आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21
श्लोक 22 से 31 अनवद्यमति का धर्मयुक्त उपदेश
अनवद्यमति नामक बुद्धिमान मंत्री ने अर्ककीर्ति को समझाया कि पृथ्वी, चक्रवर्ती, और वह स्वयं संसार के कल्याण के आधार हैं। क्षमा जैसे गुण चक्रवर्ती और अर्ककीर्ति में ही संनिहित हैं। उन्होंने कहा कि भगवान वृषभदेव द्वारा स्थापित इस कर्मभूमि का पालन अर्ककीर्ति के पिता भरत और बाद में वह स्वयं करेंगे। किसी भी उपद्रव का समाधान करना उनका कर्तव्य है, क्योंकि वे क्षत्रिय हैं।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 44- Shlok 22 to 31
श्लोक ( Shlok ) 22 – 23
तदा सर्वोपधाशुद्धो मन्त्री जानपदादिभिः । अनवद्यमतिर्नाम लक्षितो मन्त्रिलक्षणैः ॥२२॥ धर्म्यमथ्यं यशस्सारं ससौष्ठवनिष्ठुरम् । सुविचार्य वचो न्याय्यं पथ्यं प्रोक्तुं प्रचक्रमे ॥२३॥
उस समय जो सब उपधाओंसे शुद्ध हैं तथा जनपद आदि मंत्रियों के लक्षणोंसे सहित हैं ऐसा निर्दोषबुद्धिका धारक अनवद्यमति नामका मंत्री अच्छी तरह विचारकर धर्मयुक्त, अर्थपूर्ण, यशके सारभूत, उत्तम, कठोरता रहित, न्यायरूप और हितकारी वचन कहने लगा ।। २२-२३।।
At that moment, the minister named Anavadya-mati—he who possessed an unblemished intellect, pure of all ulterior motives, and endowed with the virtues befitting a counsellor of provinces and realms—after deep and thoughtful deliberation, began to speak words that were righteous, replete with meaning, the very essence of glory, noble, free from harshness, grounded in justice, and conducive to the highest good. 22 – 23
श्लोक ( Shlok ) 24
मही व्योम शशी सूर्यः सरिदीशोऽनिलोऽनलः । त्वं त्वत्पिता घनाः कालो जगत्क्षेमविधायिनः ॥२४॥
उसने कहा कि पृथिवी, आकाश, चन्द्रमा, सूर्य, समुद्र, वायु, अग्नि, तु, तेरा पिता, मेघ और काल ये सब पदार्थ संसारमें कल्याण करनेवाले हैं ।॥२४।।
He said: The Earth and the Sky, the Moon and the Sun, the Ocean, the Wind, and the Fire—along with thy father, the Clouds, and Time itself—all these entities in this world are the very embodiments of beneficence. 24
श्लोक ( Shlok ) 25
विपर्यासे विपर्येति’ भवतामनुवर्तनात् । वर्तते सृष्टिरेषा हि व्यक्तं युष्मासु तिष्ठते ॥२५।।
आप लोगोंमें उलटपुलट होनेसे यह संसारकी सृष्टि उलटपुलट हो जाती है और आपके अनुकूल रहनेसे अच्छी तरह विद्यमान रहती है इससे स्पष्ट है कि यह सृष्टि आप लोगों पर ही अवलम्बित है ।। २५ ।।
When discord arises among you, the very fabric of the world is thrown into disarray; but when you remain in harmony, creation stands firm and well-ordered. Hence, it is evident that the sustenance of this universe rests upon your collective accord.25
श्लोक ( Shlok ) 26
गुणाः क्षमादयः सर्वे “व्यस्तास्तेषु क्षमादिषु । समस्तास्ते जगद्वृद्व्य चक्रिणि त्वयि च स्थिताः ॥२६॥
क्षमा आदि गुण अलग अलग तो पृथिवी आदिमें भी रहते हैं परन्तु इकट्ठे होकर संसारका कल्याण करनेके लिये चक्रवर्तीमें और तुझमें ही रहते हैं ।॥२६॥
Forgiveness and other such virtues do indeed reside—though in scattered measure—in the Earth, the elements, and the like;
But gathered together in harmonious fullness, they dwell solely within the Chakravartin—and within thee—for the welfare of the world.26
श्लोक ( Shlok ) 27
च्यवन्ते” स्वस्थितेः काले क्वचित्तेऽपिक्षमादयः । न स कालोऽस्ति यः कर्ता प्रच्युतेर्युवयोः स्थितेः ॥२७॥
पृथिवी आदि पदार्थ किसी समय अपनी मर्यादासे च्युत भी हो जाते हैं परन्तु ऐसा कोई समय नहीं है जो तुम दोनोंको अपनी मर्यादासे च्युत कर सके ॥ २७।।
The elements—Earth and the like—may, at times, transgress their bounds;but never is there a moment when either of you swerves from the path of righteousness.Such is the steadfastness of your virtue, beyond even the constancy of nature.27
श्लोक ( Shlok ) 28
सृष्टिः पितामहेनेयं सृष्टैनां तत्समर्पिताम्। पाति सम्म्राट् पिता तेऽद्य “तस्यास्त्वमनुपालकः ॥२८॥
तुम्हारे पितामह भगवान् वृषभ-देवने इस कर्मभूमिरूपी सृष्टिकी रचना की थी, उनके द्वारा सौंपी हुई इस पृथिवीका पालन इस समय तुम्हारे पिता भरत महाराज कर रहे हैं और उनके बाद इसका पालन करनेवाले तुम ही हो ॥२८॥
Thy grandsire, the illustrious Lord Ṛṣabha, was the prime architect of this world—this realm of karma.
The Earth entrusted by him is, at present, upheld and governed by thy father, the noble Emperor Bharata.
And after him, O Prince, thou alone art destined to bear its sacred charge. 28
श्लोक ( Shlok ) 29
दैवमानुषबाधाभ्यः क्षतिः कस्यापि या क्षितौ । ममैवेयमिति स्मृत्त्वा समाधेया त्वयैव सा ॥२९॥
इस पृथिवीमें यदि किसीकी भी दैव या मनुष्यकृत उपद्रवोंसे कुछ हानि होती हो तो ‘यह मेरी’ ही है ऐसा समझकर आपको ही उसका समाधान करना चाहिये ।।२९।।
Should any harm befall this Earth—whether by divine ordinance or wrought by human hands—
it is thou who must deem it thine own, and take it upon thyself to bring about its redress.29
श्लोक ( Shlok ) 30
क्षतात् त्रायत इत्यासीत् क्षत्त्रोऽयं भरतेश्वरः । सुतस्तस्यौरसो ज्येष्ठः क्षत्रियस्त्वं तदादिमः ॥३०॥
जो क्षत अर्थात् संकटसे रक्षा करे उसे क्षत्र कहते हैं, भरतेश्वर सबकी रक्षा करते हैं इसलिये वे क्षत्र हैं और तुम उनके सबसे बड़े औरस पुत्र हो इसलिये तुम सबसे पहले क्षत्रिय हो ॥३०॥
He who offers protection from peril is called Kṣatra—the protector.
The illustrious Bharata, sovereign of all, shields the world; hence is he so named.And thou, his foremost son born of rightful lineage, art verily the first among Kṣatriyas.30
श्लोक ( Shlok ) 31
त्व त्तो न्यायाः प्रवर्तन्ते नूतना ये पुरातनाः । तेऽपि त्वत्पलिता एव भवन्त्यत्र पुरातनाः ॥३१॥
इस संसारमें नवीन न्याय तुमसे ही प्रवृत्त होते हैं और जो पुरातन अर्थात् प्राचीन हैं वे तुम्हारे द्वारा पालित होकर ही पुरातन कहलाते हैं। भावार्थ आपसे नवीन न्याय मार्गकी प्रवृत्ति चलती है और पुराने न्यायमार्गकी रक्षा होती है ॥ ३१॥
In this world, the path of new justice takes its rise from thee alone;
and that which is ancient endures, honored as such, only through thy guardianship.
For it is by thee that fresh streams of law are set in motion,
and it is through thee that the venerable codes of old remain preserved.31
श्लोक 32 से 41
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208
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आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21
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