाण, वज्रतुण्डा शक्ति, सिंहाटक भाला, लोहवाहिनी छुरी, मनोवेग कणप, और सौनन्दक तलवार हैं, जो युद्ध में अजेय हैं। भूतमुख खेट और सुदर्शन चक्र शत्रुओं को परास्त करते हैं। चण्डवेग दण्ड और वज्र-चर्म उनकी सेना को जल-उपद्रव से बचाते हैं। ये शस्त्र उनकी विजयलक्ष्मी को सुदृढ़ करते हैं।
श्लोक 172 से 181 भरत के रत्न
भरत के चूड़ामणि चिन्तामणि और चिन्ताजननी काकिणी रत्न उनकी शोभा बढ़ाते हैं। अयोध्य सेनापति, बुद्धिसागर पुरोहित, कामवृष्टि गृहपति, और भद्रमुख शिलावट उनके सजीव रत्न हैं। विजयपर्वत हाथी, पवनंजय घोड़ा, और सुभद्रा स्त्री-रत्न उनके वैभव का हिस्सा हैं। ये दिव्य रत्न देवों द्वारा संरक्षित और शत्रुओं से अजेय हैं।
श्लोक 182 से 190 भरत की भोग-सामग्री
भरत की आनन्दिनी भेरियां और गम्भीरावर्त शंख 12 योजन तक बजते हैं। वीरांगद कड़े, 48 करोड़ पताकाएं, और महाकल्याण भोजन उनकी समृद्धि दर्शाते हैं। अमृतगर्भ मोदक, अमृतकल्प स्वाद्य, और अमृत पानक उनके भक्ष्य-पेय हैं। ये भोग-साधन उनके पुण्य के फल हैं, जो अद्वितीय और केवल उनके लिए हैं।
श्लोक 191 से 201 पुण्य की महिमा और भरत का वैभव
भरत की समृद्धि—रूप, शरीर, निधियां, रत्न, अन्तःपुर, और भोग—पुण्य के उदय से प्राप्त है। पुण्य बिना विजयलक्ष्मी, प्रताप, और कीर्ति असंभव है। पण्डितों को पुण्य-संचय का उपदेश दिया जाता है। भरत का समय भोगों में क्षण-भर-सा बीतता है। वे साम्राज्यलक्ष्मी का एकछत्र पालन करते हैं, बिना व्याकुल हुए।
श्लोक 202 से 205 भरत और वृषभदेव की महिमा
भरत ने छह खण्डों की पृथ्वी को भरतभूमि बनाया, शत्रुओं का नाश कर उसका पालन किया। उनकी लक्ष्मी निधियों और रत्नों से युक्त है। वे प्रथम चक्रवर्ती हैं। वृषभदेव, तीनों लोकों के गुरु, स्तुति और ध्यान के योग्य हैं, जो भव्यों को कल्याण देते हैं। वे संसार-भय से रक्षा करते हैं।
पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन
श्लोक 1 से 11 अरहंत भगवान की महिमा और भरत की दिग्विजय
अरहंत भगवान की वाणी अज्ञान के अंधकार को नष्ट करने वाली और सूर्य की किरणों की तरह देदीप्यमान है। भगवान वृषभदेव ने अपनी विद्या से संसार को मोह के विष से जागृत किया। गौतम स्वामी राजा श्रेणिक को द्विजों की उत्पत्ति की कथा सुनाते हैं। चक्रवर्ती भरत ने साठ हजार वर्षों में भारतवर्ष पर दिग्विजय प्राप्त की और लौटने पर उनके मन में संपत्ति का उपयोग दूसरों के उपकार के लिए करने का विचार आया। वे जिनेंद्रदेव का महामह यज्ञ करना चाहते थे, लेकिन निःस्पृह मुनि धन स्वीकार नहीं करते। अतः उन्होंने अणुव्रत धारण करने वाले, धीर, और गृहस्थों में श्रेष्ठ व्यक्तियों को सत्कार योग्य माना। भरत ने सत्कार योग्य व्यक्तियों की परीक्षा के लिए सभी राजाओं को आमंत्रित किया और अपने आंगन में हरे अंकुर, पुष्प, और फल रखवाए।
श्लोक 12 से 21 व्रतियों की परीक्षा और सत्कार
अव्रती लोग बिना सोच-विचार के आंगन में प्रवेश कर गए, जिन्हें भरत ने एक ओर हटा दिया। व्रतधारी, उच्च कुलों में जन्मे लोग हरे अंकुरों के कारण आंगन में प्रवेश नहीं करना चाहते थे, क्योंकि वे पाप और जीव हिंसा से डरते थे। भरत के आग्रह पर वे प्रासुक मार्ग से आए। उन्होंने बताया कि पर्व के दिन हरे अंकुर, पुष्प, और फलों में जीवों का विनाश नहीं करना चाहिए, क्योंकि सर्वज्ञ ने कहा है कि इनमें अनंत निगोदिया जीव रहते हैं। उनके वचनों से प्रभावित होकर भरत ने व्रतियों की प्रशंसा की और उन्हें दान, मान, और सत्कार से सम्मानित किया। पद्म निधि से प्राप्त ब्रह्मसूत्र से उनकी पहचान की।
श्लोक 22 से 31 व्रतियों का सम्मान और पूजा के प्रकार
भरत ने व्रतियों का सम्मान किया, जिससे वे अपने व्रतों में और दृढ़ हुए। उन्होंने उपासकाध्ययनांग से इज्या, वार्ता, दत्ति, स्वाध्याय, संयम, और तप का उपदेश दिया। अर्हंत भगवान की पूजा चार प्रकार की बताई गई: सदार्चन (नित्यमह), चतुर्मुख, कल्पद्रुम, और आष्टाह्निक। सदार्चन में प्रतिदिन जिनालय में पूजा, मंदिर निर्माण, और दान शामिल हैं। चतुर्मुख यज्ञ राजाओं द्वारा किया जाता है, और कल्पद्रुम यज्ञ में चक्रवर्ती सभी की इच्छाएं पूरी करते हैं।
श्लोक 32 से 41 पूजा और दत्ति के प्रकार
आष्टाह्निक यज्ञ सभी के लिए प्रसिद्ध है, और ऐन्द्रध्वज यज्ञ इंद्र द्वारा किया जाता है। पूजा में नैवेद्य, अभिषेक, और संध्या उपासना शामिल हैं। विशुद्ध आचरण से खेती करना वार्ता है, और दत्ति चार प्रकार की हैं: दयादत्ति (भय दूर करना), पात्रदत्ति (मुनियों को आहार देना), समदत्ति (समान गृहस्थ को दान), और सकलदत्ति (वंश की प्रतिष्ठा के लिए दान)। स्वाध्याय, तप, और संयम द्विजों की छह विशुद्ध वृत्तियां हैं।
श्लोक 42 से 51 द्विजों की परिभाषा और संस्कार
द्विज तप, शास्त्रज्ञान, और जन्म से होते हैं, लेकिन केवल जन्म से द्विज होना पर्याप्त नहीं। व्रत, तप, और शास्त्राभ्यास से ही द्विज का संस्कार पूर्ण होता है। आजीविका के भेद से चार जातियां हैं: ब्राह्मण (व्रत संस्कार), क्षत्रिय (शस्त्र धारण), वैश्य (न्यायपूर्वक धनार्जन), और शूद्र (नीच वृत्ति)। भरत ने सम्यग्दृष्टि पुरुषों के लिए तीन प्रकार की क्रियाएं बताईं: गर्भान्वय, दीक्षान्वय, और कर्त्रन्वय। ये क्रियाएं शुभ और उत्तम फल देने वाली हैं।
श्लोक 52 से 63 गर्भान्वय और दीक्षान्वय क्रियाएं
गर्भान्वय क्रियाएं तिरेपन हैं, जैसे आधान, प्रीति, आदि। दीक्षान्वय क्रियाएं अड़तालीस हैं, जो उपासकाध्ययनांग से प्राप्त ज्ञान पर आधारित हैं। इनमें आधान, विवाह, दीक्षा, और निर्वाण तक की क्रियाएं शामिल हैं। ये क्रियाएं गर्भ से निर्वाण तक के जीवन चक्र को दर्शाती हैं।
श्लोक 64 से 71 कर्त्रन्वय क्रियाएं और आधान
कर्त्रन्वय क्रियाएं सात हैं: सज्जाति, सद्गृहित्व, पारिव्राज्य, सुरेन्द्रता, साम्राज्य, परमार्हन्त्य, और परमनिर्वाण। ये अर्हंत के वचनों के आस्वादन से प्राप्त होती हैं। आधान क्रिया में गर्भाधान से पूर्व अर्हंत की पूजा और मंत्र द्वारा संस्कार किया जाता है, जिसमें जिन प्रतिमा के पास चक्र, छत्र, और अग्नि स्थापित की जाती हैं।
श्लोक 72 से 81 गर्भाधान और प्रीति-सुप्रीति क्रियाएं ( गर्भान्वय तिरेपन क्रियाएं 1 से 3)
अर्हंत भगवान, गणधरदेवों, और केवलियों के निर्वाण के समय प्रयुक्त तीन पवित्र अग्नियों को सिद्ध प्रतिमा की वेदी के समीप स्थापित करना चाहिए। गर्भाधान क्रिया में अर्हंत की पूजा के बाद शेष पवित्र द्रव्यों से मंत्रपूर्वक इन अग्नियों में आहुति देनी चाहिए, जिनके मंत्र सात प्रकार के हैं। श्रावकों को व्यामोह छोड़कर इन मंत्रों का उपयोग करना चाहिए। गर्भाधान के बाद संतान हेतु बिना विषयानुराग के समागम करना चाहिए। तीसरे माह में प्रीति क्रिया होती है, जिसमें मंत्रपूर्वक जिन पूजा, तोरण बंधन, और दो पूर्ण कलश स्थापित किए जाते हैं। गृहस्थ प्रतिदिन घंटा-नगाड़े बजवाएं। पांचवें माह में सुप्रीति क्रिया होती है, जिसमें अग्नि और देवता की साक्षी में समस्त विधियां की जाती हैं।
श्लोक 82 से 91 धृति, मोद, प्रियोद्भव, और नामकर्म क्रियाएं ( गर्भान्वय तिरेपन क्रियाएं 4 से 8)
सातवें माह में धृति क्रिया की जाती है, जिसमें गर्भवृद्धि के लिए उत्तम गृहस्थ पिछले विधियों के अनुसार कार्य करते हैं। नौवें माह में मोद क्रिया होती है, जिसमें गर्भिणी के शरीर पर मंत्रपूर्वक बीजाक्षर लिखे जाते हैं, मंगलमय आभूषण और रक्षासूत्र बांधे जाते हैं। प्रसूति के बाद प्रियोद्भव (जातकर्म) क्रिया होती है, जिसमें जिनेंद्र स्मरण के साथ विधियां की जाती हैं। जन्म के बारहवें दिन नामकर्म क्रिया में अर्हंत और ऋषियों की पूजा, द्विजों का सत्कार, और वंशवृद्धि के लिए शुभ नाम रखा जाता है। घटपत्र विधि से जिनेंद्र के 1008 नामों में से एक नाम चुना जाता है। इसके बाद बहिर्यान क्रिया में शुभ दिन तुरही आदि के साथ बालक को प्रसूतिगृह से बाहर लाया जाता है।
श्लोक 92 से 101 निषद्या, अन्नप्राशन, व्युष्टि, और केशवाप क्रियाएं ( गर्भान्वय तिरेपन क्रियाएं 9 से 12)
निषद्या क्रिया में बालक को मंगल द्रव्यों के साथ उत्तम आसन पर बैठाया जाता है और सिद्ध भगवान की पूजा की जाती है। सात-आठ माह बाद अन्नप्राशन क्रिया में अर्हंत पूजा के बाद बालक को अन्न खिलाया जाता है। एक वर्ष पूर्ण होने पर व्युष्टि (वर्षवर्धन) क्रिया में दान, जिन पूजा, और भोजन कराया जाता है। केशवाप (चौल) क्रिया में शुभ दिन देव-गुरु पूजा के साथ बालक का मुंडन किया जाता है। बालों को गंधोदक से गीला कर अक्षत रखे जाते हैं, स्नान करवाकर आभूषण पहनाए जाते हैं, और मुनियों को नमस्कार करवाया जाता है।
श्लोक 102 से 111 लिपिसंख्यान और उपनीति क्रियाएं ( गर्भान्वय तिरेपन क्रियाएं 13 से 14)
पांचवें वर्ष में लिपिसंख्यान क्रिया में बालक को अक्षरों का दर्शन कराया जाता है और व्रती गृहस्थ को अध्यापक नियुक्त किया जाता है। आठवें वर्ष में उपनीति (यज्ञोपवीत) क्रिया में केश मुंडन, व्रतबंधन, और मौंजीबंधन होता है। जिनालय में अर्हंत पूजा के बाद बालक को मूंज की रस्सी बांधी जाती है। सफेद धोती, दुपट्टा, और यज्ञोपवीत धारण करने वाला बालक ब्रह्मचारी कहलाता है। उसे भिक्षावृत्ति से निर्वाह करना चाहिए, और प्राप्त भिक्षा का अग्रभाग अर्हंत को समर्पित कर शेष भोजन करना चाहिए।
श्लोक 112 से 121 व्रतचर्या और व्रतावतरण क्रियाएं ( गर्भान्वय तिरेपन क्रियाएं 15 से 16)
व्रतचर्या क्रिया में ब्रह्मचारी बालक मूंज की रस्सी (कमर), सफेद धोती (जांघ), यज्ञोपवीत (वक्षःस्थल), और शुद्ध मुंडन (शिर) धारण करता है। ये चिह्न रत्नत्रय और अहिंसा आदि व्रतों की विशुद्धि के प्रतीक हैं। उसे दातौन, पान, अंजन, और हल्दी आदि से स्नान नहीं करना चाहिए, केवल जल से शुद्ध स्नान करना चाहिए। वह खाट पर नहीं सोता और अकेले पृथ्वी पर सोता है। विद्या पूर्ण होने तक यह व्रत धारण करता है, फिर श्रावकाचार और अध्यात्मशास्त्र पढ़ता है। व्याकरण, न्याय, ज्योतिष आदि का अध्ययन भी करता है। व्रतावतरण क्रिया में वह विशेष व्रत छोड़कर सामान्य व्रत पालता है।
श्लोक 122 से 131 व्रतावतरण और विवाह क्रियाएं ( गर्भान्वय तिरेपन क्रियाएं 16 से 17)
व्रतावतरण क्रिया 12-16 वर्ष बाद गुरु की साक्षी में जिन पूजा के साथ होती है। द्विजों का सत्कार कर वस्त्र, आभूषण ग्रहण किए जाते हैं। क्षत्रिय शस्त्र धारण कर सकता है। ब्रह्मव्रत का त्याग होता है, पर काम त्याग बना रहता है। विवाह क्रिया में उत्तम कुल की कन्या से गुरु की आज्ञा से विवाह होता है। सिद्ध भगवान और तीन अग्नियों की पूजा के बाद विवाहोत्सव होता है। वधू-वर अग्नि की प्रदक्षिणा देकर बैठते हैं और सात दिन तक ब्रह्मचर्य पालते हैं।
श्लोक 132 से 141 विवाह और वर्णलाभ क्रियाएं ( गर्भान्वय तिरेपन क्रियाएं 17 से 18)
विवाह के बाद वर-वधू तीर्थ विहार कर घर में प्रवेश करते हैं और ऋतुकाल में संतान हेतु काम-सेवन करते हैं। वर्णलाभ क्रिया में विवाहित पुरुष को स्वतंत्र आजीविका के लिए पिता धन-धान्य और मकान देता है। सिद्ध प्रतिमा पूजन और श्रावकों की साक्षी में पिता पुत्र को धर्म और यश अर्जन की प्रेरणा देता है। पुत्र गृहस्थधर्म का पालन करता है।
श्लोक 142 से 151 कुलचर्या, गृहीशिता, और प्रशान्ति-गृहत्याग क्रियाएं ( गर्भान्वय तिरेपन क्रियाएं 19 से 21)
कुलचर्या क्रिया में गृहस्थ निर्दोष आजीविका और देवपूजा आदि छह कार्य करता है, जो उसका कुलधर्म है। गृहीशिता क्रिया में वह धर्म में दृढ़ होकर गृहस्थों का स्वामी बनता है। शुभ वृत्ति, शास्त्रज्ञान, और चारित्र से वह उन्नत होता है और वर्णोत्तम, महीदेव आदि नामों से सम्मानित होता है। प्रशान्ति क्रिया में वह पुत्र को गृहस्थी का भार सौंपकर विषयासक्ति त्यागता है, स्वाध्याय और उपवास करता है। गृहत्याग क्रिया में वह सिद्ध भगवान की पूजा कर, इष्टजनों की साक्षी में पुत्र को सब कुछ सौंपकर गृहत्याग करता है।
श्लोक 152 से 161 गृहत्याग और दीक्षाद्य-जिनरूपता क्रिया
गृहत्याग क्रिया में गृहस्थ ज्येष्ठ पुत्र को बुलाकर उसे कुलधर्म पालन का उपदेश देता है। वह धन के तीन भाग करता है: एक धर्मकार्य, एक घर खर्च, और एक भाई-बहनों में बांटने के लिए। पुत्र को शास्त्र, सदाचार, और पूजा के माध्यम से कुलधर्म निभाने का निर्देश देता है। इसके बाद वह निराकुल होकर दीक्षा के लिए घर छोड़ता है। दीक्षाद्य क्रिया में सम्यग्दृष्टि गृहस्थ एक वस्त्र धारण कर दीक्षा की तैयारी करता है। जिनरूपता क्रिया में वह परिग्रह त्यागकर दिगंबर रूप धारण करता है, जो धीर-वीर पुरुषों के लिए उपयुक्त है। यह क्रिया अहिंसा और संयम की ओर ले जाती है।
श्लोक 162 से 171 मौनाध्ययनवृत्तत्व और तीर्थकृद्भावना क्रिया
मौनाध्ययनवृत्तत्व क्रिया में दीक्षा के बाद साधु मौन धारण कर शास्त्रों का गहन अध्ययन करता है। विनययुक्त और शुद्ध मन-वचन-काय वाला साधु गुरु के मार्गदर्शन में शास्त्र पढ़ता है, जो इस लोक में योग्यता और परलोक में प्रसन्नता देता है। तीर्थकृद्भावना क्रिया में साधु तीर्थंकरों के गुणों का चिंतन करता है और उनके तीर्थ की रक्षा व प्रचार करता है। सोलह भावनाएं, जैसे सम्यग्दर्शन की विशुद्धि, इस क्रिया के लक्षण हैं। यह क्रिया उसे आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाती है।
श्लोक 172 से 181 गुरुस्थानाभ्युपगम और गणोपग्रहण क्रिया
गुरुस्थानाभ्युपगम क्रिया में साधु, जिसने समस्त विद्याएं सीख ली हैं और अंतःकरण को वश किया है, गुरु की अनुमति से उनका स्थान ग्रहण करता है। वह विनयवान और धर्मात्मा होकर शिष्यों को धर्मोपदेश देता है। गणोपग्रहण क्रिया में आचार्य मुनि, आर्यिका, श्रावक-श्राविकाओं का गण बनाकर उनका पोषण करता है। वह शास्त्र अध्ययन की इच्छा वालों को दीक्षा देता है, सदाचारियों को प्रेरित करता है, और दुराचारियों को दूर रखता है। यह क्रिया संघ की रक्षा और धर्म प्रचार पर केंद्रित है।
श्लोक 182 से 191 स्वगुरुस्थानसंक्रान्ति और निःसंगत्वात्मभावना-योगनिर्वाणसंप्राप्ति क्रिया
स्वगुरुस्थानसंक्रान्ति क्रिया में आचार्य योग्य शिष्य को अपना स्थान सौंपता है। शिष्य गुरु के आचरणों का पालन कर संघ का पोषण करता है। निःसंगत्वात्मभावना क्रिया में साधु अकेले विहार करता है, परिग्रह से मुक्त होकर आत्मा की शुद्धि पर ध्यान देता है। योगनिर्वाणसंप्राप्ति क्रिया में वह सल्लेखना धारण करता है, राग-द्वेष त्यागकर शरीर को कृश करता है, और मोक्ष के लिए भावना करता है। वह एकत्व और अन्यत्व भावनाओं का चिंतन कर कल्याण की प्राप्ति हेतु प्रयास करता है।
श्लोक 192 से 201 योगनिर्वाण साधन और इन्द्रोपपाद-इन्द्राभिषेक-विधिदान-सुखोदय क्रिया
योगनिर्वाण साधन क्रिया में साधु समाधि द्वारा मन, वचन, काय को स्थिर कर पंचपरमेष्ठियों के चरणों में चित्त लगाता है। यह क्रिया उसे निर्वाण की ओर ले जाती है। इन्द्रोपपाद क्रिया में पुण्य के बल से साधु इंद्र के रूप में जन्म लेता है। इन्द्राभिषेक क्रिया में देवता उसका अभिषेक करते हैं, और वह देदीप्यमान मुकुट व आभूषणों से सुशोभित होकर जयजयकार प्राप्त करता है। विधिदान क्रिया में वह देवों को उनके पदों पर नियुक्त करता है, और सुखोदय क्रिया में वह स्वर्ग के सुखों का अनुभव करता है।
श्लोक 202 से 211 इन्द्रत्याग क्रिया
इन्द्रत्याग क्रिया में इंद्र, आयु समाप्ति के निकट स्वर्ग के भोगों का त्याग करता है। वह देवों को उपदेश देता है कि उसने उन्हें पिता, पुत्र, मित्र, और सेवक के रूप में पाला और सम्मानित किया। अब वह स्वर्ग का साम्राज्य छोड़कर अगले इंद्र के लिए सौंपता है। वह उदासीनता के साथ धीर-वीर बुद्धि से यह त्याग करता है, जिससे वह दुखी नहीं होता। यह क्रिया स्वर्ग के ऐश्वर्य को बिना कष्ट छोड़ने की महिमा दर्शाती है।
श्लोक 212 से 223 इन्द्रावतार और हिरण्योत्कृष्टजन्मता क्रिया
इन्द्रावतार क्रिया में इंद्र अर्हंत पूजन कर मनुष्य जन्म लेने की इच्छा करता है ताकि शीघ्र मोक्ष प्राप्त कर सके। शुभ स्वप्नों के माध्यम से वह स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतार लेता है। हिरण्योत्कृष्टजन्मता क्रिया में वह महादेवी के गर्भ में रत्नमय गर्भागार में जन्म लेता है। कुबेर द्वारा रत्नवर्षा, मंद वायु, दुंदुभि वाज, और कल्पवृक्ष की मालाओं के साथ श्री, बुद्धि, धृति आदि देवियां उसकी सेवा करती हैं। वह पवित्र राजमंदिर में हिरण्यगर्भ भगवान के रूप में जन्म लेता है, जो पुण्य का निवास है।
श्लोक 224 से 231 हिरण्योत्कृष्ट जन्मता और मन्दराभिषेक-गुरुपूजन-यौवराज्य क्रिया
हिरण्योत्कृष्ट जन्मता क्रिया में भगवान गर्भ में रहते हुए तीन ज्ञान धारण करते हैं और सुवर्ण वर्षा से जन्म की उत्कृष्टता प्रकट करते हैं। उनकी माता विश्वेश्वरी, महादेवी आदि नामों से जानी जाती है, और श्री, बुद्धि, धृति आदि छह देवियां उनकी सेवा करती हैं। मन्दराभिषेक क्रिया में जन्म के बाद इंद्र मेरु पर्वत पर क्षीरसागर के जल से भगवान का अभिषेक करते हैं। गुरुपूजन क्रिया में भगवान बिना शिष्य भाव के गुरु बनते हैं, और इंद्र उनकी पूजा करते हैं। यौवराज्य क्रिया में कुमारकाल में भगवान को युवराज पद प्राप्त होता है, और उनका राज्यपट्ट बंधन व अभिषेक होता है।
श्लोक 232 से 240 स्वराज्य, चक्रलाभ, और दिग्विजय क्रिया
स्वराज्य क्रिया में भगवान सम्राट बनते हैं और समुद्र पर्यंत पृथ्वी का शासन करते हैं। चक्रलाभ क्रिया में उन्हें निधियां और चक्ररत्न प्राप्त होता है, और प्रजा उनका अभिषेक सहित पूजन करती है। दिग्विजय क्रिया में भगवान चक्ररत्न को आगे रखकर समस्त पृथ्वी को जीतते हैं। यह क्रिया दिशाओं को जीतने के उनके प्रयास को दर्शाती है।
श्लोक 241 से 251 चक्राभिषेक क्रिया
चक्राभिषेक क्रिया में दिग्विजय के बाद भगवान अपने वैभवशाली राजभवन में प्रवेश करते हैं। आनंदमंडप में विराजमान होकर वे चमरों से सुशोभित सुमेरु पर्वत जैसे प्रतीत होते हैं। निधियों और रत्नों की पूजा कर वे किमिच्छक दान देते हैं और राजाओं का सम्मान करते हैं। चार मुख्य राजा उनके मस्तक पर मुकुट रखते हैं। भगवान रत्नों, कुंडलों, हार, यज्ञोपवीत, और करधनी से सुशोभित होकर लक्ष्मी के पुंज जैसे दिखते हैं। अन्य राजा उनकी स्तुति करते हैं, और नगरवासी उनके चरणों का अभिषेक कर चरणोदक धारण करते हैं।
श्लोक 252 से 261 साम्राज्य क्रिया
साम्राज्य क्रिया में भगवान प्रातःकाल राजसिंहासन पर विराजमान होते हैं, चमर ढुलाए जाते हैं, और वे धृति, शांति आदि गुणों से युक्त होकर प्रजा का उपकार करते हैं। वे राजाओं को न्यायपूर्वक प्रजा पालन, दुष्टों का निग्रह, और शिष्टों के संरक्षण की शिक्षा देते हैं। दिव्य अस्त्रों की आराधना से युद्ध में विजय प्राप्त होती है। यह धर्मविजयी राजा यश, वैभव, और परलोक में स्वर्ग प्राप्त करता है। इस क्रिया से वह दोनों लोकों में समृद्धि पाता है।
श्लोक 262 से 271 निष्क्रान्ति क्रिया
निष्क्रान्ति क्रिया में भगवान भेदविज्ञान प्राप्त कर दीक्षा के लिए उद्यत होते हैं। लौकांतिक देव उन्हें प्रबोधित करते हैं। वे पुत्र को राज्य सौंपकर प्रजा पालन की शिक्षा देते हैं कि न्याय ही धन है, और प्रजा कामधेनु के समान मनोरथ पूर्ण करती है। राजा को धन संग्रह, वृद्धि, रक्षा, और दान करना चाहिए। बुद्धि की रक्षा, कुलमर्यादा का पालन, और आत्मरक्षा अनिवार्य है।
श्लोक 272 से 281 निष्क्रान्ति क्रिया (जारी)
निष्क्रान्ति क्रिया में भगवान पुत्र को बुद्धि, कुलमर्यादा, और आत्मरक्षा की शिक्षा देते हैं। राजा को पक्षपातरहित होकर प्रजा को समान दृष्टि से देखना चाहिए। क्रूरता, कठोर वचन, और दंड की कठिनता से बचना चाहिए। काम, क्रोध आदि छह शत्रुओं को जीतकर राजा दोनों लोकों में समृद्धि पाता है। यह क्षात्रधर्म यश, धर्म, और विजय देता है।
श्लोक 282 से 293 निष्क्रान्ति क्रिया (पूर्ण)
भगवान पुत्र को क्षात्रधर्म की शिक्षा देकर दीक्षा के लिए प्रस्थान करते हैं। महादान देकर साम्राज्य छोड़कर वे वन की ओर जाते हैं। राजा और देव उन्हें पालकी पर ले जाते हैं, जो सूर्य के विमान जैसी है। आकाश मार्ग में सुर-असुर, सेना, और निधि-रत्न उनके पीछे चलते हैं। देवों के तुरही-नृत्य और किन्नरी गीतों के बीच भगवान पवित्र आश्रम में शिलातल पर दीक्षा लेते हैं। इंद्र उनकी पूजा करते हैं।
श्लोक 294 से 303 योगसंमह और आर्हन्त्य क्रिया
योगसंमह क्रिया में भगवान बाह्य-अभ्यंतर परिग्रह त्यागकर जिनकल्प तप धारण करते हैं। क्षपक श्रेणी पर चढ़कर शुक्लध्यान से घातिया कर्म जलाते हैं, और केवलज्ञान की ज्योति प्रकट होती है। यह क्रिया ज्ञान-ध्यान के संयोग से तेज उत्पन्न करती है। आर्हन्त्य क्रिया में इंद्र उनकी पूजा करते हैं, और आठ प्रातिहार्य, बारह सभाएं, स्तूप आदि अद्भुत विभूतियां प्रकट होती हैं।
श्लोक 304 से 313 विहार, योगत्याग, और अग्रनिवृति क्रिया ( तिरेपन क्रियाएं 51 से 53)
विहार क्रिया में भगवान धर्मचक्र के साथ तीर्थ विहार करते हैं। योगत्याग क्रिया में विहार समाप्त कर वे समवसरण विघटित करते हैं और योगनिरोध करते हैं। केबलि-समुद्घात इस क्रिया में शामिल है। अग्रनिवृति क्रिया में समस्त योगों का निरोध कर भगवान अघातिया कर्म नष्ट करते हैं और मोक्षस्थान पर पहुंचते हैं। ये तिरेपन क्रियाएं भव्य पुरुषों को पालनी चाहिए। भरत महाराज ने द्विजों को इन गर्भान्वय और दीक्षान्वय क्रियाओं में स्थापित किया। इनका पालन करने वाला भव्य पुरुष मोक्ष प्राप्त करता है।
पर्व 39 – दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन
श्लोक 1 से 11 दीक्षान्वय क्रियाओं का प्रारंभ
महाराज भरत द्विजों को मोक्ष प्रदान करने वाली 43 दीक्षान्वय क्रियाओं का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि व्रतों का धारण करना दीक्षा है, जो महाव्रत (सूक्ष्म-स्थूल हिंसा आदि पापों का पूर्ण त्याग) और अणुव्रत (स्थूल हिंसा आदि का त्याग) के रूप में दो प्रकार के होते हैं। दीक्षा वह प्रवृत्ति है, जब सन्मुख पुरुष व्रत ग्रहण करता है। पहली क्रिया ‘अवतार’ है, जिसमें मिथ्यात्व से दूषित भव्य पुरुष योग्य मुनि या गृहस्थाचार्य से समीचीन धर्म का उपदेश मांगता है, क्योंकि अन्य मत और वेदों के वाक्य उसे दोषपूर्ण प्रतीत होते हैं।
श्लोक 12 से 21 आप्त और समीचीन धर्म का वर्णन
मुनि या आचार्य भव्य को आप्त के सत्य वचनों को ग्रहण करने का उपदेश देते हैं। आप्त वह है, जो वीतराग, सर्वज्ञ, कल्याणकारी, और मोक्षमार्ग का उपदेशक है। आप्त के गुणों में रूप, तेज, ज्ञान, और सुखामृत आदि शामिल हैं। जैन मत आप्त का कथन है, जो युक्ति, आगम, और गंभीर शासन से युक्त है। इसमें शास्त्र, मंत्र, और क्रिया का यथार्थ निरूपण है। अन्य मतों के वचन दुष्ट हैं, जबकि जैन धर्म ही समीचीन मार्ग है।
श्लोक 22 से 31 धर्म और शुद्धि के लक्षण
वेद, पुराण, और धर्मशास्त्र वही हैं, जो हिंसा का निषेध करते हैं। हिंसा का उपदेश देने वाले ग्रंथ धूर्तों के रचित हैं। चारित्र पापकर्मों से विरक्ति है, जो देवपूजा आदि छह कर्मों में प्रकट होता है। गर्भाधान से निर्वाण तक की क्रियाएं ही शुद्ध हैं। मंत्र, देवता, लिंग, और आहार की शुद्धि अहिंसा और दया पर आधारित है। हिंसा करने वाले मंत्र, देवता, और मांसाहारी आहार दुष्ट हैं। कामशुद्धि जितेंद्रिय मुनियों या संतोषी गृहस्थों में होती है।
श्लोक 32 से 41 अवतार और स्थानलाभ क्रिया
आप्त के उपदेश से भव्य मिथ्यामार्ग त्यागकर समीचीन मार्ग अपनाता है। यह ‘गर्भाधान’ के समान अवतार क्रिया है। इसके बाद ‘वृत्तलाभ’ क्रिया में भव्य गुरु को नमस्कार कर व्रत ग्रहण करता है। तीसरी ‘स्थानलाभ’ क्रिया में वह उपवास के बाद जिनालय में अष्टदल कमल या समवसरण मंडल की रचना करता है। आचार्य उसे जिनप्रतिमा के समक्ष बैठाकर पंचमुष्टि से मस्तक स्पर्श कर श्रावक दीक्षा देते हैं और पंच नमस्कार मंत्र का उपदेश करते हैं।
श्लोक 42 से 51 गणग्रह और पूजाराध्य क्रिया
चौथी ‘गणग्रह’ क्रिया में भव्य मिथ्यादेवताओं का विसर्जन कर अपने मत के शांत देवताओं की पूजा करता है। पांचवीं ‘पूजाराध्य’ क्रिया में वह जिनपूजन, उपवास, और द्वादशांग के अर्थ सुनता है। छठी ‘पुण्ययज्ञा’ क्रिया में वह साधर्मी पुरुषों के साथ चौदह पूर्वविद्याओं के अर्थ सुनता है। सातवीं ‘दृढ़चर्या’ क्रिया में वह अपने मत के शास्त्रों को समझकर अन्य मतों के ग्रंथों का अध्ययन करता है।
श्लोक 52 से 61 उपयोगिता और उपनीति क्रिया
आठवीं ‘उपयोगिता’ क्रिया में दृढ़व्रती भव्य पर्व के दिन रात्रि में प्रतिमायोग धारण करता है। नौवीं ‘उपनीति’ क्रिया में वह शुद्धि और उत्कृष्ट चिह्न (सफेद वस्त्र, यज्ञोपवीत, देवपूजा आदि) धारण करता है। दसवीं ‘व्रतचर्या’ क्रिया में वह यज्ञोपवीत धारण कर उपासकाध्ययन का अभ्यास करता है। ग्यारहवीं ‘व्रतावतरण’ क्रिया में वह गुरु के समक्ष आभूषण ग्रहण करता है। बारहवीं ‘विवाह’ क्रिया में वह अपनी पत्नी को श्रावक दीक्षा देकर पुनर्विवाह संस्कार करता है।
श्लोक 62 से 71 वर्णलाभ क्रिया
तेरहवीं ‘वर्णलाभ’ क्रिया में भव्य अन्य साधर्मी श्रावकों से संबंध स्थापित करता है। वह चार श्रावकों को बुलाकर कहता है कि उसने समस्त गृहस्थ धर्म का पालन किया, दान दिए, गुरुपूजन किया, और मिथ्याधर्म त्यागकर सम्यक् चारित्र अपनाया। वह यज्ञोपवीत, श्रावकाचार, और पत्नी के संस्कार पूर्ण कर चुका है। श्रावक उसे प्रशंसा कर वर्णलाभ प्रदान करते हैं, जिससे वह उनके समान हो जाता है।
श्लोक 72 से 81 कुलचर्या से कर्त्रन्वय क्रियाओं का प्रारंभ
चौदहवीं ‘कुलचर्या’ क्रिया में भव्य पुरुष आर्योचित छह कर्मों (देवपूजा आदि) में पूर्ण प्रवृत्ति रखता है। पंद्रहवीं ‘गृहीशिता’ क्रिया में सम्यक् चारित्र और अध्ययन से युक्त श्रावक, प्रायश्चित्त, श्रुति, स्मृति, और पुराण जानकर गृहस्थाचार्य पद प्राप्त करता है। सोलहवीं ‘प्रशान्तता’ क्रिया में वह उपवास आदि भावनाओं से शांति प्राप्त करता है। सत्रहवीं ‘गृहत्याग’ क्रिया में वह पुत्र को शिक्षा देकर घर छोड़ता है। अठारहवीं ‘दीक्षाद्य’ क्रिया में वह तपोवन में एक वस्त्र धारण करता है। उन्नीसवीं ‘जिनरूपता’ क्रिया में वह मुनि से दिगंबर रूप ग्रहण करता है। शेष क्रियाएं गर्भान्वय जैसी हैं। इनका पालन करने वाला भव्य शीघ्र निर्वाण प्राप्त करता है। इसके बाद कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन शुरू होता है।
श्लोक 82 से 91 सज्जाति क्रिया
कर्त्रन्वय की पहली ‘सज्जाति’ क्रिया में भव्य को मनुष्य जन्म और विशुद्ध कुल-जाति में जन्म मिलता है। विशुद्ध कुल (पिता का वंश) और जाति (माता का वंश) सज्जाति कहलाती है, जो रत्नत्रय की प्राप्ति को सुलभ करती है। आर्यखंड में योग्य शरीर और सामग्री से सज्जाति अनेक कल्याण देती है। संस्काररूपी जन्म से भव्य द्विजन्म प्राप्त करता है, जैसे रत्न या सुवर्ण संस्कार से शुद्ध होकर उत्कर्ष पाता है।
श्लोक 92 से 101 सज्जाति और सद्गृहित्व क्रिया
सज्जाति में भव्य सर्वज्ञ के मुख से सम्यग्ज्ञान प्राप्त कर व्रत-शील से द्विज कहलाता है। वह यज्ञोपवीत (द्रव्यसूत्र) और सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र (भावसूत्र) धारण करता है। आचार्य उसे पुष्प-अक्षतों से जिनपूजा के आशीर्वाद देते हैं, जो धर्म में उत्साह बढ़ाता है। दूसरी ‘सद्गृहित्व’ क्रिया में वह गृहस्थ अवस्था में अरहंत के उपदेशानुसार छह कर्मों का आलस्यरहित पालन करता है। जिनेंद्र और गणधरों की शिक्षा से वह ब्रह्मतेज धारण करता है।
श्लोक 102 से 111 सद्गृहित्व और देवब्राह्मण की महिमा
सद्गृहित्व में भव्य की प्रशंसा धर्मस्वरूप और ब्रह्मतेज युक्त के रूप में होती है। वह पूजा करता, करवाता, और वेद-वेदांग पढ़ता-पढ़ाता है। उसके गुणों में अणिमा-महिमा आदि देवगुण हैं, जिससे वह पृथ्वी पर पूजित होता है। यदि कोई उसकी जाति या कुल पर प्रश्न उठाए, तो वह कहता है कि वह जिनेंद्र के उपदेश से उत्पन्न हुआ है, न कि सांसारिक कुल-जाति से।
श्लोक 112 से 121 देवब्राह्मण की शुद्धता
कोई मिथ्यादृष्टि यदि भव्य को उलाहना दे कि वह मनुष्य ही है, तो वह उत्तर देता है कि जिनेंद्र उसका पिता और ज्ञान उसका गर्भ है। सम्यग्दर्शन, ज्ञान, और चारित्र उसकी शक्तियां हैं। वह बिना योनि के उत्पन्न होकर देवब्राह्मण है। उसका यज्ञोपवीत और व्रत शास्त्रोक्त चिह्न हैं। मिथ्यादृष्टि केवल मलिन सूत्र धारण करते हैं। जीव का जन्म और मरण दो प्रकार का होता है: शरीरजन्म-मरण और संस्कारजन्म-मरण। भव्य को संस्कारजन्म से द्विजपना प्राप्त होता है।
श्लोक 122 से 131 संस्कारजन्म और ब्राह्मण की परिभाषा
संस्कारमरण से भव्य मिथ्यादर्शन छोड़ता है और संस्कारजन्म से देवद्विज कहलाता है। वह युक्तिपूर्ण वचनों से अपने गुणों का उत्कर्ष प्रकट करता है। जिनेंद्र ही आदि ब्रह्मा हैं, जिनके उपदेश से शिष्य ब्राह्मण कहलाते हैं। मृगचर्म, जटा, या कामवश भ्रष्ट व्यक्ति ब्रह्मा नहीं हो सकता। जिनेंद्र के ज्ञान से उत्पन्न द्विज वर्णातीत और उत्कृष्ट हैं।
श्लोक 132 से 141 द्विज की शुद्धि और अशुद्धि
क्षमा, शौच, संतोष, और निर्दोष आचरण से युक्त द्विज सर्वोत्तम हैं। मलिन आचार, हिंसा, और पापकर्म करने वाले ब्राह्मण नहीं, बल्कि कर्मचांडाल हैं। हिंसक धर्म को मानने वाले निर्दय, लुटेरे, और दंडनीय हैं। जैन लोग निर्मल आचार से शुक्लवर्ग में, जबकि मिथ्यादृष्टि पापियों के कृष्णवर्ग में गिने जाते हैं। द्विज की शुद्धि श्रुति, स्मृति, पुराण, सदाचार, मंत्र, और कामनाश से होती है। दया न्याय और हिंसा अन्याय है, जिससे शुद्धि-अशुद्धि का निर्णय होता है।
श्लोक 142 से 151 जैन द्विजों की शुद्धता और हिंसा का निराकरण
जैन लोग विशुद्ध वृत्ति के कारण वर्णोत्तम और जगत्पूज्य द्विज हैं। जैन गृहस्थों की आजीविका के लिए छह कर्मों (असि, मषि आदि) में थोड़ी हिंसा हो सकती है, पर शास्त्रों में इसके शुद्धिकरण का उपाय है। शुद्धि के तीन अंग हैं: पक्ष (मैत्री, प्रमोद, कारुण्य, माध्यस्थ्य भाव से हिंसा त्याग), चर्या (देवता, मंत्र, औषधि, या भोजन के लिए हिंसा न करने की प्रतिज्ञा), और साधन (आयु के अंत में शरीर, आहार, और चेष्टाओं का त्याग कर ध्यान से आत्मशुद्धि)। इनसे हिंसा का दोष नहीं लगता। जैन मत में चार आश्रम (ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, भिक्षुक) ही विशुद्ध हैं, अन्य मतों के आश्रम विचार में दोषपूर्ण हैं।
श्लोक 152 से 161 सद्गृहित्व और पारिव्रज्य क्रिया
चार आश्रमों के भेदों से अनेक प्रकार की शुद्धि प्राप्त होती है, जिनका विस्तार ग्रंथ वृद्धि के भय से नहीं किया गया। दूसरी ‘सद्गृहित्व’ क्रिया में गृहस्थ धर्म का पालन कर भव्य दीक्षा ग्रहण करता है, जिसे ‘पारिव्रज्य’ कहते हैं। यह तीसरी क्रिया है, जिसमें ममत्व त्यागकर दिगंबर रूप धारण किया जाता है। मोक्ष की इच्छा वाला भव्य शुभ तिथि, नक्षत्र, और योग में विशुद्ध कुल-चरित्र वाले आचार्य से दीक्षा लेता है। अशुभ समय (ग्रहण, मेघ, नष्ट मास आदि) में दीक्षा नहीं दी जाती। असमय दीक्षा देने वाला आचार्य संघ से बहिष्कृत होता है।
श्लोक 162 से 171 पारिव्रज्य के सूत्रपद और गुण
पारिव्रज्य में 27 सूत्रपद (जाति, मूर्ति, लक्षण, सौंदर्य, प्रभा, मंडल, चक्र, अभिषेक आदि) परमेष्ठियों के गुण हैं। दीक्षा लेने वाला भव्य अपने गुणों का आदर न कर अरहंत के गुणों का सम्मान करता है, जिससे अहंकार से बचकर उत्थान होता है। वह उत्तम जाति का होते हुए भी अरहंत की सेवा करता है, जिससे अगले जन्म में दिव्या, विजयाश्रिता, परमा, या स्वा जाति प्राप्त होती है। मुनि शरीर को कृश कर, अन्य जीवों की रक्षा करते हुए, और अरहंत के लक्षणों का चिंतन कर तप करता है।
श्लोक 172 से 181 तप से प्राप्तियां
मुनि अपने सौंदर्य, प्रभा, तेज, और परिग्रह (अस्त्र, वस्त्र, आसन, छत्र आदि) का त्याग कर अरहंत की आराधना करता है, जिससे वह देदीप्यमान प्रभा, धर्मचक्र, अभिषेक, और सिंहासन प्राप्त करता है। तकिया, छत्र, और चामर का त्याग करने से वह स्वर्गीय विभूतियां, तीन छत्र, और चौंसठ चामर प्राप्त करता है। तप से वह परम स्वामी और तीर्थकर बनता है।
श्लोक 182 से 191 तप की महिमा
मुनि नगाड़े, उद्यान, धन, घर, और क्षेत्र का त्याग कर तप करता है, जिससे स्वर्गीय दुंदुभि, अशोक वृक्ष, निधियां, मंडप शोभा, और अवगाहन शक्ति प्राप्त होती है। वह आज्ञा, सभा, और इच्छाओं का त्याग कर मौन धारण करता है, जिससे उसकी आज्ञा सुर-असुर मानते हैं और वह समवसरण में विराजमान होता है। तप से वह प्रशंसनीय और वंदनीय बनता है।
श्लोक 192 से 201 पारिव्रज्य की पूर्णता
मुनि सवारी, भाषा, और आहार का नियमन कर तप करता है, जिससे कमल पर चरण, दिव्य ध्वनि, और चार तृप्तियां (दिव्य, विजय, परम, अमृत) प्राप्त होती हैं। काम-सुख त्यागकर वह परमानंद पाता है। तप से त्यागी वस्तु ही उसे प्राप्त होती है। पारिव्रज्य में जिनेंद्र की आज्ञा मानकर तप करने से ही सच्ची दीक्षा होती है। अन्य मतों की पारिव्रज्य युक्तिहीन है। चौथी ‘सुरेन्द्रता’ क्रिया में सुरेंद्र पद प्राप्त होता है।
श्लोक 202 से 211 साम्राज्य, आर्हन्त्य, और परिनिर्वृति
पांचवीं ‘साम्राज्य’ क्रिया में चक्रवर्ती को चक्ररत्न, निधियां, और भोग प्राप्त होते हैं। छठवीं ‘आर्हन्त्य’ क्रिया में अरहंत को स्वर्गावतार और पंचकल्याण की प्राप्ति होती है, जो तीनों लोकों में क्षोभ उत्पन्न करती है। सातवीं ‘परिनिर्वृति’ क्रिया में कर्ममल नष्ट होकर सिद्धि प्राप्त होती है, जो आत्मतत्त्व की शुद्धि है। ये सात कर्त्रन्वय क्रियाएं मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करती हैं। भव्य इनका पालन कर संसार के बंधनों को तोड़ता है, सज्जाति, सद्गृहित्व, पारिव्रज्य, सुरेंद्रता, चक्रवर्ती, अरहंत, और अंत में निर्वाण प्राप्त करता है।
पर्व 40 – द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन
श्लोक 1 से 11 मंत्रकल्प और पूजा विधि
इस खंड में मंत्रों के उद्धार और पूजा विधि का वर्णन है। मुनियों की कार्य सिद्धि मंत्रों पर निर्भर होती है। आधानादि क्रियाओं में तीन छत्र, तीन चक्र, और तीन अग्नियों की स्थापना करनी चाहिए। वेदी के मध्य में जिनेंद्रदेव की प्रतिमा स्थापित कर उनकी पूजा मंत्रकल्प कहलाती है। भूमि शुद्धि के लिए ‘नीरजसे नमः’ मंत्र का उच्चारण करना चाहिए, जो विशुद्धि प्रदान करता है। इसके बाद डाभ का आसन ग्रहण कर ‘दर्पमथनाय नमः’ मंत्र से विघ्न शांति, और गंध, पुष्प, अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य अर्पण के लिए विशिष्ट मंत्रों (‘शीलगन्धाय नमः’, ‘विमलाय नमः’, ‘अक्षताय नमः’, ‘श्रुतधूपाय नमः’, ‘ज्ञानोद्योताय नमः’, ‘परमसिद्धाय नमः’) का प्रयोग करना चाहिए। अंत में, पीठिका मंत्र जैसे ‘सत्यजाताय नमः’ और ‘अर्हज्जाताय नमः’ पढ़े जाते हैं।
श्लोक 12 से 23 पीठिका मंत्रों का विस्तार
इस खंड में पीठिका मंत्रों का क्रमिक वर्णन है। ‘परमजाताय नमः’, ‘अनुपमजाताय नमः’, ‘स्वप्रधानाय नमः’, ‘अचलाय नमः’ आदि मंत्रों का उच्चारण किया जाता है, जो जिनेंद्रदेव के गुणों (अनंत ज्ञान, दर्शन, वीर्य, सुख) और उनकी निर्मलता, अक्षयता, अजर-अमरता को दर्शाते हैं। ‘परमकाष्ठयोगरूपाय नमः’, ‘लोकाग्रवासिने नमो नमः’, और ‘परमसिद्धेभ्यो नमो नमः’ जैसे मंत्र सिद्धों की स्तुति करते हैं। अंत में, सम्यग्दृष्टि, आसन्नभव्य, निर्वाणपूजार्ह की सम्बोधन में दो-दो बार उच्चारण कर ‘अग्नीन्द्र स्वाहा’ मंत्र पढ़ा जाता है।
श्लोक 24 से 31 काम्य मंत्र और जाति मंत्र
यह खंड काम्य मंत्रों और जाति मंत्रों पर केंद्रित है। ‘सेवाफलं षट्परमस्थानं भवतु’ आदि मंत्रों से छह परम स्थानों की प्राप्ति, अपमृत्यु नाश, और समाधिमरण की कामना की जाती है। जाति मंत्रों में ‘सत्यजन्मनः शरणं प्रपद्यामि’, ‘अर्हज्जन्मनः शरणं प्रपद्यामि’, और ‘रत्नत्रयस्य शरणं प्रपद्यामि’ जैसे मंत्र जिनेंद्रदेव, उनकी माता, पुत्र, और रत्नत्रय के शरणागत होने को दर्शाते हैं। सम्यग्दृष्टि, ज्ञानमूर्ति, सरस्वती की सम्बोधन में ‘स्वाहा’ के साथ मंत्र पढ़े जाते हैं।
श्लोक 32 से 42 निस्तारक और ऋषि मंत्र
निस्तारक मंत्रों में ‘सत्यजाताय स्वाहा’, ‘अर्हज्जाताय स्वाहा’, ‘षट्कर्मणे स्वाहा’, और ‘देवब्राह्मणाय स्वाहा’ आदि मंत्रों का प्रयोग छह कर्मों, श्रावकों, और ब्राह्मणों के लिए हवि अर्पण हेतु किया जाता है। ऋषि मंत्रों में ‘निर्ग्रन्थाय नमः’, ‘वीतरागाय नमः’, ‘महाव्रताय नमः’, और ‘गणधराय नमः’ जैसे मंत्र निर्ग्रन्थ, वीतराग, और गणधरों की स्तुति करते हैं। सम्यग्दृष्टि, भूपति, नगरपति, और कालश्रमण की सम्बोधन में ‘स्वाहा’ के साथ मंत्र पढ़े जाते हैं।
श्लोक 43 से 51 ऋषि मंत्रों का संग्रह और सुरेंद्र मंत्र
इस खंड में ऋषि मंत्रों का संग्रह और सुरेंद्र मंत्रों का प्रारंभ है। ऋषि मंत्रों में ‘विविधर्द्धये नमः’, ‘अङ्गधराय नमः’, और ‘परविभ्यो नमो नमः’ शामिल हैं। सुरेंद्र मंत्रों में ‘दिव्यजाताय स्वाहा’, ‘नेमिनाथाय स्वाहा’, ‘सौधर्माय स्वाहा’, और ‘अहमिन्द्राय स्वाहा’ जैसे मंत्र देवेंद्रों, सौधर्मेंद्र, और उनके अनुचरों को हवि अर्पण के लिए हैं। सम्यग्दृष्टि, कल्पपति, दिव्यमूर्ति, और वज्रनामन् की सम्बोधन में ‘स्वाहा’ मंत्र पढ़ा जाता है।
श्लोक 52 से 62 सुरेंद्र और परमराजादि मंत्र
सुरेंद्र मंत्रों का संग्रह पूरा होने के बाद परमराजादि मंत्रों का वर्णन है। ‘अनुपमेन्द्राय स्वाहा’, ‘विजयार्चजाताय स्वाहा’, और ‘नेमिनाथाय स्वाहा’ जैसे मंत्र चक्रवर्ती और उत्कृष्ट जन्म वालों के लिए हैं। सम्यग्दृष्टि, उग्रतेजः, दिशांजय, और नेमिविजय की सम्बोधन में ‘स्वाहा’ मंत्र के साथ काम्य मंत्र पढ़े जाते हैं, जो छह परम स्थानों की प्राप्ति और समाधिमरण की कामना करते हैं।
श्लोक 63 से 71 परमेष्ठी मंत्रों का प्रारंभ
परमेष्ठी मंत्रों में ‘सत्यजाताय नमः’, ‘परमजाताय नमः’, ‘परमार्हताय नमः’, और ‘परमरूपाय नमः’ जैसे मंत्र उत्कृष्ट जन्म, धर्म, और निर्ग्रन्थ रूप की स्तुति करते हैं। ‘परमगुणाय नमः’, ‘परमस्थानाय नमः’, ‘परमयोगिने नमः’, और ‘परमविज्ञानाय नमः’ मंत्र परम गुण, मोक्ष, योग, और ज्ञान की महिमा गाते हैं। ये मंत्र परमेष्ठियों के अनंत गुणों को दर्शाते हैं।
श्लोक 72 से 81 परमेष्ठी मंत्रों का संग्रह और समापन
इस खंड में परमेष्ठी मंत्रों का पूर्ण संग्रह है, जिसमें ‘परमवीर्याय नमः’, ‘सर्वज्ञाय नमः’, ‘परमेष्ठिने नमो नमः’, और ‘परमनेत्रे नमो नमः’ शामिल हैं। सम्यग्दृष्टि, त्रिलोकविजय, धर्ममूर्ति, और धर्मनेमि की सम्बोधन में ‘स्वाहा’ के साथ मंत्र पढ़े जाते हैं। ये सात पीठिका मंत्र ब्राह्मणों द्वारा गर्भाधानादि क्रियाओं में सिद्धपूजन के लिए हैं। ये मंत्र संध्याओं में आहुति मंत्र और साधन मंत्र के रूप में भी प्रयुक्त होते हैं। सिद्ध प्रतिमा के समक्ष 108 बार जप, गंध-पुष्प अर्पण, और शुद्ध वस्त्र धारण कर इन मंत्रों से क्रिया करनी चाहिए।
श्लोक 82 से 91 अग्नियों की स्थापना और पूजा
क्रियाओं के प्रारंभ में उत्तम द्विजों को रत्नत्रय का संकल्प कर अग्निकुमार देवों के इंद्र के मुकुट से उत्पन्न तीन प्रकार की अग्नियाँ (गार्हपत्य, आहवनीय, दक्षिणाग्नि) स्थापित करनी चाहिए। ये अग्नियाँ तीर्थंकर, गणधर, और सामान्य केवली के निर्वाण महोत्सव में पूजा का अंग होकर पवित्र मानी जाती हैं। इन्हें तीन कुंडों में स्थापित कर मंत्रों द्वारा पूजा करनी चाहिए। पूजा करने वाला द्विजोत्तम और नित्य पूजा करने वाला अग्निहोत्री कहलाता है। गार्हपत्य से नैवेद्य, आहवनीय से धूप, और दक्षिणाग्नि से दीप जलाया जाता है। इन अग्नियों की रक्षा करनी चाहिए और असंस्कृत व्यक्तियों को नहीं देनी चाहिए। अग्नि स्वयं पवित्र नहीं, परंतु अरहंतदेव की पूजा के संबंध से पवित्र हो जाती है। जैन ब्राह्मणों को व्यवहार नय से अग्नि पूजा करनी चाहिए, जो निर्वाण क्षेत्र की पूजा के समान दोषरहित है। सामान्य मंत्रों के बाद विशेष क्रियाओं के मंत्रों का वर्णन किया गया है।
श्लोक 92 से 101 गर्भाधान, प्रीति, सुप्रीति, और धृति मंत्र
गर्भाधान मंत्रों में ‘सज्जातिभागी भव’, ‘सद्गृहिभागी भव’, ‘मुनीन्द्रभागी भव’, ‘सुरेन्द्रभागी भव’, ‘परमराज्यभागी भव’, ‘आर्हन्त्यभागी भव’, और ‘परमनिर्वाणभागी भव’ मंत्रों का उच्चारण कर उत्तम जन्म, गृहस्थ, मुनि, इंद्र, चक्रवर्ती, अरहंत, और निर्वाण की प्राप्ति की कामना की जाती है। प्रीति मंत्रों में ‘त्रैलोक्यनाथो भव’, ‘त्रैकाल्यज्ञानी भव’, और ‘त्रिरत्नस्वामी भव’ मंत्र त्रिलोक के स्वामी, त्रिकालज्ञानी, और रत्नत्रय के स्वामी होने की प्रार्थना करते हैं। सुप्रीति मंत्रों में ‘अवतारकल्याणभागी भव’, ‘मन्दरेन्द्राभिषेककल्याणभागी भव’, ‘निष्क्रान्तिकल्याणभागी भव’, ‘आर्हन्त्यकल्याणभागी भव’, और ‘परमनिर्वाणकल्याणभागी भव’ मंत्र गर्भ, अभिषेक, निष्क्रमण, केवलज्ञान, और निर्वाण कल्याणों की प्राप्ति के लिए हैं। धृति मंत्र गर्भाधान मंत्रों में ‘दातृ’ शब्द जोड़कर बनते हैं, जैसे ‘सज्जातिदातृभागी भव’, जो इन पदों को देने वाले होने की प्रार्थना करते हैं।
श्लोक 102 से 112 मोद और प्रियोद्भव मंत्र
मोद क्रिया के मंत्रों में ‘सज्जातिकल्याणभागी भव’, ‘सद्गृहिकल्याणभागी भव’, ‘वैवाहकल्याणभागी भव’, ‘मुनीन्द्रकल्याणभागी भव’, ‘सुरेन्द्रकल्याणभागी भव’, ‘मन्दराभिषेककल्याणभागी भव’, ‘यौवराज्यकल्याणभागी भव’, ‘महाराज्यकल्याणभागी भव’, ‘परमराज्यकल्याणभागी भव’, और ‘आर्हन्त्यकल्याणभागी भव’ मंत्र उत्तम जन्म, गृहस्थ, विवाह, मुनि, इंद्र, अभिषेक, युवराज, महाराज, चक्रवर्ती, और अरहंत कल्याणों की प्राप्ति के लिए हैं। प्रियोद्भव मंत्रों में सिद्ध भगवान की पूजा के बाद ‘दिव्यनेमिविजयाय स्वाहा’, ‘परमनेमिविजयाय स्वाहा’, और ‘आर्हन्त्यनेमिविजयाय स्वाहा’ मंत्रों का उच्चारण कर कर्म शत्रुओं पर विजय की प्रार्थना की जाती है। जन्म संस्कार में गंधोदक से अभिषेक कर माता के गुणों (शीलवती, सन्तानवती, भाग्यवती, अवैधव्य, सम्यग्दृष्टि) का वर्णन कर ‘दिव्य चक्र’, ‘विजय चक्र’, और ‘परम चक्र’ प्राप्ति का आशीर्वाद दिया जाता है।
श्लोक 113 से 121 जन्म संस्कार की विधि
जन्म संस्कार में पिता पुत्र के अंगों का स्पर्श कर ‘हे पुत्र, तू मेरे अंग-अंग से उत्पन्न हुआ है, मेरा आत्मा है, सैकड़ों वर्ष जीवित रह’ कहता है। ‘घातिजयो भव’ मंत्र पढ़कर नाभि नाल काटी जाती है। ‘श्रीदेव्यः ते जातक्रियां कुर्वन्तु’ कहकर सुगंधित चूर्ण से उबटन, ‘त्वं मन्दराभिषेकार्हो भव’ मंत्र से स्नान, और ‘चिरं जीव्या:’ मंत्र से अक्षत डाले जाते हैं। ‘नश्यात् कर्ममलं कृत्स्नम्’ मंत्र से औषधीय घी मुख और नाक में डाला जाता है। ‘विश्वेश्वरीस्तन्यभागी भूयाः’ मंत्र से माता का स्तन मंत्रित कर बालक को पिलाया जाता है। जरायु पटल को मंत्र पढ़कर पवित्र भूमि में गाड़ा जाता है।
श्लोक 122 से 131 जन्मोत्सव और माता का स्नान
जरायु पटल को ‘सम्यग्दृष्टे सम्यग्दृष्टे सर्वमातः सर्वमातः वसुन्धरे वसुन्धरे स्वाहा’ मंत्र से मंत्रित कर जल, अक्षत, और पांच रत्नों के साथ गाड़ा जाता है। ‘त्वत्पुत्रा इव मत पुत्राः चिरंजीविनी भूयासुः’ मंत्र से पुत्र की चिरंजीविता की प्रार्थना की जाती है। माता को क्षीर वृक्ष की डालियों से सजाकर मंत्रित गर्म जल से स्नान कराया जाता है, जिसमें ‘सम्यग्दृष्टे सम्यग्दृष्टे आसन्नभव्ये आसन्नभव्ये विश्वेश्वरि विश्वेश्वरि ऊर्जितपुण्ये ऊर्जितपुण्ये जिनमातः जिनमातः स्वाहा’ मंत्र पढ़ा जाता है। तीसरे दिन ‘अनन्तज्ञानदर्शी भव’ मंत्र से पुत्र को तारों भरा आकाश दिखाया जाता है। पुण्याहवाचन, दान, और जीवों को अभय दान देकर जन्मोत्सव सम्पन्न होता है।
श्लोक 132 से 142 नामकर्म, बहिर्यान, निषद्या, और अन्नप्राशन मंत्र
नामकर्म में सात पीठिका मंत्रों के बाद ‘दिव्याष्टसहस्रनामभागी भव’, ‘विजयाष्टसहस्रनामभागी भव’, और ‘परमाष्टसहस्रनामभागी भव’ मंत्रों से दिव्य, विजय, और परम नामों की प्राप्ति की प्रार्थना की जाती है। बहिर्यान मंत्रों में ‘उपनयनिष्क्रान्तिभागी भव’, ‘वैवाहनिष्क्रान्तिभागी भव’, ‘मुनीन्द्रनिष्क्रान्तिभागी भव’, ‘सुरेन्द्रनिष्क्रान्तिभागी भव’, ‘मन्दरेन्द्राभिषेकनिष्क्रान्तिभागी भव’, ‘यौवराज्यनिष्क्रान्तिभागी भव’, ‘महाराज्यनिष्क्रान्तिभागी भव’, ‘परमराज्यनिष्क्रान्तिभागी भव’, और ‘आर्हन्त्यनिष्क्रान्तिभागी भव’ मंत्र यज्ञोपवीत, विवाह, मुनि, इंद्र, अभिषेक, युवराज, महाराज, चक्रवर्ती, और अरहंत पद के लिए निष्क्रमण की प्रार्थना करते हैं। निषद्या मंत्रों में ‘दिव्यसिंहासनभागी भव’, ‘विजयसिंहासनभागी भव’, और ‘परमसिंहासनभागी भव’ मंत्र इंद्र, चक्रवर्ती, और तीर्थंकर के सिंहासन की प्राप्ति के लिए हैं। अन्नप्राशन मंत्रों में ‘दिव्यामृतभागी भव’, ‘विजयामृतभागी भव’, और ‘अक्षीणामृतभागी भव’ मंत्र दिव्य, विजय, और अक्षीण अमृत के भोग की प्रार्थना करते हैं।
श्लोक 143 से 151 व्युष्टि और चौल मंत्र
व्युष्टि मंत्रों में ‘उपनयनजन्मवर्षवर्धनभागी भव’, ‘वैवाहनिष्ठवर्षवर्धनभागी भव’, ‘मुनीन्द्रजन्मवर्षवर्धनभागी भव’, ‘सुरेन्द्रजन्मवर्षवर्धनभागी भव’, ‘मन्दराभिषेकवर्षवर्धनभागी भव’, ‘यौवराज्यवर्षवर्धनभागी भव’, ‘महाराज्यवर्षवर्धनभागी भव’, ‘परमराज्यवर्षवर्धनभागी भव’, और ‘आर्हन्त्यराज्यवर्षवर्धनभागी भव’ मंत्र यज्ञोपवीत, विवाह, मुनि, इंद्र, अभिषेक, युवराज, महाराज, चक्रवर्ती, और अरहंत पद के वर्ष वृद्धि की प्रार्थना करते हैं। चौल मंत्रों में ‘उपनयनमुण्डभागी भव’, ‘निर्ग्रन्थमुण्डभागी भव’, ‘निष्क्रान्तिमुण्डभागी भव’, ‘परमनिस्तारककेशभागी भव’, ‘परमेन्द्रकेशभागी भव’, ‘परमराज्यकेशभागी भव’, और ‘आर्हन्त्यराज्यकेशभागी भव’ मंत्र उपनयन, निर्ग्रन्थ दीक्षा, केशलोच, आचार्य, इंद्र, चक्रवर्ती, और अरहंत के केशों की प्राप्ति के लिए हैं। इन मंत्रों से चोटी रखवानी चाहिए। इसके बाद लिपि-संख्यान मंत्रों का वर्णन किया जाएगा।
श्लोक 152 से 161 लिपिसंख्यान और उपनीति मंत्र
लिपिसंख्यान मंत्रों में ‘शब्दपारभागी भव’, ‘अर्थपारगामी भागी भव’, और ‘शब्दार्थसम्बन्धपारभागी भव’ मंत्रों का उच्चारण कर शब्द, अर्थ, और उनके संबंध की पारगमिता की प्रार्थना की जाती है। उपनीति मंत्रों में ‘परमनिस्तारकलिङगभागी भव’, ‘परमर्षिलिङगभागी भव’, ‘परमेन्द्रलिङगभागी भव’, ‘परमराज्यलिङगभागी भव’, ‘परमार्हन्त्यलिङगभागी भव’, और ‘परमनिर्वाणलिङगभागी भव’ मंत्र आचार्य, ऋषि, इंद्र, चक्रवर्ती, अरहंत, और निर्वाण के चिह्नों की प्राप्ति के लिए हैं। शिष्य का संस्कार कर उसे विकाररहित वस्त्र, लंगोटी, और मूंज की रस्सी पहनाई जाती है। गणधरों द्वारा मंत्रित यज्ञोपवीत धारण कराने से बालक द्विज कहलाता है। जन्म से ब्राह्मण होने के बाद व्रतों से संस्कृत होकर वह द्विजत्व प्राप्त करता है। गुरु की साक्षी में अणुव्रत, गुणव्रत, और शिक्षाव्रत दिए जाते हैं। गुरु उपासकाध्ययन पढ़ाकर चारित्र के योग्य नाम रखते हैं और विद्या का उपदेश देते हैं।
श्लोक 162 से 171 उपनीति क्रिया और व्रतचर्या
शिष्य सिद्ध भगवान और आचार्य की पूजा करता है। वह अपनी जाति या कुटुंब के घरों में भिक्षा मांगता है और प्राप्त लाभ को उपाध्याय को सौंपता है। विद्या अध्ययन तक ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करना चाहिए। यज्ञोपवीत धारण करने वाले बालक के लिए चार चिह्न हैं: मुंडन (शिर), यज्ञोपवीत (वक्ष), मूंज रस्सी (कमर), और सफेद धोती (जांघ)। सदृष्टि द्विज, जो शस्त्र, लेखन, खेती, या व्यापार से आजीविका कमाते हैं, यज्ञोपवीत धारण करें। दोषयुक्त कुल को राजा की अनुमति से शुद्ध कर पुत्र-पौत्रों को यज्ञोपवीत दिया जा सकता है। नाच-गायन आदि से आजीविका कमाने वालों को यज्ञोपवीत की अनुमति नहीं, पर वे व्रत धारण कर एक धोती पहन सकते हैं।
श्लोक 172 से 181 व्रतचर्या और दश अधिकार
यज्ञोपवीत धारण करने वाले द्विज मांसाहार त्यागें, विवाहिता स्त्री का सेवन करें, अनारंभी हिंसा और अभक्ष्य-अपेय का परित्याग करें। उपासकाध्ययन सूत्र में दश अधिकार हैं: अतिबाल विद्या, कुलावधि, वर्णोत्तमत्व, पात्रत्व, सृष्टयधिकारिता, व्यवहारेशिता, अवध्यत्व, अदण्डधता, मानार्हता, और प्रजासम्बन्धान्तर। अतिबाल विद्या बाल्यकाल से विद्या सिखलाती है, जो द्विजों के लिए आवश्यक है। इसके अभाव में द्विज मूर्ख रहता है और मिथ्या शास्त्रों में भटकता है। श्रावकाचार शास्त्रों का अभ्यास निज और पर का उद्धार करता है। कुलावधि कुलाचार की रक्षा करती है, अन्यथा व्यक्ति अन्य कुल में विलीन हो जाता है।
श्लोक 182 से 191 दश अधिकारों का विवरण
वर्णोत्तमत्व समस्त वर्णों में श्रेष्ठता है, जो प्रशंसा और उद्धार की क्षमता देता है। इसके अभाव में द्विज न स्वयं शुद्ध हो सकता है, न दूसरों को शुद्ध कर सकता। वह कुब्राह्मणों की सेवा में दोष ग्रहण करता है। पात्रत्व गुणों से दान की योग्यता देता है, जो पूजनीय बनाता है। इसके अभाव में मान्यता और धन हानि होती है। सृष्टयधिकारिता उत्तम सृष्टि की रक्षा करती है। मिथ्यादृष्टियों की सृष्टि को त्यागकर तीर्थंकरों की अनादि धर्मसृष्टि की प्रभावना करनी चाहिए। राजाओं को इस सृष्टि की रक्षा के लिए प्रेरित करना चाहिए, अन्यथा वे अन्य सृष्टियों को मानकर धर्म की प्रामाणिकता खो देंगे।
श्लोक 192 से 201 दश अधिकारों का continuation
व्यवहारेशिता प्रायश्चित्त आदि में स्वतंत्रता देती है। इसके अभाव में द्विज न स्वयं, न दूसरों को शुद्ध कर सकता। अवध्यत्व गुणों की अधिकता से द्विज को अवध्य बनाता है, क्योंकि ब्राह्मणों की हिंसा विशेष दोषकारी है। अवध्यता धर्म का माहात्म्य है, जो तिरस्कार से बचाती है। इसके अभाव में धर्म की प्रामाणिकता नष्ट होती है। सनातन धर्म की रक्षा से संसार में रक्षा मिलती है। अदण्डधता धर्म में स्थिर द्विज को दण्ड से मुक्ति देती है। धर्मदर्शी राजा धर्मानुसार अधर्मियों को दण्ड देता है। ब्राह्मण का धन त्याज्य नहीं, अतः वह दण्ड देने योग्य नहीं।
श्लोक 202 से 211 दश अधिकारों का समापन
अदण्डधता से द्विज दण्ड देने वालों के समक्ष अदण्ड्य रहता है। इसके अभाव में वह दण्डित होकर दरिद्र और दुखी होता है। मानार्हता गुणों से सन्मान की योग्यता देती है। इसके अभाव में स्थान, मान, और लाभ की हानि होती है। राजा ज्ञान-चारित्र से युक्त द्विज की पूजा करें। प्रजासम्बन्धान्तर अन्य धर्मावलंबियों से संबंध में भी उन्नति को बनाए रखता है। उत्तम द्विज अन्यों को अपने गुणों से प्रभावित करता है, जैसे रसायन लोहे को सुवर्ण बनाता है। यह गुण धर्म प्रभावना को बढ़ाता है। इसके अभाव में गुणवत्ता नष्ट होती है। दश अधिकारों को स्वीकार करने वाला द्विज मान्य होता है।
श्लोक 212 से 223 व्रतचर्या और ब्राह्मण सृष्टि
दश अधिकारों का विस्तार उपासकाध्ययन शास्त्र से समझना चाहिए। व्रतचर्या में सात पीठिका मंत्र सामान्य और सभी क्रियाओं में उपयोगी हैं। विशेष मंत्र विशिष्ट क्रियाओं के लिए हैं। मंत्रों का यथायोग्य प्रयोग करने वाला द्विज सन्मान प्राप्त करता है। मंत्ररहित क्रियाएँ सिद्धि नहीं देतीं। शास्त्राभ्यासी द्विज मंत्रोच्चारण सहित विधिपूर्वक क्रिया करें। महाराज भरत ने धर्म विजय और धार्मिक निपुणता से द्विजों को शिक्षा देकर ब्राह्मणवर्ण की सृष्टि की। वृषभदेव के मतानुसार दीक्षित ब्राह्मणों का सत्कार हुआ, जिनका चारित्र सुंदर और शास्त्रज्ञान प्रखर था। भरत ने इन ब्राह्मणों को सदाचार में स्थिर कर प्रतिदिन सन्मान किया, अपनी सृष्टि की उन्नति देख कृतकृत्य माना। इस प्रकार चालीसवाँ पर्व समाप्त हुआ।
पर्व 41 – भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन
श्लोक 1 से 11 भरत के स्वप्न और विचार
चक्रवर्ती भरत ने एक रात अनिष्टसूचक स्वप्न देखे, जिनसे चित्त में खेद उत्पन्न हुआ। वे जागकर स्वप्नों के फल पर विचार करने लगे, यह मानते हुए कि ये स्वप्न पंचम काल में अनिष्ट फल देंगे, क्योंकि वृषभदेव के समय में प्रजा को उपद्रव असंभव है। उन्होंने अनुमान लगाया कि कृतयुग के अंत में पाप की अधिकता होने पर ये स्वप्न फलित होंगे। स्वप्नों का प्रभाव राजा और प्रजा पर समान होगा। केवलज्ञान ही सूक्ष्म तत्त्वों की प्रतीति दे सकता है। भरत ने निर्णय लिया कि वृषभदेव के समक्ष स्वप्नों का रहस्य और ब्राह्मण सृष्टि का निवेदन करना उचित है।
श्लोक 12 से 21 भरत का समवसरण की ओर प्रस्थान
भरत ने प्रातःकालीन क्रियाएँ पूरी कर सभा में राजाओं के साथ वृषभदेव की वंदना के लिए प्रस्थान किया। सेना और मुकुटबद्ध राजाओं के साथ वे समवसरण पहुँचे। दूर से समवसरण भूमि देखकर उन्होंने नमस्त्रीभूत मस्तक पर कमल के समान हाथ जोड़कर नमस्कार किया। बाहरी प्रदक्षिणा देकर, कक्षाओं का उल्लंघन करते हुए, मानस्तंभ, चैत्यवृक्ष, और सिद्धार्थवृक्ष को निहारते हुए वे भीतर प्रवेश किए।
श्लोक 22 से 31 समवसरण में पूजा और भक्ति
समवसरण की कक्षाओं में देवांगनाओं के गीत-नृत्य से भरत का चित्त अनुरक्त हुआ। ऊँचे गोपुर मार्ग से वे गणधरदेव की सभा में पहुँचे। वहाँ तीन कटनी वाले पीठ की प्रथम कटनी पर चढ़कर धर्मचक्र की पूजा और प्रदक्षिणा की। दूसरी कटनी पर महाध्वजाओं की पूजा कर गंधकुटी के समीप पहुँचे। भक्तिपूर्वक वृषभदेव को नमस्कार कर, स्तोत्रों से स्तुति और विधिपूर्वक पूजा की। भक्ति से उनके परिणाम विशुद्ध हुए, जिससे अवधिज्ञान उत्पन्न हुआ। धर्मरूपी अमृत का पान कर संतुष्ट होकर उन्होंने ब्राह्मण सृष्टि और ग्यारह प्रतिमाओं के यज्ञोपवीत के बारे में निवेदन किया।
श्लोक 32 से 41 भरत का प्रश्न और स्वप्नों का वर्णन
भरत ने वृषभदेव से पूछा कि उनकी ब्राह्मण सृष्टि में गुण-दोष क्या हैं और क्या यह योग्य है। साथ ही, उन्होंने रात में देखे सोलह स्वप्नों का वर्णन किया, जो अनिष्टसूचक प्रतीत हुए। स्वप्न थे: (1) सिंह, (2) सिंह का बच्चा, (3) हाथी का भार उठाने वाला घोड़ा, (4) सूखे पत्ते खाने वाले बकरे, (5) हाथी पर वानर, (6) कौवों से त्रस्त उलूक, (7) आनंदित भूत, (8) मध्य में सूखा तालाब, (9) धूल से मलिन रत्न, (10) नैवेद्य खाता कुत्ता, (11) तरुण बैल, (12) मंडल युक्त चंद्रमा, (13) मिलते हुए दो बैल, (14) मेघों से आच्छादित सूर्य, (15) छायारहित सूखा वृक्ष, (16) जीर्ण पत्तों का समूह। उन्होंने इनके फल का निश्चय करने को कहा।
श्लोक 42 से 51 वृषभदेव का व्याख्यान और ब्राह्मण सृष्टि का दोष
भरत के प्रश्न पर वृषभदेव ने सभा को संतुष्ट करते हुए व्याख्यान दिया। उन्होंने भरत की ब्राह्मण सृष्टि की प्रशंसा की, परंतु दोष बताया कि कृतयुग में ये सदाचार का पालन करेंगे, किंतु पंचम काल में जातिवाद के अभिमान से भ्रष्ट होकर मिथ्या शास्त्रों से लोगों को मोहित करेंगे। ये हिंसा, मधु, और मांस का भोजन करेंगे, अहिंसारूप धर्म को दूषित कर हिंसक वेदों को पुष्ट करेंगे।
श्लोक 52 से 61 ब्राह्मण सृष्टि का भविष्य और स्वप्नों का प्रकार
पंचम काल में ब्राह्मण मिथ्यादृष्टि होकर धर्मद्रोही बनेंगे, पाखंडी मतों का प्रचार करेंगे। यह सृष्टि वर्तमान में दोषरहित है, पर भविष्य में दोष का बीज बनेगी। फिर भी, धर्म सृष्टि के उल्लंघन से बचने के लिए इसे अभी त्यागना उचित नहीं। स्वप्न दो प्रकार के होते हैं: स्वस्थ (सत्य) और अस्वस्थ (असत्य), तथा दोषजन्य (मिथ्या) और दैवजन्य (सत्य)। भरत के स्वप्न दैवजन्य और सत्य हैं, जिनका फल पंचम काल में होगा।
श्लोक 62 से 71 स्वप्नों का फल (भाग 1)
वृषभदेव ने स्वप्नों का फल बताया: (1) तेईस सिंह: महावीर स्वामी को छोड़कर अन्य तीर्थंकरों के समय दुष्ट नय नहीं होंगे। (2) सिंह का बच्चा और हरिण: महावीर के तीर्थ में परिग्रही कुलिंगी होंगे। (3) भारवाहक घोड़ा: पंचम काल में साधु तप के गुणों को धारण नहीं कर पाएंगे। (4) सूखे पत्ते खाने वाले बकरे: मनुष्य सदाचार छोड़ दुराचारी होंगे। (5) हाथी पर वानर: प्राचीन क्षत्रिय वंश नष्ट होकर नीच कुलवाले शासक बनेंगे। (6) कौवों से त्रस्त उलूक: लोग जैन मुनियों को छोड़ अन्य मतों के साधुओं का अनुसरण करेंगे। (7) आनंदित भूत: लोग व्यंतरों को देव मानकर पूजेंगे।
श्लोक 72 से 81 स्वप्नों का फल (भाग 2)
(8) मध्य में सूखा तालाब: धर्म आर्यखंड से हटकर म्लेच्छ खंडों में रहेगा। (9) धूल से मलिन रत्न: पंचम काल में ऋद्धिधारी मुनि नहीं होंगे। (10) नैवेद्य खाता कुत्ता: व्रतरहित ब्राह्मण सत्कार पाएंगे। (11) तरुण बैल: लोग केवल तरुण अवस्था में मुनिपद ग्रहण करेंगे। (12) मंडल युक्त चंद्रमा: मुनियों में अवधि और मनःपर्यय ज्ञान नहीं होगा। (13) मिलते हुए बैल: मुनि एक साथ रहेंगे, अकेले विहार नहीं करेंगे। (14) मेघाच्छादित सूर्य: केवलज्ञान का उदय नहीं होगा। (15) सूखा वृक्ष: चारित्र भ्रष्ट होगा। (16) जीर्ण पत्ते: महाऔषधियों का रस नष्ट होगा। ये स्वप्न पंचम काल में धर्म के हास को दर्शाते हैं। भरत को विघ्न शांति के लिए धर्म में बुद्धि लगाने की सलाह दी गई।
श्लोक 82 से 91 भरत का शांति कर्म और घंटा स्थापना
वृषभदेव के वचनों से भरत का संदेहरूपी कीचड़ नष्ट हो गया और उनका चित्त निर्मल हुआ। उन्होंने भगवान को बार-बार प्रणाम कर प्रसन्न मन से अयोध्या में प्रवेश किया। स्वप्नों के अनिष्ट निवारण के लिए उन्होंने जिनेंद्रदेव का अभिषेक, दान, और शांति कर्म किए। गाय के दूध से पृथ्वी का सिंचन, ऋषियों की पूजा, और प्रेमियों को संतुष्ट किया। रत्नजड़ित, सुवर्ण रस्सियों से बंधे चौबीस घंटे नगर के दरवाजों, राजभवन, और गोपुरों पर लगवाए। ये घंटे अरहंतदेव की स्मृति कराते और पूजा का साधन बने, जो सूत्रों से युक्त ग्रंथों की टीकाओं के समान शोभित थे।
श्लोक 92 से 101 वंदनमाला और धर्मप्रिय प्रजा
भरत के मस्तक पर लगे घंटे जिनेंद्रदेव के चरणों की छाया जैसे सुशोभित थे। उनके द्वारा रत्नजड़ित तोरणों में स्थापित घंटों को देख अन्य लोग भी अपने घरों में वंदनमालाएँ लगाने लगे। ये मालाएँ अरहंतदेव की वंदना के लिए बनाई गईं, इसलिए वंदनमाला नाम से प्रसिद्ध हुईं। धर्मात्मा राजा होने से प्रजा भी धर्मप्रिय थी। भरत के सदाचार के कारण प्रजा धर्मत्रिय हो गई। लोग उनके धर्मप्रेम और सन्मान को देख धर्म में प्रीति करने लगे। भरत धर्मविजयी, सदाचारी, और बलिष्ठ थे, जिससे प्रजा को धार्मिक क्रियाएँ करने का उपदेश मिला।
श्लोक 102 से 111 भरत का गृहस्थ धर्म
आश्रित राजा भरत के धर्माचरण का अनुसरण करते थे। चक्रवर्ती भरत अर्थ और काम की सफलता के बाद भी धर्म में एकाग्र रहते थे। गृहस्थ धर्म के चार प्रकार—दान, पूजा, शील, और उपवास—का पालन करते थे। वे मुनियों को विशुद्ध आहार, औषधि, और अभय दान देते थे। जिनेंद्रदेव की पूजा से पूज्यपना प्राप्त होता है, यह मानकर वे भक्ति से संतुष्ट रहते थे। जिनविम्ब और मंदिरों की रचना कर कल्पवृक्ष यज्ञ किया। शील की रक्षा आत्मा की रक्षा करती है। वे व्रतों का पालन कर गृहस्थों में मुख्य थे।
श्लोक 112 से 121 भरत की धार्मिक दिनचर्या
पर्व के दिन उपवास कर भरत जिनमंदिर में सामायिक करते और मुनियों का आचरण धारण करते थे। जिनेंद्रदेव का स्मरण कर उनका चित्त स्थिर हो जाता था, जिससे आभूषण शिथिल पड़ते थे। धर्म की चिंता से अन्य पदार्थों का चिंतन स्वतः हो जाता था। उनकी सभी क्रियाएँ धर्म चिंतन से प्रारंभ होती थीं। प्रभात में दिशाओं की लालिमा को वे जिनेंद्रदेव के चरणों की लालिमा मानते थे। सूर्योदय को केवलज्ञान का प्रतिविम्ब और कमलों की शीतलता को भगवान की दिव्यध्वनि समान समझते थे। धर्मप्रधान जीवन जीते हुए वे प्रातः धर्म चिंतन, पूजा, और प्रजा के सदाचार-असदाचार पर विचार करते थे।
श्लोक 122 से 131 राजकीय और सामाजिक कर्तव्य
सभाभवन में राजसिंहासन पर विराजमान होकर भरत राजाओं को दर्शन, मुस्कान, वार्तालाप, सन्मान, और दान से संतुष्ट करते थे। दूतों और भेंट लाने वालों को सम्मानित कर उनके कार्य पूरे करते थे। नृत्य-कलाकारों को पारितोषिक देकर प्रसन्न करते थे। सभा विसर्जन के बाद क्रीड़ाएँ करते, स्नान-भोजन कर अलंकार धारण करते थे। परिवार की स्त्रियाँ उनकी सेवा करती थीं। दोपहर बाद विद्वानों के साथ विद्याचर्चा और वेश्याओं के हास्य-भोगों में समय बिताते थे।
श्लोक 132 से 141 रात्रिकाल और शास्त्रज्ञान
दिन के अंतिम भाग में मणिजड़ित भूमि पर टहलते हुए राजमहल की शोभा निहारते थे। क्रीड़ासचिवों के साथ विहार कर देवकुमारों जैसे शोभित होते थे। रात्रि में चक्रवर्ती के योग्य कार्य करते। कृतकृत्य होने पर भी मंत्रियों से सलाह लेते थे। शत्रुरहित पृथ्वी का पालन करते हुए केवल स्वराष्ट्र की चिंता थी। छह गुणों का अभ्यास अज्ञान नाश के लिए किया। राजविद्याओं—आन्वीक्षिकी, त्रयी, वार्ता, दण्डनीति—का व्याख्यान करते। निधि-रत्नों का निरीक्षण और धर्मशास्त्र के विवादों का निराकरण करते थे।
श्लोक 142 से 151 शास्त्रों में निपुणता
भरत अर्थशास्त्र, कामशास्त्र, हस्तितंत्र, और अश्वतंत्र में निपुण थे, जिससे लोग उन्हें इन शास्त्रों के कर्ता मानते थे। आयुर्वेद में उनकी प्रशंसा मूर्तिमान आयुर्वेद के रूप में होती थी। वे व्याकरण, शब्दालंकार, और छंदशास्त्र में कुशल थे। निमित्त, शकुन, और ज्योतिष शास्त्र उनके मतानुसार थे। वे इन शास्त्रों के अधिष्ठाता और मान्य थे। उनकी स्वाभाविक बुद्धि के कारण सभी विद्याओं में प्रगति थी। शास्त्रज्ञान में वे दर्पण समान थे, जिससे विद्वान संशयमुक्त होते थे।
श्लोक 152 से 158 भरत की महिमा
बुद्धिपरक कुलकर भरत लोकाचार के सूत्रधार थे। वे राजशास्त्र, धर्मशास्त्र, और कलाओं में श्रेष्ठ थे। उनका प्रथम राज्य, सार्वभौम पद, और यश आश्चर्यजनक था। विद्वानों में चक्रवर्ती के रूप में उनकी कीर्ति फहराती थी। समस्त तत्त्वों को जानकर वे जिनेंद्रदेव के धर्ममार्ग का स्मरण और प्रचार करते थे। शत्रुरहित पृथ्वी का पालन कर भोगों के साथ क्रीड़ा करते थे। लक्ष्मी और सरस्वती के समागम से सुख स्वामी, शास्त्र-शस्त्र निपुण, और जिनेंद्रदेव की सेवा में अग्रेसर थे। इस प्रकार इकतालीसवाँ पर्व समाप्त हुआ।
पर्व 42 – भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला
श्लोक 1 से 12 क्षत्रिय धर्म का उपदेश
भरत, सभामध्ये सिंहासन पर बैठकर, राजाओं को क्षात्रधर्म का उपदेश देते हैं। वे कहते हैं कि भगवान् वृषभदेव ने क्षत्रियों को दुखी प्रजा की रक्षा के लिए नियुक्त किया है। क्षत्रियों का धर्म पांच प्रकार का है: कुलपालन, बुद्धिपालन, आत्मरक्षा, प्रजारक्षा, और समंजसपना। कुलपालन में कुलाम्नाय और योग्य आचरण की रक्षा शामिल है। वृषभदेव ने सर्वप्रथम क्षत्रिय वर्ण की सृष्टि की, जो रत्नत्रय की आराधना और सोलह भावनाओं के चिंतन से सर्वार्थसिद्धि से अवतरित हुए। कर्मभूमि में दो प्रकार की प्रजा होती है: रक्षा योग्य और रक्षक। रक्षक प्रजा की वंशपरंपरा ही क्षत्रिय कहलाती है, जो अनादिकाल से चली आ रही है।
श्लोक 13 से 21 क्षत्रिय न्याय और वंशरक्षा
क्षत्रियों का न्याय धर्म का उल्लंघन किए बिना धन कमाना, रक्षा करना, बढ़ाना, और योग्य पात्र को दान देना है। यह जैन धर्म के अनुसार उत्तम न्याय है। रत्नत्रय के प्रताप से क्षत्रिय अयोनिज कहलाते हैं। बड़े वंशों के राजा लोकोत्तम पुरुष हैं, जो धर्ममार्ग में स्वयं और अन्य को स्थिर रखते हैं। उन्हें अन्य मतों के शेषाक्षत आदि ग्रहण नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे महत्त्व का नाश और विघ्न उत्पन्न होते हैं। अन्य मतों के प्रति श्रद्धा से कुल की हीनता और राजा का नाश संभव है।
श्लोक 22 से 31 जैन धर्म की श्रेष्ठता
राजाओं को अन्य मतों के शेषाक्षत, आशीर्वाद, और शांतिवचन त्यागने चाहिए, अन्यथा कुल की हीनता होती है। जैन राजा अर्हंतदेव के शेषाक्षत ग्रहण कर सकते हैं, क्योंकि इससे पापक्षय होता है। रत्नत्रय के कारण वृषभदेव के वंशज और राजा एक गोत्र के भाई-बंधु हैं, अतः जिनेंद्रदेव के शेषाक्षत ग्रहण करना उचित है। मुनियों के शेषाक्षत भी ग्रहण योग्य हैं, क्योंकि दीक्षा लेने वाला सम्यक्चारित्री क्षत्रिय ही माना जाता है। अन्य मतों के लोग क्षत्रियों को शेषाक्षत देने के अधिकारी नहीं हैं। कुलरक्षा के लिए सावधानी आवश्यक है, अन्यथा झूठे पुराणों से ठगे जाने का भय है।
श्लोक 32 से 41 बुद्धिपालन और तत्त्वज्ञान
बुद्धिपालन अविद्या (मिथ्याज्ञान) का नाश करने से होता है। अर्हंतदेव का कहा ही तत्त्व है, जो ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय, और अंतराय कर्मों का क्षय कर चुके हैं। राजविद्या और धर्मशास्त्र का परिज्ञान बुद्धि को दृढ़ करता है। तीर्थंकर और वृषभदेव के चारित्र में स्थिर राजा महादेव कहलाते हैं, उनकी पत्नियां महादेवी। अन्य मतों के दावे (जैसे स्वयं को महादेव या तारक मानना) सारहीन हैं, क्योंकि केवल जिनेंद्रदेव का मार्ग ही संसार से तारता है।
श्लोक 42 से 51 अर्हंतदेव की आप्तता
अर्हंतदेव राग-द्वेष से रहित, वाणी, आत्मा, और भाग्य के अतिशय से युक्त आप्त हैं। उनकी दिव्य वाणी सभ को संतुष्ट करती है, अनंत ज्ञान-दर्शन-सुख-बल उनका आत्म अतिशय है, और आठ प्रातिहार्य, समवसरण, बारह सभाएं उनके भाग्य का अतिशय हैं। अन्य मतों में ऐसा पुरुष नहीं, अतः अर्हंतदेव ही आप्त हैं। क्षत्रियों को अनाप्त मतों से वंश को पृथक् रखकर बुद्धि की रक्षा करनी चाहिए, जिससे अखंड पृथ्वी की रक्षा संभव है। तीन उदाहरण (पुरुष, बेड़ी, संसारी जीव) इस स्वरूप को स्पष्ट करते हैं।
श्लोक 52 से 62 संसारी और मुक्त जीव
संसारी जीव इंद्रियजनित ज्ञान, दर्शन, वीर्य, सुख, और सुंदरता को शरीर में अनुभव करता है, परंतु मुक्त जीव अतींद्रिय गुणों से परम सुख का अनुभव करता है। संसारी जीव अल्पज्ञानी होने से शास्त्रज्ञान के लिए अन्य का आश्रय लेता है, सीमित दर्शन और वीर्य के कारण उत्कंठित रहता है, और इंद्रियजनित सुख-सुंदरता के लिए पराधीन है। शरीर की रक्षा में व्याकुल रहता है और तप करने पर भी शरीर को साधन मानकर स्वीकार करता है, पर नष्ट होने पर नया शरीर चाहता है।
श्लोक 63 से 71 अतींद्रिय गुणों की श्रेष्ठता
अतींद्रिय ज्ञान वाला पुरुष शास्त्राश्रित नहीं, बल्कि स्वयं सबको उपदेश देता है। अतींद्रिय दर्शन वाला अपूर्व पदार्थ देखने की इच्छा नहीं करता, क्योंकि वह सब कुछ देखता है। अनंतवीर्य वाला स्वयं कृतकृत्य हो सिद्धालय पहुंचता है। अतींद्रिय सुख वाला भोगों से उत्कंठित नहीं, अतींद्रिय सुंदरता वाला स्नानादि की इच्छा नहीं करता, और अतींद्रिय आत्मरूप शरीर वाला आहारादि की अपेक्षा नहीं करता। ऐसे गुणों वाला आप्त है, अन्य अनाप्त।
श्लोक 72 से 81 मुक्त जीव की स्वतंत्रता
जो जीव जन्म, जरा, और मरण से मुक्त है, वह तप या अन्य आवास की इच्छा नहीं करता। वह समस्त दोषों से रहित, गुणों से युक्त, परमात्मा और उत्कृष्ट ज्योतिस्वरूप है, वही परमेष्ठी कहलाता है। कामरूपी होना (इच्छानुसार अवतार लेना) आप्त का लक्षण नहीं, क्योंकि कामरूपी रागयुक्त और अकृतकृत्य होता है। जैसे बेड़ी में बंधा जीव इष्ट स्थान तक नहीं पहुंच सकता, वैसे ही कर्मबद्ध जीव स्वतंत्र नहीं। कर्ममुक्त जीव स्वतंत्रता प्राप्त करता है। संसारी जीव की परतंत्रता के वर्णन से मुक्त जीव की स्वतंत्रता स्पष्ट होती है।
श्लोक 82 से 91 संसारी जीव की परतंत्रता
संसारी जीव कर्मबन्धन के कारण परतंत्र है। सुख-दुख की वेदनाओं से चंचलता, ऋद्धियों के क्षय से नश्वरता, ताड़ना से बाध्यता, और इंद्रियजनित ज्ञान, दर्शन, वीर्य, सुख के क्षयशील होने से अंतसहितता उत्पन्न होती है। कर्मों से मलिनता, शरीर की छेद्यता-भेद्यता, बुढ़ापा, मृत्यु, गर्भवास, और शरीर का परिमित होना इसका प्रमेयपना है। क्रोध से क्षोभ और योनियों में भ्रमण इसकी विविधता है।
श्लोक 92 से 101 संसारी और मुक्त जीव का अंतर
संसारी जीव चार गतियों में भटकता है, और इसके गुण परिवर्तनशील हैं, जो असिद्धता है। कर्मरूपी रज से युक्त संसारी जीव के सुख-दुख, बल, और शरीर बदलते रहते हैं, जबकि मुक्त जीव के अविनाशी भाव आत्मस्वरूप, अचंचलता, अक्षयपना, अव्याबाधपना, अनंतज्ञान, अनंतदर्शन, अनंतवीर्य, अनंतसुख, नीरजसपना, और निर्मलपना हैं। कोई अन्य पुरुष स्वभाव से निर्मल और सिद्ध नहीं।
श्लोक 102 से 111 मुक्त जीव के गुण
मुक्त जीव का कर्ममल नष्ट होने से अच्छेद्यपना, अभेद्यपना, अक्षरता, और अप्रमेयपना है। यह गर्भवास, गुरुता-लघुता से मुक्त, अक्षोभ्य, अविलीन, और परम हद वाला है। तीनों लोकों के शिखर पर इसका लोकाग्रवास और समस्त पुरुषार्थों की पूर्णता इसकी परमसिद्धता है। ऐसे कृतकृत्य जीव को परद्रव्यों की आवश्यकता नहीं। संसारी जीव का उदाहरण व्यतिरेक से परमात्मा को सिद्ध करता है। आप्त के मत में बुद्धि लगाने वाला क्षत्रिय श्रेष्ठ है।
श्लोक 112 से 121 आत्मरक्षा और धर्म
क्षत्रिय को अन्य मतों से बुद्धि हटाकर समीचीन मार्ग में लगानी चाहिए। आत्मरक्षा इस लोक और परलोक के अपायों से बचाव है। परलोक की रक्षा धर्म से होती है, जो आपत्तियों का प्रतिकार, मनचाहा फल, कल्याण, और आनंद देता है। राज्य में शत्रुता, खेद, पाप, और शंका के कारण सुख नहीं। बुद्धिमान को अपथ्य राज्य का त्याग और तप ग्रहण करना चाहिए।
श्लोक 122 से 131 सल्लेखना और त्याग
निमित्तज्ञानी क्षत्रिय को अंत समय में सल्लेखना धारण करनी चाहिए। त्याग परम धर्म, तप, कीर्ति, और ऐश्वर्य का साधन है। पवित्र स्थान में पूजा, शरीर, आहार, और राजचिह्नों का त्याग करना चाहिए। परीषह विजय से इष्टसिद्धि होती है। अनुप्रेक्षाओं के चिंतन से चित्त समाधान होता है। सम्यक्त्व का चिंतन और मिथ्यात्व का त्याग करना चाहिए। रत्नत्रय ग्रहण और परिग्रह त्याग कर, पंचपरमेष्ठी स्मरण करते हुए प्राणत्याग करने से शुभ गति या मोक्ष प्राप्त होता है।
श्लोक 132 से 141 प्रजारक्षा
आत्मरक्षा न करने वाला क्षत्रिय अपमृत्यु से दुखदायी संसार में पड़ता है। बुद्धिमान क्षत्रिय को दोनों लोकों में आत्मरक्षा के लिए प्रयत्न करना चाहिए। प्रजारक्षा राजा का मौलिक गुण है। जैसे ग्वालिया आलस्यरहित होकर गायों की रक्षा करता है, वैसे ही राजा को प्रजा की रक्षा करनी चाहिए। अपराधी प्रजा को अंगछेदन जैसे कठोर दंड न देकर, अनुरूप दंड से नियंत्रित करना चाहिए।
श्लोक 142 से 151 प्रजा और सेवकों की रक्षा
कठोर दंड देने वाला राजा प्रजा को उद्विग्न करता है, जिससे प्रजा और मंत्री उससे विमुख हो जाते हैं। जैसे ग्वालिया मुख्य गायों की रक्षा कर समृद्ध होता है, वैसे ही राजा मुख्य वर्ग की रक्षा कर अपने और अन्य राज्यों में पुष्टि प्राप्त करता है। श्रेष्ठ राजा अपने बल से समुद्रांत पृथ्वी को सहज जीत लेता है। जैसे ग्वालिया घायल गाय के पैर को जोड़ता और उपद्रवों का प्रतिकार करता है, वैसे ही राजा को घायल योद्धा की वैद्य द्वारा रक्षा और स्वस्थ होने पर उत्तम आजीविका देनी चाहिए। युद्ध में मृत भृत्य के पुत्र या भाई को उसके पद पर नियुक्त करना चाहिए।
श्लोक 152 से 162 सेवकों का संतोष
जैसे ग्वालिया गायों को कीड़े से बचाने के लिए औषधि देता है, वैसे ही राजा को दरिद्र या खिन्न सेवक का चित्त संतुष्ट करना चाहिए, अन्यथा सेवक विरक्त हो जाएगा। दरिद्रता को घाव के कीड़े समान मानकर त्वरित प्रतिकार करना चाहिए। सेवकों को सम्मान से संतोष मिलता है, जो धन से नहीं मिलता। जैसे ग्वालिया बलशाली बैल को पुष्ट करता है, वैसे ही राजा को उत्तम योद्धा को आजीविका और सम्मान देना चाहिए। पराक्रमी वीर को संतुष्ट रखने से भृत्य अनुरक्त रहते हैं। जैसे ग्वालिया पशुओं को उपद्रवहीन वन में चराता है, वैसे ही राजा को सेवकों को सुरक्षित स्थान पर रखना चाहिए।
श्लोक 163 से 171 प्रजा और सेवकों की सुरक्षा
चोर, डाकू, या अन्य राजाओं से सेवकों की रक्षा के लिए राजा को उनकी आजीविका नष्ट करनी चाहिए। जैसे ग्वालिया नवजात बछड़े की देखभाल करता है, वैसे ही राजा को नए सेवकों को सम्मान और आजीविका देनी चाहिए। जैसे ग्वालिया गुणी पशुओं की परीक्षा कर खरीदता है, वैसे ही राजा को उच्चकुलीन सेवकों का चयन करना चाहिए। सेवकों को योग्य कार्यों में लगाना चाहिए, और उनके संग्रह में बलवान जामिनदार नियुक्त करना चाहिए।
श्लोक 172 से 181 कृषि और धन संग्रह
जैसे ग्वालिया आलस्यरहित होकर गायों को उपयुक्त स्थान पर चराता और दूध प्राप्त करता है, वैसे ही राजा को ग्रामों में खेती करवानी चाहिए। देश में भली-भांति खेती करवाकर न्यायपूर्ण धान्य संग्रह करना चाहिए, जिससे भंडार समृद्ध, बल बढ़े, और देश पुष्ट हो। प्रजा को दुख देने वाले अक्षरम्लेच्छों को कुलशुद्धि द्वारा आधीन करना चाहिए। सत्कार से वे उपद्रव नहीं करते, अन्यथा उपद्रव करते रहते हैं। सामान्य प्रजा की तरह उनसे कर लेना चाहिए।
श्लोक 182 से 192 अक्षरम्लेच्छों का स्वरूप
अक्षरम्लेच्छ वेद पढ़कर आजीविका करते और अधर्म से ठगते हैं। अज्ञान से अहंकार और पापसूत्रों से वे म्लेच्छ कहलाते हैं। हिंसा, मांसभक्षण, धनहरण, और धूर्तता उनका आचार है। नीच द्विज हिंसा को वेदों से प्ररूपित करते हैं, अतः सामान्य या निकृष्ट माने जाते हैं। केवल अर्हंत भक्त द्विज मान्य हैं। वे स्वयं को तारक या लोकसम्मत कहें, तो उनकी विशेषता सिद्ध नहीं, क्योंकि वे व्रतरहित और दयाहीन हैं। राजा को उन्हें म्लेच्छ समान मानकर कर वसूल करना चाहिए। जैनधर्मी द्विज ही पूज्य हैं।
श्लोक 193 से 201 प्रजापालन और समंजसत्व
जैसे ग्वालिया गोधन को व्याघ्र और चोरों से बचाता है, वैसे ही राजा को प्रजा की रक्षा करनी चाहिए। बलवान राजा के आने पर भेंट देकर संधि करनी चाहिए, क्योंकि युद्ध हानिकारक है। ग्वालिया दृष्टांत स्वीकार कर राजा को नीतिपूर्वक प्रजापालन करना चाहिए। प्रजापालन के बाद समंजसत्व गुण कहा गया, जिसमें राजा चित्त समाधान कर दुष्टों का निग्रह और शिष्टों का पालन करता है। निष्पक्ष, मध्यस्थ, और समान दृष्टि वाला राजा समंजस कहलाता है।
श्लोक 202 से 208 क्षत्रिय धर्म और भरत का वैभव
समंजसत्व से राजा शिष्टों का पालन और दुष्टों का निग्रह करता है। दुष्ट हिंसा से पाप करते, शिष्ट क्षमा-संतोष से धर्म धारण करते हैं। भरत ने क्षत्रियों को वृषभदेव के मार्ग में नियुक्त कर आचार का उपदेश दिया। राजा इस धर्म को स्वीकार कर प्रसन्न हुए और योग-क्षेम में प्रवृत्त रहे। वर्णाश्रम धर्मोत्सव करते हुए संतोषी बने। भरत का क्षत्रिय और तीर्थक्षत्रिय चरित्र गौतम गणधर ने श्रेणिक के लिए निरूपित किया। वृषभदेव की भक्ति करने वाले भरत का समय सुखमय व्यतीत हुआ। वे जिनपूजा, याचक संतुष्टि, और समुद्रांत पृथ्वी का पालन करते हुए दश भोगों का उपभोग करते थे।
पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन
श्लोक 1 से 11 वृषभदेव की महिमा और पुराण की प्रस्तुति
भगवान वृषभदेव की महिमा का वर्णन किया गया है, जिनके ध्वज में वृषभ चिह्न है और जिन्होंने मोक्ष मार्ग का उपदेश देकर तीनों लोकों को प्रकाशित किया। वे प्रथम तीर्थंकर हैं, जिनके उपदेश से मोक्ष मार्ग की स्थापना हुई, और अन्य तीर्थंकरों के उपदेश उनके अनुसरण में ही हैं। उनकी महिमा को एकमात्र ओम् अक्षर के समान बताया गया है। जिनसेनाचार्य द्वारा रचित इस पुराण का शेष भाग शिष्य गुणभद्र द्वारा पूर्ण किया जा रहा है, जो गुरु के मार्गदर्शन में शब्द और अर्थ से सुशोभित है। विद्वानों से इसकी स्वीकृति और श्रवण की अपेक्षा की गई है।
श्लोक 12 से 21 पुराण की रचना और इसका महत्व
पुराण का पूर्व भाग जिनसेनाचार्य द्वारा और उत्तर भाग शिष्य गुणभद्र द्वारा रचित है, जो गुरु-शिष्य परंपरा से सुंदर बनता है। इसकी रचना को धर्म ग्रहण करने की सलाह दी गई है, न कि रचनाकार की योग्यता पर ध्यान देने की। गुरुओं का प्रभाव रचना को सुसंस्कृत करता है। यह पुराण दोषों को गुणों में बदलने और भव्य जीवों के लिए निर्दोष होने का दावा करता है। सज्जन गुणों को ग्रहण करते हैं, जबकि दुर्जन दोषों को देखते हैं, जो सम्यक् और मिथ्या ज्ञान का परिचायक है।
श्लोक 22 से 31 रचना की चुनौतियाँ और कवि की भूमिका
दुर्जनों द्वारा निंदा को स्वीकार किया गया है, पर गुणों को ग्रहण न करने की प्रार्थना की गई है, ताकि रचना निर्दोष रहे। अज्ञानी की निंदा या स्तुति हास्यास्पद होती है, और महापुरुष छोटे उपद्रवों से विचलित नहीं होते। कवि का परिश्रम केवल कवि ही समझ सकता है। रचना की स्तुति और निंदा दोनों ही कवि की कीर्ति को बढ़ाती हैं, जैसे अर्जुन के बाण खोटे संस्कारों को दुख देते हैं।
श्लोक 32 से 46 पुराण की पूर्णता और प्रभाव
रचना को गुरुओं के मार्गदर्शन में शुद्ध करने की अपेक्षा की गई है। यह पुराण धर्मरूपी रत्न है, जिसे पंडित ग्रहण करेंगे। यह रचना सुंदरी स्त्री के समान रस, अलंकार और विचित्र शब्दों से युक्त है, जो सभी के मनोरथ पूर्ण करती है। यह पापों को नष्ट करती है, पुण्य को बढ़ाती है, और युगों तक स्थिर रहेगी। इसकी सिद्धि में गुरु जिनसेनाचार्य का मार्गदर्शन महत्वपूर्ण है।
श्लोक 47 से 69 जयकुमार के चरित्र की मांग
राजा श्रेणिक, वृषभदेव के चरित्र से प्रभावित होकर, उनके 84 गणधरों में से 71वें गणधर जयकुमार के चरित्र को सुनने की इच्छा प्रकट करते हैं। जयकुमार ने अर्ककीर्ति को युद्ध में जीता और उनके प्रताप की प्रशंसा की गई। गणधरों के नामों का उल्लेख करते हुए उनकी महिमा और गुणों का वर्णन किया गया है, जो सर्वज्ञ के अनुरूप थे।
श्लोक 70 से 81 जयकुमार के चरित्र का प्रारंभ
राजा श्रेणिक की प्रार्थना पर गौतम गणधर जयकुमार का18 के चरित्र को सुनाने के लिए तैयार होते हैं। कुरुजांगल देश के हस्तिनापुर नगर में राजा सोमप्रभ और उनकी पत्नी लक्ष्मीवती के पुत्र जयकुमार का जन्म हुआ। जयकुमार गुणों से युक्त और कीर्ति विस्तारक थे। उनके 14 अन्य भाई भी गुणवान थे, जो राजा सोमप्रभ को सुशोभित करते थे।
श्लोक 82 से 91 जयकुमार का राज्य और धर्म श्रवण
राजा सोमप्रभ, रानी लक्ष्मीवती, छोटा भाई श्रेयांस और पुत्र जयकुमार से सुशोभित राज्य पूजनीय था। सोमप्रभ ने संसार की अनित्यता समझकर जयकुमार को राज्य सौंपा और श्रेयांस के साथ भगवान वृषभदेव से दीक्षा लेकर मोक्ष प्राप्त किया। जयकुमार ने पिता के पद पर पृथ्वी का पालन किया और भाइयों के साथ भोगों का उपभोग किया। एक दिन उद्यान में मुनि शीलगुप्त के दर्शन कर धर्म सुना। वहाँ सर्प दंपति ने भी धर्म श्रवण किया, जिनमें सर्प वज्रपात से मरकर देव हुआ।
श्लोक 92 से 102 सर्पिणी का मरण और नागकुमार का क्रोध
जयकुमार ने उद्यान में सर्पिणी को काकोदर सर्प के साथ देखकर क्रोधित होकर दोनों को ताड़न किया। सैनिकों ने उन्हें मार डाला। सर्प जलदेवता और सर्पिणी नागकुमार की पत्नी बनी। नागकुमार ने जयकुमार पर सर्पिणी के मरण का दोष लगाकर उसे मारने की ठानी और उसके घर पहुँचा। जयकुमार ने रानी श्रीमती से सर्पिणी की कुकृत्य बताते हुए स्त्रियों की निंदा की।
श्लोक 103 से 111 स्त्रियों की निंदा
जयकुमार ने कहा कि स्त्रियाँ धर्म और काम से धन खरीदती हैं, उनमें विष भरा है, और उनके सत्याभास नमस्कार बुद्धिमानों को ठगते हैं। उनकी प्रसन्नता भयंकर है, और वे मायाचारी हैं। गुण स्त्रियों में स्थिर नहीं रहते, और दोष उनकी उत्पत्ति हैं। वे निर्गुण को गुणी मान लेती हैं, और उनके चंचल स्वभाव के कारण शास्त्रों में उनका मोक्ष नहीं माना गया।
श्लोक 112 से 121 नागकुमार का परिवर्तन और जयकुमार का शांत जीवन
जयकुमार ने रानी को अपवाद बताया कि लक्ष्मी, सरस्वती, कीर्ति, मुक्ति और वह स्वयं दुर्लभ हैं। नागकुमार ने जयकुमार की निंदा सुनी, पर धर्म के प्रभाव से क्रोध त्यागकर उसकी पूजा की और अपने इरादे बताकर लौट गया। जयकुमार ने भरत के साथ दिग्विजय किया और शांत भाव से नगर में निवास किया, जो सौम्य, गुणाकर और सुंदर था।
श्लोक 122 से 131 काशी और वाराणसी का वर्णन
भरत क्षेत्र में काशी देश स्वर्ग और मोक्ष को जीतने वाला था, जहाँ कल्पवृक्ष थे। वाराणसी नगरी अमरपुरी को लज्जित करती थी, जहाँ पापी जीव जन्म नहीं लेते थे। यह नगरी जिनवाणी की तरह धर्म मार्ग पर ले जाती थी। राजा अकम्पन, विद्या और नीति से युक्त, प्रजा का पालन करते थे और भगवान वृषभदेव को पूज्य मानते थे। उनकी रानी सुप्रभा चंद्रमा की तरह थी।
श्लोक 132 से 141 सुप्रभा और सुलोचना का वर्णन
सुप्रभा ने राजा को पुत्रों से आनंदित किया। उनके हजार पुत्रों में हेमांगद आदि थे। सुप्रभा से सुलोचना और लक्ष्मीमती कन्याएँ उत्पन्न हुईं। सुलोचना लक्ष्मी की तरह मनोहर थी, और धाय सुमित्रा ने उसका पालन किया। उसके चरणकमल रागी थे, और नख चांदनी की तरह कुमुदिनियों को विकसित करते थे। उसके पैरों की अंगुलियाँ कामदेव के वेगों की तरह थीं, और चरणों की शोभा अद्वितीय थी।
श्लोक 142 से 151 सुलोचना की शारीरिक शोभा
सुलोचना की जंघाएँ संतुलित थीं, और नितम्ब कामदेव की वेदी जैसे थे। उसका मध्य भाग त्रिवली से बंधा था, और नाभि से रोमराजि घास की तरह थी। उसके स्तन स्याद्वाद की तरह विरुद्ध धर्म धारण करते थे। भुजाएँ लक्ष्मी को आलिंगन करती थीं, और कंठ जयकुमार के हाथों से सुशोभित था। कपोल दर्पण जैसे थे, और ओठ बिम्बी फल से भी श्रेष्ठ थे।
श्लोक 152 से 161 सुलोचना के मुख की शोभा
सुलोचना के दाँत सुंदर और चमकीले थे, और नाक मुख की सुगंध का स्वाद लेती थी। उसके नेत्र विशाल और कटाक्षपूर्ण थे, जो जयकुमार को जीतते थे। कान जयकुमार के प्रेम संभाषण के पात्र थे। भौंहें कामदेव के धनुष थीं, और ललाट उन्नत था। बाल काले सर्प जैसे थे, और उसका शरीर परमाणुओं से बना था। उसका मुख चंद्रमा से भी श्रेष्ठ था, क्योंकि वह निष्कलंक और पूर्ण था।
श्लोक 162 से 171 सुलोचना के मुख की शोभा
सुलोचना के मुख की शोभा कमल से श्रेष्ठ थी, जो सदा एकरूप रहकर भी प्रतिक्षण विलक्षण शोभा धारण करती थी, स्याद्वाद का स्वरूप प्रकट करती थी। यह शोभा न चंद्रमा के समान सूर्य से नष्ट होती थी, न कमल की तरह चंद्रमा से। यह रात-दिन पूर्ण और विकसित रहती थी। सुलोचना का मुख देखने वाले और उसके द्वारा देखे जाने वालों की शोभा बढ़ती थी। उसने कुमारी अवस्था में कामदेव और युवावस्था में जयकुमार को जीत लिया, लक्ष्मी आदि को परास्त किया। उसकी कान्ति ने चंद्रमा को क्षयरोगी बना दिया, और उसका मुख कुमुद, कमल सहित सब कुछ जीत लेता था।
श्लोक 172 से 181 सुलोचना की भक्ति और विवाह चिंता
सुलोचना ने जिनेंद्रदेव की रत्नमयी प्रतिमाएँ बनवाकर उनकी पूजा, स्तुति, दान और धर्म-श्रवण किया, जिससे सम्यग्दर्शन प्राप्त किया। फाल्गुन में अष्टाह्निकी पूजा और उपवास कर वह राजा अकम्पन को शेषाक्षत देने गई। राजा ने उसे पारणा के लिए विदा किया और उसकी यौवनावस्था देखकर विवाह की चिंता करने लगा। उन्होंने चार मंत्रियों—श्रुतार्थ, सिद्धार्थ, सर्वार्थ, सुमति—को बुलाकर कन्या के विवाह पर विचार-विमर्श किया।
श्लोक 182 से 191 मंत्रियों का परामर्श
राजा अकम्पन ने मंत्रियों से पूछा कि सुलोचना किसे दी जाए। श्रुतार्थ ने चक्रवर्ती के पुत्र अर्ककीर्ति को उपयुक्त बताया, जिसके गुण और कीर्ति सर्वत्र फैली थी। सिद्धार्थ ने छोटे कुल के साथ बड़े कुल का संबंध उचित न मानकर प्रभंजन, जयकुमार आदि समकक्ष राजपुत्रों का सुझाव दिया। सर्वार्थ ने विद्याधरों से संबंध को लाभकारी और प्रशंसनीय बताया। सुमति ने स्वयंवर की प्राचीन विधि का प्रस्ताव रखा, जिससे किसी से वैर न हो और राजा की यश-कीर्ति बढ़े।
श्लोक 192 से 201 स्वयंवर का निर्णय
सुमति के स्वयंवर प्रस्ताव को सबने स्वीकार किया, क्योंकि यह नीतिसम्मत और वैर-रहित था। राजा ने मंत्रियों को विदा कर सुप्रभा और पुत्र हेमांगद से विचार-विमर्श किया। उन्होंने कुल के वृद्धों और बंधुओं से परामर्श लिया। राजा ने विभिन्न प्रकार के दूत भेजकर राजाओं को स्वयंवर के लिए आमंत्रित किया, जिसमें निसृष्टार्थ, मितार्थ और उपहार सहित पत्र ले जाने वाले दूत शामिल थे।
श्लोक 202 से 213 स्वयंवर भवन की रचना
पूर्वभव में राजा अकम्पन का भाई रहा विचित्रांगद देव सौधर्म स्वर्ग से सुलोचना का स्वयंवर देखने आया। उसने राजा की आज्ञा से नगर के समीप सर्वतोभद्र राजभवन बनाया, जो मंगलद्रव्यों, विवाह मंडप और रत्न-सुवर्ण से सुशोभित था। इसके चारों ओर स्वयंवर महाभवन बनाया गया, जिसमें चार दरवाजे, गोपुर, रत्न-तोरण, सुवर्ण-कलश और नीलमणि-जड़ित धरातल था। यह भवन भोग-उपभोग की वस्तुओं से परिपूर्ण और पुण्य के प्रभाव से निर्मित था।
श्लोक 214 से 221 वसंत ऋतु का आगमन
राजा अकम्पन स्वयंवर भवन देखकर संतुष्ट हुए। वसंत ऋतु का प्रारंभ हुआ, जिसमें मलयानिल चंदन, इलायची और लवंग की सुगंध लिए बह रहा था। लताएँ और वृक्ष शाखाएँ मलयानिल का आलिंगन करती थीं। सूर्य उत्तरायण में था, और कोयलें मधुर स्वर कर रही थीं। चंपा, अशक, चमेली और मौलश्री के वृक्ष फूलों से लदे थे, जो भक्तों और भमरों को आकर्षित करते थे।
श्लोक 222 से 232 स्वयंवर की तैयारियाँ और राजाओं का आगमन
मौलश्री वृक्ष गुणों से युक्त थे। वसंत के सहयोग से दूतों ने भूमिगोचरी और विद्याधर राजाओं को स्वयंवर का समाचार दिया। नगाड़ों के शब्द और सुलोचना की आकर्षिणी विद्या से प्रेरित विद्याधर राजा विमानों से आए। राजा अकम्पन ने उनकी अगवानी की और वाराणसी में प्रवेश कराया। हेमांगद आदि पुत्रों के साथ उन्होंने अर्ककीर्ति और जयकुमार की अगवानी की, मानो उनकी सिद्धि को सूचित करते हुए।
श्लोक 233 से 242 राजाओं का स्वागत और उत्सव
तीनों समुद्रों के बीच के राजा बनारस आए। राजा अकम्पन ने कुछ राजाओं की स्वयं और कुछ की हेमांगद आदि के माध्यम से अगवानी की। सुलोचना के कारण वाराणसी अयोध्या को लज्जित करती थी, क्योंकि कन्या-रत्न सर्वश्रेष्ठ था। राजा ने अर्ककीर्ति आदि को स्वयंवर शाला में ठहराया, जिनेंद्रदेव की पूजा की, और दीन-अनाथों को दान देकर उत्सव की तैयारी की। यह सब पूर्वार्जित धर्म का फल था, जिससे उनकी लक्ष्मी क्षयरहित और पृथ्वी उपभोग्य बनी।
श्लोक 243 से 251 स्वयंवर उत्सव का प्रारंभ
राजा अकम्पन ने जिनेंद्रदेव की पूजा कर स्वयंवर कार्य प्रारंभ किया, जो सफलता की गारंटी थी। भेरी की ध्वनि से आनंद छाया। पृथ्वी पर फूल, आकाश में पताकाएँ, नगाड़ों से दिशाएँ गूंजीं। गलियाँ शुद्ध कर तोरण बाँधे गए, महल चूने से सजाए गए। स्त्रियाँ कज्जल, मालाएँ, तिलक, कुंडल, पत्ररचना, पान, मोती, चंदन, और नूपुरों से सुशोभित थीं, जो स्वर्गपुरी को लज्जित करती थीं।
श्लोक 252 से 264 नगरी और उत्सव की शोभा
वाराणसी नगरी अचिंत्य वैभव से अलंकृत थी, राजमहल का उत्सव नगर से ही प्रकट था। सचेतन और अचेतन सभी उत्सव मना रहे थे। कोई भोग या भोक्ता अभावग्रस्त न था, कामदेव और लक्ष्मी सदा उपस्थित थे। धर्मात्मा इस पुण्य का माहात्म्य देख आदर करते थे। मुनि इसे धर्म का फल मान प्रसन्न हुए। सौभाग्यवती स्त्रियाँ सुलोचना को मंगलद्रव्यों से युक्त मंडप में ले गईं, अभिषेक कर चैत्यालय में जिनपूजा कराई, शेषाक्षत दिए, और शुभ लग्न की प्रतीक्षा में ठहरीं।
श्लोक 265 से 275 राजाओं का आगमन और कामदेव की उपस्थिति
अकम्पन के संदेश पर भूमिगोचरी और विद्याधर राजा सज्जित हो आसनों पर बैठे, जो देवों से युक्त और कामदेव के रूपों जैसे थे। वे सुलोचना को जीतने की आशा में अहंकारी थे। कामदेव, वसंत ऋतु, मलय पर्वत की सुगंध, कावेरी के कमल, और कोयल-भ्रमरों के स्वरों से युक्त, दक्षिण वायु का सहयोग ले सब देशों को जीतकर वहाँ पहुँचा।
श्लोक 276 से 291 सुलोचना का स्वयंवर मंडप में प्रवेश
राजा अकम्पन, सुप्रभा और कुटुंब के साथ स्वयंवर मंडप में विराजमान हुए। महेंद्रदत्त कंचुकी सुलोचना को अलंकृत रथ पर लाया। हेमांगद ने सेना के साथ रथ की रक्षा की। सुलोचना ने नगाड़ों, छत्र, और राजाओं की दृष्टियों के बीच स्वयंवर शाला में प्रवेश किया, नीलकमल-नेत्रों से राजाओं को सींचा। राजा उसकी दृष्टि से संतुष्ट हुए, और वह भी राजाओं को देख प्रसन्न हुई। कंचुकी के कहने पर वह महल से उतरी, जिससे राजा खिन्न हुए। सुलोचना रथ पर सवार हो कामदेव को स्वीकार कर सबके हृदय आकर्षित करती रही।
श्लोक 292 से 301 सुलोचना की श्रेष्ठता
कामदेव सुलोचना के अंगों में प्रविष्ट हो विकार प्रकट करता था, अपने शरीर-रहित होने को श्रेष्ठ मानता था। सुलोचना लक्ष्मी और रति से श्रेष्ठ थी, जो जयकुमार को प्राप्त होगी। उसका पाणिग्रहण करने वाला सच्चा लक्ष्मीवान होगा। उसका लावण्य समुद्र और सुलोचना में ही था, जिसने राजाओं को आकर्षित किया। समुद्र रत्नाकर होने का अहंकार करता था, पर सुलोचना रूपी रत्न अकम्पन और सुप्रभा के पास था। सुलोचना स्वयंवर भवन में लक्ष्मी-सी पहुँची, राजा प्रेम और शोक के मिश्रित रस में डूबे।
श्लोक 302 से 311 सुलोचना का जयकुमार की ओर अग्रसर होना
महेंद्रदत्त कंचुकी ने रथ को विद्याधर राजाओं की ओर ले जाकर नमि, विनमि, सुनमि, सुविनमि आदि का परिचय दिया। सुलोचना ने सबको छोड़ आगे बढ़ी। विद्याधर आशा में बैठे रहे। रथ भूमिगोचरियों की ओर उतरा। सुलोचना, कोयल की तरह, अर्ककीर्ति आदि को छोड़ जयकुमार के पास पहुँची। कंचुकी ने जयकुमार का गुण-वर्णन प्रारंभ किया।
श्लोक 312 से 321 जयकुमार का गुण-वर्णन
कंचुकी ने जयकुमार को सोमप्रभ का पुत्र, कुलदीपक, और भाइयों से युक्त बताया। उसका रूप वर्णनातीत था। उसने मेघकुमार को जीतकर सिंहनाद किया, जिसके लिए भरत ने उसे वीरपट्ट और मेघस्वर नाम दिया। वह गुणवान, आदरणीयों का संग करता था। उसका दोष केवल चार प्रियाएँ—श्री, कीर्ति, वीरलक्ष्मी, सरस्वती—थीं। वह सुलोचना को जीतने के लिए अधीर था, कामदेव को सहायक बनाकर। उसकी कीर्ति और प्रभा सूर्य-चंद्रमा को निस्तेज करती थी। उसकी प्रीति सुलोचना में फलीभूत होगी।
श्लोक 322 से 331 सुलोचना का जयकुमार को वरण
कामदेव, जयकुमार और सुलोचना का शत्रु, सुलोचना पर निष्ठुर था। सुलोचना ने अपनी दृष्टि से जयकुमार को जीत लिया। कंचुकी के वचनों से लज्जा छोड़, सुलोचना ने जन्मांतर के स्नेह, जयकुमार की आकृति, और कामदेव के प्रभाव से रथ से उतरकर रत्नमाला जयकुमार के गले में डाली। बाजों की ध्वनि से उत्सव गूंजा। जयकुमार का मुख लक्ष्मी से सुशोभित था।
श्लोक 332 से 339 उत्सव का समापन और जयकुमार की महिमा
अन्य राजाओं के मुख म्लान हो गए। अकम्पन, सुलोचना और जयकुमार को लेकर नगर में प्रविष्ट हुए। जयकुमार का यश कल्पान्त तक फैला। वह सूर्य-चंद्रमा को जीतने वाला, सौभाग्यशाली था। लोगों ने उसकी पुण्य, रूप, और सौभाग्य की प्रशंसा की। वह पृथ्वीमंडल को प्रसन्न करता, सदा बढ़ता रहा। जिनेंद्र की उपासना से जयकुमार को लक्ष्मी प्राप्त हुई। श्रद्धावान पुरुषों को जिनेंद्र के चरणों की उपासना की सलाह दी गई।
पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन
श्लोक 1 से 11 दुर्मर्षण का उत्तेजन और अर्ककीर्ति का क्रोध
दुर्मर्षण नामक दुष्ट व्यक्ति, जो राजकुमार अर्ककीर्ति का सेवक था, जयकुमार के वैभव को सहन न कर सका। उसने अन्य राजाओं को उकसाते हुए कहा कि अकम्पन नीच और दुष्ट है, जो झूठे ऐश्वर्य के मद में अर्ककीर्ति का अपमान करना चाहता है। उसने सुलोचना को सर्वोत्तम कन्या रत्न बताकर अर्ककीर्ति को उकसाया कि अकम्पन ने उसका तिरस्कार किया है। दुर्मर्षण ने अर्ककीर्ति को युद्ध के लिए उकसाया, जिससे क्रोधित अर्ककीर्ति ने शत्रुओं को नष्ट करने की प्रतिज्ञा की।
श्लोक 12 से 21 अर्ककीर्ति का उग्र भाषण
अर्ककीर्ति ने क्रोध में कहा कि अकम्पन ने उसका अपमान कर स्वयं विनाश को आमंत्रित किया है। उसने अपनी शक्ति का बखान करते हुए कहा कि उसकी सेना और तलवार शत्रुओं को नष्ट कर देगी। वह जयकुमार की विजय को चुनौती देने और सुलोचना की माला को हरण करने की बात करता है। दुर्मर्षण के उकसावे और अन्य राजाओं के समर्थन से उसका क्रोध और बढ़ गया, जिससे वह युद्ध की तैयारी में जुट गया।
श्लोक 22 से 31 अनवद्यमति का धर्मयुक्त उपदेश
अनवद्यमति नामक बुद्धिमान मंत्री ने अर्ककीर्ति को समझाया कि पृथ्वी, चक्रवर्ती, और वह स्वयं संसार के कल्याण के आधार हैं। क्षमा जैसे गुण चक्रवर्ती और अर्ककीर्ति में ही संनिहित हैं। उन्होंने कहा कि भगवान वृषभदेव द्वारा स्थापित इस कर्मभूमि का पालन अर्ककीर्ति के पिता भरत और बाद में वह स्वयं करेंगे। किसी भी उपद्रव का समाधान करना उनका कर्तव्य है, क्योंकि वे क्षत्रिय हैं।
श्लोक 32 से 41 स्वयंवर की मर्यादा और अकम्पन की महत्ता
अनवद्यमति ने कहा कि स्वयंवर विवाह की प्राचीन और श्रेष्ठ विधि है, जिसमें कन्या अपनी इच्छा से वर चुनती है। इस न्याय का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। उन्होंने अकम्पन को चक्रवर्ती भरत के समान पूज्य बताया और नाथवंश तथा सोमवंश को उनके कुल के सहायक अंग कहा। अकम्पन का सम्मान करना अर्ककीर्ति का कर्तव्य है, क्योंकि पूज्य पुरुषों का अपमान अकल्याणकारी है।
श्लोक 42 से 51 जयकुमार की प्रशंसा और युद्ध का विरोध
अनवद्यमति ने जयकुमार के पराक्रम और दिग्विजय की प्रशंसा की, जो चक्रवर्ती के सेनापति रहे हैं। उन्होंने अर्ककीर्ति को समझाया कि नाथवंश और सोमवंश का नाश करना अनुचित है, क्योंकि इससे चक्रवर्ती क्रोधित होंगे और अधर्म फैलेगा। सुलोचना को जबरदस्ती हासिल करना असंभव है, और अन्य कन्याएँ भी उपलब्ध हैं। युद्ध से कीर्ति के बजाय अपकीर्ति होगी।
श्लोक 52 से 61 अर्ककीर्ति की हठधर्मिता
अर्ककीर्ति ने अनवद्यमति के उपदेश को ठुकरा दिया। उसने स्वीकार किया कि स्वयंवर प्राचीन विधि है और अकम्पन मान्य हैं, लेकिन जयकुमार के प्रति पक्षपात का आरोप लगाया। उसने कहा कि अकम्पन ने कपट से सुलोचना को जयकुमार को दिया। वह जयकुमार को नष्ट करने और अन्याय का निराकरण करने की बात कहता है, यह दावा करते हुए कि उसका पराक्रम और धर्म नष्ट नहीं होगा।
श्लोक 62 से 72 युद्ध की तैयारी
अर्ककीर्ति ने सेनापति को बुलाकर युद्ध का ऐलान किया और भेरी बजवाई। उसकी सेना में हाथी, घोड़े, रथ, और पैदल सैनिक तैयार हो गए। कोलाहल और शस्त्रों की ध्वनि से वातावरण भयंकर हो गया, मानो प्रलयकाल आ गया हो। अर्ककीर्ति ने युद्ध के लिए दृढ़ निश्चय कर लिया।
श्लोक 73 से 81 सेना का प्रस्थान
अर्ककीर्ति की सेना, जिसमें शक्तिशाली हाथी, घोड़े, रथ, और पैदल सैनिक शामिल थे, युद्ध के लिए कूच कर गई। नगाड़ों, घंटियों, और शस्त्रों की ध्वनियों से दिशाएँ गूंज उठीं। सेना का कोलाहल भयावह था, जो युद्ध की भयंकरता को दर्शाता था।
श्लोक 82 से 92 युद्ध का प्रारंभ और राजनैतिक संकट
अर्ककीर्ति विजयघोष नामक हाथी पर सवार होकर अकम्पन की ओर बढ़ा। अकम्पन ने यह समाचार सुनकर दूत भेजा, जो अर्ककीर्ति को समझाने का प्रयास करता है, परन्तु वह अशांत रहा। दूत के लौटने पर अकम्पन व्याकुल और मूर्छित हो गए। जयकुमार ने अकम्पन को सान्त्वना दी और सुलोचना की रक्षा का वचन देते हुए अर्ककीर्ति को बांधने का संकल्प लिया।
श्लोक 93 से 103 जयकुमार की युद्ध
जयकुमार ने क्रोध में आकर मेघघोषा नामक भेरी बजवाई, जिसकी ध्वनि प्रलयकाल के मेघों की गर्जना को मात देती थी। उसकी सेना में उत्साह बढ़ा, और हाथी, घोड़े, रथ, और पैदल सैनिक युद्ध के लिए तैयार हो गए। विशेष रूप से, उसकी सेना में स्त्रियाँ भी योद्धाओं की तरह लड़ रही थीं। जयकुमार विजयार्ध नामक हाथी पर सवार होकर, सेना और छोटे भाइयों के साथ युद्ध के लिए निकला, मानो प्रलयकाल की लहरों को ललकार रहा हो।
श्लोक 104 से 111 अकम्पन और जयकुमार की सेनाएँ
महाराज अकम्पन ने सुलोचना को नित्यमनोहर चैत्यालय में भेजकर स्वयं सेना के साथ युद्ध के लिए निकले। सुकेतु, सूर्यमित्र, श्रीधर, जयवर्मा, और देवकीर्ति जैसे राजा अपनी सेनाओं के साथ जयकुमार से मिले। मेत्रप्रभ नामक विद्याधर भी अपनी तलवार और विद्याधरों के साथ युद्ध में शामिल हुआ। जयकुमार ने मकरव्यूह रचना बनाकर सेना को सुसज्जित किया, जबकि अर्ककीर्ति चक्रव्यूह के साथ सूर्य की तरह चमक रहा था।
श्लोक 112 से 121 युद्ध का प्रारंभ और बाणों का प्रभाव
सुनमि जैसे विद्याधरों ने गरुड़व्यूह बनाया, और आठ चन्द्र नामक विद्याधर अर्ककीर्ति की रक्षा कर रहे थे। दोनों सेनाओं में बाजों की ध्वनि और धनुर्धारी योद्धाओं के बाण युद्धक्षेत्र में छाए। बाणों को पक्षियों, मंत्रियों, और दूतों की तरह वर्णित किया गया, जो तीक्ष्ण, सरल, और शत्रुओं के हृदय को भेदने वाले थे। ये बाण शत्रुओं को मारकर परलोक पहुँचाते थे, मानो पापी जीवों को नरक में ले जाते हों।
श्लोक 122 से 131 बाणों की तुलना और युद्ध की तीव्रता
बाणों की तुलना वेश्याओं, नौकरों, और पक्षियों से की गई, जो रक्त बहाते और शत्रुओं को वश में करते थे। धनुर्धारी योद्धा शत्रु के बाणों का जवाब देते थे, और बाण सन्धि-विग्रह जैसे गुणों से युक्त होकर सिद्धि प्राप्त करते थे। युद्ध में रुधिर की धारा वीररस की तरह सुशोभित थी, और बाण शत्रुओं को भेदकर उनकी मृत्यु का कारण बने।
श्लोक 132 से 141 जयकुमार का पराक्रम
जयकुमार ने क्रोधित होकर वज्रकाण्ड धनुष से युद्ध शुरू किया। उसके बाण दूतों और कपट युद्ध की तरह तीक्ष्ण और प्रभावी थे, जो शत्रुओं के हृदय को भेदते थे। उसने विद्याधरों को भयभीत कर उनके बाणों को नष्ट किया। उसकी सेना ने शत्रुओं को पीछे हटाया, और युद्ध में उसका पराक्रम सूर्य की तरह चमका।
श्लोक 142 से 152 विद्याधरों और भूमिगोचरियों का युद्ध
विद्याधरों के तीक्ष्ण बाण वज्र की तरह योद्धाओं पर गिरे, जिससे युद्धक्षेत्र अंधकारमय हो गया। बाणों ने अकाल मृत्यु को जन्म दिया। विद्याधरों और भूमिगोचरियों के बाणों ने आकाश को ढक लिया, जिससे युद्ध कुछ समय के लिए रुक गया। जयकुमार ने क्रोधित होकर वज्रकाण्ड धनुष से शत्रुओं को भयभीत किया और युद्ध को पुनः तीव्र किया।
श्लोक 153 से 161 जयकुमार की वीरता
जयकुमार के धनुष की टंकार से शत्रु भयभीत हो गए, और उनके बाण अदृश्य होकर शत्रुओं को मार गिराते थे। उसके बाण उल्काओं की तरह दिशाओं को ढक लेते थे। विद्याधरों के मुकुटों से गिरी मणियाँ जयकुमार को भेंट की तरह प्रतीत हुईं। उसने मृत विद्याधरों की स्त्रियों पर दया दिखाई। यमराज की तरह वह अन्यायियों का वध कर धर्मस्वरूप हो गया।
श्लोक 162 से 171 घुड़सवारों का युद्ध
अर्ककीर्ति के घुड़सवार सामने आए, और जयकुमार ने जयतुरंगम घोड़े पर सवार होकर अपनी घुड़सवार सेना को युद्ध की आज्ञा दी। घोड़ों की हिनहिनाहट और तलवारों की चोट से युद्धक्षेत्र भयंकर हो गया। घोड़े और योद्धा परस्पर क्रोधित होकर लड़ते रहे, और तलवारें आकाश में चमकती रहीं। घायल घोड़े अपने स्वामियों को खोजते हुए दौड़ रहे थे।
श्लोक 172 से 182 रथों का युद्ध और जयकुमार की विजय
योद्धा कपिशीर्षक धनुष और तलवारों से युद्ध करते रहे, कुछ अंधे होकर भी लड़ते रहे। जयकुमार ने क्रोधित होकर सिंह की तरह युद्ध किया, और शत्रु की सेना समुद्र की लहरों की तरह पीछे हट गई। रथों के पहियों से खून और मांस की कीचड़ बन गई। जयकुमार ने शस्त्रों से युक्त रथ पर सवार होकर, सूर्य की तरह शत्रुओं के अंधकार को भेदा और युद्ध में विजय प्राप्त की।
श्लोक 183 से 191 जयकुमार का युद्ध कौशल
जयकुमार ने वैद्य की तरह शत्रुओं का रक्त निकाला और तलवार से शत्रुरूपी शल्य को हटाया। उसके बाण धूमकेतु की तरह शत्रुओं की ध्वजाओं को नष्ट करते थे। उसने शत्रुओं को वंशहीन और पौरुषहीन कर दिया। शत्रु उसकी अग्नि को सहन न कर पतंगों की तरह उस पर टूट पड़े। हेमांगद जैसे राजकुमारों ने बाणों की वर्षा की, और रथों के घोड़े युद्ध में अग्नि की तरह दौड़े। दोनों सेनाओं के शस्त्र परस्पर टकराए, जिससे कोई भी शस्त्र शत्रु तक नहीं पहुँचा।
श्लोक 192 से 203 युद्ध की तीव्रता और अर्ककीर्ति का क्रोध
युद्ध में दोनों सेनाएँ एक-दूसरे को जीत न सकीं, क्योंकि जयकुमार को छोड़कर किसी के लिए विजय दुर्लभ थी। जयकुमार ने अर्ककीर्ति की सेना को बाणों से ढक दिया। क्रोधित अर्ककीर्ति ने प्रतिज्ञा की कि वह जयकुमार को मारकर नाथवंश और सोमवंश का नाश करेगा। उसकी सेना के हाथी भयभीत और मंद गति से चल रहे थे, जो अशुभ संकेत दे रहे थे।
श्लोक 204 से 212 जयकुमार का पराक्रम
अर्ककीर्ति के हाथी मंद, भयभीत, और अशुभ संकेतों से युक्त थे। दूसरी ओर, जयकुमार विजयार्ध हाथी पर सवार होकर सिंह की तरह गर्ज रहा था। उसकी सेना की ध्वजाएँ अनुकूल वायु में लहरा रही थीं, और शस्त्रों की दीप्ति से दिशाएँ प्रकाशित हो रही थीं। नगाड़ों और घंटियों की ध्वनि से युद्धक्षेत्र भयंकर हो गया। जयकुमार ने प्रलयकाल की लहरों को ललकारते हुए युद्ध में उत्कृष्टता दिखाई।
श्लोक 213 से 221 युद्ध की वर्षा ऋतु समान शोभा
युद्धक्षेत्र वर्षा ऋतु की तरह सुशोभित था, जिसमें हाथी मेघ, बाण मयूर, तलवारें बिजलियाँ, और रुधिर जल के समान थे। दोनों सेनाओं के शस्त्रों का आदान-प्रदान हुआ। आकाश गिद्धों, ध्वजाओं, और शस्त्रों से भर गया। जयकुमार ने सुलोचना को जयलक्ष्मी की सौत बनाने की इच्छा से अर्ककीर्ति पर आक्रमण किया। अष्टचन्द्र विद्याधरों ने उसे रोका, लेकिन जयकुमार उत्साह से देदीप्यमान रहा।
श्लोक 222 से 232 हाथियों का युद्ध और योद्धाओं की मृत्यु
हाथियों का युद्ध पर्वतों की टक्कर जैसा था। भद्र जाति के हाथी यमराज की तरह लड़े, जबकि मृगजाति के हाथी भय से भागे। शक्तिशाली योद्धा शस्त्रों से शत्रुओं को परास्त करते थे। कई योद्धाओं ने मृत्यु के समय अर्हंत का स्मरण कर स्वर्ग गति प्राप्त की। युद्धक्षेत्र रुधिर और मृत शरीरों से भरा था, जो जयकुमार की विजयलक्ष्मी को दर्शाता था।
श्लोक 233 से 241 जयकुमार और विद्याधरों का युद्ध
जयकुमार के बाणों ने अष्टचन्द्र विद्याधरों को घेरा, जिन्हें उन्होंने विद्या बल से रोका। सुनमि ने शत्रुओं पर बाणों की वर्षा की, लेकिन मेघप्रभ ने जयकुमार की आज्ञा से सुनमि के विद्यामयी बाणों को नष्ट कर उसे परास्त किया। जयकुमार की सेना ने अर्ककीर्ति के पक्ष को रोका, और उसका पराक्रम बढ़ता गया।
श्लोक 242 से 251 मेघप्रभ की विजय और जयकुमार का संदेश
मेघप्रभ ने सुनमि को परास्त किया, जिससे जयकुमार की विजय पुष्ट हुई। जयकुमार ने अर्ककीर्ति को संदेश दिया कि चक्रवर्ती के न्याय मार्ग का पालन करना चाहिए। उसने अर्ककीर्ति के क्रोध को दुराचारियों का परिणाम बताया और युद्ध बंद करने की सलाह दी। उसने कहा कि अन्याय से चक्रवर्ती को पीड़ा होगी और वह दुष्टों को बाँधकर अर्ककीर्ति को सौंप देगा।
श्लोक 252 से 261 जयकुमार की युद्ध निपुणता
जयकुमार ने अर्ककीर्ति से युद्ध बंद करने की प्रार्थना की, लेकिन अर्ककीर्ति ने उसके वचनों को अनसुना कर युद्ध जारी रखा। जयकुमार ने अपने विजयार्ध हाथी से अर्ककीर्ति और अष्टचन्द्र के नौ हाथियों को घायल कर गिराया। युद्ध के बीच सूर्यास्त हो गया, जो अर्ककीर्ति की पराजय का प्रतीक था।
श्लोक 262 से 271 सूर्यास्त और अर्ककीर्ति की पराजय
सूर्य का अस्त होना अर्ककीर्ति की पराजय का संकेत था। सूर्य की तुलना एक दोषयुक्त राजा से की गई, जो क्रूर, असहनशील, और अन्यायी है। उसकी किरणें संताप देती हैं, और वह सहायकों के बिना नष्ट हो जाता है। विद्वानों ने कहा कि जब सूर्य जैसा उपमान नष्ट हो गया, तो अर्ककीर्ति की हार निश्चित थी। युद्धक्षेत्र में जयकुमार की विजयलक्ष्मी स्थापित हुई।
श्लोक 272 से 281 चन्द्रमा का उदय और युद्ध का विराम
चन्द्रमा का उदय हुआ, जो अंधकार को दूर करने के लिए अमृत से भरे चांदी के कलश की तरह प्रतीत हुआ। उसकी किरणें अंधकार को पी रही थीं, मानो क्षय रोग का नाश करने के लिए धूम्रपान कर रही हों। हालांकि, चन्द्रमा पूर्ण रूप से अंधकार नष्ट करने में असमर्थ था, क्योंकि उसका मंडल अशुद्ध और प्रतापहीन था। युद्धक्षेत्र में रात्रि के आगमन के साथ युद्ध थम गया।
श्लोक 282 से 291 चन्द्रमा का प्रभाव और स्त्रियों की भावनाएँ
चन्द्रमा की किरणों से तालाबों में कुमुद खिल उठे, जो मानो प्रसन्नता से चन्द्रमा को निहार रहे थे। विरहिणी स्त्रियाँ चन्द्रमा को देखकर दुखी हुईं, क्योंकि उसकी किरणें उन्हें संताप दे रही थीं। कुछ स्त्रियों ने कामदेव के प्रभाव से मद्य त्याग दिया, जबकि अन्य ने पति के हाथ से मद्य पीकर आनंद लिया। चन्द्रमा का प्रकाश कामदेव के अट्टहास की तरह फैल गया, जिससे राग और प्रेम की भावनाएँ प्रबल हुईं।
श्लोक 292 से 301 युद्ध में मृत योद्धाओं की स्त्रियों का विलाप
कई स्त्रियाँ अपने पतियों को शत्रु के बाणों से मृत देखकर स्वयं मर गईं। कुछ ने वीरलक्ष्मी की ईर्ष्या में प्राण त्यागे, तो कुछ ने पति को अप्सराओं के साथ स्वर्ग में जाने की कल्पना कर विलाप किया। योद्धा अपनी स्त्रियों की प्रतीक्षा में मृत्यु के कगार पर थे, और कुछ ने पत्नी के प्रेम में प्राण छोड़े। युद्धक्षेत्र में प्रेम और शोक का मिश्रण देखने को मिला।
श्लोक 302 से 311 योद्धाओं और स्त्रियों का प्रेम और शोक
कुछ योद्धा यमराज के हाथों से कामदेव द्वारा छुड़ाए गए, क्योंकि वे अपनी पत्नी की चिंता में डूबे थे। कुछ ने पत्नी के साथ मृत्यु को गले लगाया। स्त्रियाँ अपने पतियों से स्वर्ग में मिलने की बात कहकर संतुष्ट करती थीं, जबकि अन्य ने वीरलक्ष्मी और कीर्ति के लिए पति को प्रेरित किया। कामदेव के बाणों को स्त्रियों के लिए यमराज समान बताया गया, जो पुरुषों को कम और स्त्रियों को अधिक कष्ट देते थे। रात्रि के अंत में संध्या की लाली युद्ध को देखने आई।
श्लोक 312 से 322 युद्ध का पुनरारंभ और जयकुमार की तैयारी
प्रभात में बाजों की ध्वनि से दिशाएँ गूँज उठीं। सूर्योदय के साथ पूर्व दिशा शोभित हुई। सेनापतियों ने व्रत पालन कर, जिनेन्द्र की पूजा की और युद्ध के लिए तैयार हुए। जयकुमार रिंजय रथ पर सवार होकर, वज्रकाण्ड धनुष लेकर युद्धक्षेत्र में खड़ा हुआ, जो यमराज की तरह
श्लोक 323 से 331 जयकुमार और अर्ककीर्ति का युद्ध
अर्ककीर्ति अपने रथ पर सवार होकर जयकुमार पर आक्रमण करने आया, लेकिन उसकी ध्वजा और शस्त्र जयकुमार के बाणों से नष्ट हो गए। जयकुमार ने अष्टचन्द्र विद्याधरों के बाणों को रोककर हेमांगद और अनंतसेन के साथ युद्ध किया। दोनों पक्षों के राजा परस्पर
श्लोक 332 से 341 जयकुमार की विजय
जयकुमार के मित्र देव ने उसे नागपाश और अर्द्धचन्द्र बाण दिए। जयकुमार ने इन बाणों से अष्टचन्द्र विद्याधरों और उनके रथों को नष्ट कर दिया। अर्ककीर्ति पराजित होकर चेष्टाहीन खड़ा रहा। जयकुमार ने उसे और अन्य शत्रु राजाओं को नागपाश से बाँध लिया।
श्लोक 342 से 352 युद्ध का अंत और काशी में प्रवेश
जयकुमार ने अर्ककीर्ति को अकम्पन को सौंप दिया। उसने मृतकों का दाह संस्कार कराया और जीवितों की चिकित्सा की। वह मेघप्रभ के साथ काशी में प्रवेश कर विजयी हुआ। अकम्पन ने बंधे हुए राजाओं को समझाकर उनके योग्य स्थान पर भेजा। सभी ने नित्यमनोहर चैत्यालय में अर्हंत की वंदना की।
श्लोक 353 से 361 जिनेन्द्र की स्तुति
जयकुमार ने भक्ति के साथ जिनेन्द्र की स्तुति की, जिसमें उनके चरणों में भय का नाश और कर्मों का क्षय होने की बात कही गई। जिनेन्द्र की शरण लेने से सारी आपत्तियाँ नष्ट हो जाती हैं और मोक्ष प्राप्त होता है। अर्ककीर्ति ने पराजय के कारण वीरलक्ष्मी के वियोग में शोक प्रकट किया।
श्लोक 362 से 367 जयकुमार की महिमा और पर्व का समापन
जयकुमार की विजयलक्ष्मी सूर्य की तरह चमकी। उसने सुलोचना के साथ विवाह की इच्छा प्रकट की और यशरूपी सेहरा धारण किया। यह पर्व विजय के लिए जिनेन्द्र की शरण लेने का महत्व दर्शाता है। गुणभद्राचार्य द्वारा रचित त्रिषष्टिलक्षण महापुराण का यह चवालीसवाँ पर्व जयकुमार की विजय के साथ समाप्त होता है।
पर्व 45 – जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन
श्लोक 1 से 11 युद्धोपरांत शान्ति और सुलोचना का सत्कार
युद्ध समाप्त होने के बाद जयकुमार अपने विशाल निवास में ठहर गया। महाराज अकम्पन ने जिनेन्द्रदेव की स्तुति की और कायोत्सर्ग में खड़ी सुलोचना का सत्कार किया। उन्होंने सुलोचना को आश्वासन दिया, उसके गुणों की प्रशंसा की तथा नियम संकोच करने की आज्ञा दी। फिर राजभवन में प्रवेश कर सुलोचना को उसके महल में भेज दिया। अकम्पन ने मंत्रियों से विचार कर विद्याधर राजाओं को मुक्त किया और उनका सत्कार किया।
श्लोक 12 से 21 अकम्पन द्वारा अर्ककीर्ति को क्षमा और समझाना
अकम्पन ने अर्ककीर्ति से कहा कि नाथवंश और सोमवंश दोनों उसके द्वारा ही स्थापित और बढ़ाए गए हैं। महात्मा लोग अपराध क्षमा करते हैं। उन्होंने अर्ककीर्ति को सूर्य के समान बताया और उसके क्रोध को पूर्वजन्म के पाप का फल कहा। जयकुमार को उसका सेवक बताकर अपराध न मानने की सलाह दी। सुलोचना छोटी बात है, सब कुछ अर्ककीर्ति का ही है। उन्होंने अर्ककीर्ति को दूसरी पुत्री लक्ष्मीमती (अक्षमाला) देने का प्रस्ताव रखा।
श्लोक 22 से 31 : संधि, विवाह और विदाई
अकम्पन ने अर्ककीर्ति को प्रसन्न कर महाभिषेक और शान्तिपूजा कराई। जयकुमार को भी बुलाकर दोनों में संधि कराई और अत्यन्त प्रेम उत्पन्न किया। अर्ककीर्ति को अक्षमाला कन्या, वैभव और सम्पदा देकर सम्मानपूर्वक विदा किया। अन्य विद्याधर और भूमिगोचरी राजाओं को भी रत्न, हाथी, घोड़े देकर बिदा किया। सभी लोग लज्जा और वैर त्यागकर अपने नगर लौट गए।
श्लोक 32 से 41 : जयकुमार-सुलोचना विवाह और दूत प्रेषण
देव ने सुलोचना-जयकुमार विवाह का उत्सव सम्पन्न किया। जयकुमार ने सहायकों को धन देकर बिदा किया। अकम्पन ने जयकुमार से सलाह कर सुमुख दूत को चक्रवर्ती के पास भेजा। दूत ने चक्रवर्ती को प्रणाम कर अकम्पन का संदेश सुनाया कि सुलोचना जयकुमार को स्वयंवर में दी गई थी। अर्ककीर्ति ने विरोध किया, किसी दुष्ट ने उसे भड़काया।
श्लोक 42 से 51 : दूत द्वारा चक्रवर्ती को विस्तृत संदेश
दूत ने कहा कि अर्ककीर्ति युवा है, दोष हमारा है। अकम्पन ने स्वयंवर में सबकी सहमति ली थी। चक्रवर्ती सर्वज्ञ हैं, सब जानते हैं। अकम्पन ने अपराध स्वीकार कर दण्ड की प्रार्थना की—फांसी, क्लेश या धन हरण। उन्होंने कहा कि आपकी आज्ञा से हम लोक-परलोक में धन्य होंगे।
श्लोक 52 से 61 : चक्रवर्ती भरत का उत्तर
चक्रवर्ती ने दूत को पास बुलाया और कहा कि अकम्पन उनके पिता तुल्य और ज्येष्ठ हैं। स्वयंवर मार्ग अकम्पन द्वारा ही चलाया गया। उनका चक्रवर्तीपन जयकुमार के पराक्रम से है। अर्ककीर्ति ने अकीर्ति फैलाई। जयकुमार ने न्याय किया। अपराधी को दण्ड देना उचित है, चाहे वह पुत्र ही क्यों न हो।
श्लोक 62 से 72 चक्रवर्ती का न्यायपूर्ण निर्णय
चक्रवर्ती ने कहा कि अकम्पन ने अक्षमाला देकर अर्ककीर्ति को पूज्य बना दिया। उन्होंने अर्ककीर्ति को दण्ड न देकर न्याय को प्राथमिकता दी। दूत ने दोनों का प्रणाम निवेदन किया। चक्रवर्ती ने दूत को प्रसन्न कर वापस भेजा। दूत ने लौटकर अकम्पन और जयकुमार को प्रसन्न किया।
श्लोक 73 से 81 जयकुमार का ससुराल में सुख
दूत को सम्मानित किया गया। जयकुमार सुख से श्वसुर गृह में रहा। सुलोचना के प्रति उसका प्रेम बढ़ा। कामदेव के फूलों के बाणों से वह घायल हुआ। जयकुमार ने सुलोचना की लज्जा दूर की, उसे हँसाया, निर्भय किया। दोनों ने परस्पर प्रेम में समय व्यतीत किया।
श्लोक 82 से 91 सुलोचना और जयकुमार का प्रेमालाप
सुलोचना का मन कामदेव से प्रभावित हुआ। उसकी लज्जा, भय और धैर्य कम होने लगा। दोनों ने परस्पर सुख प्राप्त किया। वे एक-दूसरे की इच्छा पूरी करते रहे। संभोग के अंत में दोनों असमर्थ हुए, पर आनन्द में डूबे रहे। उनकी दृष्टियाँ एक-दूसरे में खो गईं।
श्लोक 92 से 103 जयकुमार की वापसी
जयकुमार ने अकम्पन से जाने की इच्छा व्यक्त की। अकम्पन व्याकुल हुए, पर सहमति दी। शुभ दिन में वधू-वर को धन-रत्न देकर विदा किया। अकम्पन कुछ दूर तक साथ गए और शोक में लौट आए। जयकुमार अपनी प्रजा के पास लौट गया।
श्लोक 104 से 113 जयकुमार का गंगा तट पर पड़ाव और अयोध्या प्रस्थान
जयकुमार सुलोचना सहित विजयार्ध हाथी पर सवार होकर छोटे भाइयों, हेमांगद आदि के साथ उत्सवपूर्ण मार्ग पर गंगा तट की ओर चला। गंगा किनारे यथोचित स्थान पर सेना का पड़ाव डाला। पड़ाव स्वर्ग जैसा सुशोभित था। जयकुमार ने सुलोचना को उतारा, उसे सुख से विराजमान किया, विनोदों से संतुष्ट किया। रात्रि व्यतीत कर सुलोचना और हेमांगद आदि को वहीं रखा तथा कुछ साथियों के साथ अयोध्या की ओर प्रस्थान किया।
श्लोक 114 से 123 अयोध्या में प्रवेश और चक्रवर्ती से मिलन
अयोध्या पहुँचने पर अर्ककीर्ति आदि ने स्वागत किया। जयकुमार ने प्रेम से अयोध्या में प्रवेश किया। राजभवन के बाह्य द्वार पर हाथी से उतरा और रत्नमण्डप में चक्रवर्ती भरत के समक्ष पहुँचा। भरत सिंहासन पर सूर्य की तरह सुशोभित थे। जयकुमार ने आठ अंगों से प्रणाम किया। भरत ने उसे पास बिठाया और प्रसन्न किया। जयकुमार तेज से सुशोभित हुआ।
श्लोक 124 से 131 चक्रवर्ती का प्रेमपूर्ण वार्तालाप
चक्रवर्ती ने जयकुमार से पूछा कि बहू को क्यों नहीं लाए, विवाह में क्यों नहीं बुलाया। जयकुमार ने अपराधी की तरह मुँह नीचा किया और विनम्र होकर उत्तर दिया। उसने स्वयंवर की विधि और दैव के उलट प्रभाव का उल्लेख किया। युद्ध शान्त होने पर चरणों में आया।
श्लोक 132 से 141 जयकुमार की विनम्रता और भरत का सत्कार
जयकुमार ने कहा कि वह चक्रवर्ती के चरणों के भ्रमर हैं। भरत ने उसे वस्त्र, आभूषण, सवारी से सत्कारा। सुलोचना के लिए भी भेंट दी। जयकुमार ने प्रणाम कर विदा ली। नगर से बाहर निकलकर गंगा तट पर पहुँचा।
श्लोक 142 से 152 गंगा में संकट और गंगादेवी की रक्षा
मार्ग में कौए के शकुन से जयकुमार मूर्छित हुआ। पुरोहित ने आश्वासन दिया। हाथी गढ़े में चला गया। कालिका देवी (मगर रूप में) ने हाथी को पकड़ा। सुलोचना ने पंचनमस्कार मंत्र स्मरण कर कायोत्सर्ग किया। गंगादेवी ने सबको बचाया और सुलोचना की पूजा की।
श्लोक 153 से 160 सुलोचना की पूर्व कथा और गंगादेवी का परिचय
सुलोचना ने बताया कि विन्ध्यश्री उसकी सहेली थी, जो सर्पदंश से मरकर गंगादेवी बनी। गंगादेवी ने सुलोचना के मंत्र से देवीत्व प्राप्त किया। जयकुमार ने विदा की। सब डेरे में लौटे।
श्लोक 161 से 181 गंगा तट पर यात्रा और हस्तिनागपुरी प्रवेश
जयकुमार ने सुलोचना को गंगा की सुन्दरता का वर्णन किया। गंगा को प्रेममयी बताया। कुरुजांगल पहुँचकर हस्तिनागपुरी में प्रवेश किया। नगरी सुलोचना की तरह सुशोभित थी। राजभवन में सुखपूर्वक निवास किया।
श्लोक 182 से 191 सुलोचना का पट्टबन्ध और विदाई
शुभ लग्न में सुलोचना का पट्टबन्ध किया। हेमांगद आदि को भोग, विनोद, सवारी से संतुष्ट किया। रत्न, धन देकर बनारस विदा किया। हेमांगद आदि अकम्पन के पास पहुँचे और प्रसन्न रहे।
श्लोक 192 से 201 अकम्पन का वैराग्य और दीक्षा
अकम्पन ने शरीर की असारता पर विचार कर वैराग्य प्राप्त किया। शरीर को अपवित्र बताया। संसार की अनित्यता समझी। हेमांगद का राज्याभिषेक किया। वृषभदेव के समीप दीक्षा ली और केवलज्ञान प्राप्त किया।
श्लोक 202 से 211 जयकुमार-सुलोचना का प्रेम सुख
जयकुमार सुलोचना के प्रेम में डूबा रहा। इन्द्रियों से सुख प्राप्त किया। दोनों ने परस्पर अनुकूल रहकर संभोग सुख भोगा। प्रेम पूर्णता को प्राप्त हुआ।
श्लोक 212 से 219 : संभोग सुख की सीमा और पर्व समापन
दोनों ने संभोग के सुख को चरम तक पहुँचाया, पर इच्छाएँ पूरी नहीं हुईं। आचार्य ने कहा कि विषय सुख की भी निन्दा है। पर्व जयकुमार-सुलोचना के सुख भोग वर्णन के साथ समाप्त हुआ।
पर्व 46 – जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन
श्लोक 1 से 13 पूर्वजन्म स्मरण और मूर्च्छा
जयकुमार महल की छत पर बैठा था। विद्याधर दम्पति को देखकर वह ‘हा मेरी प्रभावती’ कहकर मूर्छित हो गया। सुलोचना ने कबूतर युगल देखकर ‘हा मेरे रतिवर’ कहकर मूर्छा प्राप्त की। दासियों के शीतलोपचार से दोनों प्रबोध को प्राप्त हुए। जयकुमार ने सुलोचना को अनुनय-विनय से समझाया। दोनों को अवधिज्ञान प्राप्त हुआ। सौतें ईर्ष्या से सुलोचना की माया पर टिप्पणी करने लगीं। जयकुमार ने सुलोचना से पूर्वभव कथा कहने को कहा।
श्लोक 14 से 21 पूर्वभव कथा का प्रारम्भ
सुलोचना ने पूर्वभव कथा शुरू की। पूर्व विदेह क्षेत्र में पुण्डरीकिणी नगरी में राजा प्रजापाल थे। राजशेठ कुबेरमित्र थे। उनके महल में रतिवर नामक बुद्धिमान कबूतर रहता था। वह सेठ के हाथ पर बैठता, धान खाता, अहिंसा चिन्तन करता, मुनियों की सेवा करता। रतिवर और रतिषेणा कबूतरी साथ क्रीड़ा करते थे। सुलोचना ने कहा कि रतिवर ही जयकुमार और रतिषेणा ही वह (सुलोचना) थे।
श्लोक 22 से 31 कुबेरकान्त का जन्म और सुख
कुबेरमित्र की स्त्री धनवती से कुबेरकान्त पुत्र हुआ। उसका मित्र प्रियसेन था। कामधेनु ने उसके लिए धान्य, ईख, वीणा, गंगा जल, कल्पवृक्ष आदि प्रदान किए। कुबेरकान्त ने सभी भोगों का उपभोग किया।
श्लोक 32 से 40 कुबेरकान्त का विवाह
कुबेरकान्त का विवाह समुद्रदत्त सेठ की पुत्री प्रियदत्ता से हुआ। राजकुमारियों यशस्वती और गुणवती ने वैराग्य धारण किया। राजा प्रजापाल ने भी संयम लिया। लोकपाल ने राज्य संभाला।
श्लोक 41 से 51 फल्गुमति मंत्री की दुष्टता
मंत्री फल्गुमति ने सेठ कुबेरमित्र को राजा से दूर करने की चेष्टा की। उसने पहरेदार को रिश्वत देकर राजा से कहलवाया कि सेठ बिना बुलाए न आएँ। राजा ने सेठ को दूर रखा।
श्लोक 52 से 61 मणि भ्रम और सेठ की बुद्धिमत्ता
राजा ने बावड़ी में मणि देखी, पर वह वृक्ष पर थी। सेठ ने भ्रम दूर किया। राजा ने अपनी मूर्खता और मंत्री की दुष्टता समझी। सेठ को सदा पास रखा और राज्य भार सौंपा।
श्लोक 62 से 71 सेठ का वैराग्य और तप
सेठ की स्त्री ने सेठ के बाल देखे। सेठ ने राजा छोड़कर देवगिरि पर तप लिया। दोनों ब्रह्मलोक गए।
श्लोक 72 से 81 प्रियदत्ता का पुण्य और पूर्वजन्म ज्ञान
प्रियदत्ता ने चारण मुनि को दान दिया। मुनि ने बताया कि पाँच पुत्र और एक पुत्री होगी। अमितमति, अनन्तमति आदि आयिकाएँ आईं। राजा लोकपाल और सेठ ने धर्म सुना।
श्लोक 82 से 92 रतिवर-रतिषेणा का पूर्वजन्म प्रकट
जंघाचारण मुनि आए। रतिवर-रतिषेणा ने प्रणाम किया। दोनों ने पूर्वजन्म नाम लिखे। प्रियदत्ता ने रतिवर को अपना पूर्व पति पहचाना। सभा प्रसन्न हुई। सुलोचना ने कथा जारी रखने की इच्छा व्यक्त की।
श्लोक 93 से 100 मुनियों का प्रस्थान और व्रत नियम
मुनि आहार त्याग कर सेठ के घर से चले गए। राजा ने अमितमति गणिनी से कारण पूछा। अमितमति ने धान्यकमाल वन के पास शोभानगर का वर्णन किया। वहाँ राजा प्रजापाल और रानी देवश्री थे। सामंत शक्तिषेण और पत्नी अटवीश्री के पुत्र सत्यदेव थे। सभी ने धर्मोपदेश सुना, मद्य-मांस त्यागा, उपवास व्रत लिया। शक्तिषेण ने मुनियों के बाद भोजन करने का नियम लिया। अटवीश्री ने पाँच वर्ष तक विशेष उपवास किया। सत्यदेव ने साधु स्तवन का व्रत लिया।
श्लोक 101 से 111 भवदत्त (दुर्मुख) की दुष्टता और विवाह विवाद
मृणालवती में राजा धरणीपति थे। सेठ सुकेतु के पुत्र भवदत्त (दुर्मुख) दुराचारी था। श्रीदत्त सेठ की पुत्री रतिवेगा थी। अशोकदेव की पुत्री सुकान्त से रतिवेगा का विवाह हुआ। भवदत्त ने विवाह रोका, पर असफल रहा। वधू-वर शक्तिषेण की शरण में गए। भवदत्त ने हठ किया, पर शक्तिषेण के भय से लौट गया। शक्तिषेण ने मुनियों को आहार दान दिया।
श्लोक 112 से 122 : मेरुकदत्त सेठ और हीनांग व्यक्ति
सर्पसरोवर के पास सेठ मेरुकदत्त ठहरे थे। उनकी पत्नी धारिणी थी। चार मंत्री—भूतार्थ, शकुनि, बृहस्पति, धन्वन्तरि थे। एक हीनांग व्यक्ति आया। मंत्री अलग-अलग कारण बताए। भूतार्थ ने पूर्वजन्म की हिंसा बताया। सत्यदेव के पिता ने उसकी अकर्मण्यता बताई। सत्यदेव ने निदान किया और द्रव्यलिंगी मुनि बनकर लोकपाल हुआ।
श्लोक 123 से 132 पुण्य और पूर्वजन्म स्मरण
शक्तिषेण-अटवीश्री ने आहार दान कर पंचाश्चर्य प्राप्त किए। मेरुकदत्त-धारिणी ने निदान किया कि वे उनकी संतान होंगे। मंत्री तप कर लोकपाल पर्याय प्राप्त किए। सुकान्त-रतिवेगा ने अनुमोदना से पुण्य प्राप्त किया। वसुमती को पूर्वजन्म स्मरण हुआ, वह मूर्छित हुई। अमितमति ने बताया कि वसुमती देवश्री थी, लोकपाल प्रजापाल था। प्रियदत्ता को भी स्मरण हुआ, वह अटवीश्री थी, कुबेरकान्त शक्तिषेण था। मंत्री कामधेनु-कल्पवृक्ष बने।
श्लोक 133 से 141 भवदत्त का प्रभाव और नए जन्म
सत्यक देव बनकर रक्षा करता है। भवदत्त ने रतिवेगा-सुकान्त को जलाया, वे कबूतर-कबूतरी बने। मेरुकदत्त-धारिणी कुबेरकान्त के माता-पिता बने। मुनि विजयार्ध पर्वत पर थे। उन्होंने पाँच पुत्र-एक पुत्री का संकेत दिया। रत्नवृष्टि आदि से वे इस जन्म में आए, पर कबूतर देखकर लौट गए। वे पिता और गुरु थे।
श्लोक 142 से 151 कबूतरों का मृत्यु और नए जन्म
धनवती और कुबेरसेना ने दीक्षा ली। बिलाव (भवदत्त) ने कबूतरों को मार डाला। रतिवर हिरण्यवर्मा और रतिषेणा प्रभावती बने। उनके माता-पिता पूर्वजन्म के माता-पिता ही बने।
श्लोक 152 से 162 प्रभावती का स्वयंवर
वायुरथ ने प्रभावती का स्वयंवर तय किया। प्रभावती ने गतियुद्ध जीतने वाले को वर चुना। कोई सफल नहीं हुआ। हिरण्यवर्मा ने माला ली। दोनों का प्रेम बढ़ा। प्रभावती को पूर्वजन्म स्मरण हुआ।
श्लोक 163 से 170 पूर्वजन्म स्मरण और प्रेम
हिरण्यवर्मा ने पूर्वजन्म लिखा। प्रभावती ने भी लिखा। दोनों का प्रेम दुगुना हुआ। मंगलाभिषेक हुआ। चारण मुनि से पूर्वभव सुना—तीसरे जन्म में रतिवेगा-सुकान्त थे।
श्लोक 171 से 181 वायुरथ का वैराग्य
मुनि ने बताया कि शक्तिषेण ने दान दिया, अनुमोदना से पुण्य मिला। वायुरथ ने संसार की नश्वरता देख वैराग्य धारण किया। राज्य मनोरथ को सौंपा। भाई-बन्धुओं ने रतिप्रभा का विवाह चित्ररथ से तय किया।
श्लोक 182 से 194 हिरण्यवर्मा का वैराग्य और दीक्षा
महाराज आदित्यगति ने हिरण्यवर्मा का अभिषेक कर राज्य सौंपा और वायुरथ के साथ मुनि के समीप संयम धारण किया। सुलोचना ने कहा कि रतिवेगा, रतिषेणा और प्रभावती तीनों वह स्वयं थी। जयकुमार ने भी तीनों भवों में वह उनका पति था। हिरण्यवर्मा धान्यकमाल वन में सर्पसरोवर देखकर पूर्वभव स्मरण कर वैराग्य प्राप्त हुआ। उसने संसार की क्षणभंगुरता, शरीर की असारता, भोगों की अनित्यता पर विचार कर राज्य पुत्र सुवर्णवर्मा को सौंपा और श्रीपाल गुरु के समीप दीक्षा ली।
श्लोक 195 से 211 हिरण्यवर्मा का वैराग्य-विचार
हिरण्यवर्मा ने शरीर को अपवित्र, संसार को दुःखमय, भोगों को सर्प-फण समान बताया। तृष्णा की अग्नि बढ़ने, इष्ट-अनिष्ट की अनिश्चितता पर विचार किया। जीव के रूप-रहित स्वरूप और मोक्ष की आवश्यकता समझी। बंधन के कारणों का नाश करने का संकल्प लिया। प्रभावती ने भी माता शशिप्रभा के साथ गुणवती आयिका के समीप तप धारण किया।
श्लोक 212 से 221 हिरण्यवर्मा का तप और पुण्डरीकिणी आगमन
हिरण्यवर्मा सूर्य की तरह तप से देदीप्यमान हुआ। प्रभावती भी आयिका के साथ रहने लगी। प्रियदत्ता ने पूछा कि अमितमति कहाँ हैं? प्रभावती ने बताया कि वह स्वर्ग गई। प्रभावती ने कहा कि वह रतिषेणा थी। प्रियदत्ता ने आश्चर्य व्यक्त किया। प्रभावती ने कुबेरकान्त को रतिवर बताया।
श्लोक 222 से 232 गांधारी की माया और सेठ का संयम
प्रभावती ने गांधारी की माया का वर्णन किया। गांधारी ने कुबेरकान्त को नपुंसक समझा। सेठ ने गांधारी को विरक्त किया। गांधारी ने संयम लिया। प्रभावती ने पाँच पुत्रों का वर्णन किया। गांधारी ने पुनः आकर सेठ से पूछा। सेठ और राजा ने मुनि से धर्म जाना।
श्लोक 233 से 241 लोकपाल और सेठ की दीक्षा
लोकपाल ने राज्य गुणपाल को सौंपा और रतिषेण मुनि के समीप संयम लिया। सेठ ने कुबेरप्रिय को पद सौंपा और पुत्रों के साथ दीक्षा ली। प्रियदत्ता विरक्त हो पुत्री कुबेरश्री को गुणपाल को दी और गुणवती आयिका के समीप दीक्षा ली।
श्लोक 242 से 255 मुनिराज का उपसर्ग और स्वर्ग प्राप्ति
हिरण्यवर्मा ने श्मशान में प्रतिमायोग लिया। विद्युच्चोर ने प्रियदत्ता की दासी से वृत्तांत सुना और क्रोध से विभंगावधि प्राप्त की। उसने हिरण्यवर्मा-प्रभावती को जलाया। दोनों उपसर्ग सहन कर स्वर्ग गए। सुवर्णवर्मा ने प्रतिज्ञा की। देव-देवी ने संयमी रूप धारण कर पुत्र को क्रोध से मुक्त किया और दिव्यरूप प्रकट कर आभूषण दिए।
श्लोक 256 से 271 केवलज्ञान और पूर्वभव कथा
शिवघोष मुनि को केवलज्ञान हुआ। इन्द्र ने पूछा। भगवान ने बताया कि पुष्पपालिता और पुष्पवती मालिन की लड़कियाँ थीं। उन्होंने श्रावक व्रत लिया। सर्प से मरकर देवियाँ बनीं। हिरण्यवर्मा-प्रभावती ने भी पूर्वभव सुना। भीम मुनि ने धर्मोपदेश दिया।
श्लोक 272 से 286 भीम मुनि का पूर्वजन्म और दीक्षा
भीम मुनि ने बताया कि पिता ने व्रत गुरु का स्थान पूछा। रास्ते में विभिन्न पापियों को दण्ड मिलते देखे—वज्रकेतु ने मुर्गा मारा, धनदेव ने धरोहर छिपाई, रतिपिंगल ने हार चुराया, कोतवाल ने परस्त्रीगमन किया, किसान लोल ने पुत्र मारा, सागरदत्त ने जुए में धन जीता, आनन्द महाराज के पुत्र ने मेढ़ा मारा, मद्यपानिनी ने बालक मारा। इन दण्डों से पाप का फल इस लोक और परलोक में बुरा होने का निश्चय हुआ। भीम ने पिता छोड़कर मोक्ष के लिए दीक्षा ली।
श्लोक 287 से 296 : भीम मुनि का ज्ञान और विद्यद्वेग चोर की कथा
गुरु प्रसाद से भीम शास्त्रों में पारंगत हुए। सर्वज्ञ देव से पूर्वजन्म सुने। पुण्डरीकिणी में राजा वसुपाल थे। कोतवाल ने विद्यद्वेग चोर पकड़ा। चोर ने धन विमति को दिया। विमति ने इंकार किया। धन उसके घर मिला। दण्ड में तीन विकल्प—विष्ठा खाना, मुक्के सहना, धन देना। चोर ने तीनों सहे और नरक गया। राजा ने चाण्डाल से मारने को कहा। चाण्डाल ने अहिंसा व्रत के कारण इंकार किया। राजा ने दोनों को बाँध दिया।
श्लोक 297 से 313 चाण्डाल की कथा और उत्पलमाला का शील व्रत
चाण्डाल ने कहा कि गुणपाल के समय कुबेरप्रिय सेठ थे। नाट्यमालिका की पुत्री ने नृत्य किया। उत्पलमाला वेश्या ने कहा कि कुबेरप्रिय को विचलित नहीं कर सकी। राजा ने शील व्रत वर दिया। सर्वरक्षित कोतवाल रात में गया। उत्पलमाला ने रजस्वला होने का बहाना बनाया। मंत्री पुत्र और पृथुधी आए। उत्पलमाला ने कोतवाल को संदूक में छिपाया। पृथुधी ने धन माँगा। सत्यवती ने धन लाकर रख दिया। राजा ने पृथुधी को मारने का आदेश दिया।
श्लोक 314 से 322 सेठ का प्रतिमायोग और उपद्रव
राजा के मुख्य हाथी को पूर्वभव स्मरण हुआ। उसने मांस त्यागा। सेठ ने शुद्ध भोजन दिया। राजा ने वर माँगने को कहा। सेठ ने बाद के लिए रखा। मंत्री पुत्र को मारने ले जाया गया। सेठ ने वर माँगकर छुड़वाया। मंत्री पुत्र ने सेठ पर क्रोध किया। राजा के साले ने अंगूठी से वसु को सेठ रूप बनाया। पृथुधी ने राजा से सेठ को मारने की आज्ञा ली। सेठ प्रतिमायोग में था। पृथुधी ने बाँधकर श्मशान ले गया।
श्लोक 323 से 331 सेठ पर तलवार और चमत्कार
चाण्डाल ने तलवार मारी। तलवार मणियों का हार बनी। नगर में उपद्रव हुआ। राजा और लोग सेठ की शरण गए। उपद्रव दूर हुआ। देवों ने शील व्रत की महिमा बताई। राजा ने क्षमा माँगी। सेठ ने पूर्वकर्म बताया और क्षमा की। सेठ विभूति से नगर में प्रवेश किया। राजा ने वारिषेणा (सेठ की पुत्री) वसुपाल को दी।
श्लोक 332 से 341 धर्म और पुरुषार्थ पर चर्चा
राजा ने सेठ से धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के परस्पर संबंध पूछा। सेठ ने कहा कि सम्यग्दृष्टि वालों के लिए अनुकूल, मिथ्यादृष्टि वालों के लिए नहीं। राजा ने वर माँगने को कहा। सेठ ने जन्म-मरण क्षय माँगा। राजा ने असमर्थता बताई। सेठ ने स्वयं सिद्ध करने की बात कही। राजा छिपकली के बच्चों को देखकर विचार किया कि जीव स्वयं आजीविका जानते हैं। राज्य वसुपाल को सौंपा। सेठ और राजा ने तप लिया।
श्लोक 342 से 361 भीम मुनि का पूर्वजन्म और देवियों का प्रश्न
चाण्डाल ने अहिंसा व्रत बताया। भीम मुनि ने सर्वज्ञ से सुना कि भवदेव (विद्युच्चोर) ने तीन बार रतिवेगा-सुकान्त को मारा। वे देव-देवी बने। दोनों ने वन्दना की। सुलोचना ने कहा कि पुण्डरीकिणी में भीम मुनि को केवलज्ञान हुआ। चार देवियाँ आईं। उन्होंने पति के बारे में पूछा। मुनि ने बताया कि सुरदेव पिंगल कोतवाल हुआ। उसकी रानियाँ और दासियाँ देवियाँ बनीं। पिंगल संन्यास लेकर अच्युत स्वर्ग जाएगा। व्यन्तर कन्याएँ अतिपिंगल को पूजने लगीं।
श्लोक 362 से 369 कथा समापन और पर्व समाप्ति
देवियों ने रतिकूल, मणिनागदत्त, सुकेतु के चरित्र सुने। सब सत्य होने पर वन्दना कर गईं। जयकुमार-सुलोचना भी वन्दना कर स्वर्ग गए। सुलोचना ने क्रमबद्ध पूर्वभव कथा सुनाई। जयकुमार संतुष्ट हुए। सभा विकसित हुई। अन्य स्त्रियों की कान्ति नष्ट हुई। सुलोचना ने तीन भवों में पति-पत्नी संबंध बताया। जयकुमार अन्य वृत्तांत सुनने को उत्सुक हुआ। पर्व जयकुमार-सुलोचना के भवान्तर वर्णन के साथ समाप्त हुआ।
आदिपुराण पर्व 47 – प्रथम तीर्थंकर और प्रथम चक्रवर्ती का वर्णन
श्लोक 1 से 12 : श्रीपाल की कथा का प्रारम्भ और नृत्य दृश्य
जयकुमार के पूछने पर सुलोचना श्रीपाल चक्रवर्ती की कथा सुनाने लगती है। जम्बूद्वीप के पूर्व विदेह क्षेत्र में पुण्डरीकिणी नामक प्रसिद्ध नगरी है। वहाँ श्रीपाल और वसुपाल नामक दो भाई सूर्य-चन्द्रमा या नय-पराक्रम के समान राज्य करते हैं। एक दिन माली से पता चलता है कि उनके पिता गुणपाल मुनि को सुरगिरि पर्वत पर केवलज्ञान प्राप्त हुआ है। माता कुबेरश्री प्रसन्न होकर पूजा सामग्री लेकर दर्शन के लिए निकलती हैं, और श्रीपाल-वसुपाल भी उनके पीछे जाते हैं। मार्ग में एक सुन्दर वन में वटवृक्ष के नीचे जगत्पाल चक्रवर्ती की प्रतिमा के समीप नृत्य होता है। श्रीपाल देखते हैं कि एक पुरुष स्त्री वेष में और स्त्री पुरुष वेष में नाच रही है। वह कहता है कि यदि स्त्री स्त्री वेष में नाचे तो नृत्य उत्तम होता। यह सुनकर नटी मूर्छित हो जाती है।
श्लोक 13 से 30 नटी की पहचान और श्रीपाल का अपहरण
नटी के सचेत होने पर एक स्त्री (प्रियरति) श्रीपाल से कहती है कि वह श्रीपुर नगरी के राजा श्रीधर की पुत्री जयवती की परीक्षा के लिए आई है। जन्म के समय भविष्यवाणी हुई थी कि जो नट-नटी के भेद को जान लेगा, वही चक्रवर्ती होगा। प्रियरति अपनी पुत्री मदनवेगा (पुरुष वेष में नाचने वाली) और नट वासव का परिचय देती है। श्रीपाल संतुष्ट होकर उन्हें सम्मानित करता है और पिता के दर्शन के लिए सुरगिरि की ओर चलता है। मार्ग में एक घोड़ा आता है, श्रीपाल उस पर सवार होता है, जो विद्याधर बनकर उसे आकाश में ले उड़ता है। अशनिवेग नामक विद्याधर उसे रत्नावर्त पर्वत पर छोड़ देता है। वहाँ छह राजकन्याएँ आती हैं, जो बताती हैं कि अशनिवेग ने उन्हें जबरदस्ती वहाँ लाया है। श्रीपाल अपना वृत्तान्त कहता है। तभी विद्युद्वेगा नामक विद्याधरी आती है, जो अशनिवेग की बहन है और काम से पीड़ित हो श्रीपाल पर अनुरक्त हो जाती है। वह बताती है कि अशनिवेग ने उसे भेजा है और श्रीपाल उसका साला बनेगा।
श्लोक 31 से 45 विद्युद्वेगा का प्रयास और भेरुण्ड पक्षी द्वारा अपहरण
विद्युद्वेगा रागपूर्ण चेष्टाएँ करती है और विद्याबल से मकान बनाकर राजकन्याओं के साथ बैठ जाती है। अनंगपताका नामक सखी आकर बताती है कि कुबेरश्री ने गुणपाल मुनि से श्रीपाल की खोज कराई, जिससे अशनिवेग उसे लाया। विद्याधर अनलवेग के शत्रु उत्तरश्रेणी राजा से युद्ध कर रहे हैं। विद्युद्वेगा श्रीपाल से विवाह की इच्छा रखती है, किन्तु श्रीपाल गुरु व्रत के कारण मना करता है कि वह केवल गुरुजन द्वारा दी गई कन्या से विवाह करेगा। कन्याएँ प्रयास करती हैं, असफल होने पर विद्युद्वेगा उसे मकान में बंद कर माता-पिता के पास जाती है। श्रीपाल सो जाता है, तब भेरुण्ड पक्षी उसे मांस समझकर उठा ले जाता है और सिद्धकूट चैत्यालय पर रखकर छोड़ देता है।
श्लोक 46 से 64 सिद्धकूट से आगे की यात्रा और रूप परिवर्तन
श्रीपाल स्नान कर जिनालय की पूजा करता है। एक विद्याधर उसे उठाकर शिवंकरपुर ले जाता है, जहाँ अनिलवेग राजा की पुत्री भोगवती है। विद्याधर पूछता है कि यह कौन है, श्रीपाल कहता है ‘विषम सर्पिणी’। क्रोधित होकर विद्याधर उसे अनिलवेग के पास ले जाता है। राजा क्रुद्ध होकर उसे शीत वैताली विद्या से वृद्ध रूप देकर उत्तर श्रेणी के श्मशान में फेंक देता है। वहाँ एक चाण्डालिनी उसे कुत्ते के रूप में पटकती है, फिर पुराना रूप लौटाती है। श्रीपाल भयभीत होता है। हरिकेतु नामक विद्याधर उसे सर्वव्याधिविनाशिनी विद्या देता है और असली रूप लौटाता है। आगे एक विद्याधर बताता है कि यह सुसीमा देश है, जहाँ सात शिलाएँ हैं। इन्हें एक पर एक रखने वाला चक्रवर्ती बनेगा। श्रीपाल ऐसा करता है।
श्लोक 65 से 108 सुखावती का परिचय, रूप परिवर्तन और चैत्यालय की घटनाएँ
श्रीपाल पुष्कलावती मार्ग पूछता है। एक बुढ़िया (सुखावती) बताती है कि वह विद्याधरी है, पिप्पला और मदनवती से संबंधित है। वह श्रीपाल की खोज में आई है और उसे बुढ़ापे का रूप देकर छिपा रही है क्योंकि धूमवेग और हरिवर नामक विद्याधर उन कन्याओं के लिए खतरा हैं। वह अमृत फल देती है और पुरुष रूप धारण कर उसे ले चलती है। सिद्धकूट चैत्यालय में भोगवती और अन्य राजकन्याएँ पूजा करती हैं। एक शिवकुमार का मुँह टेढ़ा होता है, जो श्रीपाल के समीप ठीक हो जाता है। हरिवर क्रोधित होकर श्रीपाल को महाकाल गुफा में फेंक देता है, किन्तु व्यन्तर कुछ नहीं कर पाता। धूमवेग के सेवक उसे पकड़ते हैं और मारने का प्रयास करते हैं, किन्तु शस्त्र फूल बन जाते हैं। नगर में अतिबल नामक दूसरा विद्याधर राजा रहता है (कथा आगे बढ़ती है)।
श्लोक 109 से 122 अग्निकुंड से मुक्ति और कन्या रूप में परीक्षा
धूमवेग विद्याधर श्रीपाल को अग्निकुंड में फेंकता है, जहाँ राजा विमलसेन अपने दुष्ट नौकर को जला रहा था। कुमार की महौषधि से अग्नि निस्तेज हो जाती है और वह बाहर निकल आता है। उस नौकर की पत्नी अग्नि में कूदकर अपनी शुद्धि सिद्ध करती है। कुमार स्त्रियों की माया के कवच की दृढ़ता पर आश्चर्य करता है। विमलसेन की पुत्री कमलावती पर कामरूप पिशाच का आक्रमण होता है, श्रीपाल उसे दूर करता है। राजा पुत्री देना चाहता है, किन्तु कुमार मना करने पर वरसेन उसे घर भेजता है। मार्ग में सुखावती कूबड़ी रूप में आकर प्यास बुझाती है और कुमार को कन्या बना देती है। धूमवेग और हरिवर दोनों उस कन्या पर आसक्त हो जाते हैं और परस्पर द्वेष करते हैं। बंधु उन्हें रोकते हैं कि कन्या जिसे चाहे वही पति बने। कन्या किसी को नहीं चुनती, सुखावती उसे अन्य कन्याओं के पास ले जाती है।
श्लोक 123 से 131 असली रूप, गजपुर में विजय और अगवानी
कन्याओं के बीच श्रीपाल असली रूप में बैठता है, कुछ कन्याएँ लज्जित होती हैं और कुछ प्रीति करती हैं। रात भर सोने के बाद सुखावती उसे उठाकर ले जाती है और बताती है कि वह सदा साथ रही है तथा निमित्तज्ञानियों के अनुसार यहाँ स्त्रीरत्न मिलेगा। श्रीपाल हर्षित होकर गजपुर नगर पहुँचता है। वहाँ मदोन्मत्त गजराज को शास्त्रोक्त 32 क्रीड़ाओं से वश करता है। सूर्योदय पर नगरवासी जानकर पताकाएँ फहराते हैं और पुण्य प्रभाव से अगवानी करते हैं।
श्लोक 132 से 141 हयपुर, सुसीमा पर्वत और विभिन्न परीक्षाएँ
श्रीपाल हयपुर पहुँचता है, जहाँ घोड़ा प्रदक्षिणा देकर खड़ा होता है। नगरवासी सत्कार करते हैं। आगे सुसीमा पर्वत पर पहुँचकर तलवार म्यान से निकालता है, जिसे अन्य नहीं निकाल पाते। गूंगा व्यक्ति जय-जय कहकर प्रणाम करता है, टेढ़ी अंगुली वाला व्यक्ति ठीक हो जाता है और हीरे की भस्म बनाने वाला सफल होता है। ये सभी भावी सेनापति, पुरोहित, स्थपति और मंत्री हैं। विजयपुर की कीर्तिमती पुत्री का वर श्रीपाल होगा, श्रेयस्पुर की वीतशोका का वर गूंगा बोलने से, शिल्पपुर की रतिविमला का वर अंगुली ठीक होने से और धान्यपुर की विमलसेना का वर भस्म बनने से पहचाना जाता है।
श्लोक 142 से 151 धूमवेग से युद्ध और यक्षी की सहायता
सुखावती कुमार को आकाशमार्ग से ले जाती है, धूमवेग रास्ता रोकता है। प्रतिमा की रक्षक देवी विद्याधर रूप में आकर सुखावती को धूमवेग से लड़ने को कहती है और कुमार को ले जाती है। सुखावती युद्ध करती है और धूमवेग को रोकती है। कुमार समीपवती पर्वत पर पहुँचता है, पूर्वभव की माता यक्षी देवश्री आकर परिश्रम दूर करती है और तालाब में जाने को कहती है। कुमार रात भर खंभे पर बैठता है।
श्लोक 152 से 163 रत्न प्राप्ति और सुरगिरि वापसी
सुबह पञ्चनमस्कार मंत्र पढ़कर जिनप्रतिमा की पूजा करता है। यक्षी के उपदेश से कमल से चक्ररत्न, कछुए से छत्ररत्न, नाग से दण्डरत्न, मेंढक से चूड़ामणि, मगर से चर्मरत्न और विच्छू से कौस्तुभ मणि प्राप्त करता है। आभूषण धारण कर बाहर निकलता है। सुखावती धूमवेग को जीतकर तलवार सहित आती है। दोनों सुरगिरि पर्वत पर गुणपाल जिनेन्द्र के समवसरण पहुँचते हैं।
श्लोक 164 से 171 माता-भाई से मिलन और विवाह
श्रीपाल गुणपाल की स्तुति करता है, माता-भाई से विनय करता है और सुखावती की प्रशंसा करता है। वसुपाल के प्रश्न पर भगवान् ने पूर्व कथनानुसार लाभ बताए थे। सात दिनों में नगर पहुँचकर वसुपाल का वारिषेणा आदि से विवाह होता है। श्रीपाल जयावती आदि 84 कन्याओं से विवाहित होता है। दोनों भाई सूर्य-चन्द्रमा के समान पृथ्वी का पालन कर चिरकाल तक सुख भोगते हैं।
श्लोक 172 से 183 गुणपाल का जन्म, विवाह और वैराग्य
जयावती से गुणपाल पुत्र उत्पन्न होता है, चक्ररत्न प्रकट होता है। श्रीपाल इन्द्र लीला से उल्लंघन करता है। गुणपाल का जयसेना आदि विद्याधर कन्याओं से विवाह होता है। कुछ समय बाद गुणपाल चन्द्रग्रहण देख वैराग्य प्राप्त करता है और पूर्वभव स्मरण करता है। पूर्वभव में पद्मक देश के कनकप्रभ था, विद्युत्प्रभा सर्पदंश से मरने पर विरक्त हो समाधिगुप्त मुनि से संयम धारण कर अहमिन्द्र बना।
श्लोक 184 से 191 गुणपाल की दीक्षा और सुखावती का पुत्र
गुणपाल मोह नष्ट कर तप करता है, घातिया कर्म नष्ट कर सयोगी पद (तेरहवाँ गुणस्थान) प्राप्त करता है। सुखावती का पुत्र यशपाल गुणपाल के पास दीक्षा लेकर पहला गणधर बनता है। श्रीपाल विभूति सहित पूजा करता है, दोनों प्रकार का धर्म सुनता है और पूर्वभव पूछता है। भगवान् बताते हैं कि सुलोचना जयकुमार को कथा सुना रही है।
श्लोक 192 से 201 यशपाल की कथा का प्रारम्भ
विदेह क्षेत्र की पुण्डरीकिणी में राजा यशपाल रहता है। वैश्य सर्वसमृद्ध की पत्नी धनश्री और पुत्र सर्वदयित सेठ है, बहिन सर्वदयिता सती है। सर्वदयित की दो पत्नियाँ जयसेना और जयदत्ता हैं। देवश्री सागरसेन की पत्नी है, संतान सागरदत्त, समुद्रदत्त और सागरदत्ता। वैश्रवणदत्त हिस्सेदार है। परिवार प्रेम से रहता है। धनंजय राजा यशपाल को रत्न भेंट करता है, राजा सुवर्ण आदि धन देता है।
श्लोक 202 से 211 सर्वदयिता का त्याग और जितशत्रु का जन्म
सभी वैश्यपुत्र धन कमाने के लिए निकलते हैं और समीप के एक गाँव में ठहरते हैं। रात्रि में समुद्रदत्त घर आकर अपनी पत्नी सर्वदयिता से संभोग करता है और चुपके से वापस लौट जाता है। गर्भ बढ़ने पर सागरदत्त इसे पाप समझकर सर्वदयिता को बिना परीक्षा घर से निकाल देता है। सर्वदयिता भाई सेठ सर्वदयित के पास जाती है, किन्तु वह भी उसे दुराचारिणी कहकर रोक देता है। वह पास के घर में रहती है और नौ महीने बाद पुण्यवान् पुत्र को जन्म देती है। सेठ सर्वदयित इसे कुलकलंक समझकर नौकर से उसे दूर रखवाने को कहता है। बुद्धिमान नौकर उसे विद्याधर जयधाम को सौंप देता है। जयधाम और जयभामा उसे जितशत्रु नाम देकर औरस पुत्र की तरह पालते हैं।
श्लोक 212 से 223 पूर्वभव की समाप्ति और दीक्षा
सर्वदयिता पुत्र-वियोग से स्त्री-वेदना की निन्दा करती है और मरकर पुरुष जन्म लेती है। समुद्रदत्त वापस आकर भाई की निन्दा करता है और सेठ पर क्रोध रखता है। वैश्रवणदत्त सागरदत्त से ईर्ष्या करता है कि सेठ पद उसे मिलना चाहिए था। सागरदत्त और समुद्रदत्त भी ईर्ष्या करते हैं। सेठ सर्वदयित जितशत्रु से समानता पूछता है। जितशत्रु सब वृत्तान्त बताता है। अंगूठी देख सेठ समझता है कि यह भानजा है। वह अपनी अपरीक्षा पर पछताता है, जितशत्रु को पुत्री सर्वश्री, धन और सेठ पद देकर स्वयं विरक्त हो जाता है। जयधाम, जयभामा, जयसेना, जयदत्ता, सागरदत्ता, वैश्रवणदत्ता आदि को आत्मज्ञान होता है। वे सब रतिवर मुनि से संयम धारण कर चिरकाल तप कर स्वर्ग जाते हैं।
श्लोक 224 से 232 पूर्वभव का फल और श्रीपाल की व्याख्या
स्वर्ग से जयधाम वसुपाल, जयभामा जयावती, जयसेना पिप्पली, जयदत्ता मदनावती, वैश्रवणदत्ता विद्युद्वेगा, सागरदत्ता सुखावती, सागरदत्त हरिवर, समुद्रदत्त ज्वलनवेग का पुत्र, वैश्रवणदत्त अशनिवेग और सर्वदयित सेठ श्रीपाल (जयकुमार) बनता है। पूर्वभव में भानजे को माँ से अलग करने के कारण इस भव में भाइयों से अलगाव हुआ। पूर्वभव के द्वेषी धूमवेग, अशनिवेग, हरिवर बने। पूर्वभव की पत्नियाँ इस भव में भी प्रिय रानियाँ हुईं। बहिन के बालक की हिंसा न करने से भाइयों से पुनः समागम हुआ। पूर्व तप के फल से चक्रवर्ती बना और परिग्रह त्याग से शीघ्र मोक्ष मिलेगा।
श्लोक 233 से 241 वैर त्याग और श्रीपाल का वैराग्य
गुणपाल तीर्थंकर के वचन सुन सब वैर छोड़ देते हैं। श्रीपाल जन्म-मृत्यु आदि नष्ट करने के लिए धर्म-अमृत का पान करता है। वह चक्रवर्ती राज्य को कुम्हार के चाक के समान क्षणभंगुर समझता है। आयु वायु, भोग मेघ, संयोग नश्वर, शरीर पाप-पात्र और विभूतियाँ बिजली के समान चंचल हैं। यौवन भ्रष्टि का कारण और विषय-प्रेम द्वेष का मूल है। बुद्धि में विपर्यय रहने तक सुख लगता है, किन्तु सीधी बुद्धि में त्याग योग्य लगता है। अभिलाषा से चित्त-वृक्ष बढ़ता है तो दुःख फल लगते हैं। चिरकाल भोग करने पर भी तृष्णा नहीं मिटी। सभी इष्ट पदार्थ मिलने पर भी सुख नहीं मिलता।
श्लोक 242 से 252 श्रीपाल की दीक्षा और मोक्ष
स्त्रियों से सुख पुरुषत्व नहीं, आत्मा में सुख निश्चय से सच्चा पुरुषत्व है। श्रीपाल चक्ररत्न सहित समस्त परिग्रह त्यागने का निश्चय करता है। सुखावती पुत्र नरपाल का राज्याभिषेक कर सिंहासन देता है। जयवती आदि रानियों और वसुपाल आदि के साथ दीक्षा धारण करता है। बाह्य-अंतरंग तप से कषायरहित चारित्र प्राप्त कर, शुक्ल ध्यान से घातिया कर्म नष्ट कर केवलज्ञान प्राप्त करता है। योगरहित होकर सब कर्म नष्ट कर मोक्ष प्राप्त करता है। रानियाँ तप कर स्वर्ग जाती हैं। सुलोचना जयकुमार से कहती है कि वे दोनों कथा सुनकर गुणपाल को नमस्कार कर स्वर्ग गए और पुण्य से पुनः जन्म लिया। सभा में सब सुलोचना के वचनों पर विश्वास करते हैं। जयकुमार-सुलोचना सुख भोगते हैं और प्रज्ञप्ति आदि विद्याएँ प्राप्त करते हैं।
श्लोक 253 से 273 जयकुमार-सुलोचना का विहार और शील परीक्षा
जयकुमार-सुलोचना सुख भोगते हैं। विद्याओं से देव-देशों में विहार की इच्छा से विजयकुमार को राज्य सौंपते हैं। समुद्र, कुलाचल, वनों में विहार कर कैलाश पहुँचते हैं। सुलोचना से दूर होने पर रविप्रभ देव की काञ्चना देवी शील परीक्षा के लिए आती है। वह विद्युत्प्रभा कहकर अनुराग दिखाती है। जयकुमार उसे बहिन कहकर व्रत स्मरण कर मना करता है। क्रुद्ध होकर काञ्चना राक्षसी रूप धारण कर उसे उठाती है। सुलोचना ललकारती है, देवी डरकर अदृश्य हो जाती है। काञ्चना स्वामी के पास जाकर शील-माहात्म्य बताती है। रविप्रभ आश्चर्य कर क्षमा माँगता है, रत्न-पूजा कर स्वर्ग जाता है। जयकुमार-सुलोचना चिरकाल विहार कर नगर लौटते हैं।
श्लोक 274 से 283 जयकुमार की दीक्षा और गणधर पद
जयकुमार आदिनाथ तीर्थंकर के पास वन्दना कर धर्म-प्रश्न सुनता है, कथाएँ और कर्म-बन्ध चर्चा करता है। कर्म-नाश से श्रेष्ठ सुख प्राप्त करता है। अनन्तवीर्य का राज्याभिषेक कर संपदा सौंपता है। स्वयं राग-द्वेष रहित छोटे भाइयों और अन्य वैराग्यी पुत्रों के साथ दीक्षा धारण करता है। भगवान् के समीप वह शासन पात्र के समान सुशोभित होता है। सब परिग्रह त्याग, श्रुत-अर्थ, सात ऋद्धियाँ और चार ज्ञान से अंधकार नष्ट कर वह भगवान् का 71वाँ गणधर बनता है। सुलोचना पति-वियोग से शोकाकुल हो सुभद्रा के समझाने पर ब्राह्मी आयिका से दीक्षा लेती है और अच्युत स्वर्ग में देवी बनती है।
श्लोक 284 से 303 भरत की पूजा और धर्म का स्वरूप
भगवान् वृषभदेव के पास 84,000 मुनि, 3,50,000 आर्यिकाएँ, 3 लाख श्रावक, 5 लाख श्राविकाएँ, देव-तिर्यञ्च आदि से घिरे भगवान् की पूजा कर भरत धर्म पूछते हैं। भगवान् कहते हैं कि शिष्यों को कुगति से हटाकर उत्तम स्थान पहुँचाने वाला सत्पुरुष धर्म कहलाता है। धर्म के चार भेद हैं—सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र और सम्यक्तप। यह धर्म कर्तव्य प्रधान है।
श्लोक 304 से 321 मोक्ष के चार मार्गों का निरूपण और उपदेश
भगवान ऋषभदेव भरत को बताते हैं कि जीव आदि सात तत्त्वों में यथार्थ श्रद्धान सम्यग्दर्शन कहलाता है। यह शंका आदि दोषों से रहित होता है और औपशमिक, क्षायिक, क्षायोपशमिक तीन भावों से विवेचित होता है। संशय, विपर्यय और अनध्यवसाय के अभाव से जीवादि सात तत्त्वों का यथार्थ ज्ञान सम्यग्ज्ञान है। कर्मों के आस्रव को रोकने वाला चारित्र या संयम है। कर्मों की निर्जरा कराने वाली वृत्ति तप कहलाती है। ये चारों गुण (सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र, तप) कषाय सहित होने पर स्वर्ग के कारण हैं, कषायरहित होने पर स्वर्ग और मोक्ष दोनों के कारण हैं। ये मोक्ष के मार्ग हैं और प्राणियों को बड़ी कठिनाई से प्राप्त होते हैं। मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, कषाय और शुभ-अशुभ योग कर्म-बंध के कारण हैं। मिथ्यात्व पाँच प्रकार का, अविरति 108 प्रकार की, प्रमाद 15, कषाय चार और योग 15 प्रकार के हैं। कर्मों के मूल भेद आठ और उत्तर भेद 148 हैं। बंध चार प्रकार का होता है और कर्म उदय में आकर ही फल देते तथा नए बंध का कारण बनते हैं। भगवान भरत आदि को गृहस्थाश्रम त्यागकर गुप्ति, समिति, धर्म, अनुप्रेक्षा, परिषहजय और चारित्र का अभ्यास करने तथा वीतराग मुनियों या गुणस्थानों में अवस्था धारण कर मोक्ष की उपासना करने का उपदेश देते हैं। गृहस्थ बुद्धिमान पुरुष सम्यग्दर्शन पूर्वक दान, शील, उपवास, परमेष्ठी पूजा करें, श्रावक प्रतिमाएँ पालें और सज्जाति आदि सात परमस्थानों को प्राप्त हों। भरत ने भगवान के वचनों का पूर्ण श्रद्धान किया और कैलाश से अयोध्या लौट आए। भगवान ने धर्म-बीज बोया और एक लाख पूर्व से अधिक (एक हजार वर्ष + 14 दिन कम) गणधरों सहित विहार किया।
श्लोक 322 से 331 मोक्ष के पूर्व स्वप्न और संकेत
भगवान ने आयु के अंतिम 14 दिन शेष रहने पर पौष पूर्णिमा को कैलाश पर योग निरोध कर विराजमान हुए। उसी दिन भरत ने स्वप्न देखा कि महामेरु पर्वत सिद्ध क्षेत्र तक पहुँच गया। युवराज अर्ककीर्ति ने महौषधि वृक्ष को रोग नष्ट कर स्वर्ग जाते देखा। गृहपति ने कल्पवृक्ष को फल देकर स्वर्ग जाते देखा। प्रधानमंत्री ने रत्नद्वीप को रत्न देकर आकाश जाते देखा। सेनापति ने सिंह को वज्र-पिंजड़ा तोड़ कैलाश उल्लंघन करते देखा। अनन्तवीर्य ने चन्द्रमा को तीनों लोक प्रकाशित कर ताराओं सहित जाते देखा। सुभद्रा ने इन्द्राणी को शोक करते देखा। चित्रांगद ने सूर्य को आकाश में उड़ते देखा। सबने स्वप्न देखे और सूर्योदय पर पुरोहित से फल पूछा।
श्लोक 332 से 342 मोक्ष-कल्याणक और निर्वाण
पुरोहित ने कहा कि ये स्वप्न भगवान के कर्म-नाश कर मोक्ष जाने का संकेत हैं। आनन्द नामक व्यक्ति ने बताया कि भगवान ने दिव्यध्वनि संकोच कर ली है, सभा शोक में है। भरत सबके साथ कैलाश पहुँचा, तीन प्रदक्षिणा, स्तुति और 14 दिन महामह पूजा की। माघ कृष्ण चतुर्दशी को अभिजित नक्षत्र में भगवान पूर्व दिशा मुख करके पर्यंकासन में विराजमान हुए। शुक्ल ध्यान के तीसरे और चौथे चरण से योग निरोध कर अघातिया कर्म नष्ट किए। औदारिक, तैजस, कार्मण शरीर नष्ट हो सिद्धत्व प्राप्त किया, आठ निज गुणों से युक्त तनुवातवलय में विराजमान हुए।
श्लोक 343 से 354 भस्म-संस्कार और अग्नि-स्थापना
देव लोग मोक्ष-कल्याणक पूजा के लिए आए, भगवान के शरीर को पवित्र मान पालकी में रखा। अग्निकुमार देवों ने सुगन्धित अग्नि से शरीर का दाह किया, जगत में अभूतपूर्व सुगन्ध फैली। इन्द्र ने तीन अग्नियाँ स्थापित कीं: दाहिनी गणधरों के लिए, बाईं अन्य केवलियों के लिए, मध्य तीर्थंकर के लिए। इन्द्र ने भस्म उठाई, ललाट, भुजा, गले, वक्ष में लगाई और पवित्र मान धर्मानुराग में तन्मय हुए। सबने आनन्द नृत्य किया और श्रावकों को उपदेश दिया कि तीन संध्याओं में तीन अग्नियाँ स्थापित कर धर्मचक्र, छत्र, जिन प्रतिमा की पूजा करें और अतिथि बनें।
श्लोक 355 से 371 भरत का शोक और पूर्वभव कथन (प्रथम भाग)
शोकरूपी अग्नि भरत के चित्त को जला रही थी। वृषभसेन गणधर ने शोक दूर करने के लिए सभी के पूर्वभव बताए। वृषभदेव का जीव जयवर्मा से शुरू होकर दसवें भव में अहमिन्द्र से वृषभदेव बना। श्रेयान का जीव घनश्री से श्रेयान बना। भरत का जीव अतिगृद्ध से भरत चक्रवर्ती बना। बाहुबली का जीव सेनापति से बाहुबली बना। वृषभसेन गणधर ने अपना और अनन्तविजय, महासेन, श्रीषेण, गुणसेन, जयसेन आदि के पूर्वभव बताए।
श्लोक 372 से 381 शोक-निवारण उपदेश
वृषभसेन ने भरत से कहा कि संसार में इष्ट-अनिष्ट का संगम होता है और अकस्मात् नाश होता है। भगवान ने आठ कर्म नष्ट कर मोक्ष प्राप्त किया, तो विषाद क्यों? हम भी चरमशरीरी हैं, शीघ्र मोक्ष प्राप्त करेंगे। इष्ट मित्र की मृत्यु पर शोक होता है, लेकिन सिद्ध पद पर हर्ष होना चाहिए। भगवान के आठ दुष्ट शत्रु (कर्म) नष्ट हो गए, हानि क्या? देव लोग भी भस्म कर आनन्द मना रहे हैं, तो शोक व्यर्थ है। दर्शन आदि न होने पर शोक ठीक, लेकिन बीती वस्तु पर प्रार्थना भूल है। पिता अद्वितीय गुरु थे, तू तीन ज्ञानों का धारक है, मोह से उत्तमता नष्ट मत कर।
श्लोक 382 से 391 शोक का निवारण और भरत का वैराग्य
संसार में इष्ट-अनिष्ट क्या है? मूर्ख प्राणी द्वेष-राग करता है। काल अनादि और दुःखमय है, संसार को धिक्कार है। जीव के अनन्त काल से सैकड़ों संबंध हो चुके, मोह व्यर्थ है। भगवान का शरीर कर्मज है, स्थायी नहीं, हेय है। भगवान अब हृदय में विद्यमान हैं, चित्त में देखो। वचनों से भरत का शोक शांत हुआ, जैसे दावानल से जला पर्वत बादलों से शांत हो। भरत ने चिन्ता छोड़ गणधर को नमस्कार किया, तृष्णा की निन्दा कर मोक्ष के लिए उत्सुक हो नगर में प्रवेश किया।
श्लोक 392 से 403 भरत का मोक्ष और स्तुति
भरत ने दर्पण में सफेद बाल देख राज्य को तृण समान मान अर्ककीर्ति को सौंप दिया। समस्त तत्त्व जानकर यम-समिति से पूर्ण संयम धारण किया। मनःपर्ययज्ञान और केवलज्ञान प्राप्त हुआ। इन्द्रों द्वारा वन्दनीय और तीन लोक का स्वामी बना। मुनिरूपी हंस के समान विहार कर जनकल्याण किया। अंत में योग निरोध कर तीन शरीर नष्ट कर मोक्ष प्राप्त किया। वृषभसेन आदि मुनि भी निर्वाण को प्राप्त हुए। सबने भगवान ऋषभदेव की स्तुति की कि वे प्रथम तीर्थंकर, कुलकर, मोक्षमार्ग दर्शक हैं। भगवान वृषभनाथ भव्य जीवों को मोक्ष प्रदान करें और शान्ति दें।
Download PDF
आदिपुराण भाग – 2 Adi purana Part-2 by Acharya Jinasena
आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena