आदिपुराण पर्व 47 – प्रथम तीर्थंकर और प्रथम चक्रवर्ती का वर्णन पर्व 47 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 30 | श्लोक 31 से 45 | श्लोक 46 से 64 | श्लोक 65 से 108 | श्लोक 109 से 122
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 47- Shlok 123 to 131
श्लोक ( Shlok ) 123
कन्याकृत्यैव’ गत्वाऽतः कान्तया स सुकान्तया । रतिकान्ताख्यया कान्तवत्या च सहितः पुनः ॥ १२३॥
उस कन्याने उन दोनोंमेंसे किसीको नहीं चाहा इसलिये सुखावती उसे कन्याके आकारमें ही वहां ले गई जहां कान्ता, सुकान्ता, रतिकान्ता और कान्त-वती थी ।।१२३॥
Yet the maiden chose neither of the two suitors, and so Sukhaavati, keeping her in the form of a young girl, led her away to the place where Kanta, Sukanta, Ratikanta, and Kantavati were gathered.॥123॥
श्लोक ( Shlok ) 124
स्थितं प्राक्तनरूपेण काचित्तं वीक्ष्य लज्जिता । रतिं समागमत् काचिन्ने कभावा हि योषितः ॥ १२४॥
पहलेके समान असली रूपमें बैठ हुए कुमारको देखकर कोई कन्या लज्जित हो गई और कोई प्रीति करने लगी सो ठीक ही है क्योंकि स्त्रियोंके भाव अनेक प्रकारके होते हैं ।॥१२४।।
Seeing the prince now seated in his true form once more, some of the maidens were overcome with shyness, while others felt their hearts stirred with love for him. And rightly so, for the hearts of women are manifold in their feelings and inclinations.॥124॥
श्लोक ( Shlok ) 125 – 127
प्रसुप्तवन्तं तं तत्र प्रत्यूषे च सुखावती । यत्नेनोद्धृत्य गच्छन्ती तेनोन्मीलितचक्षुषा ॥१२५।। विहाय मामिहेकाकिनं त्वं क्व प्रस्थितेति सा । पृष्टा न क्वापि याताऽहं त्वत्समीपगता सदा ॥१२६॥आदिष्टः वनितारत्नलाभो नैवात्र ते भयम् । इत्यन्तर्हित मापाद्य स्वरूपेण समागमः ॥१२७॥
श्रीपाल रातको वहीं सोया, सोते सोते ही सवेरेके समय सुखावती बड़े प्रयत्नसे उठा ले चली, कुमारने आंख खुलनेपर उससे पूछा कि तू मुझे यहां अकेला छोड़कर कहां चली गई थी ? तब सुखावतीने कहा कि मैं कहीं नहीं गई थी, मैं सदा आपके पास ही रही हूं, यहां आपको स्त्रीरत्न प्राप्त होगा ऐसा निमित्तज्ञानीने बतलाया है, यहां आपको कोई भय नहीं है। आज तक मैं अपने रूपको छिपाये रहती थी परन्तु आज असली रूपमें आपसे मिल रही हूं” ।॥१२५-१२७॥
That night, Shripal slept there peacefully. At dawn, Sukhaavati awoke him with great care and began to lead him away. As his eyes opened, the prince asked her, “Where had you gone, leaving me alone here?”Sukhaavati replied, “I did not go anywhere; I have always remained by your side. The seers have foretold that here you shall obtain a matchless maiden. There is no cause for fear in this place. Until now, I kept my true form hidden from you, but today I come before you in my real appearance.”॥125–127॥
श्लोक ( Shlok ) 128
इत्याह तद्वचः श्रुत्वा प्रमुद्यैत्य’ खगाचले । पुरं दक्षिणभागस्थं गजादि तत्समीपगम् ॥१२८॥
उसके यह वचन सुनकर श्रीपाल बहुत ही हर्षित हुआ और वहांसे आगे चलकर विजयार्ध पर्वतके दक्षिण भागमें स्थित गजपुर नगरके समीप जा पहुंचा ।।१२८।।
Hearing these words, Shripal was filled with great joy. Setting forth once more, he journeyed onward and soon arrived near the city of Gajapura, which lay on the southern slopes of Mount Vijayardha.॥128॥
श्लोक ( Shlok ) 129
कञ्चिद् गजपतिं स्तम्भमुन्मूल्यारूढदर्पकम् । द्वात्रिंशदुक्तक्रीडाभिः क्रीडित्वा वशमानयत् ॥१२९॥
वहां कोई एक गजराज खंभा उखाड़कर मदोन्मत्त हो रहा था। उसे कुमारने शास्त्रोक्त बत्तीस क्रीड़ाओंसे क्रीड़ा कराकर वश किया ।।१२९।।
There, a mighty elephant, maddened with rut, was raging wildly, uprooting pillars in its fury. Prince Shripal, employing the thirty-two traditional arts of elephant-taming as prescribed in the scriptures, skillfully subdued the beast and brought it under his control.॥129॥
श्लोक ( Shlok ) 130 – 131
ततः समुदिते चण्डदीधितौ’ निर्जिताद् गजात् । कुमारागमनं पौरा बुद्ध्वा संतुष्टचेतसः ॥१३०॥”प्रतिकेतन मुद्दद्धचलत्केतुपताककाः । ‘प्रत्युद्गममकुर्वस्ते’ ‘तन्पुण्योदयचोदिताः ॥१३१।।
तदनन्तर सूर्योदय होते होते नगरके सब लोगों ने गजराजको जीत लेनेसे कुमारका आना जान लिया, सबने संतुष्ट चित्त होकर घर घर चञ्चल पताकाएं फहराई और कुमारके पुण्योदयसे प्रेरित होकर सब लोगोंने उसकी अगवानी की ॥१३०-१३१॥
Then, as the sun rose, word of the prince’s triumph over the mighty elephant spread swiftly through the entire city. Rejoicing at the news, the people of every household unfurled fluttering banners in delight. Inspired by the radiance of the prince’s merit, all the citizens came forth with joyful hearts to welcome him.॥130–131॥
श्लोक 132 से 141
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208 | सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 339 | जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 367 | जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 219
आदिपुराण पर्व 46 – जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन पर्व 46 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 100 | श्लोक 101 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 170 | श्लोक 171 से 181 | श्लोक 182 से 194 | श्लोक 195 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 255 | श्लोक 256 से 271 | श्लोक 272 से 286 | श्लोक 287 से 296 | श्लोक 297 से 313 | श्लोक 314 से 322 | श्लोक 323 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 361 | श्लोक 362 से 369
आदिपुराण पर्व 47 – प्रथम तीर्थंकर और प्रथम चक्रवर्ती का वर्णन पर्व 47 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 30 | श्लोक 31 से 45 | श्लोक 46 से 64 | श्लोक 65 से 108 | श्लोक 109 से 122