आदिपुराण पर्व 46 – जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन पर्व 46 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 170 | श्लोक 171 से 181 | श्लोक 182 से 194
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 46- Shlok 195 to 211
श्लोक ( Shlok ) 195
नीरूपोऽयं स्वरूपेण रूपी देहररूपता । निर्वाणाप्तिरतो हेयो देह एव यथा तथा ॥१९५॥
यह जीव स्व स्वरूपकी अपेक्षा रूपरहित है परन्तु शरीरके सम्बन्धसे रूपी हो रहा है, रूपरहित होना ही मोक्षकी प्राप्ति है इसलिये जिस प्रकार बने उसी प्रकार शरीरको अवश्य ही छोड़ना चाहिये ॥ १९५॥
“This soul, in its true nature, is formless, yet by its association with the body, it appears to possess form. To attain liberation, one must realize and abide in this formless essence; therefore, in whatever way it may happen, the body must surely be renounced.”॥195॥
श्लोक ( Shlok ) 196
बन्धः सर्वोऽपि सम्बन्धो भोगो रोगो रिपुर्वपुः । दीर्घमायासमत्यायुः तृष्णाग्नेरिन्धनं धनम् ॥१९६॥
सब प्रकार सम्बन्ध ही बन्ध है, भोग ही रोग हे, शरीर ही शत्रु है, लम्बी आयु ही तो दुःख देती है और धन ही तृष्णारूपी अग्निका ईंधन है ।।१९६।।
“All forms of attachment are bonds of bondage; sensual enjoyments are themselves afflictions; the body is an enemy; a long life only prolongs suffering; and wealth is but the fuel that feeds the fire of insatiable desire.”॥196॥
श्लोक ( Shlok ) 197
आदौ जन्म जरा रोगा मध्ये ऽन्तेऽप्यन्तकः खलः । इति चक्रकसम्भ्रान्तिः जन्तोर्मध्येभवार्णवम् ॥१९७।।
इस जीवको पहले तो जन्म धारण करना पड़ता है, मध्यमें बुढ़ापा तथा अनेक रोग हैं और अन्तमें दुष्ट मरण है, इस प्रकार संसाररूप समुद्रके मध्यमें इस जीवको चक्रकी तरह भ्रमण करना पड़ता है ।। १९७॥
“This soul must first endure birth; in the middle of life come old age and countless ailments; and in the end awaits a wretched death. Thus, in the vast ocean of worldly existence, the soul is made to spin endlessly like a wheel.”॥197॥
श्लोक ( Shlok ) 198
भोगिनो’ भोगवद् भोगा न भोगा नाम भोग्यकाः । एवं भावयतो भोगान् भूयोऽभूवन् भयावहाः ॥१९८॥
भोग करनेवाले लोगोंको ये भोग सर्पके फणों-के समान हैं इसलिये भोग करने योग्य नहीं है इस प्रकार भोगोंका बार बार विचार करनेवाले पुरुषके लिये ये भोग बड़े भयंकर जान पड़ने लगते है ।॥१९८॥
“For those who indulge in sensual pleasures, these very enjoyments are like the hoods of venomous serpents—never fit to be embraced. Thus, to one who repeatedly reflects upon the nature of such pleasures, they soon appear as truly terrifying.”॥198॥
श्लोक ( Shlok ) 199
निषेव्यमाणा विषया विषमा विषसन्निभाः । देदीप्यन्ते बुभुक्षाभिर्दीपनीयैरिवौषधैः ॥१९९॥
ये सेवन किये हुए विषय विषके समान हैं, जिस प्रकार उत्तेजक औषधियोंसे पेटकी आग भभक उठती है उसी प्रकार भोगकी इच्छाओंसे ये विषय भभक उठते हैं।॥ १९९॥
“These objects of sense, once indulged in, are like deadly poisons. Just as pungent medicines can inflame the fires of the stomach, so too do desires for sensual pleasures ignite an ever-growing blaze within the mind.”॥199॥
श्लोक ( Shlok ) 200
न तृप्तिरे भिरित्येष एव दोषो न पोषकाः । तृषश्च विषवल्लर्याः संसृतेश्चावलम्बनम् ॥२००॥
इन विषयोंसे तृप्ति नहीं होती केवल इतना ही दोष नहीं है किन्तु तृष्णाको पुष्ट करनेवाले भी हैं और संसाररूपी विषकी बेलको सहारा देने-वाले भी हैं ।॥ २००॥
“These sensual pleasures do not bring satisfaction—this alone is not their only fault; they also nourish insatiable craving, and serve as the very supports for the poisonous vine of worldly existence.”॥200॥
श्लोक ( Shlok ) 201
वनितातनु सम्भूतकामाग्निः “स्नेहसेचनैः । कामिनं भस्मसाद्भावम नीत्वा न निवर्तते ॥२०१॥
स्त्रियोंके शरीरसे उत्पन्न हुई यह कामरूपी अग्नि स्नेहरूपी तेलसे प्रज्वलित होकर कामी पुरुषोंको भस्म किये बिना नहीं लौटती है ॥२०१॥
“This fire of lust, ignited by the allure of women’s bodies and fueled by the oil of attachment, never ceases until it has utterly reduced the lustful man to ashes.”॥201॥
श्लोक ( Shlok ) 202
जन्तोर्भागेष भोगान्ते सर्वत्र “विरतिर्ध्रुवा । स्थैर्ये तस्याः प्रयत्नोऽस्य क्रियाशेषो” मनीषिणः ।।२०२॥
भोग करनेके बाद इन समस्त भोगों में जीत्रोंको बेराग्य अवश्य होता है, बुद्धिमान् लोगोंको जो तपश्चरण आदि क्रिया करनी पड़ती है वे सब इस वैराग्यको स्थिर रखनेका उपाय ही है ॥ २०२॥
“After indulging in all these pleasures, those who possess wisdom inevitably experience dispassion toward them. The practices of austerity and other spiritual disciplines undertaken by the wise are, indeed, meant solely to keep this dispassion firm and unwavering.”॥202॥
श्लोक ( Shlok ) 203
प्रापितोऽप्यसकृद्दुखं भोगेस्तानेव याचते । धत्तेऽवताडितोऽप्यंह्रि मात्रास्या एव बालकः ॥२०३॥
यद्यपि यह जीव भोगोंसे अनेक बार दुःखको प्राप्त है तथापि ये जीव उन्हीं भोगोंको चाहते हैं सो ठीक ही है क्योंकि माता बालकको जिस पैरसे ताड़ती हैं बालक उसी उसी प्रकार माताके चरणको पकड़ते हैं ॥२०३॥
“Though the soul has suffered countless times on account of sensual pleasures, it still longs for those very same enjoyments. And rightly so—for just as a child, even when struck by its mother’s foot, clings to her feet all the more, so too does the deluded soul remain attached to its tormentors.”॥203॥
श्लोक ( Shlok ) 204
अध्रु वत्वं गुणं मन्ये भोगायुः ‘कायसम्पदाम् । ध्रुवेष्वेषु कुतो मुक्तिर्विना मुक्तेः कुतः सुखम् ॥२०४॥
भोग, आयु, काल और सम्पदाओंमें जो अस्थिरपना है उसे मैं एक प्रकारका गुण ही मानता हूं क्योंकि यदि ये सब स्थिर हो गये तो मुक्ति कैसे प्राप्त होगी ? और मुक्तिके बिना सुख कैसे प्राप्त हो सकेगा ? ॥ २०४॥
“The transience inherent in pleasures, lifespan, time, and worldly riches—I regard this very impermanence as a kind of blessing. For if these were to remain constant, how could liberation ever be attained? And without liberation, how could true happiness be found?”॥204॥
श्लोक ( Shlok ) 205
विस्रम्भजननैः पूर्व पश्चात् प्राणार्थहारिभिः । पारिपन्थिकसङ्काशैः र्विषयैः कस्य नापदः ॥२०५।
पहले तो विश्वास उत्पन्न करनेवाले और पीछे प्राण तथा धनको अपहरण करनेवाले शत्रु तुल्य इन विषयोंसे किसे भला आपदाएं प्राप्त नहीं होती हैं ? ॥२०५॥
“Who indeed has not met with calamity from these sense-objects, which at first inspire trust but later, like enemies, rob one of life and wealth?”॥205॥
श्लोक ( Shlok ) 206
तद् दुःखस्यैव माहात्म्यं स्यात् सुखं विषयैश्च यत् । “यत्कारवल्लिका स्वादुः प्राभवं ननु तत्क्षुधः ॥२०६॥
इन विषयोंसे जो सुख होता है वह दुःखका ही माहात्म्य है क्योंकि जो करेला मीठा लगता है वह भूखका ही प्रभाव है ।। २०६।।
“The happiness one derives from these sense-objects is nothing but the glorification of suffering itself; for when bitter karela tastes sweet, it is only the effect of intense hunger.”॥206॥
श्लोक ( Shlok ) 207
सङ्कल्पसुखसन्तोषाद् विमुखस्वात्मजात् सुखात् । गुञ्जाग्नितापसन्तुष्ट शाखामृगसमो जनः ॥२०७॥
यह जीव कल्पित सुखोंसे संतुष्ट होकर आत्मासे उत्पन्न होनेवाले वास्तविक सुखसे विमुख हो रहा है इसलिये यह जीव गुमचियों के तापनेसे संतुष्ट होनेवाले बानरके समान है । भावार्थ-जिस प्रकार गुमचियोंके तापनेसे बन्दरकी ठंड नहीं दूर होती है उसी प्रकार इन कल्पित विषयजन्य सुखोंसे प्राणियोंकी दुःख-रूप परिर्णात दूर नहीं होती है ? ॥२०७॥
“Content with the illusion of imagined pleasures, the soul turns away from the true bliss that arises from within itself. In this, it resembles a monkey warming itself with fireflies: just as the monkey’s cold is never relieved by the glow of those insects, so too do these imagined, sense-born joys fail to dispel the soul’s inherent suffering.”॥207॥
श्लोक ( Shlok ) 208
सदास्ति निर्जरा नासौ युक्त्यै बन्धच्युतेर्विना । ‘तच्च्युतिश्च हतेर्बन्धहेतोस्तत्तद्धतौ यते ॥२०८॥
इस जीवके निर्जरा तो सदा होती रहती है परन्तु बन्धका अभाव हुए बिना वह मोक्षका कारण नहीं हो पाती है, बन्धका अभाव बन्धके कारणों-का नाश होनेसे हो सकता है इसलिये मैं बन्धके कारणोंका नाश करनेमें ही प्रयत्नशील हूँ।।२०८॥
“This soul is constantly undergoing the shedding of karmic matter, yet without the absence of new bondage, such shedding cannot lead to liberation. The cessation of bondage arises only when the causes of bondage are destroyed; therefore, I shall dedicate myself wholly to the eradication of these causes.”॥208॥
श्लोक ( Shlok ) 209
केन मोक्षः कथं जीव्यं कुतः सौख्यं क्व वा मतिः । “परिग्रहाग्रहग्राहगृहीतस्य भवार्णवे ॥२०९॥
इस संसाररूरी समुद्रमें जिन्हें परिग्रहके ग्रहण करने रूप पिशाच लग रहा है उन्हें भला मोक्ष किस प्रकार मिल सकता हे ? उनका जीवन किस प्रकार रह सकता है ? उन्हें सुख कहांसे मिल सकता हे और उन्हें बुद्धि ही कहां उत्पन्न हो सकती है ? ॥ २०९ ॥
“In this vast ocean of worldly existence, how can those who see the acceptance of possessions as alluring spirits ever attain liberation? How can they truly live? Whence can they find happiness? And how could wisdom ever arise within them?”॥209॥
श्लोक ( Shlok ) 210
किं भव्यः किमभव्योऽयमिति संशेरते बुधाः । ज्ञात्वाऽप्यनित्यतां लक्ष्मीकटाक्ष शरशायिते ॥२१०॥
लक्ष्मी के कटाक्ष-रूपी वाणोंसे सुलाये हुए (नष्ट हुए) पुरुषमें अनित्यताको जानकर भी विद्वान् लोग ‘यह भव्य है ? अथवा अभव्य है ?’ इस प्रकार व्यर्थ संशय करने लगते हैं ।॥ २१०।।
“Struck down by the arrow-like glances of Lady Fortune, men lie stupefied; and even the wise, though they recognize impermanence, fall into futile doubt, asking, ‘Is this soul destined for liberation, or is it beyond hope?’”॥210॥
श्लोक ( Shlok ) 211
अयं कायद्रुमः “कान्ताव्रततीत तिवेष्टितः । जरित्वा जन्मकान्तारे “कालाग्निग्रासमाप्स्यति ॥२११॥
स्त्रीरूपी लताओं के समूहसे घिरा हुआ यह शरीररूपी वृक्ष संसाररूपी अटवीमें जीर्ण होकर कालरूपी अग्निका ग्रास हो जायगा ।।२११॥
“Encircled by the clustering vines of women, this tree of the body, standing in the forest of worldly existence, shall in time wither and become the prey of the fire of death.”॥211॥
श्लोक 212 से 221
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208 | सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 339 | जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 367
आदिपुराण पर्व 45 – जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 103 | श्लोक 104 से 113 | श्लोक 114 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 160 | श्लोक 161 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 219
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