प्रतिष्ठाचार्य ब्र. सूरजमल जैन
Front Desk Jainism Forum (FDJF)
स्थापना
गीत
आवो आवो नाथ मेरे तिष्ट इस शुभ मंडले । संसार बन्धन तोड़ने को बैठिये हृदये भले |
नाम शान्तिनाथ है शुभ शान्ति के दाता सदा । हे नाथ हम पूजें चरण तव होत याते भव विदा ||
ॐ ह्रीं श्री शांतिनाथ सर्व कर्म बन्धन बिमुक्त सकल शान्तिकम् सम्पूर्णोत्तम हे पंचम चक्रेश्वर अत्रावतरावतर संवौषठ इत्याह्वान ।
ॐ ह्रीं श्री शांतिनाथ सर्व कर्म बन्धन विमुक्त सम्पूर्णोत्तम मंगलप्रद है द्वादश कामदेवेन्द्र अत्र तिष्ट तिष्ट ठः ठः स्थापनं |
अथाष्टकं
गीता
जो स्वर्ण भृंग भराय जल से पूजते जिन चरण को । तुरत पावे राज्य सम्पत्त मेट जामन मरण को ॥
श्री शाँतिनाथ महान् हो प्रभु शाँति के दातार हो । तीर्थकर हो चक्रवर्ती नार शिव भरतार हो ||1||
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः जगदापद्विनाशनाय ह्रीं शांतिनाथाय जन्म जरा मृत्यु विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।
कर्पूर कुंकुम शुद्ध चन्दन चर्चते पद युगल को । प्राप्त होय सुगन्ध देही सेव सुरि पद कमल को ॥
श्री शाँतिनाथ महान हो प्रभु शाँति के दातार हो । तीर्थकर हो चक्रवर्ती नार शिव भरतार हो ||२||
ॐ भ्रां भ्रीं भ्रूं भ्रौं भ्रः जगदापद्विनाशनाय ह्रीं शाँतिनाथाय संसार ताप विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा |
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ले अखण्ड सुगन्ध अक्षत चरण जिन पूजा करे । होय दीर्घायु निरोगी और सुन्दर तन तन धरे ॥
श्री शाँतिनाथ महान् हो प्रभु शांति के दातार हो । तीर्थकर हो चक्रवर्ती नार शिव भरतार हो ॥ ३ ॥
ॐ म्रां म्रीं म्रूं म्रौं म्रः श्री जगदापद्विनाशनाय ह्रीं शाँतिनाथाय संसार ताप विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा।
मल्लिका अरु वकुल मरुवा पुष्प सुन्दर लीजिये । जिन देव पद अर्चन सु करके काम वाण हरीजिये ॥
श्री शांतिनाथ महान् हो प्रभु शांति के दातार हो । तीर्थकर हो चक्रवर्ती नार शिव भरतार हो ॥४॥
ॐ रां रीं रूं रौं रः जगदापद्विनाशनाय ही शांतिनाथाय कामबाण विनाशनाय पुष्पाणि निर्वपामीति स्वाहा |
ले शुद्ध घृत युत शर्करा से व्यंजनों के थाल भर । भक्ति से पूजे चरण जिन रोग क्षुध तिन नाश कर ।।
श्री शांतिनाथ महान् हो प्रभु शांति के दातार हो । तीर्थकर हो चक्रवर्ती नार शिव भरतार हो ||५||
ॐ घां घीं घूं घौं घः जगदापद्विनाशनाय ही शांतिनाथाय क्षुधा रोग विनाशनाय नैवेद्य निर्वपामीति स्वाहा ।
कर्पूर निर्मित दीप लेकर आरती करता सदा दैदीप्य होवे निज सदन, पावे नहीं भी दुःख कदा ॥
श्री शांतिनाथ महान् हो प्रभु शान्ति के दातार हो । तीर्थकर हो चक्रवर्ती नार शिव भरतार हो ||६||
ॐ झां झीं झूं झौं झ: जगदापद्विनाशनाय ह्रीं शाँतिनाथाय मोहान्धकार विनाशनाय दीप निर्वपामीति स्वाहा।
अगर चन्दन आदि सुरभित धूप से पूजा करूँ । पाप सारे नाश होवें कर्म आठों को हरूँ
श्री शांतिनाथ महान् हो प्रभु शान्ति के दातार हो । तीर्थकर हो चक्रवर्ती नार शिव भरतार हो ॥७॥
ॐ श्रां श्रीं श्रूं श्रीं श्रः जगदापद्विनाशनाय ही शाँतिनाथाय अष्ट कर्म विनाशनाय धूप निर्वपामीति स्वाहा ।
नारिंग केले पूङ्ग श्रीफल आम जम्बीरी घने | पूजते श्री शाँति जिन को मिले वांछित शोभने ॥
श्री शांतिनाथ महान् हो प्रभु शान्ति के दातार हो । तीर्थकर हो चक्रवर्ती नार शिव भरतार हो ||८||
ॐ खा खीं खूं खौ खः जगदापद्विनाशनाय ही शांतिनाथायो फल प्राप्तये फल निर्वपामीति स्वाहा।
नीरादि फल पर्यन्त बसु ले द्रव्य जिनवर पूजते । विघ्न नाशे ज्ञान भासे सुमन पूजित हूजते ॥
श्री शांतिनाथ महान् हो प्रभु शान्ति के दातार हो । तीर्थकर हो चक्रवर्ती नार शिव भरतार हो ||९||
ॐ अं हां सिं आ हूँ उ ह्रौं सा ह्रः जगदापद्विनाशनाय अनर्थ पद प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
स्तवन
दोहा-
स्तवन करे जिनराज का अनुपम सुखद सुसार । जाल नसे संसार का होवे सुक्ख अपार स्तवन माला ॥
जय ज्ञान रूप ओंकार नमो, जय ह्रीं मध्य प्रभु शांति नमो ।
जय स्थावर जीव सुरक्ष नमो, जय एक अनेक सुईष नमो ||१||
जय चक्रवर्ती श्रीमान् नमो, जय शांति रूप परमात्म नमो ।
जय केवल ज्ञान सु भानु नमो जय नाना भाषा रूप नमो ॥२॥
जय इच्छा रहित सुशांति नमो, जय गुण समुद्रशुभ गीत नमो ।
जय अष्ट कर्म हन वीर नमो, जय तीर्थकर शांतीश नमो ||३||
जय रहित विकल्प निःकंप नमो, जय मुक्ति वधु परमात्म नमो ।
जय यति आधार सु चतुर नमो, जय लीन निजातम रूप नमो ||४||
जय रत्नत्रय गुण युक्त नमो, जय ज्ञान व्याप्त परमेश नमो ।
जय पर सुख दाता विष्णु नमो, जय जीव दयामय तीर्थ नमो ॥५॥
जय विश्वहितंकर वाणि नमो, जय शांतिनाथ गुण थोक नमो ।
जय दुर्जय विषहर अगद नमो, जय कुरु वंशापति देव नमो ॥६॥
जय ऋषिमन हर्षित कार नमो, जय कुल क्रम भृत अरहंत नमो ।
जय अद्भुत रूप स्वरूप नमो, जय ह्रीं बीज से युक्त नमो ||७||
जय क्षमा शांति के ईश नमो, जय विघ्न विनाशक वीर नमो ।
जय संज्ञा शांति सुशोभ नमो, जय भय हर्ता जग बन्धु नमो ॥८॥
जय माया रहित सु शांति नमो, जय मुक्ति पुरी के ईश नमो ।
जय पाप कलाप विनाश नमो, ब्रह्म सूरज को प्रभु तार नमो ॥९॥
गीता
जो शांति अष्टक को सदा ही कंठ धारे हार सम । उनके घरों में होय सम्पद विपद भागे एक दम ||
अन्त में वह कर्म हनि कर पाय मुक्ति स्वभाव से । याते सदा पद कमल पूजों नाम कर ले भाव से ।। पुष्पांजलि
दोहा
शान्ति अष्टक को सदा पढ़ता मन उमगाय |
दुःख नाशे उसका सभी अन्तिम शिवपुर जाय ॥
प्रथम वलयाष्ट कोष्ठों परि पुष्पांजलिं क्षिपेत् ॥
English Translation of Pujan
शांतिनाथ विधान डाउनलोड करें ( Download shantinath vidhan PDF)
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