शीतल पुराण का वर्णन पर्व 56 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22
English translation of Uttar Puran parv 56- shlok 23 to 31
श्लोक ( Shlok ) 23 – 27
तस्मिन्भुवं समायाति षण्मासस्थितिजीविते । द्वीपेऽस्मिन् भारते वर्षे विषये मल याह्वये ॥ २३ ॥राजा भद्रपुरे वंशे पुरोर्दृढरथोऽभवत् । महादेवी सुनन्दास्य तद्गृहं धनदाशया ॥ २४ ॥ रत्नैरपूरयन् देवाः षण्मासैर्गुह्यकाद्धयाः । सापि स्वमाग्निशाप्रान्ते षोडशालोक्य मानिनी ॥ २५ ॥प्रविशम्तं गर्ज चास्ये भूपतेस्तत्फलान्यवैत् । तदाद्याषाढनक्षत्रे कृष्णाष्टम्यां दिवश्च्युतः ॥ २६ ॥चैत्रे स देवः स्वर्गाग्रत् गुणैः सदृत्ततादिभिः । भावी शुक्तिपुटे तस्या वाबिन्दुर्बोदरेऽभवत् ॥ २७ ॥
जब उस इन्द्रकी आयु छह माहकी बाकी रह गई और वह पृथिवी पर आनेके लिए उद्यत हुआ तब जम्बूद्वीपके भरत क्षेत्र सम्बन्धी मलय नामक देशमें भद्रपुर नगरका स्वामी इक्ष्वाकुवंशी राजा दृढ़रथ राज्य करता था। उसकी महारानीका नाम सुनन्दा था। कुबेरकी आज्ञासे यक्ष जातिके देवोंने छह मास पहलेसे रत्नोंके द्वारा सुनन्दाका घर भर दिया। मानवती सुनन्दाने भी रात्रिके अन्तिम भागमें सोलह स्वप्न देखकर अपने मुखमें प्रवेश करता हुआ एक हाथी देखा। प्रातःकाल राजासे उनका फल ज्ञात किया और उसी समय चैत्रकृष्ण अष्टमी के दिन पूर्वाषाढ़ा नक्षत्रमें सदृत्तता – सदाचार आदि गुणोंसे उपलक्षित वह देव स्वर्गसे च्युत होकर रानीके उदमें उस प्रकार अवतीर्ण हुआ जिस प्रकार कि सद्वृत्तता – गोलाई आदि गुणोंसे उपलक्षित जलकी बूँद शुक्तिके उदरमें अवतीर्ण होती है ।। २३-२७ ॥
“When only six months of that Indra’s lifespan remained and he prepared to descend to Earth, the Ikshvaku-dynasty King Dridharatha was ruling the city of Bhadrapura in the Malaya region of Bharat-kshetra (Jambudvipa). His queen’s name was Sunanda. By the command of Kubera, the celestial Yakshas began filling Sunanda’s home with gems six months in advance.
The noble Sunanda, during the final watch of the night, beheld the sixteen auspicious dreams and saw a magnificent elephant entering her mouth. In the morning, she learned the significance of these dreams from the King. At that very moment, on the eighth day of the dark half of the month of Chaitra, under the Purvashadha constellation, that deity—distinguished by his virtuous conduct—descended from heaven into the Queen’s womb. He entered just as a round, flawless drop of water descends into the heart of a pearl oyster.”23 – 27
श्लोक ( Shlok ) 28
आदिकल्याणसत्पूजां प्रीत्यैत्य विदधुः सुराः । द्वादश्यामसिते माघे विश्वयोगेऽजनि क्रमात् ॥ २८ ॥
देवोंने आकर बड़े प्रेमसे प्रथम कल्याणककी पूजा की। क्रम-क्रमसे नव माह व्यतीत होनेपर माघकृष्ण द्वादशीके दिन विश्वयोगमें पुत्र-जन्म हुआ ॥ २८ ॥
“The deities arrived with great devotion and performed the worship of the first auspicious event (Garbha Kalyanak). In due course, as nine months passed, the son was born on the twelfth day of the dark half of the month of Magha, under the auspicious Vishvayoga alignment.”28
श्लोक ( Shlok ) 29
तदैवागत्य तं नीत्या महामेरुं महोत्सवाः । देवा महाभिषेकान्ते व्याहरन्ति स्म शीतलम् ॥ २९ ॥
उसी समय बहुत भारी उत्सवसे भरे देव लोग आकर उस बालकको सुमेरु पर्वत पर ले गये। वहाँ उन्होंने उसका महाभिषेक किया और शीतलनाथ नाम रक्खा ॥२९।।
“At that very moment, the celestial beings—filled with the joy of a grand celebration—arrived and carried the child to the summit of Mount Sumeru. There, they performed the Mahabhisheka (the Great Coronation Bath) and bestowed upon him the name Lord Shitalnath.”29
श्लोक ( Shlok ) 30 – 31
नवकोव्यब्धिमानोक्तपुष्पदन्तान्तरान्तिमे । पल्योपमचतुर्भागे म्युच्छिन्ने धर्मकर्मणि ॥ ३० ॥तदभ्यन्तरवर्त्यायुरुत्पन्नः कनकच्छविः । खपञ्चकैकपूर्वायुर्धनुर्नवतिविग्रहः ॥ ३१ ॥
भगवान् पुष्पदन्तके मोक्ष चले जानेके बाद नौ करोड़ सागरका अन्तर बीत जानेपर भगवान् शीतलनाथका जन्म हुआ था। उनकी आयु भी इसीमें सम्मिलित थी । उनके जन्म लेनेके पहले पल्यके चौथाई भाग तक धर्म-कर्मका विच्छेद रहा था। भगवान्के शरीरकी कान्ति सुवर्णके समान थी, आयु एक लाख पूर्वकी थी और शरीर नब्बे धनुष ऊँचा था ॥ ३०-३१ ॥
“Lord Shitalnath was born after an interval of nine crore Sagaras had passed since the Nirvana (liberation) of Lord Pushpadanta; his own lifespan was also included within this duration. For a period of one-fourth of a Palya prior to his birth, the practice of religious duties (Dharma) had been interrupted. The Lord’s body possessed a golden luster, his lifespan spanned one lakh Purvas, and his height was ninety Dhanushas.”30 – 31
श्लोक 32 से 41
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