आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 103 | श्लोक 104 से 111
श्लोक 112 से 121 युद्ध का प्रारंभ और बाणों का प्रभाव
सुनमि जैसे विद्याधरों ने गरुड़व्यूह बनाया, और आठ चन्द्र नामक विद्याधर अर्ककीर्ति की रक्षा कर रहे थे। दोनों सेनाओं में बाजों की ध्वनि और धनुर्धारी योद्धाओं के बाण युद्धक्षेत्र में छाए। बाणों को पक्षियों, मंत्रियों, और दूतों की तरह वर्णित किया गया, जो तीक्ष्ण, सरल, और शत्रुओं के हृदय को भेदने वाले थे। ये बाण शत्रुओं को मारकर परलोक पहुँचाते थे, मानो पापी जीवों को नरक में ले जाते हों।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 44- Shlok 112 to 121
श्लोक ( Shlok ) 112
क्रुद्धाः खे खेचराधीशाः सुनमिप्रमुखाः पृथक् । गरुडव्यूहमापाद्य तस्थुश्चक्रिसुताज्ञया ॥११२॥
क्रोधित हुए सुनमि आदि विद्याधरोंके अधिपति भी गरुड़व्यूहकी रचनाकर चक्रवर्तीके पुत्र-अर्ककीतिकी आज्ञासे आकाशमें अलग ही खड़े थे ।। ११२॥
“Enraged, the lords of the Vidyādharas—Sunami and others—too stood apart in the sky, having formed a Garuḍa-vyūha, in obedience to the command of Arkkakīrti, the son of the Emperor.” ॥112॥
श्लोक ( Shlok ) 113
अष्टचन्द्राः खगाः ख्याताश्चक्रिणः परितः सुतम् । शरीररक्षकत्वेन भेजुर्विद्यामदोद्धताः ॥११३॥
विद्याके मदसे उद्धत हुए आठ चन्द्र नामके प्रसिद्ध विद्याधर शरीररक्षकके रूपमें चारों ओरसे अर्ककीर्तिकी सेवा कर रहे थे ॥११३॥
“Intoxicated with the pride of their knowledge, eight renowned Vidyādharas named Chandra, acting as bodyguards, stood in devoted service around Arkkakīrti on all sides.” ॥113॥
श्लोक ( Shlok ) 114
अकालप्रलयारम्भजृम्भिताम्भोदजितम् । निर्जित्य तूर्णं तूर्याणि दध्वनुः सेनयोः समम् ॥११४॥
उन दोनों सेनाओंमें असामयिक प्रलयकालके प्रारम्भमें बढ़ती हुई मेवोंकी गर्जनाको जीतकर शीघ्र शीघ्र एक साथ बहुतसे बाजे बज रहे थे ।॥११४॥
“In both armies, countless instruments resounded all at once with great speed, overpowering even the rising thunder of untimely clouds at the dawn of a cosmic dissolution.” ॥114॥
श्लोक ( Shlok ) 115
धानुष्कैर्मार्ग णैर्मार्गः समरस्य पुरस्सरैः । प्रवर्तयितुमारेभे घोरघोषैः सबल्गितम् ॥११५॥
युद्धके आगे आगे जानेवाले और भयंकर गर्जना करनेवाले धनुर्धारी योद्धाओंने वाणों द्वारा अपना मार्ग बनाना प्रारम्भ किया था । भावार्थ-धनुष चलानेवाले योद्धा वाण चलाकर भीड़को तितर बितर कर अपना मार्ग बना रहे थे ।।११५॥
“The bow-wielding warriors, advancing at the forefront of battle and thundering with terrifying roars, had begun to carve their path with arrows—scattering the crowd and clearing the way before them.” ॥115॥
श्लोक ( Shlok ) 116
सङग्रामनाटकारम्भ सूत्रधारा धनुर्धराः । रणरङगं विशन्ति स्म गर्जत्तूर्यपुरस्सरम् ॥११६॥
जो संग्रामरूपी नाटकके प्रारम्भमें सूत्रधारके समान जान पड़ते थे ऐसे धनुष को धारण करनेवाले वीर पुरुष गर्जते हुए बाजोंको आगे कर युद्धरूपी रंगभूमिमें प्रवेश कर रहे थे ।।११६।।
“Those valiant bowmen, appearing like the Sūtradhāras at the opening of a war-like drama, advanced into the battlefield—preceded by the roaring of war-drums, as if heralding their thundering entrance upon the stage of combat.” ॥116॥
श्लोक ( Shlok ) 117
आबध्य स्थानकं पूर्व रणरङ्गे धनुर्धरैः । पुष्पाञ्जलिरिव व्यस्तो मुक्तः शितशरोत्करः ॥११७॥
धनुष धारण करनेवाले पुरुषोंने रणरूपी रंगभूमिमें सबसे पहले अपना स्थान जमा कर जो तीक्ष्ण वाणोंका समूह छोड़ा था वह ऐसा जान पड़ता था मानो उन्होंने पुष्पाञ्जलि ही विखेरी हो ।।११७।।
The bow-bearing warriors, having first taken their positions upon the battlefield—like actors upon a stage—released volleys of sharp arrows that seemed, as it were, like showers of flower offerings scattered in reverence.” ॥117॥
श्लोक ( Shlok ) 118
तीक्ष्णा मर्माण्यभिघ्नन्तः पूर्व कलहकारिणः । पश्चात्प्रवेशिनः शश्वत् खलकल्पा धनुर्धृतः ॥११८॥
वे धनुषपर चढ़ाये हुए वाण सदा दुष्टोंके समान जान पड़ते थे क्योंकि जिस प्रकार दुष्ट तीक्ष्ण अर्थात् क्रूर स्वभाववाले होते हैं उसी प्रकार वे वाण भी तीक्ष्ण अर्थात् पैने थे, जिस प्रकार दुष्ट मर्मभेदन करते हैं उसी प्रकार वाण भी मर्मभेदन करते थे, जिस प्रकार दुष्ट कलह करनेवाले होते हैं उसी प्रकार वाण भी कलह करनेवाले थे और जिस प्रकार दुष्ट पहले मधुर वचन कह कर फिर भीतर घूस जाते हैं उसी प्रकार वे वाण भी मनोहर शब्द करते हुए पीछेसे भीतर घूस जाते थे ॥११८॥
“The arrows mounted upon the bows ever appeared like the wicked—for just as the wicked are sharp of nature, so too were these arrows keen-edged; as the wicked pierce to the core, so too did these arrows strike the vital points; as the wicked stir up strife, so too did the arrows incite tumult; and as the wicked speak sweet words only to betray thereafter, so too did these arrows enter with charming sound, then penetrate deep within.” ॥118॥
श्लोक ( Shlok ) 119
उभयोः ‘पाश्र्वयोर्बध्वा बाणधी कृतवल्गनाः । धन्विनः खेचराकारा रेजुराजौ जितश्रमाः ॥११९॥
जो दोनों बगलोंमें तरकस बांधकर उछल कूद कर रहे हैं तथा जिन्होंने परिश्रमको जीत लिया है ऐसे धनुषधारी लोग उस युद्धमें पक्षियोंके समान सुशोभित हो रहे थे ।।११९।।
“The bowmen, with quivers bound upon both shoulders, leaping and darting about, having conquered all fatigue, appeared resplendent in that battle like birds in graceful flight.” ॥119॥
श्लोक ( Shlok ) 120
ऋजुत्वाद् दूरदर्शित्वात् सद्यः कार्यप्रसाधनात् । शास्त्रमार्गानुसारित्वात् शराः सुसचिवैः समाः ।१२०।
और वाण अच्छे मंत्रियोंके समान जान पड़ते थे क्योंकि जिस प्रकार अच्छे मंत्री ऋजु अर्थात् सरल (मायाचार रहित) होते हैं उसी प्रकार बाण भी सरल अर्थात् सीधे थे, जिस प्रकार अच्छे मंत्री दूरदर्शी होते हैं अर्थात् दूरतककी बातको सोचते हैं उसी प्रकार बाण भी दूरदर्शी थे अर्थात् दूरतक जाकर लक्ष्यभेदन करते थे, जिस प्रकार अच्छे मंत्री शीघ्र ही कार्य सिद्ध करनेवाले होते हैं उसी प्रकार बाण भी शीघ्र करनेवाले थे अर्थात् जल्दीसे शत्रुको मारनेवाले थे और जिस प्रकार अच्छे मन्त्री शास्त्रमार्ग अर्थात् नीतिशास्त्रके अनुसार चलते हैं उसी प्रकार बाण भी शास्त्रमार्ग अर्थात् धनुषशास्त्रके अनुसार चलते थे । ॥१२०॥
“And the arrows seemed akin to wise ministers—for just as good ministers are upright and free of deceit, so too were the arrows straight and true; as ministers are far-sighted, so too did the arrows reach distant targets with precision; as ministers swiftly accomplish their tasks, so too did the arrows swiftly strike down their foes; and just as ministers act according to the path of scripture and statecraft, so too did the arrows follow the prescribed path of the science of archery.” ॥120॥
श्लोक ( Shlok ) 121
क्रव्यास्त्रपायिनः पत्रवाहिनो दूरपातिनः । लक्ष्येषूड्डीय तीक्ष्णास्याः खगाः पेतुः खगोपमा । १२१।
मांस और खूनको पीनेवाले, पंख धारण करनेवाले, दूरतक जाकर पड़नेवाले और पैने मुखवाले वे बाण पक्षियोंके समान उड़कर अपने निशानोंपर जाकर पड़ते थे । भावार्थ-वे बाण पक्षियोंके समान मालूम होते थे, क्योंकि जिस प्रकार पक्षी मांस और खून पीते हैं उसी प्रकार बाण भी शत्रुओंका मांस और खून पीते थे, जिस प्रकार पक्षियोंके पंख लगे होते हैं उसी प्रकार बाणोंके भी पंख लगे थे, जिस प्रकार पक्षी दूर जाकर पड़ते हैं उसी प्रकार बाण भी दूर जाकर पड़ते थे और जिस प्रकार पक्षियोंका मुख तीक्ष्ण होता है उसी प्रकार बाणोंका मुख (अग्रभाग) भी तीक्ष्ण था। इस प्रकार पक्षियोंकी समानता धारण करनेवाले बाण उड़ उड़कर अपने निशानोंपर पड़ रहे थे ।। १२१॥
“Those arrows—drinkers of flesh and blood, feathered, far-reaching, and sharp-pointed—flew like birds and struck their marks. For just as birds feed on flesh and blood, so too did the arrows devour the bodies of foes; as birds are winged, so were the arrows adorned with feathers; as birds alight at distant places, so too did the arrows fall far afield; and as birds possess sharp beaks, so too were the arrowheads keen and piercing. Thus, likened to birds in every way, the arrows soared and fell upon their destined targets.” ॥121॥
श्लोक 122 से 131
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