आदिपुराण पर्व 45 – जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 153 से 160 | श्लोक 161 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 45- Shlok 212 to 219
श्लोक ( Shlok ) 212
‘प्रमाणकालभावेभ्यो यद्रतेः समता तयोः । ततः सम्भोग श्रृङ्गारावारापारान्तगौ हि तौ ॥ २१२॥
चूँकि प्रमाण, काल और भावसे इन दोनोंके प्रेममें समानता थी इसलिये ही वे दोनों संभोग शृङ्गाररूपी समुद्रके अन्त तक पहुंच गये थे ।। २१२।।
Since their love was perfectly matched in measure, in timing, and in feeling, the two of them thus reached the very depths of the ocean of erotic delight.” 212
श्लोक ( Shlok ) 213
अतिपरिणतरत्या लोपितालेपनादिः स सकलकरणानां गोचरीभूय तस्याः ।हितपरविषयाणां” सा “तस्यैवमेतौ समरतिकृतसाराण्यन्वभूतां सुखानि ॥ २१३॥
खूब बढ़े हुए प्रेमसे जिसने विलेपन आदि छोड़ दिया है ऐसा वह जयकुमार सुलोचनाकी सब इन्द्रियोंका विषय रहता था और सुलोचना भी जय-कुमारके हित करनेवाले विषयोंमें तत्पर रहती थी, इस प्रकार ये दोनों ही समान प्रीति करना ही जिनका सारभाग है ऐसे सुखोंका उपभोग करते थे ॥ २१३॥
“Overflowing with ever-deepening love, Jayakumara had forsaken all other ornaments and adornments, becoming himself the sole object of Sulochana’s every sense. In turn, Sulochana devoted herself wholeheartedly to all that would bring joy and benefit to Jayakumara. Thus did the two of them, whose essence lay in a love perfectly mutual, partake of pleasures born of this profound and harmonious affection.”213
श्लोक ( Shlok ) 214
मनसि मनसिजस्यावापि सौख्यं न ताभ्यां पृथगनुगतभावै सङ्गताभ्यां नितान्तम् ।”करणमुखसुखै स्तैस्तन्मनः प्रीतिमापत् भवति परमुखं च क्वापि सौख्यं सुतृप्त्यै ॥२१४।॥
पृथक् पृथक् उत्पन्न हुए परि-णामोंसे खूब मिले हुए उन दोनोंने अपने मनमें कामदेवका सुख नहीं पाया था किन्तु इन्द्रियोंसे उत्पन्न हुए उन उन सुखोंसे उनके मन प्रीतिको अवश्य प्राप्त हुए थे सो ठीक ही है क्योंकि दूसरे-के द्वारा उत्पन्न हुआ सुख क्या कहीं उत्तम तृप्तिके लिये हो सकता है ? ॥ २१४।।
“Though the two, bound by distinct and individual states of being, found themselves deeply united, they did not attain in their hearts the ultimate bliss of love’s consummation as envisioned by Kama himself. Yet, through the varied pleasures born of their senses, their hearts did indeed taste the sweetness of mutual affection. And rightly so—for how could any pleasure brought about by another ever grant the highest and most perfect fulfillment?” 214
श्लोक ( Shlok ) 215
शिशिरसुरभिमन्दोच्छ्वासजैै स्वै समीरै-मृदुमधुरवचोभिः त्वादनीयप्रदेशैः ।ललिततनु लताभ्यां मार्दवैकाकराभ्याम् मखिलमनयतां तौ सौख्यमात्मेन्द्रियाणि ॥२१५॥
अपने श्वासो-च्छ्वाससे उत्पन्न हुए शीतल सुगन्धित और मन्द पवनसे, कोमल और मधुर वचनोंसे, स्वाद लेने योग्य अधर आदि प्रदेशोंसे और कोमलताकी एक खान स्वरूप सुन्दर शरीररूपी लतासे वे दोनों अपनी इन्द्रियोंको समस्त सुख पहुंचाते थे ॥ २१५॥
With the cool, fragrant, and gentle breezes arising from their mingled breaths, with tender and melodious words, with lips and other regions delectable to the taste, and with their beautiful, vine-like bodies that were the very abode of softness, the two of them bestowed supreme delight upon all their senses.”215
श्लोक ( Shlok ) 216
हृतसरसिजसारै रिष्टचेटीय मानैः सततरतनिमित्तैर्जाल मार्गप्रवृत्तैः ।मृदुशिशिरतरैः सम्प्रापतुस्तौ समीरैः सुरत विरतिजातस्वेदविच्छेदसौख्यम् ॥२१६॥
जिसने कमलका सार भाग हरण कर लिया है, जो प्रिय दासके समान आचरण करता है, निरन्तर संभोगका साधन रहता है, झरोखेके मार्गसे आता है और अत्यन्त कोमल (मान्द) तथा शीतल है ऐसे पवनसे वे दोनों ही संभोग के बाद उत्पन्न हुए पसीना सूखनेका सुख प्राप्त करते थे ।। २१६॥
“With the breeze that had stolen the very essence of the lotus, that behaved like a devoted servant, that ever served as an instrument of their amorous play, that entered through the lattice windows, and that was exquisitely gentle and refreshingly cool—both of them found bliss in the soothing comfort of their sweat drying after their passionate union.” 216
श्लोक ( Shlok ) 217
तां तस्य वृत्तिरनुवर्तयति स्म तस्या-श्चैनं ‘तदेव रतितृप्तिनिमित्तमासीत् ।प्रेमा पदत्र निज भावचिन्त्यमन्त्य -सातोदयश्च भवभूतिफलं तदेव ॥२१७॥
जयकुमारकी प्रवृत्ति सुलोचनाके अनुकूल रहती थी और सुलोचनाकी प्रवृत्ति जयकुमारके अनुकूल रहती थी । उन दोनोंका परस्पर एक दूसरेके अनुकूल रहना ही उनके रतिजन्य संतोषका कारण था जो चिन्तवनमें न आ सके ऐसा प्रेम इन्हीं दम्पतियोंमें पूर्णताको प्राप्त हुआ था, इन्हींके सातावेदनीय-का अन्तिम उदय था और यही सब इनके जन्म लेनेका फल था ।। २१७।।
“Jayakumara’s inclinations were ever attuned to Sulochana’s wishes, and Sulochana’s inclinations were ever attuned to Jayakumara’s desires. This mutual harmony of hearts was the true cause of their profound satisfaction in love—a love so perfect that it defied all attempts to grasp it in thought. In this blessed couple alone did such love reach its fullest bloom, marking the final fruition of the seven kinds of painful karmic fruition, and serving as the ultimate purpose of their birth.”217
श्लोक ( Shlok ) 218
कामोऽगमत् सुरतवृत्तिषु तस्य शिष्य-भाव सुधीरिति रतिश्च सुलोचनायाः ।को गर्वमुद्वहति चेन्न वृथाभिमानी स्वष्टार्थसिद्धिविषयेष गुणाधिकेषु ॥२१८॥
बुद्धिमान् कामदेव, संभोग चेष्टाओंके समय जयकुमारका शिष्य बन गया था और रति सुलोचनाकी शिष्या बन गई थी सो ठीक ही है क्योंकि मनुष्य यदि व्यर्थका अभिमानी न हो तो ऐसा कौन हो जो अपने इष्ट पदार्थकी सिद्धिके विषयभूत अधिक गुणवाले पुरुषोंके साथ अभिमान करे ? ॥२१८॥
“During their passionate delights, wise Kama himself became a disciple at the feet of Jayakumara, while Rati humbly served as a pupil to Sulochana. And rightly so—for who, unless blinded by vain pride, would dare boast before those of greater excellence in attaining the very object of one’s deepest desire?”218
श्लोक ( Shlok ) 219
एवं सुखानि तनुजान्यनुभूय तौ च नैवेयतुश्चिररतेऽप्यभिलाषकोटिम् ।धिक्कष्टमिष्टविषयोत्थसुखं सुखाय तद्वीत विश्वविषयाय बुधा यतध्वम् ॥२१९॥
इस प्रकार शरीरसे उत्पन्न हुए सुखोंका अनुभव कर चिरकाल तक रमण करनेपर भी वे दोनों इच्छाओंकी अन्तिम अवधिको प्राप्त नहीं हुए थे उनकी इच्छाएं पूर्ण नहीं हुई थीं । इसलिये कहना पड़ता है कि इष्ट विषयोंसे उत्पन्न हुए सुखको भी धिवकार है। हे पण्डितो, तुम उसी सुखके लिये प्रयत्न करो जो कि संसारके सब विषयोंसे अतीत है ।। २१९।।
“Thus, though they reveled for a long time in pleasures born of the body and delighted ceaselessly in one another’s company, they still could not reach the final limit of their desires—their cravings were never truly fulfilled. Therefore, it must be said that even the pleasures arising from cherished objects are worthy of reproach. O wise ones, strive instead for that joy which transcends all worldly objects and lies beyond the reach of the senses.”219
इत्यार्षे भगवद्गुणभद्राचार्यप्रणीते त्रिषष्टिलक्षणश्रीमहापुराणसङ्ग्रहे जयसुलोचना-सुखानुभवव्यावर्णनं नाम पञ्चचत्वारिंशत्तमं पर्व ॥४५॥
इस प्रकार भगवद्गुणभद्राचार्य प्रणीत त्रिषष्टिलक्षण महापुराणसंग्रहके हिन्दी भाषानुवादमें जय-कुमार और सुलोचनाके सुखभोगका वर्णन करनेवाला यह पैंतालीसवां पर्व समाप्त हुआ
Thus ends the forty-fifth canto, describing the pleasures of Jayakumara and Sulochana, in this Hindi translation of the Trishashtilakshana Mahapurana Sangraha, composed by the venerable Acharya Gunabhadra.
आदिपुराण पर्व 46 – जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन
पर्व 46 – श्लोक 1 से 13
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208 | सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 339 | जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 367
आदिपुराण पर्व 45 – जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 103 | श्लोक 104 से 113 | श्लोक 114 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 160 | श्लोक 161 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211