श्री अभिनन्दनस्वामी का पुराण वर्णन
Hindi Translation of Uttar puran Parv 50
श्लोक 1 से 11 : पूर्वभव में राजा महाबल का वैभव और वैराग्य
पदाथके सत्य होनेसे जिनके वचनोंकी सत्यता सिद्ध है और ऐसे सत्य वचन ही जिन यथार्थ वक्ताकी सत्यताको प्रकट करते हैं ऐसे अभिनन्दन स्वामी वन्दना करनेवाले लोगोंको आन-न्द्रित करते हुए हम सबकी रक्षा करें ।॥ १ ॥ जम्बूद्वीपके पूर्व विदेह क्षेत्रमें सीता नदीके दक्षिण तट पर एक मङ्गलावली नामका देश सुशोभित है ॥ २ ॥ उसके रत्नसंचय नगरमें महाबल नामका राजा था। वह बहुत भारी राजसम्पत्तिसे सहित तथा चारों वर्णों और आश्रमोंका आश्रय था-रक्षा करने-वाला था ।। ३ ।। उसके पृथिवीकी रक्षा करते समय ‘अन्याय’ यह शब्द ही नहीं सुनाई पड़ता था और समस्त प्रजा किसी प्रतिबन्धके बिना ही अपने-अपने मार्गमें प्रवृत्ति करती थी ॥ ४ ॥ शत्रुओंको नष्ट करनेवाले उस राजामें सन्धि-विग्रह आदि छह गुणोंका समूह भी निर्गुणताको प्राप्त हो गया था और इस तरह निर्गुण होनेपर भी वह राजा त्याग तथा सत्य आदि गुणोंसे गुणवान् था ।। ५ ।। वह राजा लक्ष्मीका एक ही पति था। यद्यपि सरस्वती कीर्ति और वीरलक्ष्मी उसकी सौतें थीं तो भी राजा सब पर प्रसन्नचित्त रहता था। उसकी कीर्ति अन्य मनुष्यों के वचनों तथा कानोंमें रहती है, सरस्वती उसके वचनोंमें रहती है, वीरलक्ष्मी वक्षःस्थल पर रहती है और मैं सर्वाङ्गमें रहती हूं यह विचार कर ही लक्ष्मी अत्यन्त सन्तुष्ट रहती थी ।। ६-७ ।। स्त्रीरूपी कल्पलतासे रमणीय उसका शरीररूपी कल्पवृक्ष, वह जिस जिसकी इच्छा करता था वही वही सुख प्रदान करता था ।॥ ८ ॥ जिसके नेत्ररूपी भ्रमर सुन्दर स्त्रियोंके मुखरूपी कमलोंकी सेवा करनेमें सदा सतृष्ण रहते हैं ऐसे उस राजा महाबलने बहुत लम्बा समय सुखसे कालकी एक कलाके समान व्यतीत कर दिया ॥ ६ ॥ किसी समय इच्छानुसार मिलनेवाले भोगोपभोगोंमें अतृप्ति होनेसे उसे वैराग्य उत्पन्न हो गया जिससे उस उदारचेताने धनपाल नामक पुत्रके लिए राज्य कर विमलवाहन गुरुके पास पहुँच संयम धारण कर लिया । वह ग्यारह अङ्ग का पाठी हुआ और सोलह कारण भावनाओंका उसने चिन्तवन किया ।। १०-११ ॥
श्लोक 12 से 22 : तीर्थंकर नामकर्म बंध, देवगति और अभिनन्दननाथ का गर्भ-जन्म
सोलह कारण भावनाओंका चिन्तवन करनेसे उससे पञ्चकल्याणकरूपी फलको देनेवाले तीर्थंकर नामकर्म-बन्ध किया जिससे यह तीर्थकर होगा। सो ठीक ही है क्योंकि मनस्वी मनुष्योंको क्या नहीं प्राप्त होता ? ।। १२ ।। आयुके अन्त में समाधिमरण कर वह विजय नाम के पहले अनुत्तर में तैंतीस सागरकी आयुवाला अहमिन्द्र हुआ ।। १३ ।। विजय विमानमें जो शरीरकी ऊंचाई, लेश्या, अवधिज्ञानका क्षेत्र तथा श्वासोच्छ्वासादिका प्रमाण बतलाया है वह उन सबसे सहित था, पांचो इन्द्रियोंके सुखका अनुभव करता था, चित्त शान्त था, वैराग्यरूपी सम्पत्तिसे उपलक्षित हो भक्ति-पूर्वक अर्हन्त भगवान्का ध्यान करता हुआ वहां रहता था और आयुके अन्तमें समस्त कर्मों-का क्षय करनेके लिए इस पृथिवीतल पर अवतार लेगा ।। १४-१५ ।। जब अवतार लेनेका समय हुआ तब इस जम्बूद्वीपके भरत क्षेत्रमें अयोध्या नगरीका स्वामी इक्ष्वाकु वंशी काश्यपगोत्री तथा आश्चर्यकारी वैभवको धारण करनेवाला एक स्वयंवर नामका राजा था। सिद्धार्था उसकी पटरानी का नाम था। अहमिन्द्रके अवतार लेनेके छह माह पूर्वसे सिद्धार्थाने रत्नवृष्टि आदि पूजाको प्राप्त किया और वैशाख मासके शुक्लपक्षकी षष्ठी तिथिके दिन सातवें शुभ नक्षत्र (पुनर्वसु) में सोलह स्वप्न देखनेके बाद अपने मुखमें प्रवेश करता हुआ एक हाथी देखा। उसी समय वह अहमिन्द्र उसके गर्भमें आया ।। १६-१८ ।। राजासे स्वप्नोंका फल सुनकर वह बहुत सन्तुष्ट हुई और माघ मासके शुक्ल पक्षकी द्वादशीके दिन अदिति योगमें उसने पुण्योदयसे उत्तम पुत्र उत्पन्न किया ।॥ १६ ॥ उस पुत्रके प्रभावसे इन्द्रका ‘आसन कम्पायमान हो गया जिससे उस बुद्धिमान्ने अवधिज्ञानके द्वारा त्रिलोकीनाथका जन्म जान लिया ।। २० ।। इन्द्रने अपनी शचीदेवी द्वारा उस दिव्य मानवको प्राप्त किया और उसे लेकर देवोंसे आवृत हो शीघ्रतासे सुमेरु पर्वत पर पहुँचा। वहां दिव्य सिंहासनपर विराजमानकर बाल सूर्यके समान प्रभावाले बालकका क्षीरसागरके जलसे अभिषेक किया, आभूषण पहनाये और अभिनन्दन नाम रक्खा ।। २१-२२ ।।
श्लोक 23 से 31 : जन्म महोत्सव, दिव्य महिमा और राज्यारोहण
उस समय जिसने विक्रिया वश बहुत-सी भुजाएँ बना ली हैं, हजार नेत्र कर लिये हैं और जो अनेक भाव तथा रसोंते सहित हैं ऐसे इन्द्रने आश्चर्य-कारी करणोंसे प्रारम्भ किये हुए अङ्गहारों द्वारा आकाशरूपी आंगनमें भक्तिसे ताण्डव नृत्य किया और अनेक अभिनय दिखलाये। उस समय उसका राग परम सीमाको प्राप्त था, साथ ही वह अन्य अनेक धीरोदात्त नटोंको भी नृत्य करा रहा था । ।। २३-२४ ॥ जन्माभिषेकसे वापिस लौटकर इन्द्र अयोध्यानगरीमें आया तथा मायामयी बालकको दूर कर माता-पिताके सामने सचमुचके बालकको रख कर स्वर्ग चला गया ।। २५ ।। श्री संभवनाथ तीर्थंकरके बाद दश लाख करोड़ वर्षका अन्तराल बीत जानेपर अभिनन्दननाथ स्वामी अवतीर्ण हुए थे, उनकी आयु भी इसी अन्तरालमें सम्मिलित थी वे मति श्रुत अवधि इन तीन ज्ञानोंसे सुशोभित थे, पचास लाख पूर्व उनकी आयु थी, साढ़े तीन सौ धनुष ऊँचा शरीर था, वे बाल चन्द्रमाके समान कान्तिसे युक्त थे, अथवा जिसका अनुभाग प्रकट हो रहा है ऐसे पुण्य कर्मके समूहके समान जान पड़ते थे ।। २६-२७ ॥ गुणोंसे सबको आह्लादित करते हुए वे शोभा अथवा लक्ष्मीकी वृद्धिको प्राप्त हो रहे थे। उनकी कान्ति सुवर्णके समान देदीप्यमान थी । कामदेवके सारथिके समान कुमार अवस्थाके जब साढ़े बारह लाख पूर्व बीत गये तब ‘तुम राज्यका उपभोग करो’ इस प्रकार राज्य देकर इनके पिता वनको चले गये। उसी समय इन्होंने राज्य प्राप्त किया ।॥ २८-२६ ॥ उस समय चन्द्रमा इनकी कान्तिको चाहता था, सूर्य इनके तेजकी इच्छा करता था, इन्द्र इनका वैभव चाहता था और इच्छाएं इनकी शान्ति चाहती थीं ॥३०॥ अपने उत्कृष्ट अनुभागबन्धकी अनन्तगुणी वृद्धि होनेसे उनके सभी पुण्य परमाणु प्रत्येक समय फल देते रहते थे ।। ३१ ।। उन्होंने अन्य सबके तेजको जीतकर तथा सब प्रजाको प्रसन्न कर चन्द्रमा और सूर्यको भी जीत लिया था इस तरह वे अपने ही तेजसे सुशोभित हो रहे थे ।। ३१-३२ ।।
श्लोक 32 से 41 : असाधारण गुण, सम्यग्दर्शन और लोककल्याणकारी व्यक्तित्व
समस्त राजा लोग इन्हें अपने मुकुट झुकाते थे इसमें उनकी क्या स्तुति थी। क्योंकि ये जन्मसे ही ऐसे पुण्यात्मा थे कि इन्द्र भी इनके चरणोंकी पूजा करता था ।। ३३ ।। जब मोक्षलक्ष्मी भी इन्हें अपने कटाक्षोंका विषय बनाती थी तब राज्यलक्ष्मी इनमें अनुराग करने लगी इसमें आश्वर्यकी क्या बात है ।। ३४ ।। उनके कभी नष्ट नहीं होनेवाला शुद्ध क्षायिक सम्यग्दर्शन था और तीर्थंकर नामक पुण्य प्रकृति थी। सो ठीक ही है क्योंकि तीनों लोकों पर विजय प्राप्त करनेकी इच्छा रखनेवाले मनुष्य के इससे बढ़कर दूसरी कौनसी आत्मसम्पत्ति है ? ॥ ३५ ॥ वे भगवान् कुमार-अवस्था में धीर और उद्धत थे, संयमी अवस्थामें धीर और प्रशान्त थे तथा अन्तिम अवस्थामें धीर और उदात्त अवस्था-को प्राप्त हुए थे ।। ३६ ।। उनकी उत्साह, मन्त्र और प्रभुत्व इन तीनों शक्तियोंने धर्मानुवन्धिनी सिद्धि-को फलीभूत किया था सो ठीक ही है क्योंकि शक्तियां वही हैं जो कि दोनों लोकोंमें हित करने-वाली हैं ।। ३७ ।। उनकी कीर्तिमें शास्त्र भरे पड़े थे, स्तुतिमें वर्ण और अक्षरोंसे अङ्कित अनेक गीत थे, मनुष्योंकी दृष्टिमें उनकी प्रीति थी, और उनका स्मरण सदा गुणोंके विवेचनके समय होता था ॥ ३८ ॥ वे उत्पन्न होनेके पूर्व ही समस्त उत्तम गुणोंसे परिपूर्ण थे। यदि ऐसा न होता तो गर्भमें ही उनकी सेवा करनेके लिए देवोंके आसन कम्पायमान क्यों होते ? ॥ ३६ ॥ उनका उत्तम रत्नत्रय प्रचुर मात्रामें पूर्वभंवसे साथ आया था तथा अन्य गुणोंकी क्या बात ? उनकी बुद्धिके गुण भी विद्वानों-के द्वारा वर्णनीय थे ।। ४० ॥ उनके उत्साह गुणका वर्णन अलगसे तो करना ही नहीं चाहिये क्योंकि वे तीनों लोकोंके कण्टक स्वरूप मोह शत्रुको अन्य समस्त पापोंके साथ नष्ट करना ही चाहते थे ॥ ४१ ॥
श्लोक 42 से 53 : वैराग्य, दीक्षा और मनःपर्ययज्ञान
जन्मके समय भी उनका प्रताप ऐसा था कि दोपहरके सूर्यको भी प्रतापरहित करता था फिर इस समय उसे दूसरा सह ही कौन सकता था ? ॥ ४२ ॥ इनके गुण इस प्रकार बढ़ रहे थे मानो परस्परमें एक दूसरेका उल्लंघन ही करना चाहते हों। सो ठीक है क्योंकि एक साथ बढ़ने-वालोंकी ईर्ष्याको कौन रोक सकता है ? ॥ ४३ ॥ इस प्रकार संसारके श्रेष्ठतम विशाल भोगोंके समूहका उपभोग करनेवाले भगवान् अभिनन्दननाथ केवलज्ञान-रूपी सूर्यका उदय होनेके लिए उदद्याचलके समान थे ॥ ४४ ॥ जब उनके राज्यकालके साढ़े छत्तीस लाख पूर्व बीत गये और आयुके आठ पूर्वाङ्ग शेष रहे तब वे एक दिन आकाशमें मेघोंकी शोभा देख रहे थे कि उन मेघोंमें प्रथम तो एक सुन्द्र महलका आकार प्रकट हुआ परन्तु थोड़े ही देरमें वह नष्ट हो गया। इस घटनासे उन्हें आत्म-ज्ञान उत्पन्न हो गया । वे सोचने लगे कि ये विनाशीक भोग इस संसारमें रहते हुए मुझे अवश्य ही नष्ट कर देंगे। क्या टूटकर गिरनेवाली शाखा अपने ऊपर स्थित मनुष्यको नीचे नहीं गिरा देती ? ॥ ४५ ॥ यद्यपि मैंने इस शरीरको सभी मनोरथों अथवा समस्त इष्ट पदार्थोंसे परिपुष्ट किया है तो भी यह निश्चित है कि वेश्याके समान यह मुझे छोड़ देगा। इस तरह विचार कर वे शरीरसे विरक्त हो गये ।। ४६-४८ ।। उन्होंने यह भी विचार किया कि आयुके रहते हुए मरण होता है, आयुके न रहने पर मरण नहीं होता। इसलिए जो मरणसे डरते हैं उन्हें सबसे पहिले आयुसे डरना चाहिये ॥ ४६ ॥ समस्त सम्पदाओंका हाल गन्धर्वनगरके ही समान है अर्थात जिस प्रकार यह मेघोंका बना गन्धर्वनगर देखते-देखते नष्ट हो गया उसी प्रकार संसारकी समस्त सम्पदाएं भी नष्ट हो जाती हैं यह बात विद्वानोंकी कौन कहे मूर्ख भी जानते हैं ।। ५० ।। जिस समय भगवान् ऐसा विचार कर रहे थे उसी समय लौकान्तिक देवोंने आकर उनकी पूजा की। देवोंने भगवान्का निष्क्रमण-कल्याणक किया । तदनन्तर जितेन्द्रिय भगवान् हस्तचित्रा नामकी पालकी पर आरूढ़ होकर अग्र-उद्यानमें आये । वहाँ उन्होंने माघ शुक्ल द्वादशीके दिन शाम के समय अपने जन्म नक्षत्रका उद्य
रहते वेलाका नियम लेकर एक हजार प्रसिद्ध राजाओंके साथ जिन-दीक्षा धारण कर ली। उसी समय उन्हें मनःपर्ययज्ञान उत्पन्न हो गया ।। ५१-५३ ।।
श्लोक 54 से 63 : केवलज्ञान और विशाल धर्मसंघ
दूसरे दिन भोजन करनेकी इच्छासे उन्होंने साकेत (अयोध्या) नगर में प्रवेश किया। वहां इन्द्रदत्त राजाने पडगाह कर उन्हें आहार दिया तथा पश्चाश्चर्य प्राप्त किये ।। ५४ ।।
तदनन्तर छद्मस्थ अवस्थाके अठारह वर्ष मौनसे बीत जाने पर वे एक दिन दीक्षावनमें असन वृक्षके नीचे वेलाका नियम लेकर ध्यानारूढ हुए ॥ ५५ ॥ पौष शुक्ल चतुर्दशीके दिन शामके समय सातवें पुनर्वसु नक्षत्रमें उन्हें केवलज्ञान हुआ, समस्त देवोंने उनकी पूजा की ॥५६॥ वज्रनाभि आदि एक सौ तीन गणधर, शरीरसे ममत्व छोड़नेवाले दो हजार पाँच सौ पूर्वधारी, दो लाख तीस हजार पचास शिक्षक, नौ हजार आठ सौ अवधिज्ञानी, सोलह हजार केवलज्ञानी, उन्नीस हजार विक्रिया ऋद्धिके धारक, ग्यारह हजार छह सौ पचास मनःपर्ययज्ञानी और ग्यारह हजार प्रचण्ड वादी उनके चरणोंकी निरन्तर वन्दना करते थे ॥ ५७-६० ॥ इस तरह वे सब मिलाकर तीन लाख मुनियोंके स्वामी थे, मेरुषेणा आदि तीन लाख तीस हजार छह सौ आर्यिकाओंसे सहित थे, तीन लाख श्रावक उनके चरण युगलकी पूजा करते थे, पाँच लाख श्राविकाएँ उनकी स्तुति करती थीं, असंख्यात देव-देवियोंके द्वारा वे स्तुत्य थे, और संख्यात तिर्यश्च उनकी सेवा करते थे ।। ६१-६३ ॥
श्लोक 64 से 70: सम्मेदशिखर पर मोक्ष और अंतिम स्तुति
इस प्रकार शिष्ट और भव्य जीवोंकी बारह सभाओंके नायक भगवान् अभिनन्दननाथने धर्मवृष्टि करते हुए इस आर्यखण्डकी वसुधा पर दूर-दूर तक विहार किया ॥ ६४ ॥ इच्छाके विना ही विहार करते हुए वे सम्मेद गिरि पर जा पहुँचे। वहाँ एक मास तक दिव्य ध्वनिसे रहित होकर ध्यानारूढ रहे, उस समय वे ध्यान कालमें होनेवाली योगनिरोध आदि क्रियाओंसे युक्त थे, समुच्छिन्न क्रिया-प्रतिपाती और व्युपरतक्रियानिवर्ती नामक दो ध्यानोंसे रहित थे, अत्यन्त निर्मल थे, और प्रतिमा-योगको धारण किये हुए थे। वहींसे उन्होंने वैशाख शुक्ल षष्ठीके दिन प्रातःकालके समय पुनर्वसु नामक सप्तम नक्षत्रमें अनेक मुनियोंके साथ परमपद – मोक्ष प्राप्त किया ।। ६५-६६ ।। उसी समय भक्तिसे जिनके आठों अङ्ग झुक रहे हैं ऐसे इन्द्रने आकर उन त्रिलोकीनाथ की पूजा की, स्तुति की और तदनन्तर यथाक्रमसे स्वर्गकी ओर प्रस्थान किया ।॥ ६७ इन्द्रोंके द्वारा पञ्च कल्याणकोंमें उत्पन्न होनेवाली पुण्यमयी लक्ष्मी प्राप्त की, जिन्होंने कर्म ॥ जिन्होंने क्षयसे होनेवाली तथा अनन्तचतुष्टयसे देदीप्यमान अविनाशी अन्तरङ्ग लक्ष्मी प्राप्त की जो रूपप्ते रहित होनेपर भी निर्मल गुणोंके धारक रहे, मोक्षलक्ष्मीने जिनका आलिङ्गन किया, जिनका उदय कभी नष्ट नहीं हो सकता और जो पूर्वोक्त लक्ष्मियोंसे युक्त रहे ऐसे श्री अभिनन्दन जिनेन्द्र सदा जयवन्त रहें ।। ६८ ।। जो पहले रत्नसंचय नगरके राजा महाबल हुए, तदनन्तर विजय नामक अनुत्तर विमानमें विजयी अहमिन्द्र हुए, फिर ऋषभनाथ तीर्थंकरके वंशमें अयोध्या नगरीके अधि-पति अभिनन्दन राजा हुए वे अभिनन्दन स्वामी तुम सबकी रक्षा करें ।॥ ६६ ॥ जिन्होंने निश्वय और व्यवहार इन दोनों नयोंसे विभाग कर समस्त पदार्थोंका विचार किया है, अपने भवकी विभूति को नष्ट करनेके लिए देवोंने भक्तिसे जिनकी स्तुति की है, जो तीनों लोकोंके स्वामी हैं, निर्भय हैं और संसारके प्राणियोंका भय दूर करनेवाले हैं ऐसे अभिनन्दन जिनेन्द्र, हे भव्य जीवो ! तुम सबकी विभूतिको करनेवाले हों ।। ७० ।।
इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध भगवद्गुणभद्राचार्च प्रणीत त्रिषष्टि लक्षण महापुराणके संग्रह में श्री अभिनन्दनस्वामीका पुराण वर्णन करनेवाला पचासवाँ पर्व पूर्ण हुआ ।
पर्व 51
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
उत्तरपुराण हिन्दी-भाषानुवाद
उत्तरपुराण सारांश
पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 |पर्व 54 | पर्व 55
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
आदिपुराण हिन्दी-भाषानुवाद
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 |पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47
आदिपुराण सारांश
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 |पर्व 11 |पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 |पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47
Download PDF
आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
आदिपुराण भाग – 2 Adi purana Part-2 by Acharya Jinasena