Summary of Uttar Puran Parv 65 by Acharya Gunabhadra
उत्तरपुराण पर्व 65 (श्लोक 1–192) का संक्षिप्त सारांश
इस पर्व में अठारहवें तीर्थंकर भगवान् अरनाथ के पूर्वभव, जन्म, वैराग्य, केवलज्ञान और मोक्ष का वर्णन किया गया है। पूर्वभव में वे क्षेमपुर के राजा धनपति थे। अर्हन्नन्दन तीर्थंकर की दिव्यध्वनि सुनकर उन्होंने वैराग्य धारण किया, दीक्षा लेकर सोलह कारण भावनाओं का आराधन किया और तीर्थंकर-नामकर्म का बन्ध किया। मृत्यु के पश्चात् वे जयन्त विमान में अहमिन्द्र देव हुए। वहाँ से च्युत होकर हस्तिनापुर के राजा सुदर्शन और रानी मित्रसेना के यहाँ जन्म लेकर अरनाथ भगवान् बने। उन्होंने चक्रवर्ती पद का वैभव भोगने के बाद संसार की नश्वरता का अनुभव किया, राज्य त्यागकर दीक्षा ग्रहण की, कठोर तप किया और केवलज्ञान प्राप्त किया। विशाल धर्मसंघ का संचालन करते हुए उन्होंने धर्मोपदेश दिया तथा अन्त में सम्मेदशिखर पर मोक्ष प्राप्त किया।
इसके पश्चात् सुभौम चक्रवर्ती का चरित्र वर्णित है। पूर्वभव में भूपाल नामक राजा ने दीक्षा तो ग्रहण की, किन्तु चक्रवर्ती पद की कामना रूप निदान कर लिया। उसी कर्म के प्रभाव से वह महाशुक्र स्वर्ग का देव और फिर सुभौम चक्रवर्ती बना। दूसरी ओर जमदग्नि, रेणुकी, परशुराम तथा सहस्रबाहु की कथा आती है। कृतवीर द्वारा जमदग्नि की हत्या के बाद उनके पुत्रों ने प्रतिशोध लिया। रानी चित्रमती के गर्भ से जन्मे सुभौम का पालन गुप्त रूप से हुआ और युवावस्था में उसने परशुराम का वध कर चक्रवर्ती पद प्राप्त किया।
सुभौम ने दीर्घकाल तक अपार वैभव और भोगों का उपभोग किया, किन्तु एक रसोइये के प्रति अन्याय करने से वैर का बीज बो दिया। वही रसोइया अगले जन्म में देव बनकर उसे स्वादिष्ट फलों के लोभ में फँसाकर समुद्र के मध्य ले गया और उसका वध कर दिया। रौद्रध्यान में मृत्यु होने से सुभौम नरकगति को प्राप्त हुआ। इस प्रसंग द्वारा लोभ, आसक्ति, राग और द्वेष के दुष्परिणामों का निरूपण किया गया है।
इसके बाद नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण की कथा आती है। पुण्डरीक और नन्दिषेण दोनों भाई अत्यन्त प्रेमपूर्वक राज्य करते थे। पुण्डरीक का विवाह पद्मावती से हुआ। पूर्वजन्म का शत्रु निशुम्भ प्रतिनारायण बनकर उसके विरुद्ध युद्ध करने आया, किन्तु पुण्डरीक ने उसे पराजित कर मार डाला। यद्यपि पुण्डरीक महान् पराक्रमी और विजयी था, फिर भी भोगों, परिग्रह और आसक्ति में फँसकर उसने पापकर्मों का बन्ध किया और मृत्यु के बाद छठे नरक में उत्पन्न हुआ।
दूसरी ओर भाई के वियोग से नन्दिषेण के मन में गहरा वैराग्य उत्पन्न हुआ। उसने शिवघोष मुनि के पास संयम ग्रहण किया, बाह्य और आभ्यन्तर तप का उत्कृष्ट आराधन किया तथा समस्त कर्मों का क्षय कर मोक्ष प्राप्त किया। इस प्रकार पर्व का निष्कर्ष यह है कि वैभव, शक्ति और राज्य होने पर भी राग, द्वेष, लोभ और परिग्रह जीव को अधोगति में ले जाते हैं, जबकि सम्यक्त्व, संयम, तप और वैराग्य मोक्ष के मार्ग को प्रशस्त करते हैं। भगवान् अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण के चरित्रों के माध्यम से धर्म, वैराग्य और कर्मफल का गहन उपदेश प्रस्तुत किया गया है।
हिन्दी-भाषानुवाद पर्व 65
श्लोक 1 से 11 : राजा धनपति का वैराग्य और देवगति
कच्छ देश के क्षेमपुर नगर में धनपति नामक धर्मप्रिय और प्रजावत्सल राजा राज्य करते थे। उन्होंने अर्हन्नन्दन तीर्थंकर की दिव्यध्वनि से धर्मोपदेश सुनकर संसार से विरक्ति प्राप्त की और राज्य पुत्र को सौंपकर दीक्षा ग्रहण कर ली। ग्यारह अंगों का अध्ययन तथा सोलह कारण भावनाओं का आराधन कर उन्होंने तीर्थंकर-नामकर्म का बन्ध किया। अंत में प्रायोपगमन संन्यासपूर्वक देह त्यागकर वे जयन्त विमान में अहमिन्द्र देव हुए और वहाँ दिव्य सुख तथा अवधिज्ञान का उपभोग करने लगे।
श्लोक 12 से 21 : अरनाथ भगवान् का गर्भ और जन्म कल्याणक
जयन्त विमान के देव की आयु पूर्ण होने पर उनका जीव हस्तिनापुर के राजा सुदर्शन और रानी मित्रसेना के यहाँ अवतीर्ण हुआ। रानी ने सोलह शुभ स्वप्न देखे और उनके शुभ फल सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हुई। देवों ने गर्भकल्याणक का उत्सव मनाया। मार्गशीर्ष शुक्ल चतुर्दशी के दिन रानी ने तीन ज्ञानों से विभूषित दिव्य पुत्र को जन्म दिया, जिसके जन्मोत्सव में देवगण भी सम्मिलित हुए और समस्त लोक आनन्द से भर उठा।
श्लोक 22 से 34 : कुमारकाल, चक्रवर्ती पद और दीक्षा
भगवान् अरनाथ का जन्म कुन्थुनाथ भगवान् के तीर्थकाल में हुआ। उनकी आयु चौरासी हजार वर्ष, शरीर की ऊँचाई तीस धनुष और वर्ण सुवर्ण के समान था। इक्कीस हजार वर्ष की कुमारावस्था के बाद उन्हें राज्य प्राप्त हुआ और तत्पश्चात् चक्रवर्ती पद मिला। एक दिन शरद्कालीन मेघों की क्षणभंगुरता देखकर उन्हें वैराग्य उत्पन्न हुआ। लौकान्तिक देवों की प्रेरणा से उन्होंने पुत्र अरविन्दकुमार को राज्य सौंप दिया और एक हजार राजाओं के साथ दीक्षा धारण कर चार ज्ञानों के अधिकारी बन गए।
श्लोक 35 से 50 : केवलज्ञान, धर्मसंघ और निर्वाण
दीक्षा के बाद भगवान् अरनाथ ने सोलह वर्षों तक कठोर तप किया। कार्तिक शुक्ल द्वादशी के दिन आम्रवृक्ष के नीचे ध्यानस्थ होकर उन्होंने घातिया कर्मों का नाश किया और केवलज्ञान प्राप्त किया। उनके विशाल धर्मसंघ में गणधर, पूर्वधारी, अवधिज्ञानी, केवलज्ञानी तथा अनेक साधु-साध्वियाँ सम्मिलित थीं। उन्होंने अनेक देशों में धर्मप्रचार किया। आयु के अन्त में सम्मेदशिखर पर एक हजार मुनियों सहित प्रतिमायोग धारण कर चैत्र कृष्ण अमावस्या को मोक्ष प्राप्त किया। देवों ने उनके निर्वाण कल्याणक की भव्य पूजा की। ग्रन्थकार ने उनकी महिमा का स्तवन करते हुए उन्हें संसार-सागर से पार लगाने वाला बताया है।
श्लोक 51 से 64 : राजा भूपाल, निदान और पुनर्जन्म
अरनाथ भगवान् के तीर्थ में सुभौम नामक चक्रवर्ती हुआ, जो पूर्वजन्म में भूपाल राजा था। युद्ध में पराजित होकर उसने वैराग्यवश दीक्षा ग्रहण की, किन्तु तप करते समय चक्रवर्ती पद की आकांक्षा का निदान कर लिया। इस कामनापूर्ण तप के कारण उसका तप कलुषित हो गया। मृत्यु के पश्चात् वह महाशुक्र स्वर्ग में देव हुआ। उसी काल में अयोध्या के राजा सहस्रबाहु, उनकी रानी चित्रमती और उनके पुत्र कृतवीर का वर्णन किया गया है। साथ ही जमदग्नि तापस तथा दृढ़ग्राही और हरिशर्मा की पूर्वकथा भी कही गई है, जिसमें सम्यक्त्व और मिथ्यात्व के फल का निरूपण किया गया है।
श्लोक 65 से 83 : जमदग्नि तापस का मोह और पतन
दृढ़ग्राही देव ने हरिशर्मा के जीव को सम्यक्त्व का उपदेश देने के लिए चिड़े का रूप धारण किया। दोनों पक्षियों के संवाद से जमदग्नि तापस के तप की वास्तविकता प्रकट हुई। पक्षियों ने उसके क्रोध और मिथ्या मान्यताओं को उजागर किया तथा बताया कि केवल बाह्य तप मोक्ष का कारण नहीं है। उनके वचनों से प्रभावित होकर जमदग्नि का वैराग्य डगमगा गया। वह कन्याकुब्ज के राजा पारत के पास विवाह की इच्छा से पहुँचा। परीक्षा में रागयुक्त आसन चुन लेने से उसकी आसक्ति स्पष्ट हो गई और अंततः वह एक बालिका को साथ लेकर वन में चला गया।
श्लोक 84 से 92 : रेणुकी से विवाह और पुत्रोत्पत्ति
राजा पारत ने जमदग्नि की स्थिति पर खेद व्यक्त किया, परन्तु अपनी पुत्रियों में से इच्छुक कन्या चुनने की अनुमति दी। अधिकांश कन्याएँ उससे दूर भाग गईं, किन्तु एक छोटी बालिका उसके साथ जाने को तैयार हो गई। जमदग्नि ने उसका नाम रेणुकी रखा और उससे विवाह कर लिया। उनके यहाँ इन्द्र तथा श्वेतराम नामक दो तेजस्वी पुत्र उत्पन्न हुए, जो लोगों को अत्यन्त प्रिय थे और परिवार सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करने लगा।
श्लोक 93 से 104 : रेणुकी को सम्यक्त्व की प्राप्ति और कामधेनु विद्या
एक दिन रेणुकी के भाई मुनि अरिषञ्जय उसके घर आए। रेणुकी के प्रश्न पर उन्होंने उसे सम्यक्त्व रूपी अमूल्य आध्यात्मिक धन प्रदान किया, जिसे उसने श्रद्धापूर्वक स्वीकार किया। प्रसन्न होकर मुनि ने उसे कामधेनु विद्या और मन्त्रयुक्त फरसा भी दिया। बाद में राजा सहस्रबाहु और उनका पुत्र कृतवीर वहाँ आए। रेणुकी से कामधेनु विद्या का महत्व जानकर कृतवीर उस पर लोभ करने लगा और उसे प्राप्त करने की इच्छा प्रकट की। रेणुकी ने उसे अनुचित बताया, किन्तु मोह और अहंकार से प्रेरित कृतवीर ने यह मानते हुए कि श्रेष्ठ सम्पत्ति राजाओं की ही होनी चाहिए, उस दिव्य विद्या को प्राप्त करने का आग्रह किया।
श्लोक 105 से 117 : जमदग्नि की मृत्यु का प्रतिशोध और सुभौम का जन्म
कृतवीर कामधेनु को बलपूर्वक ले जाने लगा तो जमदग्नि ने उसका विरोध किया, जिसके परिणामस्वरूप कृतवीर ने उनका वध कर दिया। यह समाचार सुनकर जमदग्नि के दोनों पुत्र अत्यन्त क्रोधित हुए और पिता की मृत्यु का प्रतिशोध लेने का संकल्प किया। उन्होंने सहस्रबाहु और कृतवीर पर आक्रमण कर सहस्रबाहु का वध कर दिया। इसी बीच गर्भवती रानी चित्रमती को उसके भाई शाण्डिल्य तापस ने सुरक्षित स्थान पर पहुँचाकर मुनि सुबन्धु की शरण में रखा, जहाँ भावी चक्रवर्ती का जन्म होने वाला था।
श्लोक 118 से 131 सुभौम का पालन-पोषण और शत्रु की भविष्यवाणी
चित्रमती ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसकी वनदेवियों ने रक्षा की। मुनि सुबन्धु ने भविष्यवाणी की कि यह बालक सोलहवें वर्ष में चक्रवर्ती बनेगा। उसका नाम सुभौम रखा गया और वह गुप्त रूप से शास्त्रों का अध्ययन करता हुआ बड़ा होने लगा। दूसरी ओर परशुराम और उसके भाई क्षत्रिय वंश का बार-बार संहार करते रहे। एक निमित्तज्ञानी ने परशुराम को बताया कि जिस व्यक्ति के लिए संचित राजाओं के दाँत भोजन में परिवर्तित हो जाएँगे, वही उसका भावी शत्रु होगा।
श्लोक 132 से 143 : सुभौम की पहचान और परशुराम की चिंता
परशुराम ने अपने शत्रु की पहचान के लिए दानशाला खुलवाई, जहाँ आने वालों को राजाओं के दाँत दिखाए जाते थे। जब सुभौम परिव्राजक के वेश में वहाँ पहुँचा, तब उसके प्रभाव से वे दाँत चावल के भोजन में बदल गए। यह देखकर सेवकों ने परशुराम को सूचना दी। परशुराम ने उसे बुलाना चाहा, किन्तु सुभौम ने निर्भीकता से उसकी आज्ञा अस्वीकार कर दी। उसके तेज और प्रभाव से परशुराम के सेवक भयभीत होकर लौट गए।
श्लोक 144 से 151 : परशुराम का वध और सुभौम का चक्रवर्ती पद
सुभौम को चुनौती देने के लिए परशुराम स्वयं सेना सहित आया। युद्ध के समय देवों ने सुभौम की रक्षा की और उसके लिए दिव्य हाथी तथा चक्ररत्न प्रकट हुए। सुभौम ने चक्ररत्न के प्रहार से परशुराम का वध कर दिया तथा शेष सेना को अभयदान दिया। इस प्रकार वह विजयी होकर प्रकट हुआ और अरनाथ भगवान् के निर्वाण के पश्चात् आठवें चक्रवर्ती के रूप में प्रतिष्ठित हुआ।
श्लोक 152 से 161 : सुभौम का वैभव और रसोइये का वैर
सुभौम चक्रवर्ती अत्यन्त तेजस्वी, ऐश्वर्यवान और छहों खण्डों का अधिपति बना। उसने चक्रवर्ती के समस्त भोगों का दीर्घकाल तक उपभोग किया। एक दिन उसके रसोइये अमृतरसायन ने ‘रसायना’ नामक व्यंजन प्रस्तुत किया। नाम मात्र सुनकर राजा क्रोधित हो गया और शत्रुओं की प्रेरणा से उसने रसोइये को कठोर दण्ड दिया, जिससे उसकी मृत्यु हो गई। मरते समय रसोइये ने प्रतिशोध का संकल्प किया और अगले जन्म में ज्योतिषी देव बनकर सुभौम का शत्रु बन गया।
श्लोक 162 से 171 : रसना-लोभ और सुभौम का पतन
ज्योतिषी देव व्यापारी का वेश धारण कर सुभौम को स्वादिष्ट फलों का लोभ देने लगा। जब राजा उन फलों का अत्यधिक आसक्त हो गया, तब उसने उसे दूरस्थ वन में चलने के लिए प्रेरित किया। मंत्रियों के मना करने पर भी सुभौम रसना-लोभवश उसके साथ समुद्र यात्रा पर निकल पड़ा। मार्ग में उसके समस्त रत्न और निधियाँ उसका साथ छोड़ गईं। समुद्र के मध्य उस देव ने अपना वास्तविक रूप प्रकट कर पूर्व वैर का बदला लिया और सुभौम की हत्या कर दी। रौद्रध्यान में मृत्यु होने से सुभौम नरकगति को प्राप्त हुआ। इस प्रसंग से राग और द्वेष को पतन का कारण बताया गया है।
श्लोक 172 से 184 : सुभौम का पूर्वभव और पुण्डरीक–निशुम्भ युद्ध
ग्रन्थकार सुभौम के अनेक भवों का वर्णन करते हुए बताते हैं कि वह भूपाल राजा, महाशुक्र स्वर्ग का देव, चक्रवर्ती सुभौम और अन्ततः नरकवासी बना। इसके बाद नन्दिषेण बलभद्र और पुण्डरीक नारायण का चरित्र आरम्भ होता है। पुण्डरीक का विवाह पद्मावती से हुआ। पूर्वजन्म का शत्रु सुकेतु अनेक भवों के बाद निशुम्भ प्रतिनारायण बना और उसने पुण्डरीक पर आक्रमण किया। दोनों के बीच भीषण युद्ध हुआ, जिसमें पुण्डरीक ने अपने चक्र से निशुम्भ का वध कर दिया और वह नरकगति को प्राप्त हुआ।
श्लोक 185 से 192: नन्दिषेण और पुण्डरीक का अंतिम परिणाम
नन्दिषेण और पुण्डरीक दोनों भाई अत्यन्त प्रेमपूर्वक राज्य करते थे। उनका पारस्परिक स्नेह राज्य और ऐश्वर्य से भी अधिक था। किन्तु पुण्डरीक भोगों, आरम्भ और परिग्रह में अत्यधिक आसक्त हो गया। मृत्यु के समय रौद्रध्यान और मिथ्यात्व के कारण वह छठे नरक में उत्पन्न हुआ। दूसरी ओर भाई के वियोग से वैराग्य प्राप्त कर नन्दिषेण ने शिवघोष मुनि के पास दीक्षा ग्रहण की, कठोर तप किया और कर्मों का क्षय कर मोक्ष प्राप्त किया। इस प्रकार एक ही कुल में उत्पन्न दो भाइयों में से एक भोगासक्ति के कारण नरकगामी हुआ और दूसरा संयम एवं तप के द्वारा मोक्ष को प्राप्त हुआ।
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