आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 322 | श्लोक 323 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 352 | श्लोक 353 से 361 | श्लोक 362 से 367
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 45- Shlok 1 to 11
श्लोक ( Shlok ) 1
अथ मेघस्वरो गत्वा ‘प्रथमानपराक्रमः । मथितारातिदुर्गर्वः पृथु स्वावासमास्थितः ॥१॥
अथानन्तर-प्रसिद्ध पराक्रमका धारक और शत्रुओंके मिथ्या अभिमानको नष्ट करने- वाला जयकुमार अपने विशाल निवास स्थानमें जाकर ठहर गया ।।१।।
“Thereafter, Jayakumāra—renowned for his boundless valour and the destroyer of the false pride of his enemies—retired to his grand and spacious abode.” ॥1॥
श्लोक ( Shlok ) 2 – 7
स्वयं च सञ्चिताघानि हन्तुं स्तुत्वा जिनेशिनः अकम्पनमहाराजः समालोक्य सुलोचनाम् ॥२॥कृताहारपरित्याग नियोगामायुधस्तदा । “सुप्रभाकृतपर्युष्टिं कार्योत्सर्गेण सुस्थिताम् ।।३।। सर्वशान्तिकरीं ध्याति ध्यायन्तीं स्थिरचेतसा । धर्म्या मेकाग्रूयनिष्पन्दां जिनेन्द्राभिमुखीं मुदा ॥४॥समभ्यर्च्य समाश्वास्य प्रशस्य बहुशो गुणान् । भवन्माहात्म्यतः पुत्रि शान्तं सर्वममङ्गलम् ॥५॥ प्रतिध्वस्तानि पापानि “नियाममुपसंहर’ । इत्युत्क्षिप्तकरामुक्त्वा पुरस्कृत्य सुतां सुतैः ॥६॥ हृष्टः सुप्रभया चामा राजगेहं प्रविश्य सः । ‘याहि पुत्रि निजागारं विसज्येंति सुलोचनाम् ॥७॥
इधर महाराज अकंपन ने स्वयं संचित किये हुए पाप नष्ट करनेके लिये श्री जिनेन्द्रदेवकी स्तुति की और फिर जिसने युद्ध समाप्त होनेतक आहारके त्याग करनेका नियम ले रक्खा है, माता सुप्रभा जिसके समीप बैठी हुई है, जो कायोत्सर्गसे खड़ी हुई है, स्थिरचित्तसे सब प्रकारकी शान्ति करनेवाला धर्म-ध्यान कर रही है, एकाग्र मनसे निश्चल है और आनन्दसे जिनेन्द्रदेवके सन्मुख खड़ी है ऐसी सुलोचनाको देखकर उसका सत्कार किया, आश्वासन देकर उसके गुणोंकी अनेक बार प्रशंसा की तथा इस प्रकार शब्द कहे हे ‘पुत्रि, तुम्हारे माहात्म्यसे सब अमंगल शान्त हो गये हैं, सब प्रकारके पाप नष्ट हो गये हैं, अब तू अपने नियमोंका संकोच कर ।’ ऐसा कहकर उन्होंने हाथ जोड़कर खड़ी हुई सुलोचनाको आगे किया और राजपुत्रों तथा रानी सुप्रभाके साथ साथ राज-भवनमें प्रवेश किया। फिर ‘हे पुत्रि ! तू अपने महलमें जा’ ऐसा कहकर सुलोचनाको बिदा किया ॥२-७।।
Meanwhile, King Akampana, seeking to efface the sins he had himself accrued, offered fervent praise to the venerable Lord Jina. Thereafter, he beheld Sulocanā—she who had vowed to renounce sustenance until the war had come to its end, she who now stood in kāyotsarga, motionless, her mind tranquil, immersed in supreme meditative absorption that calms all unrest. By her side sat her mother, Queen Suprabhā. With unwavering focus and a heart radiant with bliss, she stood before the Lord in devotional composure.Seeing her thus, he received her with reverence, consoled her with kind words, and extolled her virtues again and again. Then, he spoke these words:“O daughter, by the power of your merit, all inauspiciousness has been quelled, and every sin has been dissolved. Now, thou mayest relax the strictness of thy vows.”Having spoken thus, he respectfully led Sulocanā—who stood with folded hands—forward, and accompanied by the princes and Queen Suprabhā, entered the royal palace. Then, turning to her once more, he said:“O daughter, return now to thine own quarters.”And with these words, he bid her farewell.2 – 7
श्लोक ( Shlok ) 8 -10
अन्यथा चिन्तितं कार्य देवैन न कृतमन्यथा । इति कर्तव्यतामूढः ‘सुश्रुतादिभिरिद्धधीः ॥८ औत्पत्तिक्यादि धीभेदेर्वाऽलोच्य सचिवोत्तमैः । विद्याधरधराधीशान् विपाशीकृत्य कृत्यवित् ।।९।।विश्वानाश्वास्य तद्योग्यैः सामसारैरुदीरितैः । सम्यग्विहितसत्कारः स्नानवस्त्रासनादिभिः ॥१०॥
पुनः यह कार्य अन्य प्रकार सोचा गया था और दैवने अन्य प्रकार कर दिया अब क्या करना चाहिये इस विषयमें मूढताको प्राप्त हुए अतिशय बुद्धिमान् महाराज अकंपनने औत्पत्तिकी आदि ज्ञानके भेदोंके समान सुश्रुत आदि उत्तम मंत्रियोंके साथ विचारकर विद्याधर राजाओंको छोड़ दिया। फिर कार्यको जाननेवाले उन्हीं अकंपनने बड़ी शान्तिसे उनके योग्य कहे हुए वचनोंसे उन सबको आश्वासन देकर स्नान, वस्त्र, आसन आदिसे सबका अच्छी तरह सत्कार किया ॥८-१०।।
What had been conceived in one manner was altered by fate and brought to pass in another. In the face of this unexpected turn, even the exceedingly wise King Akampana found himself momentarily bewildered. Then, reflecting deeply with the noble ministers—such as the esteemed Suśruta—well-versed in the subtle distinctions of scriptural and intuitive knowledge, he resolved to release the Vidyādhara kings.
Thereafter, Akampana—who truly understood the nature of right action—addressed them with calm and well-considered words suited to their dignity, offering them reassurance. He then extended gracious hospitality to all, honouring them with ceremonial baths, fine garments, comfortable seats, and every mark of royal courtesy.8 -10
श्लोक ( Shlok ) 11
“कुमार वंशौ युष्माभिर्विहितौ वर्धितौ च नः । तरुर्विषमयोऽप्येति “यतोऽभून्न ततः क्षयम् ॥११॥
तथा अर्ककीर्तिसे कहा कि ‘हे कुमार ! हमारे नाथवंश और सोम-वंश दोनों ही आपके द्वारा बनाये गये हैं और आपके द्वारा ही बढ़ रहे हैं। विषका वृक्ष भी जिससे उत्पन्न होता है उससे फिर नाशको प्राप्त नहीं होता ॥११॥
Then he said to Arkakīrti:
“O Prince, both the Nāthavaṃśa and the Soma lineage have been established and are flourishing through your might alone. Even the tree of poison, once brought forth by someone, does not bring about the ruin of its source.”11
श्लोक 12 से 21
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208
आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 46 | श्लोक 47 से 69 | श्लोक 70 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 264 | श्लोक 265 से 275 | श्लोक 276 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 332 से 339
आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 103 | श्लोक 104 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 203 | श्लोक 204 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 322 | श्लोक 323 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 352 | श्लोक 353 से 361 | श्लोक 362 से 367