आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 203 | श्लोक 204 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 241
श्लोक 242 से 251 मेघप्रभ की विजय और जयकुमार का संदेश
मेघप्रभ ने सुनमि को परास्त किया, जिससे जयकुमार की विजय पुष्ट हुई। जयकुमार ने अर्ककीर्ति को संदेश दिया कि चक्रवर्ती के न्याय मार्ग का पालन करना चाहिए। उसने अर्ककीर्ति के क्रोध को दुराचारियों का परिणाम बताया और युद्ध बंद करने की सलाह दी। उसने कहा कि अन्याय से चक्रवर्ती को पीड़ा होगी और वह दुष्टों को बाँधकर अर्ककीर्ति को सौंप देगा।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 44- Shlok 242 to 251
श्लोक ( Shlok ) 242
तमोऽग्निगजमेघादिविद्याः सुनमियोजिताः । तुच्छीकृत्य स विच्छिद्य (?) सहसा भास्करादिभिः ll२४२ ll
मेघप्रभने सुनमिके द्वारा चलाये हुए तमोबाण, अग्नि बाण, गजबाण और मेघ बाण आदि विद्यामयी वाणोंको सूर्य बाण, जल बाण, सिंह बाण और पवन बाण आदि अनेक विद्यामयी बाणोंसे तुच्छ समझकर बहुत शीघ्र नष्ट कर दिया ।। २४२।।
Meghaprabha, deeming as insignificant the enchanted missiles unleashed by Sunami—darts of darkness, fire, elephants, and clouds—swiftly countered and annihilated them with a multitude of his own magical weapons: radiant sun-arrows, fluid water-arrows, ferocious lion-arrows, and tempestuous wind-arrows.242
श्लोक ( Shlok ) 243
जयपुण्योदयात्तद्यो विजिग्ये खचराधिपम् । सङ्ग्रामेऽ नुगुणे दैवे “क्षोदिमा बंहिमेति न ॥२४३॥
इस प्रकार मेघप्रभने उस युद्धमें जयकुमारके पुण्योदयसे विद्याधरोंके अधिपति सुनमिको शीघ्र ही जीत लिया सो ठीक ही है क्योंकि दैवके अनुकूल रहनेपर छोटापन और बड़प्पनका व्यवहार नहीं होता है । भावार्थ-भाग्यके अनुकूल होनेपर छोटा भी जीत जाता है और बड़ा भी हार जाता है ॥२४३।।
Thus, in that great battle, Meghaprabha—favored by the rising tide of Jayakumar’s merit—soon conquered Sunami, the lord of the Vidyādharas. And rightly so, for when fortune stands in one’s favor, all distinctions of greatness and smallness lose their sway; even the lesser prevails, while the mightier may fall.
Bhāvārtha (Interpretive Meaning):
When destiny is favorable, even the seemingly insignificant can triumph, and the mighty may face defeat.243
श्लोक ( Shlok ) 244
प्रवृंद्धप्रावृडारम्भसम्भृताम्भोधरावलिम् । “विलङ्घ्यानेक पानीकं कौमारं जयमारुणत् ॥२४४॥
बढ़ी हुई वर्षाऋतुके प्रारम्भमें इकट्ठी हुई मेघमालाके समान हाथियोंकी सेनाको उल्लंघनकर अर्कैकीतिके पक्षके लोगोंने जयकुमारको रोक लिया ॥२४४।।
Like a dense mass of storm-clouds gathering at the onset of the monsoon, the elephant forces surged forth; yet the warriors of Arkaikīti’s side broke through their ranks and succeeded in halting Jayakumar. 244
श्लोक ( Shlok ) 245
जयोऽव्यभिमुखीकृत्य विजयार्द्ध गजाधिषम् । धीरोद्धतं रुषा प्राप्तं धीरोदात्तो ऽब्रवीदिदम् ॥२४५॥
इधर धीर और उदात्त जयकुमारने भी अपना विजयार्ध नामका श्रेष्ठ हाथी क्रोधसे प्राप्त हुए धीर तथा उद्धत अर्ककीतिके सामने चलाकर उससे इस प्रकार कहना शुरू किया ॥ २४५॥
Meanwhile, the steadfast and noble Jayakumar, mounting his exalted elephant named Vijayārdha, advanced with resolute fury toward the impetuous and arrogant Arkaikīti, and thus began to address him.245
श्लोक ( Shlok ) 246
न्यायमार्णाः प्रवर्त्यन्ते सम्यक् सर्वेऽपि चक्रिणा । तेषामेभिर्दुराचारैः कृतस्त्वं पारिपन्थिकः ॥२४६॥
वह कहने लगा कि चक्रवर्ती के द्वारा सभी न्याय मार्ग अच्छी तरह चलाये जाते हैं परन्तु इन दुरा-चारी लोगोंने तुझे उन न्यायमार्गोंका शत्रु बना दिया है ॥ २४६॥
He began to say, “The paths of righteousness are well upheld by the Chakravartin, yet these wicked ones have turned you into an enemy of that very justice.”246
श्लोक ( Shlok ) 247
बुद्धिमांस्त्वं तवाहार्य बुद्धित्वमपि दूषणम् । कुमार नीयसे “पापैस्तृतीयं तद्विगर्हितम् ॥२४७॥
हे कुमार, यद्यपि तू बुद्धिमान है परन्तु आहार्य बुद्धिवाला होना अर्थात् दूसरे के कहे अनुसार कार्य करना यह तेरा दोष भी है। इसके सिवाय तूं पाप या पापी पुरुषोंके अनुकूल हो रहा है सो यह भी तेरा तीसरा दूषण है ।।२४७।।
“O Prince, though you possess intelligence, your flaw lies in being guided by an acquired mind—that is, acting merely on the counsel of others. Moreover, you lend your favor to sin and to sinful men, and that, too, is a grave blemish upon you.”247
श्लोक ( Shlok ) 248
अन्तःकोपोऽप्ययं पापैर्महानु त्थापितो पृथा । सर्वतन्त्रक्षयो भर्तुः सहसा येन तादृशः ॥२४८॥
इन पापी लोगोंने तेरे अन्त. करणमें यह बड़ा भारी क्रोध व्यर्थ ही उत्पन्न कर दिया है जिससे भरत महाराजकी सब सेनाका ऐसा एक साथ क्षय हो रहा है ।।२४८।।
These wicked men have needlessly stirred a fierce wrath within your heart, and as a result, the entire army of Emperor Bharata is being destroyed all at once. 248
श्लोक ( Shlok ) 249
आहवोऽपरिहार्योऽयं ममाद्य भवता सह । अकीर्तिश्चावयो रस्मिन्नाकल्पस्थायिनी ध्रु वम् ॥२४९॥
मेरा आपके साथ जो युद्ध चल रहा है वह आज ही बन्द कर देने योग्य है क्योंकि इससे हम दोनोंकी कल्पान्तकाल तक टिकनेवाली अपकीति अवश्य होगी ॥ २४९ ॥
This battle between us ought to be brought to an end this very day, for it shall surely leave behind a lasting disgrace upon us both—one that will endure until the end of the age.249
श्लोक ( Shlok ) 250
चक्री सुतेषु राज्यस्य योग्यं त्वामेव मन्यते । स्यात्तस्यापि मनःपीडा न वेत्यन्यायवर्तनात् ॥२५०।।
चक्रवर्ती सब पुत्रों में राज्यके योग्य आपको ही मानता है, क्या आपके इस अन्यायमें प्रवृत्ति करनेसे उसके मनको पीड़ा नहीं होगी ? ॥ २५० ॥
Among all his sons, the Chakravartin deems you alone worthy of the throne—shall his heart not be grieved, seeing you now inclined toward such unrighteousness?250
श्लोक ( Shlok ) 251
द्रोग्धॄन्न्यायस्य भूभर्तुस्तव चैतांस्ततः क्षणात् । दुष्टान् सखेच॑रान् सर्वान् बध्वाद्य भवतोऽर्पये ॥२५१॥
भरत महाराजके न्यायमार्गका द्रोह करनेवाले तुम्हारे इन सभी दुष्ट पुरुषोंको विद्याधरोंके साथ साथ बांधकर आज क्षणभरमें ही तुम्हें सौप देता हूँ ॥२५१।।
All these wicked men of yours, who have betrayed the path of justice laid down by Emperor Bharata—I shall, within but a moment, bind them along with the Vidyādharas and deliver them into your hands today. 251
श्लोक 252 से 261
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208
आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 46 | श्लोक 47 से 69 | श्लोक 70 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 264 | श्लोक 265 से 275 | श्लोक 276 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 332 से 339
आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 103 | श्लोक 104 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 203 | श्लोक 204 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 241