आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 265 से 275 | श्लोक 276 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321
श्लोक 322 से 331 सुलोचना का जयकुमार को वरण
कामदेव, जयकुमार और सुलोचना का शत्रु, सुलोचना पर निष्ठुर था। सुलोचना ने अपनी दृष्टि से जयकुमार को जीत लिया। कंचुकी के वचनों से लज्जा छोड़, सुलोचना ने जन्मांतर के स्नेह, जयकुमार की आकृति, और कामदेव के प्रभाव से रथ से उतरकर रत्नमाला जयकुमार के गले में डाली। बाजों की ध्वनि से उत्सव गूंजा। जयकुमार का मुख लक्ष्मी से सुशोभित था।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 43- Shlok 322 to 331
श्लोक ( Shlok ) 322
युवाभ्यां निर्जितः कामः सम्प्रत्यभ्यन्तरीकृतः । स वामपजयायाभूदरिर्विश्रम्भितो ऽप्यरिः ॥३२२॥
तुम दोनोंने पहले जिस कामदेवको जीतकर दूर हटाया था उसे अब अपने अन्तःकरणमें बैठा लिया है, अथवा खास विश्वासपात्र बना लिया है परन्तु अब वही कामदेव तुम दोनोंका पराजय करनेके लिये तैयार हो रहा है सो ठीक ही है क्योंकि शत्रुका कितना ही विश्वास क्यों न किया जाय वह अन्तमें शत्रु ही रहता है ।। ३२२॥
Both of you had earlier defeated and pushed away Kaamdev, but now you have made him a trusted person in your heart or have made him your confidant. But now the same Kaamdev is getting ready to defeat both of you. This is good because no matter how much you trust an enemy, he remains an enemy in the end.322
श्लोक ( Shlok ) 323
निष्ठुरं जुम्भतेऽमुष्मिन्नु भयारिरपि स्मरः । मत्वेव त्वां स्त्रियं भूयो भटेषु भटमत्सरः ॥३२३॥
यद्यपि यह कामदेव तुम दोनोंका शत्रु है तथापि तुझे स्त्री मानकर इसी एकपर बड़ी निष्ठुरताके साथ अपना प्रभाव बढ़ा रहा है सो ठीक ही है क्योंकि योद्धाओंकी ईर्ष्या योद्धाओंपर ही होती है। भावार्थ-वह तुझे स्त्री समझ कायर मानकर अधिक दुःखी नहीं करता है परन्तु जयकुमार पर अपना पूरा प्रभाव डाल रहा है ।। ३२३।।
Though this Kāma, the god of love, is indeed an enemy to you both, yet it is but fitting that he should exert his relentless power chiefly upon you, deeming you a woman. For verily, the envy of warriors is directed only toward warriors.
Bhāvārtha (Interpretative meaning):
He does not torment you much, thinking you to be weak and womanly, unworthy of his full wrath. But upon Jayakumāra, whom he sees as a true hero, he pours forth his power entirely. ॥323॥
श्लोक ( Shlok ) 324
विख्यातविजयः श्रीमान् यानमात्रेण निर्जितः । त्वयाऽयमत एवात्र जयो न्यायागतस्तव ॥३२४॥
जिसका विजय सर्वत्र प्रसिद्ध है ऐसे श्रीमान् जयकुमारको तूने यान अर्थात् आगमन (पक्षमें युद्धके लिये किये हुए प्रस्थान) मात्रके द्वारा जीत लिया है इसलिये इस जगह न्यायसे तेरी ही विजय हुई है ।। ३२४।।
Thou hast vanquished the illustrious Jayakumāra—whose victories are renowned in all quarters—by naught but thy mere approach, thy march to the battlefield. Therefore, by all measure of justice, the triumph here belongs to thee alone. ॥324॥
श्लोक ( Shlok ) 325
प्राध्वंकृत्य गले रत्नमालया दृक् शरैर्जितम् । जयलक्ष्मीस्तवैवास्तु तत्त्वमेनं करे कुरु ॥३२५॥
तू अपने दृष्टिरूपी वाणों-के द्वारा जीते हुए इस जयकुमारको रत्नोंकी मालासे गलेमें बांधकर अपने हाथमें कर, विजय-लक्ष्मी तेरी ही हो ॥ ३२५॥
Bind this Jayakumāra—whom thou hast already conquered with the arrow-like glances of thine eyes—with a garland of gems about his neck, and take him into thy hand; let the goddess of victory be thine alone. ॥325॥
श्लोक ( Shlok ) 326 – 329
इति तस्य वचः श्रुत्वा स्मरषाड्गुण्यवेदिनः । शनैर्विगलितव्रीडा’ लोललीलावलोकनः ।॥३२६॥तदा जन्मान्तरस्नेहश्चाक्षुषी सुन्दराकृतिः । कुन्दभासा ” गुणास्तस्य श्रावणाः पुष्पसायकः ॥३२७॥इत्येभिः स्यन्दनादेषा ‘समुत्क्षिप्यावरोपिता । रत्नमालां समादाय कन्या कञ्चुकिनः करात् ॥३२८॥अबध्नाद् बन्धुरां तस्य कण्ठेऽतिप्रेमनिर्भरा। सा वाचकात् समध्यास्य वक्षोलक्ष्मीरिवापरा ॥३२९॥
इस प्रकार कामदेवके सन्धि विग्रह आदि छह गुणोंको जानने-वाले कञ्चुकीके वचन सुनकर धीरे धीरे जिसकी लज्जा छूटती जा रही है, जिसकी लीलापूर्ण दृष्टि बड़ी चञ्चल है तथा उस समय जन्मान्तरका स्नेह नेत्रोंके द्वारा देखीहुई जयकुमारकी सुन्दर आकृति, कुन्दके फूलके समान सुने हुए उसके गुण और कामदेव इन सबने उठाकर जिसे रथसे नीचे उतारा है ऐसी कन्या सुलोचनाने कंचुकीके हाथसे रत्न-माला लेकर तथा अतिशय प्रेममें निमग्न होकर, वह मनोहरमाला उस जयकुमारके गलेमें डाल दी। उस समय वह माला जयकुमारके वक्षःस्थलपर अधिरूढ़ हो दूसरी लक्ष्मीके समान सुशोभित हो रही थी ।। ३२६-३२९।।
Thus, hearing the words of the chamberlain—who was well-versed in the six diplomatic strategies such as alliance and war, and who now spoke on behalf of Kāma himself—there stood Sulochanā, her modesty slowly slipping away, her playful glances ever more restless. In that moment, the tender affection of a former birth, the sight of Jayakumāra’s radiant form as beheld by her eyes, the virtues of his character likened to jasmine blossoms that had reached her ears, and the workings of Love himself—all these together seemed to lift her down from her chariot.
Receiving from the chamberlain the garland of precious gems, and wholly immersed in profound love, the maiden Sulochanā placed that exquisite garland upon the neck of Jayakumāra. At that moment, the garland, resting upon his chest, shone forth with the splendour of a second Lakṣmī, adorning him in resplendent beauty. ॥326–329॥
श्लोक ( Shlok ) 330
सहसा सर्वतूर्याणामुदतिष्ठन्महाध्वनिः । श्रावयन्निव दिक्कन्याः कन्यासामान्यमुत्सवम् ॥ ३३०।।
उस समय अकस्मात् सब बाजोंकी बड़ी भारी आवाज ऐसी उठी थी मानो दिशारूपी कन्याओंके लिये सुलोचनाका असाधारण उत्सव ही सुना रही हो ॥३३०।।
At that very moment, a sudden and thunderous burst of musical instruments arose, as though announcing to the maidens of the quarters the celebration of an extraordinary festival held in honour of Sulochanā. ॥330॥
श्लोक ( Shlok ) 331
वक्त्रवारिजवासिन्या नरविद्यावरेशिनाम् । श्रिया जयमुखाम्भोजमाश्रितं वा तदात्यभात् ॥३३१॥
उस समय जयकुमारका मुखरूपी कमल बहुत ही अधिक सशोभित हो रहा था और ऐसा जान पड़ता था मानो भूमिगोचरी तथा विद्याधर राजाओंके मुखरूपी कमलोंपर निवास करनेवाली लक्ष्मी उसी एकके मुखपर आ गई हो ।॥ ३३१॥
At that moment, the lotus-like face of Jayakumāra shone with exceptional splendour, appearing as though the goddess Lakṣmī—who dwells upon the lotus-faces of earthly and celestial kings alike—had forsaken them all to reside solely upon his countenance. ॥331॥
श्लोक 332 से 339
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158
आदिपुराण पर्व 42 – भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 46 | श्लोक 47 से 69 | श्लोक 70 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 264 | श्लोक 265 से 275 | श्लोक 276 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321
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