श्रेयांसनाथ तीर्थकर त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण के पुराणका वर्णन श्लोक 63 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 91
English translation of Uttar Puran parv 57- shlok 92 to 100
श्लोक ( Shlok ) 92
त्रिपृष्ठस्य धनुःशङ्खचक्रदण्डासिशक्तयः । गदा च सप्तरत्नानि रक्षितान्यभवत्सुरैः ॥ ९२ ॥
त्रिपृष्ठके धनुष, शंख, चक्र, दण्ड, असि, शक्ति और गदा ये सात रत्न थे जो कि देवोंसे सुरक्षित थे ॥ ९२ ॥
Triprishta possessed seven jewels: the Bow, Conch, Discus (Chakra), Staff, Sword, Spear (Shakti), and Mace (Gada); these were divine treasures protected by the gods. || 92 ||
श्लोक ( Shlok ) 93
रामस्यापि गदा त्नमाला “समुशलं हलम् । श्रद्धानज्ञानचारित्रतपांसीवाभवन्ड्रिये ॥ ९३ ॥
बलभद्रके भी गदा, रत्नमाला, मुसल और हल, ये चार रत्न थे जो कि सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र और तपके समान लक्ष्मीको बढ़ानेवाले थे ॥ ९३॥
Balabhadra (Vijay) also possessed four jewels: the Mace, Jeweled Garland, Pestle (Musal), and Plough (Hal); these four increased his prosperity just as Right Belief, Right Knowledge, Right Conduct, and Austerity enhance spiritual wealth. || 93 ||
श्लोक ( Shlok ) 94
देव्यः स्वयम्प्रभामुख्या मुकुटेशमा बभुः । केशवस्य तदर्द्धास्ता रामस्यापि मनःप्रियाः ॥ ९४ ॥
त्रिपृष्ठकी स्वयंप्रभाको आदि लेकर सोलह हजार स्त्रियाँ थीं और बलभद्रके चित्तको प्रिय लगनेवाली आठ हजार स्त्रियाँ थीं ॥ ९४ ॥
Triprishta had sixteen thousand wives, headed by Swayamprabha; meanwhile, Balabhadra (Vijay) had eight thousand wives who were dear to his heart. || 94 ||
श्लोक ( Shlok ) 95
स संरम्य चिरं ताभिर्बद्धारम्भपरिग्रहः । सप्तमीं पृथिवीं प्राप केशवश्वाश्वकन्धरः ॥ ९५ ॥
बहुत आरम्भ और बहुत परिग्रहको धारण करनेवाला त्रिष्पृष्ठ नारायण उन स्त्रियोंके साथ चिरकाल तक रमण कर सातवीं पृथिवीको प्राप्त हुआ-सप्तम नरक गया । इसी प्रकार अश्वग्रीव प्रतिनारायण भी सप्तम नरक गया ॥ ९५ ॥
Having indulged in excessive worldly activities (Aarambh) and possessed vast material attachments (Parigraha), Triprishta Narayana sported with those women for a long time; consequently, he reached the seventh earth—that is, he went to the Seventh Hell. Similarly, Ashvagriva Pratinarayana also went to the Seventh Hell. || 95 ||
श्लोक ( Shlok ) 96
सीरपाणिश्च तदुःखात्तदैवादाय सयमम् । सुवर्णकुम्भयोगीन्द्रादभूदगृहकेवली ॥ ९६ ॥
बलभद्रने भाईके दुःखसे दुःखी होकर उसी समय सुवर्णकुम्भ नामक योगिराजके पास संयम धारण कर लिया और क्रम-क्रमसे अनगारकेवली हुआ ॥ ९६ ॥
Distressed by the sorrow of losing his brother, Balabhadra (Vijay) immediately adopted self-restraint (Samyama) under a great sage named Suvarnakumbha; by practicing gradually, he eventually became an Anagar-kevali (a detached, omniscient saint). || 96 ||
श्लोक ( Shlok ) 97
कृत्वा राज्यममू सहैव सुचिरं भुक्त्वा सुखं तादृशं पृथ्वीमूलमगात्किलाखिलमहादुःखालयं केशवः । रामो धाम परं सुखस्य जगतां मूर्द्धनमध्यास्त धिक् दुष्टं कः सुखभाग्विलोमगविधिं यावश्न हन्यादमुम् ॥ ९७ ॥
देखो, त्रिपृष्ठ और विजयने साथ ही साथ राज्य किया, और चिरकाल तक अनुपम सुख भोगे परन्तु नारायण-त्रिपृष्ठ समस्त दुःखोंके महान् गृह स्वरूप सातवें नरकमें पहुँचा और बलभद्र सुखके स्थानभूत त्रिलोकके अग्रभाग पर जाकर अधिष्ठित हुआ इसलिए प्रतिकूल रहनेवाले इस दुष्ट कर्मको धिक्कार हो । जब तक इस कर्मको नष्ट नहीं कर दिया जावे तब तक इस संसारमें सुखका भागी कौन हो सकता है ? ॥ ९७ ॥
Behold! Triprishta and Vijay ruled together and enjoyed incomparable pleasures for a long time; yet Triprishta Narayana reached the Seventh Hell, which is the great abode of all miseries, while Balabhadra (Vijay) became established at the pinnacle of the three worlds (Siddhashila), the source of ultimate bliss. Therefore, fie upon this wicked Karma that acts so adversely! Until this Karma is completely destroyed, who in this world can truly partake in lasting happiness? || 97 ||
श्लोक ( Shlok ) 98
प्राग्विश्वनन्दीति विशामधीशस्ततो महाशुक्रमधिष्ठितोऽमरः । पुनस्त्रिपृष्टो भरतार्द्धचक्री चिताधकः सप्तमभूमिमाश्रयत् ॥ ९८ ॥
त्रिष्पृष्ठ, पहले तो विश्वनन्दी नामका राजा हुआ फिर महाशुक्र स्वर्गमें देव हुआ, फिर त्रिष्पृष्ठ नामका अर्धचक्री- नारायण हुआ और फिर पापोंका संचय कर सातवें नरक गया ॥ ९८ ॥
Triprishta‘s journey was thus: first, he was the prince named Vishvanandi; then, he became a celestial being in the Mahashukra Heaven; after that, he was born as the Half-Chakravartin Narayana (Vasudeva) named Triprishta; and finally, by accumulating sins, he went to the Seventh Hell. || 98 ||
श्लोक ( Shlok ) 99
विशाखभूतिर्धरणीपतिर्यमी मरुन्महाशुक्रगतस्ततश्च्युतः । हलायुधोऽसौ विजयाह्नयः क्षयं भवं स नीत्वा परमात्मतामितः ॥ ९९ ॥
बलभद्र, पहले विशाखभूति नामका राजा था फिर मुनि होकर महाशुक्र स्वर्गमें देव हुआ, वहाँ से चयकर विजय नामका बलभद्र हुआ और फिर संसारको नष्ट कर परमात्म-अवस्थाको प्राप्त हुआ ॥ ९९ ॥
Balabhadra’s journey was thus: first, he was the king named Vishakhabhuti; then, having become a monk, he was reborn as a celestial being in the Mahashukra Heaven. Descending from there, he became the Balabhadra named Vijay, and finally, having destroyed the cycle of worldly existence, he attained the state of Supreme Divinity (Paramatma). || 99 ||
श्लोक ( Shlok ) 100
विशाखनन्दी विहतप्रतापो १ व्यसुः परिभ्रम्य भवे चिरं ततः । खगाधिनाथो हयकन्धराह्वयो रिपुस्त्रिष्पृष्ठस्य ययावधोगतिम् ॥ १०० ॥
प्रतिनारायण पहले विशाखनन्दी हुआ, फिर प्रताप रहित हो मरकर चिरकाल तक संसारमें भ्रमण करता रहा, फिर अश्वग्रीव नामका विद्याधर हुआ जो कि त्रिष्पृष्ठ नारायणका शत्रु होकर अधोगति – नरक गतिको प्राप्त हुआ ॥ १०० ॥
The Prati-narayana, in his previous life, was Vishakhanandi. After dying in a state devoid of glory, he wandered through the cycle of worldly existence for a vast period. Later, he was born as the Vidyadhara named Ashvagriva, who, by becoming the enemy of Triprishta Narayana, ultimately fell into the lower state—the realm of Hell. || 100 ||
इत्यार्षे भगवद्गुणभद्राचार्यप्रणीते त्रिषष्टिलक्षणमहापुराणसंग्रहे श्रेयस्तीर्थकरत्रिपृष्ठ-विजयाश्वग्रीवपुराणं परिसमाप्तं सप्तपञ्चाशत्तमं पर्व ॥ ५७ ॥
इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, भगवद्गुणभद्राचार्य प्रणीत त्रिषष्टि लक्षण महापुराण संग्रहमें श्रेयांसनाथ तीर्थंकर त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायणके पुराणका वर्णन करनेवाला सत्तावनवाँ पर्व समाप्त हुआ
Thus ends the fifty-seventh chapter of the Mahapurana Sangrah, famously known as Arsha, composed by Bhagavad Gunabhadracharya, which narrates the history (Purana) of the Tirthankara Shreyansanatha, the Narayana Triprishta, the Balabhadra Vijay, and the Prati-narayana Ashvagriva.
पर्व 58 – श्लोक 1 से 11
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
अजितनाथ तीर्थंकर तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ तीर्थकर पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ तीर्थंकर पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ भगवान् पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पुराण का वर्णन पर्व 54 – श्लोक 1 से 276
पुष्पदन्त पुराण का वर्णन पर्व 55 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 | श्लोक 32 से 42 | श्लोक 43 से 51
श्लोक 52 से 62
शीतल पुराण का वर्णन पर्व 56 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 55 | श्लोक 56 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 96
श्रेयांसनाथ तीर्थकर त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण के पुराणका वर्णन पर्व 57 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 62 | श्लोक 63 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 91
Download PDF
आदिपुराण उत्तरपुराण हिन्दी-भाषानुवाद
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 |पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 | उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 | पर्व 54 | पर्व 55 |
आदिपुराण उत्तरपुराण सारांश
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 |पर्व 11 |पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 |पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 | पर्व 54 | पर्व 55 |
