श्रेयांसनाथ तीर्थकर त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण के पुराणका वर्णन
श्लोक 1 से 11 : राजा नलिनप्रभ का वैभव और वैराग्य
श्रेयांसनाथ भगवान् को समस्त कल्याण का सर्वोत्तम आश्रय बताया गया है। पूर्व विदेह क्षेत्र के क्षेमपुर नगर में नलिनप्रभ नामक राजा राज्य करते थे। वे धर्म, अर्थ और काम को मर्यादित रूप से धारण करने वाले न्यायप्रिय और प्रजावत्सल राजा थे। एक दिन सहस्राम्रवन में जिनेन्द्र भगवान् के दर्शन और धर्मोपदेश सुनकर उन्हें तत्त्वज्ञान उत्पन्न हुआ। उन्होंने समझा कि परिग्रह मोह का कारण है और उसका त्याग ही कल्याणकारी है।
श्लोक 12 से 22 : दीक्षा, स्वर्गगमन और गर्भ कल्याणक
राजा नलिनप्रभ ने राज्य अपने पुत्र सुपुत्र को सौंपकर अनेक राजाओं के साथ संयम धारण किया। तप और साधना से उन्होंने तीर्थंकर नामकर्म का बन्ध किया और समाधिमरण के बाद अच्युत स्वर्ग में इन्द्र हुए। वहाँ दिव्य सुख भोगकर वे भरत क्षेत्र के सिंहपुर नगर में राजा विष्णु और रानी सुनन्दा के यहाँ गर्भ में अवतीर्ण हुए। रानी ने शुभ स्वप्न देखे और देवों ने गर्भ कल्याणक का उत्सव मनाया।
श्लोक 23 से 31 : भगवान् श्रेयांसनाथ का जन्म महोत्सव
फाल्गुन कृष्ण एकादशी को भगवान् श्रेयांसनाथ का जन्म हुआ। उनके जन्म से समस्त संसार में हर्ष और शान्ति फैल गई। रोगी निरोग हो गये, दुखी प्रसन्न हो गये और धर्म की भावना जागृत हुई। देवों ने आकर दुन्दुभियाँ बजाईं, पुष्पवृष्टि की और सौधर्मेन्द्र ने सुमेरु पर्वत पर भगवान् का जन्माभिषेक कर उनका “श्रेयांस” नाम रखा।
श्लोक 32 से 41 : कुमारकाल और आदर्श राज्य
भगवान् श्रेयांसनाथ के शरीर और गुण क्रमशः बढ़ते गये। उनकी आयु चौरासी लाख वर्ष और शरीर अस्सी धनुष ऊँचा था। युवावस्था पूर्ण होने पर उन्होंने राज्य संभाला। वे चन्द्रमा के समान प्रजा को शीतलता देने वाले और धर्ममय जीवन जीने वाले आदर्श सम्राट थे। उन्हें अर्थ की चिन्ता नहीं थी, क्योंकि पूर्व जन्म के पुण्यों से सभी सम्पत्तियाँ स्वतः प्राप्त थीं।
श्लोक 42 से 52 : वैराग्य, दीक्षा और केवलज्ञान
वसन्त ऋतु के परिवर्तन को देखकर भगवान् श्रेयांसनाथ को संसार की अनित्यता का बोध हुआ। उन्होंने विचार किया कि मोक्ष प्राप्त किये बिना स्थायी सुख सम्भव नहीं है। उसी समय लौकान्तिक देवों ने आकर उनकी स्तुति की। उन्होंने पुत्र को राज्य देकर मनोहर उद्यान में एक हजार राजाओं के साथ दीक्षा ग्रहण की और मनःपर्ययज्ञान प्राप्त किया। कठोर तप के बाद तुम्बुर वृक्ष के नीचे उन्हें केवलज्ञान प्राप्त हुआ।
श्लोक 53 से 62 : विशाल धर्मसंघ और मोक्ष
देवों ने भगवान् के केवलज्ञान कल्याणक की पूजा की। उनके विशाल संघ में गणधर, पूर्वधारी, केवलज्ञानी, अवधिज्ञानी, आर्यिकाएँ, श्रावक और श्राविकाएँ बड़ी संख्या में थीं। धर्मोपदेश देते हुए वे सम्मेदशिखर पहुँचे। वहाँ एक माह तक योगनिरोध कर श्रावण शुक्ल पूर्णिमा के दिन उन्होंने समस्त कर्मों का नाश कर सिद्धपद प्राप्त किया।
श्लोक 63 से 72 : भगवान् की स्तुति और विश्वनन्दी का प्रारम्भिक चरित्र
देवों ने भगवान् श्रेयांसनाथ का निर्वाण कल्याणक मनाया। उनकी स्तुति करते हुए कहा गया कि उनका ज्ञान अज्ञानरूपी अन्धकार का नाश करने वाला है। इसके बाद प्रथम नारायण के चरित्र का वर्णन आरम्भ होता है। मगध देश के राजगृह नगर में विश्वभूति राजा राज्य करते थे। उनके पुत्र विश्वनन्दी और छोटे भाई विशाखभूति के पुत्र विशाखनन्दी थे।
श्लोक 73 से 81 : वैराग्य और मुनि दीक्षा
विश्वभूति ने राज्य त्यागकर तप स्वीकार किया और विशाखभूति राजा बने। विशाखनन्दी ने विश्वनन्दी के प्रिय नन्दन वन पर अधिकार कर लिया, जिससे दोनों में युद्ध हुआ। विशाखनन्दी के पराजित होकर भागने पर विश्वनन्दी को वैराग्य उत्पन्न हुआ। उन्होंने सम्भूत गुरु के पास दीक्षा ग्रहण कर तपस्या प्रारम्भ की। बाद में मथुरा में विशाखनन्दी ने उनका उपहास किया, जिससे उनके मन में शल्य उत्पन्न हुई।
श्लोक 82 से 91 : त्रिपृष्ठ, विजय और अश्वग्रीव का जन्म
विश्वनन्दी मृत्यु के बाद महाशुक्र स्वर्ग में देव हुए और फिर पोदनपुर में त्रिपृष्ठ नारायण के रूप में जन्मे। विशाखभूति भी उसी स्वर्ग से च्युत होकर विजय बलभद्र बने। विशाखनन्दी अनेक भवों में भटककर अश्वग्रीव प्रतिनारायण हुआ। विजय और त्रिपृष्ठ दोनों अत्यन्त प्रभावशाली और विशाल साम्राज्य के स्वामी बने। उन्होंने अश्वग्रीव को पराजित कर तीन खण्डों वाली पृथ्वी पर शासन किया।
श्लोक 92 से 100 : कर्मफल और तीनों का अन्त
त्रिपृष्ठ नारायण के पास सात दिव्य रत्न थे और विजय बलभद्र के पास चार रत्न थे। त्रिपृष्ठ अत्यधिक परिग्रह और विषय-भोगों में आसक्त रहा, जिसके फलस्वरूप वह सातवें नरक में गया। अश्वग्रीव भी अधोगति को प्राप्त हुआ। दूसरी ओर विजय बलभद्र ने वैराग्य लेकर संयम धारण किया, अनगार केवली बने और मोक्ष प्राप्त किया। अंत में कवि ने निष्कर्ष दिया कि दुष्ट कर्म के रहते संसार में स्थायी सुख सम्भव नहीं है; इसलिए मोक्षमार्ग ही वास्तविक कल्याण का मार्ग है।
English translation of Uttar Puran parv 57- shlok 1 to 11
श्लोक ( Shlok ) 1
श्रेयः श्रेयेषु नास्त्यम्यः श्रेयसः श्रेयसे बुधैः । इति श्रेयोऽर्थिभिः श्रेयः श्रेयांसः श्रेयसेऽस्तु नः ॥१॥
जो आश्रय लेने योग्य हैं उनमें श्रेयान्सनाथको छोड़कर कल्याणके लिए विद्वानोंके द्वारा और दूसरा आश्रय लेने योग्य नहीं है-इस तरह कल्याणके अभिलाषी मनुष्योंके द्वारा आश्रय करने योग्य भगवान् श्रेयांसनाथ हम सबके कल्याणके लिए हों ॥ १ ॥
“Among those worthy of seeking refuge, there is no one other than Lord Shreyansnath whom the wise consider fit for attaining ultimate well-being. May Lord Shreyansnath—who alone is worthy of being sought after by those desiring liberation and prosperity—bestow welfare upon us all.”1
श्लोक ( Shlok ) 2 – 3
पुष्करार्बेन्द्रदिग्मेरुप्राग्विदेहे सुकच्छके । सीतानद्युत्तरे देशे नृपः क्षेमपुराधिपः ॥ २ ॥नलिनप्रभनामाभूनमिताशेषविद्विषः । प्रजानुरागसम्पादिताचिन्त्यमहिमाश्रयः ॥ ३ ॥
पुष्करार्ध द्वीपसम्बन्धी पूर्व विदेह क्षेत्रके सुकच्छ देशमें सीता नदीके उत्तर तटपर क्षेमपुर नामका नगर है। उसमें समस्त शत्रुओंको नम्र करनेवाला तथा प्रजाके अनुरागसे प्राप्त अचिन्त्य महिमाका आश्रयभूत नलिनप्रभ नामका राजा राज्य करता था ।॥ २-३ ॥
“In the Sukachha country of East Videha Kshetra, situated on the northern bank of the Sita River within the Pushkarardha Island, there was a city named Kshempur. In that city reigned a king named Nalinaprabh, who forced all enemies to bow before him and who was the abode of inconceivable glory earned through the deep affection of his subjects.”2 – 3
श्लोक ( Shlok ) 4
पृथङ्गिभेदनिर्णातिशक्तिसिद्धयुदयोदितः । शमव्यायामसम्प्राप्तक्षेमयोगोऽयमैधत ॥ ४ ॥
पृथक् पृथक् तीन भेदोंके द्वारा जिनका निर्णय किया गया है ऐसी शक्तियों, सिद्धियों और उदयोंसे जो अभ्युदयको प्राप्त है तथा शान्ति और परिश्रमसे जिसे क्षेम और योग प्राप्त हुए हैं ऐसा यह राजा सदा बढ़ता रहता था ।॥ ४ ॥
“Possessing great prosperity through the Powers (Shaktis), Accomplishments (Siddhis), and Successes (Udayas)—each of which is classified into three distinct kinds—and having attained Security (Kshema) and Spiritual Union (Yoga) through peace and diligent effort, this King continued to flourish eternally.”4
श्लोक ( Shlok ) 5
भूभृत्त्तमर्थवत्तस्मिन्यस्मान्न्यायेन पालनात् । स्थितौ सुस्थाप्य सुनिग्धां धरामधित स प्रजाः ॥ ५ ॥
वह राजा न्यायपूर्वक प्रजाका पालन करता था और स्नेह पूर्ण पृथिवीको मर्यादामें स्थित कर उसका भूभृत्पना सार्थक था ॥५॥
“That King governed his subjects with justice; by establishing the earth in a state of affection and maintaining the boundaries of morality, he truly justified his title as Bhubhrit (the Supporter of the Earth).”5
श्लोक ( Shlok ) 6
धर्म एत्रापरे धर्मस्तस्मिन्सन्मार्गवर्तिनि । अर्थकामौ च धम्यौं यत्तत् स धर्ममयोऽभवत् ॥ ६ ॥
समीचीन मार्गमें चलनेवाले उस श्रेष्ठ राजामें धर्म तो धर्म ही था, किन्तु अर्थ तथा काम भी धर्म-युक्त थे । अतः वह धर्ममय ही था ।॥ ६ ॥
“In that eminent King, who walked the path of righteousness, Dharma (virtue) was naturally supreme; however, his Artha (wealth) and Kama (pleasure) were also so thoroughly imbued with virtue that he appeared to be the very embodiment of Dharma itself.”6
श्लोक ( Shlok ) 7
एवं स्वकृतपुण्यानुभाबोदितसुखाकरः । लोकपालोपमो दीर्घ पालयनिखिलामिलाम् ॥ ७ ॥
इस प्रकार स्वकृत पुण्यकर्मके उदयसे प्राप्त सुखकी खान स्वरूप यह राजा लोकपालके समान इस समस्त पृथिवीका दीर्घकाल तक पालन करता रहा ॥७॥
“In this manner, as the source of all happiness resulting from the rise of his own meritorious deeds (Punya), the King continued to protect and nurture the entire earth for a long duration, much like a Lokpala (a Guardian of the World).”7
श्लोक ( Shlok ) 8 – 11
“सहस्रास्रवणेऽनन्तजिनं तद्वनपालकात् । अवतीर्ण विदित्वात्मपरिवारपरिष्कृतः ॥ ८ ॥गत्वाऽभ्यर्च्य चिरं स्तुत्वा नत्वा स्वोचितदेशभाक् । श्रुत्वा धर्म समुत्पन्नतत्त्वबुद्धिरिति स्मरन् ॥ ९ ॥ कस्मिन् केन कथं कस्मात् कस्य किं श्रेय इत्यदः । अजानता मया भान्तं श्रान्तेनानन्तजन्मसु ॥ १० ॥ आहितो बहुधा मोहान्मयैवैष परिग्रहः । तत्त्यागाद्यदि निर्वाणं कस्मात्कालविलम्बनम् ॥ ११ ॥
एक दिन वनपालसे उसे मालूम हुआ कि सहस्राम्रवणमें अनन्त जिनेन्द्र अवतीर्ण हुए हैं तो वह अपने समस्त परिवारसे युक्त होकर एक दिन वनपालसे उसे मालूम हुआ कि सहस्राम्रवणमें अनन्त जिनेन्द्र अवतीर्ण हुए हैं तो वह अपने समस्त परिवारसे युक्त होकर सहस्त्राम्रवणमें गया। वहाँ उसने जिनेन्द्रदेव की पूजा की, चिरकाल तक स्तुति की, नमस्कार किया और फिर अपने योग्य स्थान पर बैठ गया। तदनन्तर धर्मोपदेश सुनकर उसे तत्त्वज्ञान उत्पन्न हुआ जिससे इस प्रकार चिन्तवन करने लगा कि किसका कहाँ किसके द्वारा किस प्रकार किससे और कितना कल्याण हो सकता है यह न जान कर मैंने खेद-खिन्न होते हुए अनन्त जन्मोंमें भ्रमण किया है। मैंने जो बहुत प्रकारका परिग्रह इकट्ठा कर रक्खा है वह मोह वश ही किया है इसलिए इसके त्यागसे यदि निर्वाण प्राप्त हो सकता है, तब समय बितानेसे क्या लाभ है ? ॥ ८-११ ।।
“One day, learning from the forest-keeper that Lord Anant Jinendra had arrived at the Sahasramravana (the Grove of a Thousand Mango Trees), the King, accompanied by his entire family, went there. There, he worshipped the Jinendra, offered hymns of praise for a long time, bowed in reverence, and took his appropriate seat.
After listening to the divine discourse, he attained true spiritual insight (Tattvagyan) and began to reflect thus: ‘Without knowing whose welfare can be achieved, where, by whom, in what manner, through what means, and to what extent, I have wandered through infinite births, distressed and weary. The vast possessions I have accumulated were gathered only out of delusion. Therefore, if liberation can be attained by renouncing them, what is the use of wasting any more time?'”8 – 11
श्लोक 12 से 22
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