आदिपुराण पर्व 46 – जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन पर्व 46 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 46- Shlok 93 to 100
श्लोक ( Shlok ) 93
तदा मुनेर्गृहाद् भिक्षां त्यक्त्वा गमनकारणम् । अज्ञात्वा भूपतेः प्रश्नादा हामितमतिः श्रुतम् ॥९३॥
उस समय वे मुनि आहार छोड़कर सेठके घरसे चले गये थे । जब राजाको उनके इस तरह चले जानेका कारण मालूम नहीं हुआ तब उसने अभितमति गणिनी (आयिका) से पूछा। अमितमतिने भी जैसा सुना था वैसा वह कहने लगी ॥९३॥
At that time, the ascetic monks abandoned their meal and departed from the merchant’s house. When the king could not ascertain the reason for their sudden departure, he inquired of the venerable nun, Amitamati Ganini (the head of the nuns’ order). Amitamati then began to relate exactly what she had heard. ॥93॥
श्लोक ( Shlok ) 94 – 95
विषयेऽस्मिन् खगक्ष्माभृत्प्रत्यासन्नं वनं महत् । अस्ति धान्यकमालाख्यं तदभ्यर्णे पुरं परम् ॥९४॥शोभानगरमस्येशः प्रजापालमहीपतिः । देवश्रीस्तस्य देव्यासीत् सुखदा श्रीरिवापरा ॥९५॥
इसी पुष्कलावती देशमें विजयार्ध पर्वतके निकट एक ‘धान्यकमाल’ नामका बड़ा भारी वन है और उस बनके पास ही शोभानगर नामका एक बड़ा नगर है। उस नगरका स्वामी राजा प्रजापाल था और उसकी स्त्रीका नाम था देवश्री । वह देवश्री दूसरी लक्ष्मीके समान सुख देनेवाली थी ।। ९४-९५॥
In that same land of Pushkalavati, near Mount Vijayardh, there was a vast forest named Dhanyakamal, abundant and magnificent. Adjacent to that forest stood a splendid city called Shobhanagar. The ruler of that city was King Prajapal, and his queen was named Devashri. Devashri, like a second embodiment of the goddess Lakshmi herself, was a bestower of supreme joy. ॥94–95॥
श्लोक ( Shlok ) 96 – 98
शक्ति पेणोऽस्य ‘सामन्तस्तस्याभूत प्रीतिदायिनी । अटवीश्रीस्तयोः सत्यदेवः सूनुरिमे सभम् ॥९६॥सर्वेऽप्यासन्नभव्यत्वाद् अस्मत्पा दसमाश्रयात् । श्रुत्वा धर्म नृपेणामा समापन्यद्यमांसयोः ॥९७॥त्यागं पर्वोपवासं च शक्तिपेणोऽपि भक्तिमान् । मुनिवेलात्यये भुक्तिम” ग्रहीत् स गृहिव्रतम् ॥९८॥
राजा प्रजापालके एक शक्तिषेण नामका सामन्त था, उसकी प्रीति उत्पन्न करनेवाली अटवीश्री नामकी स्त्री थी। उन दोनोंके सत्यदेव नामका पुत्र था। किसी समय निकटभव्य होनेके कारण इन सभीने मेरे चरणोंके आश्रयसे धर्मका उपदेश सुना। राजा भी इनके साथ था। उपदेश सुनकर सभीने मद्य-मांसका त्याग किया और पर्वके दिन उपवास करनेका नियम लिया। भक्ति करनेवाले शक्तिषेणने भी गृहस्थके व्रत धारण किये और साथमें यह नियम लिया कि मैं मुनियोंके भोजन करनेका समय टालकर भोजन करूंगा ॥९६-९८।।
King Prajapal had a feudal lord named Shaktishen, whose wife, Atavishri, was the source of his delight. They had a son named Satyadev. Once, as the course of events brought them near, all of them, together with the king, came to hear a sermon on dharma at my feet. Having listened to the teachings, they all resolved to renounce intoxicants and meat, and vowed to observe fasts on sacred festival days. The devoted Shaktishen also undertook the vows of a householder, and in addition pledged that he would partake of food only after the ascetics had finished their meal. ॥96–98॥
श्लोक ( Shlok ) 99 – 100
“तत्पत्नी “शुक्लपक्षादिदिनेऽष्टम्यामथापरे । पक्षे पञ्चसमास्त्यागमाहारस्य समग्रहीत् ॥९९॥अनुप्रवृद्धकल्याणनाभधेयनुपोषितम् । सत्यदेवश्च साधूनां स्तवनं प्रत्यपद्यत ॥१००॥
शक्तिषेणकी स्त्री अटवीश्रीने पांच वर्ष तक शुक्ल पक्षका प्रथम दिन और कृष्णपक्षकी अष्टमीको आहार त्याग करनेका नियम किया, अनुप्रबद्ध कल्याण नाम-का उपवास व्रत ग्रहण किया तथा सत्यदेवने भी साधुओंके स्तवन करनेका नियम लिया ।॥९९-१००।।
Atavishri, the wife of Shaktishen, undertook a vow to renounce food on the first day of the bright fortnight and on the eighth day of the dark fortnight for a period of five years. She accepted the Anuprabaddha Kalyana vow of fasting. Meanwhile, Satyadev resolved to engage devotedly in the praise and veneration of ascetics. ॥99–100॥
श्लोक 101 से 111
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208 | सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 339 | जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 367
आदिपुराण पर्व 45 – जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 103 | श्लोक 104 से 113 | श्लोक 114 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 160 | श्लोक 161 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 219
आदिपुराण पर्व 46 – जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन पर्व 46 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92