Hindi Translation of Adi purana Parv 47
श्लोक 1 से 12 : श्रीपाल की कथा का प्रारम्भ और नृत्य दृश्य
यह सुनकर जयकुमारने सुलोचनासे फिर पूछा कि हे प्रिये, इस कही हुई कथाम श्रीपाल चक्रवर्तीसे सम्बन्ध रखनेवाली एक कथा और भी है, वह तुझे याद है या नहीं ? सुलोचनाने कहा हां, सौभाग्यशाली श्रीपाल चक्रवर्तीकी कथा तो मुझे ऐसी याद है मानो मैंने आज ही देखी हो, यह कहकर वह उसकी कथा कहने लगी ॥१-२।। इस जम्बू द्वीपके पूर्व विदेह क्षेत्रमें एक पुण्डरीकिणी नामकी नगरी है जो कि इन्द्रकी नगरी-अमरावतीके समान अत्यन्त प्रसिद्ध है ।।३।। सूर्य और चन्द्रमा अथवा नय और पराक्रमके समान श्रीपाल और वसुपाल नामके दो भाई समस्त पृथिवीको जीतकर साथ ही साथ उसका पालन करते थे ।॥४॥ किसी एक दिन मालीने आकर वसुपालकी माता कुबेरश्रीसे कहा कि सुरगिरि नामक पर्वतपर आपके स्वामी गुणपाल मुनिराजको केवलज्ञान उत्पन्न हुआ है, यह सुनकर उसने सामने सात पेंड चलकर नमस्कार किया, मालीको पारितोषिक दिया और नगरमें घोषणा कराई कि सब लोग पूजाकी सामग्री साथ लेकर भगवान्के दर्शन करनेके लिये चलें, उसने स्वयं सबसे पहले जाकर भगवान्की वन्दना की। माताके पीछे ही श्रीपाल और वसुपाल भी बड़ी प्रसन्नतासे चले ॥५-८॥ मार्गमें वे एक उत्तम वनमें पहुंचे जो कि अच्छे अच्छे वृक्षोंसे सुन्दर था और जिसमें देवताकी प्रतिमासे युक्त किसी वट वृक्षके नीचे खड़े होकर महाराज जगत्पाल चक्रवर्तीने संयम धारण किया था । उसी वृक्षके नीचे एक दर्शनीय नृत्य हो रहा था, उसे दोनों भाई बड़े आदरसे देखने लगे ॥९-१०॥ देखते देखते कुमार श्रीपालने कहा कि यह स्त्रीका वेष धारण कर पुरुष नाच रहा है और पुरुषका रूप धारण कर स्त्री नाच रही है। यदि यह स्त्री स्त्रीके ही वेषमें नृत्य करती तो बहुत ही अच्छा नृत्य होता। श्रीपालकी यह बात सुनकर नटी मूच्छित हो गई ।।११-१२॥
श्लोक 13 से 30 नटी की पहचान और श्रीपाल का अपहरण
उसी समय अनेक उपायोंसे नटीको सचेत कर कोई स्त्री उस होनहार चक्रवर्ती श्रीपालसे विनयपूर्वक इस प्रकार कहने लगी ॥१३॥ कि सुरम्य देशके श्रीपुर नगरके राजाका नाम श्रीधर है उसकी रानीका नाम श्रीमती है और उसके जयवती नामकी पुत्री है ।।१४।। उसके जन्मके समय ही निमित्तज्ञानियोंने कहा था कि यह चक्रवर्तीकी पट्टरानी होगी और उस चक्रवर्तीकी पहिचान यही है कि जो नट और नटीके भेदको जानता हो वही चक्रवर्ती है, हम लोग उसीकी परीक्षा करनेके लिये आये हैं, पुण्योदयसे हम लोगोंने निधिके समान इच्छा-नुसार आपके दर्शन किये हैं ।॥१५-१६।। मेरा नाम प्रियरति है, यह पुरुषका आकार धारण कर नृत्य करनेवाली मदनवेगा नामकी मेरी पुत्री है और स्त्रीका वेष धारण करनेवाला यह वासव नामका नट है यह सुनकर राजाने संतुष्ट होकर उस स्त्रीको योग्यतानुसार संतोषित किया और स्वयं अपने पिताकी वन्दना करनेके लिये सुरगिरि नामक पर्वतकी ओर चला, मार्ग-में कोई पुरुष घोड़ा लाया उसपर आसक्तचित्त हो श्रीपालने सवारी की और दौड़ाया । कुछ दूरतक तो वह घोड़ा पृथिवीपर दौड़ाया परन्तु फिर अपना विद्याधरका आकार प्रकट कर उसे आकाशमें ले उड़ा। उस वट वृक्षके नीचे स्थित प्रतिमाके समीप रहनेवाले देवने उस विद्याधरको ललकारा, देवकी ललकारसे डरे हुए अशनिवेग नामके विद्याधरने अपनी भेजी हुई पर्णलघु विद्यासे उस कुमार श्रीपालको रत्नावर्त नामके पर्वतकी शिखरपर छोड़ दिया । देवने देखा कि उस पर्वतपर रहकर ही उसे बहुत लाभ होनेवाला है इसलिये वह कुमारको साथ लिये बिना ही लौट गया। कुमार भी किसी तालाबमें स्नान आदि कर मार्गमें उत्पन्न हुए परिश्रमको दूर कर बैठे ही थे कि इतनेमें एक सफेद महलसे छह राजकन्याएं निकलकर आई और कुमारको ‘यह राजाका पुत्र है’ ऐसा समझकर यथायोग्य रीतिसे दर्शन कर अपना समा-चार निवेदन करने लगीं। उन्होंने अपने गोत्र-कुल और नाम आदि बतलाकर कहां कि ‘अशनि-वेग नामके विद्याधरने हम लोगोंको यहां जबर्दस्ती लाकर पटक दिया है’ कन्याओंकी यह बात सुनकर कुमारको उनपर दया आई और वह भी अपने आनेका वृत्तान्त कहनेके लिये उद्यत हुआ । वह जिस समय अपने आनेका समाचार कह रहा था उसी समय विद्युद्वेगा नामकी एक दूसरी विद्याधरी वहां आई। पापी अशनिवेगने कुमारको मारनेके लिये इसे भेजा था परन्तु वह कुमारको देखकर कामसे पीड़ित हो गई सो ठीक ही है क्योंकि चित्तकी वृत्ति विचित्र होती है ।।१७-२८।। वह कहने लगी कि अशनिवेग नामका विद्याधर राजपुरके स्वामी राजा स्तनितवेगका पुत्र है, उसकी माताका नाम ज्योतिर्वेगा है ॥ २९॥ वह अशनिवेग मित्रताके कारण आपको यहां लाया है, वह मेरा बड़ा भाई है, मेरा नाम विद्युद्वेगा है और उसीने मुझे आपके पास भेजा है, अब वह आपका साला होता है ।॥ ३०॥
श्लोक 31 से 45 विद्युद्वेगा का प्रयास और भेरुण्ड पक्षी द्वारा अपहरण
उसने मुझसे कहा था कि तू रत्ना-वर्त पर्वतपर जा, वे वहां विराजमान हैं इसलिये ही मैं आदर सहित आपके पास आई हूं’ ऐसा कहकर उसने रागपूर्ण चेष्टाएं दिखलाई और कहा कि यह समीप ही चुनेका बना हुआ पक्का मकान है परन्तु इतना कहनेपर भी जब उसने उन महात्माकी इच्छा नहीं देखी तब वहींपर विद्याके द्वारा मकान बना लिया और निर्लज्ज होकर उन्हीं राजकन्याओंके साथ बैठ गई सो ठीक ही है क्योंकि कामी पुरुषोंको लज्जा कहांसे हो सकती है ? ॥३१-३३॥ इतनेमें विद्युद्वेगा की सखी अनंगपताका आकर कुमारसे इस प्रकार कहने लगी कि ‘आपकी माता कुबेरश्री आपके पिता श्रीगुणपाल जिनेन्द्रके समीप गई हुई थी वहां उसने बड़े प्रेमसे ज्योतिर्वेगाके पिता-से कहा कि मेरा पुत्र श्रीपाल कहीं गया है उसे ले आओ। ज्योतिर्वेगाके पिताने अपने जामाता स्तनितवेगसे कहा कि मेरे स्वामी श्रीपाल कहीं गये हैं उन्हें ले आओ । स्तनितवेगने स्वयं अपने पुत्र अशनिवेगको भेजा, पिताके कहनेसे ही अशनिवेग आपको यहां लाया है, वह आपका साला है। उत्तरश्रेणीका राजा अनलवेग इनका शत्रु है उसकी आशंका कर तुम्हारे स्नेहसे जिनका चित्त भर रहा है ऐसे सब भाईबन्धुओंने स्वयं विचार कर आपके खोजनेका उपाय बतलाया और कहा कि कुमारको बड़े प्रयत्नसे यहां लाया जाय । वे सब विद्याधरोंके अधिपति अनलवेग-को रोकनेके लिये गये हैं और हम दोनोंको आपके पास भेजा है। यहां आनेपर यह विद्युद्वेगा आपको देखकर आपमें अत्यन्त अनुरक्त हो गई है अतः आपको यह छोड़नी नहीं चाहिये । कुमारने ये सब बातें सुनकर और अच्छी तरह विचारकर उचित उत्तर दिया कि मैंने यज्ञो-पवीत संस्कारके समय गुरुजनोंके द्वारा दिया हुआ एक व्रत ग्रहण किया था और वह यह है कि मैं माता-पिता आदि गुरुजनोंके द्वारा दी हुई कन्याको छोड़कर और किसी कन्याको स्वीकार नहीं करूंगा । जब कुमारने यह उत्तर दिया तब वे सब कन्याएं अनेक प्रकारकी शृङ्गाररसकी चेष्टाओंसे कुमारको अनुरक्त करनेके लिये तैयार हुई परन्तु जब उसे अनुरक्त नहीं कर सकीं तब विद्युद्वेगा प्राणपति श्रीपालको मकानकी छतपर छोड़कर और बाहरसे दरवाजा बन्दकर माता-पिताको बुलानेके लिये उनके पास गई । इधर कुमार श्रीपाल भी लाल कम्बल ओढ़कर सो गये, इतने एक भेरुण्ड पक्षीकी दृष्टि उनपर पड़ी, वह उन्हें मांसका पिण्ड समझकर उठा ले गया और सिद्धकूट-चैत्यालयके अग्रभागपर रखकर खानेके लिये तैयार हुआ परन्तु कुमार-को हिलता जुलता देखकर उसने उन्हें छोड़ दिया सो ठीक ही है क्योंकि यह उन पक्षियोंका जन्म-जात गुण है ॥३४-४५॥
श्लोक 46 से 64 सिद्धकूट से आगे की यात्रा और रूप परिवर्तन
तदनन्तर श्रीपालने सिद्धकूटकी शिखरसे नीचे उतरकर सरोवरमें स्नान किया और अच्छे अच्छे सुगन्धित फूल लेकर भक्तिपूर्वक श्री जिनालयकी प्रदक्षिणा दी और स्तुति करना प्रारम्भ किया, उसी समय चैत्यालयका द्वार अपने आप खुल गया, यह देखकर वह बहुत ही प्रसन्न हुआ और विधिपूर्वक इच्छानुसार श्रीजिनेन्द्रदेवकी पूजा वन्दनाकर सुखसे वहींपर बैठ गया । इतनेमें ही एक विद्याधर सामने आया और कुमारको उठाकर आकाश-मार्गमें ले चला, चलते चलते वे मनोरम देशके शिवंकरपुर नगरमें पहुंचे, वहांके राजाका नाम अनिलवेग था, और उसकी स्त्रीका नाम था कान्तवती, उन दोनोंके भोगवती नामकी पुत्री थी, वह भोगवती आकाशमें बने हुए स्फटिकके महलमें कोमल शय्यापर सो रही थी उसे देखकर उस विद्याधरने श्रीपालकुमारसे पूछा कि यह कुमारी कौन है ? कुमारने उत्तर दिया कि यह विषम सर्पिणी है। श्रीपालके ऐसा कहनेपर वह विद्याधर क्रुद्ध होकर उन्हें उस कन्याके पिताके पास ले गया और कहने लगा कि यह दुष्ट हम लोगोंकी कन्याको सर्पिणी कह रहा है। यह सुनकर कन्याके पिताने भी क्रुद्ध होकर कहा कि ‘इस दुष्टको कठिन तपका भार धारण करनेके योग्य किसी सघन वनमें छुड़वा दो।’ राजाके कहे अनुसार उस पापी विद्याधरने शीत वैताली विद्याके द्वारा सुन्दर आकारवाले श्रीपालकुमारको वृद्धका रूप धारण करनेवाला बनाकर विजयार्ध पर्वतकी उत्तर श्रेणिके मनोहर नगरके समीपवाले श्मशानमें पटक दिया । वहां अस्पृश्य कुलमें उत्पन्न हुई किसी स्त्रीने अपने जमाईको कुत्ता बनाकर अपनी पुत्रीके दोनों चरणोंपर खूब लोटाया और इस तरह अपनी पुत्रीको अत्यन्त प्रसन्नकर फिर उस दुष्टा चाण्डा-लिनीने उसका पुराना रूप कर दिया। यह देखकर कुमार कुछ भयभीत हो चिन्ता करने लगा कि ये विद्याधर लोग इच्छानुसार रूप बनानेमें समर्थ हैं। उस समय वह मानो यमराजके सामने जानेवालेके समान ही था अत्यन्त वृद्ध था, उसके बाल काशके फूले हुए फूलोंके हँसी कर रहे थे, और शरीरमें बुढापारूपी समुद्रकी तरंगोंके समान सिकुड़नें उठ रही थीं। इस प्रकार दुष्ट विद्याधरके द्वारा किया हुआ अपना रूप देखकर वह लज्जा और शोकसे दब रहा था । इसी अवस्थामें वह शीघ्र ही आगे चला। वहां भोगवतीके भाई हरिकेतुको विद्या सिद्ध हुई थी उससे उसने प्रार्थना की तब विद्याने मुरदेका रूप धारणकर श्रीपाल कुमारके हाथपर कुछ उगल दिया और कहा कि तू बिना किसी विचारके निशङक हो इसे उठाकर पी जा, कुमार भी उसे शीघ्र ही पी गया। यह देखकर हरिकेतुने कुमारसे कहा कि तुझे सर्वव्याधिविनाशिनी विद्या प्राप्त हुई है, यह कहकर और विद्या देकर हरिकेतु प्रसन्न होता हुआ वहां चला गया । इधर कुमार भी अपने असली रूपको प्राप्त हो गया । कुमार आगे बढ़ा तो उसने एक वट वृक्षके नीचे बैठे हुए किसी विद्याधरको देखकर उससे पूछा कि यह कौन सा देश है ? तब वह विद्या-धर कहने लगा कि ॥४६-६४।।
श्लोक 65 से 108 सुखावती का परिचय, रूप परिवर्तन और चैत्यालय की घटनाएँ
‘विजयार्ध पर्वतकी पूर्व दिशा और नीलगिरिकी पश्चिमकी ओर यह सुसीमा नामका देश है, इसमें यह महानगर नामका नगर है और यह भूतारण्य वन है, यह तू अपने मनमें अच्छी तरह निश्वय कर ले, इधर इस वनमें ये सात शिलाएं पड़ी हैं जो कोई इन्हें परस्पर मिलाकर एकपर एक रख देगा वह चक्रवर्ती पदको प्राप्त होगा ऐसी सर्वज्ञ देवकी आज्ञा है’ विद्याधरके यह वचन सुनकर श्रीपालकुमारने उन शिलाओंको उसी समय एकके ऊपर एक करके रख दिया ।। ६५-६७।। कुमारका यह साहस देखकर वह विद्याधर नगरके राजाको खबर देनेके लिये चला गया और इधर कुमार भी कुछ उदासचित्त हो वहाँसे निकलकर आगे चला। आगे किसी वृक्षके नीचे निन्द्य शरीरको धारण करनेवाली एक बुढ़िया-को देखकर मधुर वचन बोलनेवाले कुमारने, उससे पूछा कि पुष्कलावती देशको कौन सा मार्ग जाता है, बताओ, तब बुढ़ियाने कहा कि वहां आकाश मार्गके बिना नहीं जाया जा सकता क्योंकि वह देश पच्चीस योजन ऊंचे विजयार्ध पर्वतसे भी उस ओर है, यह सुनकर राजपुत्र श्रीपालने उससे फिर कहा कि वहां जानेका कुछ भी तो मार्ग बतलाओ । तब वह कहने लगी इस जम्बू द्वीपमें एक वत्सकावती नामका देश है, उसके विजयार्ध पर्वतपर एक राजपुर नामका नगर है उसमें विद्याधरोंका चक्रवर्ती राजा धरणीकंप रहता है, उसकी कान्तिको फैलानेवाली सुप्रभा नामकी रानी है, मैं उन्हीं दोनोंकी प्रसिद्ध पुत्री हूं, सुखावती मेरा नाम है और मैं जाति विद्या, कुल विद्या तथा सिद्ध की हुई विद्या इन तीनों प्रकारकी बड़ी बड़ी विद्याओंकी पारगामिनी हूं । किसी एक दिन में वत्सकावती देशके विजयार्ध पर्वतपर अपने प्राणोंके समान प्यारी सखी, राजा अकंपनकी पुत्री पिप्पलाको देखनेके लिए गई थी। वहां मैंने एक विचित्र कम्बल देखकर उससे पूछा कि हे सखि, कह, यह कम्बल तुझे कहांसे प्राप्त हुआ है ? उसने कहा कि ‘यह कम्बल मेरी ही आज्ञासे प्राप्त हुआ है’ । कम्बल प्राप्तिके समयसे ही कम्बलवालेका ध्यान करती हुई वह अत्यन्त विह्वल हो रही है ऐसा सुनकर उसकी सखी मदनवती उसे देखनेके लिये उसी समय कांचनपुर नगरसे आई । उसने वह कम्बल देखा, कम्बलके छोरमें बंधी हुई रत्नोंकी अंगूठी और उसपर खुदे हुए श्रीपालके नामाक्षर देखकर मुझे अपने गुरुकी आज्ञाका स्मरण हो आया, उसी समय मेरा हृदय कामदेवके बाणोंसे भिन्न हो गया, मैं सोचने लगी कि श्रीपाल नामको धारण करनेवाला यह भूमिगोचरी विद्याधरोंके इस लोकमें कैसे आया ? इसी बातका निश्चय करनेके लिये में पुण्डरीकिणी पुरी पहुंची, वहां जिनालयमें भगवान्की वन्दनाकर बैठी ही थी कि इतनेमें वहां आपकी माता आ पहुंची, उनके कहनेसे मैंने विस्तारपूर्वक आपके प्रवास-की कथा मालूम की और निश्चय किया कि मैं आपको अवश्य ही ढूंढकर लाऊंगी । उसी निश्चयके अनुसार मैं आ रही थी, रास्ते में विद्युद्वेगाके मुखसे आपका सब समाचार जानकर मैंने उससे कहा कि ‘तू अभी विषाह मत कर मैं तेरे इष्टपतिको तुझसे अवश्य मिला दूंगी’ इस प्रकार आपकी भावी प्रियाको विश्वास दिलाकर वहांसे निकली और सिद्धकूट चैत्यालयमें पहुंची । वहांकी वन्दना कर आई हूं, यदि माता भाई तथा अन्य बन्धुओंको देखनेकी तुम्हारी इच्छा हो तो मेरे साथ पुण्डरीकिणी पुरीको चलो, यह सब सुनकर मैंने सुखावतीसे फिर कहा कि अच्छा, यह बतला तू इतनी बूढ़ी क्यों हो गई है ? कुमारके वचन सुनकर उस बुढ़ियाने हँसते हँसते कहा कि क्या आप अपने शरीरमें आये हुए बुढापेको नहीं जानते — आप भी तो बूढ़े हो रहे हैं । कुमारने अपने शरीरको बूढ़ा देखकर उससे पूछा कि ‘तूने मेरा शरीर इस प्रकार बूढ़ा क्यों कर दिया है।’ कुमारकी यह बात सुनकर वह इस तरह कहने लगी कि जिनका कथन पहले कर आई हूं ऐसी पिप्पला और मदनवती नामकी दो कन्याएं हैं, उन्हें दो प्रसिद्ध विद्याधर चाहते हैं, एकका नाम धूमवेग है और दूसरेका नाम हरिवर । ये दोनों ही अत्यन्त बलवान् हैं, उन दोनोंके भयसे ही मैंने आपको छिपाकर नगर में पहुंचाने के लिये विद्याके प्रभाव से मायामय दो रूप बनाये हैं। हे कुमार, मेरे हाथमें रखे हुए इस अमृतके समान स्वादिष्ट फलको खाकर आप अपनी भूख तथा थकावटको दूर कीजिये और मुझपर सवार होकर शीघ्र ही नगरकी ओर चलिये’ यह सुनकर कुमारने कहा कि मेरे सवार होनेके लिये स्त्रीका रूप अयोग्य है, मैं तो उसका स्पर्श भी नहीं करता हूं, सवार कैसे होऊं ? क्योंकि मैंने पहले गुरुके समीप ऐसा ही व्रत लिया है यह सुनकर उसने सोचा और कहा कि अब भी क्या हुआ ? वह विद्याके द्वारा उसी समय पुरुषका आकार धारण कर कुमारको बड़ी शीघ्रतासे ले चली । चलते चलते वह सिद्धकूट चैत्यालयमें पहुंची और वन्दना कर विश्राम करनेके लिये वहीं बैठ गई । उसी दिन भोगवतीने स्वप्नमें देखा कि कान्ति और कलाओंसे बढ़ा हुआ चन्द्रमा हमारे भवनमें प्रवेशकर लौट गया है इस स्वप्नको देखकर वह अमंगलकी शान्तिके लिये सिद्धकूट चैत्यालयमें पूजा करनेके लिये आई थी। वह सुन्दरी कान्तवती, सती रत्नवेगा, सुवेगा, अमितमती, रति-कान्ता, चित्तवेगा, पिप्पला, मदनावती, विद्युद्वेगा तथा और भी अनेक राजकन्याओंसे घिरी हुई थी । उन सभी कन्याओंने आकर बड़ी भक्तिसे जिन मन्दिरकी प्रदक्षिणा दी, विधिपूर्वक नमस्कार किया, पूजा की और फिर सबकी सब स्तुति करनेके लिये उद्यत हुई । स्तुति करते समय भी उनका चित्त व्याकुल हो रहा था । उसी चैत्यालयमें एक शिवकुमार नामका राज-पुत्र भी खड़ा था, उसका मुँह टेढ़ा था परन्तु श्रीपालकुमारके समीप आते ही वह ठीक हो गया, यह देखकर सुखावतीने उसे उसके स्थानसे हटाकर दूसरी जगह रख दिया। उस चैत्यालयमें श्रीपालकुमार अपनी कामरूपिणी मुद्रासे इच्छानुसार जलमें अपना खास रूप देख रहा था । उसे ऐसा करते पापी हरिवर विद्याधरने देख लिया और पूर्व जन्ममें पुण्य करनेवाले कुमारको क्रोधसे उस स्थानसे ले जाकर महाकाल नामकी गुफामें गिरा दिया। उस गुफामें एक महा-काल नामका व्यन्तर रहता था वह उसे पकड़नेके लिये आया परन्तु कुमारके पुण्यके प्रभावसे अकिंचित्कर हो चला गया — उसका कुछ नहीं बिगाड़ सका । वह कुमार उस दिन उसी गुफामें पवित्र, कोमल और बड़ी शय्यापर सोकर दूसरे दिन वहांसे बाहिर निकला, यद्यपि उसने अपना बूढ़ेका रूप बना लिया था तथापि धूमवेगके द्वारा परीक्षाके लिये नियुक्त किये हुए पुरुषोंने उसे पहिचान लिया, स्वामीके पास जाकर उन्होंने सब खबर दी और पकड़कर श्रीपालकुमार-को सामने उपस्थित किया । क्रोधरूपी अग्निसे प्रज्वलित हुए धूमवेग विद्याधरने कुमारको देखकर आज्ञा दी कि इसे नगरके बाहिर श्मशानके बीच पत्थरपर घिसकर तेज किये हुए अनेक शस्त्रोंसे मार डालो । सेवक लोग मारने लगे परन्तु वे सब शस्त्र उसपर फूल होकर पड़ते थे । इसीसे सम्बन्ध रखनेवाली एक कथा और लिखी जाती है जो इस प्रकार है- उसी नगरमें एक अतिबल नामका दूसरा विद्याधर राजा रहता था || 68-108
श्लोक 109 से 122 अग्निकुंड से मुक्ति और कन्या रूप में परीक्षा
उसकी चित्रसेना नामकी रानीसे कोई दुष्ट नौकर फँस गया था, इसलिये राजा उसे मारकर जला रहा था । धूमवेग विद्याधर श्रीपालकुमारको उसी अग्निकुंडमें रखकर चला गया परन्तु कुमारकी महौषधिको शक्तिसे वह अग्नि निस्तेज हो गई इसलिये वह उससे बाहर निकल आया । उस मारकर जलाये हुए सेवककी स्त्रीको जब इस बातका पता चला कि कुमारके स्पर्शसे अग्नि शक्तिरहित हो गई है तब वह स्वयं उस अग्निमें घुस पड़ी और उससे निकलकर यह कहती हुई अपनी शुद्धि प्रकट करने लगी कि ‘मेरा पति निरपराध था राजाने उसे व्यर्थ ही मार डाला है।’ कुमारको यह सब चरित्र देखकर बड़ा कौतुक हुआ, वह सोचने लगा कि स्त्रियोंकी मायासे बने हुए इस कवचको इन्द्र भी अपने वज्रसे नहीं भेद सकता है, यह छिद्ररहित है’ इस प्रकार सोचता हुआ वह निर्भय होकर वहीं बैठा था। इधर उस नगरके स्वामी राजा विमलसेनकी पुत्री कमलावती कामरूप पिशाचसे आक्रान्त हो रही थी, उसके उस पिशाचको दूर करनेकी इच्छा से बहुत आदमी इकट्ठे हुए थे, श्रीपालकुमार भी वहां गया था और उसने उस पिशाचको दूर कर दिया था। ‘निमित्तज्ञानियोंने जो पहले आदेश दिया था वह आज सत्य सिद्ध हुआ।’ यह देख राजाने संतुष्ट होकर वह पुत्री कुमारको देनी चाही परन्तु जब कुमारकी इच्छा न देखी तब उसने अपने पुत्र वरसेनको आज्ञा दी कि इन्हें शीघ्र ही बड़े यत्नके साथ इनके बन्धु वर्गके समीप भेज आओ ।॥१०९-११७॥ वह वरसेन भी कुमारको लेकर चला और विमलपुर नामक नगरके बाहर प्याससे पीड़ित कुमारको बैठाकर पानी लेनेके लिये गया ।॥११८॥ उसी समय कूबड़ीका रूप बनाकर सुखावती वहां आ गई, उसने अपने फूलोंकी मालाके स्पर्शसे कुमार की प्यास दूर कर दी और उसे कन्या बना दिया ॥ ११९॥ उस कन्याको देखकर धूमवेग और हरिवर दोनों ही उसकी इच्छा करने लगे। उसे स्वीकार करनेके लिये दोनों ईर्ष्यालु हो उठे और दोनों ही परस्पर द्वेष करने लगे । यह देखकर उनके भाई बन्धुओंने रोका और कहा कि ‘तुम दोनोंका लड़ना व्यर्थ है इसका पति वही हो जिसे यह चाहे’ इस प्रकार बन्धुजनोंके द्वारा रोके जानेपर वे दोनों वैरसे विरत हुए । देखो ! स्त्रीके कारण परस्पर किस किसका प्रेम भंग नहीं हो जाता है ? ॥ १२०-१२२॥
श्लोक 123 से 131 असली रूप, गजपुर में विजय और अगवानी
उस कन्याने उन दोनोंमेंसे किसीको नहीं चाहा इसलिये सुखावती उसे कन्याके आकारमें ही वहां ले गई जहां कान्ता, सुकान्ता, रतिकान्ता और कान्त-वती थी ।।१२३॥ पहलेके समान असली रूपमें बैठ हुए कुमारको देखकर कोई कन्या लज्जित हो गई और कोई प्रीति करने लगी सो ठीक ही है क्योंकि स्त्रियोंके भाव अनेक प्रकारके होते हैं ।॥१२४।। श्रीपाल रातको वहीं सोया, सोते सोते ही सवेरेके समय सुखावती बड़े प्रयत्नसे उठा ले चली, कुमारने आंख खुलनेपर उससे पूछा कि तू मुझे यहां अकेला छोड़कर कहां चली गई थी ? तब सुखावतीने कहा कि मैं कहीं नहीं गई थी, मैं सदा आपके पास ही रही हूं, यहां आपको स्त्रीरत्न प्राप्त होगा ऐसा निमित्तज्ञानीने बतलाया है, यहां आपको कोई भय नहीं है। आज तक मैं अपने रूपको छिपाये रहती थी परन्तु आज असली रूपमें आपसे मिल रही हूं” ।॥१२५-१२७॥ उसके यह वचन सुनकर श्रीपाल बहुत ही हर्षित हुआ और वहांसे आगे चलकर विजयार्ध पर्वतके दक्षिण भागमें स्थित गजपुर नगरके समीप जा पहुंचा ।।१२८।। वहां कोई एक गजराज खंभा उखाड़कर मदोन्मत्त हो रहा था। उसे कुमारने शास्त्रोक्त बत्तीस क्रीड़ाओंसे क्रीड़ा कराकर वश किया ।।१२९।। तदनन्तर सूर्योदय होते होते नगरके सब लोगों ने गजराजको जीत लेनेसे कुमारका आना जान लिया, सबने संतुष्ट चित्त होकर घर घर चञ्चल पताकाएं फहराई और कुमारके पुण्योदयसे प्रेरित होकर सब लोगोंने उसकी अगवानी की ॥१३०-१३१॥
श्लोक 132 से 141 हयपुर, सुसीमा पर्वत और विभिन्न परीक्षाएँ
कुमार वहांसे भी आकाशमें चला, चलता चलता हयपुर नगरमें पहुंचा वहां एक घोड़ा कुमारकी प्रदक्षिणा देकर समीपही में खड़ा हो गया, कुमारने यह सब स्वयं देखा परन्तु उसे कुछ भी आश्चर्य नहीं हुआ ॥१३२॥ जब नगरनिवासियोंको इस बातका पता चला तब सबने कुमारका सत्कार किया, कुमार वहांसे भी निकल कर अपनी इच्छानुसार आगे चला ॥१३३॥ चलता चलता चार देशोंके बीचमें स्थित सुसीमा नामक पर्वतपर पहुंचा । वहां किसी कारण बहुतसे लोग इकट्ठे हो रहे थे, वे प्रयत्नकर म्यानसे तलवार निकाल रहे थे परन्तु उनमेंसे कोई भी उक्त कार्यके लिये समर्थ नहीं हो सका परन्तु कुमारने उसे लीला-मात्रमें निकाल दिया जिसमें बहुतसे बांस उलझे हुए खड़े थे ऐसे बांसके विड़ेपर उसे चलाया यह देखकर सब लोगोंने बड़े हर्षसे कुमारका आदर सत्कार किया ॥१३४-१३६॥ इतनेमें ही वहां एक गूँगा मनुष्य आया और जय जय शब्दका उच्चारण करता हुआ कुमारको प्रणाम कर बैठ गया ।।१३७।। वहीं पर एक टेढ़ी अंगुलीका मनुष्य आया, कुमारको देखते ही उसकी अंगुली ठीक हो गई, उसने हाथकी अंगुली फैलाकर हाथ जोड़े और नमस्कार कर पास ही खड़ा हो गया ।।१३८।। वहींपर एक मनुष्य हीराओंकी भस्म बना रहा था, वह बनती नहीं थी परन्तु कुमारके सन्निधानसे वह बन गई इसलिये उसने भी बड़ी विनयसे कुमारके दर्शन किये ॥१३९॥ श्रीपालने जो तलवार म्यानसे निकाली थी उसका स्वामी विजयपुर नगरका रहने वाला था और होनहार इसी श्रीपाल चक्रवर्तीका भावी सेनापति था ॥ १४०॥ उसी विजयपुर नगरके राजा वरकीर्तीष्टकी रानी कीर्तिमतीकी एक पुत्री थी, उसके वरके विषयमें निमित्त-ज्ञानियोंने बतलाया था कि इसका वर श्रीपाल चक्रवर्ती होगा और उसकी पहिचान म्यानमेंसे तलवार निकाल लेना होगी ॥१४१॥
श्लोक 142 से 151 धूमवेग से युद्ध और यक्षी की सहायता
वह गूंगा श्रेयस्पुरमें उत्पन्न हुआ था और इसका भावी पुरोहित था, उसी श्रेयस्पुर नगरका स्वामी राजा शिवसेन था, उसके कमलके समान नेत्रवाली वीतशोका नामकी पुत्री थी उसके वरके विषयमें निमित्तज्ञानियोंने आदेश दिया था कि जिसके समागमसे यह गूँगा बोलने लगेगा, वही इसका वर होगा ॥१४२-१४३॥ जिसकी अंगुली टेढ़ी थी वह शिल्पपुरमें उत्पन्न हुआ था और इसका होनहार स्थपति रत्न था । उसी शिल्पपुर के राजाका नाम नरपति था उसके रतिविमला नामकी पुत्री थी, निमित्तज्ञानियोंने बताया था कि जिसके देखनेसे इसकी टेढ़ी अंगुली फैलने लगेगी उसीके साथ कामक्रीड़ा करनेवाली इस कन्याका चिरकाल तक समागम रहेगा ॥१४४-१४५॥ जो हीराओंका भस्म बना रहा था वह इसका मंत्री होनेवाला था और धान्यपुर नगरमें पैदा हुआ था, उसी धान्यपुर नगरके राजाका नाम विशाल था उसकी एक विमलसेना नामकी कन्या थी, निमित्तज्ञानियोंने बत-लाया था कि जिसके आनेपर हीराओंका भस्म बन जायगा वही महा तेजस्वी श्रीपाल इसका पति होगा ।।१४६-१४७।। इस प्रकार निमित्तज्ञानियोंके आदेशानुसार उस पुरुषको पहिचान कर वे सब अपने अपने नगरको चले गये और उसी समय सुखावती श्री कुमारको लेकर आकाशमार्गसे चलने लगी ॥१४८॥ चलते चलते इसे धूमवेग शत्रु मिला, वह कुमारको देखकर भयंकर शब्द करने लगा, और डांट दिखाकर रास्ता रोक आकाशमें खड़ा हो गया, उस समय खेटक और तलवार दोनों शस्त्र उसके पास थे ॥ १४९।। उसी समय पहले कही हुई प्रतिमापर जो इसकी रक्षा करनेवाली देवी रहती थी वह विद्याधरका रूप धारण कर आई और सुखावतीको छोड़कर कुमारको ले गई तथा सुखावतीसे कह गई कि तू निर्भय हो निराकुलतापूर्वक इस नीच विद्याधरसे लड़ना और इसे जीतना ॥१५०-१५१॥
श्लोक 152 से 163 रत्न प्राप्ति और सुरगिरि वापसी
शूरवीरता से शोभायमान रहनेवाली सुखावती भी कुमारको छोड़कर धूमवेगसे लड़ने लगी और रणके मैदानमें बहुत समय तक युद्धकर उसने उसे अपनी विद्याओं द्वारा रोक लिया ॥१५२॥ कुमार भी समीपवती पर्वतकी एक शिलापर धीरे धीरे जा पड़ा। वहां उसकी पूर्वभवकी माता देवश्री जो कि यक्षी हुई थी आई। उसने हाथसे स्पर्शकर श्रीपालका सब परिश्रम दूर कर दिया और कहा कि तू शीघ्र ही इस तालाबमें घुस जा । कुमार भी उसके वचनोंका विश्वास कर तालाबमें घुस गया और वहीं रातभर पत्थरके खंभेपर बैठा रहा ।। १५३-१५५।। सबेरे पञ्च नमस्कार मंत्रका पाठ करता हुआ उठा, तालाबके उत्तरकी ओर श्रीजिनेन्द्रदेवकी प्रतिमा देखकर पुष्प आदि सामग्रीसे पूजन और नमस्कार किया । तदनन्तर उसी यक्षीके उपदेशसे उस पुण्यात्माने सहस्र पत्रवाले कमलको चक्ररत्नरूप होते देखा, कछुवेको छत्र होते देखा, बड़ी बड़ी हजार फणाओंको धारण करनेवाले नागराजको दण्डरत्न होते देखा, मेंडकको चूड़ा-मणि, मगरको चर्मरत्न और देदीप्यमान लाल रंगके विच्छूको काकिणी मणि रूप होते देखा ॥१५६-१५९।। उस समय उसने प्रसन्नचित्त होकर छत्र धारण किया, दण्ड उठाया, चमकीले रत्नोंके जूते पहिने और फिर वह यक्षीके द्वारा दिये हुए मणिमय दिव्य आभूषणोंसे सुशोभित होकर गुहासे बाहर निकला । उसी समय जिस प्रकार चन्द्रमाकी वृद्धिके लिये शुक्लपक्षकी प्रतिपदा आती है उसी प्रकार धूमवेगको जीतकर तलवार लिये हुए चतुर सुखावती कुमारकी वृद्धिके लिये उसके पास आ पहुँची । श्रीपाल यहांसे उसके साथ साथ चला और चलता चलता सुरगिरि पर्वतपर गुणपाल जिनेन्द्रके समवसरणमें जा पहुंचा ।।१६०-१६३॥
श्लोक 164 से 171 माता-भाई से मिलन और विवाह
वहां मन, वचन, कायकी शुद्धि धारण करनेवाले श्रीपालने बहुत देरतक गुणपाल जिनेन्द्रकी स्तुति की, माता और भाईको देखकर उनका योग्य विनय किया और फिर उन दोनोंके आशीर्वादसे संतुष्ट होकर वह माताके पास बैठ गया । उसने माता और भाईके सामने यह कहकर सुखावतीकी प्रशंसा की कि में इसके प्रभावसे ही कुशलतापूर्वक आपलोगोंके समीप आ सका हूं सो ठीक ही है क्योंकि सज्जन पुरुषोंका जन्मेसे ही ऐसा स्वभाव होता है कि जिससे वे उपकार करने-वालोंकी स्तुति किया करते हैं ।। १६४-१६६।। महाराज वसुपालके प्रश्नके उत्तरमें भगवान् ने जैसा कुछ कहा था उसीके अनुसार उस श्रीपालने विद्याधरोंकी श्रेणीमें रहकर अनेक लाभप्राप्त किये थे ।।१६७।। तदनन्तर वह सात दिनमें ही सुखसे अपने नगरमें प्रविष्ट हो गया सो ठीक ही है क्योंकि प्रबल पुण्यका संचय करनेवाले पुरुषोंको आपत्तियां भी सम्पत्तिके लिये हो जाती हैं ।।१६८।।
नगरमें जाकर वसुपाल कुमारका वारिषेणा आदि कन्याओंके साथ विवाहोत्सव हुआ, वह विवाहोत्सव अनेक प्रकारकी विभूतियोंसे युक्त था ।।१६९।। उसी समय चतुर श्रीपाल कुमार भी जयावती आदि चौरासी इष्ट कन्याओंसे अलंकृत-सुशोभित हुए ।। १७०।। अपनी क़ान्तिसे दिग्दिगन्तको व्याप्त करनेवाले सूर्य और चन्द्रमाके समान पृथिवीका पालन करते हुए दोनों भाई चिरकाल तक सुखका उपभोग करते रहे ।।१७१।।
श्लोक 172 से 183 गुणपाल का जन्म, विवाह और वैराग्य
कुछ दिन बाद श्रीपालकी जयावती रानीके गुणोंसे उज्ज्वल गुणपाल नामका पुत्र उत्पन्न हुआ और इधर आयुधशालामें चक्ररत्न प्रकट हुआ ॥ १७२॥ जिसका शरीर लक्ष्मीसे सुशोभित हो रहा है ऐसा वह श्रीपाल चक्रवर्तीके कहे हुए सब भोगोंका अत्यन्त अनुभव करता हुआ इन्द्रकी लीलाको भी उल्लंघन कर रहा था ।।१७३॥ जयावतीके भाई जयवर्माके जयसेना नामकी पुत्री थी जो अपनी कान्ति से सेनाके समान सबको जीतनेवाली थी ॥१७४।॥ इसके सिवाय मनोवेग, अशनिवर, शिव, अशनिवेग, हरिकेतु तथा और भी अनेक अच्छे अच्छे विद्याधर राजा थे, जयसेनाको आदि लेकर उन सब राजाओंकी पुत्रियोंके साथ गुणपालका विवाह हुआ । इस प्रकार वह गुणपाल उन कन्याओंके मिलनेसे बहुत ही हर्षित हुआ ।।१७५-१७६।।
अथानन्तर-किसी समय जिसका मोक्ष जाना अत्यन्त निकट रह गया है ऐसा गुणपाल काललब्धि आदिसे प्रेरित होकर आकाशकी ओर देख रहा था कि इतनेमें उसकी दृष्टि अक-स्मात् अन्धकारसे भरे हुए चन्द्रग्रहणकी ओर पड़ी, उसे देखकर वह सोचने लगा कि इस संसार-को धिक्कार हो, जब इस चन्द्रमाकी भी यह दशा है तब संसारके अन्य पापग्रसित जीवोंकी क्या दशा होती होगी ? इस प्रकार वैराग्य आते ही उस उत्कृष्ट बुद्धिवाले गुणपालको जाति स्मरण उत्पन्न हो गया जिससे उसे अपने पूर्वभवके सम्बन्धका प्रत्यक्षकी तरह स्मरण होने लगा ॥१७७-१७९॥ उसे स्मरण हुआ कि पुष्करार्ध द्वीपके पश्चिम विदेहमें पद्मक नामका एक प्रसिद्ध देश है, उसके कान्तपुर नगरका स्वामी राजा कनकरथ था। उसकी रानीका नाम कनक-प्रभा था, उन दोनोंके मैं अपनी प्रभासे सूर्यको तिरस्कृत करनेवाला कनकप्रभ नामका पुत्र हुआ था । किसी दिन एक बगीचेमें विद्युत्प्रभा नामकी मेरी स्त्रीको सांपने काट खाया, उसके वियोगसे मैं विरक्त हुआ और अपने ऊपर अत्यन्त स्नेह रखनेवाले पिता माता तथा भाइयोंके साथ साथ मैंने समाधिगुप्त मुनिराजके समीप उत्कृष्ट संयम धारण किया था ।।१८०-१८३॥
श्लोक 184 से 191 गुणपाल की दीक्षा और सुखावती का पुत्र
वहां में दर्शनविशुद्धि आदि सोलह भावनाओंका अच्छी तरह चिन्तवन कर आयुके अन्तमें जयन्त नामके विमानमें अहमिन्द्र उत्पन्न हुआ था ।।१८४।। और अन्तमें वहांसे चयकर यहां श्रीपालका पुत्र गुणपाल हुआ हूं। वह इस प्रकार विचार ही रहा था कि इतने में ही * समुद्रदत्त, आदित्यगति, वायुरथ और सेठ कुबेरकान्त जो कि तपश्चरण कर लौकान्तिक देव हुए थे उन्होंने आकर समझाया। इस प्रकार प्रबोधको प्राप्त हुए गुणपाल मोहजालको नष्ट कर तपश्चरण करने लगे और घातिया कर्मोंको नष्ट कर सयोगिपद-तेरहवें गुण स्थानको प्राप्त हुए ।। १८५-१८७।। सुखावतीका पुत्र यशपाल भी उन्हीं गुणपाल जिनेन्द्रके पास दीक्षा धारण कर उन्हींका पहला गणधर हुआ ॥१८८॥ उसी समय राजाधिराज श्रीपालने बड़ी विभूतिके साथ आकर गुणपाल तीर्थ करकी पूजा की और गृहस्थ तथा मुनि सम्बन्धी-दोनों प्रकारका धर्म सुना । तदनन्तर बड़ी विनयके साथ अपने पूर्वभवका संबंध पूछा, तब भगवान् इस प्रकार कहने लगे-यह सब बातें मधुर वचन बोलनेवाली सुन्दरी सुलोचना महाराज जयकुमारके पूछनेपर उनसे कह रही थी। उसने कहा कि —
विदेह क्षेत्रकी पुण्डरीकिणी नगरीमें यशपाल नामका राजा रहता था ।।१८९-१९१।।
श्लोक 192 से 201 यशपाल की कथा का प्रारम्भ
उसी नगरमें सर्वसमृद्ध नामका एक वैश्य रहता था। उसकी स्त्रीका नाम धनश्री था जो कि धनको बढानेवाली थी और धनंजयकी छोटी बहिन थी । उन दोनोंका पुत्र सर्वदयित सेठ था, उसकी बहिनका नाम सर्वदयिता था जो कि बड़ी ही सती थी । सेठ सर्वदयितकी दो स्त्रियां थीं, एक तो सागरसेनकी पुत्री जयसेना और दूसरी धनंजय सेठकी पुत्री जयदत्ता ॥१९२-१९४।। सेठ सर्वदयितके पिताकी एक छोटी बहिन थी जिसका नाम देवश्री था और वह सेठ सागरसेनको ब्याही थी। उसके सागरदत्त और समुद्रदत्त नामके दो पुत्र थे तथा सागरदत्ता नामकी एक पुत्री थी । सागरसेनकी छोटी बहिन सागरसेनाके दो संतानें हुई थीं-एक वैश्रवणदत्ता नामकी पुत्री और दूसरा वैश्रवणदत्त नामका पुत्र । वैश्रवणदत्त सेठ सर्वदयितका हिस्सेदार था ।।१९५-१९७।। वैश्रवणदत्ता सेठ सागरदत्तकी स्त्री हुई थी, सेठ समुद्रदत्तकी स्त्रीका नाम सर्वदयिता था और सागरदत्ता सेठ वैश्रवणदत्तको ब्याही गई थी। इस प्रकार उन सब-का समय निरन्तर बड़े प्रेमसे व्यतीत हो रहा था ।।१९८-१९९।। जिसने बहुत धन उपार्जन किया है ऐसे सेठ धनंजयने किसी दिन अच्छे अच्छे रत्न भेंट देकर राजा यशपालके दर्शन किये राजाने भी उसका सन्मान किया और बड़े प्रेमसे उसके लिये यथायोग्य बहुत सा सुवर्ण आदि धन वापिस दिया ।। २००-२०१।।
श्लोक 202 से 211 सर्वदयिता का त्याग और जितशत्रु का जन्म
यह देखकर सब वैश्यपुत्र धन कमानेके लिये बाहिर निकले और सब मिलकर नगरके समीप ही एक गांवमें जाकर ठहर गये ॥ २०२॥ दूसरे दिन समुद्र-दत्त रात्रिमें उन डेरोंसे अपने घर आया और अपनी स्त्रीसे संभोग कर किसीके जाने बिना ही रात्रिमें ही अपने झुण्डमें जा मिला । इधर समयानुसार उसका गर्भ बढ़ने लगा । जब इस बात का पता समुद्रदत्तके बड़े भाई सागरदत्तको चला तब उसने समझा कि यह अवश्य ही इसका पापरूप दुराचरण है। समुद्रदत्तकी स्त्री सर्वदयिताने पतिके साथ समागम होनेका सब समा-चार यद्यपि बतलाया तथापि उसने परीक्षा किये बिना ही उसे घरसे निकाल दिया ॥२०३-२०५।। तब सर्वदयिता अपने भाई सेठ सर्वदयितके घर गई परन्तु उसने भी अज्ञानतासे यही कहकर उसे भीतर जानेसे रोक दिया कि ‘तू दुराचारिणी है, मेरे घरमें मत आ’ ॥२०६॥ तदनन्तर वह पासके ही एक दूसरे घरमें रहने लगी, नौ महीनेकी अवधि पूर्ण होनेपर उसने एक अतिशय पुण्यवान् पुत्र प्राप्त किया ।। २०७।। जब सेठ सर्वदयितको यह खबर लगी तो उसने समझा यह पुत्र क्या ? हमारे कुलका कलंक उत्पन्न हुआ है, इसलिये उसने एक नौकर-को यह कहकर भेजा कि ‘इसे ले जाकर किसी दूसरी जगह रख आ’ । वह सेवक बुद्धिमान् था और सेठका विश्वासपात्र भी था, वह बालकको ले गया और सेठके एक विद्याधर मित्रको ‘जो कि विद्या सिद्ध करनेके लिये श्मशानमें आया था, सौंप आया सो ठीक ही है क्योंकि पापका उदय बड़ा विचित्र होता है। सेठके उस मित्रका नाम जयधाम था और उसकी स्त्रीका नाम जयभामा था । वे दोनों भोगपुरके रहनेवाले थे उन्होंने उस पुत्रका नाम जितशत्रु रक्खा और उसे औरस पुत्रके समान मानकर वे बड़ी प्रसन्नतासे उसका पालन-पोषण करने लगे ।।२०८- २११।।
श्लोक 212 से 223 पूर्वभव की समाप्ति और दीक्षा
सर्वदयिताने पुत्रके वियोगसे बहुत दिनतक स्त्रीवेदकी निन्दा की और मरकर पुरुष-का जन्म पाया ।।२१२॥ तदनन्तर समुद्रदत्त भी अपने झुण्डके साथ वापिस आ गया और अपनी स्त्रीका वृत्तान्त सुनकर अपने भाईकी निन्दा करने लगा । सेठने अपराधके बिना ही उसकी स्त्रीको घरमें प्रवेश करनेसे रोका था इसलिये वह सेठपर अत्यन्त क्रोध करता रहता था सो ठीक ही है क्योंकि जो कार्य बिना विचारे किया जाता है उसे भला कौन सहन कर सकता है ? ॥२१३-२१४॥ कुछ दिन बाद वैश्रवण सेठ सागरदत्तसे यह कहकर क्रोध करने लगा कि ‘जब मैं बड़ा हूं, और योग्य हूं तो न्यायसे मुझे सेठ पद मिलना चाहिये, मेरे रहते हुए यह सेठ क्यों बन बैठा है’। इसी प्रकार सागरदत्त और समुद्रदत्त भी सेठक साथ ईर्ष्या करने लगे ।।२१५-२१६॥ आचार्य कहते हैं कि कठिन तपश्चरणके विषयमें की हुई मनुष्यों की ईर्ष्या भी कहीं कहीं अच्छी होती है परन्तु अन्य सब जगह अच्छी नहीं होती । किसी एक दिन सेठ सर्वद्धितने जितशत्रुसे पूछा कि तू समुद्रदत्तकी समानता क्यों धारण कर रहा है–तेरा रूप उसके समान क्यों है ? और तू सभामें किसलिये आया है ? तब जितशत्रुने भी अनुक्रमसे अपने आनेका सब समाचार कह दिया ॥२१७-२१८॥ उसी समय सेठकी दृष्टि उसके हाथमें पहिनी हुई अंगूठीपर पड़ी, उसे देखकर उसने निश्चय कर लिया कि ‘यह मेरा भानजा ही है, दूसरा कोई नहीं है । उसे अपनी और अपने बहनोईकी अपरीक्षकता (बिना विचारे कार्य करने) की याद आ गई और उसे सर्वश्री नामकी पुत्री, बहुत सा धन और सेठका पद देकर स्वयं विरक्तचित्त हो गया ।।२१९-२२०॥ उसी समय जितशत्रुको पालनेवाला जयधाम विद्याधर, उसकी स्त्री जयभामा, जयसेना और जयदत्ता नामकी अपनी स्त्रियां, वैश्रवण-दत्तकी स्त्री सागरदत्ता और वैश्रवणदत्तकी बहिन वैश्रवणदत्ता तथा और भी अनेक लोगोंको आत्मज्ञान उत्पन्न हुआ। उन सबके साथ साथ सेठने रतिवर मुनिके समीप जाकर संयम धारण, कर लिया । वे सभी लोग चिरकालतक संयमका साधन कर आयुके अन्तमें स्वर्ग गये ॥२२१-२२३।।
श्लोक 224 से 232 पूर्वभव का फल और श्रीपाल की व्याख्या
वहांकी आयु पूरी होनेपर स्वर्गसे आकर पहलेका जयधाम विद्याधर यहां राजा वसु-पाल हुआ है, जयभामा वसुपालकी सुन्दरी रानी जयावती हुई है, जयसेना पिप्पली हुई है, जयदत्ता मदनावती हुई है, वैश्रवणदत्ता सब कलाओंमें निपुण विद्युद्वेगा हुई है, सागरदत्ता स्वर्गसे आकर सुखावती हुई है, उस समयका सागरदत्त स्वर्गसे आकर पुरूरवाका प्यारा पुत्र हरिवर हुआ है, समुद्रदत्त ज्वलनवेगका प्रसिद्ध पुत्र हुआ है जो कि अपनी विद्याओंसे ही अपना पौरुष प्रकट कर रहा है, वैश्रवणदत्त अशनिवेग हुआ है और सर्वदयित सेठ यहां श्रीपाल हुआ है जो कि तू ही है ।। २२४-२२९॥ तूने पूर्वभवमें अपने जंमाई (भानेज जितशत्रु) को उसकी मातासे अलग कर दिया था इसलिये तुझे भी इस भवमें अपने भाई बन्धुओंसे अलग होना पड़ा है, पूर्व-भवमें जो वैश्रवणदत्त, सागरदत्त तथा समुद्रदत्त तेरे द्वेषी थे वे इस भवमें भी तुझसे द्वेष करने-वाले धूमवेग, अशनिवेग और हरिवर हुए हैं। उस भवमें जो तुम्हारी स्त्रियां थीं वे इस भवमें भी तुम्हारी अत्यन्त प्यारी स्त्रियां हुई हैं। तुमने अपनी बहिनके बालककी हिंसा नहीं की थी इसलिये ही तेरा इस भवमें अपने भाई बन्धुओंके साथ फिरसे समागम हुआ है। तूने उस भवमें जो तपश्चरण किया था उसीके फलसे सम्पूर्ण पृथिवीका चक्रवर्ती हुआ है और अन्तमें सब परिग्रहोंका त्याग कर देनेसे तू शीघ्र ही मोक्ष पा जायगा ॥२३०-२३२।।
श्लोक 233 से 241 वैर त्याग और श्रीपाल का वैराग्य
इस प्रकार तीर्थ कर भगवान् गुणपालके कहे हुए वचनोंको सुनकर सब लोगोंने आश्चर्यपूर्वक अपना परस्पर का सब वैर छोड़ दिया ॥२३३॥
तदनन्तर पुण्यात्मा श्रीपालने सदासे पीछे लगे हुए जन्म, रोग, जरा और मृत्युको नष्ट करनेके लिये बुद्धि स्थिर कर धर्मरूपी अमृतका पान किया ॥ २३४॥ वह सोचने लगा कि यह चक्रवर्तीका साम्राज्य कुम्हारकी जीवनीके समान है क्योंकि जिस प्रकार कुम्हार अपना चक्र (चाक) घुमाकर मिट्टीसे बने हुए घड़े आदि बर्तनोंसे अपनी आजीविका चलाता है उसी प्रकार चक्रवर्ती भी अपना चक्र (चक्ररत्न) घुमाकर मिट्टीसे उत्पन्न हुए रत्न या कर आदिसे अपनी आजीविका चलाता है-भोगोपभोगकी सामग्री जुटाता है इसलिये इस चक्रवर्ती के साम्राज्यको धिक्कार है ॥ २३५॥ यह आयु वायुके समान है, भोग मेघके समान हैं, इष्ट-जनोंका संयोग नष्ट हो जानेवाला है, शरीर पापोंका खोटा पात्र है और विभूतियां बिजलीके समान चंचल हैं ।॥ २३६॥ यह यौवन समीचीन मार्गसे भ्रष्ट करानेका कारण होनेसे सघन वनके समान है और जो यह विषयोंमें प्रीति है वह द्वेषको ढूँढ़नेवाली है ॥ २३७॥ इन सब वस्तुओं से सुख तभी तक मालूम होता है जब तक कि बुद्धिमें विपर्ययपना रहता है। और जब बुद्धि सीधी हो जाती है-तब ऐसा जान पड़ने लगता है कि इन वस्तुओंके सिवाय छोड़ने योग्य और क्या होगा ? ॥२३८।। जब कि अभिलाषारूपी विषके अंकुरोंसे इस चित्तरूपी वृक्षकी सदा वृद्धि होती रहती है तब उसकी संभोगरूपी डालियोंपर भला दुःखरूपी फल क्यों नहीं लगेंगे ? ॥२३९॥ मैंने इच्छानुसार चिरकालतक दसों प्रकारके भोग भोगे परन्तु इस भवमें तृष्णाको नष्ट करनेवाली तृप्ति मुझे रंचमात्र भी नहीं हुई ॥ २४०॥ यदि हमारी इच्छाके विषयभूत सभी इष्ट पदार्थ एक साथ मिल जायें तो भी उनसे थोड़ा सा भी सुख नहीं मिलता है ।।२४१॥
श्लोक 242 से 252 श्रीपाल की दीक्षा और मोक्ष
स्त्रियोंसे सुखकी प्राप्ति होना ही पुरुषत्व है ऐसा प्रसिद्ध है परन्तु इससे बढ़कर और दीनता क्या होगी ? इसलिये अपने आत्मामें ही सच्चे सुखका निश्चय कर पुरुष हो सकता हूं-पुरुषत्वका धनी बन सकता हूं ॥ २४२॥ इस प्रकार बुद्धिकी वक्रताको छोड़ते हुए श्रीपाल चक्रवर्तीने चक्ररत्न सहित समस्त परिग्रहको एक साथ छोड़नेका विचार किया ॥२४३॥ तदनन्तर उसने नरपाल नामके सुखावतीके पुत्रका राज्याभिषेक कर उसे अपने बहुत ऊंचे सिंहासनपर बैठाया और स्वयं जयवती आदि रानियों तथा वसुपाल आदि राजाओंके साथ दीक्षा धारण कर ली ।। २४४-२४५।। उन्होंने विधिपूर्वक बाहय और अन्तरङ्ग तप तपा, क्षपक श्रेणीमें चढ़कर मोहरूपी शत्रुको नाश करनेसे प्राप्त होनेवाला कषायरहित यथाख्यात नामका उत्कृष्ट चारित्र प्राप्त किया, वीचाररहित द्वितीय शुक्ल ध्यानके द्वारा आत्मस्वरूपकाचिन्तवन करते हुए ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तराय इन तीन घातिया कर्मोंको नष्ट कर नौ केवललब्धियां प्राप्त कीं, सयोगकेवली गुणस्थानमें पहुंचकर क्रमसे योगरहित होकर सब कर्म नष्ट किये और अन्तमें औदारिक, तैजस, कार्माण तीनों शरीरोंके नाशसे गुणोंका समूह प्रकट कर अनन्त, शान्त, नवीन और उत्तम सुख प्राप्त किया ॥ २४६-२४९।। श्रीपाल चक्रवर्तीकी सब रानियां भी अनेक प्रकारका तप तपकर स्वर्गलोकमें अपने अपने योग्य बड़े बड़े विमानोंमें देव हुईं ॥ २५० ॥ सुलोचना जयकुमारसे कह रही है कि हम दोनों भी ये सब कथाएं सुनकर एवं गुणपाल तीर्थङ्कर को नमस्कार कर स्वर्ग चले गये थे और वहां यथायोग्य सुख भोगकर आयुके अन्तमें बाकी बचे हुए पुण्यविशेषसे यहां उत्पन्न हुए हैं। ये सब कथाएं सुलोचनाने स्पष्ट शब्दोंमें कही थीं और जयकुमार भी अपनी प्रियाकी बुद्धिके प्रभावसे उस समय अत्यन्त संतुष्ट हुआ था ।। २५१-२५२॥
श्लोक 253 से 273 जयकुमार-सुलोचना का विहार और शील परीक्षा
उस समय सभामें बैठे हुए सभी लोगोंने सुलोचना के कहनेपर विश्वास किया सो ठीक ही है, क्योंकि जो दुष्ट नहीं है वह ऐसा कौन है जो सज्जनों के द्वारा कहे हुए वचनोंपर विश्वास न करे ॥ २५३॥ इस प्रकार साम्राज्य तथा श्रेष्ठ भोगोंका निरन्तर उपभोग करते और परस्पर एक दूसरेको प्रसन्न करते हुए वे दोनों सुखसे समय बिताने लगे ।।२५४।। उसी समय पहले विद्याधरके भवमें लक्ष्मीको बढ़ानेवाली जो प्रज्ञप्ति आदि विद्याएं थीं वे भी बड़े प्रेमसे जयकुमार और सुलोचना दोनोंको प्राप्त हो गईं ।॥२५५।। उन विद्याओंके बलसे महाराज जयकुमारने अपनी प्रिया-सुलोचनाके साथ देवोंके योग्य देशोंमें विहार करनेकी इच्छा की और इसलिये ही अपने छोटे भाई विजयकुमारको राज्यकार्यमें नियुक्त कर दिया ।।२५६।।
तदनन्तर जिसकी सवारियां विद्याके द्वारा बनी हुई हैं ऐसा वह जयकुमार अपनी प्रिया-सुलोचनाके साथ साथ समुद्र, कुलाचल और अनेक प्रकारके-मनोहर वनोंमें विहार करताहुआ किसी समय कैलाश पर्वतके वनमें पहुंचा और किसी कारणवश सुलोचनासे कुछ दूर चला गया ।।२५७-२५८।। उसी समय इन्द्र अपनी सभाके बीचमें जयकुमार और उसकी प्रिया सुलोचनाके शीलकी महिमाका वर्णन कर रहा था उसे सुनकर पहले स्वर्गके रविप्रभविमानमें उत्पन्न हुए लक्ष्मीके अधिपति रविप्रभ नामके देवने उनके शीलकी परीक्षा करनेके लिये एक काञ्चना नामकी देवी भेजी, वह बुद्धिमती देवी जयकुमारके पास आकर कहने लगी कि ‘इसी भरतक्षेत्रके विजयार्ध पर्वतकी उत्तरश्रेणीमें एक मनोहर नामका देश है, उसके रत्नपुर नगरके अधिपति राजा पिङ्गल गांधार हैं, उनके सुख देनेवाली रानी सुप्रभा है, उन दोनोंकी में विद्युत्प्रभा नामकी पुत्री हूं और राजा नमिकी भार्या हूं । महामेरु पर्वतपर नन्दन वनमें क्रीड़ा करते हुए आपको देखकर मैं अत्यन्त उत्सुक हो उठी हूं। उसी समयसे मेरे चित्तमें आपकी आकृति लिख सी गई है, मैं सदा आपके समागम का ही ध्यान करती रहती हूं। दैवयोगसे आज आपको देखकर आनन्दके वेगको रोकनेके लिये असमर्थ हो गई हूं।’ यह कहकर उसने समीपमें बैठे हुए अपने सब लोगोंको दूर कर दिया और कामसे विह्वल होकर तिरछी आंखें चलाती हुई वह देवी जयकुमारमें अपना अनुराग स्पष्ट रूपसे प्रकट करने लगी । उसकी दुष्ट चेष्टा देखकर जयकुमारने कहा कि तू इस तरह पापका विचार मत कर, तू मेरी बहिन है, मैंने मुनिराजसे व्रत लिया है कि मुझे परस्त्रियोंके शरीरके संसर्गसे उत्पन्न होनेवाला सुख विष खानेके समान है। महाराज जयकुमारके इस प्रकार कहनेपर वह देवी झूठमूठके क्रोधसे कांपने लगी और राक्षसीका वेष धारणकर जयकुमारको उठाकर जाने लगी । फूल तोड़नेमें लगी हुई सुलोचनाने यह देखकर उसे ललकार लगाई जिससे वह उसके शीलके माहात्म्यसे डरकर अदृश्य हो गई। देखो, शीलवती स्त्रीसे जब देवता भी डर जाते हैं तब औरोंकी तो बात ही क्या है ? वह कांचना देवी उन दोनोंके शीलका माहात्म्य जानकर अपने स्वामीके पास गई, वहां उसने उन दोनोंके उस माहात्म्यकी प्रशंसा की जिसे सुनकर वह रविप्रभ देव भी आश्चर्यसे उनके गुणोंमें प्रेम करता हुआ उन दोनोंके पास आया । उसने अपना सब वृत्तान्त कहकर उन दोनोंसे क्षमा मांगी और फिर बड़े बड़े रत्नीस पूजा कर वह स्वर्गको चला गया । इधर जयकुमार भी प्रिया-सुलोचनाके साथ चिरकाल तक बड़े प्रेमसे विहारकर वापिस लौटे और नगरमें आकर श्रेष्ठ सुखोंका अनुभव करने लगा ।।२५९-२७३।।
श्लोक 274 से 283 जयकुमार की दीक्षा और गणधर पद
अथानन्तर-जिसे आत्मज्ञान उत्पन्न हुआ है ऐसे जयकुमारने किसी एक दिन आनन्दके पात्र श्री आदिनाथ तीर्थ करके पास जाकर उनकी वन्दना की, धर्मविषयक प्रश्न कर उनका यथा योग्य उत्तर सुना, आक्षेपिणी आदि कथाएं कहीं और कर्मोंके बन्ध उदय आदिकी चर्चा की ।।२७४-२७५।। इस प्रकार प्रबुद्ध बुद्धिको धारण करनेवाले जयकुमारने कर्मोंके नाशसे प्राप्त होने योग्य श्रेष्ठ सुखको प्राप्त किया । तदनन्तर उसने जो लोगोंको बहुत ही, प्रिय है, जिसे शत्रु नहीं रोक सकते हैं, जो शस्त्र और शास्त्र दोनोंका जाननेवाला है, जिसका यश कुमार अवस्थासे ही फैल रहा है, जिसकी शूरवीरता शत्रुओंके जीतने तक है, जिसका दान सब याचकोंको संतुष्ट करनेवाला है, और जिसका सत्य कभी स्वप्नमें भी खण्डित नहीं हुआ है ऐसे शिवंकर महादेवीके पुत्र अनन्तवीर्यका राज्याभिषेक कर उसे अपनी सब राज्य संपदा दे दी ।।२७६-२७८ ।। तदनन्तर जो आकुलता रहित परम पद प्राप्त करनेकी इच्छा कर रहा है, जिसने अपने सब कुटुम्बका परित्याग कर दिया है, अपनी इन्द्रियोंको वश कर लिया है, महामोहको डांट दिखा दी है और शुभास्रवका संचय किया है ऐसे चरमशरीरी तथा विशुद्धि को धारण करनेवाले जयकुमारने विजय, जयंत, संजयन्त तथा परिग्रहके त्यागका निश्चय करनेवाले और राग द्वेषसे अदूषित अन्य छोटे भाइयों एवं रविकीति, रविजय, रिदम, रिजय, सुजय, सुकान्त, सातवां अजितंजय, महाजय, अतिवीर्य, वरंजय, रविवीर्य तथा इनके सिवाय और भी वैराग्यको प्राप्त हुए चक्रवर्तीके पुत्रोंके साथ साथ दीक्षा धारण की ।।२७९-२८३।।
श्लोक 284 से 303 भरत की पूजा और धर्म का स्वरूप
उस समय भगवान् ऋषभदेवके समीप जयकुमार ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो आपके बड़े भारी शासनको धारण करनेके लिये यह एक विशेष पात्र है यही समझकर महाराज भरत-ने उसे भगवान्के लिये सौंपा हो ।॥ २८४।। इस प्रकार जिसने सब परिग्रहका त्याग कर दिया है, सम्पूर्ण श्रुतका अर्थसंग्रह प्राप्त किया है, जो उत्कृष्ट संयम धारणकर सात ऋद्धियोंसे निरन्तर बढ़ रहा है, और चार ज्ञानरूपी निर्मल ज्योतिसे जिसने मनका विस्तीर्ण अंधकार नष्ट कर दिया है ऐसा वह जयकुमार भगवान्का इकहत्तरवां गणधर हुआ ॥२८५-२८६॥ इधर पतिके वियोगसे जिसे बड़ा भारी शोक रहा है और जो पड़े हुए कल्पवृक्षसे नीचे गिरी हुई कल्पलताके समान निष्प्रभ हो गई है ऐसी सुलोचनाने भी चक्रवर्तीकी पट्टरानी सुभद्राके समझाने पर ब्राह्मी आयिकाके पास शीघ्र ही दीक्षा धारण कर ली और जिसे आगामी पर्यायमें मोक्ष होनेवाला है ऐसी वह सुलोचना चिरकाल तक तप कर अच्युतस्वर्गके अनुत्तरविमानमें देव पैदा हुई ।
इधर जो मोक्षमार्गकी प्रवृत्ति चला रहे हैं, अनेक ऋद्धियोंसे सुशोभित वृषभसेन आदि चौरासी गणधरोंसे घिरे हुए हैं, चार हजार सात सौ पचास पूर्वज्ञानियोंसे सहित हैं, चार हजार एक सौ पचास शिक्षक मुनियोंसे युक्त हैं, नौहजार अवधिज्ञानरूपी नेत्रको धारण करनेवाले मुनियोंसे सहित हैं, बीस हजार केवलज्ञानियोंसे युक्त हैं, बीस हजार छह सौ विक्रिया ऋद्धिके धारक मुनियोंसे वृद्धिको प्राप्त हो रहे हैं, बारह हजार सात सौ पचास मनःपर्ययज्ञानियोंसे अन्वित हैं, परवादियोंको हटानेवाले बारह हजार सात सौ पचास वादियोंसे वन्दनीय हैं, और इस प्रकार सब मिलाकर तपश्चरणरूपी सम्पदाओंको प्राप्त करनेवाले चौरासी हजार चौरासी मुनिराज जिनकी निरन्तर पूजा करते हैं, ब्राह्मी आदि तीन लाख पचास हजार आर्यिकाएं जिनके गुणोंका स्तवन कर रही हैं, दृढव्रत आदि तीन लाख श्रावक जिनकी सेवा कर रहे हैं, सुव्रता आदि पांच लाख श्राविकाएं जिनकी स्तुति कर रही हैं, भवनवासी आदि चार प्रकारके देव देवियां जिनके चरणकमलोंका स्तवन कर रही हैं, चौपाये आदि तिर्यञ्चगतिके जीव जिनकी सेवा कर रहे हैं, चौंतीस अतिशय विशेषोंसे जिनका अभ्युदय प्रकट हो रहा है, जो केवल आत्मा से उत्पन्न होनेवाले विशिष्ट ज्ञान, विशिष्ट दर्शन, विशिष्ट सुख और विशिष्ट वीर्यको प्राप्त हो रहे हैं, जो शरीरकी सुन्दरतासे युक्त हैं, जो सज्जाति आदि सात परम स्थानोंसे संगत हैं, जो आठ प्रातिहार्योंसे युक्त हैं, जिन्होंने चार घातिया कर्म नष्ट कर दिये हैं, जो वृषभ आदि एक हजार आठ नामोंसे कहे जाते हैं और जिन्होंने भव्य जीवरूपी कमलोंके वनको प्रफुल्लित कर दिया है ऐसे भगवान् वृषभदेवके पास जाकर मुकुलित कमलके समान हाथ जोड़े हुए चक्रवर्ती भरतने उनकी पूजा की और धर्मका स्वरूप पूछा तब भगवान् इस प्रकार कहने लगे—
जो शिष्योंको कुगतिसे हटाकर उत्तम स्थानमें पहुंचा दे सत् पुरुष उसे ही धर्म कहते हैं । उस धर्मके चार भेद हैं- सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र और सम्यक्तप । यह धर्म कर्तव्य प्रधान है ।॥२८७-३०३॥
श्लोक 304 से 321 मोक्ष के चार मार्गों का निरूपण और उपदेश
अपने आप अथवा दूसरेके उपदेशसे जीव आदि सात तत्त्वों-में जो यथार्थ श्रद्धान होता है वह सम्यग्दर्शन कहलाता है ॥ ३०४॥ यह सम्यग्दर्शन शंका आदि दोषोंसे रहित होता है तथा औपशमिक, क्षायिक और क्षायोपशमिक इन तीन भावों द्वारा इसकी विवेचना होती है अर्थात् भावोंकी अपेक्षा सम्यग्दर्शनके तीन भेद हैं। संशय, विपर्यय और अनध्यवसायका अभाव होनेसे उन्हीं जीवादि सात तत्त्वोंका यथार्थ ज्ञान होना सम्यग्ज्ञान कहलाता है। जिससे कर्मोंका आस्रव न हो उसे चारित्र अथवा संयम कहते हैं । ॥३०५-३०६।। जिससे कर्मोंकी निर्जरा हो ऐसी वृत्ति धारण करना तप कहलाता है। ये चारों ही गुण यदि कषाय सहित हों तो स्वर्गके कारण हैं और कषायरहित हों तो आत्माका हित चाहनेवाले लोगोंको स्वर्ग और मोक्ष दोनोंके कारण हैं। ये चारों ही मोक्षके मार्ग हैं और प्राणियोंको बड़ी कठिनाईसे प्राप्त होते हैं ।॥ ३०७-३०८॥ मिथ्यात्व, अव्रताचरण, (अविरति), प्रमाद, कषाय और शुभ-अशुभ योग ये जीवोंके कर्मबन्धके कारण हैं ।॥३०९।। मिथ्यात्व पांच तरहका है, अविरति एक सौ आठ प्रकारकी है, प्रमाद पन्द्रह है, कषायके चार भेद हैं, और सम्यग्ज्ञानरूपी नेत्रको धारण करनेवाले लोगोंको योगके पन्द्रह भेद जानना चाहिये । विद्वानोंने कर्मोंका निरूपण मूल और उत्तरभेदके द्वारा किया है– कर्मोंके मूल भेद आठ हैं और उत्तरभेद एक सौ अड़तालीस हैं ।। ३१०-३११॥ प्रकृति आदिके भेदसे बंध चार प्रकार-का जानना चाहिये तथा कर्म उदयमें आकर ही फल और बन्धके कारण होते हैं। भावार्थ-पहलेके बँधे हुए कर्मोंका उदय आनेपर ही उनका सुख दुःख आदि फल मिलता है तथा नवीन कर्मोंका बन्ध होता है ॥ ३१२॥ तुम लोग भक्तिमान् हो, निकटभव्य हो और आगमको जाननेवाले हो, इसलिये संसारके कारण स्वरूप-दोष, दुःख, बुढापा और मृत्यु आदि पापोंसे भरे हुए इस भयंकर गृहस्थाश्रमको छोड़कर गुप्ति, समिति, धर्म, अनुप्रेक्षा, परिषहजय और चारित्र इन छहोंका अच्छी तरह अभ्यास करो तथा जिनके उपेक्षा आदि भेद कहे गये हैं ऐसे वीतरागादि मुनियोंमें, जिनके पुलाक आदि भेद हैं ऐसे अनगारादि मुनियोंमें अथवा प्रमत्त संयतको आदि लेकर उत्कृष्ट गुण-स्थानोंमें रहनेवाले प्रमत्तविरत आदि मुनियोंमेंसे किसी एककी अवस्था धारणकर निश्चय और व्यवहार दोनों प्रकारके उत्तम मोक्षकी उपासना करो ॥३१३-३१६॥ इसी प्रकार गृहस्थाश्रममें रहनेवाले बुद्धिमान् पुरुष सम्यग्दर्शन पूर्वक दान, शील, उपवास तथा अरहंत आदि परमेष्ठियोंकी पूजा करें, शुभ परिणामोंसे श्रावकोंकी ग्यारह प्रतिमाओंका पालन करें और यथायोग्य सज्जाति आदि सात परमस्थानोंको प्राप्त हों ।।३१७-३१८।। इस प्रकार भरतेश्वरने समीचीन तत्त्वोंकी रचनासे भरी हुई भगवान्की वचनरूप विभूति सुनकर सब सभाके साथ साथ कही हुई सब बातोंको ज्योंकी त्यों माना अर्थात् उनका ठीक ठीक श्रद्धान किया ॥ ३१९॥ मति, श्रुत, अवधि – इन तीनों ज्ञानरूपी नेत्रों और सम्य-ग्दर्शनकी विशुद्धिको धारण करनेवाला देशसंयमी भरत भगवान् वृषभदेवकी वन्दनाकर कैलाश पर्वतसे अपने उत्तम नगर-अयोध्याको आया ।। ३२० ।। इधर तीनों लोकोंके स्वामी भगवान् आदिनाथने भी धर्मके योग्य क्षेत्रोंमें समीचीनधर्मका बीज बोकर उसे धर्मवृष्टिके द्वारा खूब ही सींचा ॥ ३२१।।
श्लोक 322 से 331 मोक्ष के पूर्व स्वप्न और संकेत
इस प्रकार सज्जनोंको मोक्षरूपी उत्तम फलकी प्राप्ति करानक लिये भगवान्ने अपने गणधरोंके साथ साथ एक हजार वर्ष और चौदह दिन कम एक लाख पूर्व विहार किया । और जब आयुके चौदह दिन बाकी रह गये तब योगोंका विरोधकर पौष मासकी पौर्णमासीके दिन श्रीशिखर और सिद्धशिखरके बीचमें कैलाश पर्वतपर जा विराजमान हुए ॥३२२-३२३॥ उसी दिन महाराज भरतने स्वप्नमें देखा कि महामेरु पर्वत अपनी लम्बाई से सिद्ध क्षेत्र तक पहुंच गया है ।। ३२४।। उसी दिन युवराज अर्ककीतिने भी स्वप्नमें देखा कि एक महौषधिका वृक्ष मनुष्योंके जन्मरूपी रोगको नष्टकर फिर स्वर्गको जा रहा है ।॥ ३२५॥ उसी दिन गृहपतिने देखा कि एक कल्पवृक्ष निरन्तर लोगोंके लिये उनकी इच्छानुसार अभीष्ट फल देकर अब स्वर्ग जानेके लिये तैयार हुआ है ।। ३२६ ।। प्रधानमंत्रीने देखा कि एक रत्नद्वीप, ग्रहण करनेकी इच्छा करनेवाले लोगोंको अनेक रत्नोंका समूह देकर अब आकाशमें जानेके लिये उद्यत हुआ है ॥ ३२७॥ सेनापतिने देखा कि एक सिंह वज्रके पिंजड़ेको तोड़कर कैलाश पर्वतको उल्लंघन करनेके लिये तैयार हुआ है ।। ३२८॥ जयकुमारके विद्वान् पुत्र श्रीमान् अनन्त-वीर्यने देखा कि चन्द्रमा तीनों लोकोंको प्रकाशितकर ताराओं सहित जा रहा है ।॥ ३२९।। सोती हुई सुभद्राने दखा कि यशस्वती और सुनन्दाके साथ बैठी हुई इन्द्राणी बहुत देरतक शोक कर रही है ॥३३०।। बनारसके राजा चित्राङ्गदने घबड़ाहटके साथ यह स्वप्न देखा कि सूर्य पृथिवीतलको प्रकाशित कर आकाशकी ओर उड़ा जा रहा है ॥ ३३१॥
श्लोक 332 से 342 मोक्ष-कल्याणक और निर्वाण
इस प्रकार भरतको आदि लेकर सब लोगोंने स्वप्न देखे और सूर्योदय होते ही सबने पुरोहितसे उनका फल पूछा ॥३३२॥ पुरोहितने कहा कि ये सभी स्वप्न कर्मोंको बिलकुल नष्ट कर भगवान् वृषभदेवका अनेक मुनियोंके साथ साथ मोक्ष जाना सूचित कर रहे हैं ।। ३३३॥ इस प्रकार पुरोहित उन सबके लिये स्वप्नोंका फल कह ही रहा था कि इतने में ही आनन्द नामका एक मनुष्य आकर भगवान्का सब हाल कहने लगा ॥ ३३४।॥ उसने कहा कि भगवान्ने अपनी दिव्यध्वनिका संकोच कर लिया है इसलिये सम्पूर्ण सभा हाथ जोड़कर बैठी हुई है और ऐसा जान पड़ता है मानो सूर्यास्तके समय निमीलित कमलोंसे युक्त सरसी ही हो ॥ ३३५॥ यह सुनते ही भरत चक्रवर्ती बहुत ही शीघ्र सब लोगोंके साथ साथ कैलाश पर्वतपर गया, वहां जाकर उसने भगवान् वृषभदेवकी तीन प्रदक्षिणाएं दीं, स्तुति कीं और भक्तिपूर्वक अपने हाथसे महामह नामकी पूजा करता हुआ वह चौदह दिन तक इसी प्रकार भगवान्की सेवा करता रहा ।।३३६-३३७।। माघ कृष्ण चतुर्दशी के दिन सूर्योदयके शुभ मुहूर्त और अभिजित् नक्षत्रमें भगवान् वृषभदेव पूर्वदिशाकी ओर मुँहकर अनेक मुनियोंके साथ साथ पर्यंकासनसे विराजमान हुए, उन्होंने तीसरे-सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति नामके शुक्ल ध्यानसे तीनों योगोंका निरोध किया और फिर अन्तिम गुणस्थानमें ठहरकर पांच लघु अक्षरोंके उच्चारण प्रमाण कालमें चौर्थ व्युपरत क्रिया-निर्वात नामके शुक्लध्यानसे अघातिया कर्मोंका नाश किया। फिर औदारिक, तैजस और कार्मण इन तीनों शरीरोंके नाश होनेसे सिद्धत्वपर्याय प्राप्तकर वे सम्यक्त्व आदि निजके आठ गुणोंसे युक्त हो क्षण भरमें ही तनुवातवलयमें जा पहुंचे तथा वहांपर नित्य, निरंजन, अपने शरीरसे कुछ कम, अमूर्त, आत्मसुखमें तल्लीन और निरन्तर संसारको देखते हुए विराजमान हुए ॥३३८-३४२।।
श्लोक 343 से 354 भस्म-संस्कार और अग्नि-स्थापना
उसी समय मोक्ष-कल्याणकको पूजा करनेकी इच्छासे सब देव लोग आये उन्होंने “यह भगवान्का शरीर पवित्र, उत्कृष्ट, मोक्षका साधन, स्वच्छ और निर्मल है” यह विचारकर उसे बहुमूल्य पालकी में विराजमान किया । तदनन्तर जो अग्निकुमार देवोंके इन्द्रके रत्नोंकी कान्तिसे देदीप्यमान उन्नत मुकुटसे उत्पन्न हुई है तथा चन्दन, अगुरु, कपूर, केशर आदि सुगन्धित पदार्थों और घी दूध आदिसे बढ़ाई गई है ऐसी अग्निसे जगत्की अभूतपूर्व सुगन्धि प्रकट कर उसका वर्तमान आकार नष्ट कर दिया और इस प्रकार उसे दूसरी पर्याय प्राप्त करा दी ॥ ३४३-३४६।। गन्ध, पुष्प आदिसे जिसकी पूजा की गई है ऐसे उस अग्निकुण्डके दाहिनी ओर गणधरोंके शरीरका संस्कार करनेवाली अग्नि स्थापित की और बांई ओर तीर्थकर तथा गणधरोंसे अतिरिक्त अन्य सामान्य केवलियोंके शरीरका संस्कार करनेवाली अग्नि स्थापित की, इस प्रकार इन्द्रोंने पृथिवीपर तीन प्रकारकी अग्नि स्थापित की । तदनन्तर उन्हीं इन्द्रोंने पंच कल्याणकको प्राप्त होनेवाले श्री वृषभदेवके शरीरकी भस्म उठाई और ‘हम लोग भी ऐसे ही हों’ यही सोचकर बड़ी भक्तिसे अपने ललाटपर दोनों भुजाओंमें, गलेमें और वक्षःस्थलमें लगाई । वे सब उस भस्मको अत्यन्त पवित्र मानकर धर्मानुरागके रससे तन्मय हो रहे थे ॥ ३४७-३५०।। सबने मिलकर बड़े संतोषसे आनन्द नामका नाटक किया और फिर श्रावकोंको उपदेश दिया कि ‘हे सप्तमादि प्रतिमाओंको धारण करनेवाले सभी ब्रह्मचारियो, तुम लोग तीनों संध्याओंमें स्वयं गार्हपत्य, आहवनीय और दक्षिणाग्नि इन तीन अग्नियोंकी स्थापना करो, और उनके समीप ही धर्मचक्र, छत्र तथा जिनेन्द्रदेवकी प्रतिमाओं की स्थापनाकर तीनों काल मन्त्रपूर्वक उनकी पूजा करो। इस प्रकार गृहस्थोंके द्वारा आदर सत्कार पाते हुए अतिथि बनो’ ॥ ३५१-३५४।।
श्लोक 355 से 371 भरत का शोक और पूर्वभव कथन (प्रथम भाग)
इधर उस समय इष्टके वियोगसे उत्पन्न हुई और स्नेहसे प्रज्वलित हुई शोकरूपी अग्नि भरतके प्रबुद्ध चित्तको भी जला रही थी ॥ ३५५॥ जब भरतका यह हाल देखा तब वृषभसेन गणधर भरतका शोक दूर करनेकी इच्छा से अपने सब लोगोंके पूर्वभव स्पष्ट रूपसे कहने लगे ॥३५६॥ उन्होंने कहा कि वृषभदेवका जीव पहले भवमें जयवर्मा था दूसरे भवमें महाबल हुआ, तीसरे भवमें ललिताङ्गदेव और चौथे भवमें राजा वज्रजंघ हुआ । पांचवें भवमें भोग-भूमिका आर्य हुआ । छठवें भवमें श्रीधरदेव हुआ, सातवें भवमें सुविधि राजा हुआ । आठवें भवमें अच्युतेन्द्र हुआ, नौवें भवमें राजा वज्रनाभि हुआ, दशवें भवमें सर्वार्थसिद्धिमें अहमिन्द्र हुआ और वहांसे आकर सब इन्द्रोंके द्वारा वन्दनीय वृषभदेव हुआ है ॥ ३५७-३५९॥ श्रेयान् का जीव पहले भवमें घनश्री था, दूसरे भवमें निर्णामिका, तीसरे भवमें स्वयंप्रभा देवी, चौथे भवमें श्रीमती, पांचवें भवमें भोगभूमिकी आर्या, छठवें भवमें स्वयंप्रभदेव, सातवें भवमें केशव, आठवें भवमें अच्युतस्वर्गका प्रतीन्द्र, नौवें भवमें धनदत्त, दशवें भवमें अहमिन्द्र हुआ और वहांसे आकर दानतीर्थका नायक तथा पंचाश्चर्यकी सबसे पहले प्रवृत्ति करानेवाला राजा श्रेयान् हुआ है ।।३६०-३६२।। तेरा जीव पहले भवमें अतिगृद्ध नामका राजा था, दूसरे भवमें नारकी हुआ, तीसरे भवमें शार्दूल हुआ, चौथे भवमें दिवाकर प्रभदेव हुआ, पांचवें भवमें मतिवर हुआ, छठवें भवमें अहमिन्द्र हुआ, सातवें भवमें सुबाहु हुआ, आठवें भवमें अर्हमिन्द्र हुआ और नौवें भवमें छह खण्ड पृथिवीका अखण्ड पालन करनेवाला भरत हुआ है ।।३६३-३६४।। बाहु-बलीका जीव पहले सेनापति था, फिर भोगभूमिमें आर्य हुआ । उसके बाद प्रभंकर देव हुआ, तदनन्तर अकंपन हुआ, उसके पश्चात् अहमिन्द्र हुआ, फिर महाबाहु हुआ, फिर अहमिन्द्र हुआ और अब उसके बाद अपूर्व महा उदयको धारण करनेवाला बाहुबली हुआ है ।।३६५-३६६।। मैं पहले भवमें राजा प्रीतिवर्धनका मंत्री था, उसके बाद भोग-भूमिका आर्य हुआ, फिर कनकप्रभदेव हुआ, उसके पश्चात् आनन्द हुआ, फिर अहमिन्द्र हुआ, वहांसे आकर पीठ हुआ, फिर सर्वार्थ-सिद्धिका अहमिन्द्र हुआ और अब भगवान् वृषभदेवका गणधर हुआ हूं । अनन्तविजयका जीव सबसे पहले पुरोहित था, फिर भोगभूमिका आर्य हुआ, उसके बाद प्रभंजन नामका देव हुआ, फिर धनमित्र हुआ, उसके पश्चात् अहमिन्द्र हुआ, उसके अनन्तर महापीठ हुआ, फिर अहमिन्द्र हुआ और अब अनन्तविजय गणधर हुआ है ।। ३६७-३६९॥ महासेन पहले भवमें उग्रसेन था, दूसरे भवमें शार्दूल हुआ, तीसरे भवमें भोगभूमिका आर्य हुआ, चौथे भवमें चित्राङ्गद देव हुआ, पांचवें भवमें वरदत्त राजा हुआ, छठवें भवमें देव हुआ, सातवें भवमें जय हुआ, वहां-से चलकर आठवें भवमें अहमिन्द्र हुआ और नौवें भवमें वहांसे पृथिवीपर आकर कर्मरूपी महासेनाको जीतनेमें अत्यन्त बलवान् महासेन हुआ है ॥ ३७०-३७१॥
श्लोक 372 से 381 शोक-निवारण उपदेश
श्रीषेणका जीव पहले भवमें हरिवाहन था, दूसरे भवमें वराह हुआ, तीसरे भवमें भोगभूमिका आर्य हुआ, चौथे . भवमें मणिकुण्डली देव हुआ, पांचवें भवमें वरसेन नामका राजा हुआ, छठवें भवमें उत्तम देव हुआ, सातवें भवमें विजय हुआ, आठवें भवमें अहमिन्द्र हुआ और नौवें भवमें अतिशय पूज्य तथा लक्ष्मीसे सेवित श्रीषेण हुआ है ॥ ३७२-३७३।। गुणसेनका जीव पहले नागदत्त था, फिर वानर हुआ, उसके बाद भोगभूमिका आर्य हुआ, फिर मनोहर नामका देव हुआ, उसके पश्चात् चित्राङ्गद नामका राजा हुआ, फिर सामानिक देव हुआ, वहांसे च्युत होकर जयन्त हुआ, फिर अहमिन्द्र हुआ और अब वहांसे पृथिवीपर आकर गुणसेन नामका गणधर हुआ है ।।३७४-३७५।। जयसेनका जीव पहले लोलुप नामका हलवाई था, फिर नेवला हुआ, उसके बाद भोगभूमिका आर्य हुआ, फिर मनोरथ नामका देव हुआ, उसके पश्चात् राजा शान्तमदन हुआ, फिर सामानिक देव हुआ, तदनन्तर राजा अपराजित हुआ, फिर अहमिन्द्र हुआ और अब मेरा छोटा भाई अतिशय बलवान् जयसेन हुआ है ॥ ३७६-३७७।। श्री वृषभ-सेन गणधर चक्रवर्ती भरतसे कह रहे हैं कि इस संसाररूपी संकटमें इसी प्रकार सब प्राणियोंको इष्ट-अनिष्ट वस्तुओंका संगम होता है और अन्तमें अकस्मात् ही उसका नाश हो जाता है, तू यह सब जानता हुआ भी इतना खिन्नहृदय क्यों हो रहा है ? भगवान् वृषभदेव तो आठों कर्मोंको नष्टकर अनुपम मोक्षस्थानको प्राप्त हुए हैं फिर भला ऐसे संतोषके स्थानमें विषाद क्यों करता है ? ॥ ३७८॥ हे चक्रतिन्, हम सब लोग भी चरमशरीरी हैं, शुद्ध बुद्धिको धारण करनेवाले भगवान्के समागमसे सम्पूर्ण कर्ममलको नष्टकर आत्मस्वरूपको प्राप्त हुए हैं और अनुपम सुखसे श्रेष्ठ तथा अन्य मिथ्यादृष्टियोंके दुर्लभ उन्हीं भगवान्के पदको हम लोग भी बहुत शीघ्र प्राप्त करेंगे ।। ३७९॥ इष्ट मित्रोंकी मृत्यु होनेपर शोक हो सकता है क्योंकि उनकी वह मृत्यु शुभ अशुभ कर्मोंसे होती है और फिर भी इस संसारमें उनका जन्म करानेवाली होती है, परन्तु जिसने संसारका नाश कर दिया है और निरन्तर जिसकी प्रार्थना की जाती है ऐसा सिद्ध पद यदि स्वयं प्राप्त हो जावे तो इस बुद्धिमान् मनुष्यको यदि वह शत्रु नहीं है तो शोक कैसे करना चाहिये ? भावार्थ-हर्षके स्थानमें शत्रुको ही शोक होता है, मित्रको नहीं होता इसलिये तुम सबको आनन्द मानना चाहिये न कि शोक करना चाहिये ॥३८०।। हे निधिपते, भगवान् वृषभदेवको आठों ही दुष्ट शत्रु जड़ और शाखा सहित बिलकुल ही नष्ट हो गये हैं और अब वे आठ बड़े बड़े गुणोंसे सेवित हो रहे हैं, भला, इसमें क्या हानि हो राई ? इसलिये अब तू मोह छोड़ और शोकको जीतनेके लिये विशुद्ध बुद्धिको धारण कर ॥३८१॥
श्लोक 382 से 391 शोक का निवारण और भरत का वैराग्य
पूज्य पिताजीका शरीर छूट जानेसे यदि तू इतना अधिक शोक करता है तो बतला, जन्मसे पहले ही उनकी सेवा करनेवाले और बढ़े हुए अनुरागको धारण करनेवाले ये देव लोग भगवान्के शरीरको भस्म कर इतना अधिक आनन्द नृत्य क्यों कर रहे हैं ? भावार्थ-ये देव लोग भी भगवान्से अधिक प्रेम रखते थे, जन्मसे पहले ही उनकी सेवामें तत्पर रहते थे फिर ये उनके शरीरको जलाकर क्यों आनन्द मना रहे हैं इससे मालूम होता है कि भगवान्का शरीर छूट जाना दुःखका कारण नहीं है तू व्यर्थ ही क्यों शोक कर रहा है ? ॥ ३८२।। कदाचित् तू यह कहेगा कि ‘अब में उनके दर्शन नहीं कर रहा हूं, उनके दिव्य वचन नहीं सुन रहा हूं, और उनके दोनों चरणोंमें नम्ग्र होकर उनके नखोंकी कान्तिसे अपने मुकुटको देदीप्यमान नहीं कर पाता हूं, इसलिये ही स्नेहके वशसे आज मुझे बहुत शोक हो रहा है तो तेरा यह कहना ठीक है परन्तु बीती हुई वस्तुके लिये प्रार्थना करना तेरी भूल ही है ॥ ३८३॥ हे भरत, तेरे पिता तो तीनों लोकोंके अद्वितीय गुरु थे और तू भी तीन ज्ञानोंका धारक है फिर इस मोहजात स्नेह-से अपनी उत्तमता क्यों नष्ट कर रहा है ? क्या तुझे ऐसा करते हुए इन्द्रसे लज्जा नहीं आती ? अथवा क्या तू यह नहीं समझता है कि मैं इन्द्रसे पहले ही मोक्षको प्राप्त हो जाऊंगा ? ॥३८४।। इस संसारमें क्या इष्ट है ? क्या अनिष्ट है ? फिर भी यह मूर्ख प्राणी व्यर्थ ही संकल्प कर किसीसे द्वेष करता है, किसीको चाहता है और कभी दोनोंको उलटा समझ लेता है, इसलिये ही इसके पापकी परम्परा चलती रहती है और इसलिये ही यह भव्य होकर भी अभव्यकी तरह दुखी, निर्धन, कुमार्गमें प्रवृत्ति करनेवाला और रोगोंसे भयभीत होता हुआ इस संसाररूपी वनमें भ्रमण करता रहता है ।॥ ३८५।। काल आदि लब्धियोंके बिना पूज्य भव्य जीवको भी संसारमें रहना पड़ता है, यह काल अनादि है तथा अचिन्त्य दुःखोंसे भरा हुआ है इसलिये संसारकी इस स्थितिको बार बार धिवकार हो, यही सब समझ विद्वान् पुरुष-को इस संसारमें शोक नहीं करना चाहिये अथवा जीवोंका यह भव्यत्वपना भी अनेक प्रकारका होता है । हे राजन्, वस्तुका सहज स्वभाव ही ऐसा है ॥ ३८६॥ हे भरत, तू तो संसार-का स्वरूप जाननेवाला है, क्या तू यह नहीं जानता कि अनन्त कालसे परिवर्तन करते रहनेके कारण इस जीवके सैकड़ों सम्बन्ध हो चुके हैं ? फिर क्यों अज्ञानीकी तरह व्यर्थ ही मोहित होता है ।।३८७।। तीनों लोकोंके अधिपति भगवान् वृषभदेवका शरीर भी तो कर्मोंके द्वारा किया हुआ है इसलिये वह भी स्थायी नहीं है और इसलिये ही विद्वान् लोग उसे हेय समझते हैं ॥३८८॥ जो भगवान् पहले आंखोंसे दिखाई देते थे वे अब हृदयमें विद्यमान् हैं इसलिये इसमें शोक करनेकी क्या बात है ? तू उन्हें अपने चित्तमें सदा देखता रह ।। ३८९॥ इस प्रकार मनमें वस्तुके यथार्थ स्वरूपका चिन्तवन करता हुआ तू निर्मल ज्ञानरूपी जलसे शोक-रूपी अग्नि शान्त कर, ऐसा गणधर वृषभसेनने कहा तब चक्रवर्ती भी जिस प्रकार दावानलसे जला हुआ पर्वत नवीन बादलोंके जलते शान्त हो जाता है उसी प्रकार उनके वचनोंसे शान्त हो गया ।।३९०।।- जिसे आत्मज्ञान शीघ्र होनेवाला है और जिसका मुकुट नम्प्रभूत हो रहा है ऐसे भरतने पिताके शोकसे उत्पन्न हुई चिन्ता छोड़कर गणधरदेवको नमस्कार किया और अत्यन्त बढ़ी हुई अपनी भोगविषयक तृष्णाकी निन्दा करते हुए तथा मोक्षके लिये उत्सुक होते हुए उसने बड़े वैभवके साथ अपने नगरमें प्रवेश किया ।। ३९१।।
श्लोक 392 से 403 भरत का मोक्ष और स्तुति
अथानन्तर भरत महाराजने किसी समय उज्ज्वल दर्पणमें अपना मुखकमल देखकर परम सुखके स्थान स्वरूप भगवान् वृषभदेवके पाससे आये हुए दूतके समान सफेद बाल देखा ।।३९२।। उसे देखकर जिनका सब मोहरस गल गया है, जिन्हें आत्मज्ञान उत्पन्न हुआ है जो आत्महितको ग्रहण करनेके लिये उद्युक्त हैं और जिनकी वैराग्यविषयक इच्छा अत्यन्त सुदृढ़ तथा वृद्धिशील है ऐसे भरतने अपने राज्यको जीर्णतृणके समान मानकर अपने पुत्र अर्ककीति-को अपनी लक्ष्मीसे युक्त किया अर्थात् अपनी समस्त सम्पत्ति अर्ककीर्तिको प्रदान कर दी ॥३९३।। जिसने समस्त तत्त्वोंको जान लिया हैं और जो हीन जीवोंके द्वारा अगम्य मोक्षमार्गमें गमन करना चाहते हैं ऐसे चक्रवर्ती भरतने मार्ग हितकारी भोजनके समान प्रयासहीन यम तथा समितियोंसे पूर्ण संयमको धारण किया था सो ठीक ही है क्योंकि पदार्थके यथार्थ स्वरूपको समझनेवाले पुरुष संयमके सिवाय अन्य किस पदार्थकी प्रार्थना करते हैं ? ॥३९४।। उन्हें उसी समय मनःपर्ययज्ञान उत्पन्न हो गया और उसके बाद ही केवलज्ञान प्रकट हो गया । उनकी वैसी भव्यता उसी समय प्रकट हो गई सो ठीक ही है क्योंकि प्राणियोंको मोक्षकी प्राप्ति बड़ी विचित्र होती है ।। ३९५।। जो भरत पहले अपने देशमें उत्पन्न हुए राजाओंसे ही पूजित थे वे अब इन्द्रोंके द्वारा भी वन्दनीय हो गये। इतना ही नहीं, तीन लोकके स्वामी भी हो गये सो ठीक ही है जो कठिन तपश्चरण ग्रहण करनेके लिये समर्थ रहता है उसे क्या क्या वस्तु साध्य नहीं है अर्थात् सभी वस्तुएं उसे साध्य हैं ।॥ ३९६॥ मुनिरूपी हंस जिनसे परिचित हैं, जो धर्म-की वर्षा करते रहते हैं, जो आकाशमें निवास करते हैं, निर्मल हैं, उत्तमवृत्तिवाले हैं (पक्षमें ऊंचे स्थानपर विद्यमान रहते हैं) और जो भव्य जीवरूपी धानोंमें मोक्षरूपी पूर्ण फल लगानेवाले हैं ऐसे भरत महाराजने शरद् ऋतुके मेघके समान समस्त देशोंमें विहार किया ।॥३९७।। चिरकालतक विहारकर जिन्होंने शिक्षा देने योग्य जनसमूहका बहुत भारी कल्याण किया है ऐसे भरत महाराजने अपनी आयुकी अन्तर्मुहूर्त प्रमाण स्थिति बाकी रहनेपर योगनिरोध किया और औदारिक, तैजस तथा कार्माण इन तीन शरीररूप बन्धनोंके नष्ट होनेपर सम्यक्त्व आदि सारभूत गुण ही जिनकी मूर्ति रह गई है, जो प्रकाशमान हैं, जगत्त्रयके चूड़ामणि हैं और सुखके भाण्डार हैं ऐसे वह भरतेश्वर आत्मधाममें स्थित हो गये अर्थात् मोक्षको प्राप्त हो गये ।।३९८।। जो समस्त जीवोंके विषयमें शान्तचित्त हैं, उत्तम सुखको प्राप्त हैं, यम शील आदि गुणोंसे पूर्ण हैं, गुणवान् हैं और गण अर्थात् मनिसमूहके इन्द्र हैं ऐसे वृषभसेन आदि मुख्य मुनिराज भी कालक्रमसे अपरिमित निर्वाणधामको प्राप्त हुए ॥ ३९९॥ जिन्होंने नेताकी तरह चार आराधनारूप चार प्रकारकी सेनाको साथ लेकर पापरूपी विशाल शत्रुको नष्ट किया था, जिन्होंने सुवर्ण पाषाणके समान अपना देदीप्यमान स्वरूप प्राप्त किया है, भ्रमरोंके समान सब देवलोग जिनके कमलविजयी चरणोंकी सेवा करते हैं और जो तीन लोकके गुरु हैं ऐसे श्री भगवान् वृषभदेवकी सेवा करनेवाले तुम सबको वे ही कल्याण प्रदान करनेवाले हों ।।४००।। जो कुलकरोंमें पन्द्रहवें कुलकर थे, तीर्थ करोंमे प्रथम तीर्थ कर थे, जिन्होंने मनुष्योंकी जीविका की विधि और मोक्षका महान् मार्ग प्रत्यक्ष देखा था, जिन्हें आवरणसे रहित पूर्ण अन्तिम -केवलज्ञान उत्पन्न हुआ और जो समस्त पृथिवीके अधिपति भरत चक्रवर्तीके पिता थे वे श्रीमान् प्रथम तीर्थ कर तुम सबको लक्ष्मी प्रदान करें ॥ ४०१॥ जिन्होंने प्रसिद्ध सप्त पदार्थोंके समूह को प्रत्यक्ष देखा है और जो समीचीन धर्मरूपी तीर्थके मार्गकी रक्षा करनेमें मुख्य हेतु हैं ऐसे इक्ष्वाकु वंशके प्रमुख श्री वृषभनाथ भगवान् संसारी भव्य प्राणियोंको मोक्षरूपी आत्माकी उत्कृष्ट सिद्धिको प्रदान करें ।॥ ४०२।। जो नाभिराजके पुत्र होकर भी स्वयंभू हैं अर्थात् अपने आप उत्पन्न हैं, समस्त विद्वानोंके पूज्य हैं, समस्त परिग्रहका त्याग कर चुके हैं फिर भी विद्वानों-के स्वामी कहे जाते हैं, मध्यस्थ होकर भी भव्यजीवोंके समूहका उपकार करनेवाले हैं और दानरहित होनेपर भी विद्वानोंके द्वारा जिनके चरणोंकी सेवा की जाती है ऐसे भगवान् वृषभ-देव तुम सबकी शान्तिके लिये हों अर्थात् तुम्हें शान्ति प्रदान करनेवाले हों ।।४०३।।
इस प्रकार भगवान् गुणभद्राचार्यप्रणीत त्रिषष्टिलक्षण श्रीमहापुराण संग्रहके हिन्दी भाषानुवादमें प्रथम तीर्थ कर और प्रथम चक्रवर्तीका वर्णन करनेवाला यह सैंतालीसवां पर्व पूर्ण हुआ ।
हिन्दी-भाषानुवाद
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