आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 322 | श्लोक 323 से 331
श्लोक 332 से 341 जयकुमार की विजय
जयकुमार के मित्र देव ने उसे नागपाश और अर्द्धचन्द्र बाण दिए। जयकुमार ने इन बाणों से अष्टचन्द्र विद्याधरों और उनके रथों को नष्ट कर दिया। अर्ककीर्ति पराजित होकर चेष्टाहीन खड़ा रहा। जयकुमार ने उसे और अन्य शत्रु राजाओं को नागपाश से बाँध लिया।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 44- Shlok 332 to 341
श्लोक ( Shlok ) 332
“सानुजोऽनन्तसेनोऽपि प्राप मेघस्वरानुजान् । आङ्गरेयो यथा यूथः कलिङ्गज “मतङ्गजान् ॥३३२॥
जिस प्रकार अंग देशमे उत्पन्न हुए हाथियोंका समह कलिंग देश में उत्पन्न हुए हाथियोंपर पड़ता है उसी प्रकार अनंत-सेन भी अपने छोटे भाइयोंसहित जयकुमारके छोटे भाइयोंके सामने जा पहुँचा ॥३३२॥
Just as a herd of elephants born in the land of Aṅga charges upon those from Kaliṅga, even so did Ananta-sena, with his younger brothers in tow, advance to face the younger brothers of Jayakumāra.332
श्लोक ( Shlok ) 333
अन्येऽप्यन्यांश्च भूपाला भूपालान्कोपिनस्तदा । आनिपेतुः कुलाद्रीन्वा सञ्चरन्तः कुलाचलाः ॥३३३॥
उस समय और भी राजा लोग क्रोधित होते हुए अन्य राजाओंपर इस प्रकार जा टूटे मानो कुलाचल कुलाचलोंपर टूट पड़ रहे हों ।॥ ३३३॥
At that moment, other kings too, inflamed with fury, fell upon their rivals with such force as though the mountains of Kulācal themselves were crashing against one another.333
श्लोक ( Shlok ) 334 –335
नास्त्येषामीदृशी शक्तिर्विद्येयमिति विद्यया । जयो युद्धाय सन्नद्धस्तदा “मित्रभुजङ्गमः ॥३३४॥’ विदित्वा विष्टराकम्पाज्जयं सम्प्राप्य सादरः । नागपाशं शरं चार्द्धचन्द्रं दत्त्वा ययावसौ ॥३३५॥
इन मेरे पक्षवालोंकी न तो ऐसी शक्ति है और न यह विद्या ही है ऐसा समझकर जयकुमार स्वयं युद्धके लिये तैयार हुआ, उसी समय उसका मित्र सर्पका जीव जो कि देव हुआ था आसन कम्पित होनेसे सब समाचार जानकर बड़े आदरके साथ जयकुमारके पास आया और नागपाश तथा अर्द्धचन्द्र नामका बाण देकर चला गया ।।३३४-३३५॥
Perceiving that his allies lacked both the strength and the mystic powers needed for such a battle, Jayakumāra himself readied for war. At that very moment, his friend—the spirit of a serpent who had taken divine form—felt his heavenly seat tremble, and thus, understanding all that had transpired, descended with great reverence to Jayakumāra. There he bestowed upon him two mighty missiles: the Nāgapāśa (Serpent-Noose) and the Ardhachandra (Crescent) arrow, and then departed. 334 –335
श्लोक ( Shlok ) 336
तं सहस्रसहस्रांशुस्फुरदंशुप्रभास्वरम् । कौरवः शरमादाय वज्रकाण्डे प्रयोजयन् ॥३३६॥
जो हजार सूर्यकी चमकती हुई किरणोंके समान देदीप्यमान हो रहा था ऐसा वह बाण लेकर जयकुमारने अपने वज्रकाण्ड नामके धनुषपर चढ़ाया ॥३३६।।
That radiant missile, blazing like the gleaming rays of a thousand suns, was taken up by Jayakumāra and fitted to his mighty bow, Vajrakāṇḍa.336
श्लोक ( Shlok ) 337
हत एव सुतो ‘भर्तुर्भुवोऽनेनेति सम्भ्रमम् । नरविद्याधराधीशा महान्तमुदपादयन् ॥ ३३७॥
इस बाणसे चक्रवर्तीका पुत्र अवश्य ही मारा जायगा यह जानकर भूमिगोचरी और विद्याधरोंके अधिपति राजाओंने बड़ा भारी क्षोभ उत्पन्न किया ॥ ३३७॥
Realizing that this arrow would surely bring death to the son of the Cakravartin, the terrestrial kings and the lords of the Vidyādharas were seized with great agitation and dismay.337
श्लोक ( Shlok ) 338
रथान्नव तथा दुष्टानष्टचन्द्रान् ससारथीन् । स शरो भस्मयामास शस्त्राणि च यथाऽशनिः ॥३३८॥
उस बाणने नौ रथ, सारथि सहित आठो अष्टचन्द्र और सब बाण वज्रकी तरह भस्म कर दिये ॥ ३३८॥
That arrow, blazing with unfathomable power, struck with the fury of a thunderbolt—reducing to ashes nine chariots, the eight Aṣṭacandra warriors along with their charioteers, and every arrow they had loosed. 338
श्लोक ( Shlok ) 339
छिन्नदन्तकरो दन्तीवान्तको वा हतायुधः । भग्नमानः कुमारोऽस्थाद् धिक्कष्टं चेष्टितं विधेः ॥३३९ ।॥
जिसका मान भंग हो गया है ऐसा अर्ककीति, जिसके दांत और सूंड़ कट गई है ऐसे हाथीके समान अथवा जिसका शस्त्र नष्ट हो गया है ऐसे यमराजकी तरह चेष्टा रहित खड़ा था इसलिये कहना पड़ता है कि दैवकी इस दुःख देनेवाली चेष्टाको धिक्कार हो ॥ ३३९॥
Arkakīrti, his pride shattered, stood motionless—like an elephant whose tusks and trunk had been severed, or like Yama himself bereft of his weapon. One could only exclaim: “Fie upon this cruel sport of Fate!” 339
श्लोक ( Shlok ) 340
इति दत्तग्रहं वीरं गजं वा पादपाशकैः । अपायुधैरुपायज्ञे विधिज्ञस्तम “जीग्रहत् ॥३४०।।
जिस प्रकार शस्त्ररहित किन्तु उपायको जाननेवाले पुरुष पैरोंकी फांससे दांतोंको दबोचकर वीर हाथीको पकड़ लेते हैं उसी प्रकार जयकुमारने अर्ककीतिको पकड़ लिया ॥३४०॥
Just as a man, though unarmed yet skilled in strategy, subdues a mighty elephant by snaring its feet and seizing it with his teeth, even so did Jayakumāra seize Arkakīrti and bring him under his control.340
श्लोक ( Shlok ) 341
तच्छौर्य यत्पराभूतेः प्राक् प्राप्तपरिभूतिभिः । यत्पश्चात्साहसं धाष्टर्यात् स द्वितीयः पराभवः ॥३४१॥
तिरस्कार होनेके पहले पहले जो लड़ना है वह शूरवीरता है और तिरस्कार प्राप्तकर धृष्टतावश जो पीछेसे लड़ना है वह दूसरा तिरस्कार है ॥ ३४१॥
To fight before one is scorned—that is true valour;but to strike back from behind, out of arrogance, after being dishonoured—that is but a second disgrace. 341
श्लोक 342 से 352
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कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208
आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 46 | श्लोक 47 से 69 | श्लोक 70 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 264 | श्लोक 265 से 275 | श्लोक 276 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 332 से 339
आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 103 | श्लोक 104 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 203 | श्लोक 204 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 322 | श्लोक 323 से 331