आदिपुराण पर्व 39 – दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151
श्लोक 152 से 161 सद्गृहित्व और पारिव्रज्य क्रिया
चार आश्रमों के भेदों से अनेक प्रकार की शुद्धि प्राप्त होती है, जिनका विस्तार ग्रंथ वृद्धि के भय से नहीं किया गया। दूसरी ‘सद्गृहित्व’ क्रिया में गृहस्थ धर्म का पालन कर भव्य दीक्षा ग्रहण करता है, जिसे ‘पारिव्रज्य’ कहते हैं। यह तीसरी क्रिया है, जिसमें ममत्व त्यागकर दिगंबर रूप धारण किया जाता है। मोक्ष की इच्छा वाला भव्य शुभ तिथि, नक्षत्र, और योग में विशुद्ध कुल-चरित्र वाले आचार्य से दीक्षा लेता है। अशुभ समय (ग्रहण, मेघ, नष्ट मास आदि) में दीक्षा नहीं दी जाती। असमय दीक्षा देने वाला आचार्य संघ से बहिष्कृत होता है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 39- Shlok 152 to 161
श्लोक ( Shlok ) 152
ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थोऽथ भिक्षुकः । इत्याश्रमास्तु जैनानामुत्तरोत्तरशुद्धितः ॥१५२॥
ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और भिक्षुक ये जैनियोंके चार आश्रम हैं जो कि उत्तरोत्तर अधिक विशुद्धि होनेसे प्राप्त होते हैं ।॥१५२॥
The four Āśramas of the Jains—Brahmacāri, Gṛhastha, Vānaprastha, and Bhikṣuka—are attained through successive stages of ever-increasing purity.152
श्लोक ( Shlok ) 153
ज्ञातव्याः स्युः प्रपञ्चेन सान्तर्भेदाः पृथग्विधाः । ग्रन्थगौरवभीत्या तु नात्रैतेषां प्रपञ्चना ॥१५३॥
ये चारों ही आश्रम अपने अपने अन्तर्भेदोंसे सहित होकर अनेक प्रकारके हो जाते हैं, उनका विस्तारके साथ ज्ञान प्राप्त करना चाहिये परन्तु ग्रन्थ बढ़ जानेके भयसे यहाँ उनका विस्तार नहीं लिखा है ।। १५३।।
These four Āśramas, along with their respective inner distinctions, manifest in various forms and types. One should strive to understand them in detail; yet, out of concern for the growing length of this text, their full elaboration is not given here.153
श्लोक ( Shlok ) 154
सद्गृहित्वमिदं ज्ञेयं गुणैरात्मोपबृंहणम् । पारिव्राज्यमितो वक्ष्ये सुविशुद्धं क्रियान्तरम् ॥१५४।॥इति सद्गुहित्वम् ।
इस प्रकार गुणोंके द्वारा अपने आत्माकी वृद्धि करना यह सद्गृहित्व क्रिया है। अब इसके आगे अत्यन्त विशुद्ध पारिव्रज्य नामकी तीसरी क्रियाका निरूपण करेंगे ।।१५४।। यह दूसरी सद्गृहित्व क्रिया है।
Thus, the cultivation of the soul’s virtues through righteous means is the sat-gṛhitva-kriyā—the noble householder’s practice.
Now, proceeding further, I shall describe the third practice, known as the supremely pure pārivrajya—the life of renunciation.(This verse marks the conclusion of the second sat-gṛhitva-kriyā—the noble householder’s practice.) 154
श्लोक ( Shlok ) 155
गार्हस्थ्यमनुपाल्यैवं गृहवासाद् विरज्यतः । यद्दीक्षाग्रहणं तद्धि पारिव्राज्यं प्रचक्ष्यते ॥१५५॥
इस प्रकार गृहस्थधर्मका पालन कर घरके निवाससे विरक्त होते हुए पुरुषका जो दीक्षा ग्रहण करना है उसे पारिव्रज्य कहते हैं ।॥ १५५।।
Thus, a man who, while observing the duties of a householder, grows detached from the household and ultimately receives initiation into renunciation—this is called pārivrajya, the life of a wandering ascetic.155
श्लोक ( Shlok ) 156
पारिव्राज्यं परिव्राजो भावो निर्वाणदीक्षणम् । तत्र निर्ममता वृत्त्या जातरूपस्य धारणम् ॥१५६॥
परिव्राट्का जो निर्वाणदीक्षारूप भाव है उसे पारिव्रज्य कहते हैं, इस पारिव्रज्य क्रियामें ममत्व भाव छोड़कर दिगम्बररूप धारण करना पड़ता है ॥१५६॥
The Parivrajya, signifying initiation unto liberation (nirvāṇa-dīkṣā), is called Pārivrajya. In this practice of renunciation, one must relinquish all sense of mamatva (attachment to self) and adopt the form of a Digambara ascetic.156
श्लोक ( Shlok ) 157
प्रशस्त तिथिनक्षत्रयोगलग्न ग्रहांशके । निर्ग्रन्थाचार्यमाश्रित्य दीक्षा ग्राह्या मुमुक्षुणा ॥१५७ll
मोक्षकी इच्छा करनेवाले पुरुषको शुभ तिथि, शुभ नक्षत्र, शुभ योग, शुभ लग्न और शुभ ग्रहोंके अंशमें निर्ग्रन्थ आचार्यके पास जाकर दीक्षा ग्रहण करनी चाहिये ।।१५७।।
A man who desires liberation should seek initiation from a Nirgrantha Acharya at an auspicious date, in a favorable constellation, under a propitious yoga, during an auspicious lagna, and when the planets are well-positioned.157
श्लोक ( Shlok ) 158
विशुद्धकुलगोत्रस्य सद् वृत्तस्य वपुष्मतः ।दीक्षायोग्यत्वमाम्नातं सुमुखस्य सुमेधसः ॥१५८॥
जिसका कुल और गोत्र विशुद्ध है, चरित्र उत्तम है, मुख सुन्दर है और प्रतिभा अच्छी है ऐसा पुरुष ही दीक्षा ग्रहण करने के योग्य माना गया है ॥ १५८॥
He whose lineage and clan are pure, whose character is exemplary, whose countenance is pleasing, and whose intellect is sharp—such a man alone is deemed worthy to receive initiation.158
श्लोक ( Shlok ) 159 –160
“ग्रहोपरागग्रहणे परिवेषेन्द्रचापयोः । वक्रग्रहोदये मेघपटलस्थगितेऽम्बरे ॥१५९॥’नष्टाधिमासविनयोः संक्रान्तौ हानिमत्तिथौ । द्वीक्षाविधि मुमुक्षूणां नेच्छन्ति कृतबुद्धयः ॥१६०॥
जिस दिन ग्रहोंका उपराग हो, ग्रहण लगा हो, सूर्य-चन्द्रमापर परिवेष (मण्डल) हो, इन्द्रधनुष उठा हो, दुष्ट ग्रहोंका उदय हो, आकाश मेघपटलसे ढका हुआ हो, नष्ट मास अथवा अधिक मासका दिन हो, संक्रान्ति हो अथवा क्षयतिथिका दिन हो उस दिन बुद्धिमान् आचार्य मोक्षकी इच्छा करनेवाले भव्योंके लिये दीक्षाकी विधि नहीं करना चाहते हैं अर्थात् उस दिन किसी शिष्यको नवीन दीक्षा नहीं देते हैं ।॥ १५९-१६०।।
On a day when the planets are afflicted, an eclipse occurs, the sun or moon is surrounded by halos, a rainbow appears, malefic planets rise, the sky is overcast with clouds, it is the day of a lost or an intercalary month, or it falls on a solar ingress (saṅkrānti) or a waning lunar phase—on such a day, the wise Acharya refrains from performing initiation rites for aspirants seeking liberation; in other words, no new disciple is initiated on such inauspicious days.159 –160
श्लोक ( Shlok ) 161
सम्प्रदायमनादृत्य यस्त्विमं दीक्षयेदधीः । सः साधुभिर्बहिः कार्यों वृद्धात्यासादनारतः ॥१६१॥
जो मन्दबुद्धि आचार्य इस सम्प्रदायका अनादर कर नवीन शिष्यको दीक्षा दे देता है वह वृद्ध पुरुषोंके उल्लंघन करनेमें तत्पर होनेसे अन्य साधुओंके द्वारा बहिष्कार कर देने योग्य है। भावार्थ जो आचार्य असमय-में ही शिष्योंको दीक्षा दे देता है वह वृद्ध आचार्योंकी मान्यताको उल्लंघन करता है इसलिये साधुओंको चाहिये कि वे ऐसे आचार्यको अपने संघसे बाहर कर दे ।। १६१।।
An ignorant Acharya who, out of disregard for this tradition, initiates new disciples untimely—thus violating the elders’ authority—is deserving of ostracism by the community of monks.
Meaning: One who confers initiation at an improper time breaches the respect due to senior Acharyas; therefore, the monks ought to expel such an Acharya from their order.161
श्लोक 162 से 171
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205
आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223 | श्लोक 224 से 231 | श्लोक 232 से 240 | श्लोक 241 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 293 | श्लोक 294 से 303 | श्लोक 304 से 313
आदिपुराण पर्व 39 – दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151
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